Saturday, January 22, 2011

पीतालोक प्रसार में काल गल रहा है




हमें उन लड़कियों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए जिन्हें देखकर, मिलकर, बातें करते हुए या रेस्तरां में साथ चाय/कॉफ़ी पीते हुए हमारे मन में एक हूक उठी थी : एक हिचकी जो अब शांत है, पर जिससे पहली दफ़ा अंदाज़ा हुआ था कि हम प्यासे हैं, हमें पानी की ज़रूरत है ...

पुराने कमरे उन प्रेमिकाओं की तरह होते हैं जिनसे यों तो हमारा संबंध टूट गया है, पर जिनकी याद है, लगाव है, कभी-कभार का लौटना भी. आखिर उनके साथ इतना वक़्त जो गुजारा हुआ होता है हमने : निजी और आत्मीय.

हम प्रेम करते हुए अक्सर अकेले पड़ जाते हैं. दुःख इस बात का नहीं कि यह अकेलापन असह्य है. दुःख इस बात का है कि इसे सहने का हमारा ढंग इतना बोदा है कि हमसे वह आलोक तक छिन जाता है, जो प्रेम के इस सुनसान में हमारे साथ चलता.

कोशिश करके भूलना बेतरह याद की निशानी है. इसलिए हम कुछ भी भूलना अफोर्ड नहीं करते : न चीजें, न चेहरे, न हमारे साथ हुआ/अनहुआ. असल में विस्मृति स्वयं उन घटनाओं, चीज़ों, चेहरों और ब्योरों को हमसे अलग करती जाती है जिनका बेतुका संग-साथ हमसे बना रहता है.

इधर रात का रवैया कुछ ठीक नहीं. यों उससे अपनी पुरानी यारी है. कभी ऐसा भी रहा कि वह मुझ पर खूबसूरत-खामोश बीत जाती थी और मैं दिन भर उसी की खुमारी में बौराता रहता था. लेकिन दिल्ली में वह मेरे कहने में ही नहीं आती. एक तो उसमें इतना शोर भरा है कि मुझे आंख बंद करके भी दिन होना लगता है. दूसरे वह बीतती अपनी चाल से है. मैं सोचता था इतना स्त्रियोचित ममत्व तो होगा उसमें कि छटांक भर नींद ही डाल दे मेरी आंखों में! पर कहां? हालांकि आज का मेरा सच तो यही है कि मुझे रात की नींद और सुबह के आश्वासन के अलावा भी कुछ चाहिए. न सही बहुत मगर इतने से भी मेरा काम नहीं चलता.

दुपहर बारिश हुई. बारिश इतना और यह करती है कि सब एक छत के नीचे खड़े हो जाएँ.
वह मेरे बगल में आकर खड़ी रही. मुझे पहली बार ऐसा लगा कि उसे यहीं ऐसे ही बहुत पहले से होना चाहिए था और अभी इसे दर्ज करते हुए यह इच्छा मेरे भीतर बच रहती है कि हर बारिश में वह मेरे साथ हो.

आज दिन बहुत सुहाया. ठंडी बयार थी. धूप छुपम-छुपाई खेल रही थी. लगा नहीं कि ये गर्मियों के दिन हैं. मैं पेड़ की बदलती छायाओं में उठ-बैठ कर पढ़ता रहा. काफ्का कहते हैं एक जगह : ''एक बिंदु हो, प्यार हो, आदमी जान लड़ा देगा.'' मैं उस बिंदु पर एकाग्र होने की बजाय छिटक जाता रहा हूँ. मुझे उसे देखना चाहिए. वहां रहना चाहिए.

एक-एक दिन सरक रहा है : ''पीतालोक प्रसार में काल गल रहा है'' (मुक्तिबोध ).
****

[ पुरानी डायरी से कुछ सतरें. २००७-०८. कॉलेज के दिन.
साथ में दी गई तस्वीर ह्यूगो कसात की.]

51 comments:

'उदय' said...

... bhaavpoorn lekhan ... prasanshaneey !!

addictionofcinema said...

kahani likho anuraag
bhasha ki mang hai....

Dinanath said...

