Tuesday, July 24, 2012

पोथी पढ़ि पढ़ि : ४ : व्लादिमिर नबोकोव



सच्चे मीडीऑकर अपने अधलिखे की नुमाइश करते हैं


 मेरा कभी किसी मंडली से ताल्लुक नहीं रहा. किसी स्वीकृत मत या समूह का मेरे ऊपर कभी कोई प्रभाव नहीं रहा. राजनीतिक उपन्यास और समाज कल्याण के मनोरथ से लिखे गए साहित्य से ज़्यादा ऊब मुझे किसी चीज़ से नहीं होती. 

एक
कलात्मक कृति का समाज के लिए कोई महत्व नहीं है. यह सिर्फ उस शख्स के लिए महत्व रखती है जो इसके संपर्क में आता है और मेरे लिए भी वही शख्स महत्वपूर्ण है. 


मुझे नहीं लगता कि एक कलाकार को अपने चाहनेवालों के लिए व्याकुल होना चाहिए. उसका सबसे बड़ा चहेता तो वह शख्स है जो हर सुबह उससे हजामत बनाते हुए आईने में मिलता है. 

मुझे मूर्खता, दमन, अपराध, क्रूरता और  सुगम संगीत पसंद नहीं. लिखने और तितलियाँ पकड़ने से बड़ा मेरे लिए कोई सुख नहीं. 

तुम किसी चीज़ के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जान सकते हो लेकिन उसके बारे में सबकुछ नहीं जान सकते : सबकुछ जान लेने की इच्छा ही हताश करती है.

तुम जितना किसी 'याद' को प्यार करोगे, वह अपने तईं तुम्हें उतनी ही पुरसर और अजनबी मालूम पड़ेगी. 

मैं विज्ञानी जूनून और काव्यात्मक धैर्य का मुरीद हूँ. 

एक कलात्मक कृति में कविता की क्षिप्रता और विज्ञान की उत्तेजना, दोनों का विलय हो जाता है.  

केवल  
टुच्चे महत्वाकांक्षी और सच्चे मीडीऑकर अपने अधलिखे की नुमाइश करते हैं. यह किसी को बलगम के नमूने दिखाने जैसा है. 

मेरे लिए लेखन हमेशा उदासी और उत्साह, यंत्रणा और मनबहलाव जैसी मिलीजुली मनोदशा में मुमकिन होता रहा.

एक लेखक को हिस्की करने वाले दूसरे लेखकों के काम को, यहां तक कि ऊपर बिराजे ख़ुदा की इबारत को भी, ध्यान से पढ़ना चाहिए.

तुम किसी लेखक की कृति दिल से नहीं पढ़ते ( दिल से बोदे पढ़ते हैं ) और न अकेले दिमाग़ से ही,  इसके लिए दिमाग़ और एक तनी हुई रीढ़ दरकार है. 
****
अनुवाद : अनुराग वत्स. 

[ व्लादिमिर नबोकोव के ये विचार उनकी कथेतर गद्य-पुस्तक '' स्ट्रॉंग ओपिनियंस '' से लिए गए हैं.
उनकी तस्वीरें गूगल से हैं.
इस श्रृंखला की दूसरी 
कड़ियाँ यहां. ]

Friday, July 20, 2012

डायरी : सुजान सौन्टैग




मैं इच्छा से उकसती हूँ 


मृत्यु के बाद तुम्हारा न तो कोई ईश्वर होता है न ही जीवन. 

दुनिया में रहते हुए जो सबसे बड़ी चाहत हो सकती है, वह है अपने प्रति सच्चा बने रहने की आज़ादी यानी ईमानदारी. 

दिमाग़ एक वेश्या है. 

स्मृति परीक्षा है. 

कमज़ोरी संक्रामक है. 

हर आदमी के अपने भेद होते हैं. 

भोले बने रहने से बेहतर है जानना.  

औपचारिकता ( 'मेहरबानी करके', 'शुक्रिया', 'मुआफ़ करें' आदि ) ख़ुद को दूसरे शख्स के हवाले न करने का एक तरीका है. 

निगाह एक हथियार है. मुझे अपने इन हथियारों के इस्तेमाल से भय ( शर्म ?) है. 

किसी को प्यार करना उसे आला दर्जे का मानना, तरजीह देना है. लेकिन यह अपने आप में जीना/होना नहीं है. 

अपना दिल वहां नहीं वारना चाहिए जहां बेकद्री हो. 

