Wednesday, December 27, 2017

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 6 : कविता में अगन पड़ी है





संयोग है कि मेरा संवाद अक्सर युवाओं के साथ होता है. प्रश्न से भरे युवा. ऐसे ही कुछ युवाओं के आग्रह पर आज का यह कॉलम शब्द, अर्थ व आनंद के बुनियादी सवाल को छुएगा. कला की दुनिया के कुछ आधारभूत प्रश्न कभी नहीं बदलते. हज़ार साल पुराने कवि के सामने जो बुनियादी प्रश्न थे, वही सौ साल पुराने कवि के सामने भी थे और लगभग वही प्रश्न आज के कवि के सामने भी हैं. प्रश्न भले पुराने हों, लेकिन उनसे उपजी बेचैनियाँ मौलिक व अद्वितीय होती हैं. हर कवि को क्रमिक विकास की अवस्थाओं (इवॉल्यूशन) को पार करना होता है. जीवन और विज्ञान में एक गारंटी होती है कि बनमानुस एक बार मानुस बन गया, तो उसकी आने वाली तमाम पीढ़ियाँ हमेशा मानुस ही बनती रहेंगी. कला में ऐसा नहीं हो पाता. कलाकार को हर जीवन में बनमानुस से मानुस बनने की यात्रा करनी होती है. अपने साथ जुड़े इस बनको खुरचकर निकालना एक बड़ा संघर्ष है. मानुस बन जाने के बाद भी बनकी स्मृति को संजोकर रखना होता है, क्योंकि कला में इस स्मृति का महत्तम प्रयोग होता है. इसीलिए कलाकार आधारभूत प्रश्नों से आरंभ करता है. पाँच पीढ़ी पहले का कवि जिन मुद्दों से जूझते हुए अपनी यात्रा शुरू करता था, हमारे समय के कवि को भी अपनी यात्रा वहीं से शुरू करनी होती है. अगली पीढ़ी के कवियों को भी हीं से आरंभ करना होगा. अपने प्रश्नों के उत्तर ख़ुद खोजने पड़ते हैं. दूसरों के दीपक हमें एक सीमा तक ही रोशनी दे पाते हैं. अपना दीपक ख़ुद बनना पड़ता है. हम सब पुरानी पीढ़ियों के अनुभवों को पढ़ते हैं, उनसे राब्ता बनाते हैं और वे हमारे निजी अनुभवों को गढ़ने में थोड़े-बहुत मददगार भी साबित होते हैं, लेकिन अंतत: आग से अपनी उंगली ख़ुद ही जलानी पड़ती है. स्वर्ग कैसा भी हो, उसे देखने के लिए ब्रह्मा की मँझली बेटी मृत्यु के आगे हाथ जोड़ना ही पड़ता है. हर तरह की मृत्यु. आंशिक व अर्धमृत्यु भी. क्षण का स्वर्ग देखना है, तो क्षण की मृत्यु पानी होगी.

ऐसा ही एक सवाल बार-बार सामने आता है कि क्या कविता सीखी जा सकती है? क्या वह सिखाई जा सकती है? भाषा, शब्द व अर्थ के साथ व्यवहार की एक बुनियादी प्रतिभा तो होनी ही चाहिए. मैंने अपने पहले कॉलम में इस पर बात की है. इस बुनियादी प्रतिभा का कोई सबूत नहीं होता. बस, महसूस हो जाती है. पढ़ने वाले को भी. लिखने वाले को भी. अपना एंटीना खुला रखना होता है. लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें कविता कभी सिखाई-समझाई नहीं जा सकती. उनका हृदय समंदर जैसा दिखता है. आप उस पर कंकड़ फेंकते हैं कि छप् की ध्वनि के साथ यह डूब जाएगा. लेकिन जैसे ही कंकड़ वहाँ गिरता है, छप् की जगह टन् की आवाज़ आती है. उनके हृदय का समंदर पारदर्शी काँच से ढँका हुआ होता है. जब तक काँच टूटेगा नहीं, कंकड़ अंदर डूबेगा नहीं. वह रहनीय हृदय नहीं होता, महज़ एक दर्शनीय हृदय होता है.

इतिहास में इसके लिए प्लेटो से बड़ा कोई उदाहरण नहीं दिखता. वह चिंतक थे. दार्शनिक थे. राजनीतिज्ञ थे. उनका लिखा पढ़िए, लगेगा, एक अनमोल साहित्य पढ़ रहे हैं, लेकिन कविता उनके पल्ले नहीं पड़ती थी. कविता का सहज सौंदर्य भी उन्हें छू नहीं पाता था. इस क़दर बैर से भरे रहते थे कि उन्होंने कई बार कवियों व कविता के ख़िलाफ़ लिखा। कहते थे, कवियों को शहर से निकाल देना चाहिए. उन्हें कविता से इतनी चिढ़ क्यों थी, यह साहित्य के इतिहास की सबसे बड़ी अबूझ पहेलियों में से है.

जब-जब मैं प्लेटो के बारे में सोचता हूँ, मुझे संस्कृत साहित्य से एक उदाहरण याद आता है. दसवीं-ग्यारहवीं सदी में राजा भोज हुए थे. मध्यप्रदेश के धार में उनकी राजधानी थी. हाल के बरसों में जिन इलाक़ों में मैं घूमता-फिरता रहा हूँ, वह उन्हीं के राज्य की सीमा में आता था. कहते हैं कि इस शहर भोपाल का नामकरण उन्हीं के नाम पर हुआ था. पहले भोजपाल था. फिर भोपाल हो गया. इसके पुख़्ता प्रमाण नहीं मिलते, बस मान्यता है. राजा भोज ख़ुद भी माने हुए कवि थे. उनकी सरस्वतीकंठाभरणआज भी संस्कृत साहित्य के अध्येताओं को आकर्षित करती है. उन्होंने एक बार राजकीय आदेश पारित किया था कि जिन लोगों को कविता समझ में नहीं आती, उन्हें मेरे राज्य में रहने का अधिकार नहीं है,  वे मेरी सीमा से बाहर निकल जाएँ. उनके राजकवि बल्लाल ने उनके जीवन पर एक किताब लिखी थी- ‘भोजप्रबंध’. ऐसे वर्णन उस किताब में मिलते हैं.

जीवन व कविता को लेकर ये दोनों भयंकर अतिवादी रवैये हैं. एक बेहद शक्तिशाली दार्शनिक है, जो चाहता है कि कवियों को राज्य से निकाल दिया जाए. दूसरी ओर, एक बेहद शक्तिशाली राजा है, जो कहता है कि केवल कवि व कविमना ही मेरे राज्य में रह सकते हैं, बाक़ी कोई नहीं रह सकता. प्लेटो के रिपब्लिक में रहना है तो कविता बंद कर दो. भोज के राज्य में रहना है, तो कविता सीख-समझ लो. इतिहास अजब पहेली है. सनकी इंडीविजुअल्स ने उसकी दिशा कई बार बदली है.

सल्वादोर देश के स्पैनिश भाषी कवि रोके दाल्तोन की एक काव्य-पंक्ति है-  रोटी की तरह कविता भी सबके लिए होनी चाहिए.’ रोटी, भोजन का पर्याय है, लेकिन इस पंक्ति में कविता का क्या अर्थ है? वह कौन-सी कविता है, जो सबके लिए हो सकती है? क्या सभी लोगों में कविता को समझने की अर्हता होती है? रोटी या भोजन तो सब करते हैं, लेकिन कविता क्या सब पढ़ते हैं? क्या कविता सबके काम आती है? क्या कविता सब तक पहुँचती है? यदि वह सब तक नहीं पहुँचती, तो इसमें कविता का दोष है? या पहुँचकर भी  जिसकी पकड़-समझ में नहीं आ रही, उसका कोई दोष है? रोटी की एक स्पष्ट उपयोगिता है, क्या कविता को भी उपयोगितवादी दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए? विश्वयुद्ध की विभीषिकाओं से बेहद निराश होकर पोलिश महाकवि मीवोश ने 1945 में एक कविता में पूछा था- “वह कविता किस काम की, जो लोगों व देशों को बचा न सके.” मनुष्य स्वभाव से ही उपयोगितावादी है. हर चीज़ की उपयोगिता खोजता है. संभव है कि यहाँ से बातचीत बिल्कुल अलग दिशा में मुड़ जाए, पर मैं उस तरफ़ नहीं जाऊँगा.

कविता समझ में आए, आनंदित करे, इसके लिए समझने वाले के भीतर भी एक योग्यता होनी चाहिए. सबके लिए लिखी गई कविता भी सबको समझ में नहीं आती. आ भी जाए, तो सबको पसंद नहीं आती. कविता को कैसे पढ़ा जाए, कैसे उसमें प्रविष्ट हुआ जाए, यह बहुत ‘ट्रिकी’ सवाल है. मैं पहले भी परिहास में कहता रहा हूँ, अब भी कहूँगा, कि जिस तरह कुछ जगहों पर फिल्म अप्रीसिएशन कोर्स चलाया जाता है ताकि फिल्मों की समझ विकसित की जा सके, उसी तरह कुछ जगहों पर पोएट्री अप्रीसिएशन कोर्स भी चलाया जाना चाहिए, जो यह समझा सके कि किसी कविता को किस तरह समझा जाए, कविता की सराहना आख़िर किस तरह की जाए. लेकिन कोर्स होने से ही समझ में आ जाए, यह भी गारंटी कहाँ है? फिल्म अप्रीसिएशन कोर्स में कम ही लोग जाते हैं, फिल्म की समझ सभी अपने-अपने तरीक़े से विकसित करते हैं. उसी तरह कविता की सराहना के तरीक़े भी सबके अलग-अलग हो सकते हैं.

प्राचीन युग की सब बातें अच्छी नहीं थीं, लेकिन कुछ बातें बहुत अच्छी थीं, जो कि आज नहीं हैं. जैसे, उस ज़माने में कविता की समझ विकसित करना बुनियादी शिक्षा का अंग था. हालांकि शिक्षा सबके लिए सुलभ नहीं थी, फिर भी विभिन्न क़िस्म की कलाओं की शिक्षा घर पर भी मिल जाती थी. कला के मायने प्राचीन भारतीय संदर्भों में अलग हैं. कला का जो अर्थ आज प्रचलित है, तब उससे कहीं ज़्यादा व्यापक था. हर वह काम जिसमें कौशल की दरकार होती थी, उसे कला के दायरे में शामिल कर लिया जाता था. इसीलिए विभिन्न लेखकों द्वारा गिनाई गईं कला की सूचियाँ (मसलन चौंसठ कलाएँ, चौहत्तर कलाएँ, चौरासी कलाएँ) अलग-अलग होती थीं. शब्द, छंद व अर्थ से जुड़ी कोई न कोई कला सभी सूचियों में कॉमन होती थीं. कवि-शिक्षा का एक अर्थ कवियों को मिलने वाली शिक्षा ही नहीं, बल्कि कविता समझने की शिक्षा से भी लिया जा सकता है. हमारे यहाँ स्कूलों में कविता पढ़ाई जाती है. यूँ कहें कि बच्चों की शिक्षा ही कविता से आरंभ होती है. उन्हें नर्सरी राइम्स रटाई जाती हैं, जो कि एक तरह की कविता ही हैं. उसके बाद भी उनमें से अधिकांश बच्चों में कविता के प्रति कम ही आकर्षण होता है. जब बड़ी कक्षाओं में जाते हैं, तब पढ़ी जाने वाली कविताओं का अर्थ याद कराया जाता है. परीक्षा में कविता का अर्थ पूछा जाता है. कविता पीछे छूट जाती है. अर्थ आगे-आगे चलने लगता है. फिर एक दिन अर्थ भी छूट जाता है. शिक्षक कविता का अर्थ बताते हैं, कविता का आनंद नहीं बता पाते. पढ़ाने का यह तरीक़ा ही बड़ा गड़बड़ है. अर्थ का दबाव आनंद को दबाता है. इस तरह कविता को भी दबा देता है. अर्थ भी ज़रूरी है, किंतु आनंद कहीं बड़ा हासिल है. आनंद आएगा, तो आप चार अर्थ बना लेंगे. लेकिन सिर्फ़ अर्थ पर ज़ोर देंगे, तो आनंद भी चला जाएगा.

