Monday, February 12, 2018

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 9 : पढ़ना भी एक कला है






अपने जीवन में पहला उपन्यास जो मैंने पूरा पढ़ा था, वह था- शिवप्रसाद सिंह का ‘गली आगे मुड़ती है।’ तब मैं सत्रह साल का था। पढ़ते ही मुझे शिवप्रसाद सिंह, रामानंद तिवारी (उपन्यास का नायक) और बनारस से प्यार हो गया। तब तक मुझे शिवप्रसाद सिंह की कीर्ति व अन्य बातों का कोई अंदाज़ा नहीं था, न ही कोई चिंता थी। मैंने तो बस एक किताब पढ़ी थी और उसके प्रेम में पड़ गया था। उस साधारण पाठक की तरह, जिसे किताब के शब्दों के अलावा लेखक के बारे में कोई जानकारी नहीं होती। मुझे लगता था, रामानंद तिवारी ही शिवप्रसाद सिंह है। किताब में वह संघर्ष करता है, ट्यूशन पढ़ाता है, धर्मभीरु रिश्तेदारों से बहस करता है, बनारस के भूगोल में भटकता है, मणिकर्णिका व दशाश्वमेध पर चिरायंध गंध को महसूस करता है, गंगा को नए-नए रंगों में देखता है, एक लड़की से प्रेम करता है, उसके विरह में दूसरी को दिल दे बैठता है, फिर उलझ जाता है कि किसको छोड़े, किसको पाये। उलझन की गली कभी सीधी नहीं चलती, आगे जाकर मुड़ जाती है।

मैं शिवप्रसाद सिंह की किताबें खोजने लगा। तग़ादे कर-करके मुंबई के एक पुस्तक-विक्रेता की जान खा ली। उनकी संपूर्ण कहानियों के दोनों खंड पढ़ लिए। उनका पहला उपन्यास ‘अलग-अलग वैतरणी’ भी पढ़कर पसंद कर ली। ‘नीला चाँद’ पर आकर अटक गया। उनका सबसे प्रसिद्ध उपन्यास। 650 पेज। भारी-भरकम हिंदी, अतिशयोक्ति अलंकार का स्वच्छंद प्रयोग, भावुक संवाद, नाटकीय परिस्थितियाँ.... ओह माय गॉड! यह क्या है? यह ‘गली...’ का ही लेखक है या कोई और? उस उम्र में भवानी मेरे माथे में रहतीं। ज़रा-सी बात पर सरक जातीं। किताब पूरी होते ही मेरी भवानी सरक गईं। आव देखा न ताव, लंबी-सी चिट्‌ठी में अपना परिचय, रामानंद तिवारी की भूरि-भूरि प्रशंसा और कीरत वर्मा (‘नीला चाँद’ का नायक) की चिंदियाँ बिखेरते हुए, उपन्यास की महत्वाकांक्षी नाटकीयता के प्रति अपनी पाठकीय निराशाओं को आवेश मिश्रित शालीन शब्दों में लिख मारा और किताब के फ्लैप पर छपे लेखक के बनारस वाले पते पर पोस्ट कर दिया।

मुझे उम्मीद भी नहीं थी कि उनका जवाब आ जाएगा। मेरी पाठकीय निराशा के बदले उन्होंने लेखकीय क्रोध लिखकर भेज दिया। उन्हें मेरी प्रामाणिकता पर संदेह था। उन्हें यक़ीन ही नहीं था कि सत्रह साल का कोई लड़का ऐसा विश्लेषणात्मक पत्र लिख सकता है, उपन्यास व महाकाव्य, यथार्थ व कल्पना, कथा में संवाद की अधिकता व न्यूनता जैसे प्रश्नों को उठा सकता है। उस पत्र के अनुसार, उनका पूरा विश्वास था कि गीत चतुर्वेदी नाम का कोई व्यक्ति नहीं है, यदि है तो वह सत्रह साल का नहीं है और हो न हो, यह मुंबई में रहनेवाला एक लेखक व नाटक-समीक्षक है (जिसने उनके साहित्य पर पीएच.डी. की थी, जिसे मैं तब तक जानता भी नहीं था और जिसका नाम मैं इस कॉलम में नहीं लिख रहा) जो छद्म नाम से उन पर हमला कर रहा है। उनका पूरा पत्र क्रोध, आशंका व व्यंग्य से भरा हुआ था।

