Thursday, April 21, 2016

गीत चतुर्वेदी की दस नई कविताएं



                                                                                                                                                         कवि की तस्‍वीर : अनुराग वत्‍स



गीत चतुर्वेदी अपनी कविता में विरल विपर्ययों का सघन बसाव करते हैं : "बीते ज़मानों में जितने भी संत हुए / उन्‍हें सबने फूलों की तरह नाज़ुक पाया / फिर भी उनकी जितनी मूर्तियां बनीं / सब सख़्त पत्‍थरों से बनीं" या "हर वक़्त खड़े रहना हर वक़्त प्रतीक्षा करना है / बैठकर किए गए इंतज़ार में भी इंतज़ार तो खड़ा ही रहता है"। ऐसी बसावट फ़क़त काव्य-युक्ति से मुमकिन होती, तो रफ़ूगर का काम भी दिख जाता । लेकिन गीत के यहाँ इस युक्ति का लोप उस असम्बद्ध आंतरिकता में होता रहा है, जो उनकी कविता की सबसे पहली और मुकम्मल पहचान है। यह असम्बद्ध आंतरिकता कुछ-कुछ वैसी ही है, जैसे जल की पोटली पर कमल-गांठ। 

आगे गीत चतुर्वेदी की 10 नई कविताओं का सुवास है। सबद पर उनकी अन्य कविताएँ यहाँ पढ़ी जा सकती हैं।



 ख़ुशियों के गुप्‍तचर


एक पीली खिड़की इस तरह खुलती है 
जैसे खुल रही हों किसी फूल की पंखुडि़यां. 

एक चिडि़या पिंजरे की सलाखों को ऐसे कुतरती है 
जैसे चुग रही हो अपने ही खेत में धान की बालियां.

मेरे कुछ सपने अब सूख गए हैं 
इन दिनों उनसे अलाव जलाता हूं 

और जो सपने हरे हैं 
उन्‍हें बटोरकर एक बकरी की भूख मिटाता हूं 

मेरी भाषा का सबसे बूढ़ा कवि लाइब्रेरी से लाया है मोटी किताबें 
चौराहे पर बैठ सोने की अशर्फि़यों की तरह बांटता है शब्‍द

मेरे पड़ोस की बुढि़या ने ईजाद किया है एक यंत्र जिसमें आंसू डालो, तो 
पीने लायक़ पानी अलग हो जाता है, खाने लायक़ नमक अलग.

एक मां इतने ममत्‍व से देखती है अपनी संतान को 
कि उसके दूध की धार से बहने लगती हैं कई नदियां 

जो धरती पर बिखरे रक्‍त के गहरे लाल रंग को 
प्रेम के हल्‍के गुलाबी रंग में बदल देती हैं. 


चेतना का सतत प्रवाह
 (अनिता गोपालन के लिए)


शिवकुमार बटालवी कह गया है : 
भरी जवानी जो भी मरता है, या तो फूल बन जाता है या तारा. 
भरी जवानी आशिक़ मरता है या फिर करमों वाला. 

*
बहुत छोटा था मैं 
तब मेरी दीदी मर गई थीं भरी जवानी.
बरसों तक मैं एक बग़ीचे में लेटकर आसमान देखता रहा. 
एक सितारा रोज़ अपनी जगह से मुझे देखता था. 
मैंने कहा, ज़रूर वह दीदी होंगी. 
जब वह मरी थीं, तब उनकी आंख में एक आंसू अटका हुआ था. 
वह कभी गिर नहीं सका.  
उससे पहले ही डॉक्‍टर ने दीदी की आंखें मूद दी थीं.
सितारा दीदी के आखि़री आंसू की तरह चमकता था. 

(बड़े होने पर पता चला कि सितारे, हर बच्‍चे के रिश्‍तेदार होते हैं. मुझे बड़ा होना नापसंद गुज़रा.)

उस सितारे की भी कोई दीदी मरी होंगी 
तब वह जाने किस दूसरे सितारे को अपनी दीदी मानकर देखता होगा. 

मैं अब भी कभी-कभी देखता हूं उस सितारे को 
(पता नहीं, वह वही बचपन वाला है या कोई और) 
वह जिस लय पर टिमटिमाता है 
मेरा दिल ठीक उसी लय पर धड़कता है. 

इस तरह मेरी दीदी 
मेरे दिल की थाप के साथ जुगलबंदी करती हैं. 

