Wednesday, September 27, 2017

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 2 : नींद, मृत्यु का दैनिक अभ्यास है





जब मृत्यु से मेरा पहला परिचय हुआ, मेरी उम्र सवा चौदह साल थी. एक दशक लंबी बीमारी के बाद मेरी बड़ी बहन का निधन हो गया था. अपने परिवार में सबसे ज़्यादा जुड़ाव मैं उन्हीं से महसूस करता था. उन्होंने मुझे बहुत सारी किताबें पढ़ाई थीं. जीवन, संगीत और बिल्लियों के बारे में बहुत सारी बातें बताई थीं. मेरी हैंडराइटिंग उनकी हैंडराइटिंग से बहुत मिलतीजुलती है, क्योंकि बरसों, उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर मुझसे लिखवाया था. जब मैं लिखना सीख गया था, उसके बाद भी. यह उनके लिए खेल की तरह था. जब वह मरीं, मैं बहुत रोया. रोतेरोते सो गया. उठने के बाद फिर रोने लगा. अपने घर से श्मशान तक मैं रोतेरोते गया. जब उनकी देह को आग दी गई, मैं और ज़ोर से रोया. तब तक यह उम्मीद थी कि वह लौट आएंगी. आग देने के बाद वह उम्मीद भी चली गई.

लौट आने की उम्मीद स्वर्ण की तरह होती है. सबसे क़ीमती, लेकिन सबसे नाज़ुक. कहते हैं, सोना सबसे नहीं संभलता, अचानक गुम हो जाता है. अभी आंख के सामने था, अभी ग़ायब हो गया. लौट आने की इसी उम्मीद में पुराने ज़माने में कुछ लोग लाशों को बचाकर रखते थे. देह बची रहेगी, तो एक दिन प्राण लौटकर आएगा. जो राजा थे, समर्थ थे, धनवान थे, उनकी लाशें बची रह जाती थीं. जो समर्थ नहीं थे, देहों को बचाकर नहीं रख सकते थे, उन्होंने कला की रचना की. साहित्य रचा. दर्शन रचा. कविताओं और गीतों की रचना की. ऐसा करके वे मरे हुए लोगों को याद करते थे.


हम जब तक किसी को याद करते रहते हैं, तब तक उसकी मृत्यु नहीं होती. यही सोचकर मैं अपनी दीदी को याद करता रहा. उसके बाद मैं किसी को दीदी नहीं बोल पाया. उसके बाद मैं उतना कभी नहीं रो पाया.

हम जितनी चीज़ों को जानते हैं, उनमें सबसे बलवान मृत्यु को माना गया है. कहावत कहती है कि समय बड़ा बलवान, लेकिन समय से अधिक क्षणभंगुर कुछ नहीं होता. समय और कुछ नहीं है, बस मृत्यु का वाहन है. हर पल, हर चीज़ को उसकी मृत्यु की ओर ले जाता हुआ. हम हमेशा मृत्यु से लड़ते हैं. यह आमनेसामने की लड़ाई नहीं होती, कोई गुरिल्लायुद्ध जैसा होता है. मृत्यु ब्रह्मा की मंझली बेटी है. देवताओं को भी उससे डर लगता था. बारबार उसके आगे हाथ जोड़ना पड़ता था. एक दिन अमृत मिल गया. देवताओं को लगा कि उन्होंने मृत्यु पर विजय प्राप्त कर ली है. किंतु यह भी एक भ्रम निकला. अमृत से अमर नहीं हो सकते, चिरंजीव हो सकते हैं. हर देवता की मृत्यु निश्चित है. जिनजिन ने अमृत पिया है, उन सबको भी एक दिन मरना होता है. बस, उन्हें कुछ अतिरिक्त सुविधाएं मिल जाती हैं. उनका पुनर्जन्म होता है, जिस आयु और अवस्था में उनका निधन हुआ था, उसी आयु और अवस्था में उनका पुनर्जन्म होता है. एक और सुविधा मिलती है, उन्हें अपने पूर्वजन्म की स्मृतियां भी ठीक उसी तरह वापस मिल जाती हैं. वे सबकुछ पहले जैसे ही याद कर सकते हैं. इस तरह मृत्यु एक क्षणिक ब्रेक की तरह आती है और चली जाती है. किंतु आती ज़रूर है. मृत्युंजय महादेव भी मृत्यु के इस ब्रेक से एकबारगी दचका ज़रूर खाते हैं.

