सबद
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सबद पुस्तिका : 6 : एडम ज़गायेवस्‍की

6:39 am

[पोलिश कवि -लेखक एडम जगायेवस्‍की की कविताओं, विचारों और उन पर एकाग्र गद्य की इस पुस्तिका को सबद की तीसरी वर्षगाँठ पर पेश करते हुए हमें अपार हर्ष हो रहा है. जगायेवस्‍की कविता के उसी उर्वर प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं जहां से रुज़ेविच, मिवोश, शिम्बोर्स्का और हर्बर्ट जैसे कवि आते हैं. उनकी कविताओं और लेख का यह अनुवाद हिंदी के लब्धप्रतिष्ठ कवि-कथाकार और अनुवादक गीत चतुर्वेदी ने किया है. जगायेवस्‍की की कविताओं के साथ गीत ने लम्बी संगत की है और उनके कई अनुवाद किए हैं. इस पुस्तिका में हम एक श्रृंखला के तहत 27 कविताएं प्रस्तुत कर रहे हैं. जगायेवस्‍की की कविताओं पर उनकी भूमिका कवि के बहाने कविता के कई ज़रूरी सवालों की पड़ताल करती है. इससे पहले सबद के लिए ही अब खासे मशहूर चिली के कवि-कथाकार रोबर्तो बोलान्‍यो की कविताओं का भी अनुवाद गीत ने किया था. ]



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लपट

हे ईश्वर, हमें लंबी सर्दियां दो
और शांत संगीत, और धैर्यवान मुख
और थोड़ा-सा गौरव दो
इससे पहले कि हमारा युग ख़त्म हो जाए।
हमें एक गहरा अचंभा दो
और एक लपट दो, ऊंची, चमकदार भड़कीली


छोटा वाल्ट्ज़ 

इतने चंचल हैं दिन, इतने चमकदार
कि दुबली नन्ही हथेलियां भी
ढंकी हुई हैं उपेक्षा की सफ़ेद धूल से
अंगूर के बग़ीचों में बहुत धीरे सरसराते हैं सांप
लेकिन शाम का समंदर अंधेरे जितना गाढ़ा हो जाता है और
लटकता है सिर के ऊपर जैसे
सर्वश्रेष्ठ लिपियों में लटकते हैं विराम चिह्न
बमुश्किल हिलती है समुद्री चिडियां.
शराब की एक बूंद उत्‍कीर्ण है तुम्हारे होंठों पर
चूने के पहाड़ धीमी गति से पिघलते हैं
क्षितिज पर और एक तारा उगता है.
रात में चौराहे पर बेदाग़ सफ़ेद पोशाकों में नाविकों का एक ऑर्केस्ट्रा
बजाता है शोस्ताकोविच का छोटा वाल्ट्ज़, छोटे बच्चे
रोते हैं जैसे कि वे समझ गए हों
यह ख़ुशदिल संगीत अंतत: कहना क्या चाहता है.
हम दुनिया के संदूक़ में बंद हो चुके हैं,
प्रेम हमें स्वतंत्र करता है, समय हमारी हत्या.

* कम समयावधि का वाल्ट्ज़। अक्सर एक मिनट में समाप्त हो जाने वाला। 
शोपां ने इसकी शुरुआत की थी। 

विरह

मैं लगभग ईर्ष्‍या के साथ पढ़ता हूं अपने समकालीनों की कविताएं :
तलाक़, अलगाव, तकलीफ़देह जुदाइयां;
व्यथा, नई शुरुआतें, छोटी-मोटी मृत्यु भी;
चिट्ठियां जो पढ़ी गईं और फिर जला दी गईं, जलना, पढऩा, आग, संस्‍कृति,
क्रोध और निराशाएं-- कविता के पुंसत्व के लिए बेहद ज़रूरी माल;
निर्मम फ़ैसले, क़द्दावर सदाचारियों के ठहाकों की नक़ल उड़ाते
और अंत में सबकुछ को समा लेने वाले चिरस्थायी आत्म की विजय.

और हमारे लिए? कोई मर्सिया नहीं, हमारे विरह पर कोई छंद नहीं,
हमारे बीच कविता का कोई पर्दा नहीं
सटीक उपमाएं भी हमें एक-दूसरे से अलग नहीं कर पातीं
नींद ही है वह एकमात्र जुदाई जिससे हम बच नहीं पाते
नींद की गहरी गुफा, जिसमें हम अलग-अलग उतरते हैं
-- और मैं पूरी तरह ध्यान रखता हूं इस बात का कि
जो हाथ मैंने पकड़ रखा है उस समय
वह पूरी तरह सपनों से बना होता है.


जहां सांस है

वह अकेले खड़ी है मंच पर
और उसके पास कोई साज़ नहीं

वह अपने वक्षों पर बिछाती है अपनी हथेलियां
जहां सांसों का जन्म होता है
और जहां मरती हैं वे

हथेलियां नहीं गातीं
वक्ष भी नहीं गाते

गाता वही जो ख़ामोश बचा रहता है
****



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अम्बर रंजना पाण्डेय की तीन नई कविताएं

11:07 am




पकड़ नहीं आती छवि

दूती की भूमिका में मंच पर
बांच रही हैं आर्या-छंद मेरी प्रेयसी.
चांदी की पुतलियों का हार और हंसुली
गले में पहनें. संसार यदि छंद-
विधान है तो उसमें
अन्त्यानुप्रास हैं वह. किसी
उत्प्रेक्षा सा रूप जगमग दीपक
के निकट. दूती के छंद में कहती
हैं नायिका से, ''छाजों
बरसेगा मेह, उसकी छवि की छांह
बिन छलना यह जग, जाओ सखी
छतनार वट की छांह खड़ा है
तुम्हारा छबीला'' और मुझे मंच के नीचे
कितना अन्धकार लगता है. कैसे रहूँगा मैं
जब तुम चली जाओगी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय,
दिल्ली. यह अभिनय नहीं सुहाता, नट-
नटियों के धंधे.