*
ज़हरीला चूहा खाने से मेरी सबसे प्‍यारी बिल्‍ली मर गई थी. 
बरसों तक बादलों में उस बिल्‍ली का आकार नज़र आता. 
जब चित्रकार मरते होंगे, तो वे बादल बन जाते होंगे. 
इसीलिए बादल घड़ी-घड़ी इतने रेखाचित्र बनाते हैं. 

*
कविता क्‍या है
मेरे पिछले जन्‍मों की चिताओं की राख पर 
उगा हुआ जंगली फूल है. 

जिसका गुच्‍छा बनाकर मैं कभी-कभी औरतों को देता हूं. 

मेरी जलती हुई पुरानी देहों की ख़ुशबू 
सिर्फ़ मुझे बेचैन करती है. 

*
हर सितार का एक तार अपने अतीत में बजता है. 

जिन्‍हें अमरता पर संदेह है 
उन्‍हें बताना चाहता हूं 
ढाई हज़ार साल पुरानी एक कविता की आत्‍मा 
मेरी अधूरी कविताओं के खंडहर में भटकती है 
मुक्ति की कामना में अपने पदचाप का गीत गाती.
आधी रात मैं डरकर उठता हूं पसीने से तर 
गटगटाकर बोतल से पानी पीता हूं. 

एक बहुत पुराना रूपक 
खिलखिलाते हुए मेरी फिरकी लेता है. 


कविता का प्रतिबिंब 


हममें इस तरह का जुड़ाव था 
कि आंखें अलग-अलग होने के बाद भी 
हम एक ही दृष्टि से देख सकते थे 
इसीलिए ईश्‍वर ने हमें जुड़ने का मौक़ा दिया 

हम इस क़दर अलग थे 
कि एक ही उंगली पर 
अलग-अलग पोर की तरह रहते थे 
इसीलिए ईश्‍वर ने हमें अलग कर दिया 

हम जुड़े 
इसका दोष न तुम्‍हें है न मुझे 
हम अलग हुए
इसका श्रेय न तुम्‍हें है न मुझे 

ऐसे मामले में 
ईश्‍वर को मान लेने में कोई हर्ज नहीं 
जी हल्‍का रहता है

हम जुड़वा थे 

हममें से एक तालाब किनारे लेटी देह था 
और दूसरा पानी से झांकता प्रतिबिंब 

देह ने पानी में कूदकर जान दे दी. 
प्रतिबिंब उछलकर पानी से बाहर निकला
और मर गया. 

दीग़र है यह 
कि हम कभी तय नहीं कर पाए 
कौन देह था, कौन प्रतिबिंब. 


बायोडाटा
(एडम ज़गायेव्‍स्‍की के लिए)


हां, यह बताऊंगा कि क्‍या-क्‍या लिखा, कहां-कहां छपा आदि-आदि
लेकिन यह भी कि एक सिर जहां सारे जंगल सूख गए 
और दो आंखें जिनमें भूला हुआ संगीत सितारा बनकर रहता 
और एक शरीर जिस पर जगह-जगह ज़ख़्मों के निशान
जैसे पोलिश कवियों ने अपनी कविताएं वहां चिपका दीं. 
और एक दिल जिसके होने का अहसास कोलेस्‍ट्रोल की दवाओं ने कराया 
और एक आत्‍मा जो आवारा बिल्लियों की तरह हमेशा घर से बाहर नज़र आती.


दिल से सुनना


परसों मैंने एक रेल देखी
उसकी छत पर उगा हुआ था
घास का इकलौता हरा तिनका.
एक मुसाफि़र तिनका.

बीते ज़मानों में जितने भी संत हुए
उन्‍हें सबने फूलों की तरह नाज़ुक पाया
फिर भी उनकी जितनी मूर्तियां बनीं
सब              सख़्त पत्‍थरों से बनीं

सारे फूल एक दिन पत्‍थरों में तब्‍दील हो जाते हैं

किसी मूर्ति ने अपने कानों को ढंक के नहीं रखा
क्‍योंकि हम जो कुछ भी बोल रहे हैं, वह सुनना चाहती है

कवियों की मासूमियत पर सवाल न करो
सिर्फ़ वही हैं जो ताउम्र करते हैं इंतज़ार
कि सुनती हुई वह मूर्ति एक दिन बोल भी पड़ेगी

सात जीवन भी कम पड़ते हैं
किसी पत्‍थर को वापस फूल बनाने में.

