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कला का आलोक : ३ : रवीन्द्रनाथ पर अखिलेश





तखन करि नि नाथ
कोनो
आयोजन

रवीन्द्रनाथ के अधिकांश चित्र उनके जीवन के उत्तरार्द्ध में बनते हैं। गुरुदेव की उम्र लगभग छियत्तर वर्ष की होगी। 1937 में वे गम्भीर रूप से बीमार होते हैं और इस बीमारी के दौरान वे काफी दिनों तक बेहोश रहे। इस बीमारी से लौटे रवीन्द्रनाथ के जीवन के उत्तरार्ध में सिर्फ़ चित्र ही नहीं बनते हैं, उनका ध्यान इस सांसारिक वैभव, प्रकृति प्रेम, अनन्त वैश्विक सम्भावना से हटकर मृत्यु पर भी केन्द्रित होता है। बाद की अधिकतर कविताओं के केन्द्र में मृत्यु ही है। रवीन्द्रनाथ का विवाह तय होते ही उनकी भाभी ‘कादम्बिरी’ ने चौबीस वर्ष की उम्र में आत्महत्या कर ली थी। रवीन्द्रनाथ का अपनी भाभी के प्रति आकर्षण सर्वविदित है। इस बेहोशी से लौटने के बाद की चित्र शृंखला का नाम रवीन्द्रनाथ ‘कादम्बिरी’ ही रखते हैं। इन्हीं चित्रों में वे उदात्त अवस्था से हटकर आत्मकेन्द्रित होते हैं।

रवीन्द्रनाथ इसके पहले भी चित्र बनाते रहे, अधिकांश चित्र कविताओं के लिखने के दौरान उनको सुधारते हुए बनते-बिगड़ते हुए रूपाकारों के हैं। जिन चित्रों के लिए रवीन्द्रनाथ प्रसिद्ध हैं, वे इन्हीं अन्तिम चार वर्षों के हैं, मानों इन वर्षों में रवीन्द्रनाथ का ध्यान रूपाकारों ने सोख लिया है।

रवीन्द्रनाथ पर पश्चिमी जीवनशैली का भरपूर प्रभाव था, जिससे वे मुक्त भी हुए। उन्होंने शान्तिनिकेतन की कल्पना की और अपनी जीवनशैली की तरफ लौटे। उनका यह लौटना इतना अधिक रहा कि वे सम्भवतः एकमात्र भारतीय कवि हैं, जिसने परम्परा को बहुत-कुछ दिया, सँवारा, पुनर्परिभाषित किया। रवीन्द्र संगीत के बिना बंगाल बूचा नज़र आयेगा। बंगाली संस्कृति की थाती बन चुके रवीन्द्र गान राजनैतिक सीमाओं के पार भी उतने ही स्वतंत्र हैं जितने जातिगत विभाजन के भीतर।

रवीन्द्रनाथ का लौटना, खासतौर पर बीमारी के बाद लौटना आसान न रहा होगा। सम्भवतः मृत्यु से साक्षात्कार भी हुआ होगा। इस बीमारी में काफी दिनों तक वे मरणासन्न रहे। इस दौरान एकान्त के अवसाद से भी गुज़रे होंगे। यहीं कहीं कुछ दरकता है, जीवन मोह छूटता है। इसी मनस्थिति में किसी एक क्षण, क्षणभंगुर संसार निरर्थक, अर्थहीन और उपेक्षा योग्य जान पड़ा होगा। सांसारिकता की संस्कृति को परिष्कृत करने वाले महाकवि को सम्भवतः मरणासन्न दिनों में अकेले मनुष्य होने की मजबूरी का अहसास हुआ। लौटने पर उन्होंने पाया कि एक और संसार है अकेले होने, रहने, करने और नाचने का। वे स्वस्थ जीवन में लौटते हैं, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की तरह नहीं, व्यथित मन लिये रवीन्द्र की तरह जिसको निस्सारता का अनुभव हुआ है, जो सांसारिक अर्थ के परे आध्यात्मिक अर्थ भरे संसार को भुगत कर लौटा है, जिसका अन्तर्मन आज़ादी की उन गहराइयों में साँस ले रहा है, जो राजनैतिक आज़ादी के ऊपर मनुष्य की आत्मा की आज़ादी का स्वप्न है।

