Monday, February 12, 2018

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 9 : पढ़ना भी एक कला है






अपने जीवन में पहला उपन्यास जो मैंने पूरा पढ़ा था, वह था- शिवप्रसाद सिंह का ‘गली आगे मुड़ती है।’ तब मैं सत्रह साल का था। पढ़ते ही मुझे शिवप्रसाद सिंह, रामानंद तिवारी (उपन्यास का नायक) और बनारस से प्यार हो गया। तब तक मुझे शिवप्रसाद सिंह की कीर्ति व अन्य बातों का कोई अंदाज़ा नहीं था, न ही कोई चिंता थी। मैंने तो बस एक किताब पढ़ी थी और उसके प्रेम में पड़ गया था। उस साधारण पाठक की तरह, जिसे किताब के शब्दों के अलावा लेखक के बारे में कोई जानकारी नहीं होती। मुझे लगता था, रामानंद तिवारी ही शिवप्रसाद सिंह है। किताब में वह संघर्ष करता है, ट्यूशन पढ़ाता है, धर्मभीरु रिश्तेदारों से बहस करता है, बनारस के भूगोल में भटकता है, मणिकर्णिका व दशाश्वमेध पर चिरायंध गंध को महसूस करता है, गंगा को नए-नए रंगों में देखता है, एक लड़की से प्रेम करता है, उसके विरह में दूसरी को दिल दे बैठता है, फिर उलझ जाता है कि किसको छोड़े, किसको पाये। उलझन की गली कभी सीधी नहीं चलती, आगे जाकर मुड़ जाती है।

मैं शिवप्रसाद सिंह की किताबें खोजने लगा। तग़ादे कर-करके मुंबई के एक पुस्तक-विक्रेता की जान खा ली। उनकी संपूर्ण कहानियों के दोनों खंड पढ़ लिए। उनका पहला उपन्यास ‘अलग-अलग वैतरणी’ भी पढ़कर पसंद कर ली। ‘नीला चाँद’ पर आकर अटक गया। उनका सबसे प्रसिद्ध उपन्यास। 650 पेज। भारी-भरकम हिंदी, अतिशयोक्ति अलंकार का स्वच्छंद प्रयोग, भावुक संवाद, नाटकीय परिस्थितियाँ.... ओह माय गॉड! यह क्या है? यह ‘गली...’ का ही लेखक है या कोई और? उस उम्र में भवानी मेरे माथे में रहतीं। ज़रा-सी बात पर सरक जातीं। किताब पूरी होते ही मेरी भवानी सरक गईं। आव देखा न ताव, लंबी-सी चिट्‌ठी में अपना परिचय, रामानंद तिवारी की भूरि-भूरि प्रशंसा और कीरत वर्मा (‘नीला चाँद’ का नायक) की चिंदियाँ बिखेरते हुए, उपन्यास की महत्वाकांक्षी नाटकीयता के प्रति अपनी पाठकीय निराशाओं को आवेश मिश्रित शालीन शब्दों में लिख मारा और किताब के फ्लैप पर छपे लेखक के बनारस वाले पते पर पोस्ट कर दिया।

मुझे उम्मीद भी नहीं थी कि उनका जवाब आ जाएगा। मेरी पाठकीय निराशा के बदले उन्होंने लेखकीय क्रोध लिखकर भेज दिया। उन्हें मेरी प्रामाणिकता पर संदेह था। उन्हें यक़ीन ही नहीं था कि सत्रह साल का कोई लड़का ऐसा विश्लेषणात्मक पत्र लिख सकता है, उपन्यास व महाकाव्य, यथार्थ व कल्पना, कथा में संवाद की अधिकता व न्यूनता जैसे प्रश्नों को उठा सकता है। उस पत्र के अनुसार, उनका पूरा विश्वास था कि गीत चतुर्वेदी नाम का कोई व्यक्ति नहीं है, यदि है तो वह सत्रह साल का नहीं है और हो न हो, यह मुंबई में रहनेवाला एक लेखक व नाटक-समीक्षक है (जिसने उनके साहित्य पर पीएच.डी. की थी, जिसे मैं तब तक जानता भी नहीं था और जिसका नाम मैं इस कॉलम में नहीं लिख रहा) जो छद्म नाम से उन पर हमला कर रहा है। उनका पूरा पत्र क्रोध, आशंका व व्यंग्य से भरा हुआ था।

आपद्धर्म जानकर मैंने बहस कर ली। और लंबा ख़त लिखा, जिसमें ‘गली...’ की श्रेष्ठता की दुहाई दी थी, ‘नीला चाँद’ के अ-श्रेष्ठ होने पर क्षोभ जताया था, पन्ना नंबर नोट कर-करके मुझे ग़ैर-ज़रूरी लगने वाली नाटकीयताओं की सूची बनाई थी, फिल्मी दृश्यों को अंडरलाइन करके उनकी फोटोकॉपी नत्थी कर दी थी। इस बार उनका जवाब संयत था और उन्होंने उपन्यास-कला के बारे में कई बातें लिखी थीं। हमारे बीच दो-तीन पत्रों का आदान-प्रदान और हुआ, जो उनके शुभाशीष के साथ समाप्त हो गया।

वह सब एक एडवेंचर की तरह था। कुछ दिनों तक मैं हवा में उड़ता रहा कि शिवप्रसाद सिंह के साथ मेरा सीधा संवाद है,  कि ‘नीला चाँद’ पर मैंने उनके साथ घनघोर बहस की है, कि मेरी प्रतिभा से वह प्रभावित हुए हैं आदि-आदि। लेकिन हक़ीक़त में वह सब नई-नई चढ़ी जवानी की सोडा-सनसनी थी।

समय बीतने के साथ, मैं उनकी तीखी प्रतिक्रिया के बारे में सोचता रहा। उन्होंने इतना क्रोध क्यों किया था? शिवप्रसाद सिंह बड़े लेखक थे। उनकी विद्वत्ता व स्वाध्याय उनकी किताबों से सहज ही झाँकते थे। एक-एक किताब के लिए बरसों की मेहनत थी। उनका जीवन भी कुछ कम विपत्ति-भरा नहीं था। बेटी की लंबी बीमारी व असमय मृत्यु ने उन्हें लगभग तोड़ दिया था। ये सब बातें बाद में पता चली थीं। साहित्यिक राजनीतियों, उससे मिली उपेक्षा आदि के बारे में तब भी पूरा अंदाज़ नहीं था।

उसके साथ ही मैं यह भी सोचता कि क्या मेरा इस तरह आवेश में आकर उन्हें पत्र लिखना सही था? मैं एक लेखक से लेखकीय संयम की उम्मीद करता हूँ, तो क्या एक पाठक के रूप में मेरे पास पाठकीय संयम था? मैं अपने प्रिय लेखक के प्रति पाठकीय आक्रोश जताऊँ, तो क्या लेखक को यह अधिकार नहीं कि वह एक अनजान पाठक पर कृति को न समझ पाने का आरोप लगाते हुए अपना लेखकीय आक्रोश निर्यात कर सके? लेकिन मेरे पास पाठक होने का लाइसेंस था। पाठक यानी किसी भी छोटी-बड़ी बात पर रचना को पसंद करके ख़ुश हो जाना या किसी भी छोटी-बड़ी बात पर नाराज़ होकर पूरी रचना को ही निरस्त कर देना। यह एक ख़तरनाक लाइसेंस है। इस लाइसेंस के आगे कोई तर्क नहीं चलता। ‘मुझे नहीं पसंद मतलब नहीं पसंद’ तर्क व संवाद की तमाम संभावनाओं को समाप्त कर देता है। कई पाठकों का रवैया हमेशा यही होता है। वे सही हैं या ग़लत, मैं इसमें नहीं जाना चाहता।

बरसों बाद मैंने ‘नीला चाँद’ दुबारा पढ़ी। उसके भी कई बरसों बाद तिबारा पढ़ी। वह उतनी बुरी किताब नहीं, जितना पहले पाठ के बाद मुझे लगी थी। उल्टे, वह एक बड़ा व महत्वपूर्ण उपन्यास है। गल्प की भारतीय अवधारणाओं से प्रतिश्रुत एक देसी उपन्यास, हालाँकि जो इतिहास पर लिखे उपन्यासों के क्लीशे से ख़ुद को मुक्त नहीं रख पाता, लेकिन उसके बावजूद एक विशिष्ट व पठनीय उपन्यास। इतिहास के जिन प्रसंगों से वह जूझता है, वे बेहद संवेदनशील हैं। ‘चारुचंद्रलेख’ में हजारीप्रसाद द्विवेदी जिन प्रश्नों से ख़ुद को बचा ले गए थे, शिवप्रसाद सिंह ‘नीला चाँद’ में अपने लिए उन्हीं प्रश्नों को चुनते हैं और बहुत दिलेरी व विवेक के साथ उनका सामना करते हैं। मुझे अतिशयोक्ति से शिकायत थी, पर मैं यह भूल गया था कि अतिशयोक्ति शुद्ध प्राचीन भारतीय अलंकार है। या यूँ कहें, जो प्राचीन संस्कृतियाँ दुनिया में अब भी बची हुई हैं, उन सबके कला-साहित्य में अतिशयोक्ति का प्रचुर प्रयोग होता रहा है, तो ग़लत नहीं होगा। इसका प्रयोग जितना भारतीय कलाओं में है, चीनी व फ़ारसी कलाओं में भी लगभग उतना ही है। ‘बाहुबली’ फिल्म देखते हुए मुझे नीला चाँद याद आता रहा था। उस फिल्म में भी अतिशयोक्ति का आलंकारिक प्रयोग है। सिनेमा के परदे पर वह जँच जाती है, उपन्यास में क्यों फँस जाती है? यह पाठक और दर्शक के तौर पर हमारे संस्कार हैं। एक पाठक के तौर पर उपन्यास से, ख़ासकर साहित्यिक उपन्यास से, हम कई सारी माँगें रखते हैं। ये माँगें ही पाठ के आनंद को बढ़ाती हैं। पाठक व पाठ के बीच बनने वाला द्वंद्वात्मक संबंध इसी से पुष्ट होता है।

मुझे अब भी ‘नीला चाँद’ से कई शिकायतें होती हैं, लेकिन यह ज़रूर है कि मैं अब उतना हार्श नहीं हो सकता, क्योंकि अब मैं यह मानता हूँ कि अच्छा पाठक बनने के लिए आपको अपने भीतर एक विशेष वृद्धता अर्जित करनी होती है। हम बार-बार लेखक की गुणवत्ता की जाँच व प्रश्नांकन करना चाहते हैं, अपनी वृद्धता का कोई पैमाना तय नहीं कर पाते, क्योंकि वैसा करना पूरी तरह संभव भी नहीं, और पाठक होने का लाइसेंस हमारी आंतरिक दुर्व्यवस्था की रक्षा कर रहा होता है।

बाद में मुझे पता चला कि ‘नीला चाँद’ पर कई तरह के हमले व बहस हुई थी। अपनी निजी त्रासदियों व उन हमलों ने शायद डॉ. सिंह को तिक्त व शंकालु बनाया हो। उस किताब की समीक्षा लिखना, उन्हें या ख़ुद को सही साबित करना, उन हमलों व बहसों में शामिल होना- ये सब मेरे उद्देश्य नहीं, लेकिन अपने जीवन के उस प्रसंग, शिवप्रसाद सिंह के साथ हुए अपने किशोरवयीन संवाद को याद करते हुए, किताब पढ़ने की विभिन्न आदतों के बारे में सोचता रहता हूँ। नौजवानी व उबलते ख़ून का सम्मान होना चाहिए, लेकिन मात्र वही निर्णायक नहीं होती। वृद्धताएँ कहीं से अनावश्यक नहीं होतीं, वे पुरातन भी नहीं होतीं। सोशल मीडिया के इस दौर में जब रचनाओं पर तुरत-फुरत प्रतिक्रियाएँ आती हैं, मुझे रचनाओं के ‘मंथर पाठ’ के बारे में सोचना कहीं अधिक सुहाता है। बीते बरसों में हमारे साहित्य-समाज ने पठन के कई तरीक़ों को खोया है। पाठ के समांतर चलने वाला चिंतन कम होता गया है। इसीलिए साहित्य की आलोचना लगभग निष्प्राण है। वह पाठ के नये तरीक़ों का अन्वेषण तो दूर, पुराने मान्य तरीक़ों को भी आज़माने में नाकाम होती जाती है। कुल्हाड़ी हमारे समय की आलोचना का प्रिय रूपक है। एक कुल्हाड़ी-पाठ, जिससे रचना के अंग-भंग हो जाएँ। एक कुल्हाड़ी-समीक्षा, जिससे रचना तितर-बितर हो जाए। ये दोनों काम बिना कुल्हाड़ी चलाए भी किए जा सकते हैं। गहरी अंतर्दृष्टि व यथोचित तर्कबोध के साथ भी किसी रचना को ख़ारिज किया जा सकता है, और तब आलोचना को पढ़ने का गंभीर सुख भी मिलता है, लेकिन कुल्हाड़ी-समीक्षा केवल सनसनी का सुख दे सकती है, उससे अतिरिक्त कुछ नहीं। वह यह भी बता देती है कि समीक्षक के पास अंतर्दृष्टि, तर्कबोध व सक्षम वैचारिक भाषा नहीं है, इसीलिए वह अपने साथ कुल्हाड़ी लेता आया है। कुल्हाड़ी यौवन का अनिवार्य विकार है, लेकिन जितनी जल्दी उससे पिंड छूटे, उतना अच्छा।

