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विचारार्थ : ३ : विष्णु खरे का लेख


[ यह एक अनिवार्य हस्तक्षेप है और यहाँ से समसामयिक हिन्दी साहित्य का इतिहास नई करवट ले रहा है. पक्ष बन रहे हैं, पक्ष बिगड़ रहे हैं. दृश्य में अफ़रातफ़री, री-पोजीशनिंग और व्यक्तिपरकता है लेकिन हम सबकुछ को वैचारिक समर का हिस्सा मानते हैं और ज़रूरी मुद्दों पर बहस करना चाहते हैं. यह लेख हमारा ऐसा ही प्रयत्न है. यह सिर्फ़ एक साहित्यिक सवाल नहीं है. साम्प्रदायिकता और विचारहीनता सबसे बड़े नागरिक संकट हैं, इन्हें बेनामी प्रहार, चतुराई, विषयान्तर या हमारी ही भर्त्सना से टाला नहीं जा सकता. हम संकट के बीच खड़े होकर बात कर रहे हैं और सबसे ऎसी ही उम्मीद करते हैं.
- व्योमेश शुक्ल. ]

  कान्हा ने कई गोप-गोपियों की मटकियाँ फोड़ीं


विष्णु खरे


मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार द्वारा नियंत्रित सांस्कृतिक केंद्र भारत भवन के कार्यक्रमों में प्रगतिकामी तथा धर्मनिरपेक्ष लेखक जाएँ या न जाएँ इसे लेकर चिंतित भोपाल के तीन सुपरिचित कवियों द्वारा  पिछले दिनों दो सार्वजनिक वक्तव्य जारी किए गए हैं जिनमें से पहले के अपने उत्तर में मैंने यह भी लिखा था :आज कस्बों,बड़े शहरों और महानगरों में कुकुरमुत्तों जैसी बहुत सारी छोटी-बड़ी निजी संस्थाएं शिक्षा, संस्कृति, साहित्य के क्षेत्रोँ में सक्रिय हैं.उनके सर्वेसर्वा पुरुष और स्त्रियाँ धर्मनिरपेक्षता और प्रगतिशीलता के मुखौटे पहने हुए कई प्रलोभनों से परिदृश्य को उतना ही भ्रष्ट कर रहे हैं जितना साम्प्रदायिक सरकारें और हिन्दुत्ववादी संस्थाएं कर रही हैं.कुछ सरकारी शिक्षण और हिंदी संस्थाओं पर काबिज़ कथित कवि,लेखक और बुद्धिजीवी भी निर्लज्जता से ऐसा कर रहे हैं और हम उनसे जुड़े हुए हैं.कई कथित वैसे ही लेखक-लेखिकाएँ भी जुड़े हुए हैं.कुछ ने तो ( निरपराध दिवंगत महान लेखकों के नाम पर भी ) निजी,पारिवारिक पुरस्कार स्थापित कर रखे हैं.क्या ऐसी संस्थाओं के मालिक-मालकिनों और उन्हें खुल्लमखुल्ला समर्थन और जुड़ाव देने वाले अपने ही “साथियों” की शिनाख्त करने का साहस हममें है ? और फिर उनके विरुद्ध कार्रवाई करने का ?

जब मैंने यह प्रश्न किए थे तब मुझे ऐसी आशंका नहीं थी कि वे उपरोक्त वक्तव्यों में उठाए गए मसलों और स्वयं उन तीन लेखकों के लिए निजी तौर पर इतने शीघ्र प्रासंगिक हो जाएँगे.वाक़या यह है कि अभी १७ से लेकर १९ अगस्त तक मध्यप्रदेश के विश्वविख्यात अभयारण्य तथा पर्यटन केंद्र कान्हा में दिल्ली के एक महत्वाकांक्षी मँझोले  साहित्यिक प्रकाशक द्वारा एक निजी सैलानी होटल में हिन्दी क्षेत्र के लगभग ढाई दर्ज़न कवि-कवयित्रियों का एक अनौपचारिक सम्मेलन या शिविर जैसा आयोजित किया गया – अनौपचारिक इसलिए कि उसका कोई घोषित विषय या अजेंडा रहा हो ऐसा प्रथमदृष्टया प्रतीत नहीं होता.इस अवसर पर ,जैसी कि आजकल कुछ प्रथा-सी  बन चली है,एक नितांत नए कविता पुरस्कार की न केवल घोषणा हुई बल्कि उसका विजेता कवि भी आमंत्रित था इसलिए तुरत दान महा कल्यान ( कहीं-कहीं ‘पुन्न’ भी चलता है ) भी निपटा दिया गया.कवि-कवयित्रियों के मनोरंजन के लिए नेहरूयुगीन प्रजावत्सल शैली में एक आदिवासी नृत्य भी रखा गया था जिसमें नेहरूआना अंदाज़  में ही एक वरिष्ठ कवि ने अन्य सारे कवि-कवयित्रियों को सह-नृत्य पर सहमत कर लिया.एक कवयित्री और एक कवि ने लौटकर अपनी  प्रथम  कॉलेज पिकनिक का वर्णन करनेवाली फर्स्ट-इयर की गद्गद् छात्र-छात्रा भाषा में उस पर दो निबंध भी लिख दिए.

अभी यह खुशफहमी शुरू हो ही रही थी कि सब कुछ बहुत बढ़िया निमट गया कि अचानक वह हुआ जिसे अंग्रेजी मुहावरे“ द शिट हिट द फैन” के कुछ आज़ाद हिंदी अनुवाद में “चलते पंखे पर पाख़ाना कर देना” कहा जा सकता है.परिणाम की सिर्फ कल्पना की जा सकती है.कुछ मनचले होली के पावन-पर्व पर हँड़िया के सहारे ऐसा करते हैं.आयोजन में “कविता समय” के गिरिराज किराडू और अशोक कुमार पाण्डेय को तो बुलाया गया था,इस त्रिकोण की तीसरी भुजा बोधिसत्व को पता नहीं क्यों अपांक्तेय कर दिया गया था,जिन्होंने उस खाली समय का सदुपयोग यह खोज निकालने में किया कि प्रकाशक शिल्पायन ने वागीश सारस्वत नामक एक ऐसे कवि को भी आमंत्रित कर रखा  था जो राज ठाकरे की कुख्यात हिंदी तथा हिन्दी-पट्टी विरोधी “महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना” का कोई मामूली सदस्य नहीं,उसका राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और प्रवक्ता है.

