सबद
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तुम्हारे बालों की सबसे उलझी लट हूं / जितना खिंचूंगा उतना दुखूंगा



[ हालांकि अपने पहले संग्रह 'आलाप में गिरह' की कविताओं में भी, लेकिन उसके बाद की अनेक कविताओं में गीत चतुर्वेदी ने प्रेम को बतौर थीम बरतने के साथ-साथ उसके भीतर ऐसी जिरहें और जगहें तलाश की हैं, जिनका हिंदी में निर्वाह मुख्यतः कथा-रूपों में हुआ है. यों भी हमारा 'सेंटीमेंटल एजुकेशन' प्रेम को सात्विक, समर्पण का पर्याय और किसी भी किस्म की जिरह के बाहर रखने की सीख देता रहा है और ज़्यादातर कवि ऐसी शिक्षा के कायल भी रहे हैं. इसीलिए उनकी कविताओं में 'बिट्रेयल' को हीनतर अनुषंग या बहुत हुआ तो एक करुण-प्रसंग के तौर पर याद किया गया है. 'प्रेम की राजनीति' ( प्रेम और राजनीति !!!) जैसे विषय-संबंध कवियों ने समाज-वैज्ञानिकों के लिए रख छोड़े हैं. गीत ने कविता में ख़ुश्‍की की बहुत परवाह किए बगैर इन प्रोज़ेक विषय-संबंधों को कविता की मुख्य-भूमि पर खड़ा कर दिया है. और देखिए ऐसा करते हुए वे कितना सजग, भिन्न और अभिनव हो चले हैं. जैसे जीवन, वैसे ही प्रेम और उसके मायने भी बदले हैं. आनंदघन का बतलाया गया 'सनेह-मारग' अब कहीं नहीं है. गीत की कविताएं इस 'पहली-सी मुहब्बत' के न होने का मर्सिया भी है. ]


  • गीत चतुर्वेदी

    सात नई कविताएं



मंथरता से थकान

मेरी त्वचा की पार्थिव दरारें तुम्हारी अनुपस्थिति का रेखांकन हैं
प्रेम तुम्हारी नीति थी मुझ पर राज करना तुम्हारी इच्छा
मैं तुम्हारी राजनीति से मारा गया

मेरे हृदय में हर पल मृत्यु का स्पंदन है
बांह के पास एक नस उसी लय पर फड़कती है जिस पर दिल धड़कता है

इतने बरसों में इतने शहरों में इतने मकानों में इतनी तरहों से रहता आया मैं
कि कई बार सुबह उठने पर यह अंदाज़ा नहीं होता कि
बाईं ओर को बाथरूम पड़ता है या बाल्कनी

इस महासागर में जितनी भी बूंदें हैं वे मेरे जिए हुए पल हैं
जितनी बूंदें छिपी हैं अनंत के मेघ और अमेघ में
दिखने पर वे भी ठीक ऐसी ही दिखती हैं

मैं बलता रहा दीप की बाती की तरह
जिसमें डूबा था वह तैल मुझे छलता रहा
भरी दोपहर बीच सड़क जलाया तुमने मुझे
मुझे कमतर जताने की तुम्हारी इस विनम्रता को चूमता हूं मैं

तुम आओ और मेरे पैरों में पहिया बन जाओ
इस मंथरता से थक चुका हूं मैं
थकने के लिए अब मुझे गति चाहिए

*

सारे सिकंदर घर लौटने से पहले ही मर जाते हैं

सारे सिकंदर घर लौटने से पहले ही मर जाते हैं
दुनिया का एक हिस्सा हमेशा अनजीता छूट जाता है
चाहे कितने भी होश में हों, मन का एक हिस्सा अनचित्ता रहता है
कितना भी प्रेम कर लें, एक शंका उसके समांतर चलती रहती है
जाते हुए का रिटर्न टिकट देख लेने के बाद भी मन में हूक मचती है कम से कम एक बार तो ज़रूर ही
कि जाने के बाद लौट के आने का पल आएगा भी या नहीं

मैंने ट्रेनों से कभी नहीं पूछा कि तुम अपने सारे मुसाफि़रों को जानती हो क्या
पेड़ों से यह नहीं जाना कि वे सारी पत्तियों को उनके फ़र्स्‍ट-नेम से पुकारते हैं क्या
मैं जीवन में आए हर एक को ज्ञानना चाहता था
मैं हवा में पंछियों के परचिह्न खोजता
अपने पदचिह्नों को अपने से आगे चलता देखता

तुममें डूबूंगा तो पानी से गीला होऊंगा ना डूबूंगा तो बारिश से गीला होऊंगा
तुम एक गीले बहाने से अधिक कुछ नहीं
मैं आसमान जितना प्रेम करता था तुमसे तुम चुटकी-भर
तुम्हारी चुटकी में पूरा आसमान समा जाता

