Friday, September 22, 2017

पढ़ने के बारे में चार्ल्स सिमिक

 
 
हम क्या पढ़ते हैं, यह तो हम सब सोचते हैं, लेकिन हम कहां पढ़ते हैं, किन जगहों पर पढ़ते हैं, चार्ल्स सिमिक का यह संक्षिप्त निबंध इस बारे में है. सूक्ष्मता और संक्षेपण सिमिक के महत्वपूर्ण गुण रहे हैं. जैसे इसी निबंध का संक्षेप उदाहरण की तरह है. सिमिक ने इसमें जितना कम लिखा है, इसे पढ़ने के बाद हमारी चेतना उतना ही सक्रिय हो जाती है और हम उसके आगे की बातें सोचने लगते हैं. जगहों के साथ अपनी किताबों और पढ़ने की अपनी आदतों के बारे में सोचते हैं. सिमिक अमेरिकी अंग्रेज़ी कवि हैं. यह निबंध ‘कन्फेशन्स ऑफ अ पोएट लॉरिएट’ से लिया गया है.
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मुझे किनारों से मुड़ा अपना प्लेटो पसंद है
चार्ल्स सिमिक
किसी नियम की तरह मैं कविता पढ़ने और लिखने का काम बिस्तर में करता हूं. दर्शनशास्त्र और गंभीर निबंधों को अपनी मेज़ पर पढ़ता हूं. अख़बारों और पत्रिकाओं को नाश्ता या खाने के समय. सोफ़ा या दीवान पर लेटकर उपन्यास पढ़ता हूं. इतिहास पढ़ने के लिए कोई अच्छी-सी जगह खोजना सबसे मुश्किल काम है, क्योंकि इतिहास पढ़ना दरअसल अन्याय और अत्याचार की कहानियां पढ़ना है. उसे कहीं भी पढ़ा जाए, बग़ीचे में या गर्मी के किसी दिन या बस में यात्रा के दौरान, उसे पढ़ते समय, ख़ुद के ख़ुशक़िस्मत होने पर हमेशा एक लज्जा को अनुभव होता है. शहर में बने मुर्दाघर का प्रतीक्षालय ही शायद सबसे सही जगह है, जहां बैठकर स्टॉलिन या पोल पॉट के बारे में पढ़ा जा सके.
अजब है कि कॉमडी पढ़ने के साथ भी यही मसला है. ऐसी जगह और परिस्थतियां खोजना जहां आप खुलकर हंस सकें, कभी आसान नहीं होता. मुझे याद है, बरसों पहले जब मैं न्यूयॉर्क की एक ठुंसी हुई लोकल ट्रेन में बैठा था, जोसेफ हेलर का कैच-22 पढ़ रहा था, थोड़ी-थोड़ी देर बाद ठहाके के साथ हंसने लगता था. उस समय सारे लोगों का ध्यान मेरी तरफ़ हो जाता.  एक या दो सहयात्री मुझे देख मुस्करा उठते, जबकि बाक़ी ज़्यादातर लोग मेरे हंसने से विचलित हो रहे थे.  दूसरी तरफ़, अगर देहात के निर्जन में बने एक ख़ाली और वीरान मकान में बैठकर, आधी रात,  डब्ल्यू.सी. फील्ड्स की जीवनी पढ़ी जाए और ठहाके लगाए जाएं, तो इसे भी यार लोग अजीब व्यवहार का ही नाम देंगे.
मैं कहीं भी बैठकर पढ़ूं, कुछ भी पढ़ूं, मुझे एक पेंसिल की दरकार होती है, पेन की नहीं. ख़ासतौर पर वह पेंसिल, जो अंगूठे बराबर बची हो, ताकि मैं शब्दों के ज़्यादा क़रीब पहुंच सकूं और सुगठित वाक्यों, सुंदर या मूर्खता से भरे विचारों, दिलचस्प सूचनाओं और शब्दों को रेखांकित कर सकूं.  हाशिए पर छोटी या विस्तृत टिप्पणियां लिखना मुझे पसंद है, प्रश्नचिह्न बनाना, सही का निशान बनाना या अपनी पसंद के पैराग्राफ्स के पास बहुत निजी किस्म के चिह्न बनाना, जिन्हें सिर्फ़ मैं ही समझ सकता हूं, या कभी-कभी तो मैं ख़ुद नहीं समझ पाता. किसी सार्वजनिक पुस्तकालय में जाऊं और वहां इतिहास की किसी किताब पर रेखांकित की गई पंक्तियां या हाशिए पर लिखी गई टिप्पणियां देख लूं, तो मुझे बहुत अच्छा लगता है. वहां पुस्तकों पर ऐसे लिखना प्रतिबंधित होता है, लेकिन इससे यह पता चलता है कि उस पाठक को लेखक से कोई शिकायत थी और वह उसे ज़ाहिर करने से ख़ुद को रोक नहीं पाया. या पिछले हज़ार बरसों में सभ्यता जिन दिशाओं की ओर मुड़ गई है, उसके मुड़ जाने से उसे शिकायत है.
वितोल्द गोम्ब्रोविच ने कहीं अपनी डायरी में कहा है कि हम किसी महान उद्देश्य के लिए नहीं लिखते, बल्कि अपना होना जताने के लिए लिखते हैं. यह सिर्फ़ कवियों और उपन्यासकारों के लिए ही सच नहीं है, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए है जो किताब के पन्नों का मूल रूप बिगाड़ता है या उन पर कुछ लिख देता है. जब मेरे मन में यह बात आती है, तो मैं किंडल और उस जैसे अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के प्रति लोगों के आकर्षण को नहीं समझ पाता. (प्रिय पाठक, मैं उम्मीद करता हूं कि आपकी ईबुक मुड़ी-तुड़ी होगी, उसकी स्क्रीन पर पुराने धब्बे होंगे,  उस पर कहीं चीनी के दाने भी चिपके होंगे और अंगूठे के निशान बने होंगे.) मुझे तो अपनी प्लेटो की किताबें पसंद हैं जिनके पन्नों की कोर मैंने मोड़ रखी हैं, अपनी फिलिप रॉथ पसंद है जिस पर कॉफ़ी के गिरने के निशान हैं और मैं बिल्कुल इंतज़ार नहीं कर पा रहा कि मैं कब जाऊं और शैरन ओल्ड्स का नया कविता-संग्रह ख़रीद लाऊं जिसे मैंने कल रात किताब की एक दुकान की खिड़की से झांकते हुए देखा है.
 
 
 
 

Wednesday, September 13, 2017

गीत चतुर्वेदी : दिल के क़िस्से कहां नहीं होते

(अब से 'सबद' पर हर पंद्रह दिन में कवि-कथाकार गीत चतुर्वेदी का यह कॉलम प्रकाशित होगा.)



