Wednesday, February 20, 2013

स्मृतियां जाना नहीं जानतीं



जहां बहुत का 'त' ख़त्म होता हो वहीं से शुरू करना - होना, वहीं से प्रेम.
*
हर प्रेम का अपना अलग व्याकरण है, लेकिन वैयाकरण प्रेमी नहीं.
*
नहीं की निधि में रोज़ एक उदास सिक्का गिरता है.
*
आकांक्षा एक सुंदर फूल है, झर जाने तक, सुंदर और दुर्निवार.
*
आदतों की कोई नैतिकता नहीं.
*
अलगाव एक मृत्यु है, एक ऐसी मृत्यु, जिसका कोई 'संस्कार' अंतिम नहीं.
*
स्मृति-छल मानुष-छल से अलग है, स्मृतियां जाना नहीं जानतीं.
*
थकान पहली निराशा है, अंतिम भी.
*
अंत में सिर्फ़ अभिनय काम आता है.
****
                                                                                                     
                                           
 [ ऊपर इधर लिखे गए कुछ वाक्य हैं. ]
{ साथ दी गई पेंटिंग Sir William Rothenstein की है. }

Thursday, February 14, 2013

तुम सभी रंग हो : के. सच्चिदानंदन की नई कविताएं


Sergei Inkatov

मैं तुम्हें याद करता हूं 

मैं तुम्हें याद करता हूँ
जैसे खो गई चाबी
अपने घर को याद करती है

तुम भागती हुई आती हो मेरे पास,
जैसे दफ़्न नदियों का गड़गड़ाता उछाह
शहर के हल्ले के साथ आये

सुनहला और भूरा सपना
कैनवस से गुज़रता, जहाँ देवी का अभ्युदय हो रहा है,
छिपछिपाकर इतिहास में दाखिल हो जाता है

जमे हुए समुद्र के भीतर
पक्षी पंख पसार लेते हैं
आसमान हरा है
लाशें तीरों की मानिंद तेज़ी में

2

तुम सभी रंग हो
तुम लाल और काला हो
खून का गुलाब
रात की इकलौती एकाकी हवा
तुम नीला और हरा हो
समुद्र का अनंत कमल
टिड्डे की पृथ्वी पर सवारी

तुम पीला और भूरा हो
कुमकुम के फूलों का सागर
समुद्र तट का पूरा चंद्रमा
सफ़ेद नहीं, प्लीज़

3

ये आईनाखाना है
हरेक आईने में से
एक खुद झलकता है तुम्हारा

तुम खुद से घिरी हुई
खुद से बाहर खुद की शक्ल बनाती हुई खुद से
यह शक्ल सिमटती है, फैलती है, कई गुना हो जाती है
इन अनगिन छवियों में मैं कौन हूँ
इनका ब्रश या पैलेट

यहाँ, मैं, टूटा हुआ
बस एक अनाथ आत्मा
एक तबाह गाँव
एक बंद गली

4

मुझे खोलो
विस्मृति की बर्फ से बाहर निकालो
तंग गलियों, धान के खेतों,
भारीभरकम शिलाओं, कुलदेवियों,
उनके करीब नाचते हुए लोगों से

सारे प्रवाह काँटों में उलझ गए
सभी पर्व रेत में जाकर सूख गए
हमारे कुछ कहने से पहले ही चले गए सभी महापुरुष
चिड़ियों के घोसलों में गूँजती घंटा-ध्वनि
जड़ों में डूबे सभी हाथ
जंगलों के व्याकरण

तुम्हारी आँखों में एक शेरनी है
और उस शेरनी की आँखों में
हूँ मैं
****

John Sokol

आखिरी नदी

आखिरी नदी में
पानी की बजाय खून बहता था
लावे की तरह खौलता हुआ
जिन आखिरी मेमनों ने उसका पानी पिया
वे बेआवाज़ मर गए
जो पक्षी उसके ऊपर से होकर उड़े
वे मूर्च्छित हो गए नदी में ही गिर गए
आंसू से भीगे चेहरे और रुकी हुई घड़ियाँ
खिड़कियों से गिरती ही रहीं

आखिरी नदी में एक माँ का चेहरा
डूब उतरा रहा था
एक लड़का नाव से उसे पार कर रहा था
उसके हाथ में एक जादुई घंटी थी
माँ से मिला आखिरी उपहार
उसकी स्मृति एक घर थी
हंसी से गूंजता घर

क्या तुम मुझसे डरते नहीं हो?
लड़के से पूछा आखिरी नदी ने
'नहीं', उसने कहा, 'आखिरी नदियों की संवेदना
रक्षा करती है मेरी
वे मेरी देखभाल करती रही हैं
मेरे पूर्वजन्मों में'
'तुम्हारे पिता ने मार डाला था उनको'
नदी बोली, उनका खून मुझमें प्रवाहित हो रहा है;
यह उनका क्रोध है जो मुझमें उबल रहा है

जवाब में लड़के ने घंटी बजा दी
बारिश होने लगी, प्यार ने नदी को शांत कर दिया
उसकी रक्तिमा नीले में बदल गई
मछलियाँ वापस आ गईं
नदी किनारे के पेड़ों में फूटने लगीं
आगामी कोपलें
घड़ियाँ फिर से चलने लगीं
यों, शुरू हुआ मनुष्यता का इतिहास