दुनिया दो थी तुम्हारे वक्षों जैसी दुनिया तीन भी थी तुम्हारी आंखों जैसी दुनिया अनगिनत थी तुम्हारे ख़्यालों जैसी
मैं अकेला था तुम्हारे आंसू के स्वाद जैसा मैं अकेला था तुम्हारे माथे पर तिल जैसा मैं अकेला ही था
दुनिया भले अनगिनत थी जिसमें जिया मैं
हर वह चीज़ नदी थी मेरे लिए जिसमें तुम्हारे होने का नाद था 
फिर भी स्वप्न की घोड़ी मुझसे कभी सधी नहीं

तुम जो सुख देती हो, उनसे जिंदा रहता हूं
तुम जो दुख देती हो, उनसे कविता करता हूं
इतना जिया जीवन, कविता कितनी कम कर पाया

*

परिभाषा

पेड़ एक निर्वाक प्रतीक्षालय है
मौन एक नाद है जिसके पीछे अनहद नदी बहती है

तुम्हारे कंठ का स्वर गांडीव से निकला वत्सदंत है
जो मृत्यु नहीं देता, जीवन के पार भी भटकन ही देता है
गोया जीवन कम है मेरे लिए जीवन की भटकन भी कम है

बाल दोमुंहे थे बातें भी दोमुंही
क्या देव क्या दानव मेरे इतिहास में एक मुंह से किसी का काम ही न चल पाया
सारे देव प्रेम करते थे प्रेम का एक भी देव नहीं
वासना का देव था जो अपनी देह ही न संभाल पाया
अगर मैं हवा से तुम्हारी देह बनाकर तुम्हें चूमता हूं बेतहाशा
तो यह मेरी परंपरा का सर्वश्रेष्ठ पालन है

मिथिहास एक अन्यमनस्क परिहास है
हर परिभाषा फिर भी एक नई आशा है

अल्प विराम अर्ध विराम और तमाम विराम चिह्न जोड़ लिए
सुंदर वाक्य शब्दों से बनता है संकेतों से नहीं
मेरी गठरी में बहुत सितारे हैं
लेकिन आसमान की मिल्कियत परिंदों को कभी मिली नहीं

मुझे मत दोषो शब्द बनकर तुम्हें ही आना था
मेरी गठरी को खोल आसमान बन तन जाना था

मन पर कौमार्य की कोई झिल्ली नहीं होती
मन भी देव है एक से ज़्यादा मुंह वाला

हद है प्रेम हमेशा मुसीबत की तरह आया
कोई मुसीबत कभी प्रेम की तरह नहीं आई
किसी ने कहा यह गूंगे का गुड़ है
दरअसल यह मुहावरा ही अभिव्यक्ति के खि़लाफ़ सबसे गहरी साजि़श है

हाथ की रेखाओं पर कभी रेल चला दी
तो तय है सब आपस में टकराकर नष्ट हो जाएंगी
ऐसा सर्वनाश जंक्शन किसी नक़्शे में भी नहीं मिलेगा

अंत के अनेक विकल्प हैं

*



देखी तेरी कासी

हमारे भीतर का अंधेरा हमारी कंखौरियों तले छुपा होता है
किसी-किसी रात हम जुगनू भी नहीं होते
हवा की परछाईं कांपती है मेरे रोमों पर
मन के मैदान पर बेतरतीब उगी घास छंटने को अनमनी है

पृथ्वी ने थाम रखा है चंचल शेष को
शेष मेरे बीते समय का अवशेष है

मुस्कान क्या है धीरे-धीरे फैलती एक सीमित दूरी के सिवाय
चुंबन धीरे-धीरे गोल होती एक दूरी है

भीतर जो शोर उठता है
वह तुम्हारे न होने का डाकिया है अपनी साइकिल टिनटिनाता
मेघों को जल से भरने का दायित्व मुझ पर है
स्वीकार है मुझे अब सहर्ष सगर्व

कोई तुमसे इतना प्रेम करेगा
कि प्रेम कर-करके तुम्हारा नुक़सान कर देगा
तुम कुछ कह भी नहीं पाओगे
हर आघात के बाद वह पूछेगा
तुम प्रेम में भी नफ़ा-नुक़सान देखते हो

एक दिन तुम वह बादल बन जाओगे जो ज़रा-से आघात से रो देता है

एक मौन पेड़ मुझे देखता रहता है
चाहे कितना भी दूर क्यों न चला जाऊं
इतिहास गवाह है
ज़ालिमों को अत्यंत समर्पित प्रेमिकाएं मिलती हैं