रवीन्द्रनाथ के चित्र सीधे बनना शुरू नहीं होते, वे लौटते हैं कविताओं की तरफ, अपने लेखन की तरफ। लिखना अब आसान न था। भरे-पूरे वैश्विक रवीन्द्रनाथ टैगोर, जो भटका रहे थे इस अप्रतिम, अद्भुत, अचम्भित कर देने वाली दुनिया के आश्चर्यों में - अब कीलित भी है दुःख के अकेलेपन में। बिछोह की दुखदायी कादम्बिरी स्मृति में। लेखन में संशय की स्याही फैलना शुरू होती है। इस स्याही में अहंकार का फैलना नहीं है, जो कई कवियों की लेखनी से निकलता रंगों तक जा पहुँचता है, जिसके अत्यन्त कमजोर और अधकचरे उदाहरण शमशेर बहादुर सिंह, मलयज और श्रीपत राय के चित्र हैं।

रवीन्द्रनाथ की स्याही संकोच से सत्य की तरफ जाती दीखती है। इसमें आत्म सच का प्रकाश फैला है, इन रेखांकनों में दावा नहीं कवि का क़ातर भाव है। रवीन्द्र के चित्र रचनाकार की सहज विविधता से भरे दीखते हैं।

‘‘कवि के चित्र और रेखाचित्र विविध प्रभाव लिये हैं, उन्हें किसी वर्ग में नहीं रखा जा सकता। कुछ अभिव्यक्तिवाद, अभिव्यंजनावादी कुछ और कुछ आदिम अनगढ़ता लिये हैं।’’
- स्वामीनाथन, लिंक पत्रिका, 1961

रवीन्द्रनाथ अपने चित्रों के लिए विषय ढूँढ़ने नहीं जाते हैं। रवि वर्मा की तरह वे भारतीयता भुनाने की कोशिश नहीं करते। वे परम्परा को खँगालते, सम्भालते नज़र नहीं आते। रवीन्द्रनाथ के लिए लोक और आधुनिक, सभ्य या अपढ़, अभिव्यक्तिवाद या किसी अन्य वाद और चित्र परम्परा भी उतनी निस्सार थी जितनी कि पश्चिमी संस्कृति, जिसके वे ज्ञाता थे। वे जाते हैं अपने दिल की भीतरी कोनों में छिपी थरथराती उस आदिम आकांक्षा के पास, जो बाहर फैले मृत्यु ताण्डव में साँस ले सकेगी के डर से, काँप रही थी। यही कम्पन रवीन्द्र के शुरुआती रेखांकनों में दीखता है। वे जाते हैं विरह के पास, जिसके उदास वर्ष उन्हें बींधते रहे। यही उदासी चित्रों में फैलती है।
वे जाते हैं शब्दों के रूपाकार के पास।
वे अनायास बह जाने वाली कलम के साथ टहलते हैं।
वे ‘अचानक’ से मिलते हैं, जिसका रूप बदलता रहता है।
वे आकस्मिकता से जा टकराते हैं।
वे अपने को छोड़ देते हैं उस नर्तक की तरह जो लगातार चक्कर लगा रहा है - जिसका उद्देश्य नाचना नहीं है।

जो रचना नहीं चाहता, रचने के भीतर बसना चाहता है। वे बहते हैं, रचते हैं और अचम्भित हम देखते हैं कि रवीन्द्र के इन चित्रों को, रेखांकनों को, जो निरूद्देश्य रचे गये हैं। रचना सम्बन्ध रचना जगत् है। जागत का कुछ नहीं, जगताधीश सा है। वे अपने चित्रों को लिखी कविताओं की तरह ही देखते हैं। वे लिखते हैं:
‘‘मेरे चित्र लकीरों के बीच की पद्य रचना है। यदि उसमें कुछ जाना-पहचाना जा सका है तब पहले तो लयात्मक अभिप्राय ही होगा, जो अन्तिम सत्य है। वह किसी भी तरह के विचार का प्रस्तुतिकरण या यथार्थ की व्याख्या नहीं है।’’

