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शताब्दी स्मरण : अज्ञेय


[ हिंदी साहित्य में अज्ञेय के अवदान को रेखांकित करना कुछ हद तक इसलिए भी कठिन है क्योंकि लेखक अज्ञेय पर बात करने में कतिपय दिक्कतों से दो-चार होते ही विज्ञ या सामान्य पाठक व्यक्ति अज्ञेय पर बात बनाने में सहूलियत महसूस करते रहे. उनके खिलाफ इस तरह एक पौलिमिक्स ही खड़ी की गई थी, जो हालाँकि वक़्त के साथ निष्प्रभ हो चुकी है, इधर यह नोट करना महत्वपूर्ण है कि अनेक बुद्धिजीवियों-लेखकों ने उन्हें नए सिरे से पढने-देखने का जतन किया है, जिनका अज्ञेय के विचारों से सीधा जुड़ाव कभी नहीं रहा. चंद्रभूषण उन्हीं के बीच से आते हैं और उन्होंने आग्रह करने पर अज्ञेय की कालजयी कृति ''शेखर : एक जीवनी'' पर एक भिन्न नुक्ते से लिखा है. हमें मालूम है कि अज्ञेय का जीवन, जैसा कि उनका साहित्य भी, भरापूरा और बहुवर्णी रहा है. उसे किसी एक नुक्ते से उभारने से उसकी आभा मिल सकती है, सम्पूर्ण आकर नहीं. उनके जन्म-शताब्दी वर्ष में सबद की ओर से यह विनम्र प्रणति. ]


शेखर : एक जीवनी अज्ञेय की सबसे चर्चित लेकिन अधूरी रचना है। उनके रचना-क्रम में यह कहीं बीच में पड़ती है- न सबसे पहले, न सबसे बाद में। हालांकि इसकी प्रस्तावना से पता चलता है कि कच्ची कॉपी या लंबे प्रारंभिक नोट्स के रूप में यह उनके पास बहुत पहले से, लगभग उनकी पहली रचना के रूप में मौजूद थी। कई लेखकों का ऐसा दावा होता है कि अमुक रचना उनके जेहन में पूरी की पूरी एक ही कौंध में आ गई थी, हालांकि इसे बाकायदा रचना का रूप देने में उन्हें काफी समय लग गया।

मसलन, जे. के. राउलिंग हैरी पॉटर सीरीज के बारे में ऐसा कहती हैं और इसके करीब चार हजार पेज पढऩे के बाद लगता है कि गलत नहीं कहतीं। ढाई सौ साल पहले वॉल्तेयर ने इस तरह का दावा अपनी रचना कांदीद के बारे में किया था, हालांकि इस मामले में रचना की कौंध और रचना प्रक्रिया के बीच कोई समयांतराल नहीं था। उनके घर से थोड़ी ही दूरी पर एक तर्कशील नौजवान को धर्मांध ईसाइयों ने जिंदा जला दिया था। इसके प्रतिकार में वॉल्तेयर अपने स्टडी रूम का दरवाजा बंद करके बैठ गए और बिना कुछ खाए-पिए लगातार छत्तीस घंटे लिखते रहने के बाद अर्धचेतन अवस्था में रचना पूरी करके ही बाहर निकले।

शेखर : एक जीवनी इन दोनों मिसालों से एक बुनियादी मायने में अलग है कि यह पूरी होकर ही नहीं देती। अपने संपूर्ण स्वरूप में नहीं, और संभवत: अपनी कौंध में भी नहीं। इसकी वजह शायद यह हो कि इसका स्वरूप आत्मकथा का है। शेखर की जीवनी होने के अलावा यह खुद अज्ञेय की आत्मकथा भी है। रीयल और फिक्शनल की एक ऐसी चढ़ाचढ़ी, जिसमें दोनों को अलग कर पाना अक्सर लेखक के बूते से बाहर हो जाता है। इससे इस रचना में एक अधूरे गीत का सा दुर्दम्य आकर्षण भी पैदा होता है, लेकिन वह अलग मामला है।

