Saturday, October 08, 2016

अजंता देव की पाँच नई कविताएँ


                                                                                                              तस्वीर: शायक आलोक 



काली लड़की -

काली आँखें
काले बाल
काला तिल
जब सौंदर्य शास्त्र ने इतनी काली चीज़ें गिना रखी है
त्वचा का कालापन क्यों नहीं
क्यों अपना काला दिल बचाकर
किसी का चेहरा स्याह किया जाता है
क्यों सिर्फ़ अंधेरे में सहलाई जाती है काली देह
सवेरे हिक़ारत से देखे जाते है अपने  ही नाखूनों के निशान
काले और लाल के लोकप्रिय रंगमेल में

काली लड़की -

यह मेरे लहू का लोहा था
जो रिस कर गया था मेरी त्वचा पर
चमकता था पसीना नाक पर
काले रंग की पालिश की तरह
मैं हर रंग की  पृष्ठभूमि  पर उभर आऊँगी
मत लगाओ मेरे गाल पर ब्रोंजर
थोड़ी देर धूप में रह कर
लोहे को ताम्बा बना दूँगी
क़ीमियागरी से

काली लड़की -

लोहे को लोहा ही काटेगा
सुवर्ण नहीं
चाँदी तो बिलकुल नहीं
लोहे को अगर  कोई नष्ट करेगा तो वह पानी है
यह पानी काली आँखों  में आए आँसू भी हो सकते हैं

काली लड़की -

मैं इसी जंगल में हो सकती थी
इसी मौसम में
गर्म और नम मिट्टी से
ये मेरी आँच है जिसने  तपा दिया है मेरी त्वचा को
मेरा तापमान बढ़ते ही पिघलने लगते हैं ग्लेशियर
पर्वतों  की चोटियाँ फिर से भूरी होने लगतीं हैं

काली लड़की -

आख़िर किसके डर  ने काले को  बनाया डरावना
और फिर घिनौना
क्या वह कोई बच्चा था अंधेरे में काँपता
या कमज़ोर शिकारी बलवान के आगे
क्या रति स्पर्धा में कोई टिक नहीं पाया था मज़बूत और गहरे रंग की पेशियों के सामने
क्यों किसी को शक्ति और काला एक सा लगा था

ये धीरे धीरे नहीं
अचानक डर था
जो तुरंत बदल गया था बचाव के संदेश में

दिमाग़ अब भी वही संदेश भेजे जा रहा है झटका खाए मशीन की तरह
***

(अजंता हिंदी कविता की अत्यंत महत्वपूर्ण स्त्री-स्वर हैं। सबद पर उनका सृजन पहली दफ़ा)