ये हिंदू मिथॉलजी की वे बातें हैं, जिन्हें बहुत कम लोग जानते हैं. मिथकों को लोहिया ने 'मनुष्य की कलात्मक कल्पनाएं' कहा है. ग़ौर किया जाए, तो इस कहानी में सबसे अनिवार्य तत्व अक्षुण्ण स्मृति है. मान लीजिए कि पुनर्जन्म के बाद देवताओं को अपनी देह और अवस्था तो वापस मिल गई, लेकिन यह स्मृति वापस न मिले, तब? तब उनके लिए देह और अवस्था का कोई अर्थ न रह जाएगा. कल्पना कीजिए, मृत्यु के क्षणिक ब्रेक के बाद महाशिव का पुनर्जन्म हुआ है. उन्होंने जिस पाणिनि को अष्टाध्यायी का वरदान दिया था, वही पाणिनि उनके सामने आ जाता है और कहता है, 'हे प्रभो!' और महाशिव भरमाकर पूछ लें— 'तुम कौन हो भाई? अच्छा, पहले यही बता दो कि मैं कौन हूं?' तो पाणिनि की दृष्टि में महाशिव की भव्यता टूटकर बिखर जाएगी और कई दुर्घटनाएं घटित हो जाएंगी. महाशिव को याद ही न रहेगा कि उन्हें इस सृष्टि का संचालन करना है.

कहने का अर्थ यह है कि यह जो अमृततत्व है, यह स्मृति में वास करता है. अमरता की सारी कहानियों में स्मृति की जगह विस्मृति का निवेश कर दीजिए, अमरता भरभराकर गिर जाएगी.

स्मृति ही अमृत है. स्मृति से ही साहित्य और अन्य कलाएं बनती हैं. जो स्मृत है, वही अमृत है. इसीलिए परंपरा में साहित्य को अमृत शब्द से जोड़कर देखा जाता है. तमाम देशीविदेशी विद्वान, दार्शनिक कह गए हैं कि साहित्य, मृत्यु से मुक़ाबला करने की कार्रवाई है. मृत्यु से बड़ा कुछ नहीं मिला, तो हमने मृत्यु से बड़े की रचना शुरू कर दी. जब हिंदू मरने लगते हैं, तब गीता पढ़ने लगते हैं. सारी उम्र नहीं पढ़ते, मृत्यु को क़रीब जानते ही पढ़ने लगते हैं, क्योंकि गीता में आत्मा की सबसे पुष्ट अवधारणा दी गई है. गीता में आत्मा की जो परिकल्पना और विवरण है, वह अमरता की अवधारणा से प्रभावित है. मनुष्य की सबसे आरंभिक बेचैनियों में से एक है कि वह मृत्यु को हरा दे, उस पर विजय प्राप्त कर ले, वह देवताओं के समतुल्य बन जाए. मैं मर जाऊंगा, यह देह मर जाएगी, अंगअंग मर जाएगा, पर मेरे भीतर ऐसा कुछ है, जिसे मृत्यु भी नहीं मार पाएगी. वह है आत्मा. गीता के वे श्लोक याद कीजिए, जिसमें कृष्ण बताते हैं कि आत्मा को न शस्त्रों से काटा जा सकता है, न आग से जलाया जा सकता है आदिआदि. यह पूरी अवधारणा मृत्यु के कारण हममें पैदा हुए भय से आती है. मृत्यु हमारे अस्तित्व को बारबार छोटा बताती है, हम अपने भीतर एक ऐसी चीज़ की तलाश करते हैं, जिसके सहारे हम मृत्यु को ही छोटा बता सकें. आत्मा, मृत्यु के नाम मनुष्य द्वारा जारी की गई एक चुनौती है—  आओ, मृत्यु आओ, मेरी देह को नष्ट कर दो, पर मेरे भीतर की आत्मा का तुम कुछ नहीं बिगाड़ पाओगी, वह किसी चिड़िया की तरह मेरी देह से निकलेगी और फुर्र उड़ जाएगी, तुम उसको छू तक न पाओगी.

इसे ऐसे भी कह सकते हैंमेरे भीतर जब तक आत्मा है, मृत्यु मेरा कुछ भी न बिगाड़ पाएगी.