बाद में क्रांतिकारी आंदोलन के अपने साथी (और वैचारिक विरोधी) यशपाल की आत्मकथा सिंहावलोकन पर आलोचनात्मक टिप्पणी करते हुए अज्ञेय कहते हैं कि बेहतर होता अगर यशपाल यही सब बातें उपन्यास की शक्ल में कहते। ऐसा होता तो अपना नायकत्व साबित करने के लिए उन्हें कई बार सच के साथ खिलवाड़ करने की जरूरत नहीं पड़ती। एक ही आंदोलन की पृष्ठभूमि से निकली दो रचनाओं -- सिंहावलोकन और शेखर : एक जीवनी -- में मौजूद साझा सचाई का सत्यापन करना अब हमारे लिए संभव नहीं है। लेकिन सच के (अतिरिक्त?) आग्रह को अज्ञेय की रचना अधूरी रह जाने की एक वजह जरूर माना जा सकता है।

किताब की शुरुआत इस ब्यौरे के साथ होती है कि फांसी की सजा पाया हुआ शेखर ऐन फांसी के दिन अपनी कालकोठरी में बैठा अपनी जीवन यात्रा को समझने का प्रयास कर रहा है। इसका पहला खंड नायक/लेखक के राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन का हिस्सा बनने के साथ समाप्त होता है, जबकि दूसरे खंड के अंत में वह एक गहरे रूमानी रिश्ते की यातना से गुजरता हुआ असाध्य, अंतहीन, आत्मगत विद्रोह के बिंदु तक पहुंचता है। ऐसा कोई कारण समझ में नहीं आता, जो यहां से उसे किसी राजनीतिक अपराध के लिए फांसी की सजा तक पहुंचा सके। एक दुख का अंधकूप है, जिसके आगे सिर्फ भीतर-भीतर भोगना और लिखना ही बचा रह जाता है।

कोई सत्ता अगर इसी निरंतरता में उसे फांसी की सजा देने लायक पाती है तो यह चोर के धोखे में किसी नींद में चलते हुए आदमी को मार डालने जैसा होगा। नायक इस बिंदु से आगे अगर सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन या किसी अन्य राजनीतिक मुहिम में भाग लेता है तो इसके लिए उसके एक नए अवतार की जरूरत पड़ेगी। अफसोस कि तीसरे खंड का वायदा अधूरा रह जाने से इसका संधान कर पाना लेखक के लिए संभव नहीं हुआ।

किताब की प्रस्तावना 'प्रवेश' में एक भयानक दृश्य है, सिर्फ जिसके करीब पहुंचने के रोमांच में इस किताब के दोनों खंडों का एक-एक पन्ना चाटा जा सकता है। लेकिन प्रस्तावना के बाद दोबारा ऐसा कोई संदर्भ किताब में नहीं आ पाता। अभी का समय होता तो शायद कोई लेखक पर गलत-सलत विज्ञापन करके अपनी किताब बेचने का आरोप तक लगा देता।

एक बिखरा हुआ शव। उसके दोनों हाथ कटे हुए हैं। एक पैर कटा हुआ है, पेट खुल सा गया है और उसमें से अंतडिय़ां बाहर गिरी पड़ रही हैं। फटी-फटी आंखें ऊपर शाखों के जाल को भेदकर देख रही हैं किसी तारे को, और मुंह एक बिगड़ी हुई दर्द भरी मुस्कुराहट लिए हुए है....यही है उस कवि-हृदय सिपाही की अंत्येष्टि, उस विद्रोही के विद्रोह का अंतिम उफान।....
दृश्य फीका पड़ जाता है। एक निस्सीम श्वेत आकाश में पड़ा हुआ रह जाता है केवल वह शरीर जमते हुए रक्त के एक छप्पड़ में....उसके दोनों ओर दो आकार- एक स्त्री और एक पुरुष। वे एक दूसरे को देख रहे हैं। उनकी आंखें नीचे पड़े उस शव को नहीं देखतीं। उनके हृदय नहीं अनुभव करते कि कि वे किस भव्य पवित्रता की समाधि को भ्रष्ट कर रहे हैं। वे मिलते हैं, बाहों से एक दूसरे को घेरकर बांधते हैं, आलिंगन करते हैं किसी दानवी भूख से, और उसी शव के आरपार!

