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अशोक वाजपेयी पर उदयन





[ हिंदी के वरिष्ठ कवि-लेखक और संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी १६ जनवरी २०११ को सत्तर के हो रहे हैं. उनकी उपस्थिति, कविता और बहुस्तरीय सक्रियता पर हालाँकि पहले भी लिखा गया है, लेकिन इतना सहोदर, आत्मीय और वस्तुनिष्ठ होकर उन पर उदयन ही लिख सकते थे. ]  



मैं विलाप करता हूँ
पर क्यों ?

उदयन वाजपेयी

(मैं इस पूरे लेख में उन्हें अशोक कहूँगा। यह मैंने पहले कभी नहीं किया है। हम सभी भाई-बहन उन्हें गुड्डन भैया कहकर बुलाते हैं लेकिन मैं इस निबन्ध में उन्हें ‘अशोक‘ नाम की दूरी से देखने की कोशश करना चाहता हूँ। इससे इस निबन्ध में वस्तुनिष्ठता भले न आ पाये पर कम से कम मेरी कल्पना को भटकने का अधिक अवकाश मिल जाएगा।) 


1
विलाप

मैं विलाप करता हूँ:
बना नहीं पाया ऐसा घर
जिसमें रहते दिदिया-काका, अम्मा-दादा, बाबा
ऋभु के साथ,
जिसमें कई सदियाँ न सही, कम से कम एक सदी होती
आँगन की तरह चौड़ी-खुली;
जिस पर लगे कठचन्दन या बकौली के नीचे
सब जमा होते भोजन के लिए;
जिसमें मलाई की बरफ़ और लँगड़े आमों के साथ
कटहल का अचार, दलभजिया, भरे करेले होते
मटर-पनीर, छोले, नान के साथ;
जिसमें परछी में कभी मिरज़ापुर के पण्डितजी
रामचरितमानस पर प्रवचन करते
और कोई लैम्प के नीचे बैठा करता रहता
ज़्बीग्न्येव हर्बेर्त की कविताओं का हिन्दी अनुवाद;
जिसके भारी लकड़ी के दरवाजे़ सुबह पाँच बजे से
रात ग्यारह बजे तक लगातार खुले रहते
और जिसका होता न कोई चौकीदार;
जहाँ एक किनारे बैठकर
मैं आनन्दमोहन दादा से सुनता रह सकता
निराला और रामचन्द्र शुक्ल के संस्मरण।

मैं विलाप करता हूँ ;
रह नहीं पाया ऐसे मोहल्ले में
जिसमें सुबह-सुबह पार्क में टहलते मिल जाते
कई पिछली-अगली सदियों के लोग, स्त्रियाँ और बच्चे;
जिसमें परचूनी की दूकान, महादेव मिठया की मिठाइयाँ,
कहवाघर, मिल्कबार, आइस्क्रीम की दुकानें होतीं,
और दरज़ी बारहवीं सदी की पोशाकें रफ़ू करते हुए;
कुंजड़ा तेइसवीं सदी की ताज़ी सब्जियाँ पानी से धोकर सजाते हुए,
जिसमें शमशेर मिलते एक मौजूँ शब्द की खोज में भटकते हुए
और व्याकरण की परवाह किये बिना
असम्बद्ध कविता-पंक्तियों से उपन्यास लिखता हुआ एक स्कूली बच्चा;
जिसमें दौआ बाबा की बैलगाड़ी खेतों की तरफ जाती हो
तो उसकी बगल से जाती जूनू की ज़ेन आगे न जाना चाहती।

मैं विलाप करता हूँ;
ऐसा शहर नहीं खोज पाया
जिसके चारों ओर परकोटा हो बर्बरों को रोकने के लिए,
जिस पर उपहारस्वरूप खिली हों
फूलों की रंगारंग क्यारियाँ,
जिसके बाज़ार में बगदाद की कीमख़ाब बेचते हो सौदागर
अमरीकी सैनिकों को;
जहाँ लाहौर के कबाबों और गोश्त  दो प्याज़ा के कार्नर के बगल में हो
थाई फ़ास्टफूड और ग्रीक खाने की दुकानें
जड़ी-बूटियाँ तुर्की से;
बीच चौक में पुस्तकालय हो किसी राजप्रासाद से अधिक भव्य
जिसमें बटन दबाते ही
कबीर और शेक्सपीयर की पंक्तियाँ आ जाएँ
कम्प्यूटर के परदों पर असंख्य भाषाओं में।