कोशिश करके भूलना बेतरह याद की निशानी है. इसलिए हम कुछ भी भूलना अफोर्ड नहीं करते. Ye sabse badhiya likha gaya hai. A very keen observation that comes with experience and superb intellect! Wonderful.....!!!

Travel Trade Service said...

प्रेम के अनछुए पहलुओं की गुम अभिव्यक्ति है कहीं...उसका फिर से अंतर में में सृजन किया है शब्दों में . सुन्दर शब्दों का रूप दिया है मन की अभिव्यक्ति को.मुझे बहुत अच्छी लगी. कही में खुद जी रहा .हूँ यहाँ पढ़ने के बाद ...शुक्रिया अनुराग जी ...Nirmal Paneri

Akbar M A Rizvi said...

कहते हैं जब भाव अपनी पूरी क्षमता और त्वरा के साथ आते हैं तो शब्दों की कमी नहीं पड़ती और भटकाव भी नहीं आता। पीतालोक प्रसार में काल गल रहा है.., पढ़कर कुछ ऐसा ही लगा। मासूम भावों की बोधपूर्ण अभिव्यक्ति।

प्रवीण पाण्डेय said...

कॉलेज के दिनों में हमारा चिन्तन तो मुँह ढके सो रहा था।

अमिताभ श्रीवास्तव said...

हां, वो कादंबिनी ही होगी, जिसमे कभी पढा करता था 'काल चक्र', अच्छा लगता था पढना, मगर बदलते विचार काल के बाद वो लेखन भी बदला और शायद अब बन्द हो गया है। बहुत दिनों बाद कुछ उसी तरह का मिलता-जुलता लेखन देखा तो प्रसन्नता हुई। उक्तियों में एक अनुभव संसार गोता लगाता है..डायरी के नोट्स हों या मन के टुकडे सब सधे से हृदय में घुसते हैं और फिर यकीनन यही लगता है कि एक-एक दिन सरक रहा है : ''पीतालोक प्रसार में काल गल रहा है''

गिरीन्द्र नाथ झा said...

मैं प्रवाह में बह गया, यादों में जैसे खो गया। इस पोस्ट को पढ़ने के बाद बस यही कहूंगा।

parag mandle said...

पुराने कमरे उन प्रेमिकाओं की तरह होते हैं जिनसे यों तो हमारा संबंध टूट गया है, पर जिनकी याद है, लगाव है, कभी-कभार का लौटना भी. आखिर उनके साथ इतना वक़्त जो गुजरा हुआ होता है हमने : निजी और आत्मीय.............क्या बात है. इस पूरी पोस्ट को पढ़ते हुए लगा जैसे मैं अपनी ही किसी अनलिखी डायरी की पंक्तियां पढ़ रहा हूं। एक बहुत दिन से उपेक्षित रहे पुराने कमरे की याद दिलाने के लिए शुक्रिया अनुराग।

NP said...

Boht khoob...Bhootkal to nikal chuka hai, vartamaan ki panktiyaan kab padhne milengi?

चन्दन पाण्डेय said...

बहुत सुन्दर गद्य. भाषा से सुन्दर भाव हैं. विमल की बात मानने का समय है.
तुम्हारे लिये : न बचा बचा के तू रख इसे ये आईना है वो आईना.... बाकी तुम समझदार तो हो ही.

Dhananjay sharma said...

अनुराग भाई आपकी इस डायरी नें मुझे तीन साल पहले की याद दिला दी। आपकी इस डायरी को पढ़ने के लिए मैंने आपसे कितनी बार आरजू की, आखिरकार एक दिन आपने अपनी डायरी मुझे पढ़ने के लिए दे भी दी। इसके लिए मैने आपको उस समय भी धन्यवाद दिया था और आज अपनी डायरी की पंक्तियों एक बार फिर से पोस्ट करने के लिए आपका आभार।

शिरीष कुमार मौर्य said...

bahut sundar bhasha aur abhivyakti anurag! ekantik...niji par...behad arthpoorn...mujhe sabad par hi chhapi ashutosh ki dairy yaad aayi.

dinesh trapathi said...

anurag bhai, sunder abhivyaki hai.badi pravahpoorn, komal bhasha ne prabhavit kiya.aapki dairy ke is ansh ne aapke collage ke dino me jhankne ka avsar diya.prem ki sookshm samvedna hai yahan. sach bhoolna to tab hua jab ye bhi bhool jayen ki kya bhool gaye. varna to fir koshish karke bhoona ek tarah se betarah yad karna hi hai. achchha laga aapke likhe me doobna, shukriya.

merinajrmeranajria said...