इस पर लौट कर कृतकृत्य घर को आए आमंत्रित कवियों में वह काँव-काँव चाँव-चाँव मची जो कदाचित् बिल्ली के कूदपड़ने पर मुर्गियों और मूषकों में मचती होगी .अखिल उत्तर-भारतीय स्तर पर एक-दूसरे की लानत-मलामत,बखिया-उधेड़न,आरोप-प्रत्यारोपण, लगभग चरित्र-हत्या आदि होने लगे.फिर शायद (नि)रंजन (श्रोत्रिय) के बारे में कहा गया कि वे और भाजपा-आरएसएस परस्पर खैरख्वाह हैं (जिसका शक कुछ और लोगों को भी कुछ बरसों से है ).जब बहस बहुत तूल पकड़ गयी तो यहाँ तक इशारे किए गए कि कुछ और आमंत्रित कवि-कवयित्रियाँ भी भाजपाई-हिन्दुत्ववादी रुझान रखते हैं ( कुछ लेखिकाओं के बारे में भी यह शक बरसों से है ).

इस प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण वक्तव्य स्वयं आयोजक शिल्पायन के हैं.बताते हैं कि उन्होंने यह कहा कि कई वामपंथी अंदरूनी तौर पर हिन्दुत्ववादी हैं.फिर वे बोले कि वागीश सारस्वत राज ठाकरे के राज़दार हो सकते हैं लेकिन उन पर फैसला उनकी कविता से किया जाना चाहिए.शिल्पायन ने यह आयोजन मात्र स्वान्तःसुखाय कवि-कवयित्रीहिताय किया है,इसका कोई व्यावसायिक उद्देश्य नहीं था.उन्होंने ऐलान किया है कि भले ही वामपंथी न आएं,वे अपने मित्र वागीश सारस्वत को अगले आयोजनों में भी  बुलाए बिना न रहेंगे जो वे कविता-सहित कहानी आदि को लेकर भी करेंगे.जब तक वागीश सारस्वत वाला माजरा सामने नहीं आया था तब तक हिंदी साहित्य की जहां से दुम झड़ गयी है वहां रोमांच और गुदगुदी होते रहे.सभी कान्हा जाना चाहते थे. शायद इसीलिए अब आमराय यह बन रही है कि बहस यहीं ख़त्म की जाए.इसका एक कारण शायद उपरोक्त कवि-त्रिकोण द्वारा मुंबई में आयोज्य “कविता समय” हो.आखिर बेचारे मौसेरे भाइयों में कब तक अदावत रह सकती है ?

लेकिन जिस तरह ‘पंचतंत्र’ की एक कथा में एक सदाशय वानर-भृत्य मक्खी उड़ाने के उपक्रम में अपने सोते हुए स्वामी राजा की नाक काट डालता है,उसी तरह शिल्पायन ने अपने सरपरस्त,कवि तथा आकाशवाणी के महानिदेशक, लीलाधर मंडलोई को,और इस आयोजन को ही, अपने मूर्ख उत्साह में क्षतिग्रस्त कर दिया है.पंचतन्त्री बन्दर तो स्वयं को राजा का मात्र किंकर समझता था,शिल्पायन मंडलोई को अपने सगे चाचा का रुतबा देता है और कहता है : “...वहाँ गए किसी भी कवि से मैंने किसी तरह का कोई सहयोग नहीं लिया,सबके आने-जाने का खर्च हमने किया इन्क्लूडिंग वागीश, केवल लीलाधर मंडलोई जो मेरे लिए सगे चाचा की तरह हैं ने मुझे २ विज्ञापन दिलवाए और आकाशवाणी से रेकॉर्डिंग एवं जबलपुर में गेस्ट हाउस की व्यवस्था की ...”

दिल्ली में और बाहर अब तक लोगों को सिर्फ संदेह था कि लीलाधर मंडलोई लेखकों और प्रकाशकों को नियंत्रित-संचालित करने के लिए बरसों से दूरदर्शन-आकाशवाणी के अपने पद और प्रभाव का दुरूपयोग करते आ रहे हैं लेकिन यह पहली बार है कि उनके किसी मुँहबोले भतीजे ने सार्वजनिक रूप से सगर्व दावा किया है कि चचामियाँ ने उसे इश्तहार दिलवाए,उसके निजी कार्यक्रम की रेकॉर्डिंग करवाई और सरकारी अतिथिगृह में उसके कई लोगों को मुफ्त ठहरवाया.कुछ अजब नहीं कि चचाजान ने आकाशवाणी से पारिश्रमिक की अतिरिक्त व्यवस्था भी करवा दी हो.

यह ठिठोली की बात नहीं,गंभीर मामला है.एक प्रकाशक के निजी आयोजन के लिए जो स्मारिका छपती है,उसके लिए आकाशवाणी का महानिदेशक विज्ञापन क्यों जुटवाता है ? वे कौन सी “पार्टियाँ” हैं जो इस उच्चाधिकारी को एक मीडियोकर  प्रकाशक की दो कौड़ी की स्मारिका के लिए हज़ारों के विज्ञापन देती हैं? इन विज्ञापनों की सही रक़म क्या है और उसका भुगतान चेक से हुआ है या नक़द ? उसके बदले में मंडलोई ने  उन्हें कैसे “ओब्लाइज” किया है ? मंडलोई चाचू को उनका यह वर्तमान भतीजा कैसे पुनरुपकृत कर रहा है ? मंडलोई ने दफ्तर में क्या कहकर अपना कान्हा “टूअर” बनाया ? टी ए डी ए लिया होगा तो किस बात का ?

ऐसे सवाल मंडलोई द्वारा दिए जा रहे पुरस्कारों को लेकर भी उठाए जाने चाहिए.मंडलोई की जन्मभूमि छिन्दवाड़ा शहर नहीं,गुढ़ी नामक गाँव है,लेकिन उनके पिता के नाम से दिया जाने वाला पुरस्कार छिंदवाड़ा में बँटता है.उसकी राशि कहाँ से आती है ? उसमें दूर-दूर से शरीक़ होनेवालों का पूरा खर्च कौन देता है ? अभी जो नया “सुदीप बनर्जी स्मारक पुरस्कार” उन्होंने चालू किया है,उसकी रक़म कौन दे रहा है ? क्या भतीजा ? बैक-डोर से चच्चा से ही लेकर ? वैसे यह बात अलग है कि मोहन कुमार डहेरिया भले ही छिन्दवाड़ा के हैं लेकिन मंडलोई से बेहतर कवि हैं.मंडलोई को जानना चाहिए कि गिरिजाकुमार माथुर और उदयशंकर भट्ट भी कभी आकाशवाणी महानिदेशक थे.आज साहित्य में वे दोनों  लगभग अप्रासंगिक हैं.वैसी नियति मंडलोई की भी न हो, लेकिन वे रैकेटियर भी नहीं थे.हम सब जानते हैं कि आज आकाशवाणी का कितना पतन हो चुका है.मैं एकाध बार एफ. एम. सुन लेता हूँ – भयावह है.मंडलोई ऑल इंडिया रेडिओ को सुधारने के बजाय दिल्ली के पारिवारिक प्रकाशकों की परवरिश में मुब्तिला हैं.