साहित्य की भूमि तीन धाराओं से उपजाऊ बनती है. शब्द, अर्थ व आनंद. शब्द व अर्थ, गंगा व यमुना की धाराओं की तरह हैं. कोरी आँख से भी दिखते हैं. गंगा को समझ लो, तो यमुना को भी समझा जा सकता है. लेकिन आनंद की धारा तो सरस्वती की तरह है. दिखती नहीं है. बस महसूस होती है. कुछ लोगों को नहीं महसूस होती, तो वे उस धारा की उपस्थिति से ही इनकार कर देते हैं. जबकि वह है. और सबसे ज़रूरी धारा है. भारतीय संस्कृति में कई सरस्वतियाँ अनुपस्थित होकर भी उपस्थित बनी रहती हैं. दो तार्किक तत्वों के जल के बीच, भाव का जल छिपा हुआ ही रहता है. पुराने युगों में इसी आनंद को रस कहा जाता था. कविता की श्रेष्ठता को कई बार यही अदृश्य धारा परिभाषित करती है.

अंग्रेज़ी में तो ख़ैर अब भी बहुत सारी किताबें छपती हैं, जिनमें कविता लिखने के हुनर सिखाए जाते हैं, और एमएफए जैसे कोर्स भी होते हैं. कवि-शिक्षा से संबंधित सुंदर किताबें प्राचीन संस्कृत साहित्य में भी मिलती हैं. ऐसी ही एक किताब है अभिनवगुप्त के शिष्य और ग्यारहवीं सदी के महान कवि क्षेमेंद्र की कविकण्ठाभरण’. किन लोगों को कविता नहीं सिखाई-समझाई जा सकती, इसके बारे में यह किताब बहुत स्पष्ट शब्दों में कहती है। इन लोगों को नहीं सिखाई जा सकती

1- जिनका स्वभाव पत्थर जैसा कठोर है. रत्ती-भर स्निग्धता जिनमें नहीं है.

2- वह व्यक्ति जिसकी प्रतिभा व्याकरण की क्लिष्टता के कारण या किसी और कष्ट के कारण नष्ट हो गई हो.

3- जो बहुत ज़्यादा तार्किक हो, तर्कों की आग से झुलसा रहता हो, उनके धुएँ से धूमिल हो चुका हो.

4- जिसने अपने से पहले के अच्छे कवियों की कविताएँ न सुनी-पढ़ी हों.

इनके अलावा बाक़ी लोगों को कोशिश व अभ्यास के ज़रिए कविता के संस्कार दिए जा सकते हैं. ज़रूरी नहीं कि उच्च-स्तरीय कविता, बल्कि कम से कम साधारण, निम्न-स्तरीय, लफ़्फ़ाज़ी की कविता. यह कविता इफ़रात में होती है. चारों तरफ़ इसका बोलबाला होता है. उच्च-स्तरीय कविता का रस ग्रहण करने के लिए जिस बौद्धिक वैभव की ज़रूरत होती है, वह अमूमन श्रोता-पाठक में नहीं होती. उसे द्वितीय श्रेणी की कविता में ही वांछित आनंद मिलने लगता है और वह भी मान्य हो जाती है. हर युग में कविता इस तरह श्रेणियों में बँटी होती है. इसलिए हर युग में इस बात पर बहस होती है कि कविता किसे माना जाए.

प्लेटो यक़ीनन तीसरी क़िस्म का व्यक्ति था. बहुत अधिक तार्किक था. न्यूटन भी यही था. वह भी कविता का बहुत विरोध करता था. तर्क कविता से दूर ले जाता है. कविता से दूर होने लगें, तो तर्क से मिली झुलसन भी दिखने लग जाती है. यही समस्या वर्तमान युग के साथ भी है. पाठक ही नहीं, कवि भी तर्कों की आँच से झुलसे हुए हैं. सहृदय होने का अर्थ यह नहीं है कि आप हमेशा प्रकृति-प्रेम या सुकुमारिता में ही लगे रहें, बल्कि एक अर्थ यह भी है कि आप निहुरकर बिंबों की नई संभावनाओं का संधान करें, कोमलताओं को बचाते हुए कठोरताओं का भी आलिंगन करें. सहृदय एक बहुत सुंदर शब्द है, न केवल शब्द है, बल्कि एक पूरी दृष्टि दे सकता है. इस शब्द के गहरे अर्थों तक पहुँचा जाए. कविता के संदर्भों में अनुभूतियों व तर्कों दोनों को मान दिया जाए. पलड़ा अनुभूति की ओर झुका हुआ हो. तर्क कम से कम हों. बौद्धिक दिखने वाली कविता भी बुद्धि का छलावरण धारण कर अनुभूति की ओर ही बढ़ती है. मुक्तिबोध क्या कम तार्किक थे? फिर भी उनके यहाँ चाँद का मुँह टेढ़ा है. अब अगर तर्कशील सोसायटी का कोई सदस्य खड़ा होकर कहे कि चाँद का तो मुँह ही नहीं होता, टेढ़ा होने का सवाल कहाँ से आ गया? तो यक़ीनन, उसे क्षेमेंद्र द्वारा बताई गई तीसरी श्रेणी में एडमिशन देना होगा. तब तो संस्कृत की वही उक्ति कहनी होगी : अरसिकेषु कवित्व निवेदनम शिरसि मा लिख मा लिख मा लिख. इस सुभाषित में कवि, ब्रह्मा से प्रार्थना कर रहा कि हे चतुरानन, मेरे भाग्य में चाहे जो लिखो, मैं सह लूँगा, पर किसी अरसिक के सामने कविता पढ़नी पड़े, हे देवता, मेरे माथे पर यह ना लिख ना लिख ना लिख.

हम सभी जानते हैं कि कवि की यह प्रार्थना ब्रह्मा अब तक नहीं मान पाए हैं.

ज़ाहिर है, कविता के लिए तथ्यानुयायी नहीं, हृदयानुयायी होना ज़रूरी है. इक्कीसवीं सदी के इस युग में हमें यह बार-बार याद करना चाहिए कि कविता हृदय की प्रजा है. श्रेष्ठ काव्य के लिए बुद्धि चाहिए होती है, लेकिन हृदय की अनुपस्थिति श्रेष्ठता में कोई मदद नहीं कर पाएगी. कविता के लिए जिस दृष्टि की आवश्यकता होती है, वह बुद्धि व हृदय के संगम से बनती है. दृष्टि का बर्तन दर्शन की राख से माँजा जाता है. चिंतन के पानी से धोया जाता है. यह सब न हो, तो कविता में एक अदृश्य अगन पड़ जाती है. भावनात्मक व चिंतनात्मक अगन, जो कविता को नष्ट करती है. शाब्दिक अगन तो दिखाई पड़ जाती है, अर्थ की अगन भी शब्दों को बार-बार देखने से पता पड़ जाती है, लेकिन यह जो दृष्टि की अगन है, भावनात्मक-चिंतनात्मक, वह जल्दी दिखती नहीं. जिस तरह कविता भाषा में लिखी जाती है, लेकिन भाषा में पूरी तरह पकड़ी नहीं जाती, उसी तरह कविता की समस्याएँ भी पूरी तरह भाषा की पकड़ में नहीं आ पातीं, उनका अहसास ज़रूर हो जाता है. कवि-शिक्षा या कवि का अभ्यास, इसी अहसास को पकड़ पाने का अभ्यास भी होता है. तर्क का बेपरवाह उपयोग कविता को क्षतिग्रस्त करता है. कई बार कुछ अतार्किक पंक्तियाँ जोड़ देने से कविता खड़ी हो जाती है, तो कई बार तर्कों का प्रयोग करने से कविता भहरा भी जाती है.

अगन क्या है? कविता में अगन पड़ना, मध्य-युगीन काव्य का एक मुहावरा है. शास्त्रीय कम है, लोक में अधिक प्रचलित रहा. यह अगन, अग्नि ही है. ऐसा कह लें कि आग से लगी हुई गाँठ. ऐसी लपट, जिससे आसपास की पंक्तियाँ या पूरी कविता ही झुलस जाती है और जीवन में भी उसका उल्टा परिणाम दिखने लगता है. शब्दों के लापरवाह युग्म से दो अर्थों का प्रजनन होता है, एक अर्थ तो वह जो कवि चाहता है, दूसरा अर्थ वह जिसके बारे में कवि ने सोचा भी न हो, ग़लती से वह पैदा हो गया और जो कि पूरी तरह नकारात्मक हो. कविता की अगर कोई देवी होती है, तो कविता में पड़ने वाली अगन के नकारात्मक या नुक़सानदायी अर्थ को वह पहले ग्रहण करती है. यक़ीनन, यह उस देवी का निजी विट या ह्यूमर होगा. मध्य-युगीन काव्य में कविता में अगन पड़ने के ढेरों उदाहरण-लतीफ़े-क़िस्से-लोकश्रुतियाँ भरी पड़ी हैं. मैं यहाँ एकाध की चर्चा करूंगा, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि आख़िर यह अगन है क्या बला?

शाहजहाँ के दरबार में एक कवि थे सुंदरदास. बड़ा मान था. यमक और अनुप्रास की निराली छटाएँ. बादशाह ने आदेश दिया कि शृंगार पर कुछ लिखें, तोसुंदरशृंगारनामक काव्य की रचना की. इसमें उन्होंने एक छंद बनाया, जिसकी एक पंक्ति है-

सुंदर कोप नहीं सपने अरु जो भयो सो मन ही में विलानो.

आज की हिंदी में इसका अर्थ है- सुंदर को सपने में भी क्रोध (कोप) नहीं आता और अगर आ गया, तो वह क्रोध मन ही मन विलीन भी हो जाता है. कहते हैं कि इस पंक्ति वाला छंद लिखने के बाद सुंदर की हालत ख़राब हो गई. जब भी वह सोते, उन्हें सपना दिखता कि कोई उन्हें चप्पल मार-मारकर पीट रहा है. कई रातों तक यह सपना आता रहा, तो वह आतंकित हो गए. सोने से ही डरने लगे. लगातार जागते रहने से उनकी तबीयत बिगड़ गई. एक दिन कोई मित्र मिलने आया और उनकी हालत देखकर चिंता व्यक्त करने लगा. सुंदर कवि ने सारा हाल सुनाया. मित्र ने सुझाव दिया कि अपना कवित्त फिर से जाँचो, कहीं कोई अगन पड़ी है. अपना पूरा कवित्त जाँचने के क्रम में उनकी नज़र इस पंक्ति पर पड़ी और उन्होंने सिर पकड़ लिया. वह युग था, जब कविताएँ ज़ोर-ज़ोर से उच्चार कर पढ़ी जाती थीं. इस पंक्ति का उच्चारण किया जाए, तो एक अलग ही अर्थ बनता था क्योंकि उच्चारण में शब्द अधिक चिपकते हैं - सुंदर को पनहीं सपने.... इतने में रेड़ लग गई. पनही का अर्थ होता है चप्पल. तो अर्थ यह बना कि सुंदर को सपने में पनही पड़ती है. सुधारकर उन्होंने कोपकी जगह रोसलिखा और मुसीबत टली. कवि ने ज़रा-सी लापरवाही की, अर्थ बदला और कविता में अगन पड़ी. कविता में अगन पड़ेगी, तो छित्तर पड़ेंगे.  छित्तर, चप्पल का पंजाबी शब्द है. और जिस मज़ेदार तरीक़े से कवि पर पड़ी थी, उसके लिए छित्तर शब्द ही मौजूं लगता है.

एक कवि थे केशवदास. प्रेम पर क्या कमाल चीज़ें लिखीं. उनकी कल्पनाएँ बेलगाम होकर उड़ती हैं. इतनी गझिन कल्पनाएँ कि ओर-छोर पकड़ने में बहुत समय लग जाए. इसीलिए केशव को कठिन कवि माना जाता है. कल्पना, कवि की मित्र है, किंतु औचित्य का भी ध्यान रखा जाना चाहिए. केशव ने नहीं रखा और कविता में अगन पड़ी. उनकी एक पंक्ति है-

मखतूल के तूल झुलावत केसव भानु मनो सनि अंक लिये.