रूप दिखता है और अचानक
हो जाता है स्वाद. पकड़
नहीं आती छवि छंद से भी
ज्यादा छंटैत है.
****

ऋतु-स्नान

चैत समाप्यप्राय हैं. आठ-दस हाथ दूर
आलते रचे, मैले पांवों
को तौल तौल धरती
उतरती प्रवाह
में. एक ही चीर से
ढँके सब शरीर.
एक स्नान सूर्योदय से
पूर्व कर चुकी हैं वह. यहाँ
केश धोने आई हैं. पांच
दिनों की ऋतुमती, थकी और
मंथर, अधोमुखी जैसे हो
आम्र-फलों की लता. नर्मदे
मेरे एकांत पर फूलना
लिखा था यों यह ब्रह्मकमल कि
मारता हूँ डुबकी, अचानक
उसके स्तनों पर जमे गाढ़
स्वेद, धूल और श्वासों से
सिंची फूल पड़ती हैं मुझपर
मोगरे की क्यारियाँ. वीर्य
और रज का मैं पुतला, मुझे
नदी के बीचोंबीच होना
था मुकुल शिवपुत्र का कामोद.
****

बहुत हैं मेरे प्रेमी

मैं तो भ्रष्ट होने के लिए ही
बनी हूँ
बहुत हैं मेरे प्रेमी
पाँव पड़ता हैं मेरा नित्य
                        ऊँचा-नीचा

मुझसे सती होने की आस
मत रखना, कवि

मैं तो अशुद्ध हूँ
घाट घाट का जल
भाँत भाँत की शैया
भिन्न भिन्न भतोर का भात
सब भोग कर
आई हूँ तुम्हारे निकट

प्रौढ़ा हूँ विदग्धा हूँ
जल चुकी हूँ
यज्ञ में चिता में चूल्हे में

कनपटियों की सिरायों में
टनटनाती रहीं सबके, दृष्टि में
रही अदृश्य होकर, जिह्वा पर
मैं धरती हूँ कलेवर
उदर में क्षुधा, अन्न में तोष
निद्रा में भी
स्वप्न खींच लाया मुझे
और ले लिया मेरे कंठ का चुम्बन

फिर कहती हूँ, सुनो
ध्यान धरकर

मैं किसी एक की होकर नहीं रहती
न रह सकती हूँ एक जगह
न एक जैसी रहती हूँ

नित्य नूतन रूप धरती हूँ
मैं इच्छावती
वर्ष के सब दिन हूँ रजस्वला
मैं अस्वच्छ हूँ टहकता हैं मेरा
रोम रोम स्वेद से
इसलिए मैं लक्ष्मी नहीं हूँ
न उसकी ज्येष्ठ भगिनी

मैं भाषा हूँ, कवि
मुझे रहने दो यों ही
भूमि पर गिरी, धूल-मैल
से भरी

जड़ता में ढूंढोगे तो मिलेगा
सतीत्व, जीवन तो स्खलन
हैं, कवि

जल गिरता हैं
वीर्य गिरता हैं
वैसे मैं भी गिरती हूँ
मुझे सँभालने का यत्न न करो
मैं भाषा हूँ
मैं भ्रष्ट होना चाहती हूँ.
****
 [ अम्बर रंजना पाण्डेय की पूर्व-प्रकाशित कविताओं के लिए यहाँ आएं ]
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कथा : ६ : जार्ज लुई बोर्हेस

7:51 pm



[
बोर्हेस हिन्दी के लिए अब अपरिचित नहीं हैं। वे अर्जेन्टाइना के सुप्रसिद्ध लेखक हैं, जिनका जन्म 1899 में हुआ था। वे हमारे समय के महान लेखकों में गिने जाते हैं। उनके अनेक कथा संग्रह और कविता-संग्रह प्रकाशित हैं। यह कहानी उनकी किताब 'द बुक ऑफ सैण्ड' से ली गयी है (संयोग से इस कहानी का शीर्षक भी यही है)। बोर्हेस को लेखकों का लेखक कहने का चलन है। उनकी अनेक कहानियाँ 'आस्तित्त्विक गुत्थियों' को उद्घाटित करने की कोशिश में लिखी गयी हैं। वे हमें 'होने' के उन प्रश्नों के सामने निष्कवच ला खड़ा करती हैं जिन्हें टालकर ही सामान्य बौद्धिक व्यापार चला करता है। इस अर्थ में वे हमें गहन स्तर पर इस तरह झकझोरती हैं कि हम अस्तित्त्व के आष्चर्य पर विचार करने को विवश हो उठते हैं। ]
: :
अनुवादक
                                             

रेत की किताब       

'' तुम्हारी रेत की रस्सी''
-- जॉर्ज हर्बर्ट (1593-1623)

रेखा असंख्य बिन्दुओं से बनी होती है; सतह असंख्य रेखाओं से; घन असंख्य सतहों से; अतिघन असंख्य घनों से...। नहीं, निश्चय ही यह ज्यामितीय ढंग अपनी कहानी शुरू करने का बेहतर ढंग नहीं है। हर मनगढ़न्त कहानी की सच्चाई का दावा करने का आजकल रिवाज़ है। हालांकि मेरी वाकई सच्ची है।