प्रतिभागी कवियों की धूर्तता,कायरता और मौक़ाशनासी देखिए कि सब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और भाजपा की बात कर रहे हैं,शिल्पायन को थोड़ा-बहुत उरियाँकर रहे हैं,आपस में जूतम-पैजार चल  रही है,लेकिन मंडलोई की भूमिका पर कोई बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है, क्योंकि रेडिओ पर कभी-कभार पापी पेट का सवाल है और,कौन जानता है,कल को लीलाधर यदि दूरदर्शन के महानिदेशक बन गए तो टेलीविज़न पर दिखाई देना या उसमें खुद को या परिवार को कोई असाइनमेंट मिल जाना तो यशलोलुप हिंदी लेखक के लिए जन्नत के दरवाज़े या लाटरी खुल जाने जैसा है.इसलिए मंडलोई ड्राइंगरूम में बैठे उस गोरिल्ले की तरह हैं जिससे कान्हा का हर कान्हा नज़रें चुरा रहा है.

कुछ यही हाल शिल्पायन को लेकर है.कौन लेखक है जो प्रकाशकों का लाडला नहीं बनना चाहता ? यहाँ तो प्रकाशक “अपना” पैसा खुद लुटा कर कवि-कवयित्रियों को एंटरटेन कर रहा है और हिन्दी के कुछ हरामजादे बिला वजह ऐसे फरिश्तों में नुक्स निकालते घूमते हैं.कौन जानता है कितना बिल चुकाया होगा बेचारे इस मासूम लेखकलेखिकाप्रेमी प्रकाशक ने – डेढ़-दो लाख से तो कतई कम न होगा.लेकिन वह यह भी कह रहा है बोर्डिंग-लाजिंग का पूरा खर्च उसके मित्र रिज़ोर्ट-मालिक ने उठाया है.तो  क्या किसी ने जानने  की कोशिश की कि पार्टनर,जबलपुर-स्थित ऐसे फ़राग़दिलअजनबी सराय-स्वामी  का पोलिटिक्स क्या है ? साहित्यप्रेमी डी जी, साहित्यप्रेमी प्रकाशक,साहित्यप्रेमी होटल-मालिक –फिर भी साले कहते फिरते हैं कि इस देश में साहित्य की कद्र नहीं !

विषयांतर प्रतीत होगा, किन्तु पता नहीं क्यों जबलपुर का तूने जो ज़िक्र किया हमनशीं से अचानक संज्ञान में आया कि हाल ही में एक निहायत घटिया पत्रिका ने,जिसका प्रतिक्रियावादी,चिड़ीदिमाग़ सम्पादक-संचालक हर अंक में  एक कथित शीर्षस्थ आचार्य की पादुकाएँ धोकर पीता है, स्वयं को पुनरुज्जीवित कर रहे एक महत्वाकांक्षी वरिष्ठ लेखक को पुरस्कृत किया है.

बहरहाल, यह जानकर विचित्र लगता है कि इस सरकारी पर्यटन-स्थल  पर हमारे परिचित कवि और आइ ए एस अफसर पंकज राग भी एक आमंत्रित लेखक थे.अभी कुछ ही दिनों पहले तक वे मध्यप्रदेश पर्यटन निगम के ही महानिदेशक थे.वे उस रिज़ोर्ट से परिचित रहे होंगे, मंडलोई को तो बरसों से खूब जानते आए हैं और चाहते तो आयोजन की सारी पूर्व-पड़ताल कर सकते थे.उनकी कविता न तो रिकग्निशन की मुहताज है न प्रकाशन की.फिर,कुंदनलाल सहगल के शब्दों में,ऐसा क्यूँ...ऐसा क्यूँ ?

जो कथित बुज़ुर्ग कवि कान्हा में मौजूद थे उनके नाम मलय,नरेश सक्सेना,राजेश जोशी,विजय कुमार और अरुण कमल बताए जाते हैं.निरपराध और उपेक्षित किन्तु बहुत अन्वेष्य काव्यसाधक मलय हिंदी के ‘रेआलपोलिटीक’ के बारे में कुछ नहीं जानते,लेकिन विजय कुमार तो मुम्बई के बाशिंदे हैं –उन्होंने मौक़-ए-वारदात पर  राज ठाकरे के उपाध्यक्ष की शिनाख्त कर गश्ती सीटी क्यों नहीं बजाई ? क्या नरेश सक्सेना भी ,जो हिंदी की हर अखिल भारतीय सारस्वत सब्ज़ी में वरिष्ठ आलू की नाईं मिले रहते हैं और जिन्होंने छोहरा-छोहरियों को छछिया-भर छाँछ से कुछ ज़्यादा पर ही कान्हा में नाच नचाया, वागीश को चीन्ह नहीं सके? अरुण कमल तो अब पर्याप्त खराब कवि ही नहीं,विचारधाराघाती भी हो चुके हैं,लेकिन भोपाल के आशंका-पत्र के सबसे बड़े हस्ताक्षर राजेश जोशी ,जिनमें तथाकथित आठवें  दशक के अन्य कवियों की तरह यत्किंचित् सर्जना ही बची है और जो स्वयं मंडलोई की तरह अपने पिता की स्मृति में भोपाल में  एक वार्षिक अनुष्ठान चलाए हुए हैं,जो कई संदिग्ध स्थानीय संस्थाओं और स्त्री-पुरुष प्रतिभाओं से वाबस्ता हैं और जिनके भारत भवन के पुराने,भाजपाशासी आयोजनों के फोटो अब नैट पर ताज़ा-ताज़ा वागीश सारस्वत वालों  के साथ भी उपलब्ध हैं,इस कान्हा-काण्ड पर चुप कैसे बैठे हैं,अगरचे इशारे हुआ किए ? बिला वजह फील्डिंग करने वाले निरीह नीलेश रघुवंशी और कुमार अम्बुज को तो अब सबसे पहले अपने अज़हरुद्दीन-मार्का  कप्तान की ही जाँच आशंकित जानी-अनजानी मैच-फिक्सिंग के लिए करनी चाहिए.हिंदी साहित्य की ऐसी ट्रेजेडी है,नीच.

