Friday, October 27, 2017

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 3 : जाते हैं जिधर सब, मैं उधर क्यों नहीं जाता






जो सभी लोग करते हैं, आप भी अगर वही करेंगे, तो आपको कभी विशेषण नहीं मिलेंगे। अधिकतर विशेषण हास्यबोध से निकलकर आते हैं। जिनका बहुत मज़ाक़ उड़ाया जाता है और जो बहुत महान होते हैं (और दोनों अमूमन एक ही होते हैं और यह भी एक कारण है कि महान शब्द अब मख़ौल के लिए ज़्यादा प्रयुक्त होता है), वे अपने अधिकांश काम उस तरह नहीं करते, जिस तरह बाक़ी दूसरे लोग करते हैं। किसी को पागल इसलिए भी कहा जाता है कि वह समाज के प्राकृतिक नियमों का पालन नहीं करता। समाज और प्रकृति के साथ उसका अलग और निजी रिश्ता होता है। यही रिश्ता एक ‘जगह’ की निर्मिति करता है। सिर्फ़ भौगोलिक जगह नहीं, सिर्फ़ मानसिक जगह नहीं, बल्कि दोनों क़िस्म की जगहों का एक अमूर्त-सा मिश्रण। एक ऐसा निजी मिश्रण, जो बहुत विशिष्ट होता है। कला का वास इसी अमूर्त-सी ‘जगह’ में होता है।

जैसे दिल्ली में लाखों शायर हुए होंगे, नामदार, गुमनाम और ज़्यादातर ने दिल्ली को अपनी शायरी में जगह दी, लेकिन जो ग़ालिब की दिल्ली है, वह किसी और की दिल्ली नहीं। जो मीर की है, वह भी किसी और की नहीं। एक ही दिल्ली दो लोगों के भीतर नहीं रह सकती। हम इन लोगों को पढ़ते हैं और इनकी दिल्ली को खोजते हैं। जहाँ वह हमारे भीतर की दिल्ली से मैच हो जाती है, हम पा लेने के भाव से भर जाते हैं। तब हम पढ़ रहे होते हैं दिल्ली, लेकिन समझ रहे होते हैं भोपाल। मीर लिख रहे हैं अपने दिल का हाल, हमें लगता है, हमारे दिल का अहवाल। कविता एक ऐसी ‘जगह’ है, जहाँ ग़लत समझकर भी, दरअसल, हम कितना सही समझ रहे होते हैं।

दिल की बस्ती भी शहर दिल्ली है / जो भी गुज़रा उसी ने लूटा

किसी दूसरे की भौगोलिक जगह हमारी अपनी भौगोलिक जगह बन जाती है। काफ़्का प्राग की गलियों में चलता था, लेकिन यह वह प्राग नहीं था, जो उसके पूर्वज यान नेरूदा (जिनके नाम पर पाब्लो नेरूदा ने अपना नेरूदा रखा) अपनी ‘प्राग टेल्स’ में लिख गए थे। काफ़्का के प्राग का नक़्शा, काफ़्का के मन में बना हुआ था। काफ़्का को पढ़कर आप किसी पर्यटक की तरह प्राग में नहीं घूम सकते, लेकिन काफ़्का को पढ़कर आप उसके प्राग को खोज निकालने की इच्छा से भी बच नहीं सकते। कला के भीतर यही ‘जगह’ है। भूगोल नहीं है, मानस नहीं है, मानसिक भूगोल कह लीजिए, सुविधा होगी, पर है यह महज़ एक ‘जगह’।

नीचे की ये पंक्तियाँ कहते समय मीर लखनऊ पहुँच चुके हैं, वहाँ के शायरों को इशारे में अपना परिचय दे रहे हैं, जिस्म लखनऊ में है, दिल दिल्ली में है, लेकिन कविता में यह कौन-सी जगह है? यह विडंबना नाम की जगह है, दर्द है, उजड़ जाने की वीरानगी है, आप ख़ुद महसूस कीजिए कि हम अपने जीवन में इस बर्बाद जगह को कितना जीते आते हैं, जो उनकी दिल्ली है, हमारी कुछ और है--

दिल्ली जो एक शहर था आलम में इंतिख़ाब

रहते थे मुंतख़ब ही जहाँ रोज़गार के

उसको फ़लक ने लूट के बर्बाद कर दिया

हम रहने वाले हैं उसी उजड़े दयार के


तो ज़फ़र कहते हैं –

लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में

किसकी बनी है आलम-ए-नापाएदार में


दयार इस क़दर उजड़ा हुआ है, लुटा हुआ है, बर्बाद है, दिल-ए-दाग़दार में हसरतों तक की जगह नहीं बची है, फिर भी वह एक ‘जगह’ है। मीर फिर उस भूगोल में लौटते हैं और कहते हैं –

दिल व दिल्ली दोनों अगर हैं ख़राब

प: कुछ लुत्फ़ उस उजड़े घर में भी हैं


तो मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी को लुत्फ़ नाम की इस जगह का पता बहुत अच्छे से पता है। वह कहते हैं  -


ऐ मुसहफ़ी तू इनसे मुहब्बत न कीजियो

ज़ालिम ग़ज़ब की होती हैं ये दिल्ली वालियाँ।


ये जो अलग-अलग शेरों की दिल्लियाँ हैं, ये चार अलग-अलग ‘जगहें’ हैं। भौतिक तौर पर सबका नाम दिल्ली हो सकता है, लेकिन मानसिक तौर पर सब अलग-अलग दुनियाँ हैं। अमूर्त दुनियाँ हैं। इनका कोई आकार नहीं है। आप इन्हें महसूस कर सकते हैं, लेकिन इनका कोई नक़्शा नहीं बना सकते। आप इन ‘जगहों’ पर रह सकते हैं, , लेकिन अपने विजिटिंग कार्ड पर इन जगहों का पता नहीं छाप सकते। उसके बाद भी कुछ लोग इन जगहों पर पहुँच जाते हैं, आपको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते पहुँच जाते हैं, या यहाँ पहुँचने के बाद आपको ढूँढ़ निकालते हैं- सब लोग नहीं, कुछ लोग। सब लोग पहुँच जाएँ, तो कविताएँ सबकी समझ में आने लग जाएँ, लेकिन जिन जगहों पर सब लोग पहुँच जाएँ, वह कला की नहीं, पर्यटन व व्यवसाय की जगहें होती हैं।

कला, कविता, दर्शन आदि के बारे में बात करते हुए एक बड़ी समस्या यह होती है कि आप अमूर्त होने से नहीं बच सकते। हमारे संस्कार ऐसे होते हैं कि हम बचपन से ही अमूर्त चीज़ों की आराधना करते हैं, लेकिन अमूर्त होने से दूर भागते हैं। हमें मूर्तियों की आदत है। हमें पूजा के लिए भी मूर्ति चाहिए और तोड़ने के लिए भी मूर्ति चाहिए। बुतकश हों या बुतपरस्त, बिना बुत के काम नहीं चल पाता। जबकि जीवन की सचाई यह है कि मूर्तियों में जितनी भी जान होती है, वह अमूर्त होती है। जान या प्राण एक अमूर्त शब्द है। उसे आप महसूस कर सकते हैं, उसके उदाहरण दे सकते हैं, लेकिन उसका आकार नहीं बता सकते। मान लीजिए कि इस दुनिया में सबकुछ मूर्त हो, अमूर्त कुछ भी न हो, तो यह दुनिया कैसी होगी? निर्जीव वस्तुओं का सर्कस होगी। मिट्‌टी और चट्‌टान तो मंगल पर भी हैं, लेकिन उनमें अमूर्त की प्रतिष्ठा करने वाला वह कलाकार नहीं है, जिससे जीवन की उत्पत्ति होती है। किसी भी मूर्ति की जान उसके अमूर्त में होती है। यह अमूर्त हटा दिया जाए, तो जीवन, लाश में बदल जाएगा। जब जीवन से अमूर्त को नहीं हटाया जा सकता, तो कला से अमूर्त को कैसे हटाया जा सकता है? बिना अमूर्त के आप जीवन को नहीं समझ सकते, तो बिना अमूर्त को जाने आप कला को क्यों समझ लेना चाहते हैं?