मैं विलाप करता हूँ ;
सिर्फ़ कविता में
क्योंकि उससे बाहर विलाप और स्वप्न दोनों के लिए
अब कोई जगह नहीं बची।

2
हम अपनी माँ को दिदिया कहते थे जो उद्धृत कविता की तीसरी पंक्ति में हैं। जितनी सहजता से अशोक उन्हें उसी नाम से अपनी कविताओं में ले आते हैं, मैं कभी नहीं ला पाया। यह इसलिए कि वे उनके बेहद करीब थे। बड़ा बेटा, बेटा होने के साथ माँ का मित्र भी होता है जबकि छोटा बेटा हमेशा ही उसे बहुत पास पर साथ ही बहुत दूरी से देखता है खासकर तब जबकि उसके और माँ के बीच सात अन्य भाई-बहन हों। यह इसलिए भी है कि अशोक के मानस और काव्य में ‘मम‘ और ‘ममेतर‘ के बीच वैसी दूरी नहीं है जैसी हिन्दी के कई समकालीन कवियों के यहाँ है जिसके कारण उनकी कविताओं में वस्तुनिष्ठता भले ही आ जाती हो पर अक्सर रस का वैसा सोता नहीं फूट पाता जैसा अशोक की कविताओं में अक्सर हुआ करता है।

यहाँ अद्वितीय हिन्दी कवि कमलेश की कविताओं को याद करना समीचीन होगा क्योंकि उनकी कविता में उनका ‘मम‘ सूक्ष्म रूप से विस्तृत होकर समूचे ‘ममेतर‘ को अपने में सोख लेता है और इसीलिए वह ‘ममेतर‘ की तरह दिखता हुआ भी होता ‘मम‘ के विस्तार की तरह ही है। और इसीलिए उनकी कविताओं में उपस्थित हुआ संसार महज संसार की तरह अनुभव होने की जगह 'कमलेश-उत्तीर्ण' संसार की तरह अनुभव होता है। अगर महाराज भोज की बात को थोड़ा सा बदलकर कहा जाये तो कविता में ‘मम‘ ही रूपांतरित होकर रस में परिणीत होता है। जिस कविता में ‘ममेतर‘ की ख़ातिर ‘मम‘ को तिरस्कृत किया जाता है, वहाँ रस को सोता सूख जाता है।

संयुक्त परिवार में जीवन बिताने वाले अधिसंख्य लोगों के जीवन में ‘मम‘ और ‘ममेतर‘ का यह विभेद वैसे भी मुश्किल है। ऐसे परिवार में आप कहाँ शुरू होते हैं और कहाँ खत्म, यह अनुभव करना लगभग असम्भव है। हमारा घर न सिर्फ़ ऊर्जस्वित मोहल्ले के बीच बसा था, वह अपने आप में एक भरा-पूरा मोहल्ला ही था। तरह-तरह के लोगों की आवाज़ो से गूँजता हुआ। उसमें अक्सर आन गाँव के लोग, नाते रिश्तेदार रहा करते थे। अगर उसके बाहरी हिस्सों में सार्वजनिक जीवन की हलचलें रहती तो भीतरी अवकाशों में माँ की आत्मीयता ने एक अलग ही संसार रचा हुआ था जिसमें मोहल्ले के गरीब लोग और औरतें अक्सर दिखायी दे जाते। हमारी माँ न सिर्फ अपने नाते रिश्तेदारों की सुख-समृद्धि और आरोग्य के लिए उपवास करती, पास-पड़ोस के लोगों के घर आयी विपत्ति को टालने के लिए भी उतनी ही गम्भीरता से उपवास रखा करती थीं।