आपद्धर्म जानकर मैंने बहस कर ली। और लंबा ख़त लिखा, जिसमें ‘गली...’ की श्रेष्ठता की दुहाई दी थी, ‘नीला चाँद’ के अ-श्रेष्ठ होने पर क्षोभ जताया था, पन्ना नंबर नोट कर-करके मुझे ग़ैर-ज़रूरी लगने वाली नाटकीयताओं की सूची बनाई थी, फिल्मी दृश्यों को अंडरलाइन करके उनकी फोटोकॉपी नत्थी कर दी थी। इस बार उनका जवाब संयत था और उन्होंने उपन्यास-कला के बारे में कई बातें लिखी थीं। हमारे बीच दो-तीन पत्रों का आदान-प्रदान और हुआ, जो उनके शुभाशीष के साथ समाप्त हो गया।

वह सब एक एडवेंचर की तरह था। कुछ दिनों तक मैं हवा में उड़ता रहा कि शिवप्रसाद सिंह के साथ मेरा सीधा संवाद है,  कि ‘नीला चाँद’ पर मैंने उनके साथ घनघोर बहस की है, कि मेरी प्रतिभा से वह प्रभावित हुए हैं आदि-आदि। लेकिन हक़ीक़त में वह सब नई-नई चढ़ी जवानी की सोडा-सनसनी थी।

समय बीतने के साथ, मैं उनकी तीखी प्रतिक्रिया के बारे में सोचता रहा। उन्होंने इतना क्रोध क्यों किया था? शिवप्रसाद सिंह बड़े लेखक थे। उनकी विद्वत्ता व स्वाध्याय उनकी किताबों से सहज ही झाँकते थे। एक-एक किताब के लिए बरसों की मेहनत थी। उनका जीवन भी कुछ कम विपत्ति-भरा नहीं था। बेटी की लंबी बीमारी व असमय मृत्यु ने उन्हें लगभग तोड़ दिया था। ये सब बातें बाद में पता चली थीं। साहित्यिक राजनीतियों, उससे मिली उपेक्षा आदि के बारे में तब भी पूरा अंदाज़ नहीं था।

उसके साथ ही मैं यह भी सोचता कि क्या मेरा इस तरह आवेश में आकर उन्हें पत्र लिखना सही था? मैं एक लेखक से लेखकीय संयम की उम्मीद करता हूँ, तो क्या एक पाठक के रूप में मेरे पास पाठकीय संयम था? मैं अपने प्रिय लेखक के प्रति पाठकीय आक्रोश जताऊँ, तो क्या लेखक को यह अधिकार नहीं कि वह एक अनजान पाठक पर कृति को न समझ पाने का आरोप लगाते हुए अपना लेखकीय आक्रोश निर्यात कर सके? लेकिन मेरे पास पाठक होने का लाइसेंस था। पाठक यानी किसी भी छोटी-बड़ी बात पर रचना को पसंद करके ख़ुश हो जाना या किसी भी छोटी-बड़ी बात पर नाराज़ होकर पूरी रचना को ही निरस्त कर देना। यह एक ख़तरनाक लाइसेंस है। इस लाइसेंस के आगे कोई तर्क नहीं चलता। ‘मुझे नहीं पसंद मतलब नहीं पसंद’ तर्क व संवाद की तमाम संभावनाओं को समाप्त कर देता है। कई पाठकों का रवैया हमेशा यही होता है। वे सही हैं या ग़लत, मैं इसमें नहीं जाना चाहता।