वह घंटी अब तलक गूँजती है
बच्चों की हँसी में
***

[ मलयाली भाषा के मशहूर कवि के. सच्चिदानंदन की इन नई कविताओं का अनुवाद हिन्दी के युवा कवि व्योमेश शुक्ल ने किया है। इसी जुगलबंदी का एक पूर्वरंग यहाँ भी। ]

Tuesday, February 12, 2013

भूलना उसने सिखाया : मनोज कुमार झा की नई कविताएं


Anna Medvedeva
प्रस्थान

लुप्त होना दुश्य से
घर ने सिखाया मुझको

भयातुर छिपकलियों का पूंछ फेंकना
मैने के बच्चों का बसाना दूर बसेरा

एक चित्र की जगह दूसरा चित्र
भूल जाना दीवार का रंग पुराना
पुरानी रेडियो बेचकर बिस्कुट खरीदना
कुएं का भर जाना कबाड़ से
ये सब घर ने दिखाये

घर भूल चुका है उस मुँहदुब्बर बच्चे को
मगर मैं लौटूँगा कभी किसी घिस रही शाम में
घर को याद दिलाने
कि भूलना सिखाया उसने।
***

Bato Dugarzhapov
 सख्त रेखाएं 

कल क्या होगा
जरा भी पता नहीं
यह जुमला एक नक्शा भर है किसी उठने  वाले भवन का
कुछ लकीरें मात्र जिस पर झोपड़ी कैसे बैठेगी यह अनिशिचत
ठोस कहें तो ऐसे कहें कि कल के खाने का भरोसा वहीं
फिर यह एक दरवाज़ा बन जाएगा उस घर का
जहां रात का रंग फट जाता है सुबह के घंटों पहले।

कल क्या होगा पता नहीं
एक ठूंठ वृक्ष फकत
है दरख्त जिस पर पत्ते नहीं, फूल नहीं और काँटे भी नहीं
उसे देखो जिसने कहा कि आसमान होगा या छप्पर पता नहीं
तब जानोगे कि क्या होता है बरसते काँटों के बीच चलना।
***

Aimn Halabi

 अजब अभागों का कुनबा

अशुद्ध उच्चारणों ने कई मित्र दिए
उनमें से एक तो अक्षरों को राख कहता है
पिट कर चुप जाने से भी कई साथी मिले
एक ने तो कहा कि लड़ाई बहुत वक्त माँगती है
और उतना वक्त नहीं होता अंधी माता के संतानों को
हममें से कइयों को जब प्रियों ने तजा
तो मूर्ख कहा और हमने बस इतना सोचा
कि उन्हें इंतजार करने का हुनर नहीं और हड़बड़ी की अजब लत
वर्ना उन्हें जानने की हूक उठती कि रात में जब नदियाँ रोती हैं
तो हम अभागे उसे कंधा देते हैं जिनसे वो दिनभर दुख सँभालती हैं।
***

Leon Akwadal
थकान के किसी और रंग में

अभी आप नाचकर निकले हैं
पवन तेज अभी देह की, रूधिर तेज
प्रकाश का थक्का माथे में घूम रहा
हम बातें करेंगे
किसी और दिन, किसी और सुबह, किसी शाम, किसी रात
जब नष्ट हो रहे प्रकाश बांधेंगे आपको अलग रंग में
जब थकान की झाँइयाँ हम एक ही इन्द्रधनुष से चुनेंगे ।
***

[ मनोज कुमार झा की अन्य कविताएं : यहाँ. ]

Saturday, February 09, 2013

किसी की इच्छा करना, उसके भीतर इच्छा को रोपना है


मैं उन दिनों कविताएं लिखा करता था. क्यों लिखता था, मुझे नहीं पता. कब से लिखना शुरू किया था, यह भी नहीं पता. मुझे लगता है कि मैं हमेशा से लिखता था. मां के गर्भ के भीतर मैंने स्पर्श लिखा. दुलार लिखा. कुछ हरकतें लिखीं, जिन्हें सिर्फ़ मेरी मां ने पढ़ा. उन्हें पढ़ कर वह ख़ुश हुई. बहुत धीरे-धीरे मैंने देह लिखी. मैं सृष्टि का वह कवि हूं, जिसने बीज से पिंड तक सबकुछ लिखा. मैंने अपना होना लिखा, होने का आकार लिखा.
गर्भ से निकलने के बाद मैंने एक लंबी चुप्पी लिखी. उसके बाद एक दीर्घ रुदन लिखा.

कई बार मैंने सुबक के छंद में लिखा. कई बार गला रुंधने को मात्राओं की तरह प्रयोग किया. हिचकियों को तुक की तरह मिलाया. धरातल पर जैसे मेरे पैर चलते हैं, अ-धरा पर जैसे मेरा मन चलता है, उन तमाम चलने की लय पर लिखा.

मैंने कथ्य को रूप और रूप को कथ्य लिखा.

मैंने अपनी इच्छाओं के व्याकरण में लिखा.

जब मेरे पैदा होने का बीज भी नहीं बोया गया था, तब से मेरे भीतर इच्छाएं पलने लगी थीं. मेरे मां-पिता ने मेरी इच्छा की थी.

किसी की इच्छा करना, उसके भीतर इच्छा को रोपना है.

मैं तब से लिख रहा हूं, जब मैं इस धरती पर आया भी न था. इसीलिए मैं जो कुछ भी लिखता था, अपने न होने की वर्तनी में लिखता था.

इस तरह मैंने अपने न होने का अनाकार लिखा.

****
                                          
                                                                              [ गीत चतुर्वेदी की यह कविता उनकी नवीनतम रचना है.]