सबद
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सबद पोएट्री फि़ल्‍म : गीत चतुर्वेदी



[ सबद के चार साल पूरे होने तक यह आकलन करना प्रीतकर था कि इस छोटी-सी नेट-पत्रिका के ज़रिये निरंतरता और गुणवत्ता का ध्यान कर हमने ऐसा बहुत-कुछ पेश किया जो लेखकों-पाठकों के बीच सराहा गया. सौभाग्य से नए माध्यम में साहित्य के प्रकाशन को लेकर पुराना संकोच अब छूट रहा है और अब सबद ही नहीं दूसरी कई आवाजें भी इसमें शामिल हो  गई  हैं. ये तमाम  आवाजें अपने विन्यास और नियोजन में हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण योग कर रही हैं. सबद इस सिलसिले में एक नई शुरुआत 'पोएट्री फिल्म' के ज़रिये कर रहा है. यह बात किसी से अलक्षित नहीं कि नए माध्यमों में साहित्य को कुछ और कल्पनाशील ढंग से प्रकाशित किया जा सकता है. हम माध्यम की इस खूबी का अपने तईं बेहतर इस्तेमाल कर रहे ताकि साहित्य का और अनेक तरह से प्रसार संभव हो. इस पहली फिल्म में इधर की हिंदी कविता के अत्यंत महत्वपूर्ण किरदार गीत चतुर्वेदी हैं. उनकी कविताएं और कविता पर एक वकतव्य. पूरी फिल्म उनकी दिलचस्पियों की भी बानगी है क्योंकि संगीत, दृश्यांकन आदि भी उन्हीं का है. हम उनके सहयोग के लिए आभारी हैं. हमने अपनी तरफ से एक नई शुरुआत की है. इसे बहुत दूर तक ले जाया जा सकता है, ऐसा विश्वास जगता है. ]
***



60 comments:

शानदार प्रयोग! जानदार प्रस्तुति!! रचनात्मक जगती!!!


इस रूप में आपके मन की आवाज़ सुनकर अच्छा लगा। कविता बहुत निजी हैं मेरे लिये, स्वयं में खो जाने और स्वयं को ढूढ़ का एकमेव माध्यम।


एक दम बिंदास! 'सबद' के लिए ढेर सारी दुआएं!


शानदार पहल... निश्चय ही साहित्य को ऐसे अनेक नविन माध्यमों द्वारा भी अभिव्यक्त किया जा सकता है... साहित्य और माध्यमों की शक्ति है ये और आपकी सृजनात्मकता का विस्तार !
बधाई... आपको और गीत जी को...


अभूतपूर्व अनुभव.कवितायें तो पहले पढ़ी हैं मगर उन्हें असरदार ढंग से पार्श्व संगीत और चित्रों के साथ गीत की ठहरी हुई आवाज में सुनकर लगा कि वे प्राणवान हो गयी. गीत की कविताओं का एकल पाठ आयोजित करने के लिए आभार. ऐसे और भी कमाल दिखाते रहिये.


उफ़ .....दृश्यों के साथ कविताओं की नदिया कहाँ बहाकर ले गयी ? अब तक खोज रही हूँ खुद को .......अदभुद !


गीत की कविता पढ़ी थी . यहाँ तस्वीर, संगीत एवं गीत की ही आवाज में प्रस्तुती शानदार रही. पूरी टीम को बधाई .


जैसी गीत की कविता वैसे ही उनकी आवाज ,वैसी ही ये फिल्म


ह्रदय की बेजोड़ ...उत्कृष्ट अभिव्यक्ति .....
शुभकामनायें ..!


Geetji , apratim adbhut anupam abhinav kary ke liye badhaai


बेहतरीन प्रयास, गीत की आवाज़ में उनकी कविता सुनना अद्भुद, क्या नाम दिया जा सकता है द्रश्य, शब्द और ध्वनी से उपजे अहसासों से लबरेज़ तीस मिनट की इस पोएट्री फिल्म को बस यही गज़ब, उम्दा, बेमिसाल और क्या


geet g, film dekhi hai. anand aa gea. bahut khoob.jo fotos hain, jo awaz hai, jo music hai, peotry se pehley ki khamoshi aur baad ka music, poems ki tarteeb, lafzon ka thehrav, sab kamaal. bahut bahut vadhai aap sabhi sathion ko. is par baat karenge,.


बहुत साल लगातार यह स्वप्न देखा किया कि कविता पर विलक्षण किस्म का काम हो सकता है ..kavi को केंद्र में रख कर .. नहीं कर पाया .. अच्छा लगा कि आप लोग 'सबद ' के माध्यम से इसे फलित होता दिखा रहे हैं .. बहुत सयानी है यह पीढ़ी ...!


गीत भाई : मैंने अभी देखा और सुना. आपकी आवाज़ सुनकर अच्छा लगा. मुझे एक एक लाइन पसंद आती है आपके कविता की. "कितनी ही पीडाएं हैं जिनके लिए कोई ध्वनि है". अद्भुद !


i am speechless , poems , quality of voice , pictures and music the combination amalgamation is catalyst to each other whole effect is awesome!!


‎1-r kavita aapne badi chun-chun k piroyi hai is film me. Padha to sabko tha, par ise dekhne k baad mehsoos huaa ki kavita ko jiya v ja sakta hai. Aap k shabdon k liye aapse behtar aawaaz ho hi nahi sakti thi. Photographs, backgrnd music sab laazawaab. Kul mila k 1 adbhut prastuti. Tum jab sukh deti ho usse mai zinda rahta hoon tum jo dukh deti ho usse kavita karta hoon kitna jiya hai maine aur kavita kitni kam ki hai. Superrbbbbbbbbb..............:) aap aur aapki poori team ko haardik badhaiyaan.


‎'Sabad' ke liye badhai.aur umda aur behtarin rachnayen sunane ke liye shukria.wakai bahut pasand aya.age ke liye dheron shvbhkamnayen apko


बहुत सुन्दर प्रस्तुतु...अद्भुत कविताएं.......ऐसे प्रयोग होने ही चाहिए......


your poetry and the images have amalgamated perfectly with each other...absolutely amazing...Kieslowski, WKW, Pessoa, JLB all came alive through your voice :)


'सबद' की सालगिरह पर आपकी यह 'कविता फिल्म' एक अनमोल तोहफा है.. बहुत शुक्रिया और शुभकामना गीत, अनुराग वत्स जी और 'सबद'..


very gud sir..great combination of photos,music and vediography...no doubt kavita aatma ki awaaz hai...bt ur poems r more spiritual.... spiritualism has so many ways to flourish...its simply spiritualism in its own way...touched to heart...


भाई वह कमाल का विडियो था कविता के साथ भूमिका ऐसी की गीष्म में शीतल जल कंठ की यात्रा पर हो .....गीत जी बधाइ


गीत जी, कविता, आपकी आवाज़, संगीत और तस्वीरों का चयन सब लाजवाब है। आपकी प्रतिभा वाकई हैरान करती है। बहुत-बहुत बधाई।


सुना नहीं हूँ, सुनने जा रहा हूँ उत्साहित मन से. अग्रिम बधाई के साथ.


सन्‍मार्ग

शानदार प्रस्‍तुति......परंतु मन में कई प्रश्‍न भी उठते रहे, कविता की कल्‍पना आपकी, शब्‍द आपके, बिंब आपके यह तो ठीक है परंतु एक पाठक जब कविता को पढता है तो जरूरी नहीं कि ठीक वह उसी अर्थ में उसे स्‍वीकारता हो वह अपने ढंग से कवि के शब्‍दों और बिंबो को एक अलग परिस्थितियों में अलग तरह से शायद गढता भी है. यह ठीक है कि कवि की यह आजादी है कि वह बिंबों और शब्‍दों को अपने सीमित चित्रों के माध्‍यम से नया अर्थ दें परंतु मुझे लगता है कि कहीं न कहीं यह पाठक की कल्‍पना में हस्‍तक्षेप है क्‍योंकि शब्‍द और बिंब उसे जी‍तनी असिमित कल्‍पना की स्‍वतंत्रता देती है द़श्‍य माध्‍यम उतनी नहीं, एक हद तक इससे परे सोचने में बाधा भी प्रस्‍तुत करती है. बहरहाल शायद यह मेरी निजी सोच हो......गीत जी की अवाज में इन कविताओं को सुनने में बहुत मजा आया. गीत जी और अनुराग जी दोनों को हार्दिक धन्‍यवाद......


It's cool. Chauthi saalgirah mubarak Anurag. Lage raho


बहुत सुंदर । यह नया अंदाज़ सबद के चार साल को खास बनाता है । अगले सालों के लिए आश्वस्त करता है ।
गीत की कविता का तो कहना क्या ... 'काल की कविता' है, 'अन्तराल' की कविता है ।


अच्छी कविताओं का एक अलग अन्दाज़ में प्रस्तुतिकरण


आपकी कविताएँ तो मैंने पहले भी पढ़ी थीं लेकिन मात्र पढ़ी थीं शायद महसूसा नहीं था लेकिन आपकी आवाज़ में इन्हें सुना वह भी गुप्प अँधेरे के आँचल तले रात के तीन बजे तो मैं आपकी खामोश आवाज़ में कहीं गुम हो गया था. इसकी सफलता के लिए अनंत कामनाएँ


its new, its different and its ultimate.


‎@गीत.. वाकई आपकी यह फिल्म लाज़वाब है.. इसे जो बात सबसे मत्वपूर्ण बनाती है वह है, इसकी editing... और camera की jerking और कवितायेँ भी मन को भिगोती हैं... जैसे-

'यह नीम का पौधा है..

इसकी हरी पत्तियों में वह कड़वाहट है
जो ज़बान को मीठे का महत्व समझाती है.. '


'दुख के लिए हमेशा तर्क तलाशना, एक ख़राब क़िस्म की कठोरता है', 'माथा चूमना किसी की आत्मा चूमने जैसा है', 'कुछ दरवाज़े हमेशा भीतर की तरफ़ खुलते हैं', 'मैं तुम्हारी देह ब्रेल लिपि में पढ़ता हूँ', 'शब्दकोश के भीतर सबसे ज़्यादा दुर्बल शब्द होते हैं, हज़ार पेज का शब्दकोश कभी एक वाक्य भी ख़ुद से नहीं बना पाता', 'जीवन की किताब टाइपिंग की ग़ल्तियों से भरी पड़ी है', 'कितना भी प्रेम कर लें, एक शंका उसके समांतर चलती रहती है', 'कहा था काँच हूँ पार देख लोगे तुम मेरे'…… कैसी रही होगी आपकी मन की यात्रा, इन कविताओं को अपने भीतर रचते हुए, काग़ज़ पर उतारते हुए???
म्युज़िक, चित्र, आपका रेंडिशन…………किसी तिलिस्म के घेरे में ले गया, आख़री पंक्ति के बाद, देर तक निस्तब्द्धता………फिर लगा शायद किसी देर तक चल रहे सपने से जागना हुआ। सपना जो की दिमाग़ पे तारी हो चुका……और दुबारा उसी स्वप्न के घोर में डूब जाने की इच्छा प्रबल है। “पर्णवृंत”, “उच्चारण” बहुत ही अच्छे लगे, और सारी कविताएं भी एक से बढ़कर एक हैं।
अनुराग जी को बधाई, सबद पे इस एक्सपेरिमेंटेशन के लिए। Excellent…………………..


wakai ap real kavi ho jinka srjan humesa molik hota h . badhai ho sir


सभी पसंदीदा कवितायेँ पढ़ी हुई थी ...सुन कर शायद उनके मायेने ही बदल गए ......सुन्दर ...


aapne kavita men kuch alag sa takniki prayog kiya hai , badhaee


आपकी आवाज में कवितायें सुनना प्रीतकरृ अनुभव है. शानदार कवितायें... शानदार अंदाज में पढ़ी हुई...


एक अजीबो ग़रीब प्रयास ..... एक अनोखा तजुर्बा ..... आपको सलाम.


behad adbhut aur sunder parstuti ... Kavita ko bolte chalte thahrte aur lafzon ko yun sans lete dekhne ka pahal anbhaw ... Jis ka asar lafzon mein bayan karna namumkin hai....
Sabad ko dheron Shubhkamnaye


सुन्दर कविताओं और प्रयोगधर्मिता का शानदार मिश्रण..


‘‘जीवन की किताब टाइपिंग की गलतियों से भरी पड़ी है’’ बहुत सुन्दर। अभिनव प्रयोग के लिये ढेरों बधाई एवं शुभकामनाएं। -दुर्गेश गुप्त ‘राज’


बेहद शानदार आपको बहुत-बहुत बधाइयां.. इस तहर के प्रयोग साहित्‍य की एक नई यात्रा का संकेत हैं.. सार्थक प्रयास.. "मन की कविता"..


kuch samay ke laga ke me ek alag hi duniya me pahuch gaya hu,aur mera meri aatma se baartalaap ho raha ho...bahut hi umda prayog


शानदार प्रयोग=सभी सिकंदर घर वापस आने से पहले मर जाते हैं |यह सिलसिला रुकना नहीं चाहिए |


यह सिलसिला रुकना नहीं चाहिए |


गीत सुबह- सुबह कविता फिल्म दिखा दी जिसमें अनेक किताबें पात्र हैं. अस्तित्व का प्रश्न, प्रेम और अमूर्त भाव चित्रों और आवाज के माध्यम से मुखर होते हैं. मौन स्मृतियों को जगाता है. प्रकृति, प्रेम और साहचर्य को अद्भुत बिम्बों से व्यक्त किया गया है. भीड़ से अलग रहने और उम्मीद और स्वप्न का पुल बनने की आकांक्षा के साथ साथ टूटन की पीड़ा भी नजर आती है. अंदर की ओर खुलने वाली ये कवितायेँ अनेक चित्र प्रस्तुत करती हैं. खुद को 'आदमकद इंतजार' और चंपा को प्रतीक्षारत दर्शाया गया है. गीत, आप अपनी कहानियों पर फ़िल्में बनवाइए न.


दुनिया की तमाम अलटम पलटम भीड़ के बीच मेरा अपना अलग तरीका है ..
कितनी ही पीडाएं हैं जिनकी कोई ध्वनि नहीं ..

दुःख के दिन तर्क तलाशना एक ख़राब किस्म की कठोरता है ...

सारे सिकंदर घर लौटने से पहले ही मर जाते हैं ..


फिल्मांकित प्रस्तुति ने गीत जी की कविताओं के स्पेस को जैसे वृहत बना दिया है - कविताओं में अभिव्यक्त छोटे से छोटे अनुभव को भी जैसे एक वृहत्तर परिपृष्ठ, एक वृहत्तर अनुभूति से जोड़ दिया है । इस नाते से मैंने इस फिल्म को गीत जी की कविताओं में अभिव्यक्त हुए अनुभव की अनथक व्याख्या और पड़ताल के उत्तेजक साक्ष्य के रूप में भी महसूस किया है |


मन गदगद हो गया कविता अब भी गुँज रही है


मैं कविता में हँसता हूँ तो उस व्यक्ति की तरह जो रोता आया है.....बहुत खूब...समझ नहीं आ रहा क्या क्या quote करूँ यहाँ.....सुन्दर!!!बेहद सुन्दर !!!!

शाम झांकती है बारिश से...बचे खुचे को भिगो जाती है....

माथा चूमना
किसी की आत्‍मा चूमने जैसा है
कौन देख पाता है
आत्‍मा के गालों को सुर्ख होते.
इसे quote करने से मैं भी न रह पायी <3

रवायत के मुताबिक़..कुछ दरवाज़े हमेशा भीतर की तरफ खुलते हैं....वाह!!

दो पहाडिय़ों को सिर्फ़ पुल ही नहीं जोड़ते, खाई भी जोड़ती है....
बेहद खूबसूरत!!! enjoyed thoroughly !!


माथा चूमना
किसी की आत्‍मा चूमने जैसा है
कौन देख पाता है
आत्‍मा के गालों को सुर्ख होते.
wahhhhhhhhhhhhhh bahoooooooooooot khooooooooob


man prem ras se bheeg jata hai.


माथा चूमना
किसी की आत्‍मा चूमने जैसा है
कौन देख पाता है
आत्‍मा के गालों को सुर्ख होते. kyaa baat hai.


बाकी सब भी मैं ही.... अति सुन्दर...


Abhivykti kee yeh ek nai takneek kee shuruaat..badhai ho ..


'' . . . कितनी ही पीड़ाएं हैं जिनके लिए कोई ध्वनि नहीं '',
बहुत खूब ! गीत भाई, प्रयोग अच्छा लगा.
- अक्षय आमेरिया


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