मैं ब्यूनेस आयर्स की बेलग्रानों गली के चार मंज़िले अपार्टमेण्ट में अकेला रहता हूँ। कुछ महिने पहले, देर शाम, मेरे दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैंने दरवाज़ा खोला, बाहर एक अजनबी खड़ा था। वह लम्बा था और उसके नाक-नक्श विशेष नहीं थे, या अपनी अल्पदृष्टि के कारण मुझे वे ऐसे लगे हों। भूरे कपड़े पहने और हाथ में भूरा सूटकेस लिए वह विनम्र लग रहा था। मैंने तुरन्त जान लिया कि वह किसी और देश से आया है। पहले मुझे वह बूढ़ा जान पड़ा, बाद में समझ में आया कि मुझसे यह भूल उसके महीन और सुनहले बालों के कारण हुई है, जो स्केण्डिनेवियाई ढंग के सफे़द थे। एक घण्टे से भी कम हुई हमारी बातचीत से मुझे पता चल गया कि वह आर्कनीज़ से आया है। मैंने उसे भीतर बुलाया और कुर्सी की ओर इशारा किया। वह बोलने से पहले कुछ देर ठिठका रहा। उससे एक तरह का अवसाद फूट रहा था, जो अब मुझसे फूट रहा है।
'मैं बाइबिल बेचता हूँ,' वह बोला।

मैंने अपना ज्ञान दर्शाया, 'इस घर में अनेक अंग्रेज़ी बाइबिल हैं, जिनमें जॉन वायक्लिफ़ की पहली अंग्रेज़ी बाइबिल भी शामिल है। मेरे पास सिप्रानो डी वलेरा की, लेखन की दृष्टि से कमज़ोर लूथर की और वल्गेट की लातिन प्रति भी है। तुम जान ही गये होगे कि मुझे बाइबिल की ज़रूरत नहीं है।'

कुछ देर चुप रहने के बाद वह बोला, 'मैं सिर्फ़ बाइबिल नहीं बेचता, मैं आपको बीकानेर के बाहरी इलाके में मिली एक पावन-पुस्तक दिखाना चाहता हूँ जिसमें आपकी दिलचस्पी हो सकती है।'

उसने सूटकेस खोला और एक पुस्तक मेज़ पर रख दी। वह कपडे़ के ज़िल्द में 'अठपेजी’* पुस्तक थी। वह बेशक कई हाथों से गुज़र चुकी थी। उसके असाधारण वज़न से मुझे हैरानी हुई। उसके स्पाईन पर 'पावन लेख' लिखा था और उसके नीचे 'बम्बई।'

'शायद उन्नीसवीं सदी,’ मैंने टिप्पणी की।

'मुझे नहीं मालूम’ वह बोला, ' मैंने कभी यह पता नहीं किया।'

मैंने उस पुस्तक को कहीं से भी खोला, उसकी लिपि मेरे लिए अपरिचित थी। उसके जर्जर पन्ने मुद्रांकन की दृष्टि से ओछे थे व दो कालमों में छपे थे। जैसा कि बाइबिल में होता है। इबारत बिल्कुल पास-पास मुद्रित और संक्षिप्त पद्यों में संयोजित थी। ऊपर के कोने पर अरबी में पृष्ठ-संख्याएँ थीं। मेरा इस ओर ध्यान गया कि अगर बाँयें पृष्ठ पर (मान लो) 40514 छपा था तो उसके सामने के दाँएँ  पृष्ठ पर 999 था। मैंने अगला पन्ना खोला, उस पर आठ अंकों की संख्या पड़ी थी। छोटा-सा रेखांकन भी था, जैसा शब्दकोषों में होता है, पेन और स्याही से किसी बच्चे के-से अदक्ष हाथ से बना लंगर।

अजनबी बोला, 'इस रेखांकन को ध्यान से देखिये, इसे अब आप कभी नहीं देख पाएंगे।'

मैंने वह स्थान नोट कर पुस्तक बन्द कर दी। तुरन्त ही मैंने उसे दोबारा खोला। मैंने एक-एक पन्ना देख डाला, लंगर का रेखांकन कहीं नहीं था।

'यह किसी भारतीय भाषा में लिखे धर्मग्रन्थ का संस्करण जान पड़ती है,' अपना आतंक छुपाते हुए मैंने कहा।

'नहीं', उसने जबाव दिया। फिर, जैसे कोई रहस्य बता रहा हो, वह आवाज़ धीमी कर बोला, 'मैंने यह पुस्तक समतल पर बसे शहर में कुछ रूपयों और बाइबिल के बदले ली है। इसका मालिक पढ़ना नहीं जानता था। मुझे शक है कि उसके लिए 'पुस्तकों की पुस्तक' ताबीज़ थी। वह सबसे नीची जाति का था अलावा अछूतों के कोई भी उसकी परछाई पर बिना अपवित्र हुए नहीं चल सकता था। उसने मुझे बताया कि उसकी पुस्तक को रेत की किताब कहते हैं क्योंकि न उसकी पुस्तक का और न रेत का कोई आदि है न अन्त।'

अजनबी ने मुझसे पहला पन्ना निकालने को कहा। मैंने अपना बाँया हाथ आवरण पर रखा और अंगूठे को फ्लाईलीफ पर रखकर पुस्तक खोली। यह व्यर्थ था। जितनी बार भी कोशिश की, कुछ पन्ने मेरे अंगूठे और आवरण के बीच आ ही जाते थे जैसे वे पुस्तक से ही उग रहे हों।

