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कथा : 9 : चन्दन पाण्डेय की नई कहानी




 समय के दो भाई 

पता नहीं कौन से समय की बात है कि उसके दो भाई थे. पहले का पुकार नाम बड़े था और दूसरे का – बहुत बड़े. दोनों अमीरजादे, ख्याली, शराबी और आलसी थे. इसलिए चिंतक भी. ये दोनों भाई शराब की ही नींद उठते थे. सुबह का कुल्ला बीयर से और निबटान आदि का काम सस्ती शराब से करते. स्नान करते हुए शराब की बाल्टी में दो बूँद डेटॉल डालना कभी जो भूले हों. किसी स्त्री को चूमते, हालाँकि ऐसे मौके जाहिलों की जिन्दगी में कम ही आते हैं, तो उसके होठों या अन्य जगहों पर शराब की धार रख कर ही चूमते थे. पढ़ना लिखना इसलिए नहीं सीखा क्योंकि स्याही शराब नहीं थी.

दोनों के बोलते ख्यालों से संघातियों, पड़ोसियों के कान घायल हो चुके थे. पीने की कामना सँजोए लोग आते, पीते और इनकी खाम ख्यालियों से चोटिल होते. पहला घूँट अन्दर जाते ही बहुत बड़े की आँखें मुँद जाती और ‘बड़े’ कागज, कलम, इंचटेप, रंगीन पेंसिल लेकर बैठ जाता. इनके पैसे से पीने वाले चापलूस इनकी मटमैली करतूत देखते.

इन दोनों लखेरों को बिरसे में इतनी जमीन मिली हुई थी कि हर दिन पीने के बाद नए नए कारखाने और उद्योग धन्धे लगाते. योजनाओं की लकीर खींचने में माहिर हो चुके थे. पिनक में ‘बहुत बड़े’ कारोबार सुझाता और बड़े उसका नक्शा खींच कर दिखा देता. कारखाना लगाने के बाद मजदूरों के लिए घर बनाता. उन घरों को सस्ते ब्याज पर अपने ही मजदूरों को बेचता. बाद के दिनों में कारखाने से नजदीक ही बड़े बड़े फ्लैट भी बनाए. उनके आजू बाजू जो तरणताल बनाए. उसमें हंस, बत्तख और दुनिया की सभी रंगीन मछलियाँ भी रख आए. इससे जो मुनाफा हुआ उससे उन्होने खूब सारी शराब खरीदी. वो शराब उन साथियों को पिलाई जो वहाँ बैठे उनका ख्यालनामा सुन रहे थे.

शराब की लत तो धर्म जैसी ही बुरी होती है.

धीरे धीरे शराब ने अपना रंग दिखाया. इनके लिए वो कम पड़नी शुरु हुई. पीने का आलम यह था कि अपना पैमाना भर लेने के बाद दूसरे पैमानों पर नजर रखते. जैसे ही कोई अंजान या दुखियारा अपनी ग्लास नीचे रखता, दोनों भाई उसे गटक जाते. दुखियारा अपना सा मुँह भी नहीं रख पाता था.

वो हर सुबह सोचते, किसी तीसरे पियाक को आमंत्रित नहीं करेंगे. तैयारी करते, आज से सारा काम खुद ही करना है. शाम होते न होते दोनों कुछ घूँट से गला खंगाल कर सोचते, सलाद कौन काटेगा? चखना कौन बनायेगा ? और सबसे महत्वपूर्ण यह कि किसिम किसिम के पैग कौन बनायेगा ? इसलिए, शराब कम पड़ जाने की कीमत पर भी लालची शराबियों को जमा कर लेते और फिर शराब और ख्याली पुलावों का दौर शुरु होता.

जब से उनकी शराब कम पड़नी शुरु हुई उन्होने हर बार शराब के कारखाने सँजोए. नक्शा अलग होता और उससे बनने वाली शराब भी. बीच बीच में मजे लेने के लिए साथी पियक्कड़ भी दो चार राय उड़ेल देते. दीवाल शराब के रंग की होनी चाहिए. शराब की टंकियाँ अलमुनियम के नल से जुड़ी हों तो कितना अच्छा रहे. या ऐसी ही कोई सलाह. दोनों भाई साथियों के सलाह तब तक मन से सुनते जब तक शराब बची रहती.

ऐसा ही कोई अनगढ़ दिन रहा होगा कि इनके शराबी साथियों के साथ एक नया आदमी चला आया था. नौउम्र ही था और इनकी कारस्तानियों से नावाकिफ था. दौर शुरु हुआ. पहले या दूसरे पैग के बाद जहाँ दोनों भाईयों ने शराब का कारखाना लगाना शुरु किया वह इस नये आदमी की बस्ती से सटे हुए मैदान पर था. उसे यह सारा जतन अजूबा अजूबा लगा. शराब के कारखाने की बात से उसे आश्चर्य कम हँसी अधिक आ रही थी. चूँकि नया नया था इसलिए दोनों भाइयों की बातों के चक्कर में उसे सारा कुछ सच में तब्दील होता लगा. लगा कि शराब के कारखाने से उसकी बस्ती न उजड़े तो बाकी चीजें बर्दाश्त की जा सकती हैं. इन ख्यालों में खोने से पीने की उसकी गति कम हो गई थी.

इधर दोनों भाइयों ने शराब का कारखाना लगा तो लिया था पर वहाँ तक पहुँचने के रास्ते में बस्ती आ रही थी. गटागट पीते हुए बहुत बड़े ने सुझाया, अगर बस्ती वालों को कारखाने की मजदूरी दें दें तो वो शायद जमीन छोड़ दें. यह सलाह सबको पसन्द आई, सबने इशारे से हुँकारी भर दी. मुँह किसी ने नहीं खोला. वजह ? पीने का क्रम रुक जाता. घूँट रोककर बोलना पड़ता और इतनी देर में मौजूद पियाक लोग सारी शराब खाली कर देते. नए साथी के साथ यह दिक्कत नहीं थी. उसने कुछ कहने के लिए ग्लास नीचे रखा तब तक बहुत बड़े ने व्यंग बाण छेड़ दिए, क्यों साहब, जो पीने में इतना धीरे हो वो जीवन में कितना होगा ?

अपमानित नया साथी बोल पड़ा, जी, मैं पीकर आया हूँ. इस जवाब से चकित हो सबने एक स्वर में पूछा, कहाँ ? कहाँ पी आए ? नए साथी ने अपना समय लिया, घूँट भरकर बड़े की ओर इशारा करते हुए कहा, इनकी फैक्ट्री से. बहुत बड़े को इस जवाब पर यकीन नहीं हुआ. अपने को होश में लाने के लिए शराब से मुँह धोया और उसके ही छींटे मारे, पूछा, कब ? नया आदमी का जवाब, शाम ही को तो.

उस रात दोनों भाइयों की नींद कहीं बह गई थी. बेचैन. करवट – करवट. आधी रात के वक्त बहुत बड़े ने कहा, अब ? बड़े गुमसुम था. दो चार पहर बाद जो कुछ बोला उसे सुन कर बहुत बड़े जान गया कि यह उसके ही सवाल का जबाव था. बड़े ने कहा था, इधर हम प्यासे रहते आए और हमारे ही कारखाने से शराब चोरी होती रही. बहुत बड़े ने फिर पूछा, तब ? तब क्या ? दोनों ने एक साथ जवाब सोचा, इस तरह तो ये बस्ती वाले एक दिन सारी शराब पी जाएंगे.

दोनों आलसी भाइयों में जाने कहाँ से उर्जा भर गई थी. उन्होने पुलिस वालों को किराए पर उठाया और बस्ती को आग के हवाले कर दिया. बस्ती वाले नींद के सताए हुए थे, आग की मार कहाँ झेल पाते. भगदड़ – भगदड़. पल भर में आठों दिशाएँ लोगों से भर गई और बाकी बची दो दिशाएँ उनके शोर से. अगलगी के मुहाने से बाहर निकलते ही उन पर पुलिस की लाठियाँ पड़ रही थीं. बड़े और बहुत बड़े ने भी मोर्चा सम्भाल रखा था. लोगों को पीट पीट कर पूछ रहे थे : और पियोगे शराब ? चोर सब. और शराब पियो, सालों. पैर तो रखो कारखाने में, काट दिया जाएगा.  
*
     
किसी ने अपने अंतर्मन में इस घटना या इन दो बदमाशों ‘बेचारों’ का समर्थन नहीं किया. सैकड़ों लोग जले थे. गरीबों के जीवन में बमुश्किल जुटे संसाधनों का भयानक नुकसान हुआ था. मीडिया के भले लाचार गुस्से में आकंठ डूबे हुए थे. वो तो दुनियादारी के तकाजे थे वरना सभी अखबार और मीडिया वालों ने इनकी इस जली हुई करतूत के खिलाफ मोर्चा कस लिया होता. इसलिए इस खबर को लिखने के बाद शहर का सबसे नामी पत्रकार दो मिनट अपने झूठ पर उदास हुआ, फिर यह सोच कर खुश हुआ कि जब वह इतना सफेद झूठ बोल सकता है तब वह अपनी किस्मत साहित्य में क्यों नहीं आजमाता. उसने खबर यह बनाई थी : दैवीय चमत्कार – काल्पनिक शराब फैक्ट्री में लगी आग से बस्ती स्वाहा.
सुनने में आया, कोतवाल साहब उन दोनों पर सख्त नाराज हैं और उन्हें बन्द करना चाहते हैं पर वो क्या करें. बेचारे वचन से बँधे हुए हैं. वो दोनों बच्चे कोतवाल को मामा कह कर पुकारते हैं. हकीकत यह है, कोतवालिन ने बहुत बड़े की निगाहों में छुपे चोर का जिक्र नहीं किया कि जब वो कोतवालिन को मामी कहता है तो उसके ऐठे हुए शब्दों से और निगाहों से कैसी दुर्गन्ध उठती है.  
      
न्यायाधीश के गुस्से का भी पारावार नहीं था और वह खरा गुस्सा था. वो तो जैसे सचमुच उसी आग में जल आए थे. आज कहने वाले जो भी कहें पर न्यायाधीश साहब जानते हैं कि उनके मन में जल चुके लोगों के लिए क्षोभ और दया का भाव था. वो उन लोगों के लिए कुछ करना चाहते थे पर नहीं कर सके. जान पहिचान का दु:ख उन्हें साल रहा था, काश वो सारे अमीर उमरा अपरिचित होते तो सजा सुनाई जा सकती थी.  
**** 

                                                  [ चन्दन पाण्डेय  की सबद  पर छपने  वाली  यह तीसरी कहानी है. पहले की कहानियां यहां : 1,  2.                   कहानी के साथ दी  गयी  तस्वीर सल्वाडोर डाली की  है. ]
11 comments:

chndan ji aapne itni dhaar trike se apne shbdo ko khnaai kaa swrup diyaa hai padh ke achchha lgaa . apni dhaar aise hi bnaaye rakhe saadhu waad aap ko


.....ऐसी व्यवस्था आखिर कब तक हम सभी के गले में रस्सी का फंदा बनकर हमारा जीवन नर्क करती रहेगी.... कोई तो राह निकलेगी ही ...आज नहीं तो कल
.


बड़ी रोचक कहानी है, शराब की शुरुआत को कभी आनन्द में समाप्त होते नहीं देखा है।


शराब की लत तो धर्म जैसी ही बुरी होती है.
बढ़िया कहानी है.अंततः इसकी परिणति षड्यंत्रों और दुरभिसंधियों में ही होनी थी..वैसे थोडा सा और खुला होता तो प्रतीक आसानी से समझ लिए जाते...


Interesting story written with ink dipped in Sattire. The message was hidden yet so clear. I loved the compilation & presentation of words by "Chandan Pandey". Hope to read your more & more stories.


bahut rochak kahani hai.....naye shilp main.


इस बार इस कहानी में कहानी से ज्यादा मुझे एक भड़ास दिखाई दी. भड़ास मुझे पसंद है लेकिन भड़ास के पीछे के सच में अगर आधार सायास बनाया हुआ हो तो फिर बात वही बेमतलब की हो जाती है. अच्छी खासी और नए फ़्लेवर उठाते चल रही कहानी अच्छा होने कुछ नया कहने से पहले ढह जाती है. चंदन की कहानियाँ का मैं अंधभक्त हूँ. फिर भी यह कहानी पता नहीं कैसे अखर गई. खैर लेखन के कई मुकाम होते है. यह कहानी एक मुकाम का दर्शन कराती तो है ही.


अलमस्त कहानी...चंदन भाई शब्दों से खूब खेले हैं...इसकी बानगी देखिए "शराब की लत तो धर्म जैसी ही बुरी होती है"...बहरहाल, दंद-फंद से अलग एक रोचक कहानी...शराब का सुरूर रखने वाले अवश्य पढ़ें...


chandan pandey ki nayi kahani bilkul hi nayi hai....nice read.aur bhi padhne ka mann kar raha tha but kahani khatm ho gayi....aage bhi aapki kahani ka intezaar rahega.:)


kahani ke andar ek aur kahani maujood hai*shahitye ki


Chandan, achchhee kahanee hai. jo madyap hain, vo to madhyp hain, par jo naheen hain un par tamam tarah ke nashe hain, isiliye andhergardee ka aalam hai.


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संपादन : अनुराग वत्स.

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