Sunday, November 20, 2016

अजंता देव की नौ नई कविताएँ







नौ बत्ती टॉकीज- 

बार बार लौटती हूँ उन रास्तों पर 
जो गुलज़ार रहती थीं नौ से बारहबारह से तीनतीन से छहछह से नौ और फिर लास्ट शो तक 
रिक्शे वाले भी अब नहीं रुकते इन भग्न भवनों के आगे 
दीवारों पर पुराने पोस्टरों की गोंद पर जम गई है धूल 
उनके पीछे छिप गई हैं वो मारक आँखें 
और मैं अब भी ज़िंदा हूँ 
" जाने क्या ढूँढती रहती हैं ये आँखें मुझमें ऽऽऽ राख के ढेर में शोला है ना चिनगारी है "


नौ बत्ती टॉकीज-

वो लैम्प पोस्ट कहाँ है ?
कहाँ है रोशनी की वो शहतीर ?
सर्द रातों में बारिश का तिरछा गिरना कहाँ है ?
पृथ्वी के किस कोने में घटित हुआ था वह क्षण 
मुझे पूरा नहीं बस एक पल चाहिए 
जब ओवरकोट के खड़े कॉलर के बीच से उठता था लहराता धुआँ 
"जो भी है ऽऽऽऽ बस यही एक पल है ऽऽऽऽऽऽ"

नौ बत्ती टॉकीज-

कुछ मत कहो 
अभी दिन है 
सपाट रोशनी में बयान ही रहेगी सारी बात 
दिन ढलने दो 
अँधेरा अपने आप मिटा देगा वाक्यों से अर्थ 
"रात अंधेरी है ......बुझ गए दिये..आके मेरे पास..कानों में मेरे ..जो भी चाहे कहिए ऽऽऽऽऽऽऽऽ जो भी चाहे कहिए "

नौ बत्ती टॉकीज-

अंत में याद रहेगी इच्छा 
याद रहेगा ख़ालीपन 
मोहब्बत नहीं 
याद रहेंगे हो सकने वाले प्रेमी 
देर तक याद रहेगी गलियों में गूँजती आवाज़ 
"तू कहाँ ऽऽऽऽ ये बता इस नशीली रात में 
माने ना मेरा दिल दीवाना "

नौ बत्ती टॉकीज-

हम दो इकाई की तरह आस पास बैठते थे 
बीच में अंधेरे की तरह हमेशा होता था वो 
और अंधेरे की तरह अदृश्य भी 
परदे और मेरे साथ लगातार 
अब भी ढूँढती हूँ अँधेरा कोना 
उसका होना ,ना होना ,फिर से होना 
यों ही बीत जाते हैं दो घंटे 
हर बार एक ही गाना बजता रहता है 
"ये ही वो जगह है ...ये ही वो फ़िज़ाएँ 
यहीं पर कभी आप हमसे मिले थे ....."

नौ बत्ती टॉकीज -

यह कोई चतुर्थी या पूर्णिमा का नहीं 
तुम्हारे साथ का तुम्हारे पास का चाँद था 
जो रोज़ मेरे लिए आता था -अमावस में भी 
ठीक उसके पास उगता था एक सितारा 
मेरे लिए ,मुझे नज़र आने के लिए 
"ये रात भीगी भीगी ...ये मस्त फ़िज़ायें
उठा ऽऽऽ धीरे धीरे वो चाँद प्यारा प्यारा ऽऽऽ"

नौ बत्ती टॉकीज -

पूरी दीवार पर 
देखती आँखें थीं
ये होते हैं बड़े बड़े नयन 
मुझे तो लोग ऐसे ही कहते हैं मृगनयनी 
क्या तुम मेरा छोटा सा क़द देख पाओगे 
इतनी बड़ी आँखों से ?
या मैं ही गुनगुनाती रहूँगी बेवजह 
"आँखों ही आँखों में इशारा हो गया ऽऽऽ बैठे बैठे जीने का सहारा हो गया "

नौ बत्ती टॉकीज -

बम्बई नहीं इंद्रलोक था 
मैं जब उतरी दादर स्टेशन पर 
मेरे आलता रंगे पैरों की अदृश्य छाप
तुम्हारे घर के दरवाज़े तक चली आयी थी 
ये तुम्हारा शहर था 
अब तो तुम मिलोगे यहाँ वहाँ कहीं कभी 
अब ये मीना कुमारी का नहीं मेरा गाना था 
"यूँ ही कोई मिल गया था ऽऽऽसारे राह चलते चलते "

नौ बत्ती टॉकीज -

तुम्हारे पीछे से झाँकता है नया चेहरा 
सिगरेट के कश लगाता वो क़ातिल नज़रों वाला 
तुम्हारे हाथ तुम्हारे नहीं 
तुम्हारे होंठ तुम्हारे नहीं 
मैं भी नहीं होती हूँ तुम्हारी 
तुम ख़ुद अपना रक़ीब होते हो हर रात 
"फिर वही रात है ऽऽऽऽफिर वही ऽऽऽरात है ख़्वाबों की "
***

                                                                                                                                       ( सबद पर अजंता देव की अन्य कविताएँ यहाँ



12 comments:

Deepak Mishra said...

खूबसूरत शब्द और खलिश से भरी कविताएँ श्रभ।

नमिता जोशी said...

