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कला का आलोक : ५ : प्रत्यक्षा



 द ट्यूरीन हॉर्स’ का एक दृश्य 
फिल्म हमारे समय का एक विलक्षण कला-माध्यम है. फ़िल्में देखते हुए हम उस आत्मिक-बौद्धिक अंतर्क्रिया का अनुभव कर सकते हैं जिसकी गुंजाइश अन्य कला-माध्यमों या पुस्तकों में होती है. हिन्दी की चर्चित कहानीकार प्रत्यक्षा के जर्नल्स से ऐसी ही अंतर्क्रियाओं का एक कलन इस स्तम्भ में दिया जा रहा है. ]


बेला तार की द ट्यूरीन हॉर्स में पहले दिन किसान और उसकी बेटी का गर्म भपाये आलूओं को छीलना और खाना इतना गर्म कि हाथ फूँकना पड़े और इतनी भूख कि बावज़ूद मुँह में ऐसे हबड़-तबड़ डाला जायेफिर निस्पृह खिड़की से बाहर देखना, जैसे इस भूख से वास्ता किसी और का था, कि उसके भीतर कोई और था जो भोगता-देखता था। 
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शोएब मंसूर की पाकिस्तानी फिल्म 'बोल' और बहमन घोबदी की 'टर्टल्स कैन फ्लाई' और 'अ टाईम फॉर ड्रंकेन हॉर्सेस'...तीन अलग फिल्में...तकलीफ और यंत्रणा का सर्रियल लैंडस्केप...आप भाग निकलना चाहते हैं फिर किसी अबूझ डोर से बँधे भी रहते हैं। इसके बरक्स कल देव साहब पर बात करते एक दोस्त ने कहा 'ही वाज़ द टिनटिन ऑफ आर हार्ट्स'...एक भोले समय की भोली मीठी याद...जैसे जीवन में एक से दूसरे और फिर पहले पर लौटने की यात्रा हो, सुख और दुख के बीच की निरंतर आवाजाही।
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'थ्री कलर्स : व्हाईट' का एक दृश्य 
किसलोव्स्की की त्रोआ क्लर : ब्लों (थ्री कलर्स व्हाईट)...मिकोलाई करोल को पैसे देता है उसे मारने के लिये। करोल पूछता है, पक्का? तुम यकीनन मरना चाहते हो? मिकोलाई हाँ कहता है। करोल गोली चलाता है, नज़दीक से छाती में। मेट्रो स्टेशन है, वीराना सुनसान। रात का सन्नाटा और नीली रौशनी में डूबा दृश्य। स्लो मोशन में मिकोलाई आगे गिरता है। करोल उसे थामता धीमे से बिठाता है। एक पल जाने कितने पीड़ादायक पलों के बाद, करोल का ढहता चेहरा और मिकोलाई का बेजान। फिर धीरे से मिकोलाई की आँखें खुलती हैं। करोल यंत्रणा में फुसफुसाता है, पहली गोली ब्लैंक थी, दूसरी नहीं है। क्या अब भी तुम मरने के इरादे में पक्के हो। मिकोलाई चुप देखते धीरे से फुसफुसाता है, शायद नहीं। करोल की आँखों की यंत्रणा, मिकोलाई के चेहरे का घना अवसाद, पार्श्व से बहती रौशनी की नील नदी। करोल उसके बगल में बैठता है, पूछता है क्यों? हम सब दर्द जानते हैं। मिकोलाई जवाब देता है, हाँ लेकिन मैं दर्द कम चाहता था।