सबसे पहले ब्रह्म को अमर माना गया, फिर बाक़ी देवताओं को भी, उसके बाद दर्शन में आत्मा की अमरता की अवधारणा आई. ब्रह्म अमर है, और आत्मा भी ब्रह्म ही है, इसलिए आत्मा भी अमर है. इस तरह अमरता का अद्वैत रचित हुआ. भले रूपक में कहें या उपमा, हम बारबार कहते हैं कि साहित्य और कविता हमारी आत्मा हैं. इस तरह हम साहित्य और कविता की अमरता की ओर संकेत करते हैं. और जब भी हम साहित्य और कविता की अमरता की ओर संकेत करते हैं, हम छिपे तौर पर यह भी जता देते हैं कि साहित्य और कविता दरअसल, मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के लिए किए गए हमारे उपक्रम हैं.

कविता ही हमारी आत्मा है, तो इस तरह भी कह सकते हैं कि जब तक हमारे भीतर कविता है, मृत्यु हमारा कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएगी.

यहीं पर मुझे गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की एक कविता याद आती है, जो उन्होंने आदिकवि वाल्मीकि पर लिखी थी. आदिकवि को जब छंद का साक्षात्कार हुआ, तो उनके मन में चिंता हुई कि इसका सबसे अच्छा उपयोग क्या हो सकता है. बहुत सोचने के बाद उन्होंने तय किया कि इस छंद के बल से मैं मनुष्य को देवता और देवता को मनुष्य बना सकता हूं. कविता के भीतर मैं वे स्मृतियां भर सकता हूं, जो मनुष्य को देवता होने जैसा आभास दे सकें. गुरुदेव के इस आदिकवि ने भी यहां कविता का उपयोग मृत्यु के ख़िलाफ़ एक शस्त्र की तरह किया है. मनुष्य को देवता बनाने के संकल्प से भरा हुआ शस्त्र.

सबसे पुराना सवाल है, क्या मृत्यु को जीता जा सकता है? क्या उसके आने को रोका जा सकता है? ऋषिमनीषी से लेकर वैद्यडॉक्टर तक, कलाकारसंगीतकार से लेकर लेखककवि तक, सब अपनीअपनी तरह से मृत्यु पर विजय प्राप्त करना चाहते हैं. सब उसकी कोशिश कर रहे हैं. साहित्य मृत्यु से होने वाली इसी लड़ाई का एक तरीक़ा है.

पुराने ज़माने में एक विद्या हुआ करती थीवाजपेय विद्या. इसी से जुड़ा एक वाजपेय यज्ञ भी हुआ करता था. यज्ञ का उद्देश्य तो थोड़ा और विस्तृत था, वाजपेय विद्या एक तरह से मृत्यु को जीत लेने की विद्या मानी जाती थी, चिरयौवन प्राप्त कर लेने की विद्या. 'वाज' शब्द का प्रयोग ऋग्वेद में कई बार होता है. ऋग्वेद की अपनी टीका में सायण ने इसका अर्थ दिया हैअन्न, लेकिन जैसा कि संस्कृत का स्वभाव है, एक ही शब्द के कईकई अर्थ हो सकते हैं.

