सबद
vatsanurag.blogspot.com

पंकज चतुर्वेदी की नई कविताएं


[ आगे दी जा रही पंकज चतुर्वेदी की नई कविताओं और उस पर व्योमेश शुक्ल की क्षिप्र टिपण्णी उस महत्वपूर्ण प्रकाशन का हिस्सा है जिसके तहत कवियों ने सबद की पहल पर अपने साथ और इन अर्थों में समकालीन कवियों की कविताओं का चयन कर उस पर अपनी टिपण्णी लिखना स्वीकार किया था. हम पंकज चतुर्वेदी के आभारी हैं, उन्होंने अपनी कविताएं इस श्रृंखला के लिए उपलब्ध कराई . साथ ही व्योमेश शुक्ल के भी जिन्होंने उनकी कविताओं पर अपने मूल्यवान विचार रखे. हमारा धेय्य सीन को किसी तरह इंगेज रखना न कभी था, न है. हम ऐसे और अन्यान्य भी, इस विनम्र कोशिश में लगे हैं कि अच्छी कविता पर रोशनी और कविओं पर ध्यान बराबर जाए. इससे पूर्व आप इस श्रृंखला में नीलेश रघुवंशी, शिरीष कुमार मौर्य तथा सुशोभित सक्तावत की कविताएं पढ़ चुके हैं. ]
****

कविताएं


धारा 144

पूरे प्रान्त के विभिन्न शहरों में
तमाम केन्द्रों पर आयोजित थी
डॉक्टरी की बेहद संवेदनशील प्रवेश-परीक्षा

सरकार के हुक्म से
सख़्त इंतिज़ाम थे
कि कोई जालसाज़ी न हो सके

एक जगह पर अनेक लोगों का
जमाव न हो
आवाजाही नियन्त्रित हो
संदिग्ध तत्त्व न देखे जायँ
परीक्षा-केन्द्रों के आसपास

एक शहर में प्रशासन ने
तैयारी बैठक की
सभापति के तौर पर
अतिरिक्त ज़िलाधीश ने कहा :
धारा 144 लागू कर दी गयी है
किसी को कुछ पूछना है ?

एक मुलाज़िम ने कहा :
यह सुनिश्चित करना है
कि परीक्षा-केन्द्रों के
दो सौ मीटर के दायरे में
कोई फ़ोटोकॉपी-मशीन न चलती हो

साहब ने जवाब दिया :
धारा 144 लागू कर दी गयी है

उसने फिर कहा :
इसे एक बार और देख लें
यह धारा 144 में नहीं है

इस पर साहब ने सवाल किया :
वैसे आपका नाम क्या है ?

इसके बाद किसी ने कुछ नहीं पूछा
बैठक ख़त्म हुई
सभागार से सभी
यह कहते हुए निकले :
धारा 144 लागू कर दी गयी है
****

सम्बन्ध


कर्मचारियों की सभा में
मालिक ने कहा :
हमारे-आपके सम्बन्ध
कभी ख़राब नहीं हो सकते
क्योंकि वेतन आपको सरकार देती है

कर्मचारी ख़ुश हुए
और मालिक से और भी प्रतिबद्ध

मगर वे यह बात भूल गये
कि वेतन जो सरकार देती है
वह जनता के चुकाये हुए
करों के संग्रह में-से
इसलिए उनकी जवाबदेही
मालिक या सरकार नहीं
जनता के प्रति है

मालिक भी यह नहीं बताता
वह दरअस्ल कहता है :
वेतन आपको कोई दे
रिश्ते हमारे-आपके
अच्छे रहेंगे
****

देखिये

सोवियत संघ के पराभव के बाद
जब धर्म की वापसी हो रही थी वहाँ
और दूसरे पूर्व-कम्युनिस्ट देशों में भी
यह क़िस्सा मुझे हिन्दी के
एक कवि ने सुनाया था

सोवियत संघ की यात्रा पर
जब नागार्जुन गये
तो मास्को में एक लिफ़्ट में
उनकी भेंट एक वयोवृद्ध स्त्री से हुई
विदा होते समय उस स्त्री ने
स्वगत शैली में कुछ कहा

नागार्जुन ने पूछा :
वह स्त्री क्या कह रही थी ?