यही अमूर्त कई बार अर्थ की तरह कविता के भीतर व्याप्त होता है, तो कई बार उस अनुभूति की तरह, जिसे मैं ‘जगह’ कह रहा हूँ। जो लोग शिकायत करते हैं कि उन्हें कविता समझ में नहीं आती, दरअसल, वे उन ‘जगहों’ तक पहुँच पाने में अपनी असफलताओं को स्वीकार कर रहे होते हैं। और इसमें कोई दोष भी नहीं है। हम ताउम्र मूर्तियों के प्रेम में होते हैं। चलते-फिरते मिट्‌टी के पुतलों के रूप में इंसानों की मूर्तियाँ।  अगर लाशों को बचाए रखने की सुविधाएँ बन जाएँ, तो श्मशानों और क़ब्रस्तानों की जगह लाश रखने वाले लॉकर किराए पर मिलने लगेंगे। जैसा कि पुराने राजा, ख़ासकर इजिप्त के, करते भी थे। वे अपने प्रियजनों की लाशों को हमेशा के लिए संभालकर रखना चाहते थे। शरीर भी एक जगह है, और उस जगह के साथ हमारा रिश्ता बना रहता है। मान लीजिए, मिस्टर एक्स का शरीर मर गया और उसकी आत्मा ने आकर हमें सूचना दी कि मैं एक पेड़ के रूप में जन्म ले रहा हूँ, तब? हमने तो ताउम्र दावा किया है कि मैं तुम्हारे जिस्म से नहीं, तुम्हारी अच्छी आत्मा से प्रेम करता हूँ। तो इस दावे के आधार पर क्या हम उस पेड़ से भी उतना ही प्रेम कर पाएँगे? आप चाहें जो कहें, मुझे तो लगता है कि नहीं कर पाएँगे। क्योंकि हमारी ट्रेनिंग इस तरह से नहीं होती। हमारी ट्रेनिंग ऐसी है कि हम अमूर्त से प्रेम का दावा करें, लेकिन प्रेम मूर्ति से करें। हमें वे दावे करने की ट्रेनिंग मिली होती है, जिनका असलियत से कोई ख़ास लेना-देना नहीं होता। मूर्ति के अंदर एक अमूर्त भगवान रहता है, उससे हम लाख छल कर लेंगे, किसी को पता भी न चलने देंगे, लेकिन अगर मूर्ति का किसी ने ग़लती से भी अपमान कर दिया, तो हम मार दंगा मचा देंगे।

इस तरह इंसानों की बुनियादी ट्रेनिंग ही एक तरह से कला-विरोधी होती है। अमूर्त को अमान्य करना, और यदि मान्य भी किया, तो उसके साथ छप्पन छल करना, कला-विरोधी मानसिकता है।

हमारे समय में कविता काग़ज़ पर लिखी जाती है। लेकिन काग़ज़ को कविता नहीं कह सकते। काग़ज़ को लेकर ग़ालिब का एक मशहूर शेर याद आता है। वह शेर एक उदाहरण है कविता में ‘जगहों’ के इस्तेमाल का। भौतिक और मानसिक दोनों क़िस्म की जगहें। पहले शेर, फिर उसका अर्थ, फिर ‘जगह’ की बात।

नक़्श फ़रियादी है किसकी शोख़ी-ए-तहरीर का

काग़ज़ी है पैरहन, हर पैकर-ए-तस्वीर का।


चूँकि यह ग़ालिब का शेर है, एक स्तर पर यह बहुत आसान है, दूसरे स्तर पर बहुत जटिल। पहला अर्थ ऐसे बनता है- कोई तो है जिसने अपनी शरारत-भरी लिखावट से कुछ ऐसी बातें लिखी हैं, जिससे दुनिया की हर रेखा, हर निशान, टेढ़ा-मेढ़ा, जटिल हो गया है, इस तस्वीर या सृष्टि का हर इंसान काग़ज़ के कपड़े पहनकर फ़रियादी बना हुआ है। यानी इंसान का शरीर तो ख़ुद ही नश्वर है लेकिन वह किसी और से या ख़ुदा से फ़रियाद कर रहा है।

दूसरा अर्थ इसी का विस्तार है। एक ज़माने में ईरान में परंपरा थी कि अगर कोई शाह के सामने फ़रियाद लेकर जाता, तो काग़ज़ के कपड़े पहनकर जाता था। उसी से पता चल जाता था कि वह फ़रियाद करने आया है। इसी कहानी की ओर इशारा करते हुए ग़ालिब ने यह शेर कहा था – हम सब इंसानों ने काग़ज़ के लिबास पहन रखे हैं, जो कि कट-फट जाएँगे, टूट जाएँगे, ख़त्म हो जाएँगे, और यह जानते हुए भी हम फ़रियादी बने हुए हैं, और तुर्रा यह कि किसने सामने फ़रियादी बने हुए हैं? उसके सामने, जिसने अपनी शरारत भरी लिखावट से हमारे जीवन में दस तरह की जटिलता डाल दी है। और कल्पना कीजिए कि यह फ़रियाद क्या होगी? शायद यह होगी कि जो यह जटिलता है, समाप्त हो जाए। अब यह जो शरारती लिखवैया है, वह क्या करेगा? उसने तो जटिलता लिख दी है। अब सरलता कहाँ से लावेगा? ग़लत फ़रियाद कर रहे हो, ग़लत आदमी के सामने कर रहे हो, जो तुम्हारा गुनहगार है, उससे तुम फ़रियाद करके इंसाफ़ की उम्मीद कर रहे हो? सही कर रहे हो? मान लो, उसने सरलता लिख दी, तब क्या करोगे? तब नई फ़रियाद लेकर आओगे कि उसका ज़्यादा सरल लिख दिया, मेरा कम सरल है। सरलता तो सबके लिए अलग-अलग होती है न। बीस साल के आदमी के लिए सात का पहाड़ा बहुत सरल है, लेकिन जिसकी उम्र पांच ही साल है, उसने तो सात का पहाड़ा रटने में ही सात महीने लगा दिए थे। उस तिफ़्ल के लिए तो वही सबसे कठिन है।

इस तरह इस शेर का अर्थ और गहरा, और गहरा, और गहरा होता जाएगा। लेकिन महज़ उसके लिए, जो उन सारी जगहों तक पहुँच सकता हो। कविता पाठक से एक ख़ास क़िस्म की लियाक़त माँगती है। सुंदरताओं का आनंद उठाने के लिए योग्यता चाहिए और अच्छी कविता हमारी योग्यताओं की परीक्षा लेती है। ग़ालिब इस शेर में एक ख़ास जगह बैठे हुए हैं। वह दिल्ली में बैठे हैं। हिंदुस्तान में हैं। जिसका बहुत क़रीबी रिश्ता ईरान से रह चुका है। जिस भाषा में वह बोल रहे हैं, उसका संबंध ईरान से रह चुका है। यह तो हुई भौतिक जगह। अगर हमें इन जगहों के बारे में, इनकी परंपराओं के बारे में पता है, तो हम यह पहला पड़ाव पार कर लेते हैं कि इसका रिश्ता उस ईरानी परंपरा से है। इस शेर में ग़ालिब कुछ मानसिक जगहों पर भी बैठे हैं। जैसे एक जगह मुहब्बत की है, एक जगह दर्शनशास्त्र की है, एक जगह व्यंग्य की भी है और एक जगह विडंबना की भी है। ग़ालिब हमें आमंत्रित करते हैं कि इस शेर में हम उन सभी जगहों तक जाएँ।