घर के सामने नाना-नानी का घर था जो गर्मियों के दिनों में मौसियों, मामाओं और उनके बच्चों से भर जाता था। चूँकि हमारे घर और नाना के घर के बीच सिर्फ़ एक सड़क थी सो गर्मियों के उन दिनों में हमारे घर का मोहल्ला मौसियों, मामाओं और उनके बच्चो के आने से और बड़े मोहल्ले में तब्दील हो जाता। ऐसे संयुक्त पारिवारिक मोहल्लों की विशेषता यह होती है कि उनमें अनेक विचारों के लोग साथ-साथ रहते हैं और वे एक दूसरे से पूरी आत्मीयता से प्रतिकृत भी होते रहते हैं।

ऐसी जगहों में कोई भी किसी का मत परिवर्तन कराने की चेष्टा नहीं करता। हमारे परिवार का कोई सदस्य गाँधी को मानने वाला था, कोई लोहिया को। किसी सदस्य को जयप्रकाश नारायण पर भरोसा था। कोई आस्तिकता में डूबा था, कोई नास्तिक था, कोई आधुनिक विज्ञान में गहरा विश्वास रखता। किसी को भूतों की कहानियां प्रिय थीं (कई बरस पहले तुम्हारे नाना किसी दफ्तरी काम से एक दूसरे शहर गये हुए थे। वहाँ वे एक सराय में ठहरे। सराय की मालकिन पिशाचिन थी। जब तुम्हारे नाना सो गये उसने उनके अंगूठे पर एक धागा बांधा और ...) लेकिन इस सब वैविध्य के बाद भी आमतौर पर कोई किसी की वैचारिक आधार पर अवमानना नहीं करता था। सभी जाति और धर्मों के लोगों को घर के भीतर तेक जाने की अनुमति थी पर इतना ज़रूर था कि परिवार के मुसलमान मित्रों को चीनी मिट्टी के बर्तनों में खाना परोसा जाता था। शायद कोई पुराना ऐतिहासिक घाव था जिसका दर्द मिट चुका था। पर मन पर निशान बाक़ी था।

3
मुझे अब याद नहीं कि यह किसने कहा था पर जिस किसी ने कहा हो, कहा बड़ा उम्दा था: कविताएँ मिलनस्थलियां होती हैं। यह बात समूचे कविता संसार के लिए शायद सही न भी हो पर अशोक की कविताओं के लिए बिल्कुल सही हैं। इनकी कविताएं कई तरह से मिलन स्थलियाँ हैं और कविताओं को बहुस्तरीय पर परिष्कृत मिलन स्थली बनाने में अशोक को महारथ हासिल है। यह उनके काव्य-कौशल का अन्यतम तत्व है। वे अपनी कविताओं के लिए अलग-अलग अन्तःसंगीत (जिसे सूक्ष्म छन्द कहा जा सकता है) इसलिए ढूंढते और आविष्कृत करते हैं क्योंकि इन्हीं के सहारे वे अपनी कविताओं को अलग-अलग तरह से मिलनस्थली बनाने का उपक्रम कर पाते हैं।

इन कविताओं में तमाम तरह की प्रजातियों के जीव-जन्तु निकट आते हैं, तमाम जगहें, तमाम रिश्ते, तमाम कीट-पतंगे, तमाम समय, तमाम कलाएँ, तमाम दृष्टियाँ, तमाम आहार, तमाम व्यवहार, तमाम वृक्ष, तमाम फूल, तमाम देवता, तमाम अवसाद, तमाम विषाद, तमाम अनुपस्थितयां साथ आकर एक दूसरे को आलोकित करने का प्रयास करती हैं और अगर वे एक दूसरे को आलोकित न भी कर पायें तो वे एक दूसरे का स्थान लेने की चेष्टा नहीं करती। कविता को मिलनस्थली बनाकर ही यहां कवि को प्रजापति का ओहदा हासिल होता है। वह अलग-अलग घटनाओं या चीजों या जीवों या भावों को निकट लाकर ही अपना एक अलग ही स्वतन्त्र संसार बुनता है।