निबंध की अपनी नई किताब में पोलिश कवि एडम ज़गाएव्स्की ने किसी की ऐसी बातों पर क्षुब्ध होते हुए एक पंक्ति लिखी है – ‘युवा समीक्षक को यह नहीं भूलना चाहिए कि एक दिन वह भी मर जाएगा।’

यहाँ युवा बनाम उम्रदराज़ का द्वंद्व नहीं है, बल्कि चीज़ों को ग्रहण करने की क्षमता, स्वीकृति या अस्वीकृति की प्रामाणिक तार्किकता व उसे अभिव्यक्त करने की कलात्मकता का प्रश्न है।

वृद्धता की इस अवधारणा को ‘महाभारत’ में सुंदर वर्णित किया गया है। प्रसंग शिशुपालवध का है। युधिष्ठिर राजसूय यज्ञ करा रहे थे। उसे सफल बनाने के लिए वेद व्यास, विश्वामित्र, भारद्वाज, गौतम, वशिष्ठ यानी तमाम बड़े ऋषि आए थे। देश के सभी प्रमुख राज्यों के राजपुरुष भी पधारे थे, जिनमें भीष्म और द्रोण शामिल थे। समारोह की अध्यक्षता कौन करेगा, इस पर विचार होने लगा। सहदेव ने प्रस्ताव दिया कि कृष्ण को अध्यक्षता दी जाए। अधिकांश लोग इस पर सहमत हो गए। कुछेक सभासदों ने आपत्ति ली और भीष्म का नाम आगे करना चाहा, पर भीष्म ने ख़ुद कृष्ण के नाम का अनुमोदन किया। फिर उन्होंने तीन तरह की वृद्धताओं का उल्लेख किया।

पहला, आयुवृद्ध – जो व्यक्ति उम्र से बूढ़ा हो गया हो। ऐसे लोग बहुतायत में होते हैं क्योंकि सबकी आयु बढ़ेगी, सभी वृद्ध होंगे, लेकिन आयुवृद्ध होने वाला व्यक्ति सर्वश्रेष्ठ भी हो, यह ज़रूरी नहीं। सौ साल की आयु वाला व्यक्ति भी मूढ़ हो सकता है। अर्थात आयु कभी निर्णायक श्रेष्ठता नहीं हो सकती।

दूसरा, तपोवृद्ध – वह व्यक्ति जिसने अपने जीवन में घनघोर तप किए हों। वह भले आयुवृद्ध न हो, लेकिन वह आयुवृद्ध से श्रेष्ठ होगा, क्योंकि भरपूर तप ने उसकी आयु को खरा बनाया होगा। उसने साधारण जीवन न जिया होगा, बल्कि तप से अपने जीवन को यथेष्ट गहराई दी होगी। यहाँ तप यानी विभिन्न किस्म की साधना।

तीसरा, ज्ञानवृद्ध – वह व्यक्ति जिसने अपने जीवन में भरपूर तप किया हो और उससे ज्ञान भी प्राप्त किया हो। कई लोग तप तो कर लेते हैं, किंतु उससे ज्ञान नहीं प्राप्त कर पाते, इसलिए तपोवृद्ध से भी बेहतर है ज्ञानवृद्ध, क्योंकि उसके पास तप की भी पूँजी है और ज्ञान की भी, जो कि दुर्लभ है। ऐसे व्यक्ति की आयु कम भी हो, तो भी वह श्रेष्ठ होगा, क्योंकि चालीस की उम्र में ही उसने साठ जितना तप कर लिया होगा और अस्सी जितना ज्ञान पा लिया होगा। पैंतीस की उम्र में ज्ञान प्राप्त कर लेने वाले शाक्यमुनि भी ज्ञानवृद्ध ही कहलाएँगे।

कृष्ण ज्ञानवृद्ध थे। उनका तप व अर्जित ज्ञान असंदिग्ध था। इसीलिए भीष्म की दृष्टि में उस सभा की अध्यक्षता करने के वह सर्वयोग्य अधिकारी थे। (कहानी में आगे यह है कि शिशुपाल अंत तक इस बात को नहीं मान पाता, वह कृष्ण को अयोग्य बताते हुए उन्हें गाली देता है। कृष्ण ने शिशुपाल को सौ गालियाँ माफ़ कर रखी थीं। जैसे ही वह एक सौ एकवीं गाली देता है, कृष्ण अपने चक्र से उसका गला रेत देते हैं।)

वृद्धता की ऐसी सुंदर परिभाषा मुझे किसी अन्य ग्रंथ में नहीं मिली। किसी भी क्षेत्र में वृद्धता को इन तीन कसौटियों पर मापा जा सकता है। इसके बावजूद इस पर हमेशा बहस होती रहेगी क्योंकि तीसरी कसौटी ज्ञान है, जिसको मापने का कोई पैमाना नहीं होता, सब ख़ुद को ज्ञानी ही मानते हैं, उसके बावजूद चीज़ों को देखने का यह एक तरीक़ा हो सकता है। दूसरे को जज करने के बजाय इन पर ख़ुद को कसकर देखा जा सकता है और उस पाठकीय व कलात्मक वृद्धता को हासिल किया जा सकता है। एक पाठक या लेखक के रूप में उतना तप किया जाए। उसके बाद ज्ञान व विवेक भी प्राप्त किए जाएँ। उसके बाद भले ज्ञान को मापने में दिक़्क़त हो, फिर भी मन को शुद्धि या फिल्टर का एक बायस तो मिल ही जाएगा।

कला व साहित्य की एक बड़ी समस्या यह भी है कि इसमें श्रेष्ठता की कोई एक कसौटी नहीं होती। आधुनिक समय में ये कसौटियाँ तो लगभग छिन्न-भिन्न हो चुकी हैं। कहते हैं, अभिज्ञानशाकुंतलम को पढ़ने-देखने के बाद विक्रमादित्य ने कालिदास को महाकवि की उपाधि दे दी, तो सभा में मौजूद सारे कवियों ने आपत्ति ले ली कि ऐसे कैसे? नाटक लिखने से कोई महाकवि थोड़े हो जाता है। कालिदास पहले महाकाव्य लिखकर दिखाएँ, तब महाकवि माना जाएगा। विक्रमादित्य को उपाधि स्थगित करनी पड़ी थी और महाकाव्यों की रचना के बाद ही समकालीनों ने कालिदास को महाकवि माना।

श्रीहर्ष नैषिधीयचरितम लिखकर बैठे हुए थे, लेकिन कन्नौज के राजा ने मान्यता ही नहीं दी। कहा, पहले कश्मीर जाओ, वहाँ के राजा के निजी मंदिर में देवी सरस्वती रहती हैं, अपना महाकाव्य उन्हें पढ़वाओ, उनसे लिखाकर लाओ कि यह श्रेष्ठ कृति है, तब हम मान्यता देंगे। वहाँ तक पहुँचने में श्रीहर्ष को बहुत पापड़ बेलने पड़े। लंबे इंतज़ार के बाद जब देवी ने वह कृति पढ़ी, तो उसकी श्रेष्ठता का उद्घोष तुरंत किया।

ये सब पुरानी बातें हैं, किंवदंतियाँ हैं। ऐसी कई कथाएँ सुनाई जा सकती हैं, और इन सबसे पता चलता है कि उस पुराने ज़माने में भी साहित्य की श्रेष्ठता का कोई एक पैमाना नहीं था।

जिस लेखक को समकालीन श्रेष्ठ मानें, क्या वह श्रेष्ठ है? कोई गारंटी नहीं, क्योंकि हम सभी जानते हैं, समकालीन, राजनीति करते हैं। दल बनाकर, किसी के पक्ष में नारे लगाकर, औसत को भी श्रेष्ठ घोषित कर सकते हैं और श्रेष्ठ को इतना उपेक्षित कर सकते हैं कि वह रचनात्मक अवसाद में चला जाए। मोत्ज़ार्ट पर बनी फिल्म ‘अमादियस’ को याद किया जाए।

जिस लेखक को देवी, राजा या सत्ता श्रेष्ठ माने, क्या वह श्रेष्ठ है? कोई गारंटी नहीं, क्योंकि सत्ता की अपनी राजनीति होती है। विपक्षी विचार वाले का दमन कर देगी, पर श्रेष्ठ होने पर भी उसे श्रेष्ठ न कहेगी।

जिस लेखक को जनता श्रेष्ठ कहे, क्या वह श्रेष्ठ है? कोई गारंटी नहीं, क्योंकि जनता की रुचियाँ कई बार निम्नकोटि की भी हो सकती हैं। आज के युग में तो हम इसे महसूस भी कर सकते हैं।

फिर कौन-सा लेखक श्रेष्ठ है? कौन-सी किताब श्रेष्ठ है? कोई एक पैमाना नहीं। थोड़ा-थोड़ा सारे पैमानों का मिश्रण ही बता पाएगा। उसके बाद भी यह एक मूर्त प्रश्न का एक अमूर्त उत्तर बनेगा। यहीं पर पाठकीय वृद्धता अनमोल साबित होती है। यदि हमने तप, साधना व ज्ञान के माध्यम से उचित पाठकीय वृद्धता हासिल की है, तो हमें इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए बाहर की ओर नहीं देखना होगा। कृति के पाठ से ही हम समझ जाएँगे, भले हम अपनी समझ को पूरी तरह अभिव्यक्त न कर पाएँ। चाहे लेखन हो, पाठन हो, संपादन या साहित्यिक आलोचना, अंतत: अर्जित की हुई यही वृद्धता काम आती है। आयु चाहे कुछ भी हो। किसी कृति को प्राप्त हुई इस पाठकीय वृद्धता की बहुलता बहुत हद तक जाले साफ़ कर देती है।

यहाँ एक लेखक व पाठक के रूप में अपने संस्कारों की जाँच करते चलना भी बहुत ज़रूरी होता है। हम एक पाठक हैं या उपभोक्ता? अंतर्मन के उपयोगितावादी रुझान हमारे पाठक को उपभोक्ता में तब्दील करने में देर नहीं करते। हममें साहित्य का उपभोग करने की जल्दबाज़ी आ जाती है, हम एक ही पाठ से सारे अर्थों को पा लेना चाहते हैं, रचना में चार कठिन शब्द मिल जाएँ, तो हम यह आरोप लगाने लगते हैं कि यह आम जनता के लिए नहीं, बल्कि एक अभिजात वर्ग के लिए लिखी गई रचना है। तब हम लेखक से तमाम तरह की मेहनत की उम्मीद करने लगते हैं, लेकिन ख़ुद एक शब्दकोश खंगालकर उन शब्दों का अर्थ जानने जितनी मेहनत नहीं करना चाहते।

उपभोक्तावाद बार-बार अपने उपभोक्ता को यह विश्वास दिलाता है कि हमारी कंपनी का बनाया हुआ हर उत्पाद उपभोक्ता को संतुष्ट करेगा, क्योंकि हम कस्टमर या कंज्यूमर को ही किंग मानते हैं, उसकी मर्ज़ी से उसकी पसंद का सामान बनाते हैं क्योंकि उसे ख़ुश रखना ही हमारी कंपनी का एकमात्र लक्ष्य है। हर उपभोक्ता जानता है कि यह एक झूठ है, महज़ एक प्रलोभन है, उसके बावजूद वह इसे सच मान लेता है और सोचता है कि उपभोक्ता जो कहेगा, वही सही है।