पुनश्च : वैसे तो यह पूरा कान्हा-शिविर ही अब विदूषकों के तम्बू में तब्दील हो चुका है लेकिन एक सच्चा लतीफ़ा बाक़ी है. चलती ट्रेन के शीशों पर बच्चों से पत्थर फिंकवाकर क्रांति करवानेवाले एक कवि से अपने किसी कमज़ोर क्षण में वागीश सारस्वत ने एक इक़बालिया बातचीत में कहा कि वे राज ठाकरे के लिए काम करते हैं.हमारे कवि ने अपनी दुधमुँही मासूमियत में समझा कि वे राज ठाकरे के दफ्तर में बाबू-वगैरह होंगे और उनसे अपनी पतितपावन भावना में  कहा कि वे ऐसी अंतरात्मानाशक नौकरी छोड़ दें और खुल्लमखुल्ला प्रगतिकामी शक्तियों के साथ हो लें.इस पर सारस्वत ने बताया कि नहीं नहीं मैं महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का उपाध्यक्ष हूँ.हमारा सदाशयी शुद्धिकामी कवि कैसे वहाँ से उठा, दुर्भाग्यवश इसका कोई फोटो तक नहीं मिलता.
****


{इस टिप्पणी का पहला,किंचितमात्र अलग, मसव्विदा रविवार,२ सितम्बर २०१२ को कोलकाता से प्रकाशित हिंदी दैनिक ‘प्रभात वार्ता’ के परिशिष्ट ‘रविवार्ता’ में प्रकाशित हुआ है. दोनों में पाँच प्रतिशत भी अंतर नहीं है,फिर भी कृपया इसे ही अंतिम समझा जाए.
- वि.ख.
}


26 comments:

यह आलेख अच्छी हिन्दी में लिखा कूड़ालेख है. हँसी उड़ाता हुआ. कुछ कुछ उस अन्दाज में जब बदसूरत लोग खुद अपनी तारीफ करते हुए पाए जाते हैं कि उन पर बदचलनी का आरोप कभी नहीं लगा.ज्ञान अगर इसी को कहते हैं तो साहब को यही मुबारक पर अव्वल तो यह कि संघ के सदस्य और कवि नामदेव ढसाल की तारीफ में जो इस लेखक ने कसीदे पढ़े हैं, क्यों न उस पर भी दो दो गाल बात हो. हद हो गई है इन साहब की. खुद तो कहीं भाग वाग लेते नहीं पर जैसे ही हिन्दी में कुछ घटता है तो उसकी सटीक आलोचना न करते हुए या तो गाली गलौज वाली भाषा पर उतर आते हैं या हँसी उड़ाते रहते हैं.

मैं इस लेख की भर्त्सना करता हूँ.


विष्णु जी क्यों इतना फ्रास्तेतेद है यह जानना हर हिंदी प्रेमी के लिए आवश्यक है / शायद वे वोह कुछ नहीं पा सके जिसका हक़दार वे स्वयं को मानते होंगे /पर इसमे हमारा तो कुछ कसूर नहीं . यदि आलोचना का संपादन उन्हें नहीं बनाया गया तो इसका कोई न कोई कारण रहा होगा / उन्हें सीधे नामवर जी से इस बाबत बात करनी चाहिये, न की वीयर्थ का प्रलाप / इस लेख को पढ़ते समय उनकी एक कविता- खुलासे का धयान आ गया; " किस तरह की दिक्कतें हैं उसके साथ यह पता नहीं चलता , उसे देखकर कोई कह नहीं सकता की वह कहां से विकलांग संभव है , लेकिन उसके खड़े रहने -चलने के तरीके से यह अंदेशा होता है की उसे कोई तकलीफ जरुर है "

तो दोस्तों हमें पता लगाना होगा की क्या तकलीफ है विष्णुजी को जो उन्हें इस मानसिक विकलांगता की और धकेल रही है

अपुर्व जोशी


हिंदी साहित्य का इतना बड़ा लेखक इस सस्तेपन पर उतर जाय , पढकर दुःख होता है | खरे साहब सबको ख़ारिज करने में यह भूल जाते हैं , कि उनके द्वारा बनाये इन मानदंडों पर कसने के बाद बचेगा कौन ..? क्या वे स्वयं बच पायेंगे ..? अरुण कमल , राजेश जोशी और नरेश सक्सेना पर की गई टिप्पणियाँ सतही और अनुचित तो हैं ही , 'पाखी' को लेकर की गई उनकी बात भी समझ से परे है |

मुझे तो पूरा लेख ही अनुचित लगा ...अंत में इनता जरुर जोड़ना चाहूँगा , कि विवेक बुढापे के लिए भी बचा कर रखने की चीज होती है |


सबसे पहले सबद सम्‍पादक मित्र अनुराग वत्‍स और इस पोस्‍ट के सभी पाठकों से यह अनुरोध कि यहां मैं जो कुछ लिख रहा हूं..उसे इस पोस्‍ट की प्रस्‍तुति करने वाले कवि व्‍योमेश शुक्‍ल और मेरे बीच का संवाद भर माना जाए।
***

प्रिय व्‍योमेश,

तुमने अपनी शुरूआती छोटी-सी टीप में काफी व्‍यग्रता से संकट के बीच खड़े होने की बात कही है...पर मैं साफ़ देख पा रहा हूं कि तुम फिलहाल तो ऐसे किसी संकट के बीच नहीं खड़े हो, तुम तो उसकी परिधि पर भी नहीं हो। संकट के बीच वे लोग,जिनका जिक्र इस लेख में है और इसके लेखक खड़े हैं... अधिक से अधिक तुम सिर्फ़ इस संकट के प्रस्‍तोता भर हो...मैं बहुत समय से लगातार देखता आ रहा हूं कि अकसर संकट के बाहर खड़े लोग ही संकट के सबसे विकट प्रस्‍तोता होते हैं...तुमने इस भूमिका का वरण किया है... मैं अपनी शुभेच्‍छा ही प्रकट कर सकता हूं... सो कर रहा ... अपनी इन पंक्तियों के साथ, जो तुम्‍हारे ही नाम लिखी थीं कभी और न जाने क्‍यों मुझे अभी बहुत याद आ रही हैं, इसे ही शायद हम दोनों के प्रिय कवि की भाषा में 'कभी के बाद अभी' कहते हैं -
***

इन्हीं पहाड़ों से निकलती है गंगा
प्यारे
जहाँ मैं रहता हूं
जो बलखाती
पछताती
अपनी ही पवित्रता से पिटी हुई
तुम्हारे शहर तक पहुंचती है
कभी झाँक कर देखोगे उसके मटमैले जल में
तो दिख जाएगा
तुमको मेरा साँवला और भारी चेहरा

तुम भटकते हो अपने शहर की गलियों में कहीं
धुँआ छोड़ती पुरानी राजदूत लिए
और मैं बाँज और देवदार और चीड़ के जंगलों में भटकता हूं
और प्रदूषण के नाम पर
न जाने कितनी आहों से भरी
अपनी साँस भर छोड़ता हूं
***
....तुम्‍हारा शिरीष


व्योमेश शुक्ल

प्रिय शिरीष जी,
कान्हा-उत्सव की तस्वीरें देखकर ऐसा नहीं लगा था कि वहाँ शामिल लोग किसी संकट में हैं. अगर उनके लिये उत्तर-कान्हा बातचीत या विष्णु खरे का लेख संकट है तो विष्णु खरे के लिये और हमारे लिये साम्प्रदायिकता और विचारहीनता सबसे बड़े संकट हैं. ज़ाहिर है, दोनों अलग-अलग संकट हैं.