... बारिश इतना और यह करती है कि सब एक छत के नीचे खड़े हो जाएँ.... "बहुत बढ़िया वाकई" और आपकी दीवारों में हमेशा रहने वाली खिड़की कि जगह नही रही वरना पुराने ख्याल, ख्वाब और पुराने प्यार की याद सब ताजा रहती... मजा आया पढ़ कर

चण्डीदत्त शुक्ल said...

रुंधे गले में महज हिचकियां और थरथराती अंगुलियां, लो आंख से फिर टपका एक आंसू...बेहया, इस बार उसे समेट लेने के लिए किसी की अनामिका भी नहीं...। स्तब्ध और उत्कंठ करते हो अनुराग। शाबाश यार...

महेश वर्मा said...

लगा जैसे एक प्रेमकविता पढ़ रहा हूँ .. सुन्दर टेक्स्ट है भाई . बधाई .

नवनीत पाण्डे said...

कोशिश करके भूलना बेतरह याद की निशानी है. इसलिए हम कुछ भी भूलना अफोर्ड नहीं करते : न चीजें, न चेहरे, न हमारे साथ हुआ/अनहुआ. असल में विस्मृति स्वयं उन घटनाओं, चीज़ों, चेहरों और ब्योरों को हमसे अलग करती जाती है जिनका बेतुका संग-साथ हमसे बना रहता है.

कालेज के दिनों इस तरह की गहरी बातें! गज़ब!

भरत तिवारी said...

सुन्दर
अति सुन्दर
....
.. पर जिनकी याद है, लगाव है, कभी-कभार का लौटना भी. आखिर उनके साथ इतना वक़्त जो गुजरा हुआ होता है हमने
साधुवाद

mark rai said...

haan anuraag jee ....mujhe inhe dekh kar wo din yaad aa raha hai jab mai aapki diary sunta tha ....yaad hai aapne ek baar khichadi se shuruat kar puri society par hi prhaar kiya tha....
...कोशिश करके भूलना बेतरह याद की निशानी है. इसलिए हम कुछ भी भूलना अफोर्ड नहीं करते : न चीजें, न चेहरे, न हमारे साथ हुआ/अनहुआ. असल में विस्मृति स्वयं उन घटनाओं, चीज़ों, चेहरों और ब्योरों को हमसे अलग करती जाती है जिनका बेतुका संग-साथ हमसे बना रहता है.

....in lines ne man ko chu liya...thanks for posting...

Rahul Singh said...

एक तार ऐसा छेड़ा है कि पूरी वीणा झंकृत हो गई है.

अखिलेश चंद्र said...

आपकी डायरी पढ़कर न जाने क्यूं ऐसा लगा कि आपने ही ज़िन्दगी जी है.

Dr Shaleen Kumar Singh said...

really human>>>>मैं उस बिंदु पर एकाग्र होने की बजाय छिटक जाता रहा हूँ. >>

राजीव थेपड़ा said...

baap re......mujhe to kucch-kuchh hone saa lagaa hai....yah padhakr....!!

Umesh Pant said...

अनुराग भाई पढ़कर बहुत अच्छा लगा। छोटी छोटी पंक्तियों में बड़ी बड़ी बातें कह जाने के इस हुनर की वजहकर आपको बार बार पढ़ने का मन होता है। पुरानी डायरी की इस नयी सी तरोताजा करती सी पोस्ट के लिये शुक्रिया।

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

डायरियों में कितने भेद भरे कोने होते हैं.. कुछ सेंसुअस सा होता है कि उन्हें पढने के बाद कुछ देर तक हम उसके लिखने वाले जैसे हो जाना चाहते है और वो सब जानना चाहते हैं जो नहीं लिखा गया.. जो बिटवीन द लाइन्स रह गया जैसे उस बारिश के बाद क्या वो वहाँ फ़िर मिले? जैसे उस कमरे में और क्या था? जैसे... न जाने कितना तो ’कुछ’

’ऎडिक्शन ऑफ़ सिनेमा’ जी से सहमति है हमारी.. अनुराग भाई आपकी कहानी का इंतजार रहेगा..

anjule shyam said...