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जुदाई नादेर का सिमिन से (द सेपरेशन )... अल्ज़ाईमर से पीड़ित पिता की देखभाल करता, ग्यारह साल की बच्ची के सामने खुद को मॉरली सही देख पाने के द्वंद और बीवी के अलग नज़रिये से जूझता, नादेर बहुत अपना लगता है। पिता को नहलाते, उनकी पीठ मलते अचानक हिलग कर उसका रोना, खुद की ही रुलाई है। घटनायें इतनी बीहड़ और विशृंखल हैं, उनका खुलना इतना अराजक है, उनके बीच पिता और बेटे और नादेर और तेर्मेह के बीच के कोमल तरल पल इतने सच, कि हम देख नहीं रहते, ठीक बीचोबीच उस तनाव को झेल रहे होते हैं। इतना सच है सब। असगर फरहदी कसे तार के तनाव में न्याय की अवधारणा का महीन जाल बुनते हैं। फिल्म देखना जैसे अपने क्रिया को निर्दोष तरीके से देखना का एक अवसर था।
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'लूऑमो के वेर्रा' की मार्टिना को देखते 'पाथेर पँचाली' की दुर्गा बेतरह याद आती रही। राय की यह  फिल्म कितनी मार्मिक और खूबसूरत है। दिरित्ती के लैंडस्केप बेहद सुन्दर, सिपिया रंगों वाले, उदास और धूमिल। विश्वयुद्ध के समय नात्सियों द्वारा लोगों का बड़ी संख्या में मारा जाना, औरतें, बूढ़े, बच्चे। लेकिन लूऑमो देखते मैं दर्शक बनी रही। दुर्गा के साथ उसके भीतर मैं थी। सत्यजित राय ने 'पाथेर पाँचाली' कितने कम पैसों में कितने पुराने तकनीक से बनाई थी। लेकिन अपने  रौ नेस में फिल्म कितनी खूबसूरत, महीन और इंटेंस है। 'अपराजितो' का बनारस वाला हिस्सा भी हौंट करता है, 
'जलसाघर' भी। उस लिहाज से 'अपूर संसार' नहीं। अँधेरे और उजाले का मार्मिक गीत है। फ्रेम के बाहर का गाढ़ा उदास तरल संसार।
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'सेक़ ज़तैम'...मैं तुमसे प्यार करता हूँ मिशेल फूगैं की आवाज़ सुबह के कोहरे में सफेद फूलों के गुच्छे लिये पास और पास आती है। टुकड़ों में जॉर्ज दिरित्ती की 'लूऔमो के वेर्रा' देखती हूँ। 'इल वेंतो' के बाद लूऔमो देखना। संगीत है सिर्फ संगीत, जबकि बाहर की दुनिया में सब रुखड़ा है। दिल भर आने की हद तक। कल दोस्त को रात में गले लगाया। उसके साथ बुरा हादसा हुआ है। वो मज़बूत है। पर मुझे गले लगाते उसका चेहरा काँप रहा था। मैंने उसके बाल सहलाते कहा, यू आर फैमिली। उसने मुझे छोड़ने के पहले कस कर भींच लिया। मेरे भीतर कुछ दरक गया था । भीतर कोई पंछी छटपटाता है, उड़ान का अर्थ कोई समझा दे?