बरसों बाद मैंने ‘नीला चाँद’ दुबारा पढ़ी। उसके भी कई बरसों बाद तिबारा पढ़ी। वह उतनी बुरी किताब नहीं, जितना पहले पाठ के बाद मुझे लगी थी। उल्टे, वह एक बड़ा व महत्वपूर्ण उपन्यास है। गल्प की भारतीय अवधारणाओं से प्रतिश्रुत एक देसी उपन्यास, हालाँकि जो इतिहास पर लिखे उपन्यासों के क्लीशे से ख़ुद को मुक्त नहीं रख पाता, लेकिन उसके बावजूद एक विशिष्ट व पठनीय उपन्यास। इतिहास के जिन प्रसंगों से वह जूझता है, वे बेहद संवेदनशील हैं। ‘चारुचंद्रलेख’ में हजारीप्रसाद द्विवेदी जिन प्रश्नों से ख़ुद को बचा ले गए थे, शिवप्रसाद सिंह ‘नीला चाँद’ में अपने लिए उन्हीं प्रश्नों को चुनते हैं और बहुत दिलेरी व विवेक के साथ उनका सामना करते हैं। मुझे अतिशयोक्ति से शिकायत थी, पर मैं यह भूल गया था कि अतिशयोक्ति शुद्ध प्राचीन भारतीय अलंकार है। या यूँ कहें, जो प्राचीन संस्कृतियाँ दुनिया में अब भी बची हुई हैं, उन सबके कला-साहित्य में अतिशयोक्ति का प्रचुर प्रयोग होता रहा है, तो ग़लत नहीं होगा। इसका प्रयोग जितना भारतीय कलाओं में है, चीनी व फ़ारसी कलाओं में भी लगभग उतना ही है। ‘बाहुबली’ फिल्म देखते हुए मुझे नीला चाँद याद आता रहा था। उस फिल्म में भी अतिशयोक्ति का आलंकारिक प्रयोग है। सिनेमा के परदे पर वह जँच जाती है, उपन्यास में क्यों फँस जाती है? यह पाठक और दर्शक के तौर पर हमारे संस्कार हैं। एक पाठक के तौर पर उपन्यास से, ख़ासकर साहित्यिक उपन्यास से, हम कई सारी माँगें रखते हैं। ये माँगें ही पाठ के आनंद को बढ़ाती हैं। पाठक व पाठ के बीच बनने वाला द्वंद्वात्मक संबंध इसी से पुष्ट होता है।

मुझे अब भी ‘नीला चाँद’ से कई शिकायतें होती हैं, लेकिन यह ज़रूर है कि मैं अब उतना हार्श नहीं हो सकता, क्योंकि अब मैं यह मानता हूँ कि अच्छा पाठक बनने के लिए आपको अपने भीतर एक विशेष वृद्धता अर्जित करनी होती है। हम बार-बार लेखक की गुणवत्ता की जाँच व प्रश्नांकन करना चाहते हैं, अपनी वृद्धता का कोई पैमाना तय नहीं कर पाते, क्योंकि वैसा करना पूरी तरह संभव भी नहीं, और पाठक होने का लाइसेंस हमारी आंतरिक दुर्व्यवस्था की रक्षा कर रहा होता है।