अपने जीवन की जिस घटना को मैंने शुरू में लिखा है, उसे मैं इस तरह देख सकता हूँ – शिवप्रसाद सिंह एक ब्रैंड थे। उनकी ‘गली...’ पढ़कर मुझे उस ब्रैंड से प्यार हुआ। मेरे भीतर एक ब्रैंड लॉयल्टी ने जन्म लिया। उसके कारण मैं उनकी दूसरी रचनाओं की तरफ़ गया। ‘नीला चाँद’ ने मेरी ब्रैंड लॉयल्टी को क्षतिग्रस्त किया और मैं आहत हो गया। यह सही है कि लेखक भी एक ब्रैंड होता है, लेकिन उसकी रचना ब्रैंड लॉयल्टी को बनाए रखने वाला कोई प्रोडक्ट नहीं होती। हर कृति में साहित्य नए प्रश्नों से मुठभेड़ करता है। हमने अपनी लॉयल्टी पिछली कृति व उसके प्रश्नों के आधार पर बनाई थी। नई कृति में लेखक बदलेगा, उसके प्रश्न बदलेंगे, इस बीच क्या एक पाठक के तौर पर हमने उतना ही विकास कर लिया है जितना उस लेखक ने? नई कृति अपने पाठक से कुछ नये की माँग करती है, तभी वह अपने पाठक को बदले में कुछ नया दे पाती है।

साहित्य का आनंद हम उपभोक्ता बनकर नहीं ले सकते। कोई कृति अपने पाठक के लिए उस तरह नहीं लिखी जाती, जिस तरह कोका कोला अपने उपभोक्ता के लिए कोल्ड ड्रिंक बनाता है या टीवी वाले अपने उपभोक्ता के लिए सीरियल बनाते हैं। चौबीसों घंटे हम पर गिरने वाली विज्ञापनों की मिसाइलें, वादे कर-करके हमें इस क़दर उपभोक्ता में तब्दील कर देती हैं कि हम साहित्य को पाठक की तरह पढ़ पाने में कठिनाई महसूस करने लगते हैं। अच्छा साहित्य हमारे भीतर के पाठक से संवाद करता है, लेकिन हमारे भीतर के उपभोक्ता को वह रेजिस्ट करता है। आपको नेरूदा की कविताएँ बहुत अच्छी लगती हैं, इसकी तुलना आप इस बात से नहीं कर सकते कि आपको आदीदास के जूते बहुत अच्छे लगते हैं।

कुछ लोगों के लिए साहित्य, किताब बेचने का धंधा है (प्रकाशक, विक्रेता, वेबसाइट्स, समीक्षा-कॉलम्स, बेस्टसेलर की लिस्ट बनाने वाले, फाइव या फोर स्टार रेटिंग देने वाले), वे अनिवार्य रूप से बने रहेंगे, क्योंकि पुस्तक भी एक उद्योग है, व्यापार है। उनके बिना किताबें पाठकों तक नहीं पहुँच पाएँगी। यह व्यापार भी नफ़े-नुकसान के अर्थशास्त्र से हमेशा प्रभावित रहेगा। इसीलिए वे किताब को एक प्रोडक्ट की तरह बेचेंगे, पाठक को एक उपभोक्ता की तरह रिझाएँगे, लेकिन किताब के अंदर का साहित्य कभी प्रोडक्ट नहीं बन सकता, यह सुनिश्चित करने की ताक़त सिर्फ़ और सिर्फ़ पाठक के पास है और अपनी उपभोक्तावादी आदतों पर अंकुश लगाए बिना हम इस ताक़त का इस्तेमाल नहीं कर पाएँगे। पढ़ना भी एक कला है।



 

Wednesday, February 07, 2018

देवताओं के क़िस्से ख़त्म हो चुके





मनोज कुमार झा की पाँच नई कविताएँ


टूटे पत्थरों से पहाड़ बनाने हैं

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देवताओं के क़िस्से ख़त्म हो चुके हैं
अब वहां हांफता पूर्णविराम है
और थकाने वाली उदासी

मनुष्यों के किस्सों का तो आरम्भ है
आओ सँपेरों, चरवाहों, मछुआरों
पहाड़ तोड़ने वालों
अब तुम्हें टूटे पत्थरों से पहाड़ बनाने हैं।
*

दुःख
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मैं दुःख कहता था
तो मां जली हुई रोटी समझती थी
मैं बार बार दुःख कहता था
दुःख का अनुवाद बार बार अधूरा रह जाता था

एक बार एक चुप्पा चरवाहे ने कहा
जिसे कुछ लोग पागल भी कहते हैं
कि चिड़ियों का दुःख पंख है
जिसके कारण पृथ्वी उन्हें आसमान में धकेल देती है
मुझे आश्चर्य हुआ
कि क्या मेरा दुःख मन है
जिस कारण राजा का चेहरा गिद्ध के चेहरे की तरह दिखता है।
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सारा जीवन
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बारिश होती थी तो कागज की नाव बनाता था
नाव थोड़ी दूर चलती और गल जाती थी
गलना तब सहज क्रिया थी
दूसरी नाव बनाने की पूर्व-कथा।

तब पता नहीं था कि बाद में
नदियों को पार करने का समय आएगा तो भी
कागज की नाव ही मिलेगी
एक नष्ट हो रहे जीवन की उत्तर-कथा।
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ट्रोलिंग
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गालियां यहां सही होने का फल है
उन गालियों को भूल जाओ
जो स्कूल में तुम्हारे दोस्त या दुश्मन देते थे

यह कई चक्कर काट कर आई गालियां हैं
जिसे घृणा के सबसे नापाक कीमिया से बनाया गया है।
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दूसरे का
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तुम कहते हो तुम्हारी देह अपनी है
मेरा तो  अंगूठा भी अपना नहीं

जब अंगूठे का निशान लगाता हूं
तो धूलकण दौड़े आते हैं
अंगूठे से चिपकने

और कई लोग आ जाते हैं
अंगूठे का निशान मांगने। 
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___________________________________ सबद पर मनोज की अन्य कविताएँ यहाँ

Saturday, January 27, 2018

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 8 : बिल्लियाँ





मेरा बचपन बिल्लियों के बीच बीता। सत्रह साल तक उनकी कई पीढ़ियाँ हमारे घर में रहीं। हमने उन्हें नहीं चुना, उन्होंने हमें चुना था। वे अपनी मर्ज़ी से हमारे यहाँ आईं, हमारे सुख-दुख की उदासीन साक्षी रहीं, हमें बहुत सारी मुस्कानें दीं, कई बार हमें रुलाया, और एक दिन चली गईं।

तब मैं सात साल का था। एक रोज़ हमारे पड़ोस से बिल्ली की आवाज़ें आने लगीं। साधारण-सी म्याऊँ-म्याऊँ थोड़ी देर बाद बेचैन, मोटी म्याऊँ में बदलने लगी। हमारे आँगनों के बीच पाँच फीट ऊँची दीवार थी। बड़े लोग थोड़ा-सा उचककर एक-दूसरे के आँगनों में पूरी तरह झाँक लिया करते थे। हम बच्चों को आँगन के पार झाँकने के लिए स्टूल लगाना पड़ता था। बिल्ली की भाँति-भाँति की आवाज़ों से आकर्षित होकर हमने दीवार के पास स्टूल लगाया और झाँककर उस पार देखने लगे। पड़ोस के आँगन में, किनारे एक सुंदर-सी, बड़े मटमैले बालों वाली बिल्ली बैठी थी। उसके गले में कॉलर था, वह लोहे की पतली ज़ंजीर से बँधी हुई थी। पास ही एक कटोरी में पानी, दूसरी में दूध रखा हुआ था। दीवार के पार से झाँकते हमारे चेहरों को देख बिल्ली की बेचैन आवाज़ें बढ़ गईं। वह बिना रुके चिल्ला रही थी। हम दिन में कई बार झाँककर देखते, जबकि वह हमेशा चिल्लाती रहती। तीन दिन बीत गए। उसकी आवाज़ ज़्यादा कर्कश होती गई।

एक रोज़ मेरी दादी स्टूल पर खड़ी हुईं, बिल्ली को देखा और क्रोधित हो गईं। उतरकर सिंधी में बुदबुदाने लगीं, “इन लोगों ने बिल्ली तो पाल ली है, लेकिन रखा उसे कुत्ते जैसा है। भला कोई बिल्ली ज़ंजीर में बँधकर रह सकती है?”

बड़बड़ करती हुईं वह पड़ोस के मकान में गईं और उस घर की बहूरानी को डाँट लगाई। अपने हाथों से बिल्ली की ज़ंजीर खोली और उसे उनके मकान के अंदर रख आईं। बहूरानी ने कुछ ना-नुकुर ज़रूर की होगी, पर मेरी छरहरी दादी जब बोलती थीं, तो बाक़ी लोग सिर्फ़ सुनते थे। मेरी दादी के पास बिल्लियों का ख़ासा अनुभव था। जब वह पाकिस्तान रहती थीं, उनके पास एक बिल्ली हुआ करती थी। विभाजन के समय जिन बहुत सारी चीज़ों को वह अपने साथ नहीं ला पाई थीं, उनमें वह बिल्ली भी शामिल थी। और इसका उन्हें बहुत अफ़सोस था। वह बिल्लियों से प्यार तो करती थीं, लेकिन उन्हें अपशकुन भी मानती थीं। अक्सर एक क़िस्सा सुनातीं – “ठंड के दिन थे। पैग़ंबर साहब सोए हुए थे। उनके लबादे पर आकर एक बिल्ली सो गई। पैग़ंबर साहब अगर उसे उठाते, तो बिल्ली की नींद में ख़लल पड़ता, सो उन्होंने अपने लबादे का उतना हिस्सा काट दिया और बिल्ली को उठाकर किनारे रख दिया।” ऐसी कई कहानियाँ सुनाकर वह बतातीं, “अल्लाह बिल्लियों की बड़ी क़द्र करता है।” उनकी हर कहानी में कहीं न कहीं से बिल्ली आ जाती। वह यह कहना कभी न भूलतीं, “जिनके घर बिल्लियाँ होती हैं, उन्हें बहुत दर्द मिलता है।” कभी कहतीं, “बिल्लियाँ बेवफ़ा होती हैं। कभी साथ नहीं देतीं। कुत्ते पालना चाहिए, बिल्लियाँ तो गला भी पकड़ लेती हैं।”  तो कभी यह जुमला कि, “अगर तुम संत हो, तो कभी न कभी किसी बिल्ली की मोहब्बत में पड़ जाओगे।”

बिल्लियों से अपने प्रेम के कारण या उन्हें अपशगुन मानने के कारण या उसकी कर्कश आवाज़ से परेशान होकर--- जाने किस कारण, दादी ने उस बिल्ली को ज़ंजीर से आज़ाद करवाया। आँगन में चिल्लाने वाली बिल्ली जब अंदर कमरे में चली गई, तो एकदम ख़ामोश हो गई। उस रोज़ हमें पता चला कि बिल्लियों को बंधन पसंद नहीं। बाँधोगे, तो उनका भाग जाना तय है। इसीलिए जब अगली सुबह हमने पाया कि वह हमारे आँगन में आकर सोई हुई है, तो हमें कुछ अचरज न हुआ। कुछ देर उसके साथ खेलने के बाद हमने उसे पड़ोसियों को दे दिया, क्योंकि दादी को बिल्ली मंज़ूर नहीं थी। थोड़ी देर बाद बिल्ली फिर हमारे यहाँ आ गई। इस बार पड़ोस के बच्चे उसे उठा ले गए। शाम को फिर हमारे यहाँ आ गई। हमने फिर बिल्ली को लौटा दिया। उसे जब मौक़ा मिलता, दीवार फाँदकर हमारे यहाँ चली आती। शुरुआती दिनों के बाद, हमने उसे लौटाना बंद कर दिया। कुछ दिनों तक पड़ोस की बहूरानी या उसके बच्चे बिल्ली को खोजते हुए आते, फिर उन्होंने खोजना बंद कर दिया। थककर एक दिन बहूरानी ने दादी से कहा, “आप ही रख लो इसे।” हमने दादी को आख़िरकार मना लिया कि हम संत हैं और अब हमें बिल्लियों से मोहब्बत हो गई है।

