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भूलना उसने सिखाया : मनोज कुमार झा की नई कविताएं


Anna Medvedeva
प्रस्थान

लुप्त होना दुश्य से
घर ने सिखाया मुझको

भयातुर छिपकलियों का पूंछ फेंकना
मैने के बच्चों का बसाना दूर बसेरा

एक चित्र की जगह दूसरा चित्र
भूल जाना दीवार का रंग पुराना
पुरानी रेडियो बेचकर बिस्कुट खरीदना
कुएं का भर जाना कबाड़ से
ये सब घर ने दिखाये

घर भूल चुका है उस मुँहदुब्बर बच्चे को
मगर मैं लौटूँगा कभी किसी घिस रही शाम में
घर को याद दिलाने
कि भूलना सिखाया उसने।
***

Bato Dugarzhapov
 सख्त रेखाएं 

कल क्या होगा
जरा भी पता नहीं
यह जुमला एक नक्शा भर है किसी उठने  वाले भवन का
कुछ लकीरें मात्र जिस पर झोपड़ी कैसे बैठेगी यह अनिशिचत
ठोस कहें तो ऐसे कहें कि कल के खाने का भरोसा वहीं
फिर यह एक दरवाज़ा बन जाएगा उस घर का
जहां रात का रंग फट जाता है सुबह के घंटों पहले।

कल क्या होगा पता नहीं
एक ठूंठ वृक्ष फकत
है दरख्त जिस पर पत्ते नहीं, फूल नहीं और काँटे भी नहीं
उसे देखो जिसने कहा कि आसमान होगा या छप्पर पता नहीं
तब जानोगे कि क्या होता है बरसते काँटों के बीच चलना।
***

Aimn Halabi

 अजब अभागों का कुनबा

अशुद्ध उच्चारणों ने कई मित्र दिए
उनमें से एक तो अक्षरों को राख कहता है
पिट कर चुप जाने से भी कई साथी मिले
एक ने तो कहा कि लड़ाई बहुत वक्त माँगती है
और उतना वक्त नहीं होता अंधी माता के संतानों को
हममें से कइयों को जब प्रियों ने तजा
तो मूर्ख कहा और हमने बस इतना सोचा
कि उन्हें इंतजार करने का हुनर नहीं और हड़बड़ी की अजब लत
वर्ना उन्हें जानने की हूक उठती कि रात में जब नदियाँ रोती हैं
तो हम अभागे उसे कंधा देते हैं जिनसे वो दिनभर दुख सँभालती हैं।
***

Leon Akwadal
थकान के किसी और रंग में

अभी आप नाचकर निकले हैं
पवन तेज अभी देह की, रूधिर तेज
प्रकाश का थक्का माथे में घूम रहा
हम बातें करेंगे
किसी और दिन, किसी और सुबह, किसी शाम, किसी रात
जब नष्ट हो रहे प्रकाश बांधेंगे आपको अलग रंग में
जब थकान की झाँइयाँ हम एक ही इन्द्रधनुष से चुनेंगे ।
***

[ मनोज कुमार झा की अन्य कविताएं : यहाँ. ]
8 comments:

सुंदर कविताएँ...


बेहतरीन कविताएँ...


"एक चित्र की जगह दूसरा चित्र
भूल जाना दीवार का रंग पुराना
पुरानी रेडियो बेचकर बिस्कुट खरीदना"

~भूलना उसने सिखाया मुझको,
अब बस वही बात याद रखता हूँ...

सुन्दर रचना...सुभकामनाएं...


मनोज जी की सुगठित भाषा बहुत तेज असर करती है .इतनी बेहतरीन कवितायों के लिए बधाई !


मनोज झा हमारे समय के महत्वपूर्ण युवा कवि हैं जिनकी कविताओं में ताजगी देखते ही बनती है .एकदम से नए बिम्बों के सहारे जन और मन की बात को बड़े कलात्मक अंदाज में रखने की विशिष्टता उन्हें औरों से अलग करती है .आभार भाई अनुराग कि अपने इन तजि कविताओं को साझा किया .


सुंदर कविताएँ.


अशुद्ध उच्चारणों ने कई मित्र दिए...
उम्दा भाव सम्प्रेषण
सुन्दर कविताएँ.


hamesha kee tarah badhia kavitayen


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

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