बाद में मुझे पता चला कि ‘नीला चाँद’ पर कई तरह के हमले व बहस हुई थी। अपनी निजी त्रासदियों व उन हमलों ने शायद डॉ. सिंह को तिक्त व शंकालु बनाया हो। उस किताब की समीक्षा लिखना, उन्हें या ख़ुद को सही साबित करना, उन हमलों व बहसों में शामिल होना- ये सब मेरे उद्देश्य नहीं, लेकिन अपने जीवन के उस प्रसंग, शिवप्रसाद सिंह के साथ हुए अपने किशोरवयीन संवाद को याद करते हुए, किताब पढ़ने की विभिन्न आदतों के बारे में सोचता रहता हूँ। नौजवानी व उबलते ख़ून का सम्मान होना चाहिए, लेकिन मात्र वही निर्णायक नहीं होती। वृद्धताएँ कहीं से अनावश्यक नहीं होतीं, वे पुरातन भी नहीं होतीं। सोशल मीडिया के इस दौर में जब रचनाओं पर तुरत-फुरत प्रतिक्रियाएँ आती हैं, मुझे रचनाओं के ‘मंथर पाठ’ के बारे में सोचना कहीं अधिक सुहाता है। बीते बरसों में हमारे साहित्य-समाज ने पठन के कई तरीक़ों को खोया है। पाठ के समांतर चलने वाला चिंतन कम होता गया है। इसीलिए साहित्य की आलोचना लगभग निष्प्राण है। वह पाठ के नये तरीक़ों का अन्वेषण तो दूर, पुराने मान्य तरीक़ों को भी आज़माने में नाकाम होती जाती है। कुल्हाड़ी हमारे समय की आलोचना का प्रिय रूपक है। एक कुल्हाड़ी-पाठ, जिससे रचना के अंग-भंग हो जाएँ। एक कुल्हाड़ी-समीक्षा, जिससे रचना तितर-बितर हो जाए। ये दोनों काम बिना कुल्हाड़ी चलाए भी किए जा सकते हैं। गहरी अंतर्दृष्टि व यथोचित तर्कबोध के साथ भी किसी रचना को ख़ारिज किया जा सकता है, और तब आलोचना को पढ़ने का गंभीर सुख भी मिलता है, लेकिन कुल्हाड़ी-समीक्षा केवल सनसनी का सुख दे सकती है, उससे अतिरिक्त कुछ नहीं। वह यह भी बता देती है कि समीक्षक के पास अंतर्दृष्टि, तर्कबोध व सक्षम वैचारिक भाषा नहीं है, इसीलिए वह अपने साथ कुल्हाड़ी लेता आया है। कुल्हाड़ी यौवन का अनिवार्य विकार है, लेकिन जितनी जल्दी उससे पिंड छूटे, उतना अच्छा।

निबंध की अपनी नई किताब में पोलिश कवि एडम ज़गाएव्स्की ने किसी की ऐसी बातों पर क्षुब्ध होते हुए एक पंक्ति लिखी है – ‘युवा समीक्षक को यह नहीं भूलना चाहिए कि एक दिन वह भी मर जाएगा।’

यहाँ युवा बनाम उम्रदराज़ का द्वंद्व नहीं है, बल्कि चीज़ों को ग्रहण करने की क्षमता, स्वीकृति या अस्वीकृति की प्रामाणिक तार्किकता व उसे अभिव्यक्त करने की कलात्मकता का प्रश्न है।

वृद्धता की इस अवधारणा को ‘महाभारत’ में सुंदर वर्णित किया गया है। प्रसंग शिशुपालवध का है। युधिष्ठिर राजसूय यज्ञ करा रहे थे। उसे सफल बनाने के लिए वेद व्यास, विश्वामित्र, भारद्वाज, गौतम, वशिष्ठ यानी तमाम बड़े ऋषि आए थे। देश के सभी प्रमुख राज्यों के राजपुरुष भी पधारे थे, जिनमें भीष्म और द्रोण शामिल थे। समारोह की अध्यक्षता कौन करेगा, इस पर विचार होने लगा। सहदेव ने प्रस्ताव दिया कि कृष्ण को अध्यक्षता दी जाए। अधिकांश लोग इस पर सहमत हो गए। कुछेक सभासदों ने आपत्ति ली और भीष्म का नाम आगे करना चाहा, पर भीष्म ने ख़ुद कृष्ण के नाम का अनुमोदन किया। फिर उन्होंने तीन तरह की वृद्धताओं का उल्लेख किया।