इस तरह हमारे यहाँ बिल्ली आई। जिन चीज़ों को सुख-सुविधा से जुड़ा माना जाता है, वे हमारे यहाँ न थीं। दो सुख थे, दोनों पड़ोस से आए। टीवी हमारे यहाँ बहुत देर से आया, लेकिन संगीत का शौक़ बचपन से था। हमारे पड़ोसी अपना टेपरिकॉर्डर बहुत ज़ोर से बजाते थे। इस तरह संगीत का हमारा शौक़ पूरा होता था। मुझे ‘जांबाज़’ फिल्म के गाने अच्छे लगते थे। कभी-कभी स्टूल पर चढ़कर मैं बहूरानी से वह कैसेट चलाने को कहता। मुकेश के कई गाने मुझे अब भी शब्दश: याद हैं, क्योंकि सुबह सात बजे जब मैं स्कूल के लिए तैयार होता, बहूरानी के दूल्हे राजा, मुकेश के दर्द-भरे नग़मे चला देते थे। आज मैं उस आदमी की मन:स्थिति के बारे में सोचने की कोशिश करता हूँ, जो सुबह-सुबह मुकेश के दर्दीले गीत सुनता हो।

और दूसरा सुख था- बिल्लियाँ। उसकी पहली कड़ी भी हमारे यहाँ पड़ोस से ही आई। हमने उसका नाम रखा- जूली। क़ायदे से उसे हम चार भाई-बहनों के लिए खिलौना होना था, लेकिन जूली हाथ नहीं आती थी। पाँच-दस मिनट नज़रों के सामने रहने के बाद वह ग़ायब हो जाती। हम उसे पलंग के नीचे, कपबोर्ड के ऊपर, किचन के अंदर, हर जगह खोजते, पर शायद उसके पास अदृश्य होने का मंत्र था। कर्कश आवाज़ में चिल्लाने वाली उस बिल्ली की अब साधारण म्याऊँ भी सुनाई पड़ जाए, तो हम ख़ुशी से भर जाते, उसके दिख जाने का इंतज़ार करने लगते। इस तरह बहुत दिन बीत गए और बिल्ली का होना-न होना एक बराबर हो गया। जूली से कोई लगाव बन ही न पाया।

जब हम उसे भूल चुके थे, एक सुबह दीदी ने हमें झकझोरकर जगाया और कहा, “उठो-उठो, देखो-देखो, जूली ने बच्चे दिए हैं।” आँखें मलते हुए हम दीदी के पीछे दौड़े। भीतर स्टोर रूम में लोहे के दो बड़े बक्से अगल-बग़ल रखे हुए थे, जो दादी अपने साथ पाकिस्तान से लाई थीं। उनके बीच की जगह में जूट की बोरियों को तह करके रखा जाता था। उस ज़माने में बोरियाँ बड़े काम की चीज़ होती थीं। हर घर में उनके गट्‌ठर मिल जाते थे। उन्हीं बोरियों के ऊपर जूली लेटी हुई थी और तीन बिलौटे, जिनकी आँखें पूरी तरह नहीं खुली थीं, उसका दूध पी रहे थे। दादी बीच-बीच में जूली को सहला रही थीं, लेकिन जब हम उसे सहलाने या उसके बच्चों को छूने के लिए हाथ बढ़ाते, जूली गुर्राने लगती थी। कुछ दिनों बाद हमने उन बच्चों का बँटवारा कर लिया। काले छींटों के साथ जो सफ़ेद रंग का बिल्ला था, उस पर मेरे भाई ने दावा कर दिया। उसका नाम रखा गया- नूरू। भूरी-सुनहरी बिल्ली पर मेरी छोटी बहन का दावा हुआ। उसका नाम नूरी पड़ा। तीसरा मटमैले रंग का था, न काला, न सफ़ेद। उस पर दूसरे रंग की कोई धारी तक न थी। वह मेरे हिस्से आया। वह सबसे मरघिल्ला था। उसे चलना भी नहीं आता था, दो क़दम बाद ही गिर जाता। हम उसे अपनी हथेली पर रखते, तब भी वह काँपता रहता। उसके चेहरे के अनुपात में उसकी आँखें बड़ी थीं। पहली नज़र में ही वह एक भद्दा बिल्ला था। उसका कोई नाम नहीं रखा गया। वह सबसे छोटा था, सो अपने आप ही उसका नाम चिन्टू पड़ गया। दादी बहुत तरस खाकर उसकी ओर देखतीं और कहतीं, “यह मुआ नहीं बचेगा।”

बिल्लियों के साथ हमारा प्रेम यहाँ से शुरू हुआ। इस प्रेम की पताका नूरू के हाथ थी। वह तीनों में सबसे तगड़ा, सुंदर और शरारती था। नूरू और नूरी का आपसी खेल चैपिलन की किसी छोटी स्लैपस्टिक फिल्म से कम न होता। वे खड़े-खड़े उछल जाते, दौड़ते-दौड़ते टेबल से टकरा जाते, दूसरे को पंजा मारने की कोशिश में ख़ुद ही भहराकर गिर जाते और एक-दूसरे का पीछा तो ऐसे करते, जैसे पुलिस, बस्टर कीटन का पीछा कर रही हो। उनकी चपलता, उनकी फुर्ती, पीठ को ऊँट की तरह बनाकर पीछे हटना, पूँछ के बाल फुलाकर अजीबोगरीब आवाज़ें निकालना- उनका खेल एक तरह का युद्धाभ्यास होता। हम कितने भी दुखी हों, कितने भी निराश, बिल्लियों को खेलता देखना दुनिया का सबसे बड़ा सुख जान पड़ता। वे इतने मासूम और पवित्र दिखते कि लगता, ईश्वर जहाँ कहीं भी है, वह यक़ीनन एक उछलता हुआ बिलौटा है।

जब वे दोनों खेला करते, चिन्टू निरीह-सा एक किनारे बैठा रहता। उसका बहुत मन होता कि वह भी इस खेल में शामिल हो। वह कोशिश भी करता, एक-दो बार कूद लगाता, पूँछ के बाल खड़ा कर लेता, लेकिन कुछ पलों बाद ही वह कहीं गिर जाता, गिरकर वहीं पड़ा रहता, पड़े-पड़े शायद अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा करता। पीछे कहीं से दादी की तरस-भरी आवाज़ आती, “देखो, कैसा मुर्दार है।”

लेकिन नूरू सुपरस्टार था। जैसे-जैसे बड़ा हुआ, उसकी सुंदरता बढ़ती गई। हमने उतना सुंदर बिल्ला फिर कभी नहीं देखा। झक सफ़ेद रंग, उस पर तबीयत से बने हुए काले छींटे। गरदन के पास काली धारी, जैसे कोई माला पहन रखी हो। माथे पर काला तिलक, जैसे अभी पूजा से उठकर आया हो। चारों पंजों पर काले निशान, जैसे काले मोज़े पहन रखे हों। और पूँछ का आख़िरी सिरा काला, जैसे किसी पेंटर ने अपना ब्रश काले रंग में डुबोया हो। हमारी बातों के ज़रिए हमारे दोस्तों में वह इतना मशहूर हो गया कि वे उसे देखने हमारे घर आते थे। वह भी पक्का परफॉर्मर था, किसी को निराश न करता, ऐसी अदाएँ दिखाता, ऐसे खेल करता, कि देखने वाले वाह-वाह करने लगते। हम उसे जितना अटैंशन देते, उसका आनंद उतना बढ़ जाता था। यहाँ-वहाँ दौड़ लगाता, टेबल टेनिस की गेंद से फुटबॉल खेलने लगता, हम रस्सी हिलाते, वह उछलकर उसे पकड़ लेता, हमारे पैर पकड़कर खड़ा हो जाता, उछलकर टेबल पर चढ़ जाता, वहाँ से सीधे हमारी गोद में छलाँग लगाता। उस समय हम उसे अपनी गोद में कैच करते थे। अगर हम कैच मिस करते, तो उसके नाख़ून हमारी छाती, भुजाओं या गोद में लग जाते। हम दर्द से कराह उठते, पर नूरू को इन सबसे कोई फ़र्क़ न पड़ता। बिल्ली अगर तुमसे प्यार करेगी, तो तोहफ़े में खरोंचें देगी। उसकी शिकायत ग़ैर-वाजिब है।

एक दिन जाने कैसे नूरू ने एक नया एक्ट सीख लिया। टेबल के निचले हिस्से में, उसके पायों को जोड़ने वाली पटिया होती है, जिस पर हम अपने पैर रखा करते, वह उस पतली-सी पटिया पर चारों पैरों से उल्टा लटककर बाएँ से दाएँ और दाएँ से बाएँ चलता, जैसे ट्रेनिंग लेने वाले सिपाही रस्सी पर उल्टा लटककर चलते हैं, पैरों को क्रॉस करके, हाथों से आगे की ओर खिसकते। यह नूरू का सुपरहिट एक्ट था। दादी कहतीं, “यह बिल्ला नहीं, बान्दर है बान्दर।” अब भी जब कोई बंदर को बान्दर कहता है, मेरी आँखों के आगे नूरू की धुँधली-सी आकृति बन जाती है। मेरे निजी शब्दकोश में बान्दर का अर्थ बिल्ला है, वह भी कोई साधारण नहीं, हमारा नूरू बिल्ला।

जब हम होमवर्क कर रहे होते, वह सामने बैठ जाता। काग़ज़ पर चल रही हमारी क़लम को पंजा मार-मारकर गिराता। और जिन दिनों वह ऐसा न करता, हम उसे बुला-बुलाकर ऐसा करने के लिए कहते। पर वह हमारी कभी सुनता न था। उसे जो करना होता, अपनी मर्ज़ी से करता, हमारे बोलने-न बोलने का उस पर असर न होता था। दादी कहतीं, “बिल्लियाँ औरतों जैसी होती हैं, किसी की नहीं सुनतीं।”

हम कोई भी नई चीज़ पाते, उसे अपनी बिल्लियों के साथ शेयर करते। स्कूल से लौटते, तो पाते, कई बार हमारी बिल्लियाँ दार्शनिकों की तरह दरवाज़े पर बैठी रहतीं। अपनी बिल्लियों के साथ हम अलग और अकेला समय गुज़ारते, उनसे बात करते, अपने दिल के कई राज़ उन बिल्लियों को बताते। जब मैं चौथी कक्षा में था, मुझे पहली बार किसी लड़की ने होंठों पर चूमा था। आधी छुट्‌टी के दौरान उसने मुझे क्लासरूम से बाहर बुलाया, गलियारे में एक पिलर के पीछे खड़ी होकर बात करती रही, चौकन्नी निगाहों से आसपास देखा, भरपूर एकांत जान उसने मुझे चूम लिया और भग गई। मैं शर्म के मारे लाल हुआ, वहीं खड़ा रहा। बरसों तक यह रहस्य मेरे और उस लड़की के अलावा सिर्फ़ मेरी बिल्लियों को ही पता था। आज भी मैं मानता हूँ कि बिल्लियों से बेहतर राज़दार इस दुनिया में कोई नहीं।