काफ्का कहते हैं एक जगह : ''एक बिंदु हो, प्यार हो, आदमी जान लड़ा देगा.'' मैं उस बिंदु पर एकाग्र होने की बजाय छिटक जाता रहा हूँ. मुझे उसे देखना चाहिए. वहां रहना चाहिए..
वावो शानदार...दिल निकाल कर रख दिया है आपने तो ...पुराने कमरे और स्मृतिय....शानदार...फ़िलहाल इसे buzz पर शेयर कर रहा हूँ...

विभास said...

dilkash

Brajesh Kumar Pandey said...

समय के साथ पीले पड़ चुके डायरी के पन्नों की अपनी एक गंध होती है जिनपर उगे हुए शब्दों की जड़े अंतरात्मा में अपना गुच्छ बनाये रहती है.ये पुरानापन भी एक ताजगी लिए होता है.भाषा और भाव के स्तर पर इसे पढकर लग रहा है कि अनुभूतियों को यथावत प्रस्तुत कर पाने की विलक्षणता आने वाले दिनों में कुछ और सार्थक देनेवाली है.

पारुल "पुखराज" said...

हम प्रेम करते हुए अक्सर अकेले पड़ जाते हैं. दुःख इस बात का नहीं कि यह अकेलापन असह्य है. दुःख इस बात का है कि इसे सहने का हमारा ढंग इतना बोदा है कि हमसे वह आलोक तक छिन जाता है, जो प्रेम के इस सुनसान में हमारे साथ चलता. shukriya Anurag

शैलेन्द्र नेगी said...

सुंदर नौस्टेल्जिक लेखन. इससे प्रेमिकाओं के साथ साथ पुराने कमरों की याद भी ताजा हो गई. आपके लेखन ने एक ऐसे जख्म को हरा कर दिया जो चाहते हुए भी अभी नहीं भरा.

poonam said...

tum packaging achhi karte ho. ek khoobsoorat presentation ke tarah apni dairy ko hum sabko padne ko dete ho. hum sab hi shayad raat ki neend, subah ka aashwasan ke sath saanson ke vishwas par tike hain. baaki sab aaye to welcome nahi aaye to bheedkum.

अविनाश वाचस्पति said...

काश, ये दिन हमें नसीब हुए होते। पर काल क्रूर भी है और अनुभूतिप्रदायक भी।

sangeetaa said...

ACHHA HAI "HOOK" YANI INFATUATION AUR PREM ME ACHHA DIFERENTIATE KIYA,AGE K DIFFERENT PAHALUON KO POETIC ANDAAJ ME TOUCH KIYA, RHYTHMIC PROSE!

Madhurima said...

when i was reading this i felt i can see the images like a film.. and there's insight and deep thoughts.. there is something in this that when i read this there was a feeling that something is drilling inside.. superb!! And there is a 'controlled' desperateness throughout which i really liked..

Ratnesh said...

पुराने कमरे उन प्रेमिकाओं की तरह होते हैं जिनसे यों तो हमारा संबंध टूट गया है, पर जिनकी याद है, लगाव है, कभी-कभार का लौटना भी. आखिर उनके साथ इतना वक़्त जो गुजरा हुआ होता है ....
bahut khub...

akash said...

prem, yadein, bhag daud wali zindgi..sab jaake kahin us bindu pe milne ki koshish kar rahi hai........

Pawan Nishant said...

नहीं..नहीं..प्रेम करते हुए हम कभी अकेले नहीं होते, होता है कोई जो न होते भी होता है और जो कहता है बात करो मुझसे। और हम हर समय उससे इतनी बातं करते हैं, जितनी शायद तब नहीं की, जब वो था हमारे साथ। भूलना अफोर्ड नहीं कर सकते। खाली, पुराने और सीलन भरे कमरे जैसे ही हों पर होते हैं...
http://yameradarrlautega.blogspot.com

रंजीत/ Ranjit said...

top class translation of feelings in to words. go ahead.

nilm said...

a little scratch and all those memories are back....certain things never become the dead wood of the past...jaise purani dairy k purnay pnnay kbhi purnay nhi pdtay...and this comparison ,purni premikayan aur choday huay kmray,wah! kya baat hai....