आजकल सभी के हाथ में स्मार्टफोन है। उसकी भाषा का एक शब्द है सिन्क होना। यानी सिन्क्रोनाइज़्ड होना। यानी दो जगहों का एक सुर में आ जाना। उनमें तालमेल बन जाना। कविता में यह सिन्क होना बहुत ज़रूरी है। कवि के भीतर की जगह और पाठक के भीतर की जगह—दोनों में सिन्क होना चाहिए। नहीं होगा, तो कविता का अधिकतम आनंद नहीं पाया जा सकेगा। यह कैसे होता है? अपने अंदर की जगहों का विस्तार करके ही, उनका संशोधन करके ही हम कवि के भीतर की उस जगह तक पहुँचने की कोशिश कर सकते हैं। शत-प्रतिशत पहुँच जाएँ, यह कोई ज़रूरी नहीं, लेकिन परिहास में कहें, तो हमने अपने जीवन में पैंतीस प्रतिशत पासिंग मार्क की सुविधा बना रखी है। उतने तक तो पहुँच ही सकते हैं।

हर अच्छा कवि अपने भीतर ऐसी कई जगहें बनाता है। वह जिन जगहों पर छिपता है, उन्हीं जगहों पर उजागर होता है। हर अच्छा कवि अपनी कविता के भीतर एक कलात्मक लुका-छिपी खेल रहा होता है। वह अपनी कविता में एक जगह जाकर छिप जाता है, फिर प्रतीक्षा करता है कि पाठक आएगा और धप्पा कहकर उसकी पीठ पर एक धौल मारेगा और उसे पकड़ लेगा। यक़ीन कीजिए, वह सदियों तक यह इंतज़ार कर सकता है। उसके शरीर की मूर्ति नष्ट हो जाए, तो भी उसकी कविता के भीतर की यह अमूर्ति प्रतीक्षा करती रह सकती है। हर अच्छा कवि समझ लिए जाने की आकांक्षा से भरा हुआ होता है। हर अच्छा कवि ग़लत समझे जाने की आशंका से त्रस्त रहता है। उसके बाद भी वह अपनी कविता के भीतर जानी-पहचानी नहीं, बल्कि अनजानी जगहों पर रहना चाहता है, क्योंकि वे जगहें हमें ज़्यादा बुलाती हैं, जिन्हें हम नहीं जानते।

बात फिर वहीं पहुँची, जहाँ से शुरू हुई थी। एक अच्छा कलाकार जाने-पहचाने काम करने, जानी-पहचानी चीज़ें लिखने से बचना चाहता है। समाज और प्रकृति के साथ उसका एक निजी रिश्ता होता है, जो बहुत जाना-पहचाना नहीं होता, वह इतना निजी होता है कि लगभग विशिष्ट होता है। भौतिक जगहें उसके भीतर मानसिक भूगोल बनाती हैं। तभी तो जो ग़ालिब दिल्ली छोड़कर कहीं जाना नहीं चाहते थे, एक ऐसी जगह जाकर का सोचने लगे जहाँ कोई न हो। बेदरो-दीवार का एक घर बनाना चाहते थे। वह कौन-सी जगह है? वह घर कहाँ बन सकता है? कविता के भीतर ही एक ऐसी जगह हो सकती है।

यह जो जगह है, जिसे मैं बार-बार ‘जगह’ कह रहा हूं, वही बेदरो-दीवार का घर है। पूरी दुनिया दरो-दीवार का घर बनाने के लिए हलाकान हो रही, कवि बे-दरो-दीवार का घर बना लेना चाहता है। वह कहता है कि वह वहाँ अकेला रहेगा, पर ऐसा कहकर चाहता क्या है? वह चाहता है कि इससे यह समझा जाए कि उसे वहाँ अकेले नहीं रहना है। कहना एक ‘जगह’ है। समझना भी एक ‘जगह’ है। कविता दोनों ‘जगहों’ के बीच की आवाजाही है। यही जगहें हमें ताक़त और प्रेरणा देती हैं। यही जगहें हमें तमाम दुनिया से अलग बनाती हैं। जैसे निदा फ़ाज़ली का एक शेर है –

मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा

जाते हैं जिधर सब, मैं उधर क्यों नहीं जाता


(गीत चतुर्वेदी का पिछला कॉलम यहां पढ़ें)

Friday, October 06, 2017

इशिगुरो और नोबेल : कुछ फ़ौरी बातें - गीत चतुर्वेदी



कज़ुओ इशिगुरो


पिछले कुछ बरसों से अक्टूबर के महीने की शुरुआत के तीन रिचुअल्स रहे हैं- साहित्य के नोबेल पुरस्कार के पूर्वानुमानों में हारुकि मुराकामी को सबसे प्रबल दावेदार बताना, नोबेल समिति द्वारा अपने कॉन्फ्रेंस रूम का बड़ा-सा दरवाज़ा खोलकर माइक लिए खड़े पत्रकारों के सामने किसी एक नाम का उच्चारण करना और उसके बाद दुनिया के अधिकांश हिस्सों  में हारुकि मुराकामी के प्रति एक शोकगीत का सामूहिक गायन शुरू हो जाना। मुराकामी के प्रशंसकों को यह समझ में ही नहीं आ रहा है कि आख़िर उनमें ऐसी कौन-सी कमी है, जिसके कारण नोबेल पुरस्कार उनसे छिटक जा रहा है। इस समय वह दुनिया के सर्वश्रेष्ठ लेखकों में से हैं। अपनी हर नई किताब से वह अपनी श्रेष्ठता को पुख़्ता कर देते हैं। पिछले दो दशकों में वह एकमात्र ऐसे लेखक हैं, जिन्हें इतने अधिक लोग चाहते हैं कि वह नोबेल पा लें। इतना प्रेम इस दौर में किसी साहित्यिक लेखक को नहीं मिला।

ऊपर के इस पैराग्राफ़ को अगर एक संकेत की तरह पढ़ा जाए, तो इसमें सिर्फ़ एक बदलाव करना होगा- मुराकामी की जगह आप अपने लेखक का नाम रख लीजिए. कोई चाहे, तो न्गुगी वा थियोंगो का नाम रख सकता है, तो कोई फिलिप रॉथ का। को उन, अदूनिस से लेकर आन्त्यूनेज़ तक का नाम रख सकते हैं, क्योंकि हर साल यह उम्मीद लगती है कि शायद इन्हें या इनमें से किसी एक का मिल जाएगा, पर मिलता वह किसी और को है।

खेल का आनंद, मात्र रहस्यों से बढ़ता है। इसे एक पटकथा की तरह देखा जाए-  किसी काम के लिए प्रेमिका अपने प्रेमी को बहुत आशा से देखती है,  प्रेमी टाल जाता है, प्रेमिका नाराज़ होकर सवाल पर सवाल करती है, प्रेमी किसी भी सवाल का जवाब नहीं देता और आंखों से ओझल हो जाता है। प्रेमिका ख़ूब रोती है। अकेली रह जाती है। वह अकेले में ख़ुद से वही सवाल पूछती है, जो उसने प्रेमी से पूछा था। अगले दिनों में उसे जो कोई मिलता है, उससे वह सवाल करती है। लोग अपनी तरह से जवाब दे देते हैं, लेकिन प्रेमी ने तो कोई जवाब ही नहीं दिया था। वह चुपचाप चला गया था। प्रेमिका उसे खोजने के लिए निकल पड़ती है। उसे खोजकर अपने सवालों के जवाब वह उससे मांगेगी। प्रेमी ग़ायब हो चुका है, लेकिन प्रेमिका के भीतर का प्रेम और जवाबों को पा लेने की आकांक्षा समाप्त नहीं हो रही। क्यों? क्योंकि सवाल अनसुलझे छूट गए। जिस प्रेम में भी प्रश्न, अनुत्तरित रह जाते हैं, वह प्रेम कभी समाप्त नहीं होता, ताउम्र ज़िंदा रहता है। प्रश्नों का रहस्य प्रेम को जिलाए रखता है।