जा रे ज़माना
देखी तेरी कासी
जहां मालिक भी खलासी

*


निविद

हमने साथ चलना शुरू किया था
हमने साथ रहना शुरू किया था
धीरे-धीरे मैं अलग होता चला गया
एक कमरा मैंने ऐसा बना लिया है
जहां अब किसी का भी प्रवेश निषिद्ध है
जो भी इसे पढ़े, कृपया इसे आरोप नमाने
यह महज़ एक आत्म-स्वीकृति है

उससे दूर रहो जिसमें हीनभावना होती है
तुम उसकी हीनता को दूर नहीं कर पाओगे
ख़ुद को श्रेष्ठ बताने के चक्कर में वह रोज़ तुम्हारी हत्या करेगा

मैं समंदर के भीतर से जन्मा हूं
लेकिन मुझे सी-फूड वाले शो-केस में मत रखना
बुरादे में बदले दूध की तरह रहूंगा तुम्हारी आलमारी में
जब जी चाहे घोलकर पी जाना

द्रव में बदला हुआ प्रकाश हूं
तुम्हारी नाभि मेरे होने के द्रव से भरी है
मैं सूखकर कस्तूरी बन गया

सांस की धुन पर गाती है मेरी आत्मा
मेरा हृदय घड़ी है स्पंदन तुम्हारे प्रेम की टिक-टॉक
तुम्हारे बालों की सबसे उलझी लट हूं
जितना खिंचूंगा उतना दुखूंगा

इस देश के भीतर वह देश हूं मैं जो हज़ारों साल पहले खो गया
इस देह के भीतर वह देह हूं मैं जो हर अस्थि-कास्थि को खा गया

तुम जागती हो निविद जागता है
तुम दोनों के साथ सारे देव जागते हैं

रात-भर चूमता रहता तुम्हारी पलकों को नींद के होंठों से
रात-भर तुम्हारी हथेली पर रेखता रहा
सिलवटों से भरा है तुम्हारी आंख का पानी
फेंके हुए सारे कंकड़ अब वापस लेता हूं

*


पंचतत्व

मेरी देह से मिट्टी निकाल लो और बंजरों में छिड़क दो
मेरी देह से जल निकाल लो और रेगिस्तान में नहरें बहाओ
मेरी देह से निकाल लो आसमान और बेघरों की छत बनाओ
मेरी देह से निकाल लो हवा और यहूदी कैम्पों की वायु शुद्ध कराओ
मेरी देह से आग निकाल लो, तुम्हारा दिल बहुत ठंडा है




(पर) लोक-कथा

एक समय की बात है। एक बीज था। उसके पास एक धरती थी। दोनों प्रेम करते थे। बीज, धरती की गोद में लोटपोट होता, हमेशा वहीं बने रहना चाहता। धरती उसे बांहों में बांधकर रखती थी और बार-बार उससे उग जाने को कहती। बीज अनमना था। धरती आवेग में थी। एक दिन बरसात हो गई और बीज अपने उगने को स्थगित नहीं कर पाया। अनमना उगा और एक दिन उगने में रम गया। अन्यमनस्कता भी रमणीय होती है। ख़ूब उगा और बहुत ऊंचा पहुंच गया। धरती उगती नहीं, फैलती है। पेड़ कितना भी फैल जाए, उसकी उगन उसकी पहचान होती है।

दोनों बहुत दूर हो गए। कहने को तो जड़ें धरती में रहीं, लेकिन जड़ को किसने पेड़ माना है आज तक? पेड़ तो वह है जो धरती से दूर हुआ। उससे चिपका रहता, तो घास होता।

पेड़ वापस एक बीज बनना चाहता है। धरती अपना आशीष वापस लेना चाहती है। पेड़ को दुख है कि अब वह वापस कभी वही एक बीज नहीं बन पाएगा। हां, हज़ारों बीजों में बदल जाएगा। धरती ठीक उसी बीज का स्पर्श कभी नहीं पा सकेगी। पेड़ उसके लिए महज़ एक परछाईं होगा।

जीवन में हर चीज़ का विलोम नहीं होता। रात एक अंधेरा दिन नहीं होतीऔर दिन एक उजली रात नहीं होता। चांद एक ठंडा सूरज नहीं, और सूरज एक गरम चांद नहीं है। धरती और आसमान कहीं नहीं मिलते, कहीं भी नहीं।

मैं पेड़ के बहुत क़रीब जाता हूं और उससे कहता हूं, सुनो, तुम अब भी एक बीज हो। वही वाला बीज। क़द के मद में मत आना। तुम अभी भी उगे नहीं हो। तुम सिर्फ़ धरती की कल्पना हो।

सारे पेड़ कल्पना में उगते हैं। स्मृति में वे हमेशा बीज होते हैं।

* * * *


(तस्‍वीरें युवा जर्मन फ़ोटोग्राफ़र नताली बोटर के कैमरे से. कवि की तस्‍वीर- भावना पंत.)