मेरे ख़याल से चन्दन ने मुद्दे से अलग हटकर बात की है. फ़िलहाल उनकी बातों को सीरियसली लेने की ज़रूरत नहीं है. उनपर बाद में कभी बात हो सकती है.


यह आलेख विष्णु खरे की समकालीन 'प्रतिष्ठा' के अनुरूप है. जिस मेल से उन्होंने यह सबको भेजा था, उसके ही जवाब में पूछे गए सवाल के बाद नामदेव ढसाल को लेकर जो उन्होंने बात की है, वह बताती है कि वह किस कदर पूर्वाग्रही और कन्फ्यूज्ड हैं...या कहूं की शातिर हैं.

एक सीधा सवाल रख रहा हूँ यहाँ, एक यूनिवर्सिटी के सेमीनार में अगर मुझे बुलाया जाता है, जिसमें एक भाजपाई प्रोफ़ेसर भी आने वाला है तो क्या करना चाहिए? उसके जवाब देने चाहिए या फिर वहां से भाग लेना चाहिए? मंगलेश जी वाली बहस में मैंने लिखा था - "संवाद करना और किसी के अपने मंच पर जाकर शिरकत करना दो अलग-अलग चीजें हैं. हम ओम थानवी को इसलिए भाजपाई नहीं कहते कि उनके यहाँ तरुण विजय का कालम छपता है या इसलिए कम्यूनिस्ट नहीं कहते कि वहाँ किसी कम्यूनिस्ट का कालम छपता है. कारण यह कि जनसत्ता के न्यूट्रल मंच है. किसी टीवी कार्यक्रम में या यूनिवर्सिटी सेमीनार में आमने-सामने बहस करना और किसी संघी संस्था के मंच पर जाकर बोलना दो अलग-अलग चीजें हैं. "

क्या सान्निध्य एक संघी मंच है? जहाँ तीस से अधिक अपने लोग आये हों वहां अगर एक मनसे से जुड़ा आदमी आ गया तो उसके संक्रमण से सभी 'साम्प्रदायिक' हो गए? जिस मंच से मोहन डहेरिया को सम्मान दिया गया वह शर्म का बायस बन गया? फिर उस 'अचलेश्वर महादेव मंदिर' के मंच के ट्रस्ट से दिए जाने वाले सम्मान के मंच पर उपस्थित होने वाले मित्रों को यही क्यों न कहा जाय? विष्णु नागर, व्योमेश जी, मनोज झा और एनी कई मित्र वहां जा चुके हैं. लेकिन जब हम इन मित्रों की सेकुलरिज्म के प्रति निष्ठा को जानते हैं तो फिर इसे विचलन क्यूं मान लिया जाय?

विष्णु खरे सामुदायिक पत्र लिखने की अपनी आदत के चलते लगातार लिखते रहते हैं. जब एक व्यापारिक घराने से एक लाख रुपये का "सम्मान"(?) लिया था, तब भी एक पत्र लिखा था जिसमें निजी पूंजी के नेहरूवियन आचरण पर बलिहारी होते हुए एक ऐसी चयन समिति निर्णय करती है जिसकी साहित्यिक क्षमताओं को बताने वाला कोई नहीं, आर्थिक को उन्होंने खुद बताया था. अब शिल्पायन की उस निजी पूंजी से उन्हें इतनी दिक्कत क्यूं?

क्यूं किसी प्रकाशक के या किसी ऐसे ही अन्य आयोजक के आयोजन से उन मानदंडों की पूर्ति की उम्मीद की जाय जो वामपंथी संगठनों से की जाती है (वे कितना पूरा करते हैं, यह फ़साना फिर कभी).

हाँ, अपूर्व जोशी की चिंता बिलकुल वाजिब है, हमें इस बुजुर्ग लेखक के लिए एक अच्छे मानसिक चिकित्सक की व्यवस्था जल्द करनी होगी.


प्रिय व्‍योमेश,

मुझे उम्‍मीद थी कि तुम मेरे कहे को गम्‍भीरता से लोगे। तुम बार-बार साम्‍प्रदायिकता और विचारहीनता का उल्‍लेख कर रहे हो। मैं कहना तो नहीं चाहता था पर अपनी ही मर्यादा का उल्‍लंघन करते हुए यह कहना पड़ रहा है कि इस वक्‍़त तुम्‍हारे(और मेरे भी)स्‍कूल में चल रहे अखंड रामायणपाठ की वजह से शायद तुम कुछ सुनने की स्थिति में नहीं हो। इतने लेागों पर विचारहीनता का आरोप थोपने से पहले सोचो कि क्‍या इसे तुम्‍हारे विचारवान और साहित्‍य में सक्रिय वामपंथी युवा होने की उपलब्धि माना जाए कि तुम अपनी सक्रिय उपस्थिति वाले ख़ुद के स्‍कूल में अब तक अखंड रामायणपाठ की परम्‍परा को भी उतनी ही तल्‍लीनता से निभा रहे हो, जितनी गम्‍भीरता से अपने मार्क्‍सवाद को। मुझे हरिशंकर परसाई हमेशा याद आते हैं..अब और भी आ रहे हैं- 'दूसरों के ईमान के रखवाले'

मेरी समझ की खिड़कियां खोलने के लिए शुक्रिया भाई। तुम हर तरह से अजेय रहो...हर बहस में विजयश्री पाओ...भरपूर विचारवान रहो...एक बार फिर मेरी दुआएं तुम्‍हारे साथ हैं।

तुम्‍हारा शिरीष

और साथ ही उस स्‍कूल का एक कृतज्ञ विद्यार्थी भी, जहां ककहरा तो सीखा...पर अफसोस कि तुम्‍हारे बराबर का ज्ञान हासिल नहीं कर पाया...कुछ विद्यार्थी अज्ञानी भी रह जाते हैं...