मैं उस संगीतकार को सुनता हूं जो बिना कान के संगीत रचता है
मैं उस कवि को पढ़ता हूं जो बिना आंखों के सुंदर काव्‍य रचता है
क्‍या यह काफ़ी नहीं यह बताने के लिए कि मेरी मां का नाम आशा है

कवि हूं मैं, उम्‍मीद का बेटा हूं

वान गॉग का कटा हुआ कान
मेरे सीने में दिल बनकर धड़कता है
उस कान से सुनता हूं मैं
दुनिया की बारीक से बारीक आवाज़
जो कि उम्‍मीद की आवाज़ हो
मेरी मां की आवाज़

और दौड़कर उस आवाज़ से लिपट जाता हूं
किसी साज़ के जैसे.
किसी बछड़े की मानिंद.  


अब की स्मृति 
 (एदुआर्दो चिरिनोस के लिए)


नीचे के कमरे में एक मोमबत्ती जलता छोड़ आया था 
लौटूंगा, तो उसकी रोशनी में चार लाइनें पढ़ूंगा 

लौटने से पहले ही मोमबत्ती बुझ चुकी थी 
वे चार लाइनें मासूमियत की तरह मिट चुकी थीं 

मेरे साथ इस तरह चलती हो तुम
जैसे रेलगाड़ी की खिड़की से झांक रहे बच्‍चे के साथ-साथ चलता है चांद. 

एक दिन मैं बाल्कनी में खड़ा हो गया 
आसमान की ओर अपना रूमाल हिलाने लगा  

जो लोग मुझे अलविदा कहे बिना चले गए  
वे बहुत दूर से भी मेरा रूमाल पहचान लेंगे

मेरे रूमाल में अपने आंसू वे इस तरह छोड़ गए हैं  
जैसे आदिमानव छोड़ गए गुफ़ाओं की दीवारों पर खुरचे हुए चित्र

ल्योतार कहता था हर वाक्य एक अब होता है 
नहींदरअसल वह अब की स्मृति होता है 

हर स्मृति एक कविता होती है 
हमारी किताबों में अनलिखी कविताओं की संख्या ज़्यादा होती है


व्‍युत्‍पत्तिशास्‍त्र


एक था चकवा. एक थी चकवी. दोनों पक्षी हर समय साथ-साथ उड़ते. अठखेलियां करते. पंखों से पंख रगड़ तपिश पैदा करते.
(भाषाशास्‍त्री नोट करें : प्रेम की उत्‍पत्ति 'साथ' से हुई.)

एक रोज़ शरारत में उन्‍होंने एक साधु की तपस्‍या भंग कर दी. साधु ने शाप दे दिया कि आज से तुम दोनों का साथ ख़त्‍म. जैसे ही दिन ढलेगा, चकवा नदी के इस किनारे होगा और चकवी नदी के उस किनारे. 
(भाषाशास्‍त्री नोट करें : प्रेम की उत्‍पत्ति 'विरह' से हुई.)

दिन-भर चकवा और चकवी एक-दूसरे को पहचानते तक नहीं. जैसे ही अंधेरा छाता, वे उड़कर नदी के विपरीत छोरों पर चले जाते. वहां से सारी रात अपने प्रेम की वेदना की कविता गाते. मिलन की प्रतीक्षा करते. 
(भाषाशास्‍त्री नोट करें : प्रेम की उत्‍पत्ति 'कविता' से हुई.)

रात-भर दोनों दुआ करते कि किसी तरह साधु ख़ुश हो जाए और अपना शाप वापस ले ले. लेकिन शाप देने के बाद साधु लापता हो गया. वह साधु शब्‍द में भी नहीं बचा. प्रेम को लगा शाप कभी वापस कहां होता है
(भाषाशास्‍त्री नोट करें : प्रेम की उत्‍पत्ति 'शाप' से हुई.) 

चकवी अक्‍सर मेरी कविताएं पढ़ती हैं. पढ़-पढ़कर रोती है. कहती है, 'चकवा जो गाता है, तुम वह लिखते हो. ऐसा आखि़र कैसे करते हो? तुम चकवा हो?'

भोली है. यह नहीं जानती, मैंने कभी कोई कविता दिन में नहीं लिखी. 

(भाषाशास्त्री अब नोट करना बंद करें : प्रेम और कविता जब शुरू होते हैं, तब भाषा का कोई काम नहीं बचता. इतिहास में जितने भी महान प्रेमी हुए, उनमें एक भी भाषाशास्त्री न हुआ.) 

पोस्‍ट-स्क्रिप्‍ट : 
हर शाम चकवी पूछती है : 'रात-भर जागोगे? ऐसी कविता लिखोगे, जो नदी के दोनों किनारों को जोड़ दे?'


आम 
मुझसे पूछोतुम्‍हें ख़बर क्‍या है 
आम के आगे नेशकर क्‍या है 
                                 - ग़ालिब

  
आम चूसना एक निहायत निजी गतिविधि है 

घंटों पानी में भिगोकर 
चोपी हटाकरउसे पिलपिला बनाकर
मुंह से लगाकर जब उसे चूसा जाता है 
तो यौन-क्रियाएं याद आ जाती हैं 

किसी के सामने इस तरह आम चूसना 
अश्‍लील चुटकुलों से ज़्यादा अश्‍लील लग सकता है 
इसीलिए आम को अकेले में चूसना चाहिए 
जब कोई देख तक न रहा हो 

ग़लतियों की शुरुआत जीवन में यहीं से होती है 

सच तो यह है कि 
आम दिल की तरह होता है 
सबसे ज़्यादा मीठा तब लगता है 
जब दो लोग उसे मिलकर खाएं. 


पानी का पौधा


पानी के परदे के पीछे से झांकता बुद्ध का चेहरा
पानी के पौधे की तरह कांपता है
बुद्ध की पलकें पेड़ों पर पत्तियां बनकर उगती हैं

क्या तुम ईश्वर हो?
-नहीं, मैं ईश्वर नहीं

सफ़र करते हुए कहीं से जुटाती हो आग
जब सबकुछ बनाया जा सकता है मन के भीतर
तुम अपने लिए महज़ एक कप चाय बनाती हो

क्या तुम गंधर्व हो?
-नहीं, मैं गंधर्व भी नहीं

रहस्यों से मेरा पुराना परहेज़ है
और तुम उंगली पकड़ हर बार एक नए रहस्य की ओर ले जाती हो
मैं पहले ही पढ़ लेना चाहता हूं आखि़री पृष्ठ
सुरंग की तरह मेरे भीतर से गुज़रते हैं रहस्य

क्या तुम यक्ष हो?
-नहीं, मैं यक्ष भी नहीं

कमरे के कोने में एक भिक्षु बैठने से इंकार करता है
हर वक़्त खड़े रहना हर वक़्त प्रतीक्षा करना है
बैठकर किए गए इंतज़ार में भी इंतज़ार तो खड़ा ही रहता है

क्या तुम मनुष्य हो?
-नहीं, मैं मनुष्य भी नहीं

तुम लगातार ख़ुद को शॉल से ढांपे रखती हो
और पढ़ी हुई हर कहानी को अपनी कहानी की तरह पढ़ती हो
जबकि मैंने भ्रम के स्टेशन से भ्रम को जाने वाली गाडिय़ां पकड़ीं
बीच में जितने भी स्टेशन आए सबका नाम मैंने भ्रम पाया

इन सबमें तृष्णा है
मैं महज़ अतृष्ण हूं

सारे रहस्य मनुष्यों की तरह नश्वर हैं
बस, सबकी आयु अलग-अलग बदी है
अदृश्‍य में कोई परदा नहीं होता

हम दोनों एक ही जिल्द में रहेंगे
लेकिन हमारे बीच कई पन्नों का फ़ासला होगा
दूरियां लांघे बिना ही
मेरी ऊर्जा तुम्हारी ऊर्जा का आलिंगन करेगी

संगति ऐसे भी बनती है



बांसुरी


छिपकली में बचा रहता है मगरमच्‍छ
मगरमच्‍छ में बचा रहता है डायनासोर 
जंगली भेडि़यों के अंश घरेलू कुत्‍तों में
1700 साल पुराना एक कवि 17 साला युवा कवि में 

जो अधूरा छूट जाता है, सिर्फ़ वही होता है संपूर्ण
जो बिछड़ गए अधराह, वही हमसफ़र होते हैं 
यह लिखकर मैं बोर्हेस को याद करता हूं 
जैसे कोई बिरहन अपने पी को याद करती हो

महसूस करता हूं
संपूर्ण को स्‍वल्‍प में संरक्षित किया जा सकता है 

मैं अपने भीतर के पशु को कभी सुला नहीं पाया 
मुझमें हिंसा भरी हुई थी मैं हिंसा का शमन नहीं कर पाया 
मेरे शब्‍दों की हिंसा से तुम्‍हें चोट लगा करती थी 
मैंने चुप्‍पी की हिंसा अपना ली

विकल्‍प सिर्फ़ इतना होता है जीवन में 
कि एक हिंसा को त्‍याग दूसरी हिंसा चुनी जा सके 

जीवन से जो लोग गए, वे सब हवा बन गए
अब मेरी बांसुरी के छिद्रों से कभी-कभी बाहर झांकते हैं.