इसका अर्थ बताने के लिए पूरे छंद का संदर्भ बताना होगा. दृश्य है कि नायक-नायिका एक उपवन में हैं, एक-दूसरे के प्रति सुंदर शब्दों का उच्चारण करते हुए विपरीत रति (वुमन ऑन टॉप) में संलग्न हैं. नायिका के गले में बड़ा-सा माणिक है और उसके ठीक बीच में नीलम जड़ा हुआ है. यानी लाल रंग का घेरा, उसमें काला या काले-जैसा-नीला छोटा घेरा. नायिका की प्रणय-गति से वह माणिक-नीलम युग्म लहरा रहा है. कैसे लहरा रहा? जैसा ऊपर की इस पंक्ति में कहा गया है- मखतूल यानी काले रेशम के धागे से एक झूला बना हुआ है और उसमें सूर्यदेव (यानी बड़ा माणिक) अपने पुत्र शनिदेव (यानी छोटा नीलम वाला घेरा) को गोद में लिए बैठे हुए हैं. पड़ गई अगन. अभिसार-दृश्य में पिता-पुत्र के झूला झूलने की उपमा या उत्प्रेक्षा कौन पंडित वैध बताएगा? मणियों के रंग को औचित्य देने की कोशिश में उपमा का औचित्य भंग हो गया. कहते हैं कि इसके बाद देवी केशवदास से रुष्ट हो गईं और बोलीं, ‘प्रेम-प्रसंग में ऐसी उल्टी बातें सिर्फ़ प्रेत सोचते हैं. तू प्रेतबुद्धि है. जब तू मरेगा, प्रेत बनेगा. तेरी मुक्ति सरल न होगी.’ प्रेम-धुनि से प्रेत-योनि तक की इस यात्रा के कारण समकालीन या परवर्ती पंडितों ने केशवदास को ‘कठिन काव्य का प्रेत’ कहा है. केशव जब प्रेत बने, तो उनकी मदद के लिए तुलसीदास को दौड़े आना पड़ा था. वह अलग कहानी है. किसी और प्रसंग के लिए बचाए रखते हैं.    

इस तरह के कई क़िस्से हैं. कोई छत्रपति शिवाजी के राजकवि भूषण से जुड़ा हुआ है, तो कोई उनके बड़े भाई मतिराम से, तो कोई उनके भी बड़े भाई कवि चिंतामणि से, जो औरंगज़ेब के दरबार में कवि थे. ये सारे क़िस्से बरसों से लोक में प्रचलित हैं. साहित्यिक लतीफ़ों की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं. साहित्य की मेरी अधिकांश पढ़ाई अनौपचारिक किंतु शास्त्रीय तरीक़ों से हुई है, मैंने जो कुछ सीखा-जाना है, उसका अधिकांश विभिन्न भाषाओं में लिखे शास्त्रों व ग्रंथों से आता है, और उन्हीं से यह भी जाना है कि लोक में गहरा विश्वास रखो. जितना सम्मान शास्त्र का करते हो, उतना ही लोक का भी करो. इसीलिए मैं लोककथाओं, लोकोक्तियों, लोक में प्रचलित क़िस्सों-लतीफ़ों को मान देता हूँ, भले उन्हें ‘मक्षिका-स्थाने-मक्षिका’ जैसा शब्दश: न मान पाऊँ. इन उदाहरणों में भी मैं क़िस्सा-तत्व को पूरी तरह नहीं मान पाता, लेकिन उन क़िस्सों की आड़ में ये लतीफ़े, शब्द व अर्थ की गड़बड़ियों को लोक-सम्मत परिहास-बोध के साथ बताने में पूरी तरह समर्थ हैं, यह ज़रूर मानता हूँ.

कविता में अगन यह होती है. शास्त्रीय पदबंधों में इन्हें अलग तरह से व्यक्त किया जाता है. औचित्यचर्चा एक तरह से अगन की पहचान करना ही है. शब्द व अर्थ की अगन तो दिख जाती है, लेकिन वह जो तीसरी धारा है, आनंद की सरस्वती, जो कि अदृश्य है, उसकी अगन का क्या? जब धारा ही नहीं दिख रही, तो उसकी अगन कैसे दिखेगी? ज़ाहिर है, जिस तरह यह तीसरी धारा महज़ महसूस की जाती है, उसी तरह इसकी अगन भी सिर्फ़ महसूस की जा सकती है. यहाँ पर कवि का विवेक व अभ्यास काम आता है. विवेक व अभ्यास, दोनों सतत विकसनशील तत्व हैं. कवियों में एक आम मान्यता है कि कविता किसी तैयारी से नहीं लिखी जाती, बल्कि वह तो अपने आप आती है, स्पार्क की तरह आती है. अचानक कोई छवि कौंधती है, कोई बिंब, शब्द या स्मृति कौंधते हैं, प्रकाशित हो जाता है या कवि को प्रकाशित कर देता है, फिर कवि, कविता लिखता है, अपने शब्दों व पंक्तियों को माँजता है. आमतौर पर ऐसा या इससे मिलता-जुलता माना जाता है. 

1924 में नेरूदा ने बहुत सुंदर तरह से कहा था, तब वह महज़ बीस साल के थे— “मैंने अपने आत्म से प्रस्थान करने का निर्णय लिया है, यह एक तरह का महाभिनिष्क्रमण है. मेरे लिए सर्जना, शब्दों को प्रकाश से भर देने की इच्छा है.” यह बहुत बड़ी पंक्ति है. शब्दों को प्रकाश से वही भर सकता है, जो ख़ुद प्रकाशित हो. संबोधि की तलाश में बुद्ध द्वारा किए गए गृहत्याग को महाभिनिष्क्रमण कहा जाता है यानी ग्रेट डिपार्चर. लगभग वही बात नेरूदा कह रहे हैं. प्रकाश दोनों को चाहिए. प्रकाशित होना व प्रकाशित करना, दोनों का लक्ष्य है. आत्म से प्रस्थान किए बिना आत्म की तलाश संभव नहीं. इस बात को मुक्तिबोध किन्हीं दूसरे शब्दों में कह गए- साहित्य में रहना है, तो साहित्य से संन्यास ले लो.

सिर्फ़ यह मानकर बैठ जाना कि कविता एक स्पार्क की तरह आती है, जब आएगी, तब आएगी--- पूरी तरह सही नहीं कही जा सकती. प्रकाशित होने व प्रकाशित करने की इस इच्छा का कवि के भीतर होना बहुत ज़रूरी है. बारिश की प्रतीक्षा कर रहा किसान साथ-साथ अपने खेत व बीजों को तैयार कर रहा होता है. कविता भले स्पार्क से आए, बारिश की तरह आए, अपनी मर्ज़ी से आए या कोई बाहरी शक्ति उसे कवि पर नाज़िल कर दे- कुछ भी मान लीजिए, लेकिन इस बीच कवि को अपनी तैयारी करनी होती है, अभ्यास करना होता है. गायक व संगीतकार घंटों रियाज़ करते हैं. चित्रकार रियाज़ में अपनी स्केचबुक भर देते हैं, रंगों का विभिन्न तरह से प्रयोग करते हैं, क्रिकेटर नेट में बॉल को नॉक करता है, लेकिन कवि? वह किस तरह रियाज़ करता है? बिना भटके तो बुद्ध को भी ज्ञान नहीं मिला था, कवि कहाँ-कहाँ भटकता है? भटकाव भी एक रियाज़ है. गद्यकारों को पढ़ा होगा, वे हमेशा अपनी मेज़ पर बैठते हैं, भले कुछ लिख न पाएँ. मार्क ट्वेन ने अपने बारे में कहा था कि मैं दो घंटे सोचने के बाद दो कॉमा लगाता हूँ, फिर दो घंटे और सोचकर वे दोनों कॉमा हटा देता हूँ. गगन गिल ने अपने एक संस्मरण में कहा था- निर्मल जी लिखते कम, काटते ज़्यादा थे. यह एक तरह का अध्यवसाय है. इसे किन्हीं अर्थों में रियाज़ भी कह सकते हैं. संगीत में राग आदि पहले से तय होते हैं. संगीतकार को हर बार एक ही चीज़ करनी है और परफेक्ट बनना है. कवि को हर बार अलग-अलग चीज़ करनी है, फिर भी परफेक्ट बनना है. हर बार नया करने के लिए भी नयेपन का सतत अभ्यास चाहिए. यहाँ फिर नेरूदा याद आते हैं, जिन्होंने 1954 में एक साक्षात्कार में कहा था— “मैं किताब-दर-किताब ख़ुद को पीछे छोड़ रहा हूं. अपनी शैली व अर्थ को नई संरचना दे रहा हूँ. अगर नेरूदावाद नाम की कोई चीज़ है, तो मैं उसका सबसे बड़ा विरोधी हूँ.” यह नयापन अपने आप नहीं आता. कवि चाहे बीस साल का हो या सत्तर साल का, यह रियाज़ उसे हमेशा चाहिए.

हर कवि का रियाज़ अलग तरह से होता है. इसका कोई प्रेस्क्रिप्शन नहीं होता. कोई बहुत किताबें पढ़ता है, तो कोई बहुत सारी चीज़ें लिखता है, कोई लोगों के बीच समय बिताता है, तो कोई अपने एकांत में चिंतन करता है. और देखा जाए, तो ये सभी चीज़ें ज़रूरी हैं. कवि का एक हिस्सा पेड़ की जड़ जैसा होना चाहिए. ज़मीन के नीचे रहने वाली जड़, पानी की तलाश में, अपनी क्षमतानुसार, दूर तलक जाती है. वह पानियों में भेदभाव नहीं करती. निर्मल जल से भी अपने लायक़ रस ले लेती है, तो मलिन जल से भी.

आधुनिक कविता बहुत विकसित हो गई है. आगे बढ़ चुकी है. प्राचीन भारतीय रस-सिद्धान्त सच में प्राचीन पड़ चुका है. उसे शब्दश: पूरी तरह नहीं माना जा सकता. इसलिए आज के युग में उसकी उसी तरह चर्चा करना या उसकी लकीर पीटना मुझे कहीं से संगत नहीं जान पड़ता, लेकिन उसमें कई ऐसी चीज़ें हैं, जिन्हें हम आज के नए कला-मूल्यों, काव्य-संदर्भों के अनुसार माँजकर अपने पक्ष में प्रयोग कर सकते हैं. यह भी किसी कवि का एक रियाज़ होगा.

अगर हिंदी की समकालीन कविता पढ़ी जाए, तो कई जगहों पर अगन पड़ी दिखाई दे सकती है. मैं बीसवीं सदी या समकालीन कविता से कोई उदाहरण नहीं देने वाला. मुझे ‘पंडितों’ के ‘कोप नहीं’ सहने. पहले ही बहुत सहता आया हूँ.  लेकिन अगर आप कविता को ग़ौर से पढ़ते रहे हों, या ख़ुद कविता लिखते रहे हों, तो आधुनिक संदर्भों में इस नज़रिये को भी ध्यान में रखा जा सकता है. साहित्य की तीसरी धारा, जो कि अदृश्य है, वह यक़ीनन मज़बूत ही होगी.


(गीत चतुर्वेदी के पिछले कॉलम यहां पढ़ें)

Tuesday, December 12, 2017

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 5 : सारे रास्ते बीच में होते हैं