पहला, आयुवृद्ध – जो व्यक्ति उम्र से बूढ़ा हो गया हो। ऐसे लोग बहुतायत में होते हैं क्योंकि सबकी आयु बढ़ेगी, सभी वृद्ध होंगे, लेकिन आयुवृद्ध होने वाला व्यक्ति सर्वश्रेष्ठ भी हो, यह ज़रूरी नहीं। सौ साल की आयु वाला व्यक्ति भी मूढ़ हो सकता है। अर्थात आयु कभी निर्णायक श्रेष्ठता नहीं हो सकती।

दूसरा, तपोवृद्ध – वह व्यक्ति जिसने अपने जीवन में घनघोर तप किए हों। वह भले आयुवृद्ध न हो, लेकिन वह आयुवृद्ध से श्रेष्ठ होगा, क्योंकि भरपूर तप ने उसकी आयु को खरा बनाया होगा। उसने साधारण जीवन न जिया होगा, बल्कि तप से अपने जीवन को यथेष्ट गहराई दी होगी। यहाँ तप यानी विभिन्न किस्म की साधना।

तीसरा, ज्ञानवृद्ध – वह व्यक्ति जिसने अपने जीवन में भरपूर तप किया हो और उससे ज्ञान भी प्राप्त किया हो। कई लोग तप तो कर लेते हैं, किंतु उससे ज्ञान नहीं प्राप्त कर पाते, इसलिए तपोवृद्ध से भी बेहतर है ज्ञानवृद्ध, क्योंकि उसके पास तप की भी पूँजी है और ज्ञान की भी, जो कि दुर्लभ है। ऐसे व्यक्ति की आयु कम भी हो, तो भी वह श्रेष्ठ होगा, क्योंकि चालीस की उम्र में ही उसने साठ जितना तप कर लिया होगा और अस्सी जितना ज्ञान पा लिया होगा। पैंतीस की उम्र में ज्ञान प्राप्त कर लेने वाले शाक्यमुनि भी ज्ञानवृद्ध ही कहलाएँगे।

कृष्ण ज्ञानवृद्ध थे। उनका तप व अर्जित ज्ञान असंदिग्ध था। इसीलिए भीष्म की दृष्टि में उस सभा की अध्यक्षता करने के वह सर्वयोग्य अधिकारी थे। (कहानी में आगे यह है कि शिशुपाल अंत तक इस बात को नहीं मान पाता, वह कृष्ण को अयोग्य बताते हुए उन्हें गाली देता है। कृष्ण ने शिशुपाल को सौ गालियाँ माफ़ कर रखी थीं। जैसे ही वह एक सौ एकवीं गाली देता है, कृष्ण अपने चक्र से उसका गला रेत देते हैं।)

वृद्धता की ऐसी सुंदर परिभाषा मुझे किसी अन्य ग्रंथ में नहीं मिली। किसी भी क्षेत्र में वृद्धता को इन तीन कसौटियों पर मापा जा सकता है। इसके बावजूद इस पर हमेशा बहस होती रहेगी क्योंकि तीसरी कसौटी ज्ञान है, जिसको मापने का कोई पैमाना नहीं होता, सब ख़ुद को ज्ञानी ही मानते हैं, उसके बावजूद चीज़ों को देखने का यह एक तरीक़ा हो सकता है। दूसरे को जज करने के बजाय इन पर ख़ुद को कसकर देखा जा सकता है और उस पाठकीय व कलात्मक वृद्धता को हासिल किया जा सकता है। एक पाठक या लेखक के रूप में उतना तप किया जाए। उसके बाद ज्ञान व विवेक भी प्राप्त किए जाएँ। उसके बाद भले ज्ञान को मापने में दिक़्क़त हो, फिर भी मन को शुद्धि या फिल्टर का एक बायस तो मिल ही जाएगा।