'अब आखिरी पन्ना निकालिए।' मैं फिर विफल रहा। एक ऐसी आवाज़ में जो मेरी नहीं थी, मैं हकलाकर सिर्फ़ यह कह सका, 'यह हो ही नहीं सकता।’

वह धीमी आवाज़ में ही बोला, 'हो नहीं सकता पर है। इस पुस्तक के पन्नों की संख्या अनन्त से कम है न ज़्यादा। न कोई पहना पन्ना है, न आखिरी। मैं नहीं जानता कि इन पृष्ठों पर मनगढ़न्त संख्याएँ क्यों लिखी हैं। शायद यह इशारा करने कि एक अन्तहीन श्रृंखला की ज़द में कोई भी संख्या आ सकती है।'

फिर, जैसे बोलकर ही सोचते हुए उसने कहा, 'अगर स्पेस अन्तहीन है तो हम स्पेस के किसी भी बिन्दु पर हो सकते हैं। अगर काल अन्तहीन है तो हम काल के किसी भी बिन्दु पर हो सकते हैं।'

उसके विवेचन से मैं चिढ़ गया, ’तुम बेशक धार्मिक हो ?' मैंने कहा।

'हाँ, मैं गिरिजे का सदस्य हूँ। मेरा अन्तःकरण निर्मल है। मुझे ठीक ही विश्वास है कि मैंने इस शैतानी पुस्तक के बदले' इश्वर के शब्द’ देकर उस देशज आदमी से धोखा नहीं किया है।''

मैंने उसे भरोसा दिलाया कि उसे खुद को कोसने की ज़रूरत नहीं है और पूछा कि क्या वह संसार के इस हिस्से से महज गुज़र रहा है ? उसने बताया कि कुछ दिनों में वह अपने देश लौट जाना चाहता है। मुझे तब पता चला है कि वह आर्कनी द्वीपों से आया स्कॉट है। मैंने बताया कि मुझ स्टीवेन्सन और ह्यूम से अपने स्नेह के कारण स्कॉटलैण्ड के प्रति गहरा आकर्षण है।

'तुम्हारा मतलब स्टीवेन्सन और रोब्बी बर्न्स से है', उसने सुधार किया।

अपनी बातचीत के दौरान मैं उस अन्तहीन पुस्तक की लगातार जांच करता रहा। झूठी उदासीनता के साथ मैंने पूछा, 'क्या तुम इस अनोखी चीज़ को ब्रिटिश संग्रहालय को सौंपना चाहोगे ?'

'नहीं, मैं इसे आपको सौंप रहा हूँ।' वह बोला और उसने उस पुस्तक की ख़ासी कीमत लगायी।

मैंने पूरी ईमानदारी से कहा, ’इतना पैसा मेरी सामर्थ्य के बाहर है।’ लेकिन दो-तीन मिनिट में मुझे एक तरकीब सूझ गयी।

'मैं तुमसे एक सौदा करता हूँ’, मैं बोला।' तुमने यह पुस्तक थोड़े-से रूपयों और बाइबिल की एक प्रति के बदले ली है, मैं तुम्हें अभी-अभी मिले अपनी पेंशन के चेक का सारा धन देता हूँ और काले अक्षरों वाली वायक्लिफ़ बाइबिल जो मुझे विरासत में अपने पुरखों से मिली है।’

'काले अक्षरों वाली वायक्लिफ़', वह बुदबुदाया।

मैं शयन कक्ष में जाकर उसके लिए धन और पुस्तक ले आया। उसने पन्ने पलटे और शीर्षक-पृष्ठ को सच्चे बाइबिल-प्रेमी के उत्साह से देखा।

'मंजूर है', वह बोला।

मुझे आश्चर्य हुआ कि उसने भाव-ताव नहीं किया। यह मैं बाद में समझ सका कि वह उसे बेच देने के इरादे से ही मेरे पास आया था। उसने पैसे बिना गिने ही रख लिये।

हमने भारत के बारे में बात की, आर्कनी और उस पर कभी शासन करने वाले नार्वेजियन जार्लों  के बारे में भी। जब वह जाने लगा, रात हो चुकी थी। मैंने उसे फिर कभी नहीं देखा, न ही उसका नाम जानता हूँ।

पहले मैंने शेल्फ में वायक्लिफ़ की छूटी जगह पर रेत की किताब रखनी चाही लेकिन बाद में उसे एक हज़ार एक रातों के सेट में खाली हुई जगह पर छुपा दिया। मैं बिस्तर पर लेट गया और सो नहीं सका। सुबह के तीन या चार बजे मैंने बत्ती जलायी। मैंने उस असम्भव पुस्तक को निकाला और उसके पन्ने पलटने लगा। उसके एक पृष्ठ पर मुझे उत्कीर्ण मुखौटा दिखा। पृष्ठ के ऊपरी कोने पर एक संख्या लिखी थी जो मुझे याद नहीं रही, जिस पर नौ की घात थी।