जब से मैंने लिखने की शुरुआत की है, अक्सर मैंने लोगों को यह कहते सुना है, 'गीत, तुममें लेखन की नैसर्गिक प्रतिभा है।' ज़ाहिर है, यह सुनकर मुझे ख़ुशी होती थी। मैं शुरू से ही काफ़ी पढ़ता था। बातचीत में पढ़ाई के ये संदर्भ अक्सर ही झलक जाते थे। मेरा आवागमन कई भाषाओं में रहा है। मैंने यह बहुत क़रीब से देखा है कि हमारे देश की कई भाषाओं में, उनके साहित्यिक माहौल में अधिक किताबें पढ़ने को अच्छा नहीं माना जाता। अतीत में, मुझसे कई अच्छे कवियों ने यह कहा है कि ज़्यादा पढ़ने से तुम अपनी मौलिकता खो दोगे, तुम दूसरे लेखकों से प्रभावित हो जाओगे। मैं उनकी बातों से न तब सहमत था, न अब। 


बरसों बाद मेरी मुलाक़ात एक बौद्धिक युवती से हुई। उसने मेरा लिखा न के बराबर पढ़ा था, लेकिन वह मेरी प्रसिद्धि से परिचित थी और उसी नाते, हममें रोज़ बातें होने लगीं। हम लगभग रोज़ ही साथ लंच करते थे। कला, समाज और साहित्य पर तीखी बहसें करते थे। एक रोज़ उसने मुझसे कहा, 'तुम्हारी पूरी प्रतिभा, पूरा ज्ञान एक्वायर्ड है। तुम्हारा ज्ञान नैसर्गिक ज्ञान नहीं है।' उसके बाद कई दिनों तक हमारी बहसें इसी मुद्दे पर होती रहीं। बहसों का कोई हल नहीं होता। हममें इतना ईगो हमेशा होता है कि हम 'कन्विंस' होने की संभावनाओं को टाल जाएं।


लेकिन मुझे बुरा लगा था। एक्वायर्ड शब्द ही बुरा लगा था। इस शब्द के सारे संभावित अर्थों को जानने के लिए उस रोज़ घर लौटकर मैंने सारे शब्दकोश और थिसॉरस पलटे थे। मुझे एक भी नकारात्मक अर्थ नहीं मिला, लेकिन फिर भी मुझे बुरा लगा था। मुझे बुरा क्यों लगा था? इसका कारण समझने में मुझे कुछ बरस लग गए। जब मेरी प्रतिभा को नैसर्गिक कहा गया था, तो मुझे अच्छा लगा था। जब उसे एक्वायर्ड कहा गया, तो मुझे बुरा लगा। कारण हमारे सामूहिकसामाजिककलात्मक संस्कार थे। हमें बचपन से ही लगभग यह मनवा दिया जाता है कि श्रेष्ठताएं जन्मजात होती हैं। प्रतिभा जन्मजात होती है। बिरवा के पात चिकने हैं, यह बचपन में ही पता चल जाता है। हमें यही स्थिति सबसे अच्छी लगती है। श्रम से पाई गई, अर्जित की गई चीज़ों को, वह भी कला के संदर्भ में, अच्छा नहीं माना जाता। अभी पिछले हफ़्ते एक सज्जन कह रहे थे कि नेरूदा नैसर्गिक हैं, एक बार में कविता लिख देते थे, जबकि मीवोश को अपने क्राफ्ट पर बहुत काम करना पड़ता था, इसलिए वह कवि से ज़्यादा मिस्त्री हैं। 


प्रतिभाएं तो नैसर्गिक हो सकती हैं, पर क्या ज्ञान भी नैसर्गिक हो सकता है? चाहे बुद्ध हों या आइंस्टाइन, कोई भी जन्मजात ज्ञान लेकर नहीं आता। उसे ध्यान और अध्ययन दोनों की शरण में जाना होता है। दोनों में गहरा भाषाई रिश्ता है। निरंतर ध्यान ही अध्ययन बन जाता है। जो आप धारण करते हैं, उससे आपका ध्यान रचित होता है। इसी से बनती है मेधा। एक होती है प्रज्ञा। वह भी जन्मजात नहीं होती। आपकी मेधा से आपकी प्रज्ञा का विकास होता चलता है। प्रज्ञा, मेधा से चार क़दम आगे चलती है। मान लीजिए, आप किसी किताब के बीस पन्ने पढ़कर छोड़ देते हैं।  एक दिन आप पाते हैं कि आपके मन में वह पंक्ति या दृश्य गूंज रहा है, जो उस किताब के तीसवें पन्ने पर था, जिसे आपने पढ़ा ही नहीं था। यह प्रज्ञा का काम है। वह हमेशा उन भूखंडों में रहती है, जहां आपका अध्ययन व मेधा अभी तक नहीं पहुंचे हैं। इसीलिए योग में प्रज्ञा का विशेष महत्व है। मेधावी तो विद्यार्थी होते हैं, प्रज्ञा योगी के पास आती है। उसे भी प्राप्त करना होता है। एक्वायर्ड होती है।


पुरानी अंग्रेज़ी का एक मुहावरा है, जिसे हेमिंग्वे अपने शब्दों में ढालकर बारबार दुहराते थेप्रतिभा, दस फ़ीसदी जन्मजात गुण है और नब्बे फ़ीसदी कठोर श्रम। यह वाक्य नैसर्गिक व एक्वायर्ड, दोनों के एक आनुपातिक मिश्रण की ओर संकेत करता है। अगर वह नब्बे फ़ीसदी श्रम न हो, तो उस दस फ़ीसदी का कोई मोल न होगा। एक शेर याद आता है, जिसके शायर का नाम याद नहीं— 


दिल के क़िस्से कहां नहीं होते
मगर वे सबसे बयां नहीं होते।


पर इस मामले में मेरी मदद हेमिंग्वे से ज़्यादा अभिनवगुप्त ने की। आठनौ साल पहले मैंने उन्हें गंभीरता से पढ़ना शुरू किया था। ध्वन्यालोक के उस हिस्से में जहां वह सारस्वत तत्व की विवेचना करते हैं, सहृदय का निरूपण करते हैं, वहां वह प्रख्या और उपाख्या दो प्रविधियोंउपांगों का भी उल्लेख करते हैं। प्राचीन व अर्वाचीन विद्वानों ने इन दोनों शब्दों की भांतिभांति से व्याख्या की है, लेकिन मैंने इन्हें अपने तरीक़े से समझा है।


प्रख्या कवि की नैसर्गिक प्रतिभा है, उपाख्या उसका अर्जित ज्ञान है। प्रख्या दर्शन है। उपाख्या अभ्यास है। यहां अभ्यास का अर्थ सीधेसीधे प्रैक्टिस न समझ लें। अभ्यास यानी उस दर्शन को दृष्टि के व्यवहार में रखना। कवि में एक ऋषितत्व का होना अनिवार्य है। ऋषि शब्द को भी समझकर सुना जाए। यह इसलिए कह रहा कि याद आया, आठ-दस साल पहले जब कुंवर नारायण को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था, तो सबद पर एक टिप्पणी में मैंने लिखा था कि उनमें ऋषितत्व है। कुछ समय बाद हिंदी के एक कवि ने इस शब्द के प्रयोग के आधार पर मुझे दक्षिणपंथी और संघी आदि क़रार दिया और कहा कि ऋषि जैसा शब्द प्रयोग कर मैं कुंवर नारायण को आध्यात्मिक रंग दे रहा हूं। उस हिंदी कवि को ऋषि शब्द का अर्थ नहीं पता है, इसीलिए वह ऐसा लिख गया। कुंवर नारायण को पता है। इसलिए उन्हें पसंद आया था। पुरानी, वैदिक संस्कृत में ऋषि के दोतीन अर्थ होते हैं, लेकिन मूल अर्थ हैवह व्यक्ति जिसे बहुत दूर तक दिखाई देता हो। इसीलिए जब वेदों का उल्लेख होता है, तो ज्ञानी लोग 'मंत्रों के रचयिता' नहीं, 'मंत्रद्रष्टा' शब्द का प्रयोग करते हैं। कविता रची नहीं जाती, वह पहले से होती है, आप बस उसे देख लेते हैं, उसे उजागर कर देते हैं। उजागर करने की प्रक्रिया में बहुत श्रम लगता है। जैसे पत्थर के भीतर शिल्प होता है, अच्छा शिल्पकार उसे देख लेता है और पत्थर के अनावश्यक हिस्सों को हटाकर शिल्प को उजागर कर देता है। दृश्य हर जगह उपस्थि​त होता है, अच्छा फिल्मकार उसे देख लेता है, उसके आवश्यक हिस्से को परदे पर उतार देता है। बात वही हैदिल के क़िस्से कहां नहीं होते...। 