(
संस्कृत बड़ी प्यारी और समृद्ध भाषा है. एक ही शब्द के क़रीब ग्यारह सौ पर्यायवाची या अर्थबोधी शब्द हो सकते हैं. इसीलिए इस भाषा में अपने नायकों के, देवताओं के 108 नाम, 1008 नाम या उनसे ज़्यादा नाम गिनाते हुए छंद रचने की परंपरा थी, क्योंकि यह भाषा इस तरह से अनेक शब्द रचने की सुविधा देती है.  नाम गिनाने वाले ऐसे तमाम काव्य और छंद, एक तरह से, इस भाषा के 'मसल्स' या डोलेशोले का प्रदर्शन हैं.  यह प्राकृतिक भाषा नहीं है. दुनिया की कई भाषाएं प्राकृतिक हैं यानी लोगों के बोलनेबतियाने से बनती हैं, उसी हिसाब से परिवर्तित हो जाती हैं, देशकाल के हिसाब से बदल भी जाती हैं. दूसरी भाषाओं में घुलकर खो जाती हैं. भारत में भी ऐसी भाषाएं थीं, उन्हें प्राकृत कहते हैं. संस्कृत, प्राकृत नहीं है, वह संस्कृत है, यानी संस्कारित है, यानी बाक़ायदा बनाई गई है. हज़ार क़िस्म के नियमों के साथ बांधी गई है, उसे अपने मूल रूप में सुरक्षित बनाए रखने के लिए सैकड़ों जतन हैं. यही कारण है कि हज़ारों बरसों से यह बनी हुई है. इतने बरसों में जाने कितनी भाषाएं आईं और गईं, संस्कृत वहीं बनी हुई है. दो हज़ार साल पहले की संस्कृत और आज की संस्कृत में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं है, जबकि चार सौ साल पहले की अंग्रेज़ी आज आपके पल्ले नहीं पड़ेगी. वह क्या, हिंदी ही इतनी बदल चुकी है कि सौ साल पहले की हिंदी समझना टेढ़ी खीर हो जाता है, शब्दकोश पलटे या माथे पर बल डाले बिना, भारतेंदु और प्रसाद को पढ़ा नहीं जा सकता. इसीलिए मैं कहता हूं कि संस्कृत परंपराओं पर हिंदी और अंग्रेज़ी में ठीक से बात करना कठिन हो जाता है, क्योंकि दोनों भाषाओं में संस्कृत के वैराट्य को झेल सकने लायक़ संपन्नता ही नहीं है. अब शब्दों के अर्थ इतने सूक्ष्म रूप से बदल गए हैं कि सावधानी न बरती जाए, पूर्वग्रहों को दूर न रखा जाए, तो अर्थ का अनर्थ होने की तमाम आशंकाएं रहती हैं.)

तो बात हो रही थी 'वाज' शब्द की, सायण ने इसका अर्थ अन्न दिया है, लेकिन इसके कुछ और स्पष्ट अर्थ भी होते हैंजैसे शक्ति या अधिक स्पष्ट कहें तो, मनुष्य की आंतरिक शक्ति. संस्कृत में इसे वीर्य भी कहते हैं. इसे हिंदी के वीर्य या सेक्स वाले वीर्य में रिड्यूस करके न देखा जाए. यह वीरता से बना है, यानी अभय होने की शक्ति. वीर्य यानी किसी भी चीज़ से न डरने का भाव. मनुष्य की यह शक्ति बाहर नहीं होती, भीतर होती है. उसे बचाए रखना बड़ी मेहनत और जतन का काम है. उस ज़माने के ऋषि या मनीषी मनुष्य की आंतरिक शक्ति को बड़ी महत्ता देते थे. वे ऐसी साधानाएं किया करते थे, कि उनके भीतर की शक्ति का क्षय न हो, वे जब चाहें, तब उसका आवाह्न करें और उसका महत्तम उपयोग कर सकें. भीतर की इस शक्ति, जिसका नाम वाज है, का जब क्षय होने लगता था, तो जाने कैसे वे इसे पी जाया करते थे. इसी कारण वे 'वाजपेयी' कहलाए. जो इस शक्ति को लगातार अपने भीतर भरे रखते थे, वे भरद्वाज कहलाए. वाज से भरे हुए यानी भरद्वाज. इस आंतरिक शक्ति का एक उपयोग मृत्यु से मुक़ाबला करना भी था. इसके लिए वे तमाम तरह की आध्यात्मिक, वैज्ञानिक व कलात्मक साधानाएं किया करते थे.

तो वाजपेय विद्या के प्रवर्तक वाजपेयी और भरद्वाज कहलाए. साहित्य और कलाओं को इस दृष्टिकोण से देखा जाए, तो उन्हें वाजपेय विद्या के अंतर्गत ही आना चाहिए, क्योंकि साहित्य और कलाएं अंतत: मनुष्य की आंतरिक शक्ति का प्रगटीकरण हैं. साहित्य और तमाम तरह की कलाएं मनुष्य को चिरयौवन ही देती हैं. नेरूदा ने 'ट्वेंटी लव पोएम्स' बीस साल की उम्र में लिखी थीं, हम आज उन्हें पढ़ते हैं, तो नेरूदा हमें बीस के ही महसूस होते हैं और हम भले चालीस के हों, ख़ुद को भी बीस का ही मानने लगते हैं. अगर कालिदास आज ज़िंदा होते, तो शायद उनकी उम्र 1600 साल होती, लेकिन मेघदूतम का कालिदास तीसपैंतीस से ज़्यादा का क्या लगता होगा? आज भी उतने का ही लगता है.