हम बच्चे एक चौड़ी पलंग पर क़तार में सोते थे और तीनों बिल्लियाँ हमारे बिस्तर में घुसकर सोती थीं। सबकी अपनी बिल्लियाँ थीं, सो, क़ायदे से हमें अपनी-अपनी बिल्लियों के साथ सोना था। लेकिन वह बँटवारा तो हमारे लिए था, बिल्लियों की समझ में न आता। वे अपनी मर्ज़ी से उछलकर मनचाही जगह में घुस जातीं, हम उनके लिए लड़ते रहते। नूरू को अपने साथ सुलाने के लिए हममें होड़ लग जाती। आधी रात हमारे कमरे में हुल्लड़ होने लगता। नूरू नहीं, तो नूरी सही। चिन्टू पर हमारा ध्यान न जाता। वह चुपचाप हममें से किसी के पैरों के पास गोल होकर सो जाता। जब हम ज़ोर-से लड़ते, हमारा शोर सुनकर नूरू और नूरी भाग जाते, कहीं छिप जाते, उस समय भी चिन्टू बिस्तर के किसी कोने में पड़ा रहता। हम उसे थोड़ा सहला देते। हम उससे नफ़रत नहीं करते थे, पर वह इतना मुर्दार और निरीह था कि उससे प्यार करने की बात सोचते ही हमारे दिलों में एक अजब-सी हूक उठती, कुछ असहज-सा लगने लगता। उसकी आँखों में ऐसी बेबसी होती कि लगता, छू-भर देने से मर जाएगा। जाने क्या था, उसके प्रति हल्की-सी घृणा थी या उसके मरघिल्ले होने से पैदा हुआ भय या उसके पूरे बिल्लीत्व से निकलती निरीहता या नूरू के स्टारडम के आगे उसकी साधारणता, कुछ तो था जो हमें उससे दूर कर देता। उसे ठंड भी बहुत लगती थी। गर्मी पाने के लिए वह हमारी गोद में आना चाहता, पर हम उसे बहुत नज़ाकत से परे कर देते। तब वह दीदी की गोद में घुस जाता। दीदी उसे भी उतने ही दुलार से अपनातीं। बिल्लियों को जब ठंड लगती है, तब वे गोद में बैठकर घुर्र-घुर्र करती हैं। उनकी गर्दन या छाती पर हाथ रखने से उस ध्वनि को महसूस किया जा सकता है। हम इंतज़ार करते कि हमारी गोद में बैठी हुई बिल्ली कब घुर्र-घुर्र करना शुरू करेगी।

 तब हमारे घर में पायदान नहीं थे, उनकी जगह बोरियाँ बिछी होतीं। हर दरवाज़े के पास बोरियाँ। जब हम व्यस्त होते कि नूरू पर ध्यान न दे पाएँ, तब वह किसी पायदान वाली बोरी पर पसरकर सो जाता। मैं आठ का हो चुका था। एक रोज़ तेज़ बुख़ार में तप रहा था। कंबल ओढ़े लेटा हुआ था। माँ मेरे माथे पर ठंडे पानी की पट्टियाँ रख रही थीं। वह एक पट्‌टी रखतीं, फिर किचन में जाकर कोई काम निपटातीं, फिर आकर मेरी पट्‌टी बदलतीं। मेरे भाई-बहन दूसरे कमरे में पढ़ाई कर रहे थे। जहाँ मैं लेटा था, वहाँ से मुझे अपने कमरे की दहलीज़ पर रखी बोरी दिख रही थी। उस पर नूरू सोया था। सामने से मेरे पिताजी आ रहे थे। वह चलते-चलते अख़बार पढ़ रहे थे। मुझे लगा, अख़बार पढ़ते हुए चल रहे मेरे पिता नीचे सोये नूरू को कुचल देंगे, उन्हें दिखाई भी न पड़ेगा। ऐसा सोचते ही मेरे पूरे शरीर में डर की एक लहर दौड़ गई। अख़बार में खोये मेरे पिताजी ने अगला क़दम बढ़ाया, वह नूरू पर ही गिरने वाला था, नूरू कुचलकर मारा जाने वाला था... बस, मैं पूरी ताक़त से चिल्लाया, “बा......बू......जी.....!” चिल्लाते हुए मेरी आँखें बंद हो गईं। मैं नूरू को कुचलता नहीं देख सकता था। चिल्लाते ही मैं उठकर बैठ गया और ज़ार-ज़ार रोने लगा, “आपने नूरू को मार डाला, उसे कुचल दिया...”

मेरी चीख़ सुनकर सब उस कमरे में दौड़े आए। किसी तरह मुझे चुप कराया गया। मैंने अपने चिल्लाने का कारण बताया। पिताजी बोले, “मेरे पैर रखने से पहले ही नूरू हट गया था।” मुझे यक़ीन न हुआ, तो नूरू को लाकर मेरी गोद में बिठा दिया गया। वह सही-सलामत था। मैंने उसे बहुत प्यार किया।

लेकिन उस चीख़ के बाद मेरे माथे की नस फटने लगी थी। दर्द के मारे जान जा रही थी। थोड़ी देर बाद डॉक्टर को बुलाया गया। उसने मुझे पेनकिलर का इंजेक्शन दिया। मैं जाने कितनी देर सोया रहा। यह माइग्रेन की मेरी पहली स्मृति है। उस रोज़ मेरे सिर में जो दर्द घुसा, आज तक बाहर नहीं निकला। अक्सर मेरे सिर में विस्फोट करता है। मैं बेचैन होकर तड़पता हूँ। कई बार यह दर्द हफ़्तों चलता है। जब माइग्रेन भड़कता है, मुझे नूरू की याद आती है। जब कभी मैं नूरू को याद करता हूँ, दर्द की वह स्मृति अपने आप चली आती है। हर दर्द का एक अतीत होता है। हर अतीत की तह में कोई न कोई दर्द छिपा रहता है।

हमारे घर में बिल्लियों के लिए अतिरिक्त दूध आता था लेकिन बिल्लियाँ सिर्फ़ दूध नहीं पीतीं, वे स्वभाव से ही शिकारी होती हैं। शिकार की अपनी चाहत पूरी करने के लिए वे तिलचट्‌टे भी मार देतीं। नूरू बहुत चपल था। वह घर के बाहर एक नाली के पास जा बैठता, वहाँ चूहों का शिकार करता। उन्हें पकड़कर घर के आँगन में लाता, उछाल-उछालकर उनसे खेलता, फिर खा जाता। एक दिन चूहा खाने के कुछ घंटों बाद वह बीमार पड़ गया। शायद चूहे ने कोई ज़हरीली गोली खाई थी। नूरू उल्टियाँ करने लगा। कुछ घंटों पहले तक पूरे घर में धमाचौकड़ी मचाता नूरू अब निढाल, पस्त था। शाम हो चुकी थी। आँगन में पीले बल्ब की रोशनी में एक बोरी बिछा दी गई। पिताजी ने नूरू को उस पर लिटा दिया। वह बीच-बीच में हिचकियाँ लेता, खड़ा होता, चलने की कोशिश करता, उलटियाँ करने लगता, फिर गिर जाता। हम सब उसके चारों ओर घेरा बनाकर बैठे थे। मेरे भाई ने एक्सटेंशन बॉक्स से तार खींच-खींचकर वहाँ सिन्नी का छोटा काला टेबल फैन लगा दिया। नूरू को हवा लग रही थी। हम बार-बार उसे सहला रहे थे। जितने देवताओं के नाम याद थे, हम मन ही मन उनके आगे हाथ जोड़ते, नूरू के ठीक हो जाने की मनौतियाँ मान रहे थे। दादी ने कहा, “अब यह नहीं बचेगा।” सुनकर हमने रोना-धोना मचा दिया। हमारा रुदन सुन आस-पड़ोस के लोग हमें देख जाते। माँ को दादी की बात पर भरोसा हो गया। वह भीतर से गंगाजल ले आई। नूरू के मुँह में तुलसी-दल और गंगाजल डाला। तब तक उसकी साँसें चल रही थीं। एक बेहद सुंदर, चपल बिल्ला, जिसमें ज़िंदगी की तमाम उछल-कूद व उमंग भरी हुई थी, मृत्यु के निस्पंद सन्नाटे में पड़ा हुआ था। नूरू मर चुका था।

मैंने पहली बार किसी को मरता हुआ देखा था। वह इंसान नहीं था, लेकिन हम इंसान हैं। इंसान जब जानवर से प्यार करता है, तो उसे भी इंसान ही मानने लगता है। प्यार और मौत में बहुत अजीब रिश्ता है। जिससे प्यार हो, उसे मौत आ जाए, तो मौत का दर्द कई गुना बढ़ जाता है।

अगले कई दिन हमारे लिए वीरान रहे। हम उसे याद करते और फफक-फफककर रोते। पिताजी ने अपने हाथों गड्‌ढा खोदकर नूरू को दफ़न किया था। वह भरी आँखों से अपना हाथ देखते। नूरी और चिंटू को कैसा महसूस हुआ होगा, हम कभी नहीं जान सकते। उनकी दिनचर्या में कोई परिवर्तन नहीं आया था। बच्चे पैदा करने और कुछ दिनों तक उन्हें पालने के बाद जूली वापस अदृश्य हो गई थी। बीच में कभी-कभार वह आ जाती, घर का जायज़ा लेती, एकाध दिन रहती, अपने किसी बच्चे के साथ झगड़ा भी करती, फिर चली जाती। दादी की फिलॉसफ़ी गहरी हो गई थी। वह कहतीं- “इसीलिए बोलती हूँ, बिल्लियाँ दर्द देती हैं। जब उनसे लगाव होता है, वे चली जाती हैं। जाने किस जोनि में जाती हैं, उन्हें तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, पर हम जब तक ज़िंदा रहते हैं, उन्हें याद करते रहते हैं।”

वह दोहराती रहतीं, बिल्लियाँ बेवफ़ा होती हैं। नूरू के न रहने का दुख इतना बड़ा था कि इस तरह की बातों के अर्थ समझ नहीं आते थे। हर बात एक तरह का मातम लगती थी। उनकी सुना-सुनी मैं अक्सर कह पड़ता, “हाँ दादी, नूरू बेवफ़ा निकला।” बेवफ़ाई शब्द के मानी भी नहीं पता थे। आज सोचता हूँ, तो लगता है, हर वफ़ा की मंज़िल दरअसल एक ख़ास क़िस्म की बेवफ़ाई है। प्यार में वह मोड़ ज़रूर आता है, जहाँ हम अलग हो जाते हैं। कभी मौत अलग कर देती है, तो कभी ज़िंदगी के हालात, पर अलगाव ज़रूर होता है। क्या है बेवफ़ाई? मर जाना बेवफ़ाई है या ज़िंदा बचे रहना बेवफ़ाई है? पता नहीं, हमारे खड़े रहने की जगहों के हिसाब से दिशाएँ और परिभाषाएँ बदल जाया करती हैं।

इतना जानता हूँ कि हमारा बचपन साधारण व तंगहाल था। वह कोई बचपन नहीं था। आज इतने बरसों बाद जब पलटकर देखता हूँ, तो उम्र के उस खेत में कई सारी मुस्कानें बिखरी हुई दिखती हैं। उनमें से अधिकांश मुस्कानें बिल्लियों के कारण आईं। जो आपके जीवन में इतनी मुस्कानें भर गया हो, उसे वफ़ा-बेवफ़ा के तराज़ू पर क्यों तौला जाए? लेकिन यह भी जानता हूँ कि दादी की बात कोई इलज़ाम नहीं थी, अपने दुख को कहने का एक तरीक़ा-भर था। अपने दिवंगत पति को भी वह इन्हीं शब्दों में याद करती थीं।

नूरू के मरने के कुछ ही हफ़्तों बाद नूरी भाग गई। कभी-कभी वह आसपास की छतों पर दिख जाती, लेकिन हमारे पुकारने पर कोई प्रतिक्रिया न देती। घर में सिर्फ़ चिन्टू बचा था, जो अब भी हमारे बिस्तर के किनारे गोल होकर सोता था। दादी उसे देख-देख हैरान होतीं, “ईश्वर का कैसा खेल है! मरना इस मुर्दार को था, मर गया वह तगड़ा।” हमने उम्मीद भी नहीं की थी कि मरघिल्ला चिन्टू आगे इतना लंबा जियेगा। भविष्य के गर्भ में उसके कई नए रूप छिपे थे, जिन पर हमें हैरान होना था। उन पर फिर कभी, किसी अगली क़िस्त में।

लेकिन बाद के उन सारे बरसों में भी नूरू जैसा कोई न हुआ। वह कोई अवतारी बिल्ला नहीं था जो उसकी ग़ज़ब की लीलाएँ हों। साधारण बिल्लों और उसमें यह अंतर था कि नूरू की हर हरकत में एक आनंद था। लेखक होने के नाते मैं यह कह सकता हूँ कि आनंद अक्सर भाषा की पकड़ से बाहर रहता है। मेरे जीवन में नूरू एक दरवाज़े की तरह खुला था- इंसानों की दुनिया से पालतू जानवरों की दुनिया में ले जानेवाला दरवाज़ा। हमारे परिवार के लोग, बचपन के कुछ साथी आज भी जब इकट्‌ठा होते हैं, तो किसी न किसी बहाने नूरू का ज़िक्र ज़रूर आ जाता है।

