Sunday, February 06, 2011

शब्दों से गपशप : कुंवर नारायण



[ कुंवर जी की नोटबुक का एक हिस्सा आपने सबद पर पहले पढ़ रखा है. उसका दूसरा हिस्सा यहां दिया जा रहा है. यह चयन भी थीमैटिक है और मुख्य थीम की ध्वनि शीर्षक में सुनी जा सकती है. कुंवर जी समेत कुछ अन्य लेखकों की नोटबुक से चयन वक़्त-वक़्त पर सबद में प्रकाशित किये जाएंगे . साथ में दी गई तस्वीर गूगल से.  ]
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शब्दों से गपशप का शौक़ीन हूँ. आमतौर पर हम शब्दों को मौक़ा ही नहीं देते कि वे अपनी बात भी खुल कर हमसे कहें : उन्हें घेर कर उनसे अपनी ही बात कहलवाना चाहते हैं. लेकिन, खासे गपोड़िया होते हैं शब्द भी - बड़े बूढ़ों की तरह - यादों के अथाह भण्डार. मौक़ा मिले तो न जाने किन-किन ज़मानों के कैसे-कैसे अनुभव सुनाने बैठ जाते हैं. 

कभी-कभी देर रात तक चलती रहती है उनसे बातें. सो जाता हूँ तो नींद में भी अस्फुट कुछ-न-कुछ बोलते ही रहते हैं, अनाप-शनाप सपनों की भाषा में. लेकिन यह गपशप बेकार नहीं जाती. जब वे खुल कर, बेझिझक बोलते हैं तो अपने अंतर्मन में सदियों से छिपी तमाम भूली-बिसरी, दबी-बुझी बातों को भी कह डालते हैं. बस उन्हीं को पाने के लिए मैं शब्दों को खुली छूट देना पसंद करता हूँ...

कई तरह के शब्द होते हैं जिनसे तरह-तरह के शब्दों की दुनिया बनती है. ज़्यादातर शब्द तो मतलबी, लेन-देन, व्यावहारिक और व्यावसायिक मनोवृत्ति के होते हैं. ठोस ज़मीनी अर्थोंवाले शब्द. उनकी भी बातें सुनना ज़रूरी है. शारीरिक दुनिया में रहते उनकी अवहेलना नहीं की जा सकती. 

कुछ शब्द गुरु-घंटाल टाइप के होते हैं - चतुर, चालक, चंट - लेकिन कुछ शब्द सच्चे अर्थों में गुरुओं की तरह होते हैं. वे कम होते हैं. उन्हें खोजना पड़ता है. भीड़-भाड़  से दूर उनके एकांतों में जाकर, उनका शिष्यत्व करना पड़ता है. वे कम बोलते हैं, लेकिन जब भी बोलते हैं, मर्म और ज्ञान की बातें बोलते हैं. उन्हें ध्यान लगा कर सुनना पड़ता है, वरना उनकी बातें बिलकुल हवाई और अ-ठोस ध्वनियों की तरह सिर के ऊपर से निकल जाती है. कभी-कभी उनकी खोज में वनों और इतिहास की चोटियों तक जाना पड़ सकता है. ऐसा भी मुमकिन है कि वे शब्द न मिलें, उनकी जगह केवल एक ''मौन'' मिले. फिर भी, इस खोज का अपना अलग एक रोमांच है. अपने अन्दर एक अलग तरह का साहस और आत्म-विश्वास खोज पाने का आश्चर्य !
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कविता को पढ़ता या लिखता भी मैं कुछ इसी तरह की वजहों से. शब्दों के बीच ''विचरण'' और ''रमण'' ( कबीर की रमैनी) के  लिए. कुछ ''पाने'' या कहीं ''पंहुचने'' के लिए नहीं - भटकता हूँ शब्दों के बीच जैसे भटका जाता है ''विराट जंगलों'' में कहीं भी कुछ देर के लिए खो जाने के लिए. एक अदृश्य रहस्य हो जाने के लिए...