इन
चित्रों का रचयिता उस आदिम आत्म से संचारित है, जिसकी आँख की किरकिरी बीसवीं शताब्दी की आधुनिक होती जा रही विभीषिका भी है। विश्वयुद्ध की स्मृति, निरपराध, निर्दोष हत्याओं की सिहरन, मनुष्यता खोते जा रहे मनुष्य की विडम्बना। कमतर मनुष्य होते जाने की निरन्तरता, आदि झेलता, देखता, समझता इस रचनाकार की उन अन्जान छवियों के न पहचाने जा सकने वाले चेहरों में फैली उदासी और निराशा अन्जान मन के फीके उजास की तरह फैली है। रवीन्द्रनाथ के चित्र व्यक्तिगत विषाद का सार्वभौमिक प्रकटन है। शाश्वत और क्षणभंगुर के नाजुक सम्बन्धों के सक्षम चित्र हैं। संसार की निरन्तरता और उसकी टूटन के अहसास का प्रभाव है। ये आस्था के दरकने के आस्थावान चित्र हैं। रवीन्द्र सम्भवतः देख पा रहे थे आधुनिक होते जाते मनुष्य की मजबूरी और उससे अपने को न बचा पाने का दर्द। वे महसूस कर रहे थे साधारण मनुष्य की मुश्किलें बढ़ाता औद्योगिकी और उसके इर्द-गिर्द बुनी जा चुकी विचारधाराएँ।

लौटे हुए रवीन्द्रनाथ को अहसास हुआ होगा मनुष्य मन का साधारण से असाधारण हो जा सकने की क्षमता का जहाँ वे लिखना छोड़ चित्र बनाने लगते, चित्र बनाना छोड़ नाचने लगते। यह अहसास और चित्र बनाने, नाचने का आदिम बोध ही उन्हें ले चला होगा उस अन्जान, अव्यक्त, अपरिचित संसार की ओर जहाँ चिड़िया का चहकना सुनाई नहीं दे रहा, बल्कि दीखाई दे रहा है। जहाँ दुःख व्यक्त नहीं हो रहा - फैल रहा है।

रवीन्द्र काली स्याही के अंधकार से रचते हैं प्रकाश में डूबते-उतराते इन चित्रों को। उभरते इन रूपाकारों को, जो आत्मसात् कर लेने वाला है। उन आकारों को भी रचते हैं, जिनका सम्बन्ध सभ्यताओं, संस्कृतिओं और मनुष्यता की परम्पराओं से नहीं था, बल्कि स्वतंत्र होते जा रहे मनुष्य की अवस्था से था - जिसका भान उन्हें कुछ था, कुछ नीम-बेहोशी थी।
शब्दों की बनावट में छिपे रूपाकारों से सम्बन्ध बन रहा था।
वाक्यों में नये अर्थाकार प्रकट हो रहे थे।

ये चित्र भारतीय कला की स्वतंत्र अभिव्यक्ति के प्रमाण रूप थे, जो राजनैतिक स्वतंत्रता पाने के पूर्व धरा पर रूप धर चुके थे।

स्वामीनाथन के निधन के बाद के पहले जन्मदिवस पर उनकी स्मृति में बोलते हुए प्रख्यात चित्रकार रामकुमार ने कहा- ‘‘रवीन्द्रनाथ टैगोर, अमृता शेरगिल, मक़बूल फ़िदा हुसैन और स्वामीनाथन के बगैर आधुनिक भारतीय कला की शुरुआत नहीं मानी जा सकती।’’ रामकुमार इसे आज़ादी के पहले से शुरू कर आज के वर्तमान तक ले आ रहे हैं, जहाँ अभी भी कई जगहों पर इसके लक्षण दीख पड़ते हैं। भारत की गुलाम मानसिकता के प्रतिफलन को चित्रों में हम आज भी देखते हैं, जिन पर लिखना कागद कारे करना होगा। इनके लिए कई कला पत्रिकाएँ छप रही हैं, जिन्हें आज़ाद भारत का गुलाम प्रबुद्ध पाठक पढ़कर लगातार उपकृत हो रहा है। इस विषयान्तर में हम नहीं जा सकते, किन्तु इस सामूहिक चेतना की अभिव्यक्ति के ठेकेदार बनने की कोशिश में ‘ग्लोबलाइज़्ड' होने की महत्त्वाकांक्षा के बाहर हैं रवीन्द्रनाथ के अन्तर्मुखी चित्र।