अपनी सारी तकलीफ़ें हमसे छिपा ले जाने वाले पिता भीतर ही भीतर उसे कितना याद करते थे, यह हमें तब पता चला, जब उसके मरने के कुछ दिनों बाद, शहर के एक स्थानीय अख़बार के फीचर पेज पर नूरू पर लिखा उनका एक लेख छपा। उसमें नूरू की ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर भी थी। उसे पढ़कर शहर में कई लोग रोये थे। उस रोज़ हम बच्चों ने एक-दूसरे से कहा, “नूरू सच में सुपरस्टार था, जीते-जी कई लोगों को हँसाया, मरकर कई लोगों को रुला गया।”


(गीत चतुर्वेदी के पिछले कॉलम यहाँ पढ़ें।)

Monday, January 22, 2018

मनोज कुमार झा की नई कविताएं


                                                                                                                                                                                                                                Photo @anurag_v




मासूमियत में पराजित

वो निहायत मासूम था
इतना मासूम कि उसे इस कठिन जाड़े में भी गर्म कपड़े नही थे
चप्पल किसी के थे जिसे अब उसके पैरों ने कबूल लिया था
रात के तीन थे और मैं स्टेशन पर चाय पी रहा था
वो अंगीठी में हाथ सेंक रहा था जो चायवाले को बुरा लग रहा था
हम दोनों ठंड में थे ,मेरे पास मफलर था और उसके पास खुले कान
वो इस शहर में नया था,शहर उसके लिए नया नहीं था
वो कई शहर देख चुका था और जान चुका था कि हर शहर के दस्ताने एक से होते हैं
हर शहर उसकी मासूमियत को थोड़ा खुरच देता था
वो भूख में था और भूख की आवाज़ नहीँ होती
खाने की डकार होती है

उसे जब मैं शरीफ लगा तो लगभग कान में बोला
मैं कुछ लड़कियों को जानता हूं जो प्लेटफार्म पर घूम-फिर रही है
आप कहें तो बात करा दूँ
वो अपनी मासूमियत में पराजित था ,मैं अपने शरीफ समझे जाने में सशंक।
*** 


उच्छिष्ट

तुम्हें भी चमक की आदत लग जायेगी
हंसने के भीतर प्रकाश उपहास बनकर जगह बना लेगा
तुम शुरू शुरू में जान भी सकते हो शायद 
फिर भूल जाओगे
चाय पीने की दुकान बदल जाएगी
प्यारे पकोड़ों का स्वाद बदल जायेगा
तुम पकौड़े वाली पर चिल्लाओगे
यह सब होगा
खुद को उदार समझते जाने के बावजूद
यह इस शहर का दस्तूर है
यहां हजारों घूमते हुए फ़्लैश लाइट्स है
यहां बहुत अधिक रौशनी है
और तुम जैसे
कीड़ों में बदल रहे
उच्छिष्ट परिवर्तन के ग्राहक उसके खाद्य।

***
 

दुख में बातचीत

वेश्या मत बनना मेरी प्यारी बेटी
 
गिद्धों के शरीर का स्पर्श बहुत दुख देता है
यह रगड़ देता है कालिख मन की दीवारों पर
वेश्याओं का मजाक भी मत उड़ाना
तेरी मां ने भी कुछ ऐसे दिन भोगे हैं
लोभ त्याग देना, नहीं कहूँगा
दो जून का खाना और साफ जल से नहाना लोभ नहीं है
तुम खूब सोने बाली चिड़िया बनना और खूब आराम करना
मैं अपने पंख तुम्हारे लिए छोड़ जाऊँगा
कविताएं पढ़ती रहना और चांदनी में नहाना
याद रखना जिस सरंगिये के साथ मैं गोरखधाम भागा था
उससे चाँद ने वादा किया था कि तुम मेरे साथ रहो
मैं दिलाऊँगा तुझे रोटी और साफ पानी।
***
अन्यथा

एक किसान के पतन के ब्यौरे जानकर 
तुझे क्या मिलेगा
इससे ज़्यादा तो तुझे बैंगन में लगा 
कीड़ा बता देगा
***

सभ्यता

एक अम्बानी की बीबी
तीन लाख का एक कप
यूज़ एंड थ्रो करती है
यह जायज है
हजारों साल की सभ्यता का यह हासिल है।

एक परीछन जमींदार के खेत में ककड़ी
तोड़ते पकड़ा जाता है
उसके मुंह पर कालिख मल दी जाती है
यह भी हजारों साल की सभ्यता का हासिल है।
***

  (सबद पर मनोज की अन्य कविताएं यहाँ )

Friday, January 12, 2018

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 7 : आप किसके लिए लिखते हैं?





1996-97 का समय। 19-20 साल का एक युवक (यानी मैं), मुंबई में नरीमन पॉइंट पर बैठ, दूसरे युवक (यानी एक प्यारा कवि-मित्र) से पूछता है, “तू किसके लिए लिखता है?”

वह जवाब देता है, “मैं समाज के शोषित-पीड़ित-दमित वर्ग के लिए लिखता हूँ। मैं राशन की दुकान व रोज़गार कार्यालय की क़तार में खड़े तमाम व्यक्तियों के लिए लिखता हूँ, और ख़ासकर उस आख़िरी व्यक्ति के लिए, जिसका नंबर कभी नहीं आएगा। मैं हारे हुए आदमी के लिए कविता लिखता हूँ।”

मैंने कहा, “बड़ा प्रभावित करने वाला जवाब है, रे! लेकिन इनमें से कोई भी तेरी कविताएँ नहीं पढ़ता।”

वह: “भले न पढ़ें, लेकिन मैं उन्हीं को ध्यान में रखकर लिखता हूँ।”

मैं: “यानी ऐसा कह सकते हैं कि तू जिन लोगों को ध्यान में रखकर लिखता है, वे तुझे नहीं पढ़ते। और जो लोग तुझे पढ़ते हैं, तूने उनके लिए लिखा ही नहीं, नाहक़ वे तुझे पढ़ते हैं।”

फँसा हुआ महसूस कर, उसने अपना गोल चश्मा ठीक करते हुए मेरी ओर देखा और मेरी बात में छिपी शरारत को ताड़कर हँस पड़ा, बोला, “बहुत मारूँगा।”

हम दोनों हँसने लगे और सवाल आया-गया हो गया। लेकिन उसके जवाब से यह ज़ाहिर हो गया था कि मुंबई की गोष्ठियों में वह, उन वरिष्ठ रचनाकारों के वक्तव्यों को बहुत ग़ौर से सुनता है, जो दुनिया के किसी भी लेखक पर बात करते समय यह बताना नहीं भूलते थे कि एक लेखक को किनके लिए लिखना चाहिए।

हम कई मित्र आपस में इस तरह के सवाल पूछकर एक-दूसरे को क़िस्म-क़िस्म के बौद्धिक संकटों में डालते रहते थे। मैंने सवाल पूछकर उसे संकट में डाला था। कुछ दिनों तक सोचते रहने के बाद (शायद बदला लेने के लिए) यही सवाल उसने मुझसे किया।

मैंने जवाब दिया, “मुझे नहीं पता। बस लिखता हूँ, यह नहीं जानता कि किसके लिए लिखता हूँ। मेरी लिखाई अबूझ से संवाद का एक उपक्रम है। अपने लिखे में मैं उससे बात करता हूँ, जो अदृश्य है।”

मेरा संकट बनाए रखने के लिए उसने कुछ और सवाल किए। एक-दो का जवाब देने के बाद जब मैं भी फँसने लगा, तो उसी की तरह मैंने भी जवाब दिया, “बहुत मारूँगा।” हा हा हा करते हुए हमने फिर बात वहीं ख़त्म कर दी।

कुछ दिनों बाद, उसने पूरा क़िस्सा एक तीसरे मित्र को सुनाया, तो उसने निर्णायक जैसी भूमिका अख़्तियार करते हुए मेरे मित्र को पॉलिटिकली करेक्ट और मुझे इनकरेक्ट बताया। उस निर्णायक मित्र को मेरा जवाब कलावादी लगा था। ‘भारत एक कृषि-प्रधान देश है’ व ‘साहित्य समाज का दर्पण है’ जैसी पंक्तियों ने हमारी सामाजिक, सांस्कृतिक व साहित्यिक चेतना के साथ जितनी जोड़मतोड़ की है, लगभग उतनी ही जनवाद-कलावाद की ‘कालजयी नूराकुश्ती’ ने।

आज वह पूरी घटना याद आ रही है। मुझे चार दिन पुरानी बात ठीक से याद नहीं रहती, बीस साल पुरानी बात कैसे याद है? क्योंकि यह, उस समय की एक डायरी में बहुत विस्तार से लिख रखी है। आज, यह सारी घटना याद करते हुए कह सकता हूँ कि हम दोनों हमउम्र थे और हम दोनों के ही जवाब अपनी आयु-उचित रूमानियत से भरे हुए थे। बावजूद इसके, हम दोनों ही जानते थे कि हमारा पाठक कौन है, हमें किसके लिए लिखना है। वह एक मूर्त पाठक की कल्पना में था, मैं एक अमूर्त पाठक की।

आप किसके लिए लिखते हैं? यह ऐसा सवाल है, जो लेखक के जीवन में बार-बार आता है. इस सवाल में कई अर्थ व मंशाएँ छिपी होती हैं। कई बार पूछने वाला बेहद मासूम लगता है, तो कई बार अव्वल दर्जे का बदमाश। पूछने वाले की नीयत का अंदाज़ा लगाकर या तो इसका जवाब दिया जाता है या नहीं दिया जाता। अपने शुरुआती बरसों में मैंने कई लोगों से यह सवाल पूछा है और एक बात कॉमन पाई है कि इसका जवाब देते समय ज़्यादातर लोग पॉलिटिकली करेक्ट बने रहना चाहते हैं। आप किसके लिए लिखते हैं- साधारण-सी गूँज वाला यह सवाल अचानक एक राजनीतिक सवाल बन जाता है।

मुझे पॉलिटिकली इनकरेक्ट लोग ज़्यादा अच्छे लगते हैं। उनके भीतर का विरोधाभास मुझे आकर्षित करता है। महाभारत में दो पक्ष थे- एक पांडव, दूसरे कौरव। दोनों अपनी-अपनी पॉलिटिक्स पर टिके हुए थे। अगर दोनों में से एक भी पक्ष, एक पॉलिटिकली इनकरेक्ट निर्णय ले लेता, तो उतना बड़ा युद्ध टल जाता। मसलन, ‘पांडवों को सुई की नोंक बराबर जगह नहीं दूँगा’ की ज़िद करने वाला दुर्योधन अगर दूत बनकर आए कृष्ण के सामने कह देता, “ठीक है। यह लो, मैंने पांडवों को खांडवप्रस्थ लौटा दिया,” तो कहानी कुछ और होती। भले कौरवों के दल में इस पर अचरज प्रकट किया जाता, दुर्योधन की मति फिर गई है जैसी बातें कही जातीं। पॉलिटिकली इनकरेक्टनेस निजी होती है, आपका दल या पार्टी इसे मान्य नहीं करती।

इसी तरह त्याग को धर्म का प्रमुख गुण मानने वाले धर्मराज युधिष्ठिर ने एक बार कह दिया होता, “ठीक है। सारी ज़मीन तुम रख लो, हम किसी और देश जाकर अपने पुरुषार्थ से और ज़मीन खड़ी कर लेंगे,” तो भी कहानी अलग हो जाती। भले द्रौपदी एक बार फिर धर्मराज पर चिंचिया उठती, भीम मुक्के से चट्‌टानें फोड़-फोड़कर अपना ग़ुस्सा निकालता, पर सर्वमान्य मुखिया अगर पॉलिटिकली इनकरेक्ट निर्णय ले ही ले, तो आप चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते।

हर समय पॉलिटिकली करेक्ट होने का हठ भी महान विपदाएँ ले आता है। तुम करेक्ट हो या इनकरेक्ट, ‘पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है’ जानने के बाद ही तय हो पाता है। इसी तरह, लेखक किसके लिए लिखता है यह जानना लेखक की पॉलिटिक्स जानने जैसा मान लिया जाता है। इसीलिए इसके जवाब में लोग इतने सचेत हो जाते हैं। इनकरेक्ट होने का जोखिम नहीं उठा पाते। इसीलिए उनके भीतर का सच मालूम नहीं पड़ता।

लेखक किसके लिए लिखता है- का जवाब खोजते समय हमें यह भी सोचना होगा कि साहित्य किसके लिए है? आज के संदर्भ में देखें, तो लगता है- साहित्य सबके लिए खुला एक पार्क है, इसमें हर किसी को नि:शुल्क प्रवेश की अनुमति है कि वह आए और बैठकर साहित्य पढ़े, फिर भी इसमें सब लोग नहीं आते। इस पार्क के सामने से गुज़र जाते हैं, लेकिन इसमें प्रवेश नहीं करते। कई तो इस दिशा में देखते तक नहीं हैं। यानी जो चीज़ सबके लिए है, उसमें भी सब लोग नहीं आते। लेखक सबके लिए लिखता है, लेकिन सब लोग उसे नहीं पढ़ते। देश की बहुसंख्य जनता की चिंता लेखक करता है, लेकिन जनता का बहुसंख्य उसे पढ़ता ही नहीं। चलिए, यह भी मान लेते हैं, पढ़े-न पढ़े लेकिन चिंता का होना ज़रूरी है। जैसे एक उदाहरण लेते हैं : एक कवि ने भैंस पर कविता लिखी, पर कोई ज़रूरी नहीं कि भैंस उसे पढ़े ही पढ़े, वह तो खड़ी-खड़ी पगुरा रही। फिर उसे कौन पढ़ेगा? गड़रिया? पता नहीं, वह पढ़ता भी है कि नहीं। लेकिन कविता लिखी जाती है, और तमाम बुरे हालात के बाद थोड़ी-सी पढ़ी भी जाती है, तो कौन है वह, जो उसे पढ़ता है?