नोबेल का खेल, प्रेम के इस खेल की तरह है। जिन सवालों को हम लोग बार-बार, हर साल उठाते हैं, उसी प्रेमी का भेस धरे हुए, नोबेल समिति उनमें से किसी सवाल का जवाब नहीं देती, और कुछ नए सवाल हमें पकड़ाकर चली जाती है। जो सवाल मुराकामी के संबंध में पूछा जा रहा है, वही सवाल बोर्हेस और नबोकफ़ के संबंध में भी पूछा जा सकता है। यह प्रक्रिया अनवरत चलती रहेगी। बीस साल बाद मुराकामी जैसे ही अवसर किसी और के होंगे और उसके बारे में भी यही सवाल पूछे जाते रहेंगे। जवाब कभी नहीं आने वाला।

हारुकि मुराकामी
मुराकामी साल-दर-साल नोबेल से जिस तरह दूर जा रहे हैं, उनका क़द उतना ही बढ़ता जा रहा है। उन्हें नोबेल न मिला, तो देखिएगा, आने वाले बरसों में वह अपने आप प्रूस्त, जॉयस, नबोकफ़ और बोर्हेस की पंगत में बैठे हुए मिलेंगे। महज़ इसलिए नहीं कि इन सबको ही यह पुरस्कार नहीं मिला, बल्कि इसलिए कि नकारी गई श्रेष्ठताओं की मान्यता ज़्यादा पुख़्ता होती है। मुराकामी ने अपने साहित्य में जो नई ज़मीनें तोड़ी हैं, उन्हीं को आधार बनाकर कुछ लोग नए उपन्यास लिखेंगे और नोबेल पा लेंगे। जैसे प्रूस्त, जॉयस और बोर्हेस की ज़मीनों पर लिखने वालों ने पाए हैं। जैसे प्रूस्त की ज़मीन पर लिखने वाले कज़ुओ इशिगुरो को मिला है, लेकिन यह पुरस्कार प्रूस्त से दूर ही रहा। परिहास में यह कहा जा सकता है कि विडंबना है, फूल हमेशा भँवरा ही खिलाएगा लेकिन उस फूल को कोई राजकुँवर ले जाएगा।

इस निबंध की शुरुआत होनी चाहिए थी कज़ुओ इशिगुरो से, लेकिन हो गई मुराकामी से। ‘किसे नहीं मिला’ ने ‘किसे मिला’ को आच्छादित कर दिया। किंतु इसका अर्थ यह नहीं लेना चाहिए कि इस बार का नोबेल पुरस्कार किसी अयोग्य को मिल गया है। इशिगुरो दुनिया के श्रेष्ठतम लेखकों में से हैं और उन्हें नोबेल पुरस्कार मिलना एक योग्य और बड़े लेखक को मिला सम्मान ही है। सवाल बस इतना है कि यदि इशिगुरो को यह सम्मान मिल सकता है, तो मुराकामी को क्यों नहीं मिल सकता? क्या न अच्छा होता कि पहले मुराकामी को मिल जाता, बाद में इशिगुरो को मिल जाता? और इस इशिगुरो के साथ मुराकामी को न मिलने का ही सवाल क्यों उठाया जा रहा है, थियोंगो को न मिलने का सवाल क्यों नहीं उठाया जा रहा? जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, इन सारे सवालों का कोई जवाब नहीं हो सकता, और जो भी जवाब नोबेल समिति या किसी की ओर से आए, संभवत: उन जवाबों पर सहमत भी नहीं जा सकता। योरप में इशिगुरो को पर्याप्त मान्यता प्राप्त है और इस नाते उनको मिले पुरस्कार का स्वागत ही किया जाएगा, जिसमें कुछ भी ग़लत नहीं है, लेकिन इस बात से भी कम ही लोग इनकार कर पाएँगे कि यह पुरस्कार उन्हें उस समय दिया गया है, जब उनसे बेहतर कुछ लेखक प्रतीक्षालय में बैठे हुए थे।

इशिगुरो और मुराकामी में कुछ भिन्नताएं हैं और कुछ ख़ास अभिन्नताएं भी हैं। जैसे कि दोनों ही जापान से रिश्ता रखते हैं। मुराकामी पूरी तरह जापानी हैं।  वह उन अर्थों में जापानी हैं, जिन अर्थों में कुरोसावा जापानी थे। कुरोसावा ने अपनी थीम और शैली पश्चिम से प्राप्त की थी, उन्होंने पश्चिम के कला-जगत को कुछ नया नहीं सिखाया, बल्कि पश्चिम की शैलियों से सीख पाकर उसे अपनी कला में पिरोया। जापान की स्थानीय, अति-नाटकीय, भावुक, प्राचीन काबुकी नाट्यशैली को थोड़ा आधुनिक रूप देते हुए अपनी फिल्मों में शामिल किया। इस तरह उनकी फिल्मों में कला का एक मिश्रित संसार बना। उनके सिनेमा से स्थानीय जापानी भी प्रभावित हुए और पश्चिम में भी उन्हें तुरत लोकप्रियता मिली। कलाओं और शैलियों का ऐसा मिश्रण मुराकामी में भी दिखाई देता है। उनके नैरेशन का तरीक़ा और उत्तर-आधुनिक शैली पूरी तरह पश्चिमी है, लेकिन सोचने का तरीक़ा और परिवेश जापानी है। ‘नॉर्वेजियन वुड’, ‘वन क्यू एट फोर’ में चरित्रों का जो मूल्य-संकट है, वह न केवल जापानी बल्कि ठेठ एशियाई है, पूर्वी है। मुराकामी को भी स्थानीय और वैश्विक दोनों ही स्तरों पर लोकप्रियता मिली।

इशिगुरो सिर्फ़ नाम से जापानी हैं, बाक़ी पूरी तरह ब्रिटिश हैं। छह साल की उम्र में ही उनका परिवार इंग्लैंड आ गया था और तब से वह पूरी तरह ब्रिटिश हैं, लेकिन परिवार से उन्हें जापानी संस्कृति का एक ख़ास हिस्सा भी मिला है। उनका नैरेशन ज़ाहिर तौर पर पश्चिमी है, लेकिन सोचने का उनका तरीक़ा कहीं-कहीं जापानी संकेत दे देता है। उनके पास ठेठ ब्रिटिश या यूरोपीय तरीक़ा-मात्र नहीं है। उनके उपन्यासों का दार्शनिक स्वाद शायद उस जापानी स्पर्श के कारण आता है।

दोनों में कलात्मकता है, दोनों के पास लोकप्रियता है, और उनमें पहले भी कई बार तुलना होती रही है। ज़ाहिर है, दोनों एक-दूसरे के काम के प्रति सम्मान से भरे हुए रहते हैं। कुछ बरस पहले जब मुराकामी से पूछा गया कि वह अपनी पसंद के दो-तीन अंतर्राष्ट्रीय लेखकों के नाम बताएं, तो उन्होंने सबसे पहले इशिगुरो का ही नाम लिया था। उसके कई साल पहले ही इशिगुरो कह चुके थे कि मुराकामी, वर्तमान दुनिया के पांच श्रेष्ठतम लेखकों में से एक हैं।