(दोनों उद्धरण उपन्यास से)

यह
कोई फंतासी नहीं है। कल्पना भी नहीं है। 'प्रवेश' से पहले लेखक पाठकों को शेखर के हवाले छोड़कर परे जा चुका है, लेकिन पढऩे से ऐसा लगता है कि किताब के इस हिस्से में कही गई सारी बातें हकीकत हैं। लेखक और शेखर की साझा हकीकत। भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के सशस्त्र क्रांतिकारी धड़े के कम से कम एक नायक भगवती चरण वोरा की मृत्यु कमोबेश उसी तरह- एक बम विस्फोट में- हुई बताई जाती है, जिस तरह इसका वर्णन यहां किया गया है।

सच्चिदानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' कुछ समय के लिए इस आंदोलन के कोर ग्रुप में मौजूद कुछ गिने-चुने लोगों में थे, लिहाजा उनके उपरोक्त गद्यांश के पहले हिस्से का प्रत्यक्षदर्शी होने पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता। लेकिन इसका दूसरा हिस्सा वे किसी पेड़ की आड़ में छुपकर नहीं, निश्चय ही अपनी लेखकीय कल्पना की आंखों से देख रहे हैं। गहरी वितृष्णा पैदा करने वाला यह हिस्सा किन लोगों के बीच मौजूद कैसे संबंधों की ओर संकेत करता है?

इस प्रसंग को यहीं छोड़कर हम अपने मूल प्रश्न पर वापस लौट सकते हैं। शेखर : एक जीवनी के अधूरे रह जाने का राज क्या है? क्या इस घटनाक्रम का इसके साथ कोई संबंध हो सकता है? यह सवाल इसलिए, क्योंकि उपन्यास के उपलब्ध दो खंड इसकी कोई व्याख्या किए बिना ही समाप्त हो जाते हैं। इसे दूसरी तरह पूछें तो- अपने बिल्कुल नजदीक घटा इतना लोमहर्षक घटनाक्रम भी लेखक को अपनी सबसे महत्वपूर्ण किताब का अंतिम खंड लिखने के लिए क्यों प्रेरित नहीं कर पाता (ताकि वह इसके बारे में लिखकर अपनी मूल प्रतिज्ञा पर डटा रहे और साथ में पाठक की जिज्ञासा भी शांत हो)? खासकर तब, जब वह अपने रचनाक्रम के अंतिम छोर पर नही, इसके कहीं बीच में हो!

क्या इसका अर्थ यह निकाला जा सकता है कि किसी भीषण मानसिक बाधा ने उसे इस रास्ते पर बढऩे से रोक दिया? क्या यह किसी अन्यतम राष्ट्रीय नायक के खिलाफ सार्वजनिक रूप से खड़े होकर समाज में अकेले पड़ जाने का भय था, जिसने जीवनी के तीसरे खंड के लिए उसे कलम उठाने से रोक दिया? किसी ऐसे नायक के खिलाफ, जो इस किताब के आने के बाद अपने बचाव में कुछ कहने के लिए इस संसार में मौजूद नहीं था (और इसीलिए जीवित रहने की तुलना में कुछ ज्यादा ही मौजूद था)?

यहां प्रसंगवश, फांसी से कुछ महीने पहले जेल में भगत सिंह और सुखदेव के बीच हुए उस पत्राचार को याद किया जा सकता है, जिसमें सुखदेव ने भगत सिंह के किसी चारित्रिक दोष की तरफ इशारा किया था। उनके आरोप के जवाब में क्रांतिकारिता और ब्रह्मचर्य के अन्योन्याश्रित संबंध को खारिज करने वाली भगत सिंह की बातें हर लिहाज से क्लासिक हैं और अब से सौ साल बाद भी अगर किसी के पास उन्हें खोजकर पढऩे की फुरसत हुई तो वह इन्हें किसी आधुनिक चीज की तरह ही पढ़ेगा।

शेखर : एक जीवनी के लेखक से यह पूछना जरूरी लगता है कि क्या किसी शहीद की पत्नी या प्रेमिका को किसी अन्य व्यक्ति के साथ प्रेम करने या यौन संबंध बनाने (दूसरे शब्दों में कहें तो एक स्वतंत्र व्यक्ति की तरह जीने) का हक नहीं है? अपने प्रिय की शहादत के बाद क्या उसे जीवन भर उसके नाम की माला उठाए फिरना चाहिए, मरते दम तक इस नैतिक प्रेतबाधा से ही घिरे रहना चाहिए कि ऐसा करके वह किसी 'भव्य पवित्रता की समाधि' को भ्रष्ट कर देगी?