कला व साहित्य की एक बड़ी समस्या यह भी है कि इसमें श्रेष्ठता की कोई एक कसौटी नहीं होती। आधुनिक समय में ये कसौटियाँ तो लगभग छिन्न-भिन्न हो चुकी हैं। कहते हैं, अभिज्ञानशाकुंतलम को पढ़ने-देखने के बाद विक्रमादित्य ने कालिदास को महाकवि की उपाधि दे दी, तो सभा में मौजूद सारे कवियों ने आपत्ति ले ली कि ऐसे कैसे? नाटक लिखने से कोई महाकवि थोड़े हो जाता है। कालिदास पहले महाकाव्य लिखकर दिखाएँ, तब महाकवि माना जाएगा। विक्रमादित्य को उपाधि स्थगित करनी पड़ी थी और महाकाव्यों की रचना के बाद ही समकालीनों ने कालिदास को महाकवि माना।

श्रीहर्ष नैषिधीयचरितम लिखकर बैठे हुए थे, लेकिन कन्नौज के राजा ने मान्यता ही नहीं दी। कहा, पहले कश्मीर जाओ, वहाँ के राजा के निजी मंदिर में देवी सरस्वती रहती हैं, अपना महाकाव्य उन्हें पढ़वाओ, उनसे लिखाकर लाओ कि यह श्रेष्ठ कृति है, तब हम मान्यता देंगे। वहाँ तक पहुँचने में श्रीहर्ष को बहुत पापड़ बेलने पड़े। लंबे इंतज़ार के बाद जब देवी ने वह कृति पढ़ी, तो उसकी श्रेष्ठता का उद्घोष तुरंत किया।

ये सब पुरानी बातें हैं, किंवदंतियाँ हैं। ऐसी कई कथाएँ सुनाई जा सकती हैं, और इन सबसे पता चलता है कि उस पुराने ज़माने में भी साहित्य की श्रेष्ठता का कोई एक पैमाना नहीं था।

जिस लेखक को समकालीन श्रेष्ठ मानें, क्या वह श्रेष्ठ है? कोई गारंटी नहीं, क्योंकि हम सभी जानते हैं, समकालीन, राजनीति करते हैं। दल बनाकर, किसी के पक्ष में नारे लगाकर, औसत को भी श्रेष्ठ घोषित कर सकते हैं और श्रेष्ठ को इतना उपेक्षित कर सकते हैं कि वह रचनात्मक अवसाद में चला जाए। मोत्ज़ार्ट पर बनी फिल्म ‘अमादियस’ को याद किया जाए।

जिस लेखक को देवी, राजा या सत्ता श्रेष्ठ माने, क्या वह श्रेष्ठ है? कोई गारंटी नहीं, क्योंकि सत्ता की अपनी राजनीति होती है। विपक्षी विचार वाले का दमन कर देगी, पर श्रेष्ठ होने पर भी उसे श्रेष्ठ न कहेगी।

जिस लेखक को जनता श्रेष्ठ कहे, क्या वह श्रेष्ठ है? कोई गारंटी नहीं, क्योंकि जनता की रुचियाँ कई बार निम्नकोटि की भी हो सकती हैं। आज के युग में तो हम इसे महसूस भी कर सकते हैं।

फिर कौन-सा लेखक श्रेष्ठ है? कौन-सी किताब श्रेष्ठ है? कोई एक पैमाना नहीं। थोड़ा-थोड़ा सारे पैमानों का मिश्रण ही बता पाएगा। उसके बाद भी यह एक मूर्त प्रश्न का एक अमूर्त उत्तर बनेगा। यहीं पर पाठकीय वृद्धता अनमोल साबित होती है। यदि हमने तप, साधना व ज्ञान के माध्यम से उचित पाठकीय वृद्धता हासिल की है, तो हमें इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए बाहर की ओर नहीं देखना होगा। कृति के पाठ से ही हम समझ जाएँगे, भले हम अपनी समझ को पूरी तरह अभिव्यक्त न कर पाएँ। चाहे लेखन हो, पाठन हो, संपादन या साहित्यिक आलोचना, अंतत: अर्जित की हुई यही वृद्धता काम आती है। आयु चाहे कुछ भी हो। किसी कृति को प्राप्त हुई इस पाठकीय वृद्धता की बहुलता बहुत हद तक जाले साफ़ कर देती है।