इशिगुरो के उपन्यास विशालकाय हैं। आकार से ज़्यादा अपनी महत्वाकांक्षा में विशालकाय। मनुष्य के जीवन में दुख से पैदा होने वाली विसंगतियों और उसकी आध्यात्मिक विवशताओं को छूना अपने आप में एक विशालकाय महत्वाकांक्षा होती है। उपन्यास दरअसल एक जंक्शन होता है, जहाँ कई दिशाओं से ट्रेनें आकर रुकती हैं और आगे कई दिशाओं की ओर बढ़ जाती हैं। आत्म-संधान, दुख, हानिबोध और मृत्यु- उपन्यास नाम के इस जंक्शन के चार प्रमुख प्लेटफॉर्म हैं। और यही जीवन का चक्र भी है। इसका क्रम आगे-पीछे होता रहता है। पुरानी कहावत है कि हमारा जीवन, दरअसल जीवन नहीं है, यह हमें मिला हुआ एक मृत्युदंड है, एक क़ैद है। जिस क्षण कोई शिशु पैदा होता है, उसी क्षण उसे मृत्युदंड मिल जाता है। तुम पैदा क्यों हुए? पैदा होना एक अपराध है। तुमने यह अपराध कर दिया है। अब तुम्हें मरना ही होगा। लो, तुम्हें जीवन-रूपी मृत्युदंड दिया जाता है। सब अपनी-अपनी सज़ा भुगतते हैं। कोई बीस साल की उम्र तक भोगता है और मृत्यु के रूप में आख़िरी दंड पाता है, तो कोई सत्तर साल की उम्र तक भोगता है। सज़ा घोषित होने और सजा पूरी होने के दो बिंदुओं के बीच पूरी यात्रा चलती है। मनुष्य बार-बार यह पता करना चाहता है कि वह कौन है, इस क्रम में उसे जीवन में कई तरह की हानियों को झेलना पड़ता है और उसके पास दुख आता है। दुखों से अनुभूतियाँ बनती हैं, अनुभूतियाँ विचार में बदल जाती हैं और विचार के आने के साथ ही फिर से ख़ुद की तलाश शुरू हो जाती है। सारे विचार दरअसल, दुख के वंशज होते हैं। सारी कलाएँ अंतत: दुख की ही आराधना करती हैं। दर्शन के मूल में दुख है। जीवन में मृत्यु के कई व अद्वितीय तरीक़े होते हैं, लेकिन साहित्य उन तरीक़ों में से महज़ कुछ को ही अपनाता है, और कई बार मृत्यु के नए तरीक़ों की कल्पना करता है।

दुख और हानिबोध इशिगुरो के उपन्यासों का मूल स्वर है। ‘द रिमेन्स ऑफ द डे’ के लिए उन्हें बुकर पुरस्कार मिला था। नायक एक बड़े मालिक के घर में नौकर है। वहां एक महिला सहकर्मी के साथ उसकी निकटता है। दोनों में ख़ूब बातें होती हैं, वे प्रेम के क़रीब तो पहुंचते हैं, लेकिन उनमें से कोई भी हाथ बढ़ाकर प्रेम के कक्ष का द्वार नहीं खोल पाता। इस तरह हर बातचीत में वे प्रेम के क़रीब पहुंचकर भी छूछे हाथ लौट आते हैं। बरसों बाद नायक को उस सहकर्मी का ख़त मिलता है, जिसमें वह अपनी शादी का वर्णन करती है। नई नौकरी की तलाश, पुराने मालिक के प्रति वफ़ादारी के क़िस्सों को याद करते, नाज़ियों के साथ अपने संबंधों को बताकर भी छिपा ले जाते हुए नायक किन्हीं परिस्थितियों में उस सहकर्मी के जीवन में वापस पहुंचता है। महिला की शादी को बीस साल हो चुके हैं और जल्द ही उसे एक नाती होने वाला है। वे आधे से अधिक उपन्यास में अपने पुराने रिश्ते और दूसरे विश्व युद्ध के पहले के बरसों को याद करते हैं। महिला कहती है कि उसे लगता है, शादी करके उसने ग़लती की, और इसी के आसपास नायक को अपना हानिबोध समझ में आता है कि वह जिसे पा सकता था, उसे न पा सकना ही उसकी सबसे बड़ी हानि है। यह हानिबोध उसके अवचेतन में पहले से ही है, इसीलिए वह बहुत धीरे-धीरे अफ़सोस करता है कि उसने बरसों तक जिस मालिक की इतना सेवा की, वह कोई बहुत अच्छा आदमी, शायद, नहीं था। उसकी सेवा करने में उसने ख़ुद को इस तरह खपा दिया कि उसके पास अपने ख़ुद के जीवन व आध्यात्मिक विकास के लिए कोई समय ही न बच पाया। जिस औरत के प्रति वह आकर्षित था, वह उसे नहीं पा सकता, क्या वह अब भी उसके प्रति आकर्षित है या शायद नहीं है। अवचेतन का यह हानिबोध उसके व्यक्तित्व को बदलता है और उपन्यास के आधे होने तक एक नई आदत विकसित कर लेता है- वह सबसे हंसी-मज़ाक़ करना चाहता है। हानिबोध कई बार आपको विवश करता है कि आप हास्यबोध में शरण खोजें। हंसाने का हुनर उन्हीं के पास आता दिखता है, जिन्होंने जीवन में बहुत कुछ खोया हो।

ऊपरी तौर पर यह प्रेम के खो जाने की एक साधारण कहानी है, लेकिन साहित्यिक कहानियों का सौंदर्य उनके प्लॉट में नहीं, कथा कहने के तरीक़े में छिपा होता है। इशिगुरो ने यह कथा बहुत अच्छे से कही है। उनकी भाषा भव्य नहीं है, वह सपाट लेखक हैं। इस सपाटपन को सादगी मानने में हिचक हो सकती है, क्योंकि उनके चरित्रों का अंतर्द्वंद्व इस सादगी के विलोम में खड़ा होता है। सादगी जटिलताओं को जटिल रूप में चित्रित नहीं कर पाती, जबकि इशिगुरो में जटिलताएं पर्याप्त हैं, बस, वे अक्सर सपाट जटिलताएं होती हैं। यह सिर्फ़ मैं नहीं कह रहा, बल्कि दुनिया के कई आलोचक, बहुत पहले ही कह चुके हैं कि इशिगुरो, रूढ़ियों या क्लीशे का बेहद निडर और प्रचुर प्रयोग करते हैं। कला के भीतर यह कोई अच्छी आदत नहीं है, लेकिन जैसा कि आजकल क्रिकेट में कहा जाता है, रन आने ज़रूरी हैं, कहां से आएं, बैट के स्वीट स्पॉट पर लगकर आएँ या किनारा लगकर, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता- इसी बात के आधार पर यह सोचा जा सकता है कि कथा का अच्छा बन जाना ज़रूरी है, भले वह अच्छाई छप्पन तरह के क्लीशे का प्रयोग करके ही क्यों न आए।