व्योमेश जी, शायद आप मेरी बात की गम्भीरता को नहीं समझ पा रहे, यह आपका नितांत निजी मामला है वरना आपके इस लेख के लेखक ने मेरी छोटी सी टीप को कितनी गम्भीरता से लिया है, इसका अन्दाजा उनके खराब किंतु लम्बे पत्र से लग गया होगा.


व्योमेश शुक्ल

शिरीष जी, तुलसीदास या रामचरितमानस पर आपकी क्या राय है, जानना चाहूंगा. अपनी जिस किताब का ब्लर्ब लिखने के लिये आपने मुझसे कहा है, उससे जिज्ञासा का समाधान नहीं होता. उसे पढ़कर, अफ़सोस, दिनकर से पहले के आपके अध्ययन का पता नहीं चलता.


तेजस सिन्हा

व्योमेश जी,

ज्ञानरंजन जी की उस पत्रिका पर खरे जी के कहे से आप सहमत हैं क्या जिसका प्रचार आप इतने जोश में कर रहे थे और जिसमें आप नियमित लिखते रहे हैं?


केवल किसी और की रिपोर्टिंग के आधार पर ऐसा जजमेंटल लेख लिखना, सभी को समानाधिकार घृणा करना कैसे संभव है ? कल्पना और कुंठा की यह कैसे हदें है जिन्हें इन लेखक ने पार करके कुंठा को एक नया आयाम दिया है ? इनका यह लेख ( बाकि कुछ ज्यादा मैंने इन्हें पढ़ा नहीं है ) पढकर यह लगता है जैसे यह अकेले ही गतका ( सीख मार्शल आर्ट ) खेल रहें हैं, यह लेख पढकर बर्नार्ड शा के " आर्म्ज़ एंड दी मैन" के सरजियस की याद क्यूँ आ रही है जिसके बारे में ब्लंटश्ली कहता है

And there was Don Quixote flourishing like a drum major, thinking he'd done the cleverest thing ever known, whereas he ought to be courtmartialled for it.

इनकी ऊर्जा से अवश्य प्रभावित हुई..जहाँ हम चीज़ों का आँखों देखा हाल तक लिखने में आलसी है और यहाँ बिन देखे " आँखिन देखी " और ऐसी अथोरिटी से जैसे यह किसी इनविजिबल रूप में कान्हा में ही घूम रहे थे और ट्रेन में भी यात्रा कर रहे थे

रिपोर्टिंग पर ऐसी आस्था...लेखक का 'संदेह' कहाँ गया ?


प्रिय व्‍योमेश

मैंने पहले ही कहा कि कुछ विद्यार्थी अज्ञानी रह जाते हैं...जो अपने अज्ञान से पूरे आसपास को राममय करते माइक-स्‍पीकर पर हो रहे अखंडरामायणपाठ और रामचरितमानस या तुलसीदास के बीच अंतर डाल देते हैं.......
***
रही बात तुम्‍हें दी गई किताब के ब्‍लर्ब की तो लम्‍बे समय तक न लिख पाने की तुम्‍हारी व्‍यस्‍तताओं के चलते उसे किसी और ने लिख दिया है...मेरे लिए बहुत खुशी की बात है कि इस बार उसे किसी लेखक ने, एक पाठक ने लिखा है. तुम इस भार से मुक्‍त हो। तुमने इस भार को वहन करने का दायित्‍व स्‍वीकार किया था...इसके लिए मैं आभारी हूं...हमेशा रहूंगा....


'सीख' को 'सिक्ख' पढ़ा जाए

मोनिका कुमार


विद्या भईया , श्यामा भईया , संजय गांधी बड़े भईया , इंदिरा गांधी माता , अर्जुन सिंग ताऊ जी से अपने संबंधों की समय समय पर मुनादी पीटने वाले खरे जी इसी कांग्रेस की अवैध संतान राज ठाकरे से इतने विचलित हो गए कि उनका देशप्रेम ठांठे मारने लगा . फिल्म और कविता के साथ साथ उनकी राजनैतिक समझ की भी नैया डूब चुकी , अब यह मान लेना होगा . ढसाल को क्लीन चिट इसलिए कि वे खरे के मित्र हैं और इसी से विश्वकवि भी हैं . राजेश जोशी आदि को भी यह सुविधा पहले पा लेनी थी फिर कहीं भी आते जाते रहते... हर गाँव और कसबे में कुछ बूढ़े होते हैं जिन्हें बच्चे /नौजवान कुछ विशेष शब्द कह कर अपने पीछे गाली बकते दौड़ने /पत्थर आदि फेंकने को मजबूर कर देते हैं ..इससे उस स्थान का एक देसी ढंग का मनोरंजन भी होता ही है . श्री खरे उस दशा को प्राप्प्त कर चुके लेकिन उन्हें यह भी ध्यान रखना होगा कि उक्त प्रकार क्र बूढों से कोई नैतिक-सामाजिक मार्गार्शन मांगने नहीं जाता . उनमें से कुछ अलबत्ता स्वयं को गाँव का मुखिया समझते हुए ही काल के गाल में समा जाते हैं . आख़िरी दौर की अपनी दयनीय कविताओं के बाद श्री खरे ने ठीक ही यह भूमिका चुन ली है . सभी बड़े लेखक और सभी बड़ी पत्रिकाएँ स्तरहीन हैं और खरे जी की चुनिन्दा गालियों के योग्य सिवाय अजेय कुमार की पत्रिका के जो खरे जी की सनक को ढोते रहे हैं.... व्योमेश शुक्ल को ज़रूर कुछ सूंघ लग गयी होगी कि खरे बम्बई बनवासा तज के साहित्य अखाड़े में कोई मजबूत जगह लेने को हैं तभी वे समाज की खरे चिंता में शरीक हो लिए हैं . सबके मनोरथ पूर्ण हों .


नरेन्द्र सिंह

जो मिट्टी फांक रहे हैं
वे सबको आंक रहे हैं


दीपक शर्मा

इस पूरी बहस को पढ कर मैं इस नतीज़े पर पहुंचा हूं कि हमारे इन बुजुर्ग लेखक खरे महाराज ने और इनके दो पिछलग्गू( या लग्गू - भग्गू )डबराल और असद ज़ैदी ने पूरे हिन्दी लेखक - समाज की नैतिकता का खुद को ठेकेदार समझ लिया है . बहुत तमाशा हो चुका. बेहतर हो कि हमारी यह तेज - तर्रार युवा पीढी अब बडी निर्ममता के साथ ऐसे लोगों को एकबारगी खारिज कर दे . इनसे कोई उम्मीद नहीं की जा सकती .


देवेन्द्र

हे विष्णु
काश तुम होते तनिक सहिष्णु !