यहाँ एक लेखक व पाठक के रूप में अपने संस्कारों की जाँच करते चलना भी बहुत ज़रूरी होता है। हम एक पाठक हैं या उपभोक्ता? अंतर्मन के उपयोगितावादी रुझान हमारे पाठक को उपभोक्ता में तब्दील करने में देर नहीं करते। हममें साहित्य का उपभोग करने की जल्दबाज़ी आ जाती है, हम एक ही पाठ से सारे अर्थों को पा लेना चाहते हैं, रचना में चार कठिन शब्द मिल जाएँ, तो हम यह आरोप लगाने लगते हैं कि यह आम जनता के लिए नहीं, बल्कि एक अभिजात वर्ग के लिए लिखी गई रचना है। तब हम लेखक से तमाम तरह की मेहनत की उम्मीद करने लगते हैं, लेकिन ख़ुद एक शब्दकोश खंगालकर उन शब्दों का अर्थ जानने जितनी मेहनत नहीं करना चाहते।

उपभोक्तावाद बार-बार अपने उपभोक्ता को यह विश्वास दिलाता है कि हमारी कंपनी का बनाया हुआ हर उत्पाद उपभोक्ता को संतुष्ट करेगा, क्योंकि हम कस्टमर या कंज्यूमर को ही किंग मानते हैं, उसकी मर्ज़ी से उसकी पसंद का सामान बनाते हैं क्योंकि उसे ख़ुश रखना ही हमारी कंपनी का एकमात्र लक्ष्य है। हर उपभोक्ता जानता है कि यह एक झूठ है, महज़ एक प्रलोभन है, उसके बावजूद वह इसे सच मान लेता है और सोचता है कि उपभोक्ता जो कहेगा, वही सही है।

अपने जीवन की जिस घटना को मैंने शुरू में लिखा है, उसे मैं इस तरह देख सकता हूँ – शिवप्रसाद सिंह एक ब्रैंड थे। उनकी ‘गली...’ पढ़कर मुझे उस ब्रैंड से प्यार हुआ। मेरे भीतर एक ब्रैंड लॉयल्टी ने जन्म लिया। उसके कारण मैं उनकी दूसरी रचनाओं की तरफ़ गया। ‘नीला चाँद’ ने मेरी ब्रैंड लॉयल्टी को क्षतिग्रस्त किया और मैं आहत हो गया। यह सही है कि लेखक भी एक ब्रैंड होता है, लेकिन उसकी रचना ब्रैंड लॉयल्टी को बनाए रखने वाला कोई प्रोडक्ट नहीं होती। हर कृति में साहित्य नए प्रश्नों से मुठभेड़ करता है। हमने अपनी लॉयल्टी पिछली कृति व उसके प्रश्नों के आधार पर बनाई थी। नई कृति में लेखक बदलेगा, उसके प्रश्न बदलेंगे, इस बीच क्या एक पाठक के तौर पर हमने उतना ही विकास कर लिया है जितना उस लेखक ने? नई कृति अपने पाठक से कुछ नये की माँग करती है, तभी वह अपने पाठक को बदले में कुछ नया दे पाती है।

साहित्य का आनंद हम उपभोक्ता बनकर नहीं ले सकते। कोई कृति अपने पाठक के लिए उस तरह नहीं लिखी जाती, जिस तरह कोका कोला अपने उपभोक्ता के लिए कोल्ड ड्रिंक बनाता है या टीवी वाले अपने उपभोक्ता के लिए सीरियल बनाते हैं। चौबीसों घंटे हम पर गिरने वाली विज्ञापनों की मिसाइलें, वादे कर-करके हमें इस क़दर उपभोक्ता में तब्दील कर देती हैं कि हम साहित्य को पाठक की तरह पढ़ पाने में कठिनाई महसूस करने लगते हैं। अच्छा साहित्य हमारे भीतर के पाठक से संवाद करता है, लेकिन हमारे भीतर के उपभोक्ता को वह रेजिस्ट करता है। आपको नेरूदा की कविताएँ बहुत अच्छी लगती हैं, इसकी तुलना आप इस बात से नहीं कर सकते कि आपको आदीदास के जूते बहुत अच्छे लगते हैं।

