Monday, October 02, 2017

महेश वर्मा: छह नई कविताएं

                                                                                                                                       कवि की चित्रकृति


शेर दागना

फिरोज़ अख़तर फिरोज़ या किसी गांव के तख़ल्लसु वाले शायर दोपहर जब आये तो खासे प्यासे थे लेकिन पानी का गिलास हाथ आते ही उन्होंने शेर दाग दिया जो मेरे कान को छूता गुज़रा और  मेरे पुराने घर  की दीवार की पलस्तर में जा धंसा जहां से थोड़ी रेत और सीमेंट भुरभुरा कर झर गई. दाद न मिलने पर और एक शेर सुनाया जो मेरी नासमझी की दीवार से टकराकर थोड़ा और पलस्तर गिरा गया. थोड़ी देर में तो कमरा चांदमारी का मैदान हो गया था और आने वाले लोग थे कि चारों ओर आदिवासियों की तरह मरे पड़े थे और शेर थे कि क्लाशनिकोव की मैगजीन हुए जा रहे थे. अंत में अपनी शेरवानी, टोपी और अपना दीवान समेटकर जब वो चौकी से  से उठे तो उन्होंने क्षेत्रीय बोली में तम्बाकू मांगा.
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मछलियाँ

एक मछली से तुम सबकुछ (का चित्र) बना सकते हो... मज़ाकिये चित्रकार ने अत्याधुनिका से कहा यहां तक कि एक फीमेल न्यूड भी. वह जरा भी चौंकती तो देहाती करार दी जाती सो  उसने आगे का दांव खेला-तो क्या एक स्त्री गुप्तांग भी ? पुरूष अब गंभीर भयभीत और परास्त कायांतरण की ओर घूम चुका है। अगले दृश्य में वह त्रासदी का नायक है जो इस मछलीघर में किसी विशाल मछली के पेट से निकला है. अत्याधुनिका के लिप्सटिक ठीक करने के दृश्य के बाद कैमेरा सीधे सार्वजनिक मूत्रालयों के रेखांकनों पर रोककर हम कास्ट/क्रेडिट्स दिखाना शुरू कर सकते हैं। फिल्म का नाम मछलियाँ.
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मलेरिया

उस समय का किस्सा है जब इतना विकास हो गया था कि दो साल तक मालूम ही नहीं कर पाये कि मलेरिया था. खून जांच कराते कराते वह सुनहरा हो गया और उसकी भूख और उसका हास्यबोध जागृत हो गया. खाना अलबत्ता पच नहीं पाता था उसे और उसके लगातार मज़ाक डाक्टर,  नर्स और  मित्रों को. एक और दोस्त का किस्सा याद आया जिसका फिसड्डीपन सेरेब्रल मलेरिया से ऐसा दूर हुआ कि पुराने दोस्त उससे आंख नहीं मिला पाते थे  लेकिन बीच में थोड़ा हिंसक किस्म से सरक गया था. 
मलेरिया मिलते ही हास्पिटल में जश्न का सा माहौल हो गया डाक्टर्स एक दूसरे से गले मिलकर बधाईयाँ दे रहे थे, मिठाई मंगाने का प्रस्ताव किसी सीनीयर ने खारिज कर दिया वरना इस मरीज के मुंह में डाक्टर हलदकर जरूर लड्डू ठूंस देते जिसे मलेरिया मिला था इससे उसके प्रेक्टिकल जोक्स भी मरने तक रूक जाते. 
खुशी के बीच ऐसे भी वह मरा तो किसी का ध्यान नहीं गया.
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कल्पनाहीनता 

मेरे पक्षी उड़ते तो कभी छत से कभी पंखे से टकराकर छितरा जाते इस तरह कि जमीन उनके टुकडा टुकड़ा शवों से नहीं चिन्दी चिन्दी काग़ज़ों से भर जाता. एक बार तो हद हो गई जब मैं आकाश की बात करते हुए उड़ने वाली मछलियों की बात तक नहीं लिख पाया जबकी यह उस समय की सभी बालपत्रिकाओं में बहुतायत से छपने वाली थीम थी. अक्सर मेरे कन्धे पर पंखे से भी नीचा उड़ने वाला उल्लू बैठा रहता और मिचमिचाती आंखों से दिन की धूप को देखता रहता. यद्यपि मैं खूब उँची छतों वाले कमरों में पला बढ़ा था और मैंने बचपन में उड़ते पक्षी को मार गिराने के शिकारी संस्मरण अपने दादाजी से खूब सुने थे.
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पानी