'इल वेंतो' ...हवा चारों तरफ बहती है... अपने हिसाब वसूलती। बर्फीले लैंडस्केप में तरल ऊष्मा के भावलोक का संसार, कैमरा पैन करता, विस्तार से अंतरंग की यात्रा करता है, वादियों और पहाड़ी ढलानों में, घरों के अंतरों में, लोगों के दिलों में, चर्च के स्टीपल और छतों के सलेटी खपड़ों पर कोई मरता जाता है...कितना प्यार ज़रूरी है किसी को जिला देने के लिये?
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नूरी बिल्जे चेलान की फिल्म 'थ्री मंकीज़' का अंतिम दृश्य... ओवरकास्ट ग्रे आसमान
, बिजली तड़कने का अभास, मकान का ग्रे सिलुएट, छत पर खड़े आदमी की अँधेरी छाया, दूर बॉसफोरस में स्थिर कोई जहाज़ और कुछ देर बाद बगल से गुज़रती हुई रेल
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'नीना सिमोन : लाईव एट मॉंत्रो 1976'... नीना को सुनना अपनी आत्मा के रेशे के साथ होना होता है। उनको देखना आसमान में उड़ते एक गर्वीले पंछी को देखना होता है। उसके साथ खुद को भी स्वाभिमान से भर लेना होता है, स्वीट क्लियर प्राईड
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कार्तिये ब्रेसों की 'ल रीतू'...वापसी...होलोकॉस्ट पर कई फिल्में देखी है, बहुत किताबें पढ़ी हैं। इमरे कार्तेश की फेटलेस, सोफीज़ च्वायस, एस्केप फ्रॉम सॉबीबॉर, एक्सोडस, ओ जेरूसलम। कार्तिये ब्रेसों की डॉक्यूमेंटरी देखना इस सब को नई नज़र से एक बार फिर देखना था। इतनी अमानवीयता, इतनी क्रूरता। कैसा मास-हिप्नोटिज़्म? और क्यों सहते रहे लोग? कोई तर्क नहीं। इस पागलपन की क्रूरता का कोई तर्क नहीं। दिलदारियों का भी कहाँ होता है, तर्क?
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मंगलेश डबराल की कविता 'स्त्रियाँ' जो उन्होंने फेल्लिनी की फिल्मों के असर में लिखा था, आज उसपर हम बात करते रहे । फिर 'सात दिन का सफर'। और ये कि स्त्रियाँ क्यों इतना स्थूल है, उसमें फेल्लिनी का रस कहाँ है? कविता की एक पंक्ति है जिसका आशय है, स्त्री ने अपना स्तन इतनी देर तक दिखाया कि उसका रहस्य मिट गया। कविता में भी शब्दों का रहस्य मिट गया, जबकि 'सात दिन का सफर' एक पूरी दुनिया अपने भीतर समेटे है। फिल्मों पर बात करते हम हमेशा क्लिनिकल हो जाते हैं। सिनेमा जो कई स्तरों पर हमसे संवाद कायम करता है, औडियो, विज़ुअल, टेक्स्टुअल, हम उतने लेवेल्स पर जो ग्रहण करते हैं उसका रस लिखे में कायम क्यों नहीं कर पाते? जो दिखता है या दिखाया जाता उससे अनदिखा, अनकहा ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है। हमारी कल्पना को पूरी ज़मीन देता है। फेल्लिनी कितने अमूर्तन का रस बिखेरते हैं, जो हमारे भीतर किसी भाव सा अटका रहता है, उसे उसी अमूर्तन में पकड़ लेना, उसमें अपना 'मैं' खत्म करना यही है सिनेमा की मिठास।
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नदीन लबाकी की 'कैरामेल' की औरतें प्यार, संगत, खुशी तलाशती औरते हैं उनके रोज़मर्रा की ज़िंदगी में उनकी तकलीफ दिखती है, उनकी लड़ाई, और उनकी हँसी दिखती है। बेरूत की गलियाँ युद्ध ध्वस्त गलियाँ नहीं, बल्कि धूप नहाई, तरल लोक की सपनीली दुनिया है। कैमरा मोहब्बत से औरतों के खूबसूरत चेहरे को पैन करता है, उनके अंतरंग भावलोक को छूता, खोजता तलाशता दिखाता है उसी कोमलता नरमियत और दुलार से जैसे कि कोई आशिक। लायेल और रोज़ के चेहरे पर तरल उदासी का संसार हैलिली का विक्षिप्त संसार भी दिल तोड़ देने की कोमल चोटखाई दुनिया है। इन सब तकलीफों के बावज़ूद इन औरतों का एक-दूसरे की संगत की चहकती दुनिया, श्रृंगार के सेंसुअस विज़ुअल्स, बेरूत की संकरी तंग गलियाँ, घरों के भीतर का पारिवारिक सौहाद्र और ख़ालेद मुज़्ज़न्नर का संगीत...सब एक रिद्म एक ताल में बहता है
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राई कूडर ने क्यूबा के उन संगीतकारों को, जो फिदेल की क्यूबा में गुमनामी के गर्त में खो गये थे, रिसरेक्ट किया है फिल्म 'बूयेना विस्ता सोशल क्लब' में... कॉम्पे सेगुंडो, इब्राहिम फेरर, रूबेन गोंज़ालेज़, एलियाडे ओचोबा, ओमारा पोर्तुओन्दो... लिस्ट लम्बी है और उनका संगीत अचंभित कर देने वाला...कहते हैं हवाना में संगीत मनोरंजन नहीं है, ये जीने का तरीका है 