साहित्य व कलाएं मनुष्य की आंतरिक शक्ति से बनते हैं और यह आंतरिक शक्ति किससे बनती होगी? इसके कई जवाब हो सकते हैं, पर मुझे प्रमुखत: जो सूझती हैं, वे स्मृति, कल्पना और स्वप्न. एक चौथी चीज़ भी है, वह है इच्छा, जो कि सबसे बलशाली तत्व है, लेकिन उस पर अगले कॉलमों में. अभी स्मृति, कल्पना और स्वप्न के विषय में कुछ बातें.

उन्नीसवीं और बीसवीं सदी का अधिकांश साहित्य यथार्थ और उसके आसपास घूमता है. यथार्थ ही धुरी है. यथार्थवाद एक आधुनिक अवधारणा है. पुराने ज़मानों में यह ठीक ऐसे ही नहीं हुआ करती थी. हमें साफ़साफ़ नहीं पता कि दान्ते या होमर या कालिदास की रचनाएं उनके समकालीन यथार्थ को रेखांकित या चित्रित करती थीं या नहीं. इनकी किताबों में जो घटनाएं हैं, वे सच हैं या नहीं, यह भी नहीं पता. हो सकता है कि वे महज़ कल्पना हों, लेकिन उनमें भी सच होने जैसा आभास है. इसलिए इन्हें कल्पना द्वारा रचा गया साहित्य माना जाता है. आधुनिक यथार्थवादी साहित्य में जो घटनाएं दी जाती हैं, वे भी सच में घटित हुई थीं या नहीं हुई थीं, यह पता करना भी बहुत मुश्किल है, और ग़ैरज़रूरी भी, लेकिन उन घटनाओं के भी सच होने का आभास मिल जाता है. आभास ज़रूरी है, होना ज़रूरी नहीं है. पूरी तरह यथार्थवाद के सहारे रहकर तो इस सदी में भी कला की रचना नहीं हो सकती, जो कोशिशें हुई भी हैं, वे बहुत कम सफल हो पाई हैं. स्मृति, कल्पना और स्वप्न के तत्वों को उनमें मिलाना ही पड़ता है. चूंकि सारी रचनाएं भाषा के भीतर लिखी जाती हैं और भाषा एक स्मृति ही होती है, इसलिए सारे यथार्थवाद के बाद भी स्मृति तो उसमें दिख ही गई.

मैं इस मुद्दे पर पहले भी बोलता रहा हूं और इसे स्पष्ट करने के लिए किताब को उदाहरण की तरह प्रस्तुत करता हूं; भौतिक किताब. एक वस्तु के रूप में किताब. वह मेरे लिए कला का रूपक है. एक किताब को ध्यान से देखिए. वह तीन तरफ़ से खुलने वाली दुनिया है. चौथी ओर से नहीं खुलती, बंधी रहती है. अगर चौथी तरफ़ से भी खुल जाए, तो वह काग़ज़ का पुलिंदा होगी, वस्तु के रूप में किताब नहीं होगी. जिन तीन तरफ़ से वह खुलती है, उसमें एक हैस्मृति, दूसरी है कल्पना और तीसरा है स्वप्न. चौथी तरफ़ बाइंडिंग का स्पाइन है, वह यथार्थ है. यानी कोई भी किताब स्मृति, कल्पना और स्वप्न से खुलती है और इन तीनों को बांधे रखने का काम चौथी तरफ़ से होता है यानी यथार्थ करता है. कोई भी किताब यथार्थ की तरफ़ से नहीं खुलती, खुले तो फट जाएगी. स्मृति, कल्पना और स्वप्ननिर्बंध होते हैं, उन्हें एक बंधन की ज़रूरत होती है. यथार्थ से उन्हें बांधा न जाए, तो तीनों अपनीअपनी दिशा में आपको ले उड़ेंगे, आप उन्हें रोक भी न पाएंगे, बस भटक जाएंगे. यथार्थ किसी भी स्थिति में उड़ता नहीं है, वह ठस होता है, ज़मीन पर ही रहता है, इसलिए स्पाइन वाला बाज़ू ही यथार्थ कहला पाएगा, शेष तीनों बाज़ू यथार्थ नहीं हो सकते, क्योंकि उनमें उड़ जाने का, उड़ा ले जाने का गुण है.