पूछो : क्या यह शख्स मेरे भीतर कुछ भी अच्छा उगा रहा है ? यह नहीं कि क्या यह सुन्दर है, अच्छा है, काम आएगा ? 

सेक्स को सेक्स मत कहो. इसे दूसरे शख्स की काया की छानबीन कहो ( एक अनुभव नहीं, न ही प्रेम का प्रदर्शन ). इस छानबीन में हर दफ़ा तुम एक नई चीज़ पाती हो. 

बौद्धिक 'चाहत' कामुक चाहत जैसी है.  

मैं पवित्र नहीं, प्रचुर हूँ. 

लोगों को नैतिक शिक्षा देने की मंशा से लिखना लेखन को भ्रष्ट करना है.

मुझे लेखक ( एक अच्छा लेखक ) होने से सिवाय मेरे आलस्य के कोई नहीं रोकता. 

कुछ करने के लिए बहुत से कारण हैं. लेकिन पता है क्या, कारण मुझे काम करने के लिए नहीं उकसाते, मैं इच्छा से उकसती हूँ.  

प्रेरणा मुझे फ़िक्र के लिबास में मिलती है. 

लिखना एक सुन्दर काम है. कुछ ऐसा सिरजने जैसा, जो बाद में दूसरों को सुख देगा. 

एक लेखक में चार लोग  : १. सनकी, २. मूर्ख ३. शैलीकार, ४. आलोचक.
१. माल मुहैया कराता है. २. उसे बाहर ले आता है. ३. उसका स्वाद बनाता है. ४. उसमें बुद्धि की जगहें भरता है.
एक महान लेखक में ये चारों रहते हैं. लेकिन एक अच्छा लेखक नम्बर १ और २ से भी काम चला सकता है क्योंकि ये दोनों ही सबसे अहम हैं.
****
अनुवाद : अनुराग वत्स.


सुजान सौन्टैग क्या बला हैं यह यहाँ .
ऊपर की पंक्तियाँ उनकी डायरी ''
रीबॉर्न ''और तस्वीर गूगल से है.]

Saturday, July 14, 2012

कवि की संगत कविता के साथ : ११ : शिरीष कुमार मौर्य




वकतव्य : 


वाम वाम वाम दिशा/ समय साम्‍यवादी.....

मैं कविता के बारे में कुछ भी कहना चाहूं तो सबसे पहले मुझे बहुत देर तक शमशेर की इन पंक्तियों  की उमड़-घुमड़ में रहना होता है –  यह दिशा मैंने अपने लिए तय की हो – ऐसा नहीं है, यह तो अपने समाज में डूबते जाने के क्रम में ख़ुद-ब-ख़ुद तय होती गई...शोषण और अनाचार और अपने अकेलेपन के अंधेरे में आंखें मलते हुए मैंने अपने समय को पहचाना... वाम  और साम्‍य,  दो शब्‍दों में उजाला था मेरे लिए और मेरे जनों के लिए। निजी अनुभवों के सहारे कहूं तो मेरे अपने घरेलू जीवन में काफी सामन्‍तवाद था...उसके शिकार भी ....जिनमें ज्‍़यादातर औरतें और बच्‍चे थे ...जवान हुआ तो घर के बाहर के अंधेरों को जाना...देखा कि इन अंधेरों के बीच अपनी कई दुरभि:संधियां हैं...वे एक-दूसरे के विस्‍तार हैं। इधर बाबरी मस्जिद ढहाई गई...उसका भरपूर विरोध किया...उत्‍तराखंड आन्‍दोलन हुआ....मैं  शामिल रहा..चोटें खायीं...उन चोटों से कुछ मज़बूती आयी...वरना ढह गया होता....एक सही राजनीतिक समझ के बिना इंसान हो पाना मुश्किल है...यह समझ में आया....    

हे  अरे  अबे  ओ  भगवान .....