4
औबेदुल्लागंज के करीब होशंगाबाद जिले में कुछ दशक पहले प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता श्रीधर वाकणकर ने भीमबेठिका नाम की जगह में ऐसी गुफाएं खोजी थी जिनकी भित्तियों पर  हज़ारों वर्ष पहले आरम्भिक मनुष्य ने शैलचित्र बनाये थे। ये शैलचित्र मानुषी सृजन के आरंभिक दस्तावेज हैं। इनका अध्ययन करने पर कुछ ऐसे तत्वों की ओर ध्यान जाता है जो तब के मनुष्य से लेकर आज के मनुष्य तक की सृजनात्मकता में निरन्तर बने रहे हैं। बल्कि उनके होने से ही किसी कर्म को सृजनात्मक कहने का चलन रहा है। भीमबेठिका की गुफाओं में आखेट के अनेक दृश्य चित्रित हैं, कई जानवरों के, कई ऐसे चित्र भी हैं जिनमें कुछ मनुष्य मिलकर हाथ में हाथ डालकर नृत्य कर रहे हैं। यानी वहां नृत्य संयोजन के भी चित्र हैं। इन सभी चित्रों के बीच वहाँ की भीतरी गुफा में एक अनोखा चित्र है। इसमें सूर्य और मुर्गे की आकृतियों को साथ-साथ बनाया गया है। ये दोनों ही आकृतियाँ एक दूसरे के ठीक बगल में बनी हैं और एक ही चित्रकृति का भाग लगती हैं।

मेरा ख्याल है, यह शैलचित्र आरम्भिक मनुष्य का आरम्भिक संयोजन है। ‘संयोजन‘ शब्द का मैं चित्रकला-शास्त्र के विशेष अर्थ में प्रयोग कर रहा हूँ। यहाँ संयोजन से मेरा आशय ऐसी क्रिया से है जहां दो ऐसी चीजों को, जिनके अलग देशकाल हैं, साथ रखकर एक तीसरा देशकाल उत्पन्न किया जाता है। इस अर्थ में संयोजन सृजन का मूल तत्व है। बिना संयोजन के सृजन सम्भव नहीं है। यह नहीं कि संयोजन मात्र से सृजन की इतिश्री हो जाती हो पर बिना किसी संयोजन के कोई भी सृजन नहीं हो पाता। आरम्भिक मनुष्य अपने चित्रों में ऐसा संयोजन करता था, इससे यह किसी हद तक प्रमाणित हो सकता है कि मनुष्य में हमेशा से ही नया देशकाल रचने की आकाँक्षा रही है। वह जिस देशकाल में रहता है, उससे अलग और स्वतन्त्र देशकाल यानी एक नया संसार रचना चाहता रहता है। उसे प्रदत्त देशकाल से संतोष नहीं होता। वह प्रदत्त देशकाल से इतर, प्रदत्त संसार से इतर संसार रचना चाहता है। यह आकाँक्षा ही साहित्य का मूल है। दुर्भाग्य से यह आकांक्षा ही तमाम यूटोपियाओं की भी जड़ में है जिनके वशीभूत न जाने कितने लोग सदियों से छले जाते रहे हैं।

अशोक की कविताएं न सिर्फ संयोजन करती हैं (जिनके बिना वैसे भी कविता सम्भव नहीं) बल्कि संयोजन की प्रक्रिया को पूरी नाटकीयता के साथ रेखांकित भी करती हैं। वहां सिर्फ़ सृजन ही नहीं, सृजन की प्रक्रिया को भी पूरी पारदर्शिता के साथ प्रस्तुत किया जाता है। दूसरे शब्दों में वे सृजन को सम्भव करते समय सृजन-प्रक्रिया की गाथा भी गाती चलती हैं।

5
भारत में विभिन्न कलाओं को साथ लाने और उनके बीच जीवन्त संवाद स्थापित करने का जितना सृजनात्मक, बौद्धिक और सांस्थानिक उद्यम अशोक ने किया है, किसी और ने नहीं किया। उन्होंने इसके सैद्धान्तिक आधार को रेखांकित करने तमाम निबन्ध लिखे, इसके प्रति संवेदन जगाने की दृष्टि से (भले ही सचेत रूप से नहीं) कई कविताएँ लिखीं और इसे ठोस भौतिक आधार देने कई संस्थाओं का निर्माण किया। वे बीसवीं सदी के उन बिरले कवि-बौद्धिकों में हैं जिन्होंने आधुनिकता के सन्दर्भ में हमारी सभ्यता में हुए कुछ मूलभूत बिखरावों पर ध्यान एