Friday, June 28, 2013

विचारार्थ : तीरथ में भई पानी



भारत की नदियाँ



-- राममनोहर लोहिया 

अब मैं ऐसे मुद्दे पर बोलना चाहता हूँ जिसका ताल्लुक आमतौर पर धर्माचार्यों से है लेकिन जब से वे ग़ैरज़रूरी और बेकार बातों में लिप्त हो गये हैं, इससे विरत हैं. जहाँ तक मेरा सवाल है, यह साफ़ कर दूँ कि मैं एक नास्तिक हूँ. किसी को यह ग़लतफ़हमी न हो कि मैं ईश्वर पर विश्वास करने लगा हूँ. आज के और अतीत के भी भारत की जीवन-पद्धति, दुनिया के दूसरे देशों की ही तरह, लेकिन और बड़े पैमाने पर, किसी न किसी नदी से जुड़ी रही है. राजनीति की बजाय अगर मैं अध्यापन के पेशे में होता तो इस जुड़ाव की गहन जाँच करता. राम की अयोध्या सरयू के किनारे बसी थी. कुरु, मौर्य और गुप्त साम्राज्य गंगा के किनारों पर फले-फूले, मुग़ल और शौरसेनी रियासतें और राजधानियाँ यमुना के किनारों पर स्थित थीं. साल भर पानी की ज़रूरत एक वजह हो सकती है, लेकिन कुछ सांस्कृतिक वजहें भी हो सकती हैं. एक बार मैं महेश्वर नाम की जगह में था जहाँ कुछ समय के लिए अहल्या ने एक शक्तिशाली शासन स्थापित किया था. वहाँ ड्यूटी कर रहे संतरी ने यह पूछकर मुझे दंग कर दिया कि मैं किस नदी का हूँ. यह दिलचस्प सवाल था क्योंकि मेरी भाषा, मेरे शहर या मेरे क़स्बे  के बारे में पूछताछ करने की बजाय उसने मुझसे मेरी नदी के बारे में पूछा. सभी बड़े साम्राज्य नदी-तटों पर बसते आए हैं, - चोल, पांड्य और पल्लव साम्राज्य क्रमशः कावेरी, व्यगीर और पालर नदियों के किनारों पर थे.

हमारे देश की कुल चालीस करोड़ की आबादी में से तक़रीबन  एक या दो करोड़ लोग रोज़ाना नदियों में डुबकी लगाते हैं और पचास से साठ लाख लोग नदी का पानी पीते हैं. उनके दिल और दिमाग़ नदियों से जुड़े हुए हैं. लेकिन नदियाँ शहरों से गिरने वाले मल और अवजल से प्रदूषित हो गयी हैं. गंदा पानी ज़्यादातर फैक्ट्रियों का होता है और कानपुर में ज़्यादातर फैक्ट्रियां चमड़े की हैं जो पानी को अब और भी नुक़सानदेह बना रही हैं. फिर भी हज़ारों लोग यही पानी पीते हैं, इसी में नहाते हैं. साल भर पहले इस दिक़्क़त  पर कानपुर में मैं बोला भी था.

क्या हमें नदियों के प्रदूषण के ख़िलाफ़ एक आंदोलन शुरू करना चाहिए? अगर ऐसा आंदोलन सफल हो जाय तो अकूत धन की बचत भी हो पायेगी. अवजल को शोधित करके गंगा या कावेरी में ही डाल देने की बजाय ड्रेन पाइपों के ज़रिये उन्हें नदी से दस-बीस मील दूर ले जाया जाय और मैदानों में छोड़ा जाय. इस जगह पर खाद बनाने की फैक्ट्री खोली जा सकती है. देखने में यह ख़र्चीला लगता है. लेकिन समूची दृष्टि को क्रांतिकारी तरीक़े  से बदलना होगा. ख़र्च  करोड़ों में होगा लेकिन सरकार पंचवर्षीय योजनाओं में २२०० करोड़ रूपये सालाना क्या नहीं ख़र्च  कर दे रही है? मुमकिन है, कुछ अन्य परियोजनाओं के अमल को टालना पड़े. लेकिन ऐसी योजना को लागू करने के रास्ते में आने वाले अवरोधों को भी मैं जानता हूँ. हमारे वर्तमान शासक और भविष्य में शासक बनने के आकांक्षी जन नक़ली और सतही तौर- तरीक़ों से देश का यूरोपीयकरण कर डालने के बारे में सोचते हैं. और आज के शासक हैं कौन? वे एक लाख होंगे, या इससे भी कम, जो ज़रा-सी अंग्रेज़ी जानते हैं. वे जानते हैं कि छुरी-काँटे का इस्तेमाल कैसे किया जाता है और टाई और कोट कैसे पहनना चाहिए. उन्होंने एक ताक़तवर संसार बना लिया है और उनके नेता हैं पंडित नेहरू. श्री संपूर्णानंद भी उसी संसार का प्रतीक हैं, हालाँकि अपने कपड़े-लत्ते से वह यूरोपियन नहीं लगते लेकिन अगर श्रीयुत नेहरू को अमेरिका जाना हो तो वहाँ वह भी ऐसी ही शख्सियतों में गिने जायेंगे.