पारम्‍परिक भारतीय परिवारों की तरह मेरे हिस्‍से में भी ईश्‍वर नाम की अलामत बहुत थी। पिता ईश्‍वर को तो झुटलाते रहे पर अंधविश्‍वासों और जीवन में ईश्‍वरीय संकेतों की भूलभुलैया से कभी बाहर नहीं निकल पाए। मैंने सन् 88 के चैत महीने में उन्‍हें कुलदेवता की पूजा में निमग्‍न देखा...वे कांपे, उनकी देह अकड़ने लगी...वे चीखने और फफक-फफककर रोने लगे...मां ने कहा इन पर कुलदेवता उतरे हैं...रोते हुए आए हैं..इसका मतलब परिवार पर संकट आनेवाला है। पिता ने सहमति व्‍यक्‍त की.... और मैं, मैं भीतरी असहमति के बावज़ूद कुछ कहने की स्थिति में नहीं था...बाद में पिता के व्‍यक्तित्‍व को जानने-समझने की एक मुहीम चलाई मैंने...उनके जीवन और विचार के बारे में परिवार के और बाहर के उनके अंतरंग लोगों से जानकारियां जुटाई...उनकी एक पुरानी डायरी तलाश कर चुपचाप पढ़ने का जघन्‍यतम अपराध किया...पर मैंने उन्‍हें जाना.... उन पर देवता आना ईश्‍वरीय नहीं, साइकोलॉजिकल घटना थी। वे महान और स्‍थानीय के बीच एक टूटे  हुए आदमी या आख्‍यान हैं आज भी.....

उस जनपद कवि हूं

जी हां,  उसी हिंदी जनपद का कवि हूं जो अभी आधुनिकता ठीक से नहीं जानता....जो बकौल त्रिलोचन भूखा है... दूखा है...
 ****

कविताएं : 





बारिश के भीतर बारिश है

पानीदार लगभग कुछ नहीं है
न आंखें
न चेहरे
न हथियारों की धार
न किरदार
मेरे आसपास पानीदार लगभग कुछ नहीं है

एक ऐसे समय में कह सकते हैं
सूखा है
अकाल है

पपड़ाई मिट्टी के ढूहों से
बिलखती निकलती हैं चींटियां
दिमाग़ में रेंगती
अचानक पानी की उम्‍मीद में उग आए कोमल पंखों को
हिलातीं
थोड़ा उड़तीं इधर-उधर
फिर दिमाग़ के कोटर में ही
गिर जातीं

एक ऐसे समय में कह सकते हैं
सूखा है
अकाल है

पक्षियों की महान उड़ानों के झड़े हुए पंख
धूल में भटकते बच्‍चों को मिल जाते हैं
खेलने के काम आते हैं
पक्षी जो उड़ गए पानी की तलाश में
साधारण थे
महान थीं उड़ानें
आकाश के सूनेपन को सरापती
अब न जाने कहां होंगी

एक ऐसे समय में कह सकते हैं
सूखा है
अकाल है

पेड़ों पर बंधे हुए फलों में सूख गया रस
अब लगे रहें बेशर्मी से कि झड़ जाएं की उनकी कशमकश
पहाड़ी नदियों के तल में रेत ही रेत
गो हर देश और काल में अपने उद्गम से लगभग
पहाड़ी ही होतीं हैं वे
लाश की तरह नोचते उन्‍हें माफिया
पानी न होने का सुख सम्‍भालते
इधर लोग पुकारते व्‍याकुल कराहते
बोलते तो मुंह से झरती रेत

एक ऐसे समय में कह सकते हैं
सूखा है
अकाल है

जंगलों से भाप की जगह निकलता धुंआ
धूप के साथ आग
चांदनी के साथ राख
हर तरफ़ झुलसे हुए छोटे-छोटे जीवों और कीड़ों के
अदृश्‍य शव
इधर पिटती हुई झील के किनारे
समृद्ध पर्यटकों का कलरव
हाहाकार पहाड़ों के दिल का अनसुना ही रह जाता है
बेवक्‍़त की इस अजब-सी बादे-बहार के बीच 

एक ऐसे समय में कह सकते हैं
सूखा है
अकाल है

कहां है बारिश
बारिश कहां हैं
पुकारते हैं पहाड़
कराहता है भाबर
पानीदार कुछ भी नहीं अब तो बताओ
बीते जा रहे चौमासे के महीने रीते के रीते 
कहां है बारिश
बारिश कहां हैं

कैसे न कैसे एक दिन तो वह आएगी
तर-ब-तर हो जाएंगे पहाड़
पानी इतना आएगा
कि सरकार को दैवीय नज़र आने लग जाएगी हर आपदा

पर आंखें सूनी रह जाएंगी मेरे जनों की
चेहरे वैसे ही सूखे
बेपानी इठलाते रहेंगे जनप्रतिनिधियों के किरदार
क्‍या हमेशा कुंद ही बनेगी रहेगी विचारों के हथियारों की धार