बूयेना विस्ता हवाना का वो प्रसिद्ध लोकप्रिय क्लब था जहाँ चालीस के दशक में दिग्गज संगीतकारों का जमघट लगता था। लगभग पचास वर्ष बाद क्लब बंद हुआ। विम वेंडर्स और राई कूडर ने उस गुज़रे ज़माने को इस फिल्म में उसी उल्लास से कैद किया है। पारंपरिक क्यूबन और लातिन अमरीकी संगीत का जादू हवाना की सड़कों और मकानों से होता घरों के भीतर से गुज़रता इन संगीतकारों की ज़बानी अपनी सहज कहानी कहता, संगीत की धूप खिली रंगत की खुशी से नहाता सराबोर करता है।

अच्छे संगीत और बच्चे सी सहजता और भोलेपन वाली खुशी के साथ इन संगीतकारों को गाते बजाते देखना चाहे वो अम्स्टरडम हो या न्यूयॉर्क, हर बार ऐसा ही लगता है जैसे अपने मुहल्ले के आत्मीय संसार में अपने में लीन वो संगीत रच रहे हैं और इस सिलसिले में अगर कुछ लोग वहाँ जुट कर आपके संगीत को सराह दें, बस इससे ज़्यादा और खुशी क्या चाहिये?
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कुछ सिलसिलों में इधर चीन पर बहुत कुछ सामग्री पढ़ने देखने में गुज़री। यांगत्से नदी पर एक डॉक्यूमेंटरी, फिर चिया चाँगखे  की 'स्टिल लाईफ'। 'थ्री गॉर्जेस डैम' पर बहुत सारे आलेख। नदी की कहानी, शहरों की कहानी, बाढ़ से विस्थापित लोगों की कहानी, चीनी सभ्यता की कहानी, उनका खानपान, इतिहास, संगीत...बहुत कुछ। उतना सब जो चीन घूम आने के बावज़ूद नहीं दिखा था, नहीं देखा था। 

'स्टिल लाईफ' का एक दृश्य 
'स्टिल लाईफ' और 'यांग्त्से' में जो दुनिया है वो हमारी दुनिया है, उतनी ही कंगाली और भुखमरी की दुनिया जबकि यूरोपियन सिनेमा में गरीबी भी हमारी नज़र में एक रूमानी गरीबी है जैसे 'ज़्यां द फ्लोरेत' में जेरर्द देपारदियू वाईन पीते दुखी होता है कि इस मौसम अगर बरसात न हुई तो वो तबाह हो जायेगा। उसके कपड़े, जूते, हैट तक सलामत साबुत होते हैं, उनकी गरीबी में भी एक किस्म की डिगनिटी होती है। हनी अबु असद की 'पैराडाईज़ नाउ' में भी सईद का घर, जिसे वो कहते हैं कि यहाँ रहने से मर जाना बेहतर हैभी हमारे यहाँ किसी मध्यमवर्गीय रहन सहन जैसा ही  दिखता है। मजीदी की 'सॉंग ऑफ स्परोज़' में भी ऐसी बदहाल गरीबी का आलम नहीं होता या फिर बरान में भी अथाह गरीबी के आलम में भी बरान के पैरों में जूते होते हैं। जबकि हमारे यहाँ गरीबी माने शरीर को सही तरीके से ढकने को कपड़ों का न होना, दो जून भोजन का न होना, मौसम की मार बचाने को सलामत घर का न होना।

अलग सभ्यताओं में गरीबी की परिभाषा भी अलग होती है ये समझना मुश्किल नहींफिर भी किसी भोलेपन में इस फर्क को देख लेना हैरान करता है। ऐसी और कितनी फिल्में होंगी जो जाने कितनी अलग दुनिया के वितान बुन रही होंगी। चिया चाँगखे की फिल्म अपने दिखने के बाद छाती में उस संगीत की तरह धँस जाती है जो आपकी ज़ुबान पर अटका रहता है, आप चाहे उसे लाख भूलें, कोई धुन आपके भीतर बजती है। हो सकता चीन पढ़ते-पढ़ते उसकी दुनिया भीतर फैल गई हो, पिछले दिनों किसी तिब्बती मार्केट में सुना संगीत भी कहीं अपना लगा था, हो सकता है किताबें और सिनेमा आपके साथ यही खेल करती हों कि जो दुनिया अपनी न हो वही खूब-खूब अपनी लगे, कि कोई बू सान या ली फेन किसी दिलीप हेम्बरम या राफेल तिग्गा जैसा अपना लगे, कि कोई चॉंगचिंग की गली में चाईबासा का रास्ता दिख जाये और यांग्त्से देखते ऋषिकेश के भी ऊपर चढ़ते गँगा की विशाल धारा की याद आये और यांगत्से में चलते नावों को देखते 'कोथाय पाबो तारे' के मुर्शेद गाज़ी की याद आ जाये। सिनेमा लगभग एक कविता की तरह चलती है, उम्मीद और निराशा के बीच सहज मानवीय उष्मा का जनमना और लाख मुसीबतों के बावज़ूद ज़िंदगी किसी भरोसे के बल पर गरिमा से जी लेना।  
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4 comments:
आशुतोष दुबे

बहुत अच्छा लगा. शुक्रिया.


बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!


बहुत अच्छा कर रहे हैं. बधाई.


बहुत सुन्दर... पढ़के अच्छा लगा...


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संपादन : अनुराग वत्स.

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