कुछ लोगों के लिए साहित्य, किताब बेचने का धंधा है (प्रकाशक, विक्रेता, वेबसाइट्स, समीक्षा-कॉलम्स, बेस्टसेलर की लिस्ट बनाने वाले, फाइव या फोर स्टार रेटिंग देने वाले), वे अनिवार्य रूप से बने रहेंगे, क्योंकि पुस्तक भी एक उद्योग है, व्यापार है। उनके बिना किताबें पाठकों तक नहीं पहुँच पाएँगी। यह व्यापार भी नफ़े-नुकसान के अर्थशास्त्र से हमेशा प्रभावित रहेगा। इसीलिए वे किताब को एक प्रोडक्ट की तरह बेचेंगे, पाठक को एक उपभोक्ता की तरह रिझाएँगे, लेकिन किताब के अंदर का साहित्य कभी प्रोडक्ट नहीं बन सकता, यह सुनिश्चित करने की ताक़त सिर्फ़ और सिर्फ़ पाठक के पास है और अपनी उपभोक्तावादी आदतों पर अंकुश लगाए बिना हम इस ताक़त का इस्तेमाल नहीं कर पाएँगे। पढ़ना भी एक कला है।



 

Wednesday, February 07, 2018

देवताओं के क़िस्से ख़त्म हो चुके





मनोज कुमार झा की पाँच नई कविताएँ


टूटे पत्थरों से पहाड़ बनाने हैं

____________________

देवताओं के क़िस्से ख़त्म हो चुके हैं
अब वहां हांफता पूर्णविराम है
और थकाने वाली उदासी

मनुष्यों के किस्सों का तो आरम्भ है
आओ सँपेरों, चरवाहों, मछुआरों
पहाड़ तोड़ने वालों
अब तुम्हें टूटे पत्थरों से पहाड़ बनाने हैं।
*

दुःख
____

मैं दुःख कहता था
तो मां जली हुई रोटी समझती थी
मैं बार बार दुःख कहता था
दुःख का अनुवाद बार बार अधूरा रह जाता था

एक बार एक चुप्पा चरवाहे ने कहा
जिसे कुछ लोग पागल भी कहते हैं
कि चिड़ियों का दुःख पंख है
जिसके कारण पृथ्वी उन्हें आसमान में धकेल देती है
मुझे आश्चर्य हुआ
कि क्या मेरा दुःख मन है
जिस कारण राजा का चेहरा गिद्ध के चेहरे की तरह दिखता है।
**

सारा जीवन
_________

बारिश होती थी तो कागज की नाव बनाता था
नाव थोड़ी दूर चलती और गल जाती थी
गलना तब सहज क्रिया थी
दूसरी नाव बनाने की पूर्व-कथा।

तब पता नहीं था कि बाद में
नदियों को पार करने का समय आएगा तो भी
कागज की नाव ही मिलेगी
एक नष्ट हो रहे जीवन की उत्तर-कथा।
***

ट्रोलिंग
_____

गालियां यहां सही होने का फल है
उन गालियों को भूल जाओ
जो स्कूल में तुम्हारे दोस्त या दुश्मन देते थे

यह कई चक्कर काट कर आई गालियां हैं
जिसे घृणा के सबसे नापाक कीमिया से बनाया गया है।
****

दूसरे का
______

तुम कहते हो तुम्हारी देह अपनी है
मेरा तो  अंगूठा भी अपना नहीं

जब अंगूठे का निशान लगाता हूं
तो धूलकण दौड़े आते हैं
अंगूठे से चिपकने

और कई लोग आ जाते हैं
अंगूठे का निशान मांगने। 
*****

___________________________________ सबद पर मनोज की अन्य कविताएँ यहाँ