इस उपन्यास को अपने समय के नैतिक मूल्यों पर घातक प्रहार की तरह देखा गया था। मौसेरी बहन के साथ प्रेम संबंध को उस समय (और काफी हद तक आज भी) इंसेस्ट (रक्त संबंधी के साथ यौन आचरण) की तरह देखा जाता था, जो इस उपन्यास की केंद्रीय विषयवस्तु है। और तो और, सुदूर दक्षिण में नायक के हॉस्टल प्रवास के दौरान एक जगह इसमें समलैंगिक प्रेम में भी गहरी गति नजर आती है। लेकिन दूसरी तरफ उपन्यास के पारंपरिक नैतिक आग्रह भी बहुत गहरे हैं। खासकर उन जगहों पर, जहां इनका संबंध क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ता है।

बहरहाल, इस आंदोलन में अपने दखल को लेकर लेखक की दुविधा चाहे जो भी रहे हो, लेकिन रचना की दृष्टि से इसे कंटेंट और फॉर्म का घातक टकराव ही कहा जाएगा। एक ऐसा फॉर्म रचना के लिए चुन लिया जाना, जो एक मुकाम पर पहुंचकर उसके कंटेंट से टकरा जाता है। लेखक के हाथ-पांव बंध जाते हैं और रचना अधूरी छूट जाती है।

अज्ञेय ने एक जगह मुक्तिबोध को अधूरी कविताओं का कवि कहा है, जिसे लेकर प्रगतिशील हलकों में आज भी आक्रोश देखा जाता है। लेकिन अधूरेपन की तकलीफ और उसकी ताकत, दोनों से खुद अज्ञेय से ज्यादा वाकफियत भला और किसकी हो सकती थी- जिसकी सबसे बड़ी और सबसे महत्वाकांक्षी रचना ही अधूरी रह गई हो! यानी मुक्तिबोध के बारे में कही गई उनकी बात का एक अन्य संदर्भ भी लिया जा सकता था, बशर्ते दोनों पक्षों में इसके लिए पर्याप्त सदाशयता होती।

बहरहाल, शेखर : एक जीवनी के अधूरेपन से इस रचना के बड़प्पन के बारे में कोई राय नहीं बनाई जा सकती। एक बड़ी रचना की तरह इसने अपनी भाषा को कुछ बड़ी मन:स्थितियां और कुछ बड़े पात्र दिए हैं, जिनके बारे में अलग से विचार करके हम शेखर के करीब पहुंच सकते हैं (कौन जाने खुद अज्ञेय से भी ज्यादा करीब!) अगर यह काम कभी किया जा सका तो इससे पैदा हुई रचनाकांक्षा किसी को शेखर की जीवनी का तीसरा खंड लिखने की तरफ ले जा सकती है।

अधूरी रचना पूरी करने का ऐसा काम, जिसे शायद दुनिया के किसी भी साहित्य में आज तक संपन्न नहीं किया गया। दरअसल, यह व्यवहार में ही नहीं, सिद्धांत रूप में भी असंभव है। ठीक उसी तरह, जैसे गणित में पाई (वृत्त की परिधि और उसके व्यास का अनुपात) का अंतिम मान ज्ञात करने का काम। फिर भी यह करणीय है- ठीक उसी तरह, जैसे पाई से जूझने वाले पिछले तीन सौ वर्षों में लगातार गणित को समृद्ध करते गए हैं।

वाम विचार सरणियों में आत्म से अधिक वस्तु और व्यक्ति से अधिक समाज के आग्रह ने ही शायद वाम आलोचकों में इस किताब के प्रति इतनी ज्यादा वितृष्णा पैदा की होगी। लेकिन आत्म तत्व की बहुतायत के बावजूद यह शेखर : एक जीवनी का गौण पक्ष ही है। ऐसा न होता तो नायक को हम एकाधिक बार ऐसे लोगों के सामने खड़े न पाते, जिनके घुटनों तक पहुंचने लायक भी (उन विशिष्ट स्थितियों में) वह खुद को नहीं पाता। उसे अपने युग के सबसे बड़े सामाजिक प्रश्नों- जाति, स्त्री, भाषा और राजनीतिक अवसरवाद- से जूझता हुआ न पाते, जो राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के पुरोधाओं की नजर से भी प्राय: अछूते रह जाते थे।

शेखर : एक जीवनी के तीन पात्र बाबा मदन सिंह, मोहसिन और शशि मूलभूत अर्थों में विद्रोही हैं। शेखर का जीवन उसकी जीवनी में जितना भी आ पाया है, इन तीनों पात्रों से कुछ न कुछ सीखते हुए ही गुजरता है- जैसे यह किसी सर्वांगीण विद्रोह की तैयारी हो।

इस नायक की सबसे अच्छी बात यह कि उसके अंदर सीखने को लेकर कोई हड़बड़ी नहीं है। किताब की शुरुआत से ही अपनी अद्वितीयता के अतिरिक्त आग्रह के बावजूद उसकी गरिमा यह मानने में है कि ये तीनों लोग बहुत गहरे हैं। उसकी पहुंच से कहीं ज्यादा गहरे। मोहसिन तो जलती हुई मशाल की तरह भभकता हुआ उसके सामने से गुजर भर जाता है लेकिन मदन सिंह और शशि की मुट्ठियां जरा बंद सी हैं। उनमें मौजूद चीजों की थाह पाने के लिए नायक बार-बार उन तक लौटता है। दोनों की कही हुई बातों के अर्थ उसके सामने कई बार खुलते हैं- हर बार पहले से कहीं ज्यादा बड़े आयाम अपने साथ लिए हुए।

मजे की बात यह कि किताब में सजा-ए-मौत भी इन्हीं तीनों को मिलती है, शेखर को नहीं। फांसी की बजाय कुछ दूसरी शक्लों में, जो हर मायने में फांसी से ज्यादा तकलीफदेह हैं। कहानी से अगर इन तीनों पात्रों को हटा दें, या किसी आग्रह-दुराग्रहवश ये हमसे बिसर जाएं तो किताब की संक्षिप्त छवि के रूप में पाठक के दिमाग में सिर्फ शेखर की ईडियोसिंक्रेसीज बची रहती हैं। आत्मश्रेष्ठता के कुछ बालहठ नुमा आग्रह, जिन्हें खामखा विद्रोह की वैचारिक आधारशिला की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है!
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7 comments:

शब्दहीन स्मरण शब्दों के चितेरे को !


आलेख को पढते ही शेखर के पुनर्पाठ की इच्छा बलवती हो उठी है. शेखर का चरित्र कोई साधारण चरित्र नहीं है.बहुत ही दिलचस्प और गूढ


Anuraag ji post k liye badhai. Is lek se sekhar ek jeevani ki smriti punah jaagrit ho jaati hai. Dhanyawad is padhane k liye.


Apko is Post ke liye badhai. Shekhar ka charitra adbhut hai. Kaee Yuva pathakon ko bhee ise padhane ka mauka mil jayega, shayad ab tak unhen yak mauka na mila ho.Agyey jee ka smaran kar aapne bahut achchha kary kiya hai.


bahastalab tippani hai.
aur krantikariyon ke itihas ke gahre adhdhyan ke liey bhi prerit karti hai. unke svpan, unki akanksha,naitiktaon se unke takrav, unke bich vyktitvon ka sangharsh, in sare pahloo se. yadyapi aapne jidhar ishara kiya hai. vah stri purush ek dusri jodi bhi ho sakti hai. ya fir agyey ke apne manojagat men us tarah ki bat rahi hogi. behad pida men bhi koi us stri ke sath ho sakta hai, is manovigyan ko shayd shekhar ke rachnakar ke liey samjhna mushkil tha. vaise us vishay pravesh ko chhod den to shekhar ek jivani aur dada comrade dono ko amane samne rakh ke padhna chahiey. buniyadi fark katha rachana ke prati dono ki manyataon ka bhi hai. khaskar ve patr jo karantikari hai, vah prayah lekhak ke agrah-purvagrah aur uske rachnatmak nishkarsh ya uski paribhashaao ya uske ytharthbodh ka atikarman kar jate hain. iska satik udaharan ha, jainendra ki mashoor kahani- patni, jo kahten hain bhagvati bhai aur durga bhabhi par likhi gayi thi. -sudhir


अज्ञेय के स्‍मरण के लिए बधाई ।परन्‍तु शेखर को हम तत्‍कालीन औपन्‍यासिक रचनाओं के मध्‍य ही मूल्‍यांकित कर सकते हैं ।अज्ञेय पर वार भले ही वामपंथियों ने किया हो ,परन्‍तु उनको नकारा नहीं गया ।


अज्ञेय के बारे में इतना कुछ जानना बड़ा अच्छा लगा।


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संपादन : अनुराग वत्स.

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