यथार्थ क्या होता है? कुछ भी नहीं होता, सिर्फ़ एक अर्थ होता है. कुछ लोग रियलिटी को यथार्थ मानते हैं, जबकि दोनों दो अलगअलग भाषाओं के अलगअलग अर्थ देने वाले शब्द हैं, जिनका प्रयोग समार्थी के रूप में कर दिया जाता है. सचाइयों को यथार्थ मान लिया जाता है, वास्तविकताओं को भी, घटनाओंपरिस्थितियों को भी, पर ये सब यथार्थ के कारक हो सकते हैं, यथार्थ नहीं होता. इस पर एक पूरा कॉलम लिखने की संभावना है, इसलिए अधिक विस्तार में जाए बिना महज़ इतना कहूंगा कि यथार्थ यानी यथा + अर्थ यानी जो जैसा है उसका अर्थ यानी कोई एक अर्थ यानी जो अर्थ आप निकालना चाहते हैं, वह अर्थ. किसी परिस्थिति से निकलने वाला कोई अर्थ. उसे मैं अपनी तरह से निकाल सकता हूं, आप अपनी तरह से. जैसे ही घटनाएं और अनुभूतियां आएंगी, यथार्थ अपने आप बनने लगेगा और आपकी अगली कल्पनाओं को निर्दिष्ट करता चलेगा. विचारधारा और दृष्टिकोण के अनुसार यथार्थ बदल जाता है, क्योंकि यथा का अर्थ बदल जाता है.

हमने ऊपर देखा कि आत्मा एक कल्पना की तरह रची जाती है, मृत्यु की विराटता को लांघ देने का भान देने वाली कल्पना. स्मृति का प्रयोग भी मृत्यु को पराजित करने के लिए होता है. बचा स्वप्न, जो कि मुख्यत: नींद में रहता है. नींद क्या है? मृत्यु का दैनिक अभ्यास है. ड्रेस रिहर्सल है. स्वप्न उसके भीतर या बाहर रहता है. साधारण स्वप्न की तरह भी, तो मनुष्यता के महास्वप्न की तरह भी, जो कि प्राचीन काल के महाभारत से लेकर पमुक के नए उपन्यास द रेड हेयर्ड वुमन तक में व्याप्त है. यदि नींद के भीतर स्वप्न न हों, तो नींद, मृत्यु की सगी बहन ही लगेगी, लेकिन स्वप्न इस सगेपन में एक शुभबाधा की तरह मौजूद रहते हैं.

और मनुष्य की आंतरिक शक्ति इन तीनों से मिलकर ही बनती है. इन तीनों से मिलकर ही साहित्य और कलाओं की रचना होती है. हम लगातार मृत्यु की ओर बढ़ते हैं, लेकिन हमारी आंतरिक शक्तियां मृत्यु के पार हो जाना चाहती हैं. कई बार वे मृत्यु की विराटता को लघुता में बदल देती हैं.


(गीत चतुर्वेदी का पिछला कॉलम यहां पढ़ें)
 

19 comments:

Nisarg Purohit said...

मुझे खुशी होती है जब सजगता यह एहसास दिलाती है कि मैं भी उसी काल का हिस्सा हूँ जिस काल में गीत चतुर्वेदी है ।

Rahul Shabd said...

"एक किताब को ध्यान से देखिए. वह तीन तरफ़ से खुलने वाली दुनिया है. चौथी ओर से नहीं खुलती, बंधी रहती है. अगर चौथी तरफ़ से भी खुल जाए, तो वह काग़ज़ का पुलिंदा होगी, वस्तु के रूप में किताब नहीं होगी. जिन तीन तरफ़ से वह खुलती है, उसमें एक है— स्मृति, दूसरी है कल्पना और तीसरा है स्वप्न. चौथी तरफ़ बाइंडिंग का स्पाइन है, वह यथार्थ है"
🙏🙏🙏🙏🙏🙏
सर बहुत अच्छा लिखा है।

ranendra-kanchi said...

ज्ञानवर्द्धक , गद्य का सौंदर्य

Seema Gupta said...