यह ऋषितत्व, देख लेने का यह गुण, प्रख्या है। उजागर करने की प्रक्रिया में लगने वाला श्रम उपाख्या है। रससिद्धांत की अच्छी समीक्षा करने वाले लोग भी इस भ्रम में पड़े रहते हैं कि सबसे बड़ा कलाकार वही होता है, जिसके भीतर जन्मजात गुण हो। बचपन से हमारे संस्कार ऐसे होते हैं कि हम जन्म से मिलने वाली श्रेष्ठताओं को ही वरीयता देते हैं। इसीलिए एक्वायर्ड शब्द या अर्जित श्रेष्ठताओं का महत्व हम नहीं समझ पाते। इसीलिए हम साधना के अध्यवसाय को नजरअंदाज़ कर चमत्कारों में यक़ीन करने लग जाते हैं। मेरे उस प्राचीन दुख का कारण यहीं कहीं रहा होगा। किसी एक को महत्वपूर्ण मान लेना, दूसरे को कम महत्व का मानना एक संस्कारी भूल है। श्रम की महत्ता को कम करने आंकने जैसा है। 


कवि की देह प्रतीकात्मक रूप से अर्धनरनारीश्वर की देह होती है। वह यौगिक है। दो तत्वों के योग से बनी हुई देह। अनुभूति व अभिव्यक्ति का योग। कथ्य व शिल्प का योग। अंतर व बाह्य का योग। प्रख्या व उपाख्या का योग। दाना व नादान का योग। जब कृति सामने आती है, तब यह पता नहीं लगाया जा सकता कि ये दोनों तत्व अलगअलग थे भी क्या। जैसे पानी पीते हुए हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का स्वाद आप अलगअलग नहीं जान सकते। हां, उसकी शीतलता और प्यास बुझाने के उसके गुण को जान सकते हैं। दोनों बहुत महत्वपूर्ण हैं। दोनों का संयोग महत्वपूर्ण है। इसीलए अभिनवगुप्त ने इस संबंध में कहा था-  सरस्वती के दो स्तनों का नाम है प्रख्या व उपाख्या। कलाकार यदि सरस्वती की संतान है, तो वह अपनी मां के दोनों स्तनों से दुग्धपान करता है।


क्या कोई यह बता सकता है कि कालिदास, ग़ालिब और नेरूदा में कितनी प्रख्या थी, कितनी उपाख्या थी? उनका नैसर्गिक ज्ञान कितना था व अर्जित ज्ञान कितना? हो सकता है, किसी रचनाकार के जिस ज्ञान को आप उसका नैसर्गिक ज्ञान मान रहे हों, वह उसने बरसों के अभ्यास से अर्जित किया हो? और जिसे आप उसका अर्जित ज्ञान मान रहे हों, वह उसकी स्वाभाविक प्रज्ञा से आया हो, उन भूखंडों से, जहां तक वह कभी गया ही न हो? रचनात्मकता का यह रहस्य कभी भेदा नहीं जा सकता। 


यहां ​अभिनवगुप्त का पानक याद आता है। यह पुराने ज़माने का कोई शर्बत है, जिसमें गुड़ भी होता है और मिर्च भी होती है। गुड़ और मिर्च, दोनों को अलगअलग चखा जाए, तो अलगअलग स्वाद मिलते हैं। लेकिन जब ईख से बने उस शरबत में इनका प्रयोग किया जाता है, तो एक अलग स्वाद मिलता है। वह तीसरा ही कोई स्वाद होता है। इसलिए कृति का स्वाद या रस, उसके इनग्रेडिएंट्स या उपांगों को देखकर नहीं जाना जाता, बल्कि कृति के संपूर्ण प्रभाव को देखने पर ज़ोर दिया जाता है। क्योंकि आपके पास वही आता है। हम तक नेरूदा और मीवोश के प्रभाव आते हैं, उनका होमवर्क नहीं आ सकता। 


अंग्रेज़ी में इसे गेस्टॉल्ट इफेक्ट कहते हैं। गेस्टॉल्ट जर्मन का शब्द है, जिसका अर्थ होता है संपूर्ण। आधुनिक दर्शन व मनोविज्ञान की एक पूरी शाखा गेस्टॉल्ट पद्धति पर आधारित है। यह पद्धति कहती है कि चीज़ों को उनके टुकड़ों में न देखा जाए, बल्कि उसे एक में देखा जाए। बहुलता को आधार अवश्य बनाया जाए, लेकिन बहुल के समेकित प्रभाव को जाना जाए। दाल को हल्दी, नमक, मिर्च, तड़का के अलगअलग उपांगों में बांटकर नहीं चखना चाहिए, उसके समेकित प्रभाव को जानना चाहिए। अंत में आपको 'एक' तक पहुंचना ही होगा। यही 'एक' है, जिसकी ओर शंकर ले जाना चाहते हैं, अभिनवगुप्त ले जाना चाहते हैं, और इसी 'एक' तक बुद्ध भी ले जाना चाहते हैं। बुद्ध में अद्वैत है। भरपूर है। इसका एक प्रमाण यह भी कि बुद्ध का एक नाम 'अद्वयवादी' भी है और यह नाम बुद्ध के जीतेजी प्रचलित हो चुका था। और इसी का उल्टा रास्ता पकड़कर चलें, तो देरिदा और बॉद्रिला के विखंडनवाद और संरचनावाद को समझ सकते हैं। प्राचीन भारतीय दर्शन 'बहुत से एक' की ओर ले जाता है, तो आधुनिक यूरोपीय दर्शन 'एक से बहुत' की ओर। 


तो जब कोई यह कहता है कि नेरूदा नैसर्गिक थे, क्योंकि वह एक बार में लिख देते थे और मीवोश को अपने क्राफ्ट पर मेहनत करनी होती थी, तो हंसी आ जाती है। क्योंकि तब यह पता चल जाता है कि कहने वाला 'बाल' है, वह अभी अपने 'बालपने' से नहीं निकल पाया है, भले सत्तर का हो गया हो। यह कैसे पता चलेगा कि किसी ने एक रचना एक ही बार में लिख दी या दस दिन की मेहनत से? और यह पता करने की ज़रूरत भी क्या है? रचना कैसी है, यह क्यों नहीं देखते? एक बार में लिख देने से भी श्रेष्ठ है तो भी अच्छी बात। चार बार लिखने के बाद भी श्रेष्ठ है, तो भी अच्छी बात। तथाकथित नैसर्गिक प्रतिभा से आई हो या तथाकथित एक्वायर्ड प्रतिभा से, रचना की श्रेष्ठता ही उसका गेस्टॉल्ट है। 