बारिश कहां है
कहां है बारिश

एक ऐसे समय में कह सकते हैं
सूखा है
अकाल है

जानता हूं मैं यह बारिश जिसकी बरसों से तलाश है
क़ैद है दूसरी बारिश के भीतर
इस बारिश के भीतर दुबक गया है
एक बहुत बड़ा संसार
एक बारिश छुप गई है बारिश के भीतर
आपदा के भीतर उर्वरता
सरकार के भीतर जनता

एक ऐसे समय में कह सकते हैं
सूखा है
अकाल है 

किसी भी समय में कवि यदि कवि है तो
उम्‍मीद नहीं छोड़ता
जानता है
अपने हारते हुए दिल से भी मानता है
एक दिन बारिश को बारिश का डर न होगा
इतनी बढ़ जाएगी आपदा
कि दुबक जाने को कोई घर न होगा

आंख मलते जन सड़कों पर होंगे
बारिश होगी
जल होगा
भले ही एक विशाल आज में घुटकर रह गए हों हम
पर सरल बात है यह - कल होगा

एक ऐसे समय में जब कहना पड़ता है
सूखा है
अकाल है
बात का यूं उम्‍मीद के मोड़ पर ख़त्‍म हो जाना ही अच्‍छा 
यही एक शरण्‍य है
बाक़ी तो सब जीवन फ़िलहाल हताश धुकधुकियों का
एक सिलसिला है
भय है ।
***


कवि की मेज़
(दो प्‍यारे दोस्‍तों : गिरिराज किराड़ू और व्‍योमेश शुक्‍ल के लिए)

एक ज़िंदा पेड़ की महक सूखी-तराशी हुई लकड़ी से आ रही है
एक किताब के कवर पर लगभग अमूर्त हो चुकी
चिड़िया भी गा रही है

मसली हुई तम्‍बाकू के कण
कॉफ़ी के गहरे दाग़
कितना निकोटिन-कैफ़ीन है यहां

यह
छात्र-जीवन के पुराने रेस्‍टोरेंट की उस मेज़ की तरह
लगती है
जिस पर कितनी बहसें हुईं
सिगरेटें बुझाई गईं क्रोध से भरकर
कुछ झड़पें भी हुई
नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे  वालों के साथ
जबकि ज़मीने-हिंदोस्‍तां प्‍यारी थी हमें उनसे भी ज्‍़यादा
हम उस पर अपने करोड़ों कुचले कराहते जनों की
बसासत देखते थे
धर्म-मज़हब के फ़रेब से दूर
इंसान की मुक्ति
मेहनत की क़द्र करने वाले विचारों में खोजते थे 

आज भी इस पर विचारों की भरमार है
दिशा वही है समय भी वही है

यहां वाल्‍टर बेंजामिन मार्टिन हाइडेगर  को घूरते हैं
देरिदा  कोने में पड़े रहते हैं उत्‍तरआधुनिकता की
भंगमुद्राओं का परीक्षण करते सोकल
उनका नाम तक नहीं लेते हैं
यहां आज भी
एक घमासान मचा रहता है
ऐसे में कविमन कहां बचा रहता है

पर यह कोई बौद्धिक चीज़ नहीं है
ज्ञानात्‍मक संवेदना और भावानात्‍मक संवेदना की
प्राध्‍यापकीय कारीगरी की ज़द से बाहर है
इसका शिल्‍प –
बहुत ठोस
चार खड़े डंडों पर एक पटरा
नीचे डंडों के बीच दो-एक आड़ी लकडि़यां
सहारे के वास्‍ते....
बस्‍स..इतना भर...बाक़ी तो सब कला है
अगर उसमें कुछ श्रम है तो मज़ा है

कई परिवर्तनशील युगों में इसके इतिहास के बारे में
मेरे पास दो सरल वाक्‍य हैं

1- इसने ख़ुद को कुछ ख़ास नहीं बदला है
2- हमने इसको कुछ ख़ास नहीं बदला है

पहला कवि का वक्‍तव्‍य है
और दूसरा बढ़ई का
जाहिर है बढ़ई वाले में विचार ज्‍़यादा है
और विचार सिर्फ़ मूल ढांचे के बारे में है

बाक़ी तो सब कला है ...
अगर इसमें कुछ श्रम है तो मज़ा है

कुछ कवि मेज़ नहीं तिपाई रखते हैं सिरहाने
उनकी कविता के बारे में
इतना तो कहना ही होगा 
कि एक पांव कम होने से सौन्‍दर्य और कला
कुछ बढ़ जाते हैं
पर तिपाई कमज़ोर होती है मेज़ से