उनके दुभाषिये ने बताया :
वह ईश्वर से आपके लिए
दुआ माँग रही थी

नागार्जुन को अचरज हुआ :
सोवियत संघ और ईश्वर?

दुभाषिये ने कहा :
भाषा का क्या किया जाय
भाषा में ईश्वर---
यह शब्द तो है

मुझे लगा, क़िस्सागो कवि से कहूँ :
अगर यह आपकी चेतना में है
तो आप सिर्फ़ इशारा कर रहे हैं---
एक निर्वैयक्तिक इशारा---
देखिये, यह सब
कहाँ से लौट आया है
****

तीन बातें

कोई किसी को
माफ़ नहीं करता

कोई किसी पर
एहसान नहीं करता

और आप जो कुछ हैं
अपनी बदौलत हैं
****

कविताओं पर व्योमेश शुक्ल

पंकज
अनुभव को राजनीति के सामान में बदल लेते हैं. यह अनुभव की अनंत संभावनाओं में एक और संभावना की तलाश है या इस वक़्त के कवि का कर्त्तव्य. इस कर्त्तव्य को वह कलात्मक चुनौती की तरह स्वीकार करते हैं और एक निहायत सादा, ताज़ा, आदिम और क़ाबिलेयक़ीन 'मौलिक-विशेष', यों, आज की कविता को हासिल हो जाता है.

दिक़्क़त यह है कि कवि की ऐसी राजनीतिक उपलब्धि को हिंदीसाहित्यसंसार में 'मुहावरा' वगैरह कहकर समझ लिया जाता है. जगमग दृश्य में पंकज उन बहुत कम, अनोखे कवियों में से हैं जिन्होंने एकदूसरे जैसी कविता नहीं लिखी और वर्चस्वशाली शिल्पों से असहमत रहे आए. उनकी रचना में उपलब्ध के साथ सामंजस्य, सहयोग या संतुलन का अभाव है, लेकिन यह अभाव भी किसी वाचालता में ख़ुद को ज़ाहिर नहीं करता, बल्कि नमी, व्याकुलता, वैराग्य, यथार्थ की निरुपायता और एक असमाप्त मननशील युयुत्सा की मिलीजुली रौशनी से उसकी आवाज़ बनती है. ऐसी आवाज़ जितनी बनती है, उतनी बढ़ती भी है. ऐसी आवाज़ में व्यक्ति की भीतरी परतें भी पारदर्शी होकर सामाजिक सचाइयाँ बन जाती हैं. ऐसी आवाज़ में, जैसा निर्मल वर्मा मलयज के लिए कह गए हैं, हमेशा एक मंद्र 'अर्जेंसी' होती है. ऐसी आवाज़ का आत्म ही मुक्तिबोध के शब्दों में, एक 'आभ्यंतरीकृत विश्व' होता है.

अपमान उनकी कविता का प्रमुख मुद्दा है. ग़ौरतलब है कि व्यक्ति के अपमान को पंकज कितने सिरों से उठाते हैं, ग्रामप्रधान की बैठक यानी अन्यायमय सामाजिक यथास्थिति के 'ग्राउंड ज़ीरो' से शुरू करके 'निर्वैयक्तिक इशारे' करते रहने वाले चमकदार हिंदी कवियों के सूक्ष्मातिसूक्ष्म 'कंडीशंड रेफ्लेक्सेस' तक. ऐसे अप्रत्याशित और विविध उनके लिये सुविधाएँ और अलंकरण हो सकते थे, लेकिन रचना में वे सरोकारों के हिस्से बनकर मौजूद हैं.