मध्ययुग के एक इतालवी कवि का किस्सा याद आता है : उसका समाज मानता था कि यदि कोई रचना एक ही बार में लिख दी गई हो, तो वह ईश्वरप्रदत्त है। यानी उस रचना की श्रेष्ठता निर्विवाद है। कलाकार हमेशा एक निर्विवाद श्रेष्ठता को पाना चाहता है। तो उस इतालवी कवि ने एक दिन घोषणा की कि मैंने यह लंबी कविता कल रात जंगल में प्राप्त की है, एक प्रकाशपुंज दिखा, और उससे यह कविता मुझ पर नाज़िल हुई। उसके समाज ने उस कविता को महान मान लिया। वह थी भी श्रेष्ठ कविता। कुछ समय बाद वह कवि मरा, तो एक स्मारक बनाने के लिए उसके सामान की तलाशी ली गई। वहां उसकी दराज़ों में उसी कविता के बारह या अठारह अलगअलग ड्राफ्ट मिले। वह उसे छह साल से लिखने की कोशिश कर रहा था। चूंकि उसका समाज वैसा था, एक निर्विवाद श्रेष्ठता पाने के लिए उसे दैवीय चमत्कार की कल्पना का सहारा लेना पड़ा। 
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Tuesday, June 06, 2017

महेश वर्मा की लम्बी कविता : रक़ीब


                                                                                                            तस्वीर: अनुराग वत्स 


रक़ीब


रक़ीब माशूका के ख़ाब में बुदबुदाता है 
और उस दोपहर मेरी नींद पर 
बर्फ़ जमी होती है 

मैं बर्फ़ के नीचे से अपना ख़ून आलूदा हाथ निकालकर 
किसी को बुलाना चाहता हूँ 
माशूका अपनी प्यारी चील को किशमिश खिला रही होती है

मुझे दो घड़ी की नींद चाहिये 
नींद के गैरहाज़िर ख़ुदा!
मुझे नींद चाहिये कि अपने ख़ाब का कोई दरवाज़ा खोलकर 
माशूका की नींद में सरक जाऊँ दबे पाँव

मुझे रक़ीब के हौसले और और अपने ख़ंजर की प्यास 
दोनों की फ़ितरत मालूम है 

***

हर बार की तरह उस एक बार भी 
मेरी पुकार और माशूका की तवज्जो में 
वही पुरानी निस्बत रहनी थी 
वो अपनी अंगड़ाई के ख़त्म पर 
काग़ज़ पर मेरा नाम लिखेगी या हथेली पर 
और मेरी पुकार के जवाब में बोलेगी : हाँ यहीं हैं 
फिर अपना ख़ाब बताएगी के रक़ीब के फ़रेब 
और एक क़ातिल हवा मेरे खून को गर्म कर देगी 

मुझे तेईस मुल्क के कारतूसों और 
तेरह मुल्कों की तलवारों और 
सत्रह मुल्कों के ज़हरों का अफ़साना मत सुनाओ 

अगर हो सके तो दुआ करो कि मुझे नींद जाए 
***

मैं एक वादे 
और टेलीफोन की घंटी के बीच 
बज रहा वक़्त हूँ मेरी जान  
जितनी बार तुम्हारी धड़कन से 
तुम्हारे सीने का सबसे ख़ूबसूरत तिल धड़कता है 
मैं उतनी ही बार मरने को तैयार फ़र्द हूँ चाँद !
मुझे अपने पास रक्खा करो 
***


रक़ीब के पास दिलफ़रेब अफ़साने हैं 
और मेरी नज़्मों की क़िताब के लफ़्ज 
बार-बार आंसुओं से धुल जाते हैं 

नज़्मों के दिन लौटेंगे बरखुरदार : बोलता बोलता बूढ़ा नजूमी 
मेरे आख़िरी सिक्के भी ठग लेगा
और फ़कीर दुआओं से ख़ाली अपना कासा 
मुझ पर उलीच देगा : सिक्के नहीं 
                : तो दुआ भी नहीं 

क्या यही तुम्हारे पुराने नगर का दस्तूर है 
ये पूछने से पहले 
मुझे तुम्हारे नयनों की याद बींध देगी 
और मैं अपने सवाल भूल जाऊंगा 

सबसे आसन लफ़्जों को भूलने की मौत 
और मुश्किल लफ़्जों से परहेज के इल्म के बीच 
मुझे रक़ीब के क़दमों की आहट सुनाई देगी 
और मैं इन्साफ़ के मौजूदा तरीके को मानने से इनकार कर दूंगा 

मुझे क़िताबों और पुराने चलनों के रियाज़ से बाहर की 
कोई बात बताओ अगर आये हो मेरे दोस्त !
मुझे नसीहत से अधिक नींद 
और सच से अधिक झूठ का जाम लाकर दो 
***


अगर तुम ये कहती हो कि सच का वक़्त ख़त्म हो चुका 
तो मुझे एक झूठ रचने का हुनर तुम्हें ही सिखा देना चाहिये था 

रक़ीब तुम्हारे तस्वीरख़ाने में रखी तस्वीरों के पीछे मुस्काता है 
और तुम बहाने से अपनी अल्बम बंद करने के सारे हुनर जानती हो 

मुझे एक बंद क़िताब की चुप्पी और 
कलम से बह रहे ख़ून में से कुछ चुनना नहीं था : तुम्हें मालूम है 
मुझे रकीब के सीने से बह रहे ख़ून की महक ही चुप करा सकती है 
                                       : ये भी तुम्हें मालूम है 
और तुम तो इतनी संगदिल हो मेरी जान 
कि मेरे ख़ाब में तुम्हारे तुम्हारे क़दमों की आवाज़ तक नहीं 
मुझे अपने ख़ाब में जगह दो मत दो 
मेरे ख़ाबों की पुकार पे ज़रा कान तो दो 
***

रक़ीब मेरी नींद की चादर चुराकर 
उसे धूप के खेतों में जला देता है 
मैं बेनींद की आँखों
धूप की चमकदार सफ़ेदी और धुएँ के बीच 
चीज़ों की जगह भूलता जाता हूँ 

यहाँ रखी थी माचिस 
यहाँ था नमक का मर्तबान 
यहाँ समेटकर रखे गए थे पुराने दुःख 
यहाँ रखे गये थे पागल अलफ़ाज़ 

लेकिन कोई चीज़ अपनी जगह पर क्यूं नहीं मिलती 

मेरे बिस्तर की जगह पर ताबूत रखी है 
मेरे इबादतख़ाने में कुफ़्र रखे हैं 
और तेज़ाब भरा है सुरमेदानी में 
***

ये सारी पहेलियाँ मैं पहली सुबह हल कर लूँगा 
और चीज़ें अपने मायनों में लौट जाएंगी 

मैं नींद की गोलियों की शीशी 
बस की खिड़की से बाहर फेंकने के सपने से बाहर 
फेंक दिया गया मुसाफ़िर नहीं हूँ नसीब 

ये बात बिलकुल साफ़ है कि क़त्ल रक़ीब ही का होना है
ख़ून मेरी ही आस्तीन के कफ़ पर लगना है
मुकाबला कभी कोई था ही नहीं 
चाँद को मेरे ही जाम में उतरना है 

फिर भी कोई शै है के मुझे उदास किये जाती है 
और उस शै का पता सिर्फ़ तुम्हें मालूम है.
***