इन चित्रों में संदेश देने की तड़पन नहीं है। वे मनुष्य की आत्माभिव्यक्ति का दावा भी नहीं करते हैं। वे आत्माभिमान लिये संकोच भरे चित्र हैं। वे संशय की उलझनों से गर्भित हैं। वे आज़ाद होने जा रहे देश की आज़ाद अभिव्यक्ति की चेतना के चित्र हैं, जो आज़ादी के आन्दोलन में शामिल होने का न आह्वान करते दीखते हैं, न शामिल होने की कोशिश करते हैं। वे तथाकथित सामाजिक-राजनैतिक चेतना के चित्र नहीं हैं जो आत्मग्लानि का रोना रोते नज़र आते हों।

‘‘रवीन्द्रनाथ अपने रेखांकन के लिए, जो निहायत सादगी से भरे हैं, मिथक और कथाओं की तरफ नहीं आकर्षित होते हैं। उनके कई अभ्यास चित्र चिन्तातुर विषयात्मकता, जो अर्धचेतन की गहराई से निकलने वाले अर्थों से भरे हैं - जिन्हें हम खुशी से आधुनिक भारतीय कला का ‘नायक’ कह सकते हैं।’’
- स्वामीनाथन, मार्च 1959

अर्धचेतन की गहराई से निकलने वाले जिन अर्थों की तरफ स्वामी का इशारा है, यह ‘अर्धचेतन', बेहोशी में उस शाश्वत मृत्यु से साक्षात्कार कर चुका होगा, जो रवीन्द्रनाथ की लम्बी बेहोशी में उनके साथ रही होगी। बीमारी के बाद इन्हीं चित्रों, मृत्यु सम्बन्धी कविताओं और आल्हादित नृत्य के बीच बीते इन चार सालों में बनाये रवीन्द्रनाथ के चित्र उन अर्थों से परे नज़र आते हैं, जो इस सांसारिकता में उन्हें वापस खींच लाने का प्रयत्न मात्र हैं। ये चित्र अन्तर्मन में बसे उस नाथ को सम्बोधित हैं, जो जाने कब चुपचाप हृदय में चला आया है। जिसका अनुभव उन्होंने कभी किया था और उसका वर्णन वे इस कविता में करते हैं:
तखन करि नि नाथ, कोनो आयोजन।
विश्वेर सवार साथे, हे विश्वराजन्,
अज्ञाते आसिते हासि आमार अन्तरे
कत शुभ दिने; कत मुहूर्तेर परे
असीमेर चिह्न लिखे गेछ। लड़ तुलि
तोमार-स्वाक्षर-आँका सेइ क्षण गुलि --
देखि तारा स्मृति-माझे आछिल जड़ाये
क्षणिकेर कत तुच्छ सुख-दुःख घिरे।
हे नाथ, अवज्ञा करि जाओ नाइ फिरे
आमार से धुलास्तूप खेला घर देखे।
खेला-माझे शुनिते पेयेछि थेके-थेके
जे चरणध्वनि, आज शुनि ताइ बाजे
जगत् सङ्गीत-साथे चन्द्रसूर्य-माझे
- रवीन्द्रनाथ, गीतांजलि
****

( बहुचर्चित चित्रकार और लेखक अखिलेश का यह आलेख राजकमल प्रकाशन से उनकी सद्यः प्रकाशित गद्य-पुस्तक 'दरसपोथी' से लिया गया है। इस पुस्तक के अलावा यह निबंध कहीं भी पहली दफा छप रहा है। आलेख के साथ दिए गए चित्र रवीन्द्रनाथ टैगोर के हैं। अखिलेश का एक अन्य लेख यहां देखें। )


2 comments:

रवीन्द्रनाथ जी के चित्र संस्कृति एक्सप्रेस में देखे थे, अवस्था के उस पड़ाव पर भी उनमें सृजनात्मकता कूट कूट कर भरी है।


ज्ञानवर्धक निबधं !!!
इस से पहले अखिलेश जी के रंग प्रेम और अब शब्द प्रेम से रु-बरु हो के अच्छा लगा
उपर दी गई कविता का हिंदी अनुवाद पढने को मिल सकता तो उसे भी समझा जा सकता था !!


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