मेज़ में
अपने सीमित आकार के बावज़ूद विस्‍तार बहुत है
इस पर हाथ रखकर सोचता बैठा
या लिख-पढ़ रहा आदमी
भटक सकता है रात-रातभर के लिए
खो भी सकता है
और कितनी कोमल बात है
कि लौटकर आए तो सो भी सकता है
उसी पर सिर टिकाए

समकालीन समय में
ज‍बकि टी.वी. स्‍टैंड से उठकर दीवार पर चिपक गए हैं
रेडियो खो गए हैं कहीं
अब उनकी आवाज़ भी नहीं आ रही है
तब भी
इस मेज़ से एक ज़िंदा पेड़ की महक आ रही है
एक अमूर्त चिड़िया इस पर गा रही है 

रागात्मिका वृत्ति है यह हमारी
जो हमें
मनुष्‍यों और दूसरे जीवों के अलावा
चीज़ों से भी जोड़े रखती है
और चीज़ें आख़िर चीज़ें ही हैं
अकसर इस्‍तेमाल भर का होता है
उनका मोल

पर किताबों के बोझ से सजी
कुछ अनदेखी सम्‍भावनाओं से दबी यह मेज़...
इसका मामूलीपन कुछ ख़ास ज़रूर है
इस मामूलीपन से ही जन्‍मती है दुनिया हमारी
लगातार फैलती हुई
चौतरफ़ा ख़ासुलख़ास होती हुई  

कुछ और पुरानी ख़स्‍ताहाल होने पर भी पड़ी रहेगी
घर के किसी कोने में
कवि भले कवि न रहे पर उसकी स्‍मृतियों में यह तब भी
कवि की मेज़ रहेगी

कभी बहुत क्रूर आया समय तो जाड़ों की किसी रात
अहाते में
बच्‍चों के हाथ सेंकने की ख़ातिर लहक कर जलेगी

यूं सर्द सफ़ेद चांदनी के बीच
इससे एक लाल गर्म दहकती हुई-सी कविता बनेगी

उफ़...कितनी तुकें मिलाने लगा हूं मैं
हर बार की तरह
मेरा कवि होना
असफल होने लगा है
इस बार तो लकड़ी की एक मामूली-सी मेज़ के सामने 
जिससे फिलहाल
एक ज़िंदा पेड़ की महक आ रही है
एक लगभग अमूर्त हो चुकी चिड़िया जिस पर
अभी अकेले ही गा रही है ..
घुप्‍प रात और राजनीतिक अचेतन के अंधेरे में
उजाले की अगवानी का कर रही है अभ्‍यास 
जिसकी उम्‍मीद धीरे-धीरे जाती रही
लोगों के मन से

विचारों का ये घमासान बता रहा है
दूसरी चिड़ियें भी हैं अनगिनत घरों में क़ैद अमूर्त होती हुई
ख़तरे में आ पड़ेगी जब जान
मिलकर गाएंगी वे भी

एक दिन
सामूहिक होता जाएगा ये मुक्ति का गान
***


पन्‍द्रह की उमर में एक तुकान्‍त प्रेम 

बीच राह की बहुत देर की गपशप से थकी हुई-सी
वह जाती थी सिर पर आटे का थैला लादे
थोड़ी शर्मायी-सी
घर को
अम्‍मा देती आवाज़ दूर से उसको

उसी सांकरी प्रिय पगडंडी पर
किलमोड़े* के फल के गाढ़े गहरे लाल रंग से
अपने अंग्‍गूठे पर मैंने
झूटा  नकली घाव बनाया

लग जाने का अभिनय कर उसे बुलाया

वह पलटी
रक्‍ताक्‍त अंगूठा देख तुरत ही झपटी
अपने सर्दी से फटे होंट पर धर कर
छोटी-सी गरम जीभ से
जैसे ही अंगूठा चूसा
खट्टा-कड़वा स्‍वाद झूट का उसने पाया

झट से प्रेम समझ में आया
हाय, क्‍यों झूटा घाव बनाया
देखा कितनी-कितनी बार
मगर फिर अपने निकट न उसको पाया

इतने बरसों बाद
अब भी जीवन है भरपूर
और प्रेम भी है जीवन में
पर झूट धंसा है
गहरा कहीं रक्‍त–सा रिसता है मन में।
***
*एक पहाड़ी झरबेरी

[ इससे पहले सबद पर शिरीष की एक कविता और कवि-वक्तव्य .  
सबद पर इस स्तंभ की अन्य कड़ियाँ यहां. तस्वीरें गूगल से. ]