91 comments:

मुझे कमतर जताने की तुम्हारी इस विनम्रता को चूमता हूं मैं

तुम आओ और मेरे पैरों में पहिया बन जाओ
इस मंथरता से थक चुका हूं मैं
थकने के लिए अब मुझे गति चाहिए....

बेहद उम्दा...बहुत खूब लिखा है...


सारे सिकंदर घर लौटने से पहले ही मर जाते हैं
दुनिया का एक हिस्सा हमेशा अनजीता छूट जाता है
चाहे कितने भी होश में हों, मन का एक हिस्सा अनचित्ता रहता है
कितना भी प्रेम कर लें, एक शंका उसके समांतर चलती रहती है
जाते हुए का रिटर्न टिकट देख लेने के बाद भी मन में हूक मचती है कम से कम एक बार तो ज़रूर ही
कि जाने के बाद लौट के आने का पल आएगा भी या नहीं
*****

हमने साथ चलना शुरू किया था
हमने साथ रहना शुरू किया था
धीरे-धीरे मैं अलग होता चला गया
एक कमरा मैंने ऐसा बना लिया है
जहां अब किसी का भी प्रवेश निषिद्ध है
जो भी इसे पढ़े, कृपया इसे आरोप न माने
यह महज़ एक आत्म-स्वीकृति है

उससे दूर रहो जिसमें हीनभावना होती है
तुम उसकी हीनता को दूर नहीं कर पाओगे
ख़ुद को श्रेष्ठ बताने के चक्कर में वह रोज़ तुम्हारी हत्या करेगा...

बहुत ही गहन अनुभूतियां और अभिव्यक्तियां है, मन और समय के खुरदुरेपन को अतल गहराई तक कुरेदती हुयी। साझा करने के लिए आभार अनुराग भाई!


हाथ की रेखाओं पर कभी रेल चला दी
तो तय है सब आपस में टकराकर नष्ट हो जाएंगी
ऐसा सर्वनाश जंक्शन किसी नक़्शे में भी नहीं मिलेगा

अंत के अनेक विकल्प हैं...गीत जी की कवितायें पढ़ने के बाद किसी रेगिस्तान में खो जाने का मन होता है जहाँ कोई व्यवधान न हो और बस सोचते रहो रहो..


गीत चतुर्वेदी ने तो गजबै ढा रक्खा है ! :-)
ये बर्फ के पहाड़ों पर खड़े होकर आग लगाने पे उतारू हैं . मैं अपने स्थान पर खड़े हो कर गीत चतुर्वेदी के लिए ज़ोरदार तालियाँ बजा रही हूँ.


गीत की इन कविताओं में प्रेम अनेक भेष बदल कर आया है.इतने प्रयोग और नए बिम्ब शायद ही कहीं एक साथ देखने को मिलें तुम आओ और मेरे पैरों में पहिया बन जाओ.बाल दोमुंहे थे बातें भी दोमुंही.तुम्हारे बालों की सबसे उलझी लट हूं
जितना खिंचूंगा उतना दुखूंगा.और तुम जागती हो निविद जागता है तुम दोनों के साथ सारे देव जागते हैं.
पहली कविता में शहर और उसकी भटकन में प्रेम सुकून देता है.परिभाषा में नए मुहावरे गढ़े गए हैं.इसमें मन और देह की कसमकस भी नजर आती है. देखी तेरी कासी पढ़कर गुरुदत्त देखी ज़माने की यारी कहता याद आता है .दुखों की इंतिहा पर मन का लगभग विरक्त हो जाने वाला भाव.निविड़ बाह्य और अंतर्जगत की बेचैनी को व्यक्त करने वाली कविता है.पंचतत्व में शरीर के पांचों तत्व और भी उज्जवल स्वरुप में लौटाने का आग्रह है. पर लोक कथा बीज और पेड़ के माध्यम से प्रेम के दूर होने पर भी जड़ों की ओर लौटने की इच्छा दर्शाती है.


मेरी त्वचा की पार्थिव दरारें तुम्हारी अनुपस्थिति का रेखांकन हैं प्रेम तुम्हारी नीति थी मुझ पर राज करना तुम्हारी इच्छा मैं तुम्हारी राजनीति से मारा गया

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सारे सिकंदर घर लौटने से पहले ही मर जाते हैं दुनिया का एक हिस्सा हमेशा अनजीता छूट जाता है चाहे कितने भी होश में हों, मन का एक हिस्सा अनचित्ता रहता है कितना भी प्रेम कर लें, एक शंका उसके समांतर चलती रहती है

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मेरी गठरी में बहुत सितारे हैं लेकिन आसमान की मिल्कियत परिंदों को कभी मिली नहीं
.....