                                                                                   सबद पर महेश की अन्य कविताएँ : यहाँ )

Saturday, May 27, 2017

कथा: १२ : सोने की गाय में बदलता एक देश : मनोज कुमार पांडेय


(इधर एक जिद सी पैदा हुई है भीतर कि उन चीजों पर लिखा जाय जो अभी घटित हो रही हैं। इनका कहानी के रूप में मूल्यांकन कैसा होगा मुझे पता नहीं। यह कहानी मानी जाएँगी कि नहीं यह भी नहीं पता। पर यह पता है कि इस सीरीज में मैं अभी बहुत सारी कहानियाँ लिखने वाला हूँ। ____  मनोज कुमार पांडेय )

तस्वीर : गूगल से 

सोने की गाय में बदलता एक देश 


यह कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है। आप हमसे बेहतर जानते हैं कि इसका हमारे देश में घट रही घटनाओं से कोई लेना देना नहीं है। इस कहानी का लेखक चौबीस कैरेट का देशभक्त है और गाय को अपनी माता मानता है। वह दिन में कम से कम पाँच बार पाकिस्तान को गाली देता है तथा नियमित रूप से पतंजलि पंचगव्य का उपयोग करता है।


    कहीं बहुत दूर बसे देश में एक जानवर होता था जिसे लोग गाय कहते थे। गाय एक सीधा सादा जानवर था। इसे लोगों ने बहुत पहले ही साध लिया था। यह घास खाता था और पानी पीता था। कभी कभी इसे खुश करने के लिए लोग अपने घरों के जूठन भी इसे दे आते थे। यह और खुश हो जाता था था। कुछ लोग इसे पवित्र जानवर मानते थे। वे अपने भोजन का पहला ग्रास हमेशा गाय के लिए निकालते और एक पवित्रता से भर जाते। गाय उस ग्रास को देर तक मुँह में चुभलाती रहती। अक्सर यह ग्रास उसके गले में चिपक जाता जिसे भीतर करने के लिए उसे भूसा खाना पड़ता। गाय भूसा खाते हुए इंतजार करती कि लोग आएँ और उसे दुहें। लोग गाय को माता मानते थे और उसके दूध को अमृत। माता का दूध अमृत होता है यह बात तो वह बछड़ा भी जानता था जो दूर बँधा दूध के लिए हुड़कता रहता था। यह बात गाय भी जानती थी पर उसे बताया गया था कि वह महान है और महानता हमेशा त्याग माँगती है।

    इस देश के बच्चों के इम्तहानों में अक्सर एक निबंध लिखने के लिए आता। इस निबंध का शीर्षक होता - ‘ एक कृषि प्रधान देश है’। यह निबंध कमजोर बच्चों को भी अक्सर जुबानी याद होता। वैसे भी इस निबंध के लिखने में किसी को कोई मुश्किल नहीं आती थी। एक कृषि प्रधान देश था यह इससे भी साबित होता था कि इस देश में किसान बड़ी संख्या में रहते थे। किसान बड़ी संख्या में रहते थे यह इससे पता चलता था कि देश में आत्महत्या करने वाली सूची में किसान नंबर एक पर थे। बाकी दुनिया में लोग अचरज में थे कि इस देश में किसान आखिर कितनी बड़ी संख्या में रहते हैं कि रोज रोज मरते रहने के बावजूद समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहे थे। इससे भी साबित होता था कि यह एक कृषि प्रधान देश था। यह इस बात से भी साबित होता था कि कई बार लोग गाय लिखते हुए किसान और किसान लिखते हुए गाय लिख देते थे और इससे अर्थ पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता था।

     जबकि दूसरी चीजों के मामले में यह अर्थ का मामला बदल जाता था। किसी को शेर कहो तो वह खुश हो जाता था जबकि शेर गाय खाता था और दूसरी तरफ किसी को गाय कहो तो उसे माता मानने वाले लोग भी आँखें तरेरते थे। गाय कहा जाने वाला व्यक्ति प्रेम या श्रद्धा से देखे जाने की बजाय दया से देखा जाता था। फिर भी लोगों को गाय बहुत पसंद थी। बहुतों को तो विवाह करने के लिए भी गाय ही चाहिए होती थी। यह अलग बात है कि यह गाय भी कभी कभी सींग या लात मारती थी पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। लोग उसकी नाक में छेद करके नकेल डाल देते और पैरों को बाँध कर उसे दुह ही लेते। कभी कभार वह और दिक्कत करती या कि दुहे जाते समय बछड़े पर उसका प्यार उमड़ आता तो पुत्र-भाव को मन में रखते हुए उस पर आठ-दस लाठियाँ बरसा दी जातीं। वह पहले से ही गाय होती। लाठियाँ खाने के बाद और ज्यादा गाय हो जाती।

एक कृषि प्रधान देश है यह बात गायों को भी पता थी। वे एक पीड़ादायी गर्व के साथ सदियों से यह बात जानती थीं कि उनके उन अभागे पुत्रों के दम पर ही कृषि प्रधान देश है जिन्हें पटक कर बैल बना दिया जाता है और फिर वे जीवन भर बैल बने रहते हैं। अक्सर उनकी आँखों में दिखाई देने वाला डँहका इसी दृश्य से पैदा होता था जो उनकी आँखों में गड़ता रहता था। फिर भी वह रोते हुए ही सही पर खुश रहतीं कि जैसे भी हो वह उनकी आँखों के सामने रहते हैं और वह जब मन करे उन्हें चाट सकती हैं। उनका मन कभी कभी उन बैलों को दूध भी पिलाने का करता था, आखिरकार वे माँ थीं और ममता की एक न समाप्त होने वाली भावना उनके भीतर हमेशा बहती रहती थी। तब उन्हें वह लाठियाँ याद आतीं जो कभी चोरी से अपनी बछिया या बछड़े को दूध पिलाने पर उन पर बरसी थीं। उन्हें बताया गया था कि चोरी करना बुरी बात है, अनैतिक है और जब माँ ही अनैतिक हो जाएगी तो उसकी उन संततियों का क्या होगा जो उसके दूध के दम पर पलती और बढ़ती हैं।

     गायें अक्सर चुप रहती थीं इसका यह मतलब नहीं था कि उन्हें कुछ पता नहीं था। वे पढ़ी लिखी नहीं थीं पर उन्हें आहार चक्र के बारे में पता था। उन्हें पता था कि गाय घास खाती है। उन्हें पता था कि शेर बाघ गाय को खा जाते हैं। वे अपने ऊपर कौओं का बैठना पसंद करती जो उनकी चमड़ी में चिपके परजीवी कीड़ों को खा जाते। ऐसे ही उन्हें यह भी पता था कि बहुतेरे इनसान गाय भी खा जाते हैं। उन्हें दुख होता पर इस दुनिया में यह उनके लिए एक स्वाभाविक चक्र था। ऐसे में अक्सर वे अपनी माँओं को याद करतीं जो जब बूढ़ी हो जातीं तो अक्सर रूखा सूखा कुछ भी खाने को डाल दिया जाता। वे बैल जो बूढ़े हो जाते हड्डाए हुए अपनी मौत का इंतजार करते।

