सबद
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समर्थ वाशिष्ठ की नई कविताएं




जन्म लेता है एक शब्द
हौले-हौले जन्म लेता है
एक शब्द
जैसे जुड़ी हो उसके साथ
भरे-पूरे किरदारों वाली
कोई कथा
आप कहेंगे ज़मीन
तो मौजूद हो सकती है वहां
बख़्तरबंद सिपाहियों की पूरी कतार
भूमि पर चढ़ाई करती
यूंहि नहीं कह सकते
आप किसी फल को आम
अपनी जिव्हा पर टपक आए
रस का आस्वादन किए बगैर
दर्द से बिलबिला उठेंगे आप
ततैया के दंश से
पर कुछ भी नहीं होगा वह
भिरड़ के लड़ने के दर्द के मुक़ाबले
बैंगलोर्ड हो  जाएगा अमरीका में कोई
डूब जाएगी आर्नल्ड श्वाज़ेनेगर की छवि
प्लूटो के ग्रहत्व की तरह।
हौले-हौले जन्म लेता है एक शब्द
उसे गढ़ता है तीन साल का एक बच्चा
भूल जाता है, फिर करता है याद
तीन बरस के अपने बच्चे से खेलता हुआ।
नदी सा बन जाता है कभी कोई शब्द
जैसमीन के फूल की सफ़ेदी में
जुड़ जाता है क्रांति का रंग
हौले-हौले यूं बना कोई शब्द
जब देता है शब्दकोश पर दस्तक
तो चौंक जाती है अचानक भाषा
कि अरे, देखा ही नहीं मैंने
आते हुए दबे-पांव तुम्हें!
****
स्ट्रीट रैट
मेरी दिल्ली में बसने की
ख़ास मुसीबत ये नहीं थी
कि ताज़ा, सस्ता और गर्म खाना खाने
चलना पड़ता पांच किलोमीटर रोज़ाना
न ही ये कि एक के बाद एक आते ’नगर’
अच्छी ख़ासी नींद भी कर देते उचाट
बस में
ये भी नहीं कि बढ़ता ही जाता था पीठ का दर्द -
बॉस के सामने भी होने लगती महसूस ज़रूरत
गर्दन झटकाने की
पर यह कि जहां भी मैं जमता हलक़ से निवाला कोई उतारने
काला लिजलिजा चूहा कोई आ पड़ता सामने
        उन-उन आकारों में
        जिन-जिन आकारों में वो रहा होता
        कल्पना से एकदम परे
अभूतपूर्व।
घुस जाता नासिका के रास्ते
        मस्तिष्क में
पतीली के नीचे से सरकते
प्याज़ के छिलकों में
भी देता दिखाई
(अब जो भी अर्थ दें आप इसे
सचमुच सरका था गुलाबी एक छिलका
पतीली के नीचे से
गर्म एक दुपहर)
और शायद चलता भी रहता यही सब बदस्तूर
अगर बहुत दिन गायब रहने के बाद
आ न जाता उधम मचाता वो यकबार
मेरे पांव के बिल्कुल पास।
दुनिया के शायद सबसे विशाल चूहे को
दर्द से बिलबिलाते
पीठ दिखाकर भागते देखना।
पर फिर मैंने समझी उसकी आंत्रों की कुलबुलाहट
और ज़मीन पर गिराकर रोटी कोई नर्म
कहने लायक बना उससे कई बार --
कि आओ मियां
        मिल बांटे खाएं जो कुछ भी है
                दो भूखे दोस्त।
****

पतन
ओह कैसा समय
कैसे तौर-तरीके
कहते हैं सिसेरो
भरे सिनेट में
कैटेलीन को लताड़ते
दोहराते हैं हम ये शब्द
हां में हिलाते हैं गर्दन
दो हज़ार साल आगे
****

आकलन
जब पसंद आ रहे होते हैं
मुझे आप
तब पसंद आ रही होती हैं
मुझे
आपकी कुछ ख़ास बातें
आकलन के जोख़िम हैं
इस पसंद आने में
तमाम
जैसे सीमा रेखा पर
उछाल लेता क्षेत्ररक्षक
दे जाए छ: रन अचानक
कैच लेता-लेता।
****
मां
(सिरहाने ’मीर’ के आहिस्ता बोलो...)
सोचते-सोचते
नींद में प्रवेश कर गया होगा
उसका मस्तिष्क
जिव्हा के कसैलेपन को
आत्मसात करते
धीरे-धीरे
घुल रहें होंगे
रक्त प्रवाह में
दवाइयों के अवयव
घुल रही होगी
शर्करा।
कैसे कल्पित करूं
उसके डरावने सपनों के रंग
उनमें हाथ
थोड़ा गीला किए बगैर?
धीरे से छोड़ दूं
माथे पर एक चुंबन
इससे पहले कि
वो उठे
और पूछे वे प्रश्न
जिनके उत्तर
वो जानती है
पर जानना नहीं चाहती।
****

मच्छर
हवा होगी
तो होंगे
ये महानुभाव भी
आधी रात
उठूंगा अचानक
किसी दंश की
तिलमिलाहट से
ढूंढूंगा इन्हें ख़त्म करने का
कोई भी ज़रिया
हाथ आएगा
तिलचिट्टों के सफ़ाए
के लिए लाया गया
हिट का लाल कनिस्तर
सीधे इनके ऊपर
ज़हर की धार छोड़ते
याद करूंगा
जो बच सकते थे भोपाल
जो नहीं बचे इराक़
नाश्ते की मेज़ पर अगले दिन
दोस्तों से करूंगा मज़ाक़
कि क्यूं न रक्खे मुझे
मच्छरों की दुनिया का ओबामा
अपनी टार्गेटिड किल्लिंग सूची[1] के
ऐन ऊपर?
****

सूर्य

वह रोटी में नमक की तरह प्रवेश करता है
                                - सूर्य (केदारनाथ सिंह)

हमारी कविताओं पर क़ाबिज़ रहते हो
ज़िंदगी से ओझल होकर भी

किसी बहुत सर्द रात
बुद्ध मुद्रा में लीन
हवा के दर्रे सहते यात्रियों के
सपनों में आते हो
नर्म, मख़मली

तुम्हारे आने पर
चहचहाती है चिड़ियाएं
ओस की भौचक बूंदें
उड़ेलकर अपना निर्वात
लगाती हैं छ्लांग

एक चमकती सुबह
तेज़ तेज़तर बिगड़ैल
तुम टटोलते हो मेरी आंखें
धूसर पर्दों के पार

मुस्करा उठता हूं मैं
उदय होता है एक विश्व
हमारे बीच।
****

नवगीत
खाली हो टंकी जब सूखे हों नल
शॉवर में रहता है थोड़ा सा जल
ऐसे ही जाता है जीवन निकल
जगमग उजालों से लगता है डर
घर लौटूं, तकिए पे रखूं जो सर
राहत कि जैसे हो गर्मी में ज्वर
दिनभर निकलते ही रहते हैं काम
खाली सी आंखों में दुनिया तमाम
इंसान होने के सब ताम-झाम
चिल्लाती सुबहों में फैले उजास
जागूं मैं ज्यूंही इक कविता उदास
जम्हाई लेती सी आ बैठे पास।
****
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3 comments:

सबद हमारे बीच एक मखमली तकिया है.


vashishth ji ki kavitaye.n achchhi lagi. khaskar navgeet , badhayi
dr. dinesh tripathi


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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अपवाद : [ सबद का सहोदर ] :

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