मुस्कान क्या है धीरे-धीरे फैलती एक सीमित दूरी के सिवाय चुंबन धीरे-धीरे गोल होती एक दूरी है
....

how many times should one write 'waah-waah'?

each and every line is miraculous.

GC, you are not only a poet, but a magician.

minute observations, silky language, ironical and reverse expressions, pains of love and affection towards mother nature... combine them all and it will shape into a GC poem.

salute. every time you just amaze me. i can not resist to express my regards. GC, you are the best!!!!


कौन सबों को जीत सका है..


बहुत उम्दा कविताएं... गीत भाई के अपने ही inimitable स्टाइल में।

खासतौर पर 'निविद' वैसे गहरी होती जाती है जैसे कोई तट से समंदर के बीचों-बीच चलता जा रहा हो।


"उससे दूर रहो जिसमें हीनभावना होती है
तुम उसकी हीनता को दूर नहीं कर पाओगे
ख़ुद को श्रेष्ठ बताने के चक्कर में वह रोज़ तुम्हारी हत्या करेगा"

कितना दु:खद है कि ये सबसे समीप के संबंधों में सबसे अधिक होता है।


मेरी त्वचा की पार्थिव दरारें तुम्हारी अनुपस्थिति का रेखांकनहैं
प्रेम तुम्हारी नीति थी मुझ पर राज करना तुम्हारी इच्छा
मैं तुम्हारी राजनीति से मारा गया

... लगा कि अभी अभी एक कविता के जिस्‍म में समाते चले गया.. देहांतरण होना आदमी के कविता होने जैसे ही है. गीत भैया, आप जादुई आदमी हैं और कविता का तिलस्‍म रचते हैं.


bahut dino baad achanak is link par pahucha aur aapki 07 kavitayen padhi, yakin maaniye andar tak hil ,kalpanayon ka ye vistar akalpniya hai,,,,,umdaa...


गीत की कविताएँ पीले पत्ते में उभरती हरी नसें हैं ..यहाँ ठहर कर हमेशा अच्छा लगता है।
बहुत बढ़िया ..


हमने साथ चलना शुरू किया था
हमने साथ रहना शुरू किया था...



सारे सिकंदर घर लौटने से पहले ही मर जाते हैं दुनिया का एक हिस्सा हमेशा अनजीता छूट जाता है चाहे कितने भी होश में हों, मन का एक हिस्सा अनचित्ता रहता है कितना भी प्रेम कर लें, एक शंका उसके समांतर चलती रहती है.......


उससे दूर रहो जिसमें हीनभावना होती है
तुम उसकी हीनता को दूर नहीं कर पाओगे
ख़ुद को श्रेष्ठ बताने के चक्कर में वह रोज़ तुम्हारी हत्या करेगा"..............





सभी रचनाएँ एक से बढकर एक हैं ....
धन्यवाद ...आप भी पधारो स्वागत है....
http://pankajkrsah.blogspot.com



सभी रचनाएँ एक से बढकर एक हैं ...


अब मैं क्या लिखु कुछ शबद बटोर लू आती हे जलदी-'


देह की आग से तुम अपने ठन्डे दिल को .....भावनाओं की.प्रेम की गरमी से परिपूरित कर लो!!


पंचतत्‍व
बड़ी कविता .


सुन्दर! अति सुन्दर


जा रे ज़माना
देखी तेरी कासी
जहां मालिक भी खलासी..
...बहुत खूब ।


अभिव्यक्ति इतनी तरल हो सकती है ....कि कब वो मन के किस रेशे से यूँ लिपट जाये ...सुन्दर प्रतिमान और नए आयाम खोलती व्यंजनाये .


"paribhasha" panchtatv" aur "sare sikandar ghar lautane se pahale hi mar jate hai" ne khastaur par prabhavit kiya. GEET ji k range vishal hai.


सारे पेड़ स्‍मृति में उगते हैं.


बहुत अच्चा कहते हो अंदाज बेमिशाल है


जीवन में हर चीज़ का विलोम नहीं होता. रात एक अंधेरा दिन नहीं होती, और दिन एक उजली रात नहीं होता. चांद एक ठंडा सूरज नहीं, और सूरज एक गरम चांद नहीं है. धरती और आसमान कहीं नहीं मिलते, कहीं भी नहीं. kamaal hai ...!!!