55 comments:

महेश तिवारी said...

गीत भाइ आपकि कविताए आत्मा को अंदर तक छु जाती है । एक एक पंक्ति अपने आप मे संपुर्णता लिये हुए है ।

Sunil Kumar Mishra said...

गीत आप हर बार मुझे नि:शब्द कर जाते हैं । गीत आपकी कविताओं को मैं बहुत प्यार करता हूँ इतना कि हर बार आपकी कविताओं का इंतज़ार बना रहता है ।

डॉ. सुमीता said...

Kya khoob kavitayen hain! Wah.

Jeet Singh said...

जिसकी क़लम की स्याही का ख़्याल खुदा रखता है,
वही शख़्स इतना गहरा और सुंदर लिख सकता है.
Stay blessed and keep writing Sir.

Parmendra Singh said...

विलक्षण @खुशियों के गुप्तचर

किंशुक शिव said...

क्या कहूँ निशब्द बस ।

Shashank Garg said...

वाह्ह बन्धु

धर्मेन्द्र कुमार सिंह said...

सागर तल से मोती लाना सबके बस की बात नहीं, गीत के ही बस की बात है

Mukesh Mishra said...

नाटकीय स्थितियों को एक अनुक्रम में बाँधते संवाद-संलाप में व्यक्त आख्यानपरकता गीत चतुर्वेदी की कविताओं के बिम्बों में जिस प्रखरता, लपट और रागात्मक उन्मेष का अहसास कराती है - उसके चलते वह अनुभूति के विविधता भरे रंगों व धरातलों से सामना कराती है । उनकी कविता की यही बात एक पाठक के रूप में मुझे सम्मोहित करती है |

Shobha Prabhakar said...

बहुत सुंदर रचनाएँ. संपादकीय ब्यौरा भी खूब है.

Hirendra Jha said...

मेरे प्रिय कवि को सलाम

Gunjan Sharma Mukherjee said...

कितना सुन्दर

Gauri Ks said...

वाह!

Gur Preet said...

Kamaal

Shifalee Pandey said...

aah kamaal geet jee

Urmy Malik said...

Oh kya likh diya !

Harish Bhatia said...

Waah...

Narendra Pundrik said...

BHUT HI UMDA KVITAYE HAI BHAI

Samartha Vashishtha said...

बहुत, बहुत उम्दा कविताएँ। हर स्तर पर कालजयी।

Sonali Navangul said...

वाह

Vivek Savarikar Mridul said...

Geet....aapki kavitaye itni ander tak jati hain...ki aapko TUM jitna apna samjhne lagta hai..jaise koi dost pichhe se aakar aapki aankh band kar kahta ho ..pahchan koun,itna TUM

Rachana Dubey said...

वाह बहुत खूब .....

Vishakha Rajurkar Raj said...

वाह! बहुत सुन्दर! बधाई smile emoticon

Bina Vachani said...

Very touching , Thanks

Sanjay Sailaani said...

Sabse pyare Geet Chaturvedi ko padhiye.
Inko padh kar aap khud se mukhatib honge.sath hi us duniya se rubaru ho paayenge jo duniya basti to hai Par saadharan aankhon se nazar nahi aa paati.
Geet apne aap me virle samundar hai, jinhone samundar ke namak ko swaad badhane ke liye alag kar rakha hai.
Aapke paas peene ke liye samoocha samundar hai, dhero ratn hai is samundar me, talaashiye.dhero jeewan hain inke bheetar,jaaniye.
Aur lutf leejiye.

‪#‎mrhIndia‬

‪#‎magicalgeet‬

‪#‎poet‬
‪#‎jaadugar‬
‪#‎oceanofemotions‬
‪#‎favouritepoet‬

Anju Sharma said...