शहर बनारस में भगवान विश्वनाथ को लेकर आंदोलन चला है. अब उनका एक नया मंदिर भी बनाया जा रहा है. दरअसल यह आंदोलन भगवान विश्वनाथ के लिए था ही नहीं. संघर्ष तो ब्राह्मणों के देवता और चमारों के देवता के बीच था. हिन्दू मानस बेकार ही फालतू मामलों में उलझा रहता है. अगर सिर्फ़ करपात्री जी ने उस अंदाज़ में काम कर दिखाया होता जिसका संकेत मैंने किया है, तो समस्या सुलझ गयी होती. लेकिन करपात्री जी कौन सी दुनिया की नुमाइंदगी करते हैं. वे राजस्थान के धनकुबेरों और घनघोर सामंतों के प्रतिनिधि हैं. एक की बजाय दो विश्वनाथ मंदिर बनवा देने से कोई समाधान नहीं होगा. ज़रूरत पूरे देश की पुनर्रचना और गरीबी के उन्मूलन की है.

आज हमारी सेना के जवान कौन हैं? ये ग़रीब के बेटे हैं और वे लोग हैं जो जान देते हैं. ये वे हैं जो देहरादून और सैंडहर्स्ट के नक़ली माहौल में प्रशिक्षित अधिकारियों के हुक्म की तामील करते हैं. अफसर समृद्ध वर्गों के हैं. वे आधुनिक विश्व के नुमाइंदे हैं. वे क्यों इस देश के लाखों लोगों के लिए दिक हों? उनके पास भारतीय दिमाग़ है भी नहीं. अगर ऐसा होता तो नदियों की सफ़ाई की योजनाएँ आज बिल्कुल तैयार होतीं. मैं चाहता हूँ कि पार्टी से बाहर के लोग बैठकें करने, जुलूस निकालने और संगोष्ठियाँ आयोजित करके सरकार को नदी-प्रदूषण-निवारण परियोजनाओं को उठाने के लिए बाध्य करने की ख़ातिर सोशलिस्ट पार्टी से हाथ मिला लें. हमें ख़ुद भी इस संकल्प के साथ तैयार रहना होगा कि यदि तीन से छह महीने के भीतर अवजल के प्रवाह को मैदानों की ओर नहीं मोड़ा गया तो हम वर्तमान ड्रेनेज सिस्टम को तोड़ देंगे और इस तोड़फोड़ में किसी किस्म की हिंसा नहीं होगी. 

कबीर ने कहा है:
माया महाठगनि मैं जानी                                                                                           
केशव की कमला बन बैठी,                                                                                  
शिव के भवन भवानी                                                                                         
पंडा की मूरत बन बैठी,                                                                                     
तीरथ में भई पानी    

तीर्थ में क्या है? – सिर्फ़ पानी. तो लोगों को सरकार को डाँटना चाहिए, ‘तुम बेशर्म लोग, बंद करो यह मलिनता.’ मैं तो फिर भी नास्तिक हूँ. मेरे लिए सवाल तीर्थ का नहीं है, यह है कि हमारा देश तीस लाख लोगों का है कि चालीस करोड़ का.
 ***


अनुवाद : व्योमेश शुक्ल 

{ १९५८ की फरवरी में बनारस में दिया गया भाषण
राममनोहर लोहिया की मशहूर किताब ‘इंटरवल ड्यूरिंग पॉलिटिक्स’, नवहिंद प्रकाशन, हैदराबाद, प्रथम संस्करण १९६५ में शामिल निबंध. साथ में दी गई तस्वीर गूगल से. }               