Mindblowing...!!! I am Just Speechless


बीज से वृक्ष, वृक्ष से शाखा-प्रशाखाएं अनेकता का रूपक है। वृक्ष एक इकाई है, किंतु वह अनेक अनेकताओं का धारक भी है।

वृक्ष बीज की संभावनाओं का विस्‍तार और बीज की उपस्थिति का विलोपन, दोनों है।

बीजत्‍व में लौटना 'वस्‍तुत:' संभव नहीं, किंतु यदि बीजत्‍व ही सत्‍व है, तत्‍व है, अस्तित्‍व, अवयव है, तो लौटने की आवश्‍यकता भी न होगी, आकांक्षा भी न होगी।

स्‍मृति एक अमरबेल है, समय मरण की व्‍याप्‍ित।

सारे पेड़ यादों में उगते हैं, लेकिन यादों के सब जुगनू जंगल में रहते हैं...


अदभुत है गीत.............


जिस ऊँचाई पे पेड़ पहुंचा था, वहां सिरफिरी हवा का मुकाबला करने की ताक़त उसमें न रही थी.. वो जितना ऊपर उठता जाता था, जितना ही धरती से दूर होता जाता, उतना ही कमज़ोर होता जाता था...उसे मालूम था कि कद के मद में आकर वो ज्यादा देर टिक नहीं सकता है. इसलिए वो वापस बीज बन जाना चाहता था.. धरती की गोद में मुंह छिपा लेना चाहता था..फिर से पनाह चाहता था.. अपनी महत्त्वकांक्षा के कारन उसे मृत्यु का वरण करना पड़ता... लेकिन सद अफ़सोस! वो सैंकड़ों बीज बनकर बिखर तो सकता था, अपनी जड़ों को धरती के भीतर और दूर तक फैला सकता था..लेकिन वापस अपनी जड़ों की ओर लौट नहीं सकता था....


bahut khoobsurat... bilkul Niraala... be-misaal...


प्रशंसनीय !


बहुत सुंदर .. कहने को ब्द नहीं हैं


Dharti aur aasman kahin nahi milte..kahin nhi..awesome..jst lv dis 1


Ati sundar, Lajawab, Behtarin, Ummda, kya kehne


inspaireration line;tum ab bhi ek bij ho,vahi wala beej,kad k mad me mat aana.awasome


वाह गीत जी वाह !...आपकी जिस पंक्ति ने मुझे भीतर तक छुआ है वह यह कि जीवन में
कई चीज़ों का विलोम नहीं होता !....कमाल ! मेरी बधाई !


Yahi to puchti hoon bar bar......ki door dikhta wo kshitij....... aabhasi hai na.......


बहुत खूब लिखा है गीत जी. पेड़ कितना भी बड़ा और विशाल क्यों न हो जाये, उसे अपनी विशालता का गुमान नहीं होना चाहिए. वह धरती की मानिंद उर्वरक कभी नहीं हो सकता...उसे तो हज़ारों बीज में ही तब्दील होना है अंततः...सारे पेड़ स्मृतियों में ही उगते हैं...


lokmut deep unk main aapki kavitayeen parheen.


Behad khoobsoorat...bahut...!!koi saani nahi...!!

एक दिन बरसात हो गई और बीज अपने उगने को स्‍थगित नहीं कर पाया. अनमना उगा और एक दिन उगने में रम गया. अन्‍यमनस्‍कता भी रमणीय होती है....Kya kahun...ye wo prose hai..jise poetry kahten hain...!!Intihaa khoobsoorat..

behad khoobsoorat..mere paas isko padh ke jo ghat raha hai usko abhivyakt karne ke liye shbad nahi hain..!gale laga ke dhanyvaad..share karne ka.


प्रेम की बेहतरीन अभिव्यक्ति, जिसे आपने वह रूप दिया है कि मिलन और विरह दोनों ही अपनी खूबसूरती से व्यक्त हो रहे हैं. धरती ने अपने प्रेम को व्यक्त किया और कहा कि प्रेम की पहचान ही यही है कि 'वह' अपने स्तर से कदम दर कदम उठता जाये और पेड़ ने उसके सच्चे प्रेम को दुनिया के सामने प्रस्तुत कर खुद को एक मिसाल बना दिया. अब फिर भी दुनिया प्रेम को ना समझे तो क्या किया जा सकता है.

इस पर लिखने को और भी बहुत कुछ है, अभिव्यक्ति के अनेक पहलू दिखाई दे रहे हैं, और भी मन महसूस कर राह है मगर ...........


Beautifull expression sir !!