अद्भुत कवितायें, शब्दातीत, वर्णनातीत ....अभी पता नहीं कितनी बार और पढ़ना है, यूँ भी मुझ पर इलज़ाम है कि अपने व्हाट्स एप ग्रुप में बार बार गीत को ही पढवाती हूँ :)

Jai Narain Budhwar said...

मेरे प्रिय कवियों में एक।गीत तुमसे बहुत कुछ पाना है अभी।

Preet Paul Hundal said...

Maar daala....🎶@ one of madhuri's song

Tarsem Meetu · said...

कमाल कविता लिखते हो।

Sushila Puri said...

'व्यतुपत्तिशास्त्र ' सबसे अच्छी कविता

Vidhu Lata said...

भाषा आणि भावांच्या जंगलात खूबच छान

Beau La Vie said...

कविता का कोई अपना रंग नही होता, जैसे पानी का भी अपना कोई रंग नही होता। आपकी कवितायें हर मन मुताबिक़ हो जाती हैं और उनके पुनर्पाठ से वो हर बार और क़रीब आ जाती हैं मन के......

Sonnet Zade Sunita said...

मेरे शब्‍दों की हिंसा से तुम्‍हें चोट लगा करती थी
मैंने चुप्‍पी की हिंसा अपना ली
विकल्‍प सिर्फ़ इतना होता है जीवन में
कि एक हिंसा को त्‍याग दूसरी हिंसा चुनी जा सके ... ohh Geet

Gurbinder Punn said...

Masha Allah

Banwari Kumawat Raj said...

kamaaal kavi...

Vihang Salgat said...

behtrin geet bhai

अंजनी कुमार सिंह said...

वाह बेहतरीन .....

Rupa Singh said...

Aah..bahut khub.

Ravindra Vyas said...

sunder marmik!

Amit Mandloi said...

shandar

sarita sharma said...

गीत की ये कवितायेँ पढना गहरे चिंतन में डूबने का अनुभव है. 'खुशियों के गुप्तचर' विषमता के बीच आशा जगाती सबसे मार्मिक कविता है. 'चेतना का सतत प्रवाह' मानव और कविताओं की आत्मा की अमरता को दर्शाती है. 'कविता का प्रतिबिम्ब' मूर्त और अमूर्त की अदला- बदली और अविभाज्यता की ओर संकेत करती है. 'बायोडाटा' एडम के प्रति प्यारी सी अनुभूति है. 'दिल से सुनना' कवि द्वारा उम्मीद की आवाज को सुना जाना है. 'अब की स्मृति' एदुआर्दो चिरिनोस के बिना विदा लिए अचानक चले जाने के आघात को व्यक्त करती है. 'व्युत्पत्तिशाष्त्र' में प्रेम की उत्पत्ति के विभिन्न स्रोतों और भाषा की सीमाओं को अनूठे ढंग से दिया गया है. आम दिल की तरह मीठा है और 'पानी का पौधा' पानी, आग, बुद्ध, ईश्वर, भ्रम, तृष्णा, रहस्य, इंतजार जैसे प्रश्नों को उठाते हुए प्रेम की संगति स्थापित करती है. 'बांसुरी' में अधूरेपन की सम्पूर्णता है और जीवन से जाने वाले लोगों के शब्द बांसुरी के छिद्रों के माध्यम से हवा बनकर गूंजते रहते हैं.

Amrita Bera said...

संदर्भ - बांसुरी : असाधारण । बड़ी गहराई में जाकर किसी सूक्ष्म भावना की रग़ पर हाथ रखा है आपने । एक नावाक़िफ़ एहसास - कब हम चुप्पी की हिंसा अपना लेते हैं, हमें ख़ुद इसका एहसास नहीं होता । शायद अंजाने ही किसी बात का बदला ले रहे होते हैं । आपके कवि मन ने ख़ूब पहचाना इसे ।

Bhalchandra Joshi said...

गीत भाई तुम्हारी कविताओं के बारे में फेस बुक पर उपलब्ध जगह कम है । कितने भी बड़े और ईमानदार वाक्यों का समूह कविताओं की मानवीय मार्मिकता की सघन अभिव्यक्ति के लिए कम रहेंगे । बधाई ।

Ratnesh Kumar said...

सर हम तो आपके दीवाने हो गए,"व्युत्पत्तिशास्त्र ",

प्रियंका said...

बहुत ही सुंदर कविताएं हैं, जो मन को गुदगुदाती हैं और अपनी छाप छोड़कर जाती हैं।

Sadhana said...