Sunday, June 02, 2013

अविनाश मिश्र की डायरी से कुछ नई सतरें



प्रेरणाएं करीब-ए-मर्ग हैं मगर यह रियाज का वक्त है

- एक लहर में आती हैं वे मेरे पास 
- वे आयतों की तरह उतरती हैं मुझ पर 
- जब मैं बेहद उदास होता हूं 
मैं प्रेरणा में यकीन रखता हूं 
मुझे स्मृतियां अच्छी लगती हैं 
वर्ष के सबसे नीरस महीनों में 
- वे धूल भरी आंधियों की तरह उठती हैं                                                                                                                                     

एक क्रम में एक ‘गलत कविता’ से प्रतीत होते ऊपर के वाक्य दरअसल भिन्न-भिन्न ‘रचना प्रक्रियाएं’ हैं। वैसे कई लंबी कविताएं भी मैंने लिखी हैं, लेकिन अब जब सब कुछ सर्वथा अपाठ्य होता जा रहा है, ऐसे में स्वरचित लंबी कविताओं का सार्वजनिक प्रकटीकरण मुझे एकदम गैरजरूरी लगता है। और अगर आप यह टेप रिकॉर्डर बंद कर दें तब मैं कुछ और भी काम की बातें बता सकता हूं। 

मसलन, यह एक सच है कि जो अच्छे कवि नहीं बन पाते, वे अच्छे आलोचक बन जाते हैं। जो अच्छे आलोचक नहीं बन पाते, वे अच्छे निर्णायक बन जाते हैं। जो अच्छे कहानीकार नहीं बन पाते, वे अच्छे संपादक बन जाते हैं और जो अच्छे संपादक नहीं बन पाते, वे अच्छे दलाल बन जाते हैं। वैसे ये सब व्यक्तित्व बनने की प्रक्रियाएं हैं, लेकिन इन्हें ‘रचना प्रक्रियाएं’ भी समझा जा सकता है।

यहां मैं विषय से कुछ हटता हूं और कुछ प्रश्न करता हूं कि क्यों वह ‘महाकाव्यात्मकता’, जो एक उपन्यास में प्राप्त होती है, एक अरब कविताओं में भी दुर्लभ है? क्यों कुछ लंबी कविताएं सुंदर गद्य का निर्माण करती हैं? और क्यों कई लंबी कहानियां केवल वाग्जाल होती हैं? क्यों कुछ डायरियों में जीवन सीलिंग फैन की मानिंद घूमता रहता है, जबकि जीवन सीलिंग फैन-सा नहीं है, डायरियों-सा है कतई। 

वैसे कई डायरियां भी मैंने लिखी हैं। एक बार एक डायरी में मैंने लिखा था : यह काव्य जैसे काव्य और गद्य जैसे गद्य से रिहाई का वक्त है। प्रेरणाएं करीब-ए-मर्ग हैं मगर यह रियाज का वक्त है। यह महंतों के महांतों के इंतजार का वक्त है।

विषय में विषयातीत हो जाना मेरा लक्ष्य होता है, लेकिन इस विषयांतर से हटकर यदि विषय पर आऊं तब कह सकता हूं कि कोई कब और कैसे कविता, कब और कैसे कहानी, कब और कैसे डायरी या कब और कैसे कुछ और रचता है यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि यह कि वह आखिर यह सब कुछ क्यों करता है। क्या वह कुछ बनना चाहता है- कवि, कहानीकार, आलोचक, संपादक या निर्णायक? वह शर्तिया नष्ट होगा क्योंकि वह माध्यम से उम्मीदें पाल रहा है। ...और ‘रचना-प्रक्रिया’- सरीखा धुंधला और कुछ भी नहीं है एक रचनाकार के जीवन में। इसलिए इस पार्थिव परंतु अप्रकट को उद्घाटित करना वैसे ही अपराध है, जैसे सार्वजनिक सिनेमाघरों में ‘ब्लू फिल्म’ प्रदर्शन। वैसे कई सार्वजनिक सिनेमाघरों में ब्लू फिल्म्स भी मैं देखता रहता हूं। वैसे यह आपने बहुत अच्छा किया था जो टेप रिकॉर्डर बंद कर दिया था, वर्ना कई मुश्किलें आती हैं इससे इस मौसम में।
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वे तुम्हें एक ‘ध्रुव’ से मिलाएंगे और तुम्हें घोषित कर देंगे इस वर्ष का ‘निराला’ या ‘मुक्तिबोध’ या ‘शमशेर’ या ‘केदार’...
                                                                       