कोई भी बीज हो | कहीं से भी आया हो | कितनी भी यात्रायें कर ले | कितना बड़ा , विशाल कद हो जाये उसका | लेकिन उसके भीतर इक़ बैचेनी , बेताबी , बेकरारी , इक़ अनबुझी प्यास बनी ही रहती है | वो वापस वहीं चले जाना, चाहता है जहाँ से उसका जन्म हुआ था | जहाँ वो टूट कर फिर नया हो गया था | जितने भी बड़े बरगद दिखते है ना | कभी कान लगाकर सुनना इक़ सिसकी हमेशा सुनाई देती है | वापस बीज बन जाने की आस दिखाई देती है | जीवन में जिसने जितनी यात्राये की जितना प्रेम किया वो दरअसल खुद की ही खोज थी | जैसे आसमानों में , बादलों में कोई किरण भटकती है | जैसे धरती के अन्दर बीज भटकता है | समय के भीतर कोई लम्हा ..............| जैसे कोई दीवाना किसी गली में अपनी मोहब्बत खोजता है | गली से फिर गाँव फिर नगर और फिर महानगर तक उसकी खोज जारी रहती है | वो जिस्मों में भटकता है और भटक -भटक कर अपनी सच्ची मोहब्बत खोजता रहता है | पर सफ़र खतम नहीं होता ना खोज | फिर वो रूह में भटकना शुरू कर देता है | कभी किसी की आखं से गिर जाता है कभी किसी के दिल से | तो कभी क्रोध में खुद ही झटक दी अपने जिस्म और रूह की मिट्टी और फिर नया हो गया |
वो देखो --फिर किसी धरती की आवाज पर उसके थके थके कदम फिर उठने लगे | अबकी बार वो कहता है मैं पेड़ बनकर थक गया | इतने फूलों , फलों, पत्त्तियों और अनगिनत शाखाओं के बोझ से मैं थक गया | देख ली उंचाइयां मैंने आसमानों की | और देख ली गहराइयाँ धरती की भी | अब नहीं कुछ भी नहीं | अब फिर से वही नन्हा बीज बन जाना चाहता है | पवित्र , निच्छल , हल्का , बंद सा |
गुलजार ने इस भटकन को बहुत सुन्दर शब्दों में बांधा है | तुम्हारी रूह में अब , जिस्म में भटकता हूँ | लबों से चूम लों , आखों से थाम लों मुझको | तुम्हारी कोख से जनमू तो फिर पनाह मिले ....|
वो पनाह कहा मिलेगी ? ये उसकी तलाश है | हर वो चीज वही गुम हो जाएगी| इक़ दिन जहाँ से वो आई है | हम उसी से मोहब्बत करते है जिसके भीतर हम लापता हो जाना चाहते है | बाकी तो सारे खेल है मन बहलाने के |
विलोम --नहीं होता किसी चीज का --चलो मान लेते है लेकिन --अँधेरी रात और उजाले दिन के बीच, ठंडे चाँद और गरम सूरज के बीच और धरती /आसमान के बीच जो इक़ खिंचाव है क्या उसका कोई मोल नहीं ? जाते दिन और आती रात के बीच , आते सूरज और जाते चाँद के बीच , झुकते आसमान और उठती धरती के बीच जो सदियों से आकर्षण है उसका कोई मोल नहीं ? धरती , सब जानती है उसे पता है उस पर उगा हुआ पेड़ चाहे कितना भी ऊँचा ऊग ले इक़ दिन फिर उसमे ही पनाह खोजेगा |
पेड़ को क्यों दुख है की वो अब सिर्फ परछाई है ? क्या वो नहीं जानता की परछाई तो बाहर तब ही पड़ती है ना जब भीतर असल चीज मौजूद हो | धरती के भीतर या हमारे मन के भीतर जो सदियों से रहता आया है | हमें उसकी परछाई ही बाहर दिखती है | जिसने ये राज जाना | पनाह उसी को मिली | जो पनाह नहीं पाते वो जीवन भर गुनाह ही करते जाते है |


ohh..amezing...very nice geetji


apki ye post parh kar apki nazr ek shair..................................
तुझ को खुदा कहूँ के खुदा को खुदा कहूँ
दोनों की शक्ल एक किसको खुदा कहूँ


सुन्दर व्याख्या .....!!!!!


bahut sunder rachna...............


पेड़ के नजदीक गए तुम गीत चतुर्वेदी और एक बेहद सार्थक सच उसे सौंप आये.. पेड़ तो वैसे भी अपने कद के मद में नहीं आता, लेकिन बंधु, यह पाठ इंसानों को कैसे पढ़ाओगे ? सबसे ज़रुरी ता यह इंसानों के लिए लिए ही यह. दरअसल, इंसान भी एक कटीली नस्ल वाला पेड़ है.