मैंने अपना यह ख़जाना किसी को नहीं दिखाया। उसके अपने पास होने के सौभाग्य में, उसके चुरा लिए जा सकने का भय भी जुड़ा गया और यह अंदेषा भी कि शायद यह पुस्तक सचमुच अन्तहीन न हो। इन जुड़वाँ पूर्वग्रहों ने मेरे पुराने मानव-द्वेष को और गहरा दिया। मेरे पहले ही बहुत थोड़े-से मित्र थे, अब उनसे भी मिलना मैंने बन्द कर दिया। अब मैं उस पुस्तक का कै़दी था और मैंने घर से बाहर निकलना लगभग बन्द कर दिया। उसके घिसे हुए स्पाईन और आवरणों का लैन्स से परीक्षण करने के बाद मैंने किसी भी तरह के छल का अभाव पाया। मैंने पाया कि संक्षिप्त रेखांकन, दो हजार पृष्ठों की दूरी पर बने थे, मैंने उनकी क्रमवार सूची नोटबुक में बनाना शुरू की, जो शीघ्र ही भर गई। कोई भी रेखांकन दोहराया नहीं गया था। रात में अपनी अनिद्रा से छूटे अन्तरालों में मैं पुस्तक के सपने देखता।

गर्मियाँ आयीं और लौट गयीं। मैं समझ गया कि यह पुस्तक शैतानी है। लेकिन यह समझ कर मुझे क्या हासिल हुआ क्योंकि उस पुस्तक को अपनी आँखों से देखने व अपने हाथों से छूने वाला खुद मैं क्या कुछ कम शैतान हूँ। मुझे लगा यह पुस्तक दुःस्वप्नात्मक है, एक ऐसी अश्लील वस्तु जो यर्थाथ को ही लज्जित और लांछित कर रही है।

मुझे आग का ख्याल आया लेकिन मुझे डर था कि एक अन्तहीन पुस्तक का जलना कहीं अन्तहीन साबित न हो और सारा ग्रह धुएँ  से भर जाये। मैंने कहीं पढ़ा था कि पत्ती को छुपाने की सबसे अच्छी जगह जंगल है।

सेवा-अवकाश प्राप्त करने से पहले मैं मैक्सिको गली में, अर्जेन्टाईन राष्ट्रीय पुस्तकालय में काम करता था, जहाँ नौ सौ हज़ार किताबें हैं। मुझे मालूम था कि प्रवेश-द्वार के दाँयी ओर एक घुमावदार सीढ़ी तलघर को जाती है, जहाँ किताबें, नक़्शे और पत्र-पत्रिकाएँ रखे जाते हैं। एक दिन मैं वहाँ गया और पुस्तकाध्यक्ष के अन्यमनस्क होने का फायदा उठाकर और यह ध्यान देने से बचता हुआ कि दरवाज़े से कितनी ऊँचाई या दूरी पर हूँ, मैंने रेत की किताब को तलघर के धूसर शेल्फों में से किसी एक पर छोड़ दिया।

अब मुझे कुछ-कुछ हल्का लग रहा है पर मैक्सिको गली** से गुज़रने के ख़याल तक को मैं अपने पास फटकने देना नहीं चाहता।
####


                              [ अंग्रेजी से अनुवाद- उदयन वाजपेयी संगीता गुन्देचा .
साथ में दी गई चित्र-कृति यहाँ से . इस स्तम्भ के अंतर्गत छपी अन्य कथाओं को  पढने के लिए यहाँ आएं. ]

सन्दर्भ
*वह पुस्तक जिसके पन्ने एक शीट को आठ भागों में विभक्त करके बनाये जाते हैं, जो साधारणतः पाँच से आठ इंच लम्बी और छः से साढ़े नौ इंच चौड़ी होती है।

**अर्जेण्टाईना का राष्ट्रीय पुस्तकालय ब्यूनेस आयर्स में जिस जगह पर स्थित है उसे 'मैक्सिको गली' कहा जाता है।
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कथा : ५ : शशिभूषण

2:39 pm
छाछ

यह उतरते क्वार और लगते कातिक के एक दिन की बात है।

मुझे अब ठीक से याद नहीं कि कौन सा दिन था। कई साल हो चुके हैं इसलिए तारीख़ और वार याद न रह
जाने को समझा जा सकता है। उन दिनों खेतों में जुताई चल रही थी। धान-सोयाबीन की फसलें खलिहान में आ चुकी थीं। बारिश नहीं होने की वजह से परती हो रहे ऐसे खेतों को चने या मसूर की फसल के लिए जल्दी-जल्दी जोता जा रहा था जिन्हें किसी साधन से सींचा नहीं जा सकता। उस दिन पिताजी ने सुबह से ही बैलों को सानी खिलाने के बाद काँधे में हल्दी-तेल लगाकर उन्हें नोन-पिसान पिलाकर तैयार कर दिया था। वे यह ताक़ीद करके पहले ही खेत निकल गए थे कि जैसे ही छोट्टे भाई आएँ बैलों को लेकर खेत आ जाना।

गाँव में तब नहर नही आई थी। पिछले बीसेक साल से बाणसागर सिंचाई परियोजना
गाँव-गाँव आ रही है। सूखे कुओं का पानी बहाल होने ही वाला है। इसे क्षेत्र की धरती का घटता जलस्तर काबू में न आ जाए तो कहना....आदि-आदि केवल सुनने में आ रहा था। हाँ इस बीच मोबाईल और केबल कनेक्शन खूब आ चुके थे। निजी ट्यूबेल अब भी कम थे। बिजली की सप्लाई अनिश्चित रूप से ऐसी न्यून थी कि खेतों की सिंचाई के बारे में सोचना ही बेवक़ूफ़ी थी। हमारे आस-पास के गाँवों में किसानों ने एक फसल को ही अपनी नियति मान लिया था। धान की फसल काट ली तो गेहूँ की आशा नहीं। गेहूँ बोना हो तो चौमास भर खेत को पानी पीने दो। एकटक दशहरे का बिहान तको।