      इस बीच गायों ने पाया कि यह चक्र बदल रहा था। बहुत सारे मशीनी बैल आ गए थे जिन्होंने बैलों को उनके काम से मुक्त कर दिया था। दो बैलों की कहानी में से एक बैल को निकाल बाहर कर दिया गया था। दूसरा बैल जिसका नाम किसान था वह हक्का बक्का इस स्थिति को देख रहा था और मशीनी बैल के साथ पूरी ताकत लगाकर दौड़ रहा था। शुरुआत में तो वह बहुत खुशी से दौड़ा। फिर उसे पसीने छूटे। वह हाँफने लगा और जल्दी ही बेदम होकर गिर पड़ा। उधर गायें पहले तो खुश हो गईं कि अब उनके बेटों और भाइयों को बैल नहीं बनना पड़ेगा। पर जल्दी ही उन्हें इस सच का पता चला कि स्थिति पहले से ज्यादा भयानक हो गई है। उनके बछड़ों को बाहर खदेड़ दिया गया। अब वे किसी काम के नहीं थे। उन्होंने किसानों से उनकी फसल में अपने पुरखों की मेहनत का हिस्सा माँगना शुरू कर दिया। किसान मशीनी बैलों के साथ दौड़ते हाँफते पहले ही बेदम हो चुके थे। उनके पास कुछ नहीं बचा था। उन्होंने अपने को प्रस्तुत कर दिया। बछड़े जो अभी तक उनसे लड़ने पर उतारू थे उनका माथा चाटने लगे।

      गायें अभी इस घटना को समझने की कोशिश ही कर रही थीं कि उन्होंने पाया कि उनके बहुतेरे मालिकों ने जो सैकड़ों और हजारों की संख्या में गाय पालते थे बछड़ों को सुई चुभोकर मार देना शुरू किया। गायों को कँपकँपी छूट गई। यह तो उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था। इससे अच्छा तो बैल बनकर खेत जोतना ही था। उधर एक दूसरी भी मुश्किल उनके सामने बड़े विकराल रूप में पसर रही थी। जब वे दूध देने लायक नहीं रहतीं तो उन्हें अपना चारा खुद जुटाने के लिए बाहर खदेड़ दिया जाता। वे इधर उधर भटकती रहतीं। उन्हें कई कई दिनों तक चारा नसीब न होता। वे माँ थीं, इस तरह की बातों पर शिकायत करने का उन्हें कोई हक नहीं था। वे करती भी नहीं थीं। पर कई बार भूख जोर मारती तो सड़कों पर, कूड़ाघरों की तरफ निकल जातीं और भक्ष्य-अभक्ष्य जो भी मिलता उसे खाकर अपना पेट भर लेतीं और उसे पचाने के लिए पगुराना शुरू कर देतीं। पर कई बार उनका भोजन इतना पौष्टिक होता कि वे पगुराते पगुराते जान भी दे देतीं फिर भी नहीं पचता।

    देश में लोकतंत्र था और गायों को भी वोट देने का अधिकार मिला हुआ था। यह अलग बात है कि इस देश के मनुष्यों की तरह गाएँ भी भाई-भतीजावाद से ग्रस्त थीं इसलिए वह अक्सर साँड़ों को वोट देती थीं जिन्हें वह अपना प्रेमी, पति, भाई, पुत्र और संरक्षक मानती थीं। बदले में साँड़ उन्हें हर बार वचन देते थे कि वे जो कुछ भी करेंगे बस गायों के लिए ही करेंगे। गायें इस बात पर इतनी खुश हो जाती थीं कि वह तब भी पगुराती रहती थीं जब उनके पेट में घास का एक तिनका भी नहीं होता था। कहा जाता है कि कभी न कभी तो घूरे के भी दिन बदलते हैं तो वे तो गायें थीं। अगले चुनाव में राजा पद के लिए जो प्रत्याशी अवतरित हुआ उसने कहा कि गायों के रक्षा उसके जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य है। भावी राजा की इस घोषणा से प्रभावित होकर लाखों ऐसे लोग सामने आए जिन्होंने गायों की रक्षा को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। अपने इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु वह किसी भी हद तक जा सकते थे। यह गायों के लिए बहुत खुशी के दिन थे। उनकी बड़ी बड़ी चमकती आँखों में खुशी के आँसू थे।

   यह जिस देश की कहानी है वह अतीत में कभी सोने की चिड़िया कहा जाता था। चुनाव के बाद नए राजा ने एलान किया कि उनका लक्ष्य देश को सोने की चिड़िया बनाना न होकर सोने की गाय बनाना है। चिड़िया मांसाहारी होती हैं। वे मासूम कीड़ों को खाकर उड़ जाती हैं। वे आदर्श प्रतीक नहीं हैं क्योंकि उन पर नियंत्रण नहीं रखा जा सकता। आदर्श प्रतीक वही हो सकता है जिस पर पूरी तरह से नियंत्रण रखा जा सके। इस लिहाज से गायें सबसे आदर्श प्रतीक हैं। इसलिए भी क्योंकि वे पूरी तरह से पवित्र हैं। पहले संतानोत्पत्ति आदि के सिलसिले में उनकी पवित्रता खंडित हो जाती थी। अब ऐसा नहीं है। अब हमारे लोगों ने यह काम पूरी तरह से सँभाल लिया है। अब उनकी नस्ल भी हमारे नियंत्रण में है। इसलिए अब हमने ठान लिया है कि हम इस देश को सोने की गाय बना कर रहेंगे।

   यह एक ऐसा देश था जो आदर्श होने की तरफ बढ़ रहा था इसलिए देश की मीडिया भी पूरी तरह से जागरूक और एक पवित्र कर्तव्य-बोध से भरी थी। उसने सवाल उठाया कि सोने की गाय ही क्यों? सोने का हाथी, शेर या कि गैंडा क्यों नहीं? राजा ने कहा कि उनका भाषण गौर से सुना जाय। इस सवाल का जवाब वह पहले ही दे चुके हैं। फिर उन्होंने मजाक में कहा कि हमें एक एक सीढ़ी आगे बढ़ना है। चिड़िया से गाय तक तो ठीक है पर सीधे हाथी बहुत ज्यादा नहीं हो जाएगा! यह कहकर वे बहुत जोर से हँसे। उनके साथ मीडिया भी हँसी और कई दिनों तक हँसती रही। इस हँसी से इतना पवित्र शोर फैला कि सभी तरह की गाएँ खुशी के मारे काँपने लगीं।

    नए राजा जो कहते थे वह करते भी थे। अगले ही दिन नए राजा ने एलान किया कि गायों के लिए एक नया मंत्रालय बनाया जा रहा है जो सीधे राजा के अधीन काम करेगा। उन्होंने राष्ट्रीय प्रतीक मंत्री को इस विभाग का उपमंत्री बनाया और एलान किया कि चूँकि यह बेहद संवेदनशील मुद्दा है इसलिए मंत्री कभी भी उनसे विचार विमर्श कर सकते हैं। मंत्री जी ने राजा से गहन विमर्श करने के बाद तय किया कि देश भर की सभी गायों की नए सिरे से गिनती कराई जाएगी। इसके बाद गायों के जन्म और मत्यु का एक वैज्ञानिक ग्राफ बनाया जाएगा। यह ग्राफ हमेशा अपडेट होता रहे इसके लिए जरूरी है कि हर गाय को एक निश्चित संख्या दी जाय जिससे उसकी पहचान संभव हो सके। यह पहचान पत्र हर गाय के माथे पर आपरेशन के द्वारा हमेशा के लिए लगा दिया जाना था। जिससे सभी गाएँ सीधे तौर पर मंत्रालय के डाटा सेंटर से जुड़ी रहतीं। इस पहचान पत्र में गाय की नस्ल, उसके द्वारा दिए जाने वाले दूध की मात्रा, उम्र और शरीर में उपलब्ध मांस का सही सही ब्यौरा दर्ज किया जाना था।