पिछले साल इशिगुरो की सबसे चर्चित किताब आई – ‘द बेरीड जाएंट’। दुनिया-भर में इस किताब का जमकर प्रचार हुआ था और इसकी बहुत प्रतीक्षा भी की गई थी। इशिगुरो को नोबेल पुरस्कार मिलने में संभवत: इसी किताब की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह उपन्यास ऐतिहासिक विस्मृति को केंद्र में रखता है। छठी या सातवीं सदी का इंग्लैंड है, जो अब से बहुत अलग है। एक ऐसा नैरेटर है, जो संभवत: दोनों कालखंडों में एक साथ विचरण करता है और शुरुआत में दोनों के बीच के अंतर को बताता है और फिर जैसे ग़ायब ही हो जाता है। किंतु वह कई इशारे दे जाता है, जो आगे चलकर खुलते हैं। उस ज़माने में सैक्सन और ब्रिटिश लोगों में संघर्ष होता रहता था। एक भयानक महायुद्ध के बाद कहानी का असली प्लॉट सामने आता है। दोनों समुदाय आराम से रह रहे हैं, और तभी उनका ध्यान जाता है कि वे सभी एक विस्मृति का शिकार हो रहे हैं। पुरानी बातें तो उन्हें याद ही नहीं आतीं, और एक-डेढ़ महीने जितनी नई बातें भी लोग धीरे-धीरे भूलने लगते हैं। एक अधेड़ दंपति, एक्सल और बिआट्रिस पाते हैं कि वे भी सबकुछ भूल रहे हैं। उनका एक बेटा था और अब वह उन्हें मिल नहीं रहा। वे उसे भूलने लगते हैं। इस भूलने के बाद भी उन्हें उसकी याद है और वे उसे खोजने निकल पड़ते हैं, यह विचित्र है। वे लोग इस विस्मृति के लिए एक नया शब्द गढ़ते हैं- मिस्ट, धुंध या कोहरा। यानी एक कोहरे के कारण स्मृति और विस्मृति में दो फाँक बन गई है। बेटे को खोजने के दौरान उनकी मुलाक़ात कई लोगों से होती है, कहानी में ड्रैगन्स, राक्षस, अजीब मिथकीय जानवर भी आते हैं, जादुई यथार्थवाद की तरह नहीं, बल्कि सीधे तिलिस्मी शैली में। एक्सल और बिआट्रिस को पता चलता है कि विस्मृति की यह धुंध कुछ और नहीं है, बल्कि एक मादा ड्रैगन द्वारा छोड़ी गई साँस है। वह जितनी बार साँस छोड़ती है, वहाँ के मनुष्यों की स्मृति का उतना लोप होता है, विस्मृति उतनी बढ़ती जाती है। स्मृति चाहिए, तो उस मादा ड्रैगन को मारना होगा। और किसी न किसी तरह वे उसे मारने में सफल हो जाते हैं। स्मृति लौट आती है। प्यार की भी स्मृति लौट आती है, तो आपसी नफ़रत की भी। ब्रिटिश और सैक्सन, जो विस्मृति में शांति से रह रहे थे, स्मृति लौट आने से एक दूसरे के प्रति अपनी शत्रुता को फिर से जान लेते हैं और लड़ पड़ते हैं। इस तरह स्मृति का आना भयावह ही साबित होता है। जो जाएंट यानी दानव, बेरीड यानी दफ़न था, वह फिर उभरकर आ गया है।

जीवन का सुख अतीत को भूलने से भी पाया जा सकता है। अतीत को याद करने से दुख ही दुख है। यह इस उपन्यास का कथा-सार है। इसमें हॉबिट है, हैरी पॉटर है, प्रूस्त हैं, चेखव हैं, बोर्हेस हैं, दोस्तोएव्स्की हैं, और जाने क्या-क्या है, इशिगुरो ने कई जगहों से चीज़ें प्राप्त की हैं और इस उपन्यास में निवेश किया है। लेकिन मेरी नज़र में, यह निवेश बहुत ज़्यादा डिविडेंड नहीं देता, क्योंकि ऐसी थीम पर बोर्हेस, कम पन्नों में कहीं बड़ा काम करके जा चुके हैं, प्रूस्त ने मनोविज्ञान की एक पूरी शाखा बना दी है। चेखव की एक कहानी में मुख्य पात्र अपने मरे हुए बेटे को इसी तरह भूल जाता है। ड्रैगन्स का मायाजाल, जीवन की विस्मृतियों के साथ जुड़े जीवन-दर्शन को हम हॉबिट और हैरी पॉटर में देख-पढ़ चुके हैं। फिर इशिगुरो इस उपन्यास में हमारे लिए नया क्या देते हैं? कुल मिलाकर वह एक प्रतीक-कथा की प्रस्तावना करते जान पड़ते हैं कि स्मृति के विशाल दानव को ज़मीन के नीचे अच्छी तरह दफ़न कर दो, तो जीवन शांतिपूर्वक व्यतीत हो सकता है। इक्कीसवीं सदी के एक पाठक के तौर पर मेरी दिलचस्पी प्रतीक-कथा पढ़ने में नहीं रहती। मैं उसके लिए मिथॉलजी पढ़ लिया करता हूं, क्योंकि उसे पढ़ते समय मेरा मन मुझे बार-बार बताता है कि यह भले मैं इक्कीसवीं सदी में पढ़ रहा, यह तीन हज़ार साल पहले की कल्पनाएं हैं। किसी भी सुंदर कहानी को प्रतीक-कथा में तब्दील करके ख़त्म किया जा सकता है। जैसे ही लेखक अपनी ओर से प्रतीकों का निवेश करता है, वह पाठक की कल्पनाशक्ति को कुंद करता है, उससे कहता है कि दूसरी दिशाओं में जाकर मत सोचो, उतना ही सोचो, जितना मैं तुम्हें बताना चाहता हूं। और यह श्रेष्ठ कला का गुण क़तई नहीं हो सकता। इसीलिए, पिछले साल इस उपन्यास को पढ़ने के बाद मैंने इसे उनकी एक विराटकाय असफलता माना था, और आज जब उन्हें नोबेल पुरस्कार की घोषणा हुई, तो मुझे थोड़ा आश्चर्य भी हुआ। यह भी सही है कि दुनिया के कई आलोचक इस उपन्यास को एक सफलता भी मानते हैं। साहित्य हमेशा से आस्वाद का विषय रहेगा।

चूंकि इशिगुरो के पास सुलझा हुआ क्राफ्ट है, कहानी कह जाने की कला है, वह इस किताब को हमारे भीतर  से गुज़ार देते हैं। पर गुज़रकर वह ऐसी जगह पहुंचती है, जो हमारे लिए नई नहीं होती। कहीं न पहुंच पाने का भाव श्रम का व्यय है।

उनकी सबसे अच्छी किताब ‘नेवर लेट मी गो’ है। ‘द बेरीड जाएंट’ के प्रकाशन के पूर्व जो उत्सुकता व्याप्त थी, उसका प्रमुख कारण ‘नेवर लेट मी गो’ की विचारगत सुंदरता ही थी। इसकी कहानी ऐसे है- सरकार क्लोनिंग के ज़रिए कुछ बच्चों का ‘उत्पादन’ करती है। उन्हें एक हॉस्टल में रखा जाता है। बाक़ायदा स्कूल भी भेजा जाता है। वे बड़े भी होते रहते हैं। साधारण क्रिया-कलापों में लगे हुए हैं। पढ़ रहे हैं। प्रेम कर रहे हैं। जीवन के सौंदर्य को अनुभूत कर रहे हैं। और बड़े सपने भी देख रहे हैं। लेकिन उनका ‘उत्पादन’ एक ख़ास उद्देश्य के लिए किया गया है। उनके शरीर के सारे अंग स्वस्थ हैं। जब साधारण ब्रिटिश नागरिकों को अंगों की ज़रूरत होती है, इन बच्चों के अंग निकालकर उनमें प्रत्यारोपित कर दिए जाते हैं। ज़ाहिर है, अंग निकल जाने के बाद उस बच्चे की या तो जान चली जाएगी या वह अनुपयोगी हो जाएगा और सरकार उसे ढोने के बजाय मार डालेगी। यह प्लॉट ही अपने आप में भयावह मानवीय स्थितियों की ओर ले जाता है। फ़सल की तरह मनुष्य का उत्पादन। जैसे आप मुर्ग़ियाँ व अन्य जानवर पालते हैं, ताकि इंसान उसे व उसके अंडों को खाने के लिए उपयोग करे। विशिष्ट तकनीक के प्रयोग से मनुष्य का जानवर की तरह प्रयोग करना, हमारे भीतर के पशु का फोटो खींचकर दिखा देने जैसा है। बच्चों को पता है कि वे मारे जाएंगे, लेकिन वे कोई विरोध नहीं करते। वे लगातार अपनी नियति के आगे समर्पण करते हैं। यह इतना ताक़तवर प्लॉट है कि इशिगुरो की मुरझाई हुई, बेचमक, सपाट अंग्रेज़ी के बाद भी हम पूरी किताब पढ़ डालते हैं और अंत में लेखक की प्रशंसा ही करते हैं, मानवता के विशाल महास्वप्न में उसकी आस्था के कारण। एक बार एक पत्रिका ने सूची बनाई थी और पाठकों से आमंत्रित किया था कि वे अपने पढ़े उपन्यासों के दस सबसे उबाऊ दृश्यों को नामांकित कर उसके पास भेजें। ‘नेवर लेट मी गो’ के कुछ हिस्से उबाऊपन की उस प्रतिस्पर्धा में शामिल किए गए थे। इतने दिलचस्प प्लॉट के बाद भी इशिगुरो इस उपन्यास में अपने पाठक को झिलवा देते हैं, तो अपनी भाषाई मंथरता के ही कारण।