रघुवीर सहाय की कविता जिस एक दर्जा नीचे रहने के दर्द की ख़ातिर कविता को खोलती है, वह मुक्ति पंकज की कविता के लिये किस क़दर आजीवन कर्त्तव्य बन गयी है, इसे देखा जाना चाहिए और इस कविता की राजनीति को बहस और साहित्यिक सामाजिकता के कुछ और बीच में ले आना चाहिए. पंकज की कविता को ताक़त के अन्यायी रूपों की आलोचना के तौर पर पढ़ा जाना भी बाक़ी है. वैसे तो हमारे यहाँ अनिवार्य चीज़ें लगातार बाक़ी हैं. नब्बे के दशक, जिसके कवि पंकज बोलचाल में माने जाते हैं, की भीड़ में से प्रतिनिधि कवियों की नेक, विश्लेषणसम्मत और ऐतिहासिक तलाश का काम बाक़ी है.बहरहाल, पंकज जैसी कविता पढ़ते हुए हम कविता की अपनी शक्ति पर भरोसा रख सकते हैं और विश्लेषण के लिये प्रतीक्षा कर सकते हैं.
####
5 comments:

अछ्छी कवितायें.


बेहतरीन कविताएं...शुभकामनाएं पंकज जी को...


"धारा १४४" एवं "संबंध" दोनों ही महत्वपूर्ण कविताएं हैं|भ्रष्ट होती गयी व्यवस्था को बहुत स्पष्ट तरह से चिह्नित होते हुए देखा जा सकता है यहां। बहुत दिनों बाद कुछ अपने तरह की कविताएं पढ़ने का अवसर मिला। आभार।


पंकज भाई को अपनी कविताओं के साथ यहां देखना बहुत अच्‍छा लगा। मुझे उनकी कविताएं हमेशा ही पसन्‍द रही हैं। व्‍योम टिप्‍पणी भी बहुत अच्‍छी लिखी है।


बतियाने का शिल्प! कथाओं से कथाएं जुडती चली जाती हैं और आखिरकार एक ऐसी छटपटाहट तारी होती है कि आप इस दुनिया की हकीकत से और डर जाते हैं. यह शिल्प अलग और अनूठा है, पंकज जी का खुद विकसित किया हुआ. इस शिल्प के सहारे सच्चाईयों से तादात्म्य बनता चला जाता है. अभी इस शिल्प में उनकी सबसे बेहतर कविता का मैं इंतज़ार कर रहा हूँ क्योंकि इस शिल्प में अद्भुत ताकत है.
मृत्युंजय/ 08763642481


सबद से जुड़ने की जगह :

सबद से जुड़ने की जगह :
[ अपडेट्स और सूचनाओं की जगह् ]

आग़ाज़


सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

पिछला बाक़ी

साखी


कुंवर नारायण / कृष्‍ण बलदेव वैद / विष्‍णु खरे / चंद्रकांत देवताले / राजी सेठ / मंगलेश डबराल / असद ज़ैदी / कुमार अंबुज / उदयन वाजपेयी / हृषिकेश सुलभ / लाल्‍टू / संजय खाती / पंकज चतुर्वेदी / आशुतोष दुबे / अजंता देव / यतींद्र मिश्र / पंकज मित्र / गीत चतुर्वेदी / व्‍योमेश शुक्‍ल / चन्दन पाण्डेय / कुणाल सिंह / मनोज कुमार झा / पंकज राग / नीलेश रघुवंशी / शिरीष कुमार मौर्य / संजय कुंदन / सुंदर चंद्र ठाकुर / अखिलेश / अरुण देव / समर्थ वाशिष्ठ / चंद्रभूषण / प्रत्‍यक्षा / मृत्युंजय / मनीषा कुलश्रेष्ठ / तुषार धवल / वंदना राग / पीयूष दईया / संगीता गुन्देचा / गिरिराज किराडू / महेश वर्मा / मोहन राणा / प्रभात रंजन / मृत्युंजय / आशुतोष भारद्वाज / हिमांशु पंड्या / शशिभूषण /
मोनिका कुमार / अशोक पांडे /अजित वडनेरकर / शंकर शरण / नीरज पांडेय / रवींद्र व्‍यास / विजय शंकर चतुर्वेदी / विपिन कुमार शर्मा / सूरज / अम्बर रंजना पाण्डेय / सिद्धान्त मोहन तिवारी / सुशोभित सक्तावत / निशांत / अपूर्व नारायण / विनोद अनुपम