पिछले दिनों कुछ ऐसे संयोग बने कि दो कवियों पर बार-बार लिखना-बोलना पड़ा। मुक्तिबोध का जन्मशताब्दी वर्ष हाल ही में गुज़रा है। जिस तरह के राजनीतिक-सामाजिक हालात बनते जा रहे हैं, मुक्तिबोध लगातार और प्रासंगिक होते जा रहे हैं। इसलिए लिखत-बोलत में मुक्तिबोध के प्रसंग आना स्वाभाविक भी है, ख़ासकर इसलिए भी कि वह मेरे प्रिय कवि हैं और मैं उन लोगों में शामिल हूं, जो उन्हें हिंदी का सबसे बड़ा कवि मानते हैं। दूसरे, कुँवर नारायण, हमारी भाषा के एक और महान कवि, जिनका अभी तीन सप्ताह पहले 90 साल की उम्र में निधन हुआ। दोनों बार-बार अपनी ओर बुलाने वाले, और प्रविष्ट हो जाने के बाद बार-बार चुनौतियाँ देने वाले कवि हैं।
मुक्तिबोध के बारे में, रज़ा फाउंडेशन द्वारा आयोजित ‘युवा-2’ के तहत, बोलने का अवसर मिला था। मैं मुक्तिबोध को हिंदी कविता पर पड़ने वाली एक विशाल स्पॉटलाइट की तरह देखता हूं। उनसे पहले न उन-सा कोई कवि हुआ, न उनके बाद। एक ऐसा अद्भुत कवि, जिसके पूर्वजों का सही-सही पता हम नहीं बता पाते, जिसके वंशजों का कहीं कोई निशान नहीं खोज पाते। हम भले मुक्तिबोध को एक परंपरा में शामिल करें, उनकी एक परंपरा भी बना दें, जोकि होना-बनना लाज़िमी है, लेकिन वह परंपरा ठीक मुक्तिबोधीय शैली में विकसित नहीं हो पाती। उनके बाद के कुछ कवियों को उनकी परंपरा में खड़ा करने की कोशिश की जाती है, लेकिन साफ़ दिखता है कि वह फाउल प्ले है। उनके जैसा कोई नहीं है। वह अनूठे हैं। वह मध्य बिंदु हैं। पूरी हिंदी कविता को दो भागों में विभाजित करने वाले। उनके पहले की कविता। उनके बाद की कविता।
मुक्तिबोध की जिस बात को सबसे ज़्यादा उद्धृत किया जाता है, वह यह कि हमें अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने ही होंगे। इस पंक्ति की रोशनी में मैं सोचता हूं कि आख़िर ख़ुद मुक्तिबोध ने अभिव्यक्ति का कौन-सा ख़तरा उठाया था? क्या उन्होंने ऐसी कविताएँ लिखी थीं कि उन पर हमले हों? उनका घर जला दिया गया हो? उनके हाथ-पैर तोड़ दिए गए हों? परसाई पर तो इस तरह के हमले हुए थे। और भी कुछ लेखकों पर हुए थे। तो क्या परसाई व बाक़ी अन्य ने अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाए थे, जो कि ख़ुद मुक्तिबोध ने नहीं उठाए, जबकि कहते बार-बार थे? क्या अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाना इतना सरलीकृत कृत्य है कि आप पर हमले होने लग जाएँ? आप पर हिंसा होने लगे? किसी को गाली दे दीजिए, खिझा दीजिए, तो एक रोज़ वह अपने दल-बल के साथ आप पर हमले करेगा ही, तो क्या गाली देने व खिझाने को अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाना माना जा सकता है? नहीं मान सकते। मानेंगे, तो वह एकांगी व सरलीकृत बात होगी।
मुक्तिबोध को चाहे जो कह लीजिए, उन्हें एकांगी व सरलीकृत कहना पाप होगा। फिर मुक्तिबोध ने अभिव्यक्ति का कौन-सा ख़तरा उठाया था? उनके इर्द-गिर्द लिखी हिंदी आलोचना में इसका कोई स्पष्ट व कन्विन्सिंग उत्तर नहीं मिलता। मैं मुक्तिबोध की कविता को दो रचनात्मक ध्रुवों के मिश्रण की तरह देखता हूं। और अपने इस सवाल का जवाब पाने की कोशिश करता हूं। और इसके लिए मैं एक उदाहरण देना चाहता हूं, जो कि फिजिक्स से है। बहुत मशहूर उदाहरण है।
सन् 1704-05 के आसपास एक वैज्ञानिक हुए न्यूटन, जिन्होंने रिसर्च के बाद कहा कि प्रकाश एक कण है। न्यूटन के तर्क व प्रमाण बहुत शक्तिशाली थे, इसलिए उनके युग के विज्ञान ने उनकी बात को मान लिया। “प्रकाश कण है” इस मान्यता को आधार बनाकर विज्ञान अपनी सारी रिसर्च करने लगा और हम जानते हैं कि उस सदी में विज्ञान कहीं नहीं पहुंचा।
क़रीब सौ साल बाद, एक और वैज्ञानिक आया, उसका नाम था टॉमस यंग। उसने भी लंबी रिसर्च की और न्यूटन के सारे तर्कों को ध्वस्त कर दिया। उसने कहा, प्रकाश कण नहीं, तरंग है। उसकी बातें व प्रमाण इतने शक्तिशाली थे कि उसके युग के विज्ञान ने उसकी बात को मान लिया। “प्रकाश तरंग है” इस मान्यता को आधार बनाकर विज्ञान अपनी सारी रिसर्च करने लगा और हम जानते हैं कि उस सदी में भी विज्ञान कहीं नहीं पहुंचा।
सौ साल और बीत गए, एक नया वैज्ञानिक आया, उसका नाम था अल्बर्ट आइंस्टाइन। वह बैंक में क्लर्क था। नौकरी के बाद बचे घंटों में रिसर्च करता था। उसने भी बहुत लंबी रिसर्च की और कहा कि प्रकाश कण भी है और तरंग भी है। प्रकाश दोनों है। उसे दोनों में से कोई एक-भर मान लेना ऐतिहासिक चूक है। उसका व्यवहार दोहरा है। उसे दोनों मानना होगा। आइंस्टाइन ने तब तक की पूरी सोच को ही ध्वस्त कर दिया था। ज़ाहिर-सी बात है कि उनके तर्क, प्रमाण व नतीजे इतने ताक़तवर थे कि समकालीन विज्ञान को उनकी बात माननी ही पड़ी। “प्रकाश कण भी है और तरंग भी है” इस मान्यता को आधार बनाकर विज्ञान अपनी सारी रिसर्च करने लगा और हम जानते हैं कि उसके बाद के बरसों में विज्ञान ने जितनी तरक़्क़ी की, उतनी कभी नहीं की थी। आइंस्टाइन की सोच ही अपने आप में एक चमत्कार है। विज्ञान की भाषा में इसे वेव-पार्टिकल डुएलिटी (कण-तरंग द्वैत) कहा जाता है। और यही द्वैत, प्रकाश के संदर्भ में कण-तरंग के अद्वैत (नॉन-डुएलिटी) को भी प्रतिष्ठित कर देता है। जैसे ही विज्ञान ने इस द्वैत व अद्वैत को समझा, हमारा जीवन बदल गया। विज्ञान ने बड़ी-बड़ी खोजें कीं। जिस कंप्यूटर पर बैठकर मैं यह सब लिख रहा हूं, उसके बनने में आइंस्टाइन की उस सोच की भी भूमिका है। जिस मोबाइल पर आप यह सब पढ़ रहे हैं, उसके बनने में भी उनकी उसी सोच की ही भूमिका है।
यह हुई फिजिक्स की बात। अब बात करेंगे मेटाफिजिक्स की। कविता एक तरह से मेटाफिजिक्स का ही हिस्सा है। मुक्तिबोध की विचारधारा बहुत स्पष्ट थी। वह मार्क्सवादी थे। इस पर किसी को संदेह नहीं। वह संभवत: काफ़्का को नापसंद करते थे और अस्तित्ववाद के प्रति उनमें ख़ास तरह का संकोच व परहेज़ था। पर इतने बरसों में यह भी लगभग ज़ाहिर हो चुका है कि हिंदी में काफ़्का का कोई योग्य बौद्धिक सहोदर हुआ, तो वह स्वयं मुक्तिबोध थे। दोनों के पास दु:स्वप्न का संत्रास है। दु:स्वप्न का संत्रास, बीसवीं सदी के साहित्य में व्याकरण की तरह इस्तेमाल होता है। दु:स्वप्न का संत्रास एक अस्तित्ववादी उपकरण है। जिस लेखक के भीतर दिखेगा, उसे अस्तित्ववादी उपकरण की तरह ही पहचाना जाएगा, मार्क्सवादी उपकरण की तरह नहीं। और यही कारण था कि उनमें अस्तित्ववादी प्रवृत्तियों की खोज कई आलोचकों ने की जिनमें रामविलास शर्मा प्रमुख रहे। नामवर सिंह ने उनके तर्कों को काटा और लगभग बताया कि मुक्तिबोध में अस्तित्ववाद नहीं है। हिंदी में इस पर बहुत बहसें हो चुकी हैं और मेरा मंतव्य उन बहसों में जाना नहीं है, क्योंकि न तो मैं मुक्तिबोध को मार्क्सवादी साबित करना चाहता हूं और न ही अस्तित्ववादी। क्योंकि ये दोनों बातें पर्याप्त सिद्ध हैं। और यदि उनकी कविता पढ़ी जाए, तो स्वयंसिद्ध दिखेंगी। समस्या यहीं है कि या तो उनकी कविताओं को मार्क्सवादी माना जाता है या कुछ लोग उन्हें अस्तित्ववादी मानते हैं। बात घूमकर वहीं पहुंची- प्रकाश को या तो कण माना जा रहा था या तरंग। प्रकाश कण भी है और तरंग भी है, यह बात मानने में समय लगा था। उसी तरह क्या मुक्तिबोध की कविता को दोनों माना जा सकता है? मेरी नज़र में उनकी कविता दोनों है, क्योंकि प्रकाश की ही तरह उनकी कविता दोहरा व्यवहार करती है। उनकी कविता का बुनियादी कंटेंट जिस तरह मार्क्सवादी है, उनकी शैली उसी तरह अस्तित्ववादी है। दु:स्वप्न का संत्रास उनकी शैली है, तो दु:स्वप्न उनका कंटेंट है, वह दु:स्वप्न, जिसमें यथार्थ छिन्न-भिन्न हो रहा है।
मुक्तिबोध अपनी मानसिक व सामाजिक स्थितियों से लगातार असंतुष्ट रहते थे। यह असंतोष उनके पूरे रचनाकर्म में, उनके निबंधों-पत्रों में मुखर रूप से, दिखाई देता है। “मानसिक द्वंद्व उनके (पढ़ें मेरे) व्यक्तित्व में बद्धमूल” रहा। हम जानते हैं कि आरंभिक बरसों में मुक्तिबोध ने छायावादी कविताएँ लिखी थीं। मार्क्सवाद के प्रति उनमें कोई अनुराग न था। 1942 में तारसप्तक के प्रकाशन के समय वह घोषित मार्क्सवादी थे। हालांकि तारसप्तक में दिये अपने वक्तव्य में भी उन्होंने अपने इस असंतोष को सांकेतिक तौर पर ज़ाहिर कर दिया था। उसके बाद उन्होंने 1947 में ख़ुद को प्रयोगवाद से जुड़ा संकेतित किया। फिर जब नई कविता आंदोलन शुरू हुआ, तो मुक्तिबोध ने अपना जुड़ाव उससे संकेतित किया। यानी  (उन्हीं के शब्दों में) “अपनी विकास-स्थिति के प्रति असंतोष” उनमें लगातार रहा। इन सब बातों में कुछ भी नया नहीं, क्योंकि ये सब पहले भी छपी हुई हैं और कई आलोचकों ने उद्धरणों समेत इन्हें लिखा है। वे बातें भी छपी हैं, जिनमें क़रीबी मित्रों के हवाले से यह बताया गया कि बाद के दिनों में वह मार्क्सवाद से भी निराश रहने लगे थे।
कहने का अर्थ यह है कि मानसिक द्वंद्व और असंतोष उनके भीतर लगातार रहे। यह मानसिक द्वंद्व व असंतोष महज़ सामाजिक प्रश्नों के स्तर पर नहीं थे, बल्कि व्यक्ति की भूमिका, समाज व विचारधारा के साथ उसके संबंधों को लेकर भी थे। और उन्हीं के कारण उनके रचनाकर्म में अस्तित्ववादी तत्वों का आगमन होता जाता है, जिसके बीज तो तभी से थे, जब वह बर्गसाँ से प्रभावित हुए थे। दुनिया की महान अस्तित्ववादी रचनाओं का अध्ययन किया जाए, मसलन नीत्शे, कीर्केगार्द, दोस्तोएव्स्की, कामू, काफ़्का, सार्त्र आदि की रचनाओं का, तो व्यक्ति की भूमिका, समाज के साथ उसके संबंधों पर जिस तरह के संशय व सवाल उठाए गए हैं, उनमें से कई मुक्तिबोध की कविताओं में भी मिल जाते हैं। इन सबका अस्तित्ववाद अलग-अलग है। अस्तित्ववाद क्या है, इसका कोई स्पष्ट जवाब देना बहुत मुश्किल है। इसकी एक सर्वमान्य परिभाषा दे पाने में अतीत के कई लेखक-विचारक ख़ुद को असमर्थ बता चुके हैं। अपना पूरा लेखनकर्म अस्तित्ववादी शैली में ही करने वाले सार्त्र से जब इस पदबंध की परिभाषा देने को कहा गया था, तो उन्होंने जो कहा, उसका आशय यह है कि- लगातार नास्तिकता से मनोजगत में होने वाले जो विभिन्न परिणाम हैं, उन्हें भाषा में कहने की कोशिश अस्तित्ववाद है।
