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देवताओं के क़िस्से ख़त्म हो चुके





मनोज कुमार झा की पाँच नई कविताएँ


टूटे पत्थरों से पहाड़ बनाने हैं

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देवताओं के क़िस्से ख़त्म हो चुके हैं
अब वहां हांफता पूर्णविराम है
और थकाने वाली उदासी

मनुष्यों के किस्सों का तो आरम्भ है
आओ सँपेरों, चरवाहों, मछुआरों
पहाड़ तोड़ने वालों
अब तुम्हें टूटे पत्थरों से पहाड़ बनाने हैं।
*

दुःख
____

मैं दुःख कहता था
तो मां जली हुई रोटी समझती थी
मैं बार बार दुःख कहता था
दुःख का अनुवाद बार बार अधूरा रह जाता था

एक बार एक चुप्पा चरवाहे ने कहा
जिसे कुछ लोग पागल भी कहते हैं
कि चिड़ियों का दुःख पंख है
जिसके कारण पृथ्वी उन्हें आसमान में धकेल देती है
मुझे आश्चर्य हुआ
कि क्या मेरा दुःख मन है
जिस कारण राजा का चेहरा गिद्ध के चेहरे की तरह दिखता है।
**

सारा जीवन
_________

बारिश होती थी तो कागज की नाव बनाता था
नाव थोड़ी दूर चलती और गल जाती थी
गलना तब सहज क्रिया थी
दूसरी नाव बनाने की पूर्व-कथा।

तब पता नहीं था कि बाद में
नदियों को पार करने का समय आएगा तो भी
कागज की नाव ही मिलेगी
एक नष्ट हो रहे जीवन की उत्तर-कथा।
***

ट्रोलिंग
_____

गालियां यहां सही होने का फल है
उन गालियों को भूल जाओ
जो स्कूल में तुम्हारे दोस्त या दुश्मन देते थे

यह कई चक्कर काट कर आई गालियां हैं
जिसे घृणा के सबसे नापाक कीमिया से बनाया गया है।
****

दूसरे का
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तुम कहते हो तुम्हारी देह अपनी है
मेरा तो  अंगूठा भी अपना नहीं

जब अंगूठे का निशान लगाता हूं
तो धूलकण दौड़े आते हैं
अंगूठे से चिपकने

और कई लोग आ जाते हैं
अंगूठे का निशान मांगने। 
*****

___________________________________ सबद पर मनोज की अन्य कविताएँ यहाँ

Comments

बेहतरीन कविताएँ,हमेशा की तरह।
बेहद गहन संवेदना,अपार करुणा और सधी संरचना में रची-पगी।
Amarnath Jha said…
बहुत मार्मिक कवितायें
Sharda Jha said…
वाह! बार बार पढ़कर उसमें डूबता है मन और उस दुःख को जीता भी है शायद। हार्दिक आभार शेयर करने के लिए।
मनोज जी को पढ़ना कितना सुखद होता है।
Shipra Kiran said…
वाह। बहुत अच्छी कविताएँ।
Navin Kumar said…
दर्शन की बुनियाद पर खड़ा सच्चा कवि !
कम शब्द वज़न ज़्यादा...
सम्वेदनाओं से पूरित कविताएँ पढ़कर अच्छा लगा। दुःख का मतलब जली रोटी में उभरता बिम्ब पूरी सभ्यता का मर्म कह जाता है।
Anupama Tiwari said…
छोटी -छोटी बहुत गहरी कविताएँ। हार्दिक शुभकामनाएं।

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