Fauziya Reyaz said...

ohhhooo....bahut pyara
aapki observation kamaal hai, premika- purana kamra, koshish karke bhoolna - yaad ki nishani

amazing

purvi said...

"महीन यादों के निर्मल निर्झर,
थक कर सोये सपनों का आभास,
गुनगुना उठे संग तुम्हारे,
बंद खिड़कियों के तरल एहसास."

बहुत सुन्दर डायरी के अंश हैं अनुराग. प्रेम को इसके शुद्ध रूप में जीने की अनुभूति दे रहे हैं जैसे. मन मोहक लेखन के लिए बधाई.

manoj chhabra said...

'...हम प्रेम करते हुए अक्सर अकेले पड़ जाते हैं. दुःख इस बात का नहीं कि यह अकेलापन असह्य है. दुःख इस बात का है कि इसे सहने का हमारा ढंग इतना बोदा है कि हमसे वह आलोक तक छिन जाता है, जो प्रेम के इस सुनसान में हमारे साथ चलता.

कोशिश करके भूलना बेतरह याद की निशानी है. इसलिए हम कुछ भी भूलना अफोर्ड नहीं करते : न चीजें, न चेहरे, न हमारे साथ हुआ/अनहुआ. असल में विस्मृति स्वयं उन घटनाओं, चीज़ों, चेहरों और ब्योरों को हमसे अलग करती जाती है जिनका बेतुका संग-साथ हमसे बना रहता है...'
पहली बार डायरी के अंशों को पढ़ा तो एकदम निर्मल वर्मा की 'धुंध से उठती धुन' की याद ताज़ा हो आयी... गद्य में इतने खूबसूरत बिम्ब आमतौर पर देखने को कहाँ मिलते हैं... अनुराग एक उजली उम्मीद जगाते हैं...

अंशुमाली रस्तोगी said...

वो पुराने दिन। वो यादें। वो बातें। एक अद्भूत अभिव्यक्ति के साथ। बहुत सुंदर। याद आ गए छांवभरे पुराने दिन और पुराने बिछड़े साथी भी।

manoj said...

बहुत बढ़िया ,लगा एक उदास प्रेमिल कविता पढ़ रहा हूँ

Manohar said...

bhatkna or fir bhatak kar laut aana, magar is bhatkav me bahut kuch badal jaata hai. Hum wo nahi rah jaate jo nikla tha ghar se magar bindu se prithak hokar, chitak kar fir bhi hum usi me sama jaana chahte hai....waise to ye smritiya alag-alag hai magar milkar ek narrative ka roop hi leti hai Anurag bhai jiska ek chhor to bindu ki or hi hai, magar jab bhikraw waha se hota hai wah apko apne andar hi le jata hai jiske khoj k kuch ansh to dikh hi jaate hai in diary k panno me.....jaha aapki vyatha smriti se hai apitu ek search us solitude ki taraf bhi hai jaha smriti ka matlab hi kuch or ho jata hai....bahut hi sundar, baar baar padha or padh kar sochta raha ki kya likhu magar ant me jo bhi likha aapki diary k baare me kam hi dikhta hai....

rajeev matwala said...

anchuye pahluon ko chua hai. meri shubhkamnayen

Times said...

Though i couldn't understand much but its quite involving...

Rukaiya said...

kam lafzon mein yun zindagi ke har pahlu ko pirona aur khubsurat shabon ki ye jaadugari ,,waqi dilkash hai ...
Badhai ..

अनुपमा पाठक said...

Awesome!!

Ranjana Dubey said...

स्कूल और कॉलेज के दिनों में लौटना उस पहले प्रेमी और प्रेम से भी ज्यादा प्रिय है।जवानी की दहलीज़ को लांघ कर थोड़ी दूर चलने के बाद इंसान में बहुत कुछ को लेकर अंदर बड़ी कुलबुलाहट होती है।...👌