आमतौर पर यह मान लिया जाता है, और हिंदी में ऐसा मानने की लंबी परंपरा भी रही है कि, मार्क्सवाद व अस्तित्ववाद एक-दूसरे के विरोधी हैं। ऐसा मानने के कई मोटे कारण भी हैं, मसलन- मार्क्सवाद समाज को प्राथमिक महत्व देता है, जबकि अस्तित्ववाद समाज के भीतर व्यक्ति व उसके मनोजगत को। मार्क्सवाद एक विचारधारा है, दर्शन भी है, किंतु अस्तित्ववाद कोई विचारधारा नहीं है, अंशत: दर्शन ज़रूर है, किंतु पूरी तरह दर्शन भी नहीं है। भाषा की सुविधा के लिए भले इसे दर्शन की कोटि में डाल दिया जाता हो, लेकिन इसे दार्शनिक तेवर या समस्या भी कहा जा सकता है और दर्शन की तरफ़ उठाया गया एक सवाल भी। यदि इसे दार्शनिक समस्या की तरह देखा जाए, तो योगवासिष्ठ में भी यह है, शतपथ ब्राह्मण में भी है और होमर की ओडिसी में भी है। उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की शुरुआत में लेखकों-विचारकों, ख़ासकर गल्पकारों, ने इसका प्रयोग एक शैली या डिज़ाइन की तरह भी किया है। दोस्तोएव्स्की व काफ़्का, अस्तित्ववादी दर्शन या अस्तित्ववादी विचारधारा के लेखक नहीं, बल्कि अस्तित्ववादी डिज़ाइन या शैली के लेखक हैं।
हिंदी में इसे लेकर एक लंबी राजनीति होती रही है। मार्क्सवादी आलोचक, प्राथमिक तौर पर, साहित्य पर राजनीति को वरीयता देते रहे हैं। वे मानते रहे हैं कि कविता कला के स्तर पर बुरी हो, तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, वह समाज के भीतर पहुंच रही है व मार्क्सवादी राजनीति के साथ खड़ी है, तो वह श्रेष्ठ कविता है। इस सोच से ही पता चल जाता है कि उन्हें कविता की अधिक चिंता कभी नहीं रही। जबकि अस्तित्ववादी डिज़ाइन बिना कला की शर्तों पर खरा उतरे हासिल नहीं की जा सकती। समाज में उसका प्रसार भले कम हो, किंतु उसका कला होना निहायत ज़रूरी है। इसलिए मुक्तिबोध को महज़ मार्क्सवादी या महज़ अस्तित्ववादी साबित करना साहित्यिक नहीं, एक राजनीतिक प्रयास के रूप में ही देखा जाना चाहिए और ये प्रयास मुक्तिबोध की कविता के साथ न्याय नहीं करते। जब कोई आलोचक उन्हें महज़ मार्क्सवादी कवि के रूप में देखना चाहता है, तो उनकी कविता के अस्तित्ववादी गुणों, शैली व डिज़ाइन को नज़रंदाज़ करेगा। उसी तरह अगर कोई उन्हें महज़ अस्तित्ववादी बताना चाहता है, तो वह मुक्तिबोध की कविता में व्याप्त शोषणविहीन, समतामूलक उस समाज के महास्वप्न को नज़रंदाज़ करेगा, जो मार्क्सवाद के कारण उपस्थित होता है और जिसके बारे में मुक्तिबोध अभिधा में भी कह देते हैं। मुक्तिबोध की कविता में दोनों प्रकार के गुण व व्यवहार हैं और हमें उन्हें दोनों तरह से देखना आरंभ करना होगा।
मुक्तिबोध अपने कंटेंट में जिस तरह मार्क्सवादी हैं, उसी तरह अपनी डिज़ाइन में अस्तित्ववादी भी हैं। उनकी कविता प्रकाश की ही तरह दोहरा व्यवहार करती है, क्योंकि वह कण भी हैं, तरंग भी हैं। दोनों माने बिना उनकी कविता को पूरी तरह आत्मसात करना संभव नहीं होगा। और उन्हें दोनों मानना कहीं से ग़लत भी नहीं होगा। हां, कुछ लोगों-समूहों की राजनीति को यह सूट नहीं करेगा, वे इसका विरोध करेंगे, पर उनका बुनियादी काम ही यही है कि जो सचाइयाँ उनकी राजनीति को सूट न करती हों, वे उसका विरोध, दमन, उपेक्षा व उपहास करें। आख़िर वे साहित्य को दोयम मानते हैं, राजनीति को वरीय।
मुक्तिबोध ने भले यह जानते-बूझते किया या अनजाने ही किया, यह नहीं पता, लेकिन उनकी कविता में मार्क्सवाद व अस्तित्ववाद का एक रचनात्मक अद्वैत (शंकर का अद्वैतवाद नहीं) ज़रूर दिखाई पड़ता है। और यही उनके द्वारा उठाया गया अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा ख़तरा है। उनके पहले व बाद में किसी कवि ने यह ख़तरा नहीं उठाया। यह काम अकेले मुक्तिबोध ने किया। वह चाहते, तो अज्ञेय के रास्ते पर चलते, बिना मार्क्सवादी कंटेंट लाये वह अस्तित्ववादी डिज़ाइन व सार-तत्व से काम चला लेते। वह भी प्रचलित था। वह चाहते, तो नागार्जुन या शील के रास्ते पर चलते, बिना अस्तित्ववादी डिज़ाइन का प्रयोग सीधे-सीधे मार्क्सवादी कंटेंट जनता के सामने परोस देते। वह भी प्रचलन में था। किंतु मुक्तिबोध में अपने आप को लेकर जो संशय व असंतोष था, वह उनके द्वारा चुने गए दृष्टिकोणों में व्याप्त था। इसीलिए उन्होंने दो बिल्कुल विपरीत लगने वाले चीज़ों को मिश्रित कर दिया। इस मिश्रण से उन्होंने जो रास्ता निकाला, वह दोनों में से किसी एक ध्रुव पर चलने का नहीं था, बल्कि उनके इस चयन से उनका रचनाकर्म दोनों ध्रुवों के बीच स्थित हो गया। यह अपने रचनाकर्म में बीच का रास्ता पा लेने जैसा है। मुक्तिबोध के भीतर यही मध्य का माहात्म्य है।
पाश की मशहूर पंक्ति है- बीच का रास्ता नहीं होता। उस पंक्ति के संदर्भ बहुत अलग हैं और उसका सीधा अर्थ यह है कि जीवन में आपको एक स्टैंड लेना ही होगा, एक चुनाव करना ही होगा। यह भी सच है। जीवन में कई स्थितियाँ ऐसी आती हैं, जब आपको एक तरफ़ होना ही होता है। लेकिन साहित्य व कला के साथ जुड़ा एक बड़ा सौंदर्य यह भी है कि इसमें कोई भी पंक्ति एबसॉल्यूट नहीं बन पाती। पाश की यह पंक्ति कई संदर्भों में सही हो सकती है, लेकिन हर जगह इसे सही नहीं पाया जा सकता। कला, दर्शन, साहित्य और वृहत् जीवन में कई बार बीच के ही रास्ते चुनने होते हैं। एक विडंबना यह भी है कि सारे रास्ते दरअसल बीच में होते हैं। किनारे का रास्ता भी किनारे नहीं होता, वह किनारे और शेष भाग के बीच में स्थित होता है। रास्तों को देखा जाए, तो उनके बाएँ भी कुछ न कुछ होता है और दाएँ भी कुछ न कुछ। कई बार, रास्ता ही दरअसल किसी खेत या क्षेत्र को दो हिस्सों में बांट देता है। सारे रास्ते दरअसल बीच में ही होते हैं, बीच का कोई रास्ता हो या न हो, यह आपका चयन है। ‘में’ और ‘का’ के प्रयोग से वाक्य के अर्थ में बदलाव हो जाता है। साहित्य में वाक्यों के अर्थ किस क़दर बदल जाते हैं, इसको लेकर कबीर और उनके बेटे से जुड़ी एक किंवदंती याद आती है।
कबीर का एक बेटा था- कमाल। वह भी दोहे लिखता था। अपने पिता से बेहद असंतुष्ट रहा करता। इस क़दर कि उनके दोहों को काटते हुए नए दोहे तैयार करता था और आसपास की जनता में उसके दोहे एक प्रतिपक्ष की तरह प्रचलित हो जाते थे। एक बार कबीर ने एक दोहा कहा, जिसकी एक पंक्ति थी-
कहै कबीर दो नावै चढ़िए। एक बूड़े तो एके रहिए।
थोड़ी ही देर बाद इसका खंडन करते हुए कमाल ने एक दोहा लिखा, जिसकी पंक्ति थी-
कहै कमाल दो नाव न चढ़िए। फटै जाँघ के बूड़ के मरिए।
एक ही स्थिति है, लेकिन दोनों के देखने का तरीक़ा अलग-अलग है। कबीर कह रहे हैं कि जीवन में विकल्प बनाकर रखिए, एक से काम न बने तो दूसरे से आपका काम बन ही जाएगा। यह बिल्कुल व्यावहारिक बात है। कमाल कह रहे हैं कि दो विकल्पों को साथ लेकर मत चलिए, साँसत में पड़ जाएँगे। यह भी व्यावहारिक बात है। लेकिन दोनों बातें अलग-अलग स्थितियों में ही सही हो सकती हैं। दोनों एब्सॉल्यूट नहीं हैं। दोनों मिथ्या नहीं हैं, लेकिन दोनों पूर्ण सत्य भी नहीं हैं। इन पंक्तियों का सही-ग़लत होना स्थिति, दृष्टिकोण व चयन पर निर्भर करता है। इसीलिए कहा जाता है कि श्रेष्ठ साहित्य पूरे जीवन का चित्रण करने की कोशिश नहीं करता, बल्कि वह जीवन से अपने लिए एक हिस्से को चुन लेता है। स्थितियों के हिसाब से दोनों ही पंक्तियों को सही मानना होगा। यह दो के बीच फँसने से ज़्यादा दो के बीच समावेश स्थापित करने जैसी बात है।
मुक्तिबोध यदि दो विपरीत लगने वाली चीज़ों के बीच इस तरह का समावेश कर पाते हैं, तो यह सच में बहुत बड़ी बात है। इसके कारण मुक्तिबोध की प्रतिबद्धता को ख़तरे में पड़ा नहीं मानना चाहिए और ना ही उन्हें किसी भयवश महज़ व्यक्ति के अंतर्मन की भुलभुलैयाओं में फँसा हुआ मानना चाहिए। एक कवि दो साहित्यिक स्थितियों के बीच से अपना रास्ता तैयार कर सकता है। उसे उतनी ही गरिमा के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए। यदि बीच का वह रास्ता पाकर उसकी कला कुछ बड़ी उपलब्धियाँ हासिल करती है, तो उनका स्वागत करना चाहिए और उनकी विवेचना करते समय दोनों ही सरणियों को ध्यान में लेना चाहिए। अंतत: कवि की कविता बचती है। वह श्रेष्ठ बनी है, तो उसकी रसोई में चाहे जो चीज़ें रही हों। यहाँ निकारागुआ के कवि एर्नेस्तो कार्देनाल की याद हो आती है। वह मार्क्सवाद से प्रभावित कवि हैं, लेकिन साथ ही रोमन कैथलिक विचारों में भी उनकी गहरी आस्था है। उनका पूरा रचनाकर्म इन दोनों के बीच एक सामंजस्य बिठाने की कोशिश करता है। यह विश्व-कविता में एक बहुत बड़ा प्रयास था और पूरी गरिमा से इसे समझने की कोशिश की जाती है। जीवन की दो विपरीत अवस्थाओं के बीच सुलह बनाने की कोशिश करना वृहत्तर तौर पर रचनात्मक कर्म है। कुँवर नारायण के शब्दों में, जीवन सुंदर सुलहों का नाम है।
एक तरफ़ हो जाने की ज़िद के बरक्स थोड़ी देर रुककर यह भी सोचने का समय है कि क्या सच में एक तरफ़ हो जाना ही सबसे बड़ा समाधान होता है? दुनिया दो ध्रुवों में बंट रही है, बार-बार बंटती रही है, और हमने देखा है कि दोनों ही ध्रुव विनाश की ओर ले जाना चाहते हैं, तब आप किस तरफ़ होना चाहेंगे? किस तरफ़ खड़े होकर आप विनाश को लाना चाहेंगे? और क्या न बेहतर होगा कि आप न इस तरफ़ जाएँ, न उस तरफ़, बल्कि दोनों तरफ़ होने का विरोध करते हुए यह चुनें कि मुझे इन दोनों ध्रुवों के बीच से एक ऐसा रास्ता निकालना है , जो विनाश की तरफ़ न जाए, मनुष्यता को और प्रवर्तित कर सके। ठीक है, दुनिया ध्रुवों में बंट गई है, और आपको ध्रुवों से प्यार है, आप एक ही तरफ़ होना चाहते हैं, लेकिन यह तो सोचिए कि ध्रुवों पर कोई नहीं रह पाता, सिर्फ़ बर्फ़ रहती है। इंसान  को अपने रहने के लिए दोनों ध्रुवों के बीच की जगह को चुनता पड़ता है, क्योंकि उसी जगह से जीवन का सृजन संभव है। स्टैंड लेना बहुत अच्छी बात है, और वह अलग संदर्भ की बात है, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि मध्य का महात्म्य कहीं बड़ा है। वीररस से भरे लोगों के लिए यह बहुत आसान होता है कि वह सोच लें, मध्य की स्थिति कायरता की स्थिति है। दरअसल, ये ऐसे कोमल व संवेदनशील मुद्दे हैं कि कोशिश करनी चाहिए, इन पर युद्ध की शब्दावली में बात न हो। कुँवर जी की ही एक बात याद आती है, जो इसे कहीं सुंदर तरह से कहती है- “यह समय मुझे मुख्यतः सही समझौतों का वक़्त लगता है, टकरावों का नहीं समझौता लड़ाई की भाषा का शब्द नहीं है, विचार और विकास की भाषा का शब्द है।”  शुरू में मैंने कुँवर नारायण को याद किया था, तो इसी कारण कि मध्य के महात्म्य को मुखर तौर पर स्वीकार करने वाले वह हिंदी के दुर्लभ कवि हैं। इस मध्य का प्रयोग मुक्तिबोध ने भी किया, किंतु उन्होंने इसे स्वीकार न किया, शायद और जीते, तो ज़रूर करते। कुँवर नारायण ने इस मध्य का प्रयोग किया और इसे सविनय स्वीकार भी किया। मनुष्यता की बात करना ही मध्य का माहात्म्य है, क्योंकि मनुष्यता, पशुता और दैवत्व के मध्य वास करती है।