1- जिसे भैंस में दिलचस्पी हो
2- जिसे कविता या साहित्य में दिलचस्पी हो

3- जिसे उस कवि-विशेष में दिलचस्पी हो

तो दरअसल भैंस पर लिखने वाला कवि इन तीन लोगों के लिए लिखता है, लेकिन इन तीनों की पहचान करना बड़ा मुश्किल है, क्योंकि ये तीनों भाँति-भाँति के लोग होंगे। सबकी इच्छा, आकांक्षा व माँग अलग-अलग होंगी। हो सकता है कि पॉइंट नंबर एक के अंतर्गत आने वाला व्यक्ति पहले से तय करके बैठा हो कि भैंस में मेरी दिलचस्पी तो है, लेकिन कलावादी भैंस में, जनवादी भैंस में नहीं। इसी तरह की और श्रेणियों की कल्पना की जा सकती है। तो सवाल वही कि आख़िर इन तीनों का मिला-जुला रूप कैसे सोचा जाए, जिसे उक्त भैंस-कवि अपना आदर्श पाठक मानकर लिख सके?

बात आदर्श पाठक की खोज पर जाकर रुकती है। आदर्श पाठक जैसी कोई चीज़ नहीं होती, जैसे आदर्श कविता नहीं हो सकती, आदर्श साहित्य नहीं हो सकता, आदर्श मनुष्य नहीं हो सकता। उसके बाद भी कई लेखक अपनी ज़रूरत के हिसाब से आदर्श पाठक की एक परिकल्पना करते हैं, उसके मन में उतरने की कोशिश करते हैं, और उस हिसाब से अपनी रचना करते हैं।

कई बार इस आदर्श पाठक के रूप में मैं अपनी ख़ुद की कल्पना करता हूँ। मैं जैसी चीज़ें पढ़ना चाहता हूँ, वैसी चीज़ें लिखने की कोशिश करता हूँ। कई बार मैं कहता हूँ कि मैं बुनियादी तौर पर अपने लिए लिखता हूँ, मेरे अलावा कोई और उसे पढ़ ले, तो यह एक बोनस की तरह है। पर मैं जानता हूँ कि यह भी कोई सही जवाब नहीं है, महज़ आदर्श क़िस्म का एक जवाब है। दरअसल, इस सवाल का कोई एक सही जवाब नहीं हो सकता। हर लेखक अपने-अपने तरीक़े से इस संकट का सामना करता है। साहित्य का यह पूरा पक्ष पूरी तरह कल्पनाओं पर आधारित है। यह अवचेतन में इस तरह चलता है कि जिस समय रचना की कल्पना की जाती है, उसी समय उसे पढ़ने वाले ‘प्रतिनिधि पाठक’ की कल्पना भी कर ली जाती है और यदि दोनों में साम्य बन गया, तो रचना कामयाब मान ली जाती है। साहित्य स्वभावत: द्विपक्षीय है- लेखक मौजूद है तो पाठक को भी मौजूद होना होगा। एक की अनुपस्थिति हुई, तो ‘साहित्य’ नहीं बनेगा। जिस रचना को किसी ने नहीं पढ़ा, उसका अस्तित्व ही नहीं बचेगा, साहित्य में उसका प्रवेश तो दूर की बात। गुणाढ्य की वृहत्कथा को कोई पढ़ने-सुनने को राज़ी न था, जंगल जाकर अपनी कहानी उसने ख़ुद ही को सुनानी शुरू की, फिर रोते हुए एक-एक पन्ना जलाने लगा। वे हिस्से नष्ट हो गए। थोड़ा-सा हिस्सा वह बचा, जिसे बाद में दूसरों ने पढ़ा-सुना। साहित्य का एक अर्थ दो चीज़ों के ‘सहित’ होने में है।

लेखक हो और पाठक हो, और कोई कहानी न हो, तो भी कहानी की रचना हो जाती है। उत्तर-आधुनिक उपन्यासों में ऐसे या मिलते-जुलते कई प्रसंग आते हैं कि लेखक और पाठक (या संपादक) बैठकर एक कहानी या किताब की चर्चा (या खोज) कर रहे हैं, उनकी चर्चा ही कहानी बन जाती है, लेकिन मूल कहानी या किताब क्या थी जिसकी चर्चा की जा रही थी, लेखक इसके बारे में कहीं नहीं बताता।

भारत में प्रचलित सत्यनारायण की कथा कुछ ऐसी ही है। उसे साहित्य नहीं माना जा सकता, लेकिन वह लोक में इस क़दर व्याप्त है कि इस तकनीक को समझने के लिए उसकी मदद ली जा सकती है। उस कथा में सबकुछ है, बस सत्यनारायण की कथा नहीं है। लकड़हारा समृद्ध हो जाता है, फिर दरिद्र हो जाता है, और सारे पाप सत्यनारायण की कथा सुनने से कट जाते हैं- यह सब वर्णन मिलता है, लेकिन वह सत्यनारायण की कौन-सी कथा सुनता है, इसका कहीं पता नहीं चलता। जिस कथा का माहात्म्य बताने के लिए पूरी कथा रची गई है, वह कहीं है ही नहीं। यह रचना कैसे हुई? क्योंकि लेखक और पाठक दोनों साथ आ गए, उनका आपसी व्यवहार ही कथा बन गया।

लेखक जब एक पाठक के मॉडल की कल्पना कर लेता है, और जब वह फिट बैठ जाती है, तो रचना अपने आप खड़ी होने लगती है, उस पाठक के दिल में प्रवेश करने लगती है। अधिकांश लेखक अपने इस काल्पनिक मॉडल पाठक के प्रति जागरूक नहीं होते, कइयों को इसकी ज़रूरत भी नहीं महसूस होती, लेकिन यह दूसरा पक्ष चेतन-अवचेतन मन में रहता ज़रूर है, क्योंकि साहित्य एक संवाद भी है, आत्म से भी व अनात्म से भी।

तुलसी ने अपनी रचना को स्वांत: सुखाय कहा था- रघुनाथ की यह गाथा मैं अपने सुख के लिए लिख रहा हूँ, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्होंने पाठक या श्रोता को उपेक्षित कर दिया, बल्कि बार-बार उसे न्यौता दिया है, उसकी एक परिकल्पना अपने भीतर व रचना के भीतर छिपाए रखी है। आप किसके लिए लिखते हैं, यह सवाल भी पश्चिम से आया है और यह साहित्य का सवाल कम, बाज़ार का सवाल अधिक है। यदि लेखक को अपनी रचनाओं के लिए बड़े पाठकवर्ग की इच्छा होगी, तो भले वह चाहे न चाहे, बाज़ार उसके सामने यह सवाल ज़रूर फेंकेगा, क्योंकि तब साहित्य का बाज़ार आपके लिखे को उन लोगों के बीच ले जाना चाहेगा। पुराने युगों में भले उस तरह न रहा हो, लेकिन आज के युग में यह सवाल बार-बार आता है, क्योंकि अब साहित्य बहुत सारे विभिन्न वर्गों में बँट गया है। सौ साल पहले प्रेमचंद ही सबसे गुणवान लेखक थे, और सबसे लोकप्रिय भी। प्रसाद की कला की हर जगह सराहना होती थी और उन्हें लोकप्रियता भी उतनी ही मिली थी। बंगाली में रवींद्रनाथ टैगोर ही सर्वश्रेष्ठ व सर्वप्रिय एक साथ थे। अपने ज़माने में डिकेन्स और दोस्तोएव्स्की में भी दोनों गुण एक साथ थे। क्योंकि उस ज़माने में साहित्य की मुख्यतया एक ही धारा होती थी। अब बहुत कुछ बदल गया है। आधुनिकता ने हर भाषा के साहित्य को अभूतपूर्व तरीक़े से विखंडित किया है। उसने एक ख़ास क़िस्म के साहित्यिक लेखन को उच्च-कला व दूसरे ख़ास क़िस्म के लेखन को निम्न-कला में वर्गीकृत कर दिया है। इस तथाकथित उच्च-कला व निम्न-कला के बीच लगातार संघर्ष चल रहा है। अगर साहित्य में आधुनिकता-बोध न आया होता, तो इस तरह का बँटवारा होना मुश्किल था। नया ज्ञान व नया बोध अनगिनत लाभ देता है, तो कुछ ख़ास तरह के नुक़सान भी करवाता है। ऐसा नहीं है कि बुरा साहित्य तब न रचा जाता हो। राजशेखर, भामह, मम्मट ने बुरे कवियों व काव्य के कई उदाहरण दिए हैं। एक ख़ास तरह के काव्य को अधम काव्य भी कहा है। बावजूद इसके, तब साहित्य आज की तरह खाँचों में बँटा हुआ न रहा होगा। श्रेणियाँ तब भी रही होंगी, लेकिन आज की तरह उनकी सांस्थानिक स्थापना न हुई होगी। काव्यशास्त्र के ग्रंथों में काव्य के अनेक उद्देश्य बताए गए हैं, कवि उनका अनुसरण भी करते थे। कोई कविता धन के लिए लिखी जाती थी, कोई यश के लिए, कोई सिर पर पड़ी मुसीबत टालने के लिए यानी अनिष्ट-निवारण, कोई मोक्ष प्राप्त करने के लिए। कविता की इतनी श्रेणियाँ प्रचलित व ग्रंथित हैं, तो यक़ीनन कवि को यह भी पता होगा कि टारगेट ऑडिएन्स क्या है। एक ही कविता के कारण कवि को विद्वानों के बीच मान भी मिलता था, राजा या अमीरों की ओर से धन भी मिलता था और जनता की ओर से यश व कीर्ति भी मिलती थी। आज अगर आपको ये तीनों चीज़ें पानी हैं, तो तीन अलग-अलग तरह की कविताएँ लिखनी होंगी।

उच्च-कला धीरे-धीरे सीमित होती जा रही है, जबकि निम्न-कला उतनी ही फैल रही है। उच्च-कला के अभ्यासक को दस तरह के भ्रम होते हैं, चूंकि उसे उच्च-कला के ज्ञाताओं के बीच मान्यता प्राप्त करनी होती है, उसकी परीक्षा ज़्यादा कठिन होती है। जबकि निम्न-कला के लक्ष्य बहुत स्पष्ट होते हैं, उसे कलात्मक वैशिष्ट्य व नयेपन की परवाह नहीं होती, उसका एकमात्र लक्ष्य अधिक से अधिक लोकप्रिय होना होता है। साहित्यिक कविता व मंचीय कविता जैसी दो श्रेणियाँ हमें हिंदी में साफ़ दिखाई देती हैं।

साहित्यिक कविता के अभ्यासक अक्सर भ्रमों में रहते हैं। उन्हें समझ में नहीं आता कि कौन-सा रास्ता पकड़ा जाय।