व्योमेश शुक्ल

इस आलेख ने जो सवाल उठाए हैं उनपर बात करने की बजाय लेख की भाषा या विष्णु खरे, मंगलेश डबराल, असद ज़ैदी, ग़ालिब और दूसरों की ज़िंदगी और नैतिकता को मुद्दा बनाने की कोशिशें हो रही हैं. यह विषयान्तर के अलावा क्या है? इस मक़ाम पर यह क्यों न मान लिया जाय कि कान्हा या इसी नैतिकता के साथ कहीं भी पहुँचने वालों के पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं है? क्या लेख के सवालों को फिर से पूछने की ज़रूरत है? सिर्फ़ यही लेख ये सवाल नहीं पूछ रहा है, फेसबुक पर आशुतोष कुमार और बोधिसत्व ने भी प्रायः यही प्रश्न उठाये थे. जब तक आप संतोषजनक उत्तर नहीं देते, तब तक आपकी क्षमा याचना भी मुद्रा ही है.


जवाब आपको और सवाल उठाने वालों को देना है व्योमेश. मैंने लिखा था-

यह आलेख विष्णु खरे की समकालीन 'प्रतिष्ठा' के अनुरूप है. जिस मेल से उन्होंने यह सबको भेजा था, उसके ही जवाब में पूछे गए सवाल के बाद नामदेव ढसाल को लेकर जो उन्होंने बात की है, वह बताती है कि वह किस कदर पूर्वाग्रही और कन्फ्यूज्ड हैं...या कहूं की शातिर हैं.

एक सीधा सवाल रख रहा हूँ यहाँ, एक यूनिवर्सिटी के सेमीनार में अगर मुझे बुलाया जाता है, जिसमें एक भाजपाई प्रोफ़ेसर भी आने वाला है तो क्या करना चाहिए? उसके जवाब देने चाहिए या फिर वहां से भाग लेना चाहिए? मंगलेश जी वाली बहस में मैंने लिखा था - "संवाद करना और किसी के अपने मंच पर जाकर शिरकत करना दो अलग-अलग चीजें हैं. हम ओम थानवी को इसलिए भाजपाई नहीं कहते कि उनके यहाँ तरुण विजय का कालम छपता है या इसलिए कम्यूनिस्ट नहीं कहते कि वहाँ किसी कम्यूनिस्ट का कालम छपता है. कारण यह कि जनसत्ता के न्यूट्रल मंच है. किसी टीवी कार्यक्रम में या यूनिवर्सिटी सेमीनार में आमने-सामने बहस करना और किसी संघी संस्था के मंच पर जाकर बोलना दो अलग-अलग चीजें हैं. "

क्या सान्निध्य एक संघी मंच है? जहाँ तीस से अधिक अपने लोग आये हों वहां अगर एक मनसे से जुड़ा आदमी आ गया तो उसके संक्रमण से सभी 'साम्प्रदायिक' हो गए? जिस मंच से मोहन डहेरिया को सम्मान दिया गया वह शर्म का बायस बन गया? फिर उस 'अचलेश्वर महादेव मंदिर' के मंच के ट्रस्ट से दिए जाने वाले सम्मान के मंच पर उपस्थित होने वाले मित्रों को यही क्यों न कहा जाय? विष्णु नागर, व्योमेश जी, मनोज झा और एनी कई मित्र वहां जा चुके हैं. लेकिन जब हम इन मित्रों की सेकुलरिज्म के प्रति निष्ठा को जानते हैं तो फिर इसे विचलन क्यूं मान लिया जाय?

विष्णु खरे सामुदायिक पत्र लिखने की अपनी आदत के चलते लगातार लिखते रहते हैं. जब एक व्यापारिक घराने से एक लाख रुपये का "सम्मान"(?) लिया था, तब भी एक पत्र लिखा था जिसमें निजी पूंजी के नेहरूवियन आचरण पर बलिहारी होते हुए एक ऐसी चयन समिति निर्णय करती है जिसकी साहित्यिक क्षमताओं को बताने वाला कोई नहीं, आर्थिक को उन्होंने खुद बताया था. अब शिल्पायन की उस निजी पूंजी से उन्हें इतनी दिक्कत क्यूं?

क्यूं किसी प्रकाशक के या किसी ऐसे ही अन्य आयोजक के आयोजन से उन मानदंडों की पूर्ति की उम्मीद की जाय जो वामपंथी संगठनों से की जाती है (वे कितना पूरा करते हैं, यह फ़साना फिर कभी).



और हाँ, यह तो पूछ ही सकते हैं कि विष्णु खरे को यह सवाल उठाने का क्या हक़ है?


अरविन्द मिश्र

उस मूल सवाल का जवाब हमें अभी तक नहीं कि जिस तर्क से आप राज ठाकरे की पार्टी से जुडे एक कवि के साथ बैठने पर इतनी हाय तौबा मचा रहे हैं वही तर्क शिवसेना से जुडे नामदेव ढसाल के साथ आपके उठने बैठने पर लागू क्यों नही हो सकता ? यानी आपने नैतिकता के दो मानदंड बना लिये है - एक अपने लिये और एक बाकी सब के लिये . गलत तो फिर गलत है .फिर मामला चाहे गली के कवि छ्ज्जूराम से जुडा हुआ हो या फिर तथाकथित "अंत्तरराष्ट्रीय ख्याति वाले" कवि नाम्देव ढसाल का हो . मंगलेश डबराल उत्तराखंड के भाजपा राजनीतिज्ञ के साथ अपना रंग जमाये तो उनके सौ खून माफ , आप चुप लगा जायेंगे क्योंकि वह आपके मित्र हैं .विष्णु करे को अब जवाब देना ही होगा कि यह सब क्या चल रहा है ? रहा बोधिसत्व का सवाल . यहां दिल्ली आकर संजय निरुपम से जरा एक बार बोधिसत्व का असली हाल जान लीजिये . आपको पता चल जायेगा कि जब संजय निरुपम शिवसेना में थे तो यही व्यक्ति उनसे छोटा- मोटा हित साधने के लिये कैसे उनकी चाटुकारिता किया करता था. लोग सब कुछ देख रहे हैं . उन्हें भरमाइये मत .


लेबनानी फ़ि‍लिमकारा नदीन लबाकी की 2011 की फ़िल्‍म है, "यहां से कहां जायें?"


एक दिलचस्प खबर! उस गाली-लेख के विद्वान लेखक इतना उत्पात मचाने के बाद अब मेरे निजी मेल पर "सार्वजनिक" रूप से माफी माँग रहे हैं! लिखते हैं कि मेरे नाम को लेकर उन्हें विभ्रम हो गया! वे तो लेख लिख कर "वेरिफाइ" कर रहे थे! कोष्ठक में ही हँस सकता हूँ ( हा..हा..हा...)!