हर दो या चार लाइनों के बाद कविता के भीतर की दुनिया बदल जाती है। ये कविताएं एक यात्रा की तरह हैं। जैसे एक ट्रेन चल रही हो... बीच बीच में अनजान स्‍टेशन आ रहे हों और हम एक बिल्‍कुल अनजानी दुनिया से परिचित हो रहे हों। भीतर की दुनिया के स्‍टेशन और बाहर की दुनिया के स्‍टेशन... एक साथ दो यात्राएं। आपकी कविताएं पढ़ते हुए वो आनंद आता है जो उर्दू के उस्‍ताद शायरों को पढ़ते हुए आता है!
वाह उस्‍ताद!!!!!!

विधुल्लता said...

कल टिप्पणी करती हूँ सभी कोई शब्द नही मेरे पास

Om Nishchal said...

गीत की कविताओं का हम उसी तरह स्‍वागत करते हैं जैसे कोई किसान अपनी नई फसल की अगवानी करता है। कविता होना क्‍या होता है तमाम कविताओं को पढते हुए पता ही नहीं चलता, पर गीत की कविताओं में ऐसी कौंध जगह ब जगह मिलती है जो अपने कविता होने का ऐलान करती है।

स्‍वागत नई कवितााअों को। पढेंगे अौर आनंदित होंगे।
सफर जारी रहे। किताब आनी चाहिए अब। अंतराल काफी हो गया।

*

इन कविताओं के प्रस्‍तावन में यह कहा गया है कि 'इनमें विरल विपर्ययों का बसाव है ' और यह भी कि ' ऐसी बसावट फ़क़त काव्य-युक्ति से मुमकिन होती, तो रफ़ूगर का काम भी दिख जाता ।'

बहरहाल विरल विपर्ययों का बसाव या बसावट हो न हो। पर गीत की कविताओं में वह कसावट जरूर है जिनमें कवि का अंगड़ाई लेता लचीलापन भी दिखता है। एक एक अवधारणा के बोध के लिए गीत चिंतन की खुरदुरी सतह को कितना सुचिक्‍कन बना देते हैं । जरा सी बात और पूरी चेतना लहूलुहान हो उठे, कवि ऐसा ही तो होता है।
देखिए कैसा अपराधबोध लहलहाता है कविमन में कि न शब्‍दों कीहिसा उसे चैन लेने देती हे न चुप्‍पी की हिंसा:----

मैं अपने भीतर के पशु को कभी सुला नहीं पाया
मुझमें हिंसा भरी हुई थी मैं हिंसा का शमन नहीं कर पाया
मेरे शब्‍दों की हिंसा से तुम्‍हें चोट लगा करती थी
मैंने चुप्‍पी की हिंसा अपना ली

Sarita Sharma said...

गीत आपकी कविताओं को बार-बार पढ़ा जा सकता है. सबसे अच्छी कविता 'ख़ुशियों के गुप्‍तचर' लगी. 'कवि हूं मैं, उम्‍मीद का बेटा हूं' और 'जो अधूरा छूट जाता है, सिर्फ़ वही होता है संपूर्ण' ये पंक्तियाँ सिर्फ आप लिख सकते हैं.

Himani Diwan said...

Wat a relaxing statement... Warna jindagi is adhurepan KO bharne ki koshishon mein bitti h to .... Bharne vale jante h kya hota h ... Ur poems are as beautiful as life
geet sir

Jai Narain Budhwar said...

गीत।मेरे प्रिय कवि।

Harish Bhatia said...

Your poetry is unique,Geet,different...Every poem is laced with many layers,interwoven into a holistic experience for the insightful connoisseur...Bahut Sundar!!

Aditya Choudhary said...

अब हम कैसे ना हो तुम्हारे कायल।

Shree Shree said...

'कवियों की मासूमियत पर सवाल न करो
सिर्फ़ वही हैं जो ताउम्र करते हैं इंतज़ार
कि सुनती हुई वह मूर्ति एक दिन बोल भी पड़ेगी'

ये कविताएं मन में टीस भी पैदा कर रही हैं और किसी के होने की दस्तकें भी संभालें हैं।
एक पूरा फलक है आपके पास जिसमें हम हमेशा रहना चाहेंगे। आत्मा से लिखे शब्द आत्मा में ही उतारते हैं।

allahabadi andaaz said...

Har kavya deh ki peeda hai, vichlit vichaar hai keval mann!