अर्थ पूर्ण लेख, यथार्थ लेखन मैंने इसे इस अर्थ में लिया कि आपने बहुत सुंदर तरीके से मृत्यु को भी सुंदर कहा। हर व्यक्ति अपने भीतर की कला से हमेशा जीवित रह सकता है।
अगर सृष्टि में मृत्यु न हो तो सब तरफ जीर्ण क्षीर्ण, बीमार लोग नजर आएंगे और नवसृजन की क्या संभावना रह जाएगी ।।।
मृत्यु होने पर हमारी आत्मा को भी एक नया और स्वस्थ शरीर प्राप्त होता है।।।
मुझे मृत्यु विषय बहुत आकर्षित करता है।।।

Pramila Maheshwari said...

Thik vedic kal ki smriti se utra has ye lekh.

Arun Inder Vyas said...

मृत्यु से परिचय मन की सारी ग्रन्थियों को सुलझा देता है परन्तु मन फिर भी प्यार के रिश्तों की बेडियों में बंधा रहना चाहता है।

Shashi Sharma said...

बहुत सुन्दर लेख।

Narendra Tiwari said...

कई बार तो हज़ार साल पीछे देखने की भी ज़रूरत नहीं हम अपने बचपन की कोई तस्वीर उठा लें और देंखे यदि सात साल की उम्र की तस्वीर देंखे तो आप उम्र में वहीं खड़े रहेंगे अब देखिए शरीर कितनी मर्तबा या कहें रोज ही हर पल ही मृत्यु का वरण कर रहा है पर आत्मा या कहें स्मृति ही तो है जो आपको वही रह सकने का एहसास कराती है।

जीवन ख़त्म नहीं हो पाता और मृत्यु आ जाती है
जैसे पेपर खत्म न हो और बज जाए घण्टा ।

बहुत ही अद्भुत निर्वचनिये लेख वह देवताओं की मृत्यु वाला अंश तो लगा पढ़ चुका हूँ कहीं

अहं शून्यास्मि said...

सार्थक लेख!

वर्तिका said...

this read was wonderful Geet Chaturvedi. :)

Rakesh Rohit said...

बहुत सुन्दर लिखा है आपने!

अनुपमा पाठक said...

Awesome.
It made a wonderful read !!

Venus Singh said...

बस पढ़ने के बाद यही लगा,कि आपका लिखा स्मृति में सहेज कर रख लूं।पर बहुत छोटा सा दिमाग दिया ईश्वर ने। Sir आप जितना कुछ भी लिखे मुझे जरूर दें देना। ज़िन्दगी और मौत के संघर्ष में अपनी अन्तिम सांस तक सहेज कर रखूंगी।

Anita Manda said...

सुंदर, सार्थक लेखन!!

स्मृति ही अमृत है. स्मृति से ही साहित्य और अन्य कलाएं बनती हैं. जो स्मृत है, वही अ—मृत है. इसीलिए परंपरा में साहित्य को अमृत शब्द से जोड़कर देखा जाता है. तमाम देशी—विदेशी विद्वान, दार्शनिक कह गए हैं कि साहित्य, मृत्यु से मुक़ाबला करने की कार्रवाई है. मृत्यु से बड़ा कुछ नहीं मिला, तो हमने मृत्यु से बड़े की रचना शुरू कर दी.

sube singh sujan said...

विषय चुनना और उसके सभी कोने छूकर हमें कुछ सिखा देना आपकी योग्यता है हम नतमस्तक हैं क्योंकि वर्तमान समय में साहित्यकारों में बौद्धिकता मृत प्रायः हो चुकी है राजनीति का हस्तक्षेप साहित्य में बहुत ज्यादा हो गया

Poonam Jain said...

Wonderful

Peeyush Ranjan Parmar said...

स्मृति ही अमृत है।
गीत की लेखनी पढ़ते हुए आप विनम्र होने लगते हैं। शब्द दर शब्द आप खुद के भीतर झाँकते हैं और पाते हैं कि आप ने अपनी आत्मा के घर मे एक ईंट और जोड़ ली है। Geet सर ! यह बेहतरीन था। प्रणाम और धन्यवाद स्वीकार हो 💛
हमेशा की तरह शुक्रिया Anurag Vats

mahesh mishra said...

मेरी विनम्र राय में, इस लेख में और भी संभावना थी। स्मृति, कल्पना और स्वप्न का हिस्सा छोटा लगा, अपर्याप्त लगा, ख़ासकर कल्पना और स्वप्न के हिस्से विस्तृति की अपेक्षा रखते हैं, ऐसा लगा।

pankaj agrawal said...

सुन्दर, बहुत सुन्दर.