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शताब्दी स्मरण : भवानीप्रसाद मिश्र पर अनुपम मिश्र




[ कवि भवानीप्रसाद मिश्र का यह जन्म शताब्दी वर्ष है. सबद पर शताब्दी स्मरण श्रृंखला में भवानीप्रसाद मिश्र पर हिन्दी लेखक और पर्यावरणविद  अनुपम मिश्र  का यह आत्मीय स्मृतिरेख. अपने कवि पिता 
भवानीप्रसाद मिश्र  पर यह स्मृतिरेख अनुपम मिश्र ने पहलेपहल  महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की पत्रिका 'बहुवचन' के अंक ६ में  ''मन्ना : वे गीतफरोश भी थे'' शीर्षक से छपाया था. यहां हम उसका एक  हिस्सा साभार छाप रहे हैं. भवानीप्रसाद मिश्र की कविताओं का एक चयन भी सबद पर शीघ्र प्रकाश्य है. ]


स्नेह की उंगली 

कविकर्म  जैसे शब्दों से हम  घर में कभी कहीं टकराए नहीं। मन्ना कब कहाँ बैठकर कविता लिख लेंगे-- यह तय नहीं था। अक्सर अपने बिस्तर पर, किसी भी कुर्सी पर एक तख्ती के सहारे उन्होंने साधारण से साधारण चिट्ठों पर, पीठ कोरे (एक  तरफ छपे) कागज़ पर कवितायेँ लिखी थीं। उनके मित्र और कुछ रिश्तेदार उन्हें हर वर्ष नए साल पर सुन्दर, महंगी डायरी भी भेंट करते थे। पर प्रायः उनके दो-चार पन्ने भर कर वे उन्हें कहीं रख बैठते थे। बाद में उनमें कविताओं के बदले दूध का, सब्जी का हिसाब भी दर्ज हो जाता, कविता छूट जाती। भेंट मिले संग्रह उन्हें खाली नई डायरी से शायद ज्यादा खींचते थे। हमें थोड़ा अटपटा भी लगता था पर उनकी कई कविताएं दूसरों के कविता संग्रहों के पन्नों की खाली जगह पर मिलती थीं। पीठ कोरे पन्नों से मन्ना का मोह इतना था कि कभी बाज़ार से कागज़ खरीद कर घर में आया हो -- इसकी हमें याद नहीं। फिर यह हम सबने भी सीख लिया था। आज भी हमारे घर में कोरा कागज़ नहीं आता।


परिचित-अपरिचित, पाठक, श्रोता, रिश्तेदार --उनकी दुनिया बड़ी थी। इस  दुनिया से वे छोटे से पोस्टकार्ड से जुड़े रहते। पत्र आते ही उसका उत्तर दे देते। कार्ड पूरा होते ही उसे डाक के डिब्बे में डल जाना चाहिए। हम आसपास नहीं होते तो वे खुद उसे डालने चल देते। फोन घर में बहुत ही बाद में आया। शायद सन १९६८ में। इन्हीं  पोस्टकार्डों पर वे संपादकों को कविताएं तक भेज देते।

बचपन से लेकर बड़े होते तक हमने मन्ना को किसी से भी अंग्रेजी में बात करते नहीं देखा, सुना। जबलपुर में शायद किसी अंग्रेज प्रिंसिपल वाले तब के प्रसिद्द कॉलेज राबर्टसन से उन्होंने बी.ए. किया था। फिर आगे नहीं पढ़े। लेकिन  अंग्रेजी ख़ूब अच्छी थी। घर में अंग्रेजी साहित्य, अंग्रेजी कविताओं की पुस्तकें भी उनके छोटे-से संग्रह में मिल जाती थीं। पर अंग्रेजी का उपयोग हमें याद ही नहीं आता। बस एक बार सम्पूर्ण गांधी वांग्मय के मुख्य संपादक किसी प्रसंग में घर आए। वे दक्षिण के थे और हिन्दी बिलकुल नहीं आती थी उन्हें मन्ना उनसे काफी देर तक  अंग्रेजी में बात कर रहे थे-- हमारे लिए यह बिलकुल नया अनुभव था। दस्तखत, ख़त-किताबत सब कुछ बिना नारेबाज़ी के, आन्दोलन के-- उनका हिन्दी में ही था और हम सब पर इसका ख़ूब असर पड़ा। घर में, परिवार में प्रायः बुन्देलखंडी और बाहर हिन्दी-- हमें भी इसके अलावा कभी कुछ सूझा भी नहीं। हमने कभी कहीं भी हचक कर, उचक कर अंग्रेजी नहीं बोली, अंग्रेजी नहीं लिखी।


कोई भी पतन, गड्ढा इतना गहरा नहीं होता, जिसमें गिरे हुए को स्नेह की उंगली से उठाया न जा सके-- एक कविता में कुछ ऐसा ही मन्ना ने लिखा था। उन्हें क्रोध करते, कड़वी बात करते हमने सूना नहीं। हिन्दी साहित्य में मन्ना की कविता छोटी है कि बड़ी है, टिकेगी या पिटेगी, इसमें उन्हें बहुत फंसते हमने नहीं देखा। हाँ, अंतिम वर्षों में कुछ वक्तव्य वगैरह लोग मांगने लगे थे। तब मन्ना इन वक्तव्यों में कहीं-कहीं कुछ कटु भी हुए थे। एक बार मैं चाय देने उनके कमरे में गया तो सुना वे किसी से कह रहे थे, ''मूर्ती तो समाज में साहित्यकार की ही खडी होती है, आलोचक की नहीं! ''


हम उनके स्नेह की उंगली पकड़ कर पले-बढ़े थे। इसलिए ऐसे प्रसंग में हमें उन्हीं की सीख से खासी कड़वाहट दिखी थी। पर उन्हें एक दौर में गाँधी का कवि तक तो ठीक, बनिए का कवि भी कहा गया तो ऐसे अप्रिय प्रसंग उनके संग जुड़ ही गए एकाध। फिर उनकी एक कविता में उन्होंने लिखा है कि ''दूध किसी का धोबी नहीं है / किसी की भी ज़िन्दगी दूध की धोई नहीं है / आदमकद कोई नहीं है। '' कवि के नाते उनका कद क्या था -- यह तो उनके पाठक, आलोचक जानें। हम बच्चों के लिए तो वे एक ठीक आदमकद पिता थे। उनकी स्नेह भरी उंगली हमें आज भी गिरने से बचाती है।
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3 comments:

कवि पिता पर बेटे के भावुकतापूर्ण संस्मरण जिनमें वह बच्चों को भूलें करने पर स्नेह की अंगुली से उठा देते हैं.इसमें भवानी प्रसाद मिश्र के कोमल ह्रदय, निस्वार्थ स्वभाव और हिंदी प्रेम के बारे में पता चलता है.आलोचकों की संदेहास्पद भूमिका की ओर भी संकेत किया गया है.


moorti to samaj me sahitykar kee khadi hoti hai alochak kee nhi.. bahut prerak va sargarbhit baat hai ye.. hardik abhar


कोई भी पतन, गड्ढा इतना गहरा नहीं होता, जिसमें गिरे हुए को स्नेह की उंगली से उठाया न जा सके- adbhud
sabadh ka sukariya


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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