जो इक्का-दुक्का ट्यूबवेल थे भी तो हमारी हैसियत ऐसी नहीं थी कि तीन हार्स पावर की मशीन से चालीस रुपये घंटे पर उपलब्ध पानी से खेत सिंचवा सकें। जिनके पास बाँध थे,डीजल पंप था या पलेवा  करवा सकने लायक हैसियत थी वे ज़रूर इतने चिंतित नहीं होंते थे। पर हमारी औकात ट्रैक्टर से खेत जुतवा सकने लायक नहीं थी। दो सौ रुपये घंटे की दर से ट्रैक्टर का किराया हम जैसे चार एकड़ के किसानों के लिए असंभव सा था। बड़े-बड़े खेत हों तो कुछ सहूलियत भी हो जाती है पर हमारा कोई खेत आधा एकड़ से ज्यादा नहीं था। इनमें ट्रैक्टर से मुड़वाई में ही काफ़ी समय बर्बाद हो जाता है। खेतों के कोने बिनजुते ही रह जाते थे। दूसरी बात इतने छोटे खेतों की जुताई के लिए ट्रैक्टरवाले समय से तैयार हो जाएँ ऐसी उम्मीद करना खुद ही धोखा खाना।

वे तभी आते जब कहीं बड़ा काम नहीं होता था। पैसा भी काम पूरा होते ही चाहते। अब चार एकड़ के किसान के पास इतनी नगदी हर समय रहे तो सभी न खेती करना चाहें। छोटे किसानों को उधारी में ट्रैक्टर मानो मिलने ही बंद हो गए थे। इन्हीं मुश्किलों को देखते हमारे घर बैल थे। पिताजी की अतीत होती ज़िद थी कि अपना हल होगा तो जुताई का ताव भी मिलेगा और समय से काम भी हो जाएगा। सो, हमारे यहाँ हल चलता था। इसके कई फ़ायदे थे। धान,चना,सोयाबीन की समय से गहाई हो जाती थी। गोबर से ईंधन की समस्या भी दूर रहती थी।

लेकिन गाँव में हल इतनी तेज़ी से गायब हो रहे थे कि कुछ ही लोगों के घर किसी अजूबे की तरह हल-बैल थे। जिनके हल-बैल नहीं थे वे मिलने पर मज़ेदार ढंग से हल द्वारा जुताई की बड़ी तारीफ़ करते थे। कहते-
जुताई तो हल की ही होती है। ट्रैक्टर में आँतर रह जाता है। दो-तीन साल में खेत खरपतवार से भर जाता है। लेकिन पीठ पीछे हँसते थे, जमाना कहाँ से कहाँ पहुँच गया ये अभी भी बैल रखे हुए  होठी-तता युग में जी रहे हैं यहाँ तक कि हल से जुड़े खेती के पुराने औजारों के नाम यथा नगरा,चौंही,घुटकुल,ओइरा,बाँसा आदि लोग भूलते जा रहे थे।

अपने हल में यह सुविधा थी कि समय से काम हो जाता था। किसी की मिन्नत नहीं करनी पड़ती थी। लेकिन हलवाह मिलने में बड़ी कठिनाई थी। इस काम के लिए आदमी मिलना बहुत मुश्किल था। मजदूर छोटा-मोटा कैसा भी काम करने को तैयार थे, लेकिन हल जोतना उचित नहीं मानते थे। दूसरा सच यह था कि नये लड़कों को हल की किसानी तो दूर मूठ पकड़नी ही नहीं आती थी। हाल यह था कि गाँवों में कुछ पुराने जोतइया ही बचे थे। उनकी बहुत माँग थी। पर वे उम्र से ऐसे हो चले थे कि क्वाँर-कार्तिक के कड़े घाम में बैलों से पहले वही हाँफने लगते थे। जाँगर जवाब दे जाता था उनका। इन्हीं कारणों से हमें बड़ी मुश्किल होती थी। हम दो भाईयों में से किसी को हल चलाना नहीं आता था। ब्राह्मण घर में पैदा होने के कारण खेती का चाहे जो काम कर लें पर हल जोतने की सख्त मनाही थी।

पर हमारे पिता बड़े उपायी थे। उनकी मेहनत का कायल हर कोई था। खेती में उनकी ऐसी लगन थी कि हम दोनो भाई बुरी तरह अपने भविष्य से डर गए थे। बापराम हमारी डिग्रियों को किसानी में ही मिलाकर छोड़ेंगे। किसानी में मिला देना हमारा अपना मुहावरा था। जो हमने तब की पढ़ाई-लिखाई और लढ़ाई के बूते बनाया था। हम जिससे मिट्टी में मिला देना से बड़ा अर्थ निकालते थे। हँसते और खीझते थे। लेकिन हम पिता जितना श्रम सपने में भी नहीं कर सकते थे। न ही उतने हिकमतवाले थे। वे हर साल किसी न किसी हलवाह को मना लेते थे। नकद जुताई। दोपहर को बैलों की तकाई के एवज में खाना। सुबह खेत में बैल पहुँचाना और शाम को हाँक लाने का ज़िम्मा हमारा।