बीजक


ग़ालिब / मिर्जा़ हादी रुस्‍वा / शमशेर / निर्मल वर्मा / अज्ञेय / एम. एफ. हुसैन / इस्‍मत चुग़ताई / त्रिलोचन / नागार्जुन / रघुवीर सहाय / विजयदेव नारायण साही / मलयज / ज्ञानरंजन / सर्वेश्‍वर दयाल सक्‍सेना / मरीना त्‍स्‍वेतायेवा / यानिस रित्‍सोस / फ्रान्ज़ काफ़्का / गाब्रीयल गार्सीया मारकेस / हैराल्‍ड पिंटर / फरनांदो पेसोआ / कारेल चापेक / जॉर्ज लुई बोर्हेस / ओक्टावियो पाज़ / अर्नस्ट हेमिंग्वे / व्लादिमिर नबोकोव / हेनरी मिलर / रॉबर्टो बोलान्‍यो / सीज़र पावेसी / सुजान सौन्टैग / इतालो कल्‍वीनो / रॉबर्ट ब्रेसां / उम्बेर्तो ईको / अर्नेस्‍तो कार्देनाल / ज़बिग्नियव हर्बर्ट / मिक्‍लोश रादनोती / निज़ार क़ब्‍बानी / एमानुएल ओर्तीज़ / ओरहन पामुक / सबीर हका / मो यान / पॉल आस्‍टर / फि़राक़ गोरखपुरी / अहमद फ़राज़ / दिलीप चित्रे / के. सच्चिदानंदन / वागीश शुक्‍ल/ जयशंकर/ वेणु गोपाल/ सुदीप बैनर्जी /सफि़या अख़्तर/ कुमार शहानी / अनुपम मिश्र

सबद पुस्तिका : 1

सबद पुस्तिका : 1
भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार के तीन दशक : एक अंशत: विवादास्‍पद जायज़ा

सबद पुस्तिका : 2

सबद पुस्तिका : 2
कुंवर नारायण का गद्य व कविताएं

सबद पुस्तिका : 3

सबद पुस्तिका : 3
गीत चतुर्वेदी की लंबी कविता : उभयचर

सबद पुस्तिका : 4

सबद पुस्तिका : 4
चन्‍दन पाण्‍डेय की कहानी - रिवॉल्‍वर

सबद पुस्तिका : 5

सबद पुस्तिका : 5
प्रसन्न कुमार चौधरी की लंबी कविता

सबद पुस्तिका : 6

सबद पुस्तिका : 6
एडम ज़गायेवस्‍की की कविताएं व गद्य

सबद पुस्तिका : 7

सबद पुस्तिका : 7
बेई दाओ की कविताएं

सबद पुस्तिका : 8

सबद पुस्तिका : 8
ईमान मर्सल की कविताएं

सबद पुस्तिका : 9

सबद पुस्तिका : 9
बाज़बहादुर की कविताएं - उदयन वाजपेयी

सबद पोएट्री फि़ल्‍म

सबद पोएट्री फि़ल्‍म
गीत चतुर्वेदी की सात कविताओं का फिल्मांकन

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में

सबद फिल्‍म : प्रेम के सुनसान में
a film on love and loneliness

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन

सबद पोएट्री फिल्‍म : 3 : शब्‍द-वन
किताबों की देहरी पर...

गोष्ठी : १ : स्मृति

गोष्ठी : १ : स्मृति
स्मृति के बारे में चार कवि-लेखकों के विचार

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते

गोष्ठी : २ : लिखते-पढ़ते
लिखने-पढ़ने के बारे में चार कवि-लेखकों की बातचीत

सम्‍मुख - 1

सम्‍मुख - 1
गीत चतुर्वेदी का इंटरव्‍यू

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :
मुक्तिबोध के बहाने हिंदी कविता के बारे में - गीत चतुर्वेदी