मैं लख न सका वे दृग विपन्न (सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’)

विराट झूठ के अनंत छंद सी (गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’)

टूटी हुई बिखरी हुई (शमशेर बहादुर सिंह)

आज क्रूर कर्कश विश्व भर में सभ्यता के गाल बजते (केदारनाथ अग्रवाल)

वे यह काम कई दशकों से कर रहे हैं। वे दक्ष हैं इस विधा में।
उनकी घोषणाएं ठहराव के लिए एक उम्र जितनी लंबी नींद चाहती हैं।
वे तुम्हें कह सकते हैं ‘कवियों का कवि’ या हिंदी का ‘शुंतारो तानीकावा’ या ‘जोजेफ ब्राडस्की’ या मध्य प्रदेश का ‘दिलीप चित्रे’ या पहाड़ का ‘पाश’ या बिहार ‘वरवर राव’।
वे तुम्हें कुछ भी कह सकते हैं। शब्द बहुत कम हैं उनके पास और पुरस्कार बहुत ज्यादा।
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मैं नकारात्मकता से बचना चाहता हूं और इस बचाव में मेरी आंखें मेरी आत्मा की पवित्रता को उजागर करती हैं।
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मैं सुदूर से आता हूं यह सोचकर कि एक दिन उस केंद्रियता को नष्ट कर दूंगा जो मुझे नकारात्मक बनाती है। मेरी यह कोशिश मुझे आत्मघाती बनाती है।
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श्रीकृष्ण गीता के दूसरे अध्याय में अर्जुन से कहते हैं : जो सदा सबसे अमित्रता रखता है (स्वयं से भी) वह अविचलित और आत्म स्थित है।                                           

इस कथ्य के आलोक में मेरा मित्रवंचित वैभव उस वर्तमान का विरोध है, जो वंचितों और कवियों को नायक के रूप में स्वीकार नहीं करता।
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मेरे वैभव में बहुत सारी जगहें ऐसी हैं, जो कतई घर नहीं हैं, लेकिन मैं उन्हें बार-बार घर बनाता हूं। उन्हें पुस्तकों, महापुरुषों की तस्वीरों और संगीत से भर देता हूं। बाद इसके इस वैभव में मैं एक स्त्री को आमंत्रित करता हूं, लेकिन ‘वह खटिया पर गिरते ही मर जाती है।‘ वह ‘त्रियाचरित्र’ की नायिका है
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मैं प्रेम करता हूं और बताता नहीं हूं। ‘प्रेम के समान आकर्षणकारी और कुछ भी नहीं...चलो, आगे बढ़ो, मार्ग को सोचकर की क्लांत मत हो जाओ, नहीं तो जा नहीं पाओगे। लेकिन जहां परित्याग करना हो वहां आकृष्ट और आसक्त न होना- दुःख से बचोगे।‘ मन कहता है, मैं सुनता हूं।
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‘मुझे छोड़कर मत जाओ, प्लीज...’ यह वाक्य उसे कई बार कई तरह से बोल-बोलकर बताना था। 
नहीं-नहीं यह कोई पूर्वाभ्यास नहीं था और न ही इस दृश्य को कहीं मंचित होना था।
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दिल्ली में बस समुद्र नहीं है। बाकी सब कुछ है जो मुझे चाहिए। पर्वत और जंगल तक खोजूं तो मिल जाते हैं, और कुछ दूर चला जाऊं तब एक नदी भी और निर्जन भी...।
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नदी का दुःख जल नहीं यात्रा है और जल कभी लौटता नहीं, यही उसके अस्तित्व का वैभव है।
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‘दोहराव से यकीन टूटता है’                                                                    
यह पंक्ति मुझे तब सूझी जब मैं ठहरे हुए नीर में अपनी पीर घोल देने के लिए उसमें पत्थर फेंकने का बेतुका खेल खेल रहा था और मुझसे बहुत दूर वे कहीं कह रहे थे, ‘बस ये कुछ और नाम हैं।‘
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जो अभिव्यक्ति में व्यक्तिगत होने को बुरा मानते हैं, वे व्यक्तिगत रूप से बेहद बुरे लोग हैं। लेकिन श्रेष्ठ कवियों को अपशब्द नहीं कहने चाहिए, रचनात्मक संभावनाएं शेष हो जाती हैं
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[ अविनाश हिंदी में सक्रिय श्रेष्ठ युवतम प्रतिभाओं में से एक हैं। ]