छोट्टे भाई जब आए तो मैंने देखा वे सबेरे से बिना कुछ किए ही पस्त जैसे हैं। गोया बीमारी से उठकर आ गए हों। पर हाल-चाल पूछने की मोहलत न थी। मैंने परछी से जुँआ निकालकर रख दिया। उन्होंने उसे हल में फँसा लिया। तब मैं उनसे तंबाकू खा लेने को कहकर तश्तरी ले आया। छोट्टे भाई ने अपनी डिबिया से तंबाकू-चूना निकालकर मला। सुपाड़ी काटकर लौंग के साथ मैंने उन्हें दे दी। लेकिन जैसे ही उन्होंने कंधे में हल रखने को उठाया लड़खड़ा गए। मूठ ज़मीन से टकरा गई। गिरते-गिरते बचे।
जी ठीक नहीं है क्या भाई ?” मेरे पूछने पर उन्होंने कहा नहीं कुछ नागा नही बस थोड़ी कमज़ोरी है।मेरी मजबूरी या क्रूरता कहिए कि मैंने उनसे ऐसी हालत में थोड़ी देर आराम कर लेने को नहीं कहा। मुझे बैल पहुँचाकर जल्द लौटना था।

मैं हल नँधवाकर जल्दी ही लौट आया था। घर आने के एक घंटे बाद खेत से पिताजी का संदेश आया कि छोट्टे भाई की हिम्मत जवाब दे गई। कुछ खेत कड़ा था। कुछ बैल भी गरिअरई कर रहे थे और मुख्य बात छोट्टे भाई का जी सुबह से ही लाचार था। पचपन-छप्पन की कमज़ोर देह। वे घाम सह नहीं पाए। दो बार उल्टी हुई। एक बार चक्कर सा आया और हराई पूरी होते न होते जोर का बुखार चढ़ा। फलस्वरूप हल ढील देना पड़ा। पिताजी ने छोट्टे भाई को घर जाकर सुस्ताने को कहा। इस हिदायत के साथ कि तबियत हल्की हो तो दूसरी जून थोड़ा पहले आ जाना क्योंकि खेत जितना जल्दी हो सके जुतना ज़रूरी है। दिनोंदिन ओदी जा रही है। साथ ही पिताजी ने कहलवाया था कि छोट्टे भाई के घर से कोई आए तो ताज़ा मट्ठा बनाकर अवश्य दे दिया जाए। गर्मी और पित्त बढ़ने की वजह से हुई इस बीमारी में मट्ठा रामबाण साबित होगा।

जैसा पिताजी ने कहा था वैसा ही किया गया।छोट्टे भाई के छोटे-छोटे नाती-नातिन दो लोटा मट्ठा ले गए।हम इंतज़ार करने लगे कि दोपहर बीते।मजूरी जून हो।और छोट्टे भाई ठीक होकर थोड़ा जल्दी खेत आ जाएँ।पर चार बज गए थे वे नहीं आए।

मुझ पर पिताजी दवाब डाल रहे थे कि मैं चमड़ौरी जाकर देखूँ छोट्टे भाई सचमुच बीमार ही हैं अब तक या अपनी जाति के अनुरूप ताश के फड़ में बैठकर सब भूल चुके हैं। उन्हे मज़दूरी न भी मिली तो क्या खेत तो हमारा बिगड़ेगा। मैं चमड़ौरी जाने से बचने पर ज़ोर दे रहा था,
कोई ठीक होने पर इस तरह घर में बैठेगा? वो भी छोट्टे भाई जैसा ज़िम्मेदार खेतिहर मज़दूर इंसान।पिताजी ने इस बात पर एक बहुत ही आपत्तिजनक अतिप्रचलित सवर्ण बात कही थी कि गँवारों का भरोसा नहीं। गगरी दाना शूद्र उताना बुजुर्ग यों ही नहीं कह गए हैं। तुम सलाह न दो जाकर देखो। और हो सके तो बुला लाओ।मैं तिलमिला गया था। पर पिताजी से बहस  करने लगने का यह वक्त नहीं था, सो चल पड़ा।

मैंने दरवाज़े से ही आवाज़ दी,
छोट्टे भाई  घर में हो क्या ?” अंदर से बीमार हाँफती हुई आवाज़ आई, कौन है ?” लगा जैसे दुआर से ही लगे कमरे में छोट्टे भाई बिल्कुल दीवार से सटे लेटे हैं। मैं दामोदर हूँ। मैंने चीखकर बताया। तब तक कई छोटे-छोटे लड़के-लड़कियाँ बाहर निकल आए थे। उनमें से एक बड़ी लड़की मुझे बता रही थी, दद्दा जोतने नहीं जाएगा उसे बुखार चढ़ा है।” “तुम दद्दा की कौन हो ?” मेरे पूछने पर उसने कहा नातिन।मैंने उसे गौर से देखा। दुबली-पतली। साँवले रंग की दस बारह साल की लड़की। हरे रंग के फीते से  बालों की दो चोटी किए हुए थी। मैंने उससे पूछा, तुम्हे कैसे मालूम मैं तुम्हारे दद्दा को जोतने के लिए बुलाने आया हूँ ?” “मुझे पता है। उसने कहा।कैसे मैं भी तो जानू।” “तुम और किसी काम को आते ही नहीं। दद्दा भी जोतने और घर छाने के अलावा कुछ करता नहीँ।” “अच्छा ये बात है ?”  “हाँ। उसने कहा। तभी एक औरत ने जो उसकी माँ हो सकती थी उसे एक थप्पड़ मारा, यह कहकर कि न रे इन्हें तुकारी मारती है। तुम्हें लाज नहीं आती।वह बिना रोए मुझे शिकायत से देखती हुई भीतर चली गई। अंदर मचिया में बैठिए बाहर क्यों खड़े हैं?” औरत ने तत्काल मुझसे आग्रह किया था।