    इस महत्वपूर्ण परियोजना का ठेका राजा के एक विश्वस्त धन्ना सेठ को दिया गया जो कई पीढ़ियों से गायों के मांस, चमड़े, हड्डी आदि के व्यापार में लगा हुआ था और देश को बहुमूल्य विदेशी मुद्रा दिलवा रहा था। गायों के बारे में उससे बेहतर कोई नहीं जानता, राजा ने कहा। सभी लोगों ने सहमति में सिर हिलाया और राजा की जय जयकार की। अब देश को सोने की गाय बनने से कोई नहीं रोक सकता था। धन्ना सेठ ने एलान किया कि राष्ट्रीय प्रतीक की इस महत्वपूर्ण परियोजना में राजा से वह दो हजार की एक नई नोट तक नहीं लेंगे। वे इस योजना में लगने वाली धनराशि को इसी योजना से पैदा करेंगे। इतना ही नहीं इस पूरी प्रक्रिया को वह कुछ इस तरह से संचालित करेंगे कि बड़ी संख्या में रोजगार भी पैदा हो और लोगों को इस राष्ट्रीय महत्व की परियोजना से जुड़ने का सम्मान हासिल करने का मौका मिले।

    धन्ना सेठ ने मंत्री को विश्वास में लेकर सबसे पहले गौ सैनिकों की खुली भर्ती का एलान किया जो इस परियोजना को संभव बनाने वाले थे। फिर वह पहचान पत्र डिजाइन करवाया जो गायों के माथे पर आपरेशन के द्वारा लगाया जाना था। इसके बाद गौ सैनिकों को इस काम पर लगा दिया गया कि वह गायों के माथे पर एक निश्चित अवधि के भीतर पहचान पत्र लगा दें। चूँकि न तो गौ सैनिकों को इस काम का कोई अनुभव था न ही गायों को इसलिए बड़ी संख्या में गायें खेत रहीं। धन्ना सेठ ने प्रतीक मंत्री को इस चीज के लिए बधाई दी और कहा कि ये गायें कमजोर और बूढ़ी थीं इसलिए राष्ट्रीय प्रतीक होने की पात्रता नहीं रखती थीं। पर एक दूसरे तरीके से वह हमारी इस योजना के काम आएँगी। उनका मांस, हड्डी और चमड़ा बेचकर इस संसाधन के लिए धन एकत्र किया जाएगा और इन गायों को वही सम्मान दिया जाएगा जो महान देश भारत की परंपरा में दानवीर शिवि और दधीचि का है।

     अगला नंबर साँड़ों का था। साँड़ों का यूँ भी खेती-किसानी में कोई काम नहीं रह गया था। बल्कि वे फसलों के दुश्मन ही थे। कई बार तो वे अपनी ताकत के नशे में गायों को भी चोट पहुँचाते थे। फिर भी गायें राजा के इस कदम से हिल गईं। जब बड़ी संख्या में साँड़ धरे-पकड़े जा रहे थे तो गायों का एक प्रतिनिधि मंडल राजा से मिलने पहुँच गया। राजा ने प्रेम और धैर्य से उनकी समस्या सुनी और कहा कि किसी भी प्रतीक को अपनी समस्या बताने या प्रतिनिधि मंडल लेकर आने का कोई हक नहीं है। फिर भी चूँकि वे उदार और लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए राजा हैं इसलिए उन्होंने गायों की बात सुनी। अब गायों को भी यह जानना चाहिए कि हम यह कदम गायों की सुरक्षा के लिए ही उठा रहे हैं। हमें गौ सैनिकों से खबर मिली है कि कई जगहों पर साँड़ों ने गौ पालकों और गायों को चोट पहुँचाई है। हम यह बर्दाश्त नहीं कर सकते। यह ठीक है कि वे गायों के कुल से आते हैं पर वे कुलघाती हो गए हैं। उन्हें इस बात की सजा मिलेगी। उन्हें इस बात के लिए बाध्य किया जाएगा कि मरने के बाद ही सही पर वे गायों के लिए काम में आएँ।

     तय पाया गया कि उनका मांस इस देश के लोग तो खा नहीं सकते क्योंकि वह माता के कुल से हैं इसलिए उस मांस को उन देशों में निर्यात कर दिया जाएगा जो उन्हें खाते हैं। इस तरह से गो कुल की हत्या का पाप भी बँट जाएगा। उनकी हड्डियों से बनी खाद खेतों में जाएगी और देश की कृषि व्यवस्था में अपना योगदान देगी। इससे उन किसानों के नुकसान की भी भरपाई हो जाएगी जिनकी फसलें इन साँड़ों ने चौपट की होंगी। किसान फायदे में आएँगे तो यह बात गायों के लिए भी फायदे की होगी। उन्हें बढ़िया चारा मिलेगा। इसी तरह इन साँड़ों की खालें गौ सैनिकों के काम आएँगी। वे इन खालों को पहनकर गायों के बीच गायों के भेस में ही मौजूद रहेंगे। यह गायों की अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था होगी।

     उधर गौ सैनिकों को चार पैरों पर चलने की ट्रेनिंग दी जा रही थी। उन्हें सींगों और खुरों का उपयोग सिखाया जा रहा था। मनोवैज्ञानिक एक और तरह से उन पर काम कर रहे थे। उन्हें कुछ इस तरह से ट्रेनिंग दी जा रही थी कि साँड़ की खाल पहनने के बाद वह भीतर से साँड़ जैसा महसूस करें। तब गायों के साथ उनका ज्यादा अपनापा बनेगा और वे गायों की हिफाजत के लिए न किसी की जान लेने से डरेंगे और न ही अपनी जान देने से। उन्हें बताया गया था कि उन्हें हर हाल में गायों की रक्षा करनी है, यही बात उनके लिए एकमात्र कानून और धर्म है। इसके रास्ते में अन्य जो कानून आएँ उन्हें वे बेहिचक तोड़ सकते हैं। गौ सैनिक जिस गति से यह सब सीख रहे थे और नई स्थितियों के अनुरूप अपने को ढाल रहे थे बहुत संभव था कि बहुत जल्दी ही वह असली साँड़ों में बदल जाने वाले थे। मदद के लिए उन्हें नियमित तौर पर पूँछवर्धक पेय दिया जा रहा था।

  उधर असली साँड़ परेशान थे। उन्हें समझ में ही नहीं आ रहा था कि उनके साथ हो क्या रहा है। वे क्रोध में इधर उधर बिफरते हुए घूमते। आखिर उन्होंने आपस में तय किया कि इतनी आसानी से हार नहीं मानेंगे। वे गौ सैनिकों के खिलाफ लड़ेंगे। पर यह लड़ाई कायदे से एक दिन भी नहीं चल पाई। साँड़ों को लड़ाई के जो तौर तरीके आते थे वह सब बेकार साबित हो रहे थे। वे पूँछ खड़ी करके नथुने फुफकारते हुए अपने पैरों से जमीन को खोदते कँपाते आगे बढ़ते कि तब तक उनका काम तमाम हो जाता। उनकी पूँछ उठती कि काट ली जाती। उनकी पूँछ से बने कई पूँछवर्धक पेय पदार्थ बाजार में उतार दिए गए थे जिनके नियमित सेवन से सदियों पहले गिर कर कहीं खो गई पूँछ फिर से उग आनी थी। असली साँड़ नकली साँड़ों से हार रहे थे।