Bahut sundar ..aansoo nahi ruk rahe..sab panktiyan ek se badhkar ek..khas kar geeton ka chayan...

Jasmine Mehta said...

तुम्हारे पीछे से झाँकता है नया चेहरा
सिगरेट के कश लगाता वो क़ातिल नज़रों वाला
तुम्हारे हाथ तुम्हारे नहीं
तुम्हारे होंठ तुम्हारे नहीं
मैं भी नहीं होती हूँ तुम्हारी
तुम ख़ुद अपना रक़ीब होते हो हर रात
"फिर वही रात है ऽऽऽऽफिर वही ऽऽऽरात है ख़्वाबों की "

गज़ब ....

अति सुन्दर कवितायेँ
गहरे छू गई,
खासकर हम जैसे लोगों के लिए जो जीवन आज की दुनिया में जीते है लेकिन जेहन में अक्सर गीत पुराने गूँजते है...

कवितायेँ साझा करने के लिए आभार

imupasana said...

जो जीवन में स्मृति है, वही कविता में प्रेम है। वे बची हुई स्मृतियाँ जो समय ने काट-छाँट दी हैं अब हैं पोटली यादों की, जिनकी टूटी हुई कड़ियाँ जोड़ती हैं शहर की वे गलियाँ, जहाँ हम जाते थे; अब नहीं जाते...
वे फ़िल्में जो ज़िंदगी में केवल इसलिए देखी गयी कि कुछ समय साथ बैठा जा सके, वे चाहे कितनी भी कला-शिल्पहीन हों, बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वह पल जो संग में जी लिया गया, अमूल्य था।
वे गीत जो जब-तब गुनगुनाये गये- प्रेम में मुस्कुराते हुए, इंतज़ार में तड़पते हुए, याद में आँसू बहाते हुए
वे महज़ गीत नहीं थे। वे बन गए थे मंत्र जो फूँक देते थे प्राण जब भी उनको दुहराया गया।

अजंता देव की इन नौ कविताओं में तिलिस्म है, जिसे तोड़ने की कुंजी प्रेम है और जिसका रास्ता है स्मृतियाँ।
पहली कविता में जिस पुराने नौबत्ती टॉकीज का जिक्र है वह अब भग्न हो गया है लेकिन समय के पर्दे भेदकर देखती हुई वे मारक आँखे वैसी ही हैं।
दूसरी कविता में पृथ्वी के किसी कोने में जिया हुआ वह एक पल है जिसमें जीकर इंसान को अपने होने का मतलब समझ में आ जाता है।
अगली कविता में मुहब्बत के वे पल थे जिनकी जगह अफ़सोस रख लिया गया और अब वह ख़ालीपन में बदल गया है जो कहता रहता है कि हाथ बढ़ाया होता तो कहानी कुछ और हो सकती थी।
याद है फिर ख़ालिस, ठोस और भारी जो वक़्त गुजारना भी एहसान होने जैसा बना देती है।
और मुहब्बत में चाँद न आये तो वो कहानी अँधेरी रह जाती है। कभी महबूब की शक़्ल में तो कभी जलती रातों की ठंडक बनकर चाँद ही तो सहारा बनता है। और जब अँधेरा स्याह हो तो उगता है तारा- उसकी याद का।
सातवीं कविता मुझे सबसे सुंदर लगी जब पूछ बैठती है नायिका कि इन बड़ी-बड़ी आँखों से देख पाओगे मेरा छोटा कद! प्यार में वह पड़ाव चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने आ ही जाता है जो बता देता है खुद को अपना ही कद।
और प्यार की याद लिए हम गाते रह जाते हैं 'यूँही कोई मिल गया था....
और हम बन जाते हैं अज़नबी, बन जाते हैं कोई और, और इन सबमें सबसे ज्यादा बदल जाते हैं खुद के लिए। इश्क़- मुहब्बत कुछ और बनाये न बनाये, इंसान को खुद का दुश्मन तो बना ही देते हैं।

Anjana Tandon said...

बहुत खूब....कसकती स्मृतियाँ बन समय फिर उभरा है

Neiha Saxena said...

Neiha Saxena खूबसूरत!

Sudha Singh said...

Adbhut kavitayein. Hamesha umda likhti hain

Harshit Pareek said...

ये बेहतरीन है और मजेदार भी!

Swaranjali Pandey said...

गीतों के साथ तालमेल कर पूर्णता पाती हुई अच्छी रचनाए...

जया यशदीप said...


तुम्हारे पीछे से झाँकता है नया चेहरा
सिगरेट के कश लगाता वो क़ातिल नज़रों वाला..



आपको पढना हमेशा ही सुखद और गुदगुदाहट भरा अनुभव होताहै ।

प्रदीप कांत said...

अच्छी कविताएँ पढ़ने को मिली
आभार

पंकज said...

कविता का फुटना कभी भी साधारण घटना नहीं हैं, अंदर से किसी घटना जब सम्पूर्णता से मनषय को उद्धेलित करती है तो अक्सर कविता सहारा देती हैं ऐसा ही कुछ मेडम की कविता में ऐहसास होता हैं ।
अच्छा लिखने का सबसे बेहतर लाभ पाठक को होता हैं ।
उसी कतार का इक हिस्सा खुद को देखता हूँ