कीचड़ बारिश थकान की अनगिनत रातों और खून के बीच हम एक दूसरे को एक रात देना चाहते थे. इससे पहले कि कोई उब हमें मार डाले या एक विचारहीन गोली हमारी खोपड़ी को छेदती निकल जाये. कीचड़ हमें चबा रहा था और बीच बीच में छोड़ देता तब अंधेरा हमें भूनने लगता. वह भूल जाता तो बारिश हमारी नग्नता पर छडि़याँ फटकारने लगती. थकन तो थी हीः वह जैसे सांस थी,सांस में घरघराहट की आवाज़.
लो यह मेरी देह कहता हुआ पुरूष कहने लगता और लो अंधकार, 
   और रूदन, 
   असामर्थ्य लोः उसका अर्ध्य लो, 
   लो पूर्वजों का अहंकार.
स्त्री देना चाहती थी अपने दुःख, अपनी देह, अपने अंधकार. चुप रहती. वह आशा के शब्द 
मांगती मांग लेती चोट. धरती बने रहने से उबी हुई वह सूर्योदय  होने पर किधर भी जा 
सकती थी निर्भय.
निर्धन दोनों हम लोग इतने कि पूछने भर पानी भी नहीं आसपास कि पूछें -पानी पियोगी ?
  पियोगे पानी ?
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विवाह

उस समय जबकी कोहबर के वृक्ष और पक्षी भी सो गये थे, सप्तपदी के उनींदे समय को पुरोहित की कड़कदार आवाज़ ही तोड़ सकती थी. वह अब भी हर विवाह पर वही मज़ाक करके लोगों को जगा देने वाला मसीहा था.
रात ख़त्म होने को है, भाषा और उल्लास पहले ही ख़त्म हो चुके इसी समय मैं  वर-वधू- स्त्री-पुरूष के बीच एक बड़े से लाल फल को पकता देख पाया. वह निश्चय ही वासना का लाल फल था जो समूचे वायुमंडल की सांस तंग कर सकता था किसी क्षण.
आग जलाने का यत्न करते पुरोहित को भी जैसे अचानक इसका भान हुआ और उसके पलट कर देखते वर-वधू खड़े हो गये जबकी यह थोड़ी देर में उनसे कहा जाना था, नाई को पुरूष की कलगी और सखी को स्त्री की सलवटें ठीक करनी थीं.
कोई चीज़ इस बीच वहाँ आ गई थी अनुष्ठान मंडप से मंत्रों का वर्चस्व कम करती. वह शायद तीव्र कामना से मिलती जुलती किसी चीज़ का उत्ताप था जिसने दोनों देहों को तान दिया था अद्वितीय अंगड़ाईयों में एकसाथ एक ही जैसी गीली और लसलसी मुस्कान दोनों केमुख पर आई फिर छुपा ली गई.
उनींदे लोगों ने इसे स्वप्न की तरह देखा और पवित्र अग्नि ने इसको देखा हास से,
परिक्रमा इसके बाद संपन्न हुई।
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_____________________________________________ महेश वर्मा की सबद पर अन्य कविताएं यहां




6 comments:

manish joshi said...

वि‍वाह कवि‍ता ध्‍यान खीचती है। जल्‍दी में पढ रहा था वि‍वाह कवि‍ता पर रूकना पडा । बधाई । बहुत अच्‍छा लि‍खा है।

Rajesh Kumar Mishra said...

महेश की कविताएँ पढ़ना आज के समय को पेंटिग में अंकित देखने जैसा।

Nagesh Sharma said...

" अय्यार चित्रों ने कविता का रूप बना लिया और लखलखा सुँघाकर गद्य को पद्य में बदल बेहोश कर दिया ....और भाव का तिलस्म खुल गया ....."

Ashutosh Dubey said...

जबर्दस्त !

Sheshnath Pandey said...

बहुत ही बेहतरीन कविताएँ। पढ़ने के बाद कुछ पढ़ने सा अहसास हुआ।

neera said...

एक नयी शैली में पद्द और गद्द के अंतर को विलीन करती बेहद सुंदर कवितायें.