कभी-कभी लुकाछिपी का खेल खेलता हूँ शब्दों के साथ. वे अपने तमाम अर्थों को छिपाए रखते हैं, मानो मुझसे  कहते हैं कि मुझे ढूंढो तो जाने ! उन्हें खोजने की कोशिश में कभी-कभी  ख़ुद भी खो जाता हूँ अपने में, या उनमें. जब पाता हूँ तो चकित रह जाता हूँ कि अरे, वे तो बिलकुल पास ही मेरे एक बहुत बारीक़ परदे की आड़ में छिपे हुए थे.
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मुझे संस्कृत भाषा नहीं आती. संस्कृत भाषा तक पहुंचने का मेरे पास एकमात्र  साधन उसके शब्द हैं, उसका व्याकरण नहीं. मुझे फ्रेंच भी नहीं आती - या शायद संस्कृत की ही तरह - बहुत मामूली सी, बस इतनी कि उसके शब्दों को छू भर लूं. शब्दों का यह स्पर्श, कोरा स्पर्श, मुझे अच्छा लगता है. भाषा के बावजूद, कभी भाषा के सामानांतर, कभी भाषा के विरुद्ध उन शब्दों का मनमाना अर्थ करना अच्छा लगता है - वैसा अर्थ मैं हिंदी, अंग्रेजी  को लेकर नहीं कर पाता. जिन भाषाओं को मैं जनता हूँ उनके शब्दों के अर्थ पहले उन भाषाओं के अर्थ होते हैं - फिर मेरे अर्थ. उनमें शब्द, केवल शब्द, शुद्ध शब्दों को पाने का आनंद नहीं रहता - पाए हुए शब्दों द्वारा किसी पाए हुए अर्थ को दुहराने की मजबूरी सी रहती है.

किसी ऐसी भाषा का शब्दकोष उलटना जिस भाषा को अच्छी तरह नहीं जानता, जैसे फ्रेंच, जर्मन, इतालवी या पाली, संस्कृत : प्रत्येक शब्द अपनी जगह से कुछ कहता है - भाषा के आग्रह से स्वतंत्र कुछ. मेरा मतलब उन अर्थों से नहीं है जो शब्द के साथ दिए होते हैं, मेरा मतलब उन अर्थों से है जो दिए हुए अर्थों द्वारा संकेतित होते हैं. उसे एक ऐतिहासिक वस्तु की तरह सोचता हूँ, पढ़ता हूँ और अपनी तरह व्यख्याबद्ध करता हूँ - तब वह कोई अर्थ पाता है. सोचता हूँ, एक ऐतिहासिक ईमारत या शिल्प की तरह वह कितने विविध और विचित्र अनुभवों से गुज़रा होगा, कितने विभिन्न युगों में उसकी व्याख्या हुई होगी. अभी कितने दिन और किन-किन रूपों में वह जियेगा और कब तथा किन परिस्थितियों में उसकी मृत्यु होगी या वह मारा जाएगा !

क्या मैं उसे अपने लिए बिलकुल अपनी तरह अपनी कविता में बचा सकता हूँ ?
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भाषा के वृक्ष में लगे हुए शब्द जिन्हें तोड़ने की मनाही की तख्ती की भाषा सब से पहले पढ़ने में आती है. लेकिन जहां यह तख्ती पढ़ना ही न आता हो वहां एक बार तो शब्दों को वृक्ष से तोड़ कर चखने को जी चाहता ही है - बाद में इस अनाधिकार चेष्टा का दंड जो भी हो ! जहां कहीं कोई पका हुआ शब्द दिखाई देता उसे तोड़ने का लोभ संवरण नहीं कर पाता. 

भाषा के अनुशासन से मुक्त शब्दों की सत्ता. कभी-कभी सोचता हूँ केवल शब्द हैं भाषा नहीं, उनके साथ जुड़े निश्चित अर्थ नहीं, कुछ अनिश्चित अर्थों की यादें हैं. मैं उन यादों में हूँ - उन यादों को हलकोर रहा हूँ - उन्हें पंक्तियों में बांध नहीं रहा हूँ - पंक्तियों में बंधे शब्दों को खोल खोल कर बिखेर रहा हूँ, हवा में इधर-उधर उड़ा रहा हूँ. उनसे खेल रहा हूँ - उनका खेल बना रहा हूँ. 

खेल कभी भाषा के अन्दर है कभी भाषा के इर्दगिर्द, कभी भाषा के परे. मैं भाषा की ज़रूरतों के मुताबिक शब्दों को नहीं रख रहा हूँ : मैं शब्दों को लेकर एक नई भाषा रचने की कोशिश कर रहा हूँ, कोशिश में हूँ.

मैं मान लेता हूँ पहले शब्द रहे होंगे, फिर भाषा बानी होगी, फिर भाषा का व्याकरण बना होगा और इस तरह उस भाषा का आगे बनना बंद हुआ होगा. इसी तरह संस्कृत भाषा के साथ हुआ होगा. और मैं उस व्याकरण को नहीं जानता, तो मैं उस भाषा के शब्दों के साथ एक ऐसी जगह पर हूँ जहां मेरे सामने उन शब्दों को लेकर एक नई भाषा, कविता की भाषा में कोशिश करने की पूरी छूट और सम्भावना है.
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शब्दों के माध्यम से मैं कविता की एक नई भाषा, एक नई व्याख्या तक पहुँचने की कोशिश करता हूँ और कविता द्वारा एक खास तरह की मुक्ति का अनुभव करता हूँ - केवल ''भाषा'' से नहीं उन सब चीज़ों से भी जिनके साथ हमारी परिचित भाषा की शर्तें हमें एक खास तरह बंधती हैं कि हम उनके हैं, उनके बावजूद नहीं हैं.

यह अनुभव शायद मेरा अकेले का अनुभव नहीं है कि कभी-कभी एक शब्द एक पूरी कविता का स्रोत होता है. कविता भाषा से मुक्ति है. भाषा से मुक्ति एक खास तरह से उस दुनिया से मुक्त है जिसे व्यावहारिक भाषा संबोधित है.
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11 comments:

आवेश said...

हँसते - गाते ,ठिठोली करते शब्द ,नाराज शब्द ,उदास शब्द ,लाल ,पीले ,हरे ,गुलाबी टेढ़े मेढ़े शब्द, कुंवर नारायण के शब्द ,मंगलेश डबराल के शब्द ,हसरत जयपुरी के शब्द ,शकीरा के शब्द राधे खरवार के शब्द ,सबद के शब्द ,आओ खेले शब्द - शब्द .निःशब्द

प्रवीण पाण्डेय said...

शब्द, भाषा, अभिव्यक्ति, सुन्दर चित्रण।

mark rai said...

खेल कभी भाषा के अन्दर है कभी भाषा के इर्दगिर्द, कभी भाषा के परे. मैं भाषा की ज़रूरतों के मुताबिक शब्दों को नहीं रख रहा हूँ : मैं शब्दों को लेकर एक नई भाषा रचने की कोशिश कर रहा हूँ, कोशिश में हूँ.
.....सुन्दर अभिव्यक्ति.....

dinesh trapathi said...

speechless ,, apratim. is note par tippadi bhi shayad shabdon se khelne bolne -batiyane vala koyee shabd-gapod hi kar sakta hai. mai to sirf abhibhoot hu. kuvar ji ko naman. aap ko kotisha dhanyvad.

ssiddhant said...

पिछली बार की तरह ही, कुछ और ज़्यादा परिष्कृत तरीक़े से भाषा और उसकी चलन-कहन पर कुंवर जी का जो मत है, वह बड़ा संदेहास्पद और अनूठा है... संदेहास्पद होने से मेरा आशय - किसी भी भाषा के विकास को एक बने-बनाए ढर्रे से अलग देखना, जो कहीं से गैर-ज़रूरी नहीं है. "शब्दों" को नकार देना और उनसे होती हुई निर्माण-प्रक्रिया पर कुंवर जी और उन जैसे सभी की जो तल्ख़ निग़ाह है, वह कहीं न कहीं आज के हिन्दी साहित्य की दशा और दिशा को निर्मित करती हैं.

राजू रंजन प्रसाद said...

कुंवर जी ने सहज-सरल अंदाज में बहुत ही गंभीर बातें कही हैं. इसे पढ़ते हुए नागार्जुन की कविता की याद ताजा हुई जिसमें 'छले' गये शब्द सपने में धमका जाते हैं . बहुत सुन्दर पोस्ट के लिए साधुवाद.

Travel Trade Service said...

भाषा के वृक्ष में लगे हुए शब्द जिन्हें तोड़ने की मनाही की तख्ती की भाषा सब से पहले पढ़ने में आती है. लेकिन जहां यह तख्ती पढ़ना ही न आता हो वहां एक बार तो शब्दों को वृक्ष से तोड़ कर चखने को जी चाहता ही है
वाह ...कुवर जी ने शब्दों की माला को कही फेरते फेरते तोड़ दिया है और एक एक मनके का माला में होने का अर्थ समझ में आ रहा है. ....धन्यवाद आप का इसे हमारे बीच लाने का...NIRMAL PANERI

नवनीत पाण्डे said...