  बाद में जब गौ सैनिकों के लिए खालें कम पड़ गईं तो गायों की अनुमति से कुछ और गायों से उनकी खाल का दान माँगा गया। यह गायों की सुरक्षा का सवाल था और इसमें राजा अपनी तरफ से कोई कमी नहीं रखना चाहता था। गायों की हिचक पर राजा ने उन्हें बताया कि जैसे सभी युद्ध शांति की स्थापना के लिए किए जाते हैं वैसे ही गायों की रक्षा के लिए बहुत सारी गायों का मारा जाना जरूरी था जिससे कि गौ रक्षकों के लिए पर्याप्त मात्रा में गौ कवच तैयार किए जा सकें। इस तरह से धीरे धीरे जब गायें बहुत कम हो गईं तो देश के किसानों को इस बात की छूट दी गई कि वे चाहें तो अपना पंजीकरण गाय के रूप में करा सकते हैं। इस तरह गायों को मिलने वाली सभी सुविधाएँ और सुरक्षा पा सकते हैं। बाद में राजा ने अपनी कल्याणकारी योजनाओं में इस योजना को प्रमुखता से गिनाया कि उन्होंने किसानों को गाय होने का हक दिया जो कि इस राज्य के इतिहास में पहली बार संभव हुआ है।

    राजा की बातें सभी लोग अच्छी तरह से समझ सकें इसके लिए बहुत बड़ी मात्रा में गोबर चाहिए था जो लोगों के दिमागों में भरा जा सके। यह जिम्मेदारी देश की मीडिया को सौंपी गई जिसने पूरी ईमानदारी से अपने काम को अंजाम दिया। उसने गोबर को तरंगों में बदल दिया था। अब यह गोबर न सिर्फ आँखों और कानों के रास्ते बल्कि सभी संभव रास्तों से इनसानी दिमागों में अपनी वाजिब जगह ले रहा था। बहुतेरी जगहों पर तो अंदर भी गोबर था पर ऐसे लोगों की भी कमी नहीं थी जिनके दिमागों में पढ़ाई-लिखाई और अपसंस्कृति का कचरा पहुँच चुका था। गोबर उन्हें तेजी से बाहर निकाल रहा था और उनकी जगह खुद ले रहा था।

    गायों को संरक्षण देकर देश को सोने की गाय बनाने वाली इस योजना के साल भर पूरे होने पर देश की राजधानी में एक बड़े समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर राजा की इस योजना में प्राण-प्रण से लगे धन्ना सेठ ने बताया कि यह योजना अभूतपूर्व रूप से सफल हो रही है। गायों के मांस और हड्डियों से हमें बड़ी मात्रा में सोना हासिल हो रहा है। इस सोने का बड़ा हिस्सा गौ-संवर्धन में खर्च किया जा रहा है। एक मूर्ख पत्रकार के यह पूछने पर कि गायों के संवर्धन के लिए गायों को भला मारना क्यों पड़ रहा है राजा ने कहा कि यह नीतिगत मसला है जो देश की सुरक्षा से जुड़ा है इसलिए इसका जवाब अभी नहीं दिया जा सकता। हाँ धन्ना सेठ ने जरूर इस बात का स्पष्टीकरण दिया कि हम तो मरी हुई गायों का मांस बेचते हैं जिन्हें मशीनें मारती हैं और मशीनों पर इनसानी कायदे भला कैसे लागू किए जा सकते हैं।

   उसी रात आयोजित रात्रिभोज में राजा ने धन्ना सेठ से हुई एक ऑफलाइन बातचीत में हँसते हुए बताया कि वह बनाना तो सोने का हाथी ही चाहते थे पर उसमें कई दिक्कतें थीं। पहली यह कि हाथी संख्या में बहुत कम हैं। दूसरे उन पर नियंत्रण रखना मुश्किल काम है। तीसरी यह कि वह एक विपक्षी दल का चुनाव निशान बनकर पहले ही पतित हो चुका है। और सबसे आखिरी और जरूरी यह कि उसकी खाल ओढ़ना गौ सैनिकों के लिए बहुत ही मुश्किल काम होता। तो वह बनाना तो सोने का हाथी चाहते थे पर मुश्किल यह थी कि घुटनों के बल पर जाने के बाद गौ सैनिक हाथी तो क्या हाथी के बच्चे भी नहीं दिखते। सदा गंभीर रहने वाला धन्ना सेठ इस बात पर बहुत देर तक हँसता रहा। उसका साथ देने के लिए राजा भी देर तक हँसा। हँसते हुए राजा को अचानक से खाँसी आ गई। फिर धन्ना सेठ देर तक राजा की पीठ सहलाता रहा।

   उधर गाय थी जो बेबस यह सब देख रही थी। माथे पर जड़े हुए पहचान पत्र से उसका सिर दुखता रहता। कुछ गायों ने दीवाल में या किसी पेड़ आदि पर माथा रगड़ते हुए पहचान पत्र से मुक्ति पानी चाही तो उनका यह कदम राष्ट्रद्रोह माना गया। उन्हें सजा में फाँसी दी गई ताकि दूसरी गायों के लिए यह सबक हो। जब राष्ट्र की प्रतीक गाय ही राष्ट्र की अवज्ञा करेगी तब यह राष्ट्र भला कैसे चलेगा। गायों को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें। वे तो यह भी नहीं समझ पा रही थीं कि उन्हें प्रेम और अपनेपन से सहलाने और उनकी देखभाल करने वाले हाथ अब डरे डरे से क्यों लगते हैं। उनमें वह सिहरन भला कहाँ से आ गई? वह कुछ भी न समझ पातीं। उनकी बड़ी बड़ी निर्दोष आँखें हमेशा पनियाई रहतीं। उनके कान हमेशा हिलते रहते। वह बस घास खाती और दूध देती किसी तरह से अपना जीवन बिता रही थीं।

   आखिरकार वह गाय ही तो थीं! उन्हें पता ही नहीं था कि इस देश में उनकी हैसियत इतनी बदल चुकी थी। वे एक ताकतवर राष्ट्रीय प्रतीक में बदल चुकी थीं। उनका नाम लेकर किसी का भी सिर धड़ से अलग किया जा सकता था। वैसे अगर उन्हें यह बात पता चल भी जाती तो भला वे कर क्या लेतीं! और रही उस देश के लोगों की बात तो इसके पहले गाय शब्द सुनकर उनके मन में एक ऐसे सीधे सादे जानवर की छवि बनती थी जिसके प्रति उनके मन में कहीं गहरा कृतज्ञता बोध था। पर देश को सोने की गाय बनाने वाली इस महान परियोजना के बाद गाय शब्द सुनते ही उन्हें कँपकँपी होती और उनके सामने एक ऐसे जानवर की छवि आती जिसने सदियों का अपना भोजन चारा खाना छोड़ दिया था। अब वह इनसानों का मांस खाती थी और खून पीती थी। विडंबना यह थी कि इस सब में उस बेचारी गाय की कोई गलती नहीं थी।
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(लेखक हिन्दी के चर्चित कहानीकार हैं। 
सबद पर यह उनकी पहली कहानी। 
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