मैं सकुचाते हुए भीतर पहुँचा। वहाँ लगभग अँधेरा था। चारों तरफ़ मक्खियाँ भिनभिना रहीं थीं। मेरी स्थिति से दिखनेवाले आँगन में ज़मीन पर एक गिलास लुढ़का था। एक अधखाई थाली रखी थी। पानी से भरे बाल्टी की बग़ल में अभी अभी बुझा चूल्हा था। छोट्टे भाई एक बेहद मैली कथरी ओढ़े खटिया में टाँगे समेटे लेटे थे। उन्होंने कराहते हुए कहा,
दादू खटिया में बैठो।मैं उनकी दाहिनी  तरफ़ की पाटी में बैठ गया। खटिया इतनी ढीली थी कि मैं उसमें पाँव झुलाकर नहीं बैठ सकता था। मैंने महसूस किया छोट्टे भाई को पाटी में बैठने से ऐतराज़ हुआ है। पाटी के भीतर बैठने में खटिया सुरक्षित रहती। लेकिन मैंने इसकी परवाह नहीं की। बीमार छोट्टे भाई से सटकर बैठने में मुझे अजीब लगता।
क्या हुआ  भाई बुखार उतरा नही ?” बुखार तो अब आया है तक़लीफ़ उल्टी दस्त की है। सुबह से पचीसों कै और दस्त हो चुके हैं।
कोई दवाई ली है ?”
दवाई घर में कहाँ रहती है। पुतऊ ने किसी से मँगवाई है तो वह साँझ रात जब ले आए।
सुबह से कुछ खाया पिया या खाली पेट  ही हो?”
बेटा भूख जैसे मर गई है। अन्न देखने का मन नहीं करता।
खिचड़ी खा लेते तो आराम होता। कमज़ोरी भी कम लगती।
खिचड़ी खाने का मेरा भी मन हुआ पर घर में दाल हो तब तो खिचड़ी बने।तो दाल भी मेरे यहाँ से मँगवा लेते।
पहले सोचा था फिर लड़कों के जाते-जाते याद ही न रहा।
मट्ठा पिया था? उससे तो कुछ राहत मिली होगी।हो सके तो और मँगवा लो।पेट ठंडा होगा।
मट्ठा तो नहीं पिया।
क्यों ?” मेरे यह पूछते ही निकट खड़ी बहू झट से बोली, मट्ठा मैंने इन्हें दिया ही नहीं कि कहीं बुखार में नुकसान न करे।” “पर इन्हें बुखार नहीं है पेट की बीमारी है। मट्ठा फायदा करता। अभी लाकर दे दो।आराम मिलेगा।” मेरी यह बात सुनकर उसका चेहरा उतर गया। उसमें ग्लानि दिखने लगी। जैसे उससे कोई बड़ा अन्याय हो गया है। वह बोली मैंने इन्हें मना कर दिया पर बच्चों को नहीं रोक पाई। सब बारी-बारी से सारा मट्ठा पी गए। अब तो छांछ की एक बूँद भी नहीं बची।

मैंने अचरज और सहानुभूति से छोट्टे भाई की ओर देखा। उनमें कोई शिकायत नहीं थी। उल्टे उन्होंने बहू को टोका,
क्यों नाहक ओरहन देती हो। बच्चे हैं, पी लिया तो पी लिया, अब अफसोस काहे का। मैं छाछ के बिना भी चंगा हो जाऊँगा।फिर वे मुझसे बोले, क्या करूँ मुझे पछतावा है कि आपका खेत मेरे कारण परती हो रहा है। पर अब लगता है मुझे दो चार दिन लग ही जाएँगे। मेरी राह देखने की बजाय किसी और को बुला लें। ठीक होने पर आगे के लिए मैं हूँ ही।
देखता हूँ क्या किया जा सकता है। तुम चिंता मत करो। पहले कायदे से अपना इलाज़ कराओ। मैं अब चलता हूँ।

मैं छोट्टे भाई के मौखिक पायलागी का जवाब देकर बाहर निकल आया था। उनकी बहू द्वार तक छोड़ने आई थी। उसकी नासमझी और फिर पछतावे पर मेरा मन भर आया था। तंग गली में बच्चे खुश खेल रहे थे। उन्हें देखकर मैंने सोचा इनकी आज की इस खुशी में शायद मट्टा पीने की भी बड़ी भूमिका होगी।

मेरे कदम अनायास तेज़ हो गए थे। खेत से बैल लाने होंगे।पिताजी को बताना भी है। वे रस्ता देख रहे होंगे। जिस हालत में छोट्टे भाई हैं, उसे देखते कोई दूसरा जोतइया खोजना होगा। वह जाने कौन होगा। पता नहीं किस गाँव से आएगा
!

यह पिताजी जानें। खेती उन्हीं की खब्त है, मैंने सोचा।
****
 

[शशिभूषण हिंदी के युवा कहानीकार हैं. फटा पैंट और एक दिन का प्रेम इनकी चर्चित कहनियों में शुमार है. अब तक प्रगतिशील वसुधा, बया, परिकथा, शब्दसंगत, और रसरंग (दैनिक भास्कर) में कहानियां प्रकाशित हुई हैं. यह नै कहानी उन्होंने सबद के कथा स्तम्भ के लिए दी है. इस स्तम्भ में अब तक आप आशुतोष भारद्वाज, संगीता गुंदेचा, हिमांशु पंड्या, उदयन वाजपेयी को पढ़ चुके हैं. कहानी के साथ दी गई चित्र-कृति सिराज सक्सेना की है. ]
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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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