अम्ररेन्द्र प्रताप सिंह

हिन्दी के ये तीन तिलंगे और हर समय इनकी हां मे हां मिलाने वाले इनके कुछ पुछल्ले अब शायद सोच रहे हों बेकार कान्हा प्रकरण को उठा कर युवा लोगों से पंगा ले लिया . यहां तो इन्हें अब तो लेने के देने पड गये हैं . और भागने के लिये कोई रास्ता भी नहीं. बेहतर तो यही होता कि ये वरिष्ठ गण अपनी इस पकी आयु में अपने पद और अपनी वरिष्ठता की गरिमा को संभाले रखते . दूसरों का मखौल उडाने और उन्हें गरियाने के बजाय ये यदि यह जानना चाहते कि भाई वहां तीन दिन और पांच सत्रों मे आप लोगों की बातचीत कैसी रही , बहसें क्या हुईं तो आज माज़रा कुछ और होता. पर शायद इन जैसे वरिष्ठों के मगध में अब विचारों की बेहद कमी है .


विष्णु खरे जी का कान्हा प्रकरण पर लिखा आलेख मैं देर से पढ पाया । सुनी-सुनायी बातों को आधार बना कर यह लेख लिखा गया है । जो कहा जा चुका है उसे मैं नहीं दोहराऊंगा पर अपनी बात ज़रूर कहना चाहूंगा।

१. विष्णु जी इस आलेख के माध्यम से जो प्रकाशकों की चालबाज़ियों पर अपनी बात कहना चाहते थे वह आवेश ,अतिकथन , आक्रमकता , फुलझडियों छोडने और अपने ही लेखक साथियों के प्रति अविश्वास के चलते दिशाभ्रम का शिकार हो गया । उन्होंने एक हाथ से छ: की छ: गोलियां मण्डलोईजी पर दाग दीं और दूसरे हाथ से पंकज राग को पुचकारते रहे ।

2.अच्छे सुर में वामपंथ का वीन बजाने , बकील हो जाने , मैं जो कह रहा हूं उसे सही मानो , करे को करा मत मानो , मेरे जैसे नहीं हो तो फिर तुम नीच हो । जो लालटेन जलाना नहीं जानता उसकी लालटेन फोडने का अधिकार आपको किसने दिया ?

3.ज्ञानरंजनजी बूढे हो गये , बीस साल टाइपरायटर ठोकते रहे , दिन- रात काम करने का यही प्रतिफल ?
4.मालवा से उभरते हुये फिर डूबते हुये साहित्य के इस तानाशाह को मेरा नमस्कार ।


अजैण्‍डा की बात हमेशा ही महत्‍वपूर्ण रहेगी अन्‍यथा अस्‍थायी तौर पर ही सही, एक ऐसा समूह बनता चला जाता है जहाँ पक्षधरता के प्रश्‍न गौण होने लगते हैं और उसके जोखिम से भी बचने की गलियॉं निकल आती हैं। किसी असुविधाजनक सवाल से सार्वजनिक रूप से नहीं टकराना पड़ता और किसी के प्रति कोई जवाबदेही नहीं बनती। सिर्फ तुर्की-बतुर्की आपसी मुँहजोरी और लटठमलटठा होती रहती है। फिर तर्क समाप्‍त होने लगते हैं और कुतर्कों का एक दौर शुरू होता है जो एक आपसदारी की तरह एक-दूसरे की रक्षा में और हर उस आदमी के खिलाफ आक्रमण में जुट जाता है जो उन्‍हें असुविधाजनक प्रतीत होता है। विचार गायब हो जाता है। जो भी उन्‍हें उनके खिलाफ लगता है, वह भले ही उचित और वैचारिक बात कह रहा हो, शत्रु की तरह दिखता है। कोई किसी अन्‍य बात पर हँस भी रहा हो तो उन्‍हें लगता है कि उन पर ही हँसा जा रहा है।

हम सब सहमत होंगे कि किसी भी आयोजन में भागीदारी के कुछ आधारभूत कारण और औचित्‍य तो बनाना ही होते हैं। तथाकथित डेमोक्रेटिक स्‍पेसेज के बरअक्‍स ही हम वैचारिक संगठन बनाते हैं क्‍योंकि हमें लोकतांत्रिकता के नाम पर ऐसी जगहें नहीं चाहिए कि हाट-बाजार जैसी चिल्‍लपों मच जाए। 'अराजकता भरी और सुविधाजनक लोकतांत्रिकता' और 'अनुशासन/प्रतिबद्धता प्रेरित लोकतांत्रिकता' में हमेशा ही फर्क है। हमारी आकांक्षा क्‍या है, यह हमें समझना चाहिए। और हमें यदि किसी अन्‍य तरह से चुनाव और भागीदारियॉं करना है तो फिर वामपंथ वगैरह का राग छोड़ देना चाहिए। आप जैसे हैं, वैसे दिखें और घोषित करें। एक कौर पपीते का और एक घूँट अल्‍कोहल। इस तरह से अल्कोहल की मस्ती आ सकती है पर अल्कोहल के खतरे कम नहीं होते अंतर्विरोधों को समझते हुए, व्‍यक्तिगत चीजों से या मान्‍यताओं से उठकर विचार करना होगा।
निजी आयोजनों में भी फासिज्‍म के उस तरह के चिन्‍ह हो सकते हैं जैसे सत्‍ता संरचनाओं में होते हैं। और यदि ऐसा दिख रहा है तो फिर निजी आयोजनों को हम 'डेमोक्रेटिक स्‍पेस' के नाम पर विकल्‍प की तरह स्‍वीकार नहीं कर सकते।


अनुराग जी
यहाँ बड़ी गंध मची है, मैं और बदबू नहीं पसारना चाहता, इस गंध में झाँकना समय जाया करना है। यहाँ मेरा मामला अनाम अरविंद के मिथ्या कथन तक ही है। मेरे अब तक के जीवन में किसी साम्प्रदायिक दल या व्यक्ति के साथ किसी तरह के लोभ-लाभ के दलबंदी, गल बहियाँ, सोहबत के मामले बने ही नहीं है।
जिस दिन लगेगा कि वामपंथी मेहनत से रोटी कमाना कठिन है तो वह सब करूँगा जो मुझे उचित लगेगा। किसी से पूछने नहीं आऊँगा।
अब तक नहीं गया हूँ लेकिन जरूरत पड़ी तो संजय निरुपम जी से भी मिलूँगा। वे मेरे क्षेत्र के संसाद जो हैं।


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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गोष्ठी : १ : स्मृति

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सम्‍मुख - 1

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अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

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मुक्तिबोध के बहाने हिंदी कविता के बारे में - गीत चतुर्वेदी