Sunday, November 12, 2017

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 4 : अधूरी चीज़ों का देवता



Pic : Anurag Vats 2017



एक मित्र ने पूछा, “इधर क्या-क्या पूरा कर दिया?”
आम तौर पर पूछा जाता है कि क्या कर रहे हो, लेकिन मित्र ने वह चीज़ जाननी चाही, जिसे मैंने पूरा कर दिया हो। मित्र क़रीबी थीं, तो उन्हें मेरे गुणों का अंदाज़ा रहा होगा, इसीलिए उन्होंने सिर्फ़ वह काम जानना चाहा, जिसे मैंने पूरा किया हो। वरना “क्या-क्या कर रहा” की सूचियाँ तो मैं हमेशा ही गिनाता रहता हूँ। 
मैंने बुझकर जवाब दिया, “मैं अधूरी चीज़ों का देवता हूँ।”
अगला ईमेल आने तक, ज़िंदगी के दस काम निपटाते हुए, मेरे ज़हन के बैकग्राउंड में यह अधूरापन तैरता रहा। लगातार यह चलता रहा कि अब तक जितने काम किए हैं, वे सब अधूरे किए हैं। कोई भी काम पूरा नहीं किया। कविताएँ लिखीं। कहानियाँ लिखीं। निबंध लिखे। इनके अलावा भी बहुत सारे काम किए। सब अधूरा किया। हर काम के दौरान मन में अंत की एक अवधारणा व कल्पना रही। मसलन- यह जो कविता मैं लिख रहा हूँ, अंत में यह उस-उस-उस बिंदु तक पहुँचेगी और मुझे इसमें वह-वह-वह बातें कहनी हैं। हक़ीक़त यह है कि मैं उस-उस-उस बिंदु तक कभी नहीं पहुँच पाया, वह-वह-वह बात मैं कभी नहीं कर पाया, क्योंकि मैंने उस कविता या कहानी को कभी पूरा ही नहीं किया। एक दिन लगा कि अब इससे आगे नहीं चला जा सकेगा, वहीं थककर बैठ गया, उसी कविता या कहानी को बाहर निकाल दिया, वह छप गई, उसे पूरी हो गई रचना की तरह पढ़ा गया। किसी भी कविता के साथ यह नहीं छपा कि- “गीत चतुर्वेदी की नई अधूरी कविता”। जबकि वैसा छपा होता, तो वह सच होता। जो चीज़ छपकर लोक को अर्पित हो गई, यदि उसके अधूरे होने का अलग से उल्लेख न किया जाए, उसे पूरा ही मान लिया जाता है।
अंग्रेज़ी की लेखिका ज़ेडी स्मिथ ने अपने एक निबंध में बहुत सुंदर तरह से कहा था, ठीक इन्हीं शब्दों में नहीं, पर इन्हीं आशयों में, हम जो लिखना चाहते हैं, वह कभी नहीं लिख पाते। उसके बदले क्या करते हैं? हमसे जो लिखाsss गया है, उसी को सामने रखकर हम दावा करते हैं कि हम ठीक यही तो लिखना चाहते थे।
यह अजब क़िस्म का खेल है। जो लिखा, वह अधूरा है, लेकिन पूरे की तरह प्रस्तुत कर दिया। मैं आपके सामने प्रस्तुत हूँ, अपने आप में अधूरा हूँ, लेकिन पूरे की तरह प्रस्तुत हूँ। ख़ुद के साथ यह खेल चलता ही रहता है। पूरा तो किसी स्थिति में नहीं होऊँगा, थककर एक दिन मैं ख़ुद या आप पूरा मानने लग जाएँगे। आईने के सामने खड़ा होता हूँ और जोश मलीहाबादी का एक शेर अपने आप ज़बान पर आ जाता है –
बिगाड़कर बनाये जा, उभारकर मिटाये जा
कि मैं तेरा चिराग़ हूँ, जलाये जा, बुझाये जा।
इस शेर में भी जो हालात बनते हैं, वे पूरे नहीं हैं। बिगाड़ दिया, तो भी अधूरा ही लगूँगा। पूरा करने के लिए बनाओगे। तो भी अधूरा ही लगूँगा। फिर बिगाड़ने लग जाओगे। बुझा हुआ रहूँगा, तो पूरा करने के लिए जलाओगे। जलता रहूँगा, तो फूँक मारकर बुझा दोगे। हर कोई अपना ख़ुद का चिराग़ है। ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा खेल ख़ुद से खेले जाते हैं।
इसीलिए हम चीज़ों को पूरा मान लेते हैं। जीवन गणित की तरह है। मान लेना सबसे महत्वपूर्ण है। मान लिया, तो आगे के सारे समीकरण हल होते हैं। पूरा मान लिया, तो अगले काम की ओर बढ़ने में आसानी होती है। लोगों को अपना मान लेते हैं। पता नहीं, वे अपने हैं कि नहीं हैं, लेकिन अपना मानना होता है। न मानें, तो पचास झंझटों में पड़े रहेंगे। जो हमारे लिए हर रोज़ गड्‌ढे खोद रहा हो, उसे भी अपना मान लेते हैं। और अपना मान लिया, तो उसे बुरा मानना मुश्किल हो जाता है। पुराने ज़मानों के मशहूर नाटककार राधेश्याम कथावाचक की मशरिक़ी हूर का एक संवाद है- “जिन्हें अपना समझता हूँ, उन्हें अच्छा समझता हूँ।”
एक बहुत पुराना क़िस्सा याद आ रहा है। किशोरावस्था के दिनों में इस पर ख़ूब हँसते थे।
एक राजा था। बेटे से परेशान रहता था कि यह ऐसा बैरागी क्यों है, संन्यासी जैसा क्यों है? उसके आसपास लड़कियों की फ़ौज खड़ी कर दी कि किसी से तो प्रेम कर ले, शादी कर ले, ताकि मेरा वंश चले, पर राजकुमार तो बस अपनी ध्यान-साधना में लगा रहता। किसी की ओर झाँककर भी न देखता। राजा ने बहुत कोशिश की, पर हमेशा नाकाम ही रहा। एक दिन राजकुमार को प्रेम हो गया, पर उन लड़कियों से नहीं, जो बाप ने उपलब्ध कराई थीं। प्रेम हुआ, तो पड़ोसी देश की राजकुमारी से। आकर सबको बता दिया। रानी माँ बहुत ख़ुश हुईं। शादी की तैयारियाँ करने लगीं, पर राजा को यह प्रेम बिल्कुल पसंद न आया। अब वह अड़ गया कि बेटा, किसी और से कर ले, उससे तो शादी न होने दूँगा। कई दिनों तक ज़िद की तलवारें खिंची रहीं। बेटे के बार-बार पूछने पर राजा ने बताया, “बरसों पहले पड़ोस की रानी के साथ मेरा गुप्त प्रेम-संबंध था। सिर्फ़ मैं और वह रानी जानते हैं कि वह राजकुमारी उसी प्रेम का फल है। सो बेटा, वह तेरी बहन हुई। उससे शादी का सपना छोड़ दे। मुझसे सहन न होगा।” सुनकर राजकुमार रोने-धोने लगा। जीवन में बमुश्किल एक लड़की से प्रेम हुआ और वह भी बहन निकली। सांत्वना पाने के लिए माँ की गोद में सिर रखकर रोने लगा। माँ ने कहा, “बेटा, बरसों पहले मेरा भी एक गुप्त प्रेम-संबंध था। तू उसी प्रेम का फल है। जा, बिंदास उसी से शादी कर। कोई बहन ना लगे है तेरी।”
लतीफ़ा है। लतीफ़े कई बार फ़लसफ़ों पर भारी पड़ते हैं। मोटी किताबें जो बात नहीं समझा पातीं, छोटा-सा एक लतीफ़ा वह बात समझा जाता है। असल क्या है, किसी को नहीं पता। या जिस एक को पता था, वह हमारी कहानी से निकलकर दूर जा चुका है, तब तो और न पता चलेगा कि असल क्या था। तो ऐसे में, बस मान लेना ही एक उपाय बचता है। उसी तरह, पूरा या पूर्ण क्या है, किसी को नहीं पता, बस मान लेना होता है कि अब यह पूरा है। कोई भी कहानी जहाँ ख़त्म होती है, उसके आगे से एक नई कहानी कहना शुरू किया जा सकता है। जैसे ही यह होगा, पिछली कहानी अपने आप अधूरी साबित हो जाएगी।
सारा खेल इस ‘अ’ में है। अ से अधूरा। अ से अपूर्ण। हमारी वर्णमाला का पहला वर्ण। दुनिया की कई भाषाओं में पहला वर्ण अ या इसी से मिलती-जुलती ध्वनि से निकला है। फिर एक कहानी याद आती है। बहुत पहले, जाने कितना पहले, जब भाषा नहीं थी, लोगों के सामने सबकुछ स्पष्ट था। जवाब हर किसी के पास थे, सवाल किसी के पास नहीं था। सौंदर्य चारों ओर था, लेकिन कोई रहस्य नहीं था। रहस्य न हो, तो सौंदर्य का अचार भी नहीं डाला जा सकता। इतना सबकुछ जाना हुआ था कि लोग ऊबने लगे। तब भाषा की रचना हुई। जाने कौन जादूगर था वह, जिसने दुनिया के सारे जवाबों को इकट्‌ठा किया और भाषा के भीतर छिपा दिया। लोगों को जीने में मज़ा आने लगा। वह भाषा के पास जाते, वह उन्हें नया सवाल देती। लोग जवाब तलाशने लगते। जो भी जवाब मिलता, वह दरअसल एक नये सवाल की ओर इशारा होता। जादूगर ने कहा, भाषा के भीतर ही असली जवाब है, किसी एक वर्ण में छिपा हुआ है। लोग सारे वर्णों को खंगालने लगे, जबकि जादूगर ने पहले ही वर्ण में जवाब छिपा दिया था। और वह था अ। उसने किसी को नहीं बताया कि दुनिया के हर रहस्य की कुंजी अ के पास है। उसे समझो। अ से अनार, अ से अमरूद की पढ़ाई तो होने लगी, लेकिन अ को चाभी की तरह इस्तेमाल करने का हुनर बहुत कम लोगों को आया।
हमारे यहाँ हर विस्तार का सार प्रस्तुत करने की परंपरा है। हम विस्तार की भी आराधना करते हैं और सार की भी। तभी सात सौ श्लोकों वाली गीता का सार सात श्लोकों में प्रस्तुत कर देते हैं। वाल्मीकि की रामायण में क़रीब चौबीस हज़ार श्लोक हैं, लेकिन एकश्लोकी रामायण में उसका सार दे दिया गया है। यह पूर्णता की नहीं, अपूर्णता की स्थापना है। कोई चीज़ अगर चौबीस हज़ार श्लोक में भी पूर्ण है और एक श्लोक में भी पूर्ण है, तो वह असल में अपूर्ण है। उसे आप कितना भी बड़ा कर सकते हैं, कितना भी छोटा कर सकते हैं।
अपूर्णता के इस विचार को अ की महिमा के बिना नहीं जाना जा सकता। इसी अ में बोध है। जो अबोध है, बोध उसी को चाहिए होता है। बिना अ लगे बोध की कोई आकांक्षा भी नहीं होती। इसीलिए बुद्ध ने अ को बहुत महत्वपूर्ण माना था।
बौद्ध धर्म की महायान शाखा का बेहद प्रसिद्ध सूत्र है- प्रज्ञापारमिता। यह उनके सबसे बड़े सूत्रों में से है। एक नेपाली मान्यता है कि प्राचीनतम समय में यह सूत्र सवा लाख श्लोकों से बना था। बाद में उसे घटाकर एक लाख श्लोकों का किया गया। इसका घटाना चलता रहा, बाद में पचीस हज़ार, दस हज़ार, आठ हज़ार श्लोकों तक इसे घटाया गया। और संक्षेप करने पर यह ढाई हज़ार, फिर सात सौ, फिर तीन सौ श्लोकों तक आया।  अंत में यह एक शब्द तक सीमित हो गया। बुद्ध ने कहा, अगर तुम सवा लाख श्लोक नहीं समझ सकते, उससे कम भी नहीं समझ सकते, तो लो, मैं एक शब्द में उस पूरे ज्ञान को कहता हूं। वह वर्ण है- अ!