एक पाठक के तौर पर इशिगुरो के उपन्यासों के मुक़ाबले मैं कहानियों की उनकी किताब ‘नॉक्टर्न्स’ से अधिक मुतास्सिर हुआ था, जहां उनकी कल्पनाशीलता अनर्गल ‘वाइल्ड’ नहीं होती, उसमें वह जापानी कला-पद्धति वाबी-साबी के नज़दीक जाते हैं। आपस में जुड़ी हुई वे पांच कहानियां अलग तरह का इशिगुरो है। मनुष्य की बुनियादी अनुभूतियों के अधिक निकट खड़ा लेखक। मुझे लगता है, और ज़ाहिर है कि यह मेरी निजी सोच है, कि साहित्यिक लेखकों को भरसक मनुष्य के आसपास ही रहना चाहिए। उसे उन दुर्लभ कलाकारों में शामिल होना चाहिए जो मानते हों कि अब भी, भूख पूरी न होने पर मृत्यु हो सकती है, प्यास के बेहद हो जाने पर भी, और कोई प्रेम में डूबकर भी आत्महत्या कर सकता है, एक बम फटने,  ट्रेन के पलट जाने या ग़लत दवा की चार बूंदें पी लेने से भी हज़ारों लोग मारे जा सकते हैं। ज़रूरी नहीं कि इक्कीसवीं सदी की कला के भीतर सारी मौतें बाहर से आई उड़नतश्तरियों, दूसरे ग्रहों के अजीब सैनिकों, प्राचीन युग से इस युग में आ गए किसी डायनासॉर या गॉडज़िला या अनाकोंडा से ही हों। नए-नए व अविश्वसनीय तरीक़ों से होने वाली मृत्यु की कल्पनाओं के बजाय, मृत्यु के एग्जिस्टंग रूपों पर फिर से सोचा जाए। यह हमारी अनुभूतियों के ज़्यादा क़रीब होगा। और दूसरी बात-  व्यावसायिक कलाएँ तो उस रास्ते पर ‘ऑलरेडी’ चल ही रही हैं, साहित्यिक व गंभीर कलाओं को तो कम से कम मनुष्यता की असली उंगलियों को पकड़े रखना चाहिए।

‘नॉक्टर्न्स’ में वह जिस तरह वाबी-साबी को छूते हैं, उसी तरह अपने उपन्यासों में मूजो का स्पर्श करते हैं। दोनों ही जापानी कला-पद्धतियां हैं। दोनों का रिश्ता प्राचीन बौद्ध धर्म से है। बौद्ध भिक्षुओं के पास कला के कम ही औज़ार होते थे, इसलिए वे कम से कम चीज़ों के प्रयोग के साथ यथार्थ को हल्का-सा विरूपित, लगभग आदिम रूप में, अशुद्ध-सा दिखा देते थे। जैसे- एक गिलास। जब उसे कोई व्यावसायिक कंपनी बनाएगी, तो उसका आकार बहुत शुद्ध होगा, उसमें कोई दोष नहीं होगा, बेहद नपा-तुला, उसके किनारे तीखे होंगे, और उसकी रेखाएं एकदम सीधी होंगी। लेकिन जब एक कलाकार हाथ से गिलास को बनाएगा, तो उसकी रेखाओं को टेढ़ा-मेढ़ा कर देगा, उसके रूप को अशुद्ध कर देगा, क्योंकि रूप की अशुद्धि कला को सुंदर बनाती है। शुद्धतम रूप में व्यावसायिक मूल्य हो सकते हैं, कलात्मक मूल्य कम होंगे। ‘नॉक्टर्न्स’ में इशिगुरो इसी कला-रूप के पास जाते हैं। उस किताब में अनुभूतियां और चरित्र अशुद्ध हैं। प्रेम ठीक प्रेम जैसा नहीं है, और संगीत तो कभी संगीत जैसा होता ही नहीं। संगीत तो हमेशा एक कल्पना की तरह हमारे मन में बजता है, बाहर तो केवल ध्वनियाँ तैरती हैं।

उनके उपन्यासों में भी उनके चरित्र, नैरेशन के दौरान अपनी कमज़ोरियों और अक्षमताओं को उजागर करते चलते हैं। यह भी एक तरह का वाबी-साबी है। दूसरी चीज़ है मूजो। बौद्ध धर्म में जिसे ‘अनित्य’ कहा जाता है, उसी को जापानी में मूजो कहा जाता है। यानी हर चीज़ एक दिन नष्ट हो जाएगी, तुम भी और मैं भी, तो आख़िर संघर्ष कैसा? चीज़ों को उनके हाल पर छोड़ देने, उन्हें स्वीकार कर लेने, नियति के आगे चुप हो जाने की स्थिति का नाम भी मूजो है। इशिगुरो के उपन्यास एक ऐसी जगह जाकर ख़त्म होते हैं, जहां चरित्र अपने अतीत व वर्तमान के साथ एक ख़ास क़िस्म का सामंजस्य बना लेता है, अपने परिवेश में घुल-मिल जाता है, दुखों को उपेक्षित करके आगे बढ़ जाता है। यह कोई नकारात्मक भाव नहीं है, बल्कि जीवन में आगे बढ़ते रहने के भाव का सम्मान ही है। अधिक दुखद स्थिति का मूजो, भले हमारे ऊपर क्षणिक तौर से नकारात्मक प्रभाव छोड़े। दुख की अवस्था में दुख पर बात न करना, एक किस्म का मूजो है। यह कुरोसावा के जापानी सिनेमा में कम दिखाई देता है, लेकिन यासुजिरो ओज़ू की फिल्मों में ऐसे प्रयोग बहुत हैं, जब, अभी-अभी एक गहरे दुख से निकला व्यक्ति, दूसरे से कहता है, “कितनी अच्छी हवा चल रही है!”