1- ऐसी कविता लिखें जो बहुत लोकप्रिय हो जाए
2- लेकिन उच्च कलात्मक मूल्यों पर समकालीन मुहावरे में वैसी कविता लिखना बहुत मुश्किल है

3- मानो वैसी लिख भी दी तो जात-बाहर हो जाएँगे कि मंचीय हो गया
4- गुणवत्ता व लोकप्रियता में से क्या चुना जाए

5- लोकप्रियता के लिए तो भावुकतावादी होना होगा, एक तरह का बॉलीवुडी-पना, बुद्धिवाद के भी भावुक पक्षों को ही छूना होगा
6- उसे बार-बार यह अहसास होता है कि कोई उसे पढ़ता ही नहीं। जिस पाठक की कल्पना करके वह लिख रहा है, वह कहीं अस्तित्व में ही नहीं

7- जो अस्तित्व में है, उसकी कल्पनाशक्ति या तो उस पाठक को पकड़ नहीं पा रही या फिर उस स्तर तक नीचे उतर नहीं पा रही

इन भ्रमों में पड़कर अक्सर कलात्मक व बौद्धिकता के स्तर पर ग़लत निर्णय ले लिए जाते हैं, जिससे रचना मार खाती है। दूसरी तरफ़ मंचीय कवि को देखें। उसका फंडा एकदम क्लीयर है। वह ग़लती से भी ऐसी कोई गूढ़ या कलात्मक बात नहीं कहता, जो उसके श्रोता के सिर के ऊपर से निकल जाए। वह हर चीज़ को आसान, सरल व सुपाच्य बनाकर प्रस्तुत करता है। क्योंकि उसकी प्रतिबद्धता भ्रमहीन है। उसे कला नहीं देनी, कला का आभास देना है। कला का आभास देने के लिए भी एक ख़ास कला चाहिए होती है, उतनी उसमें है। यदि नहीं है, तो वह मंच पर असफल हो जाता है। कला में जो कुछ भी सुपाच्य होगा, वह सत्य से उतना ही दूर होगा। वह महज़ सत्याभास होगा। निम्न-कलाएँ सत्याभास से अपना आहार ग्रहण करती हैं। इन विभाजनों व इनसे पैदा हुई व्यावसायिकता ने कला के मूल्यों को तेज़ी से बदला है। एक तरफ़ ‘साहित्यिक रचना’ का दायरा तेज़ी से सिकुड़ रहा है, तो दूसरी तरफ़ यह कोशिशें भी चल रही हैं कि क्यों न उन चीज़ों को भी साहित्यिक माना जाए? यह स्थिति, परिदृश्य को औसत की विलक्षण उत्सवधर्मिता से भर देती है।  

साहित्य के आस्वादकों के बीच यह बँटवारा कैसे हो गया? आधुनिकता-बोध ने तो कला के मूल्यों को बदला, पाठक व श्रोताओं को किसने बदला व बाँटा? इसका जवाब सोचते समय हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आधुनिकता-बोध से सिर्फ़ कला ही नहीं, बल्कि बाज़ार भी विकसित हुआ। एक ही उपभोक्ता समूह को बाज़ार सब कुछ, देर तक, नहीं बेच सकता। पहले एक ही शैंपू सबके लिए आता था, फिर पुरुषों व स्त्रियों के लिए अलग-अलग हो गया। इस तरह रोज़मर्रा के जीवन में उपभोक्ताओं के विभाजन के कई सारे उदाहरण हम देख सकते हैं। साहित्य के आस्वादकों के बीच इस बँटवारे को भी वह बहुत तेज़ी से बढ़ा रहा है। मुनाफ़े के नियम से संचालित होने वाले बाज़ार का ऊँट उसी करवट बैठेगा, जहाँ भीड़ ज़्यादा होगी।

इस माहौल में लेखक से बराबर यह उम्मीद की जाती है कि उसे पता हो, वह किसके लिए लिख रहा है। वह जिसके लिए लिख रहा है, क्या वह उसे जानता है? यदि वह ख़ुद के लिए लिख रहा है, तो क्या ख़ुद को जानता है? कई बार ख़ुद को जानना अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, बजाय पाठक को जानने के। यहाँ मुझे इमरे कर्तेश की एक बात याद आती है। वह हंगरी के लेखक थे और उन्हें 2002 का नोबेल पुरस्कार मिला था। पुरस्कार से पहले व बाद भी, वह कभी लोकप्रिय लेखक नहीं रहे, लेकिन उनका सम्मान बहुत है। यूरोपीय साहित्य में दोस्तोएव्स्की, काफ़्का, सैम्युअल बेकेट व थॉमस बर्नहार्ड की एक परंपरा बनती है, वह उसमें एक अंग हैं। उन्होंने कहा था, “मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मेरी किताबें छपेंगी। सो, मैं हमेशा स्वतंत्र रहा और जैसा चाहा, वैसा लिखता रहा। मेरे पास पाठक थे ही नहीं, इसलिए मैंने सिर्फ़ भाषा, रूप और विषय के प्रति निष्ठा बरती।” क्या काफ़्का भी यही नहीं सोचता होगा? उसने तो अपनी किताबें जला देने को कहा था। पाठक नाम के इस काल्पनिक दबाव से जैसे कर्तेश ख़ुद को बचा ले गये, काफ़्का भी तो उसी तरह बचा ले गया था।

टारगेट पूरा करने व टारगेट ऑडिएन्स को संतुष्ट करने के इस उन्मादी दबाव-भरे दौर में कर्तेश की यह बात कितनी राहत देती है। इस समय दुनिया के सबसे प्रसिद्ध साहित्यिक लेखकों में से एक हैं नॉर्वे के कार्ल ऊवे केनॉसगोर्द। जब उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखनी शुरू की थी, तो कुछ ऐसी ही मानसिकता में थे। वह कहते हैं कि उन्हें नहीं पता था कि उनकी किताब कौन पढ़ेगा, बस एक ज़िद थी कि ख़ुद के प्रति सच्चा रहना है। आत्मनिष्ठ होकर की गई रचना अपने आप कला में तब्दील हो जाती है, बशर्ते आत्म से उतना गहरा परिचय हो।

भले कितने भी सुझाव दिए जाएँ कि लेखक को अपने पाठक के बारे में पता होना चाहिए, मुझे हमेशा ऐसा लगता है कि तमाम कल्पनाओं के बाद भी उसे नहीं पता होता कि उसका पाठक कौन होगा। अनजान इलाक़ों से, कोई एक अनजान व्यक्ति आता है, आपकी कल्पनाओं से एकदम ही अलग, और आपका सबसे निष्ठावान पाठक बन जाता है। लेखक को लगता है कि वह पाठक के दिल के भीतर उतरकर सारा हाल-चाल लिख देगा, तो पाठक उससे कनेक्ट होगा, जुड़ जाएगा। ऐसे में लेखक यह भूल जाता है कि सारे पाठक एक जैसे नहीं होते। हर पाठक अपने दिल के भीतर नहीं झाँकना चाहता। अपने भीतर प्रवेश करना हर किसी को नहीं रुचता। हम साहित्य इसलिए भी पढ़ते हैं कि हम दूसरे मनुष्यों को जान सकें। यह बिलकुल वैसी बात है, जैसे कोई अपनी खिड़की पर खड़ा हो पड़ोसी के घर में ताक-झाँक करे, उसके घर के सारे झगड़ों को सुने और इस तरह अपने घर के झगड़ों को भूल जाए।

दूसरों के घरों में कान लगाकर सुनने वाले पाठक/श्रोता, कहानी को बहुत दूर तक ले जाते हैं। गुणाढ्य की वृहत्कथा की रचना से संबंधित एक क़िस्सा याद आता है। लोक में इसके कई संस्करण हैं।

एक बार देवी पार्वती ने ज़िद पकड़ ली कि हे महादेव, मुझे ऐसी कहानी सुनाओ, जो एकदम नई हो, जिसे आज से पहले किसी ने न सुनी हो। ख़ूब सोच-विचारकर महादेव ने ऐसी कहानी सुनाई, जो पार्वती से पहले किसी ने नहीं सुनी थी। दीवार के पार से शिव का एक गण कान लगाए वह कहानी सुन रहा था। रात को वह अपने घर गया, जाकर उसने, शिव का ज़िक्र किए बिना, अपनी पत्नी को वही कहानी सुना दी। उसकी पत्नी, देवी पार्वती के लिए काम करती थी। कुछ दिन बाद वह देवी के कक्ष में गई और उत्साह में भरकर उसने वही कहानी उन्हें सुना दी। अब तो महादेवी आगबबूला। महादेव पर ख़ूब क्रोधित हुईं कि आपने वादा किया था, यह कहानी मेरे अलावा किसी को नहीं पता, पर मेरी तो नौकरानी भी यह कहानी जानती है। कैसे हुई यह नई? महादेव ने नंदी से कहकर जाँच बिठा दी, तो सारी सचाई पता चली। देवी ने उस गण को शाप दे दिया कि जा, अब से धरती पर रह।  धरती पर जाकर उस गण ने बरसों बाद वह कहानी एक पिशाच को सुना दी। पिशाच ने गुणाढ्य को सुना दी और गुणाढ्य ने उस कहानी को वृहत्कथा नाम से लिख दिया।

मान लें, इस क़िस्से में महादेव एक लेखक हैं, और पार्वती उनकी पाठक (श्रोता)। महादेव को लग रहा कि पाठक एक ही है- कहानी का टारगेट ऑडिएन्स यानी पार्वती, लेकिन हक़ीक़त में पाठक दो हैं, वह अदृश्य गण भी शामिल है। कहानी लिखते समय महादेव ने उसकी कल्पना तक नहीं की थी, लेकिन वह भी उतना ही आनंद पा रहा। थोड़ा और फैलाकर देखें, तो पाठक तीन हैं, गण की बीवी भी शामिल, महादेव ने उसकी भी कल्पना नहीं की थी। थोड़ा और फैलाकर देखें, तो पाठक चार हैं, पाँच हैं, फिर लाखों लोग है, क्योंकि गुणाढ्य ने धरती पर पूरी कहानी लिखके प्रसारित कर दी थी। महादेव ने पाठक के रूप में उनमें से किसी की कल्पना नहीं की थी। उनके सामने आदर्श पाठक के रूप में महज़ देवी थीं और देवी अपने स्वभाव व व्यवहार में विशिष्ट हैं, अद्वितीय हैं, यानी बाद में जो लाखों पाठक बने, देवी पार्वती उस पाठक-समूह की प्रतिनिधि नहीं कही जा सकतीं।

हिंदू मिथॉलजी में महादेव से बड़ा कथाकार किसी को नहीं माना जाता।  यानी सबसे बड़े कथाकार को भी नहीं पता था कि उसका असली पाठक कौन है, तो धरती के साधारण लेखक-कथाकारों की क्या बिसात। संभव है कि रचना करते समय जिस वर्ग को लेखक ने अपने ध्यान तक में न रखा था, वही वर्ग उस रचना का सबसे बड़ा पाठक-समूह बन जाए।

इस क़िस्से को एक और कोण से देखते हैं: सभी जानते हैं कि महादेव, अर्ध-नर-नारीश्वर हैं। यानी उनका दायाँ हिस्सा शिव का है, बायाँ हिस्सा पार्वती का है। यानी शिव और पार्वती दोनों अलग-अलग नहीं हैं। यानी जो लेखक है, वही पाठक है। जो वाचक है, वही श्रोता है। इस तरह शिव ने वह कहानी किसी दूसरे को नहीं, बल्कि अपने आप को सुनाई थी, क्योंकि पार्वती तो उन्हीं के अंदर हैं। शिव ने कल्पना भी न की थी, उस गण ने कहानी सुन ली और वह प्रसारित भी हो गई। काफ़्का व कर्तेश वाली बात इससे जुड़ती है कि शिव के पास पाठक ही नहीं था, फिर भी एक पाठक था।

हम चाहे जिसके लिए लिखें, आँख बंद करके लिखें, एक आदर्श पाठक की कल्पना करके लिखें या अपने आप के लिए लिखें, यह संभावना हमेशा रहती है कि दीवार के पीछे से एक ऐसा पाठक उसे सुन रहा होगा, जिसकी आदतों, पसंद व स्वभाव के बारे में हमें कोई अंदाज़ा ही न हो और वही हमारी कहानी को आगे तक ले जाए।