-हमेशा की तरह बहुत सुन्दर.
रहस्यवाद और छायावाद दोनों के सम्मिलायक kavi को क्या कहेंगे: बीजवादी या पेड़वादी ?
रहना लेकिन धरती पर ही. -


very nice, kafi time bad kusch acha padhne ko mila thank u geet ji


aadarniya mai jab aap ki post padhata hun to man ko ek anjana sukun milta hai bahoot hi madhur aur apana sa ............ dhanyawad.


sir..., ek baar fir ...behatareen ...kamaal... bar bar yahin thaharne ki ichha hoti hai ... jaise likhne ki chhtpatahat waise hi ise padne ki chhtpatahat...!!! aap kamaal hai is baar ke...


सुदर काव्‍यमयी अभिव्‍यक्ति ......परंतु गीत जी यह तो वही बात हुई जैसे अनेक माता पिता अपने जवान बच्‍चों से अपने प्रति व्‍यवहार से दुःखी होकर कहता है कि तुम्‍हें कुछ पता है कि तुम्‍हें हमने कितना कष्‍ट सहकर पैदा किया और पाला पोसा और इस लायक बनाया......कोई भी संतान आखिर कैसे याद रखे और जैसा उसका समाजीकरण होता है और परिस्थितियों के अनुरूप वह अपने बडों से व्‍यवहार भी वैसा ही करता है परंतु अनेक मां बाप का तो नजरिया हमेशा यही होता है कि यह मेरा वही बंद मुटिठी कर किलकारी मारने वाला, अंगुली पकड कर चलने वाला बच्‍चा है....आज यह बडा होकर भी अपने अनुसार कैसे अपनी दुनिया में रम सकता है .....वह अपनी स्‍मृति में ही खोये रहते हैं आपके शब्‍दों में .......सारे पेड़ स्‍मृति में उगने वाले.....


Bahut Khoobsurat Geet ji..


Awesome simply superb quality to express the reality of being a being, going back to the roots is the only truth


तुम अब भी एक बीज हो. वही वाला बीज. क़द के मद में मत आना.

///wah ! Geet ji...main soch hi raha tha ki kaee dinon se aap ka gadhya padhne ko filhaal nahi mila hai...aur dekho ! yahan meri muraad kuchh-kuchh poori bhi huee...!


मुग्ध हो जाते हैं ... पढ़ते हुए ..


बहुत खूब!!
आपकी कवितायेँ पढ़ते हुए जाने कहाँ खो जाने का मन होता है कि फिर वापसी का कोई रास्ता न हो।इन्हें पढ़ते हुए तो जिंदगी पढ़ी जाती है एकदम साफ़ -साफ़!!
अनु


क्या बात है गीत भाई


Waah...Waah....Waah......bahot badhiya likha, Geet ji .... aapka padha bus maza aa gaya..........bahot bahot badhayi.......!!!


vastav me bahoot hi khoobsurat andaz me kaha hai aap ne mujhe bahoot accha lagta hai . aap ki abhivyakti rongte khade kar deti hai aap ko bahoot bahoot aabhar.


पहले देवताओँ को जगाया जाता था अब तुम्हे जगाया जाता है क्योँकि तुम सबसे उलझी लट हो...तुम जग जाती हो तो सारे देवता जग जाते हैँ...तुम्हारे आँख के पानी मेँ कई कंकड़ फेँके हैँ मैने...वो सारे कंकड़ मेरी आँखोँ मेँ चुभते हैँ...फिर साथ साथ चलना चाहता हूँ मै... आँखो का समँदर ही निविद बन गया है...सिर्फ तुम्हे जगाने के लिए...


कविता के सिकंदर


प्रेम में कोई एक पक्ष धीरे धीरे कब हावी हो जाता है इसका पता तब चलता है जब प्रेम अपनी ऊंचाई से गिरना शुरू होता है...झगड़े होते हैं और दूसरा पक्ष तब सूक्ष्म मूल्यांकन करना शुरू करता है ...सब कुछ भुलाकर प्रेम में साथ रहने की नीति ही राजनीति है..जिसमें दोनों हमेशा फ़ेल हो जाते हैं..अनुपस्थिति त्वचा की पार्थिव दरारों से ज्यादा सूनी आंखो, और ओढ़ी गई हंसी में ज्यादा दिखती है...मरता प्रेम ही है..


क्या बात है.....खूब.


वाह। बेहद खूबसूरत


kya baat hai sir....!!!

प्रेम तुम्हारी नीति थी.... मुझ पर राज करना तुम्हारी इच्छा....
मैं तुम्हारी राजनीति से मारा गया...

...my fav lines.


आप कमाल हो कवि....


Awesome.....leaving stunned and speechless!


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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