अब इस अ को बूझना, सवा लाख श्लोकों को बूझ लेने के बराबर ही हुआ। है न!
यह अ नकार का है। नकार में न होता है, लेकिन हर वर्ण में अ होता है। न का अ देखना ही उसे समझना है। बुद्ध ने अ को महत्व दिया, क्योंकि वह नकारात्मक हैं। बौद्ध धर्म कोई सकारात्मक दर्शन नहीं है, वह बेहद नकारात्मक है। हर चीज़ के लिए ना कह देता है। बुद्ध ने अपने से पहले की ज्ञान-परंपरा को ना कहा। उन्होंने वेदों को ना कह दिया। उन्होंने ईश्वर को ना कह दिया। तपस्या की जो सारी प्रणालियाँ उस समय मान्य थीं, उन सबको एक-एक बार छुआ और उन्हें अपर्याप्त बताते हुए ना कह दिया। उनके पिता ने उन्हें ऐश्वर्य दिया। उसे भी उन्होंने ना कह दिया। साथियों ने ज्ञान देना चाहा। उसे भी ना कह दिया। यह ना उन्होंने अ की मदद से किया।
अपने से पहले के ज्ञान के आगे अ उपसर्ग लगा दिया और उसे अज्ञान बना दिया। वैदिक नित्य के आगे अ लगा दिया और अनित्य बना दिया। लोग द्वय में फँसे हुए थे। उन्होंने आकर अ लगा दिया। अद्वय बना दिया।  एक साधारण अ, उपसर्ग की तरह लग जाए, तो बना-बनाया अर्थ उलट जाता है। बाग़ी क्या करता है? यही करता है। समाज जिसे न्याय कहता है, बाग़ी आता है और बताता है कि नहीं, यह न्याय नहीं, अन्याय है। और बग़ावत कर देता है। इसीलिए बुद्ध बाग़ी थे। विद्रोही थे। जो पूर्ण है, जिसे सब लोग पूर्ण मानते थे, बुद्ध ने उसके आगे अ लगा दिया और उसे अपूर्ण घोषित कर दिया। एक नया रास्ता दिखा दिया, जो कि एक नया अपूर्ण होगा।
रागी और बाग़ी, दोनों ही अ से शुरू करते हैं। रागी आलाप लेता है, अ की ध्वनि के साथ शुरू करता है। बाग़ी एक स्टैंड लेता है और एक बने-बनाए सत्य के आगे अ उपसर्ग लगाकर लेता है। रागी और बाग़ी, दोनों ही अपने-अपने समय की कलात्मक कृतियाँ होते हैं। कलाएँ पूर्णता का आवाह्न नहीं करतीं, अपूर्णता की प्राण-प्रतिष्ठा करती हैं। कोई भी ईश्वर हो, वह एक कलाकृति ही है। देवता भी कलाकृति हैं। इनकी रचना मनुष्य करता है। अपने काल-समय के अनुसार अपने ईश्वर, अपने देवताओं की रचना करता है। इसलिए ये सब भी अधूरे होते हैं। इनमें लगातार विस्तार होता रहता है। एक उपनिषद का शांति-पाठ कहता है कि पूर्ण में से पूर्ण को घटा दो, तो भी पूर्ण बचेगा। पूर्ण में पूर्ण जोड़ दो, तो भी पूर्ण मिलेगा। किसी भी वस्तु में, विचार में, अगर कुछ जोड़ा या घटाया जा सके, तो इससे उसकी अपूर्णता साबित होती है, पूर्णता कैसे साबित हो सकती है?
तो क्या वह शांति-पाठ ग़लत है? नहीं, न तो गणित के स्तर पर ग़लत है न ही दर्शन के स्तर पर ग़लत है। क्योंकि वहाँ अपूर्ण को पूर्ण मान लिया जाता है। गणित के हर अंक को पूर्ण मान लिया जाता है, जैसे उसके आगे कुछ नहीं होगा। पर हर अंक के आगे कोई दूसरा अंक है। इस तरह हर अंक को पूर्ण मानने वाला गणित अंतत: कहाँ पहुँचता है? कहीं नहीं पहुँचता, अंत में हाथ खड़े कर लेता है और कहता है- इनफिनिटी है भाई, इनफिनिटी। यह क्या है? इनफिनिटी भी तो अपूर्णता ही है। जो अनंत है, वह यक़ीनन अपूर्ण है। हर अंक को पूर्ण मानकर भी तुम अपूर्णता की ओर ही बढ़ रहे हो। कहा जाता है कि यह ब्रह्मांड पूर्ण है, पर क्या सच में? यह सृष्टि अपने आप में एक अपूर्णता है। यदि पूर्ण है, तो उसका एक आरंभ होगा, एक अंत होगा। इस सृष्टि का न तो आरंभ पता है, न ही अंत पता है। क्या पता है? महज़ बीच का हिस्सा पता है। बीच के जिस हिस्से में हम हैं, उसका एक अंश पता है। तो पूरा कहाँ पता है? महज़ अधूरा पता है। यह हमारा हुनर है कि अधूरे पते पर भी चिटिठयाँ पहुँच जाती हैं।
और यही कला है। हमारी हर कलाकृति एक अधूरा पता है, लेकिन फिर भी वह किसी जगह पहुँच जाती है, इसी में कला है। मान लीजिए, मैंने एक कविता लिखी। पढ़ने वाले को लगता है कि इसकी शुरुआत पहली पंक्ति से हो रही है। पर सच में वैसा नहीं है। उस पहली पंक्ति को मैंने सबसे बाद में लिखा था। वह तो हक़ीक़त में अंत की पंक्ति थी, जो मैंने सबसे पहली पंक्ति के रूप में लिख दी। तो शुरुआत का बिंदु क्या है? अंत का बिंदु क्या है? कुछ नहीं है। किसी भी कलाकृति का, किसी भी विचार का आदि और अंत पता करना असंभव है। हम महज़ अपनी बुद्धि की सुविधा के लिए आदि और अंत को मान लिया करते हैं। चाहे जीवन हो या कला, वह बीच में मौजूद है। एक विशाल मध्य-भाग है। कला वहीं रहती है। विचार वहीं पर रहते हैं। कौन कहाँ से आया, रहस्य है। कौन कहाँ को जाएगा, रहस्य है। जितनी देर साथ है, सामने है, उतनी देर तक वह है और, यक़ीनन है।
उत्तर-आधुनिक फ्रेंच विद्वानों दिल्यूज़ और गुआत्तरी के राइज़ोम को याद करना चाहूँगा। राइज़ोम एक पौधा होता है, जिसमें कोई तना नहीं होता, बस जड़ ही जड़ होती है। एक जड़ से दूसरी जड़ उत्पन्न हो जाती है। एक तरह का कंद होता है। वनस्पति-शास्त्र में देखा जाए, तो राइज़ोम परिवार में बहुत सारे दूसरे पौधे भी आते हैं। जैसे हल्दी, अदरक, कंद ये सब अलग-अलग तरह के राइज़ोम हैं। दिल्यूज़ और गुआत्तरी अपने राइज़ोम को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं- इस जड़ की कोई शुरुआत नहीं है, इस जड़ का कोई अंत नहीं है। हमारे सामने बस मध्य-भाग होता है।
हम जिस जगह को छुएँगे, वह एक नया मध्य-भाग होगा। हमने उसे काट लिया, काट के मेज़ पर रख दिया, तो हमें उसके दो सिरे दिख जाएँगे और हम मान लेंगे कि यह उसके शुरू और अंत के बिंदु हैं, पर वैसा सिर्फ़ मानेंगे, वह हक़ीक़त नहीं होगी। बस, ख़ुद के साथ किया गया हमारा एक नया खेल होगा।
और प्रेम में हम ऐसे बहुत सारे खेल करते हैं। आपके जीवन में एक प्रेमी आया। आप यह भूल जाते हैं कि उसके पास एक पूर्व-जीवन भी रहा होगा। कल को वह आपके जीवन से निकल जाएगा। आप इस कल्पना से भी भयभीत होते हैं कि उसके बाद एक पश्चात-जीवन भी बचेगा। आपके लिए उसका जीवन महज़ उतना होता है, जितने में आप उसके साथ हैं। उसे आप पूरा मान लेते हैं। इसीलिए प्रेमी क़िस्म के लोग ऐसे भावुक उद्गार सबसे ज़्यादा प्रकट करते हैं कि – मैं अधूरा था, तुम भी अधूरी थी। हम दोनों मिलकर पूरे हो गए। दो महीने बाद प्रेमी का चक्कर कहीं और चल जाता है, प्रेमिका किसी और के साथ व्यस्त हो जाती है। तब वह पूरापन कहाँ चला जाता है? बस यह कि उतनी देर के लिए उन्होंने मान लिया था कि वे पूरे हो गए हैं। एक दिन नए सिरे से उनमें अधूरापन आ जाता है और वे नए साथी को तलाशने लग जाते हैं, पूरा हो जाने के लिए। इंसान जो नहीं होता है, वह हो जाना चाहता है। वह पूरा नहीं होता, इसीलिए पूरे हो जाने की तलाश करता रहता है। जबकि होता वह अधूरा है, लेकिन अधूरा होने की तलाश नहीं करता।  हर आदमी आत्म की खोज में लगता है, स्व को पा लेना चाहता है, अध्यात्म की तमाम किताबें पढ़ता है, दाढ़ी वाले बाबाओं की शरण में जाता है। यह भी नहीं सोचता कि बाबाओं में दाढ़ी का फैशन इतना कॉमन क्यों है? इतनी-सी बात नहीं सोचता, लेकिन सोच के सबसे ऊँचे धरातल पर पहुँच जाना चाहता है- ख़ुद को पा लेना चाहता है। बताइए, ग़लत पते पर सही चिट्‌ठी कैसे पहुँच सकती है? वह ख़ुद को पाना चाहता है, ख़ुद अधूरा है, यानी क़ायदे से उसे अपने अधूरेपन को पाने की यात्रा करनी चाहिए थी, लेकिन दौड़ रहा है वह पूरेपन की तरफ़? जो कि वह है नहीं। अगर वह पूरा होता, तो पूरेपन की तलाश को आत्म की खोज कह सकते थे, लेकिन है वह अधूरा, तो पूरेपन की तलाश को आत्म की खोज कैसे कह सकते हैं?
ठीक यह बिंदु है, जहाँ प्रेमीगण एक अद्भुत कलाकृति में तब्दील होने से वंचित रह जाते हैं। एक श्रेष्ठ कलाकृति बन सकने की सारी सामग्री होने के बाद भी वे श्रेष्ठ कलाकृति नहीं बन पाते, क्योंकि वे ग़लत पते की ओर चलने लगते हैं। जाना दिल्ली है, बैठ गए मुंबई की ट्रेन में। जाओ, अब इंडिया गेट की जगह गेटवे ऑफ इंडिया देखकर कन्फ़्यूज़न का आनंद पाओ। यात्रा का आनंद तो ख़ूब आएगा, लेकिन अंत में पाएँगे कि कहीं नहीं पहुँच पाए।
ठीक यही बिंदु है, जहाँ पर कोई कविता, उपन्यास या कोई भी कलाकृति श्रेष्ठ होने से वंचित हो जाती है, क्योंकि वह ग़लत पते पर ख़ुद को खोजने लगती है। कलाकृतियों को अपूर्णता की आराधना करनी चाहिए, करने लगती हैं वे पूर्णता की आराधना। जब आराध्य ही ग़लत चुनोगे, तो वरदान कैसे सही मिल जाएगा?
श्रेष्ठ प्रेमकथाओं में अपूर्णता का तत्व बहुत बारीकी से मिलता है। सारी प्रेमकथाओं का ज़िक्र नहीं कर सकते, एक प्रेमकथा मुझे अक्सर याद आती है, शायद अपनी सिंधी पृष्ठभूमि के कारण, जो कि आंशिक तौर पर मेरी भी पृष्ठभूमि है। यह सस्सी-पुन्नू की प्रेमकथा है। पुन्नू एक राजकुमार था। सस्सी एक धोबी की बेटी। किसी तरह दोनों में प्रेम हो गया। राजकुमार का परिवार इस विजातीय प्रेम-संबंध के ख़िलाफ़ था। फिर भी दोनों ने शादी कर ली। राजपरिवार ने क्रोध में आकर षडयंत्र किया और शादी की रात पुन्नू को बहुत शराब पिलाई। फिर उसे किडनैप कर अपने साथ ले गए। यहाँ सस्सी नींद में भी पुन्नू की प्रतीक्षा करती रही। सुबह उठी, तो पाया कि पुन्नू सुहागरात को भी कमरे में ना आया था। अब वह ग़ायब हो गया है। उसे लगा, पुन्नू बेवफ़ा निकला। वह उसकी तलाश में दौड़ पड़ी। कच्छ का रेगिस्तान पार करना बहुत मुश्किल था। भूख-प्यास से बदहाल हो गई। तभी रास्ते में दो ऊँटसवार मिले। उस रूपसी को देख उसका फ़ायदा उठाने की कोशिश करने लगे। सस्सी ने धरती से पुकार की। धरती फट गई। सस्सी उसमें समा गई। उसका दुपट्‌टा आधा ही दफ़न हुआ। आधा ज़मीन के ऊपर लहराता रहा। जब पुन्नू को होश आया, वह उल्टे पैर उसी राह दौड़ा आया और रास्ते में उसे वह दुपट्‌टा दिखा। उसके होश उड़ गए। शायद वह भी वहीं मर गया।
हम चीज़ों को जिस तरह पूरा मानते हैं, उस तरह यह कहानी भी पूरी है, पर क्या सच में यह पूरी है? सूफ़ी सिंधी कवि शाह अब्दुल लतीफ़ की किताब में यह कहानी विस्तार से है। आप इंटरनेट पर भी अंग्रेज़ी में खोजकर पढ़ सकते हैं। शुरू से ही यह कहानी एक अधूरेपन की ओर बढ़ती दिखाई देती है- एक ऐसा अधूरापन, जिसे हम स्वीकार नहीं कर पाते। उनका प्रेम अधूरा है। उनका मिलना अधूरा है। उनका बिछड़ना भी अधूरा है। राजपरिवार का षडयंत्र अधूरा है। ऊँटसवारों की कुत्सा अधूरी है। सस्सी का मरना अधूरा है। पुन्नू का बिलखना अधूरा है। और यह अधूरापन घटनाओं के स्तर पर नहीं, अनुभूतियों के स्तर पर है।  इस अधूरेपन को आप भाषा के भीतर विश्लेषित नहीं कर सकते, सिर्फ़ अनुभूत कर सकते हैं। ज़मीन में आधा दफ़न, लहराता हुआ दुपट्‌टा इस अधूरेपन का पर्याप्त इशारा दे देता है।
प्रेम क्या होता है? ज़मीन में आधा दफ़न, लहराता हुआ दुपट्‌टा ही तो होता है। उसे पूरा मान लो या अधूरा मान लो। जो भी मान लो, आधा दुपट्‌टा नज़र से ओझल ही रहेगा। आधा दिखते को पूरा मान लेना होगा। दुनिया की सारी कहानियाँ अधूरी होती हैं। कविताएँ अधूरी होती हैं। प्रेम भी अधूरा होता है। प्राचीन साहित्य का इतिहास देख लिया जाए, कितनी सारी अधूरी रचनाएँ दिखती हैं। बाण की कादंबरी अधूरी रह गई। कहानी को आगे बढ़ाने का काम उनके बेटे भूषण ने किया। कालिदास की कुमार सम्भव को अधूरा ही माना जाता है, जाने किसने उसे पूरा किया। रघुवंश अपूर्ण है, यह मानने वाले भी कम नहीं। मेरी प्रिय पुस्तकों में से एक श्रीहर्ष की नैषध के बारे में भी विद्वान अपूर्णता के उदाहरण खोज लाते हैं। वेद व्यास ने महाभारत का नाम जय रखा था और उसकी शुरुआत में ही कह दिया है कि इस ग्रंथ में मैंने चौबीस हज़ार श्लोक ही लिखे हैं, लेकिन अब किताब में एक लाख श्लोक मिलते हैं। वेद व्यास को लगा था कि उन्होंने कहानी पूरी कर दी है, जाने कौन बीच में आ गया, जो उसने बाक़ी पौने लाख श्लोक उसमें जोड़ दिए? व्यास के पूर्ण काम को अपूर्ण साबित कर दिया? उसी में हरिवंश पुराण जुड़ गया। उसी में गीता जुड़ गई। जुड़ता ही गया। जिसमें कुछ भी नया जुड़ता जाए, वह हमेशा अपूर्ण रहता है। पुणे के भंडारकर इंस्टीट्यूट में बरसों रिसर्च चलती रही कि महाभारत के कौन-से हिस्से भाषा और शैली के हिसाब से अलग हैं और बाद में जोड़े गए हैं, उन्हे निकालकर एक अलग पाठ बनाया जाए। जाने कौन लोग होंगे, जो उस पाठ से संतुष्ट हो जाएँगे। यह भी जीवन की एक विडंबना ही है। आपको लगता है कि आप पूरे हैं, आपका काम पूरा हो गया, लेकिन समाज और दुनिया बता देती है कि आप अभी भी पूरे नहीं हैं। वेद व्यास को लगा था कि वह पूरे हैं, उनके बाद के लेखकों ने बता दिया कि नहीं, अधूरे हो। बुद्ध और गांधी को लगा कि वे पूरे हैं, काम पूरा कर दिया, पर दुनिया ने बता दिया कि ना, पूरे नहीं हो सकते। हम नई-नई विधियों से हिंसा करेंगे, नए-नए छल करेंगे, करुणा को भी एक बम की तरह फोड़कर लोगों की जान ले लेंगे और ऐसा कर-करके, ओ बुद्ध-ओ गांधी, हम बता देंगे कि तुम भी अधूरे ही रहे। जो पूरे होते, तो हम लोग तुम्हारे सपनों जैसा समाज बना ही देते। हम न बनाएँगे। हम तुम्हें पूरा ही नहीं होने देंगे।    
इस दुनियावी पूरेपन से पश्चिम के लोग ज़रा सावधान रहे। भले होमर की ईलियड और ओडिसी के भी अधूरे होने की चर्चा सुनाई देती हो, वे लोग अपनी किताबों के पाठ को लेकर शुरू से ही सतर्क रहे, इसलिए शायद उनमें नई कथाएँ नहीं जुड़ पाईं। 18 लाख शब्दों वाली महाभारत, होमर की किताबों से दस गुना बड़ी है। जो आकार में जितना बड़ा होता है, उसकी अपूर्णता भी उतनी ही बड़ी होती है। जिसके पास ज़्यादा ज्ञान होता है, उसी के पास ज़्यादा अज्ञान भी होता है।
ज्ञान और अज्ञान के संबंध को एक वृत्त की तरह समझा जा सकता है। ज्ञान, रोशनी का एक वृत्त है। उसके अंदर सब रोशन है। वृत्त के बाहर जो कुछ है, वह अज्ञान है। अज्ञान उस वृत्त की परिधि पर बैठा हुआ अंधेरा है। ज्ञान के वृत्त का आकार बढ़ाते जाइए, उसकी परिधि बढ़ती जाएगी और परिधि पर अज्ञान बैठा है, यानी अज्ञान का आकार बढ़ता जाएगा। जिन लोगों को लगता है कि बहुत पढ़-लिखकर, ध्यान-साधना कर वे अपना ज्ञान बढ़ा रहे हैं, दरअसल, वे अपना अज्ञान बढ़ा रहे हैं। महज़ इसी उदाहरण से यह समझा जा सकता है कि ज्ञान और अज्ञान के बीच किस तरह निरंतर बदलते रहने वाला एक अपूर्ण क़िस्म का संबंध है। इसी तरह का संबंध जीवन और कला के अन्य क्षेत्रों में भी खोजा जा सकता है।
श्रेष्ठ कलाएँ कभी पूर्णता की दौड़ नहीं दौड़तीं। अगर उन्हें कुछ अभीष्ट होता है, तो वह उस दुनियावी पूर्णता से अलग कोई चीज़ होती है। वे लगातार एक अपूर्णता की तरफ़ बढ़ रही होती हैं। दुनिया उसे पूर्ण की तरह देखने लगती है। यहीं पर दोनों के बीच द्वंद्व होता है। एक-दूसरे को ग़लत समझ लेने की दारुणता पैदा होती है। दुनिया की रफ़्तार बहुत तेज़ है। उसे कहीं नहीं जाना, इसलिए वह बहुत तेज़ दौड़ती है, दौड़ते-दौड़ते बहुत आगे निकल जाती है। कविता शनि ग्रह की तरह है, स्वभावत: धीरे चलेगी, ठहरकर देखेगी। दोनों का साथ चलना मुश्किल है। दुनिया आगे चली जाया करेगी, कविता पीछे से आवाज़ देती रहेगी कि ओ दुनिया, तुम ग़लत जा रही हो, सुनो, थोड़ा यू-टर्न लो, इस तरफ़ जाना है। कुछ लोग पूछते हैं कि जैसे पुराने समयों में कविता समाज का नेतृत्व करती थी, अब क्यों नहीं करती? उन्हें इस दृश्य से जवाब मिल जाना चाहिए—कविता अब भी नेतृत्व कर रही है, लेकिन आगे से नहीं, पीछे से। एक नेता आगे चलता है, हज़रत मूसा की तरह, सबसे आगे चलता हुआ सबको कहीं ले जाता है। दूसरा नेता जीसस जैसा होता है, जो सबसे पीछे खड़ा होता है और वहाँ से पुकारता है कि लौट आओ, ग़लत राह चले गए। कविता इस दूसरे नेता की तरह होती है। वह करुण स्वर में पुकारती है, लौट आने और राह बदलने की आर्त पुकार। कि आओ, हम दोनों एक साथ अधूरे बन जाएँ। देखो, तुम भी पूरे हो, मैं भी पूरी हूं, आ जाओ, जुड़कर हम एक नया अधूरापन गढ़ेंगे।
मैं क्या, किसी भी कवि या लेखक का डीएनए जाँचा जाएगा, तो वह अधूरी चीज़ों का देवता ही निकलेगा। जैसा साहिर कह गए थे- वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमक़िन, उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा। हम सब अपने जीवन में इसी ख़ूबसूरत मोड़ को तलाशते हैं।
सोचिए, हम साथ-साथ चल रहे हैं। हमें पता है कि हम कभी पूरे नहीं हो सकते, लेकिन किसी एक मोड़ पर मुड़ ज़रूर जाएँगे। हम एक गली के पास से गुज़रेंगे। मैं बिना बताए उस गली में मुड़ जाऊँगा। फिर कभी दिखाई नहीं दूँगा। मेरा कोई निशान नहीं बचेगा। मैं अपने अधूरेपन में खो जाऊँगा। क्या तुम दो पल को मुझे महसूस करोगे? गली जो आगे मुड़ती है, उसके मुहाने पर खड़े होकर इंतज़ार करोगे या आगे बढ़ जाओगे? मुझे याद कर-करके मेरे अधूरेपन में नए क़िस्से जोड़ोगे या मुझे भूलकर मेरे अधूरेपन की समिधा चढ़ा दोगे? इतना ही साथ था। साथ आधा छोड़कर चला जाऊँगा। उसे पूरा कह पाओगे? तब महसूस करोगे, जीवन की गली कभी पूरी नहीं होती, बस, आगे जाकर मुड़ जाती है।