इशिगुरो के उपन्यासों में बीच-बीच में ऐसे कितने ही मूजो प्रसंग आते हैं। ‘द बेरीड जाएंट’ में दोन किहोते या डॉन क्विग्जोट जैसा एक किरदार है, सर गैविन, उसकी उपस्थिति एक किस्म का मूजो है। वहीं ‘द रिमेन्स ऑफ द डे’ में नायक द्वारा बीच-बीच में किया जाने वाला परिहास भी मूजो है। इस तरह के मूजो-प्रसंग इशिगुरो को एक दार्शनिक स्पर्श भी दे देते हैं।
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(गीत चतुर्वेदी के अन्य लेख यहां पढ़े जा सकते हैं।)

Monday, October 02, 2017

महेश वर्मा: छह नई कविताएं

                                                                                                                                       कवि की चित्रकृति


शेर दागना

फिरोज़ अख़तर फिरोज़ या किसी गांव के तख़ल्लसु वाले शायर दोपहर जब आये तो खासे प्यासे थे लेकिन पानी का गिलास हाथ आते ही उन्होंने शेर दाग दिया जो मेरे कान को छूता गुज़रा और  मेरे पुराने घर  की दीवार की पलस्तर में जा धंसा जहां से थोड़ी रेत और सीमेंट भुरभुरा कर झर गई. दाद न मिलने पर और एक शेर सुनाया जो मेरी नासमझी की दीवार से टकराकर थोड़ा और पलस्तर गिरा गया. थोड़ी देर में तो कमरा चांदमारी का मैदान हो गया था और आने वाले लोग थे कि चारों ओर आदिवासियों की तरह मरे पड़े थे और शेर थे कि क्लाशनिकोव की मैगजीन हुए जा रहे थे. अंत में अपनी शेरवानी, टोपी और अपना दीवान समेटकर जब वो चौकी से  से उठे तो उन्होंने क्षेत्रीय बोली में तम्बाकू मांगा.
***

मछलियाँ

एक मछली से तुम सबकुछ (का चित्र) बना सकते हो... मज़ाकिये चित्रकार ने अत्याधुनिका से कहा यहां तक कि एक फीमेल न्यूड भी. वह जरा भी चौंकती तो देहाती करार दी जाती सो  उसने आगे का दांव खेला-तो क्या एक स्त्री गुप्तांग भी ? पुरूष अब गंभीर भयभीत और परास्त कायांतरण की ओर घूम चुका है। अगले दृश्य में वह त्रासदी का नायक है जो इस मछलीघर में किसी विशाल मछली के पेट से निकला है. अत्याधुनिका के लिप्सटिक ठीक करने के दृश्य के बाद कैमेरा सीधे सार्वजनिक मूत्रालयों के रेखांकनों पर रोककर हम कास्ट/क्रेडिट्स दिखाना शुरू कर सकते हैं। फिल्म का नाम मछलियाँ.
***


मलेरिया

उस समय का किस्सा है जब इतना विकास हो गया था कि दो साल तक मालूम ही नहीं कर पाये कि मलेरिया था. खून जांच कराते कराते वह सुनहरा हो गया और उसकी भूख और उसका हास्यबोध जागृत हो गया. खाना अलबत्ता पच नहीं पाता था उसे और उसके लगातार मज़ाक डाक्टर,  नर्स और  मित्रों को. एक और दोस्त का किस्सा याद आया जिसका फिसड्डीपन सेरेब्रल मलेरिया से ऐसा दूर हुआ कि पुराने दोस्त उससे आंख नहीं मिला पाते थे  लेकिन बीच में थोड़ा हिंसक किस्म से सरक गया था. 
मलेरिया मिलते ही हास्पिटल में जश्न का सा माहौल हो गया डाक्टर्स एक दूसरे से गले मिलकर बधाईयाँ दे रहे थे, मिठाई मंगाने का प्रस्ताव किसी सीनीयर ने खारिज कर दिया वरना इस मरीज के मुंह में डाक्टर हलदकर जरूर लड्डू ठूंस देते जिसे मलेरिया मिला था इससे उसके प्रेक्टिकल जोक्स भी मरने तक रूक जाते. 
खुशी के बीच ऐसे भी वह मरा तो किसी का ध्यान नहीं गया.
***

कल्पनाहीनता 

मेरे पक्षी उड़ते तो कभी छत से कभी पंखे से टकराकर छितरा जाते इस तरह कि जमीन उनके टुकडा टुकड़ा शवों से नहीं चिन्दी चिन्दी काग़ज़ों से भर जाता. एक बार तो हद हो गई जब मैं आकाश की बात करते हुए उड़ने वाली मछलियों की बात तक नहीं लिख पाया जबकी यह उस समय की सभी बालपत्रिकाओं में बहुतायत से छपने वाली थीम थी. अक्सर मेरे कन्धे पर पंखे से भी नीचा उड़ने वाला उल्लू बैठा रहता और मिचमिचाती आंखों से दिन की धूप को देखता रहता. यद्यपि मैं खूब उँची छतों वाले कमरों में पला बढ़ा था और मैंने बचपन में उड़ते पक्षी को मार गिराने के शिकारी संस्मरण अपने दादाजी से खूब सुने थे.
***

पानी

कीचड़ बारिश थकान की अनगिनत रातों और खून के बीच हम एक दूसरे को एक रात देना चाहते थे. इससे पहले कि कोई उब हमें मार डाले या एक विचारहीन गोली हमारी खोपड़ी को छेदती निकल जाये. कीचड़ हमें चबा रहा था और बीच बीच में छोड़ देता तब अंधेरा हमें भूनने लगता. वह भूल जाता तो बारिश हमारी नग्नता पर छडि़याँ फटकारने लगती. थकन तो थी हीः वह जैसे सांस थी,सांस में घरघराहट की आवाज़.
लो यह मेरी देह कहता हुआ पुरूष कहने लगता और लो अंधकार, 
   और रूदन, 
   असामर्थ्य लोः उसका अर्ध्य लो, 
   लो पूर्वजों का अहंकार.
स्त्री देना चाहती थी अपने दुःख, अपनी देह, अपने अंधकार. चुप रहती. वह आशा के शब्द 
मांगती मांग लेती चोट. धरती बने रहने से उबी हुई वह सूर्योदय  होने पर किधर भी जा 
सकती थी निर्भय.
निर्धन दोनों हम लोग इतने कि पूछने भर पानी भी नहीं आसपास कि पूछें -पानी पियोगी ?
  पियोगे पानी ?
***

विवाह

उस समय जबकी कोहबर के वृक्ष और पक्षी भी सो गये थे, सप्तपदी के उनींदे समय को पुरोहित की कड़कदार आवाज़ ही तोड़ सकती थी. वह अब भी हर विवाह पर वही मज़ाक करके लोगों को जगा देने वाला मसीहा था.
रात ख़त्म होने को है, भाषा और उल्लास पहले ही ख़त्म हो चुके इसी समय मैं  वर-वधू- स्त्री-पुरूष के बीच एक बड़े से लाल फल को पकता देख पाया. वह निश्चय ही वासना का लाल फल था जो समूचे वायुमंडल की सांस तंग कर सकता था किसी क्षण.
आग जलाने का यत्न करते पुरोहित को भी जैसे अचानक इसका भान हुआ और उसके पलट कर देखते वर-वधू खड़े हो गये जबकी यह थोड़ी देर में उनसे कहा जाना था, नाई को पुरूष की कलगी और सखी को स्त्री की सलवटें ठीक करनी थीं.
कोई चीज़ इस बीच वहाँ आ गई थी अनुष्ठान मंडप से मंत्रों का वर्चस्व कम करती. वह शायद तीव्र कामना से मिलती जुलती किसी चीज़ का उत्ताप था जिसने दोनों देहों को तान दिया था अद्वितीय अंगड़ाईयों में एकसाथ एक ही जैसी गीली और लसलसी मुस्कान दोनों केमुख पर आई फिर छुपा ली गई.
उनींदे लोगों ने इसे स्वप्न की तरह देखा और पवित्र अग्नि ने इसको देखा हास से,
परिक्रमा इसके बाद संपन्न हुई।
***

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