कई तरह के शब्द होते हैं जिनसे तरह-तरह के शब्दों की दुनिया बनती है. ज़्यादातर शब्द तो मतलबी, लेन-देन, व्यावहारिक और व्यावसायिक मनोवृत्ति के होते हैं. ठोस ज़मीनी अर्थोंवाले शब्द. उनकी भी बातें सुनना ज़रूरी है. शारीरिक दुनिया में रहते उनकी अवहेलना नहीं की जा सकती.

कुछ शब्द गुरु-घंटाल टाइप के होते हैं - चतुर, चालक, चंट - लेकिन कुछ शब्द सच्चे अर्थों में गुरुओं की तरह होते हैं. वे कम होते हैं. उन्हें खोजना पड़ता है. भीड़-भाड़ से दूर उनके एकांतों में जाकर, उनका शिष्यत्व करना पड़ता है. वे कम बोलते हैं, लेकिन जब भी बोलते हैं, मर्म और ज्ञान की बातें बोलते हैं. उन्हें ध्यान लगा कर सुनना पड़ता है, वरना उनकी बातें बिलकुल हवाई और अ-ठोस ध्वनियों की तरह सिर के ऊपर से निकल जाती है. कभी-कभी उनकी खोज में वनों और इतिहास की चोटियों तक जाना पड़ सकता है. ऐसा भी मुमकिन है कि वे शब्द न मिलें, उनकी जगह केवल एक ''मौन'' मिले. फिर भी, इस खोज का अपना अलग एक रोमांच है. अपने अन्दर एक अलग तरह का साहस और आत्म-विश्वास खोज पाने का आश्चर्य !
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बहुत ही अद्भुत और गहरी सार्थक गपशप है भाई! साझा करने के लिए आभार!

प्रशान्त said...

हमारी अभीव्यक्ती के माध्यम होने से अलग शब्दों की निश्चित ही अपनी एक दुनिया है. ये दुनिया शायद भाषा-संसार से भी दूर कहीं है. उस संसार से उठ कर शब्द खुद अर्थ के पास पहुंचे या उनके अर्थ उन्हें तलाशते उस लोक तक पहुंचे, लेखक ने न जाने ऐसे कितने शब्दों के रहस्य को पाया होगा. शब्दों के उस लोक में पहुंच कर उनसे बतियाते, उनके बीच विचरते, भाषा से अलग उनके अस्तित्व को नीहारते और इस सब के बाद भी कभी उनकी आवाज नहीं सिर्फ़ एक ’मौन’ को पाते न जाने कितने शब्दों को कुंवरजी ने अत्मीय बनाया होगा. शब्दों को एक ’ऐतिहासिक ईमारत या शिल्प की तरह’ ’बिलकुल अपनी तरह अपनी कविता’ में बचाये रखने की चिन्ता भी इसीलिये है कि वे उन्हें अपने लगते हैं.शब्दों के माध्यम से एक नयी भाषा तक पहुंचने का प्रयास, उन्हें तयशुदा अर्थों से अलग कर कविता में उन्हें नये सिरे से रचते ’एक खास तरह की मुक्ति का अनुभव’ हर किसी के लिये संभव भी नहीं.
कुंवरजी के ये नोट्स शब्द-भाषा-व्याकरण के उस जादू को तोड़ने का प्रयास है ’जिनके साथ हमारी परिचित भाषा की शर्तें हमें एक खास तरह बंधती हैं कि हम उनके हैं, उनके बावजूद नहीं हैं.’
शब्दों की आवाज सुनने को बाध्य कर रही हैं लेखक की पंक्तियाँ.
प्रस्तुती के लिये धन्यवाद.

डॉ .अनुराग said...

दिलचस्प !!!!

चन्दन said...

शब्दों की गरिमा और उसके अर्थार्थ पर बहुत अच्छी पोस्ट.

अनुराग, कुँवर जी की डायरी पर तुम्हारा ध्यान और गम्भीरता तारीफ की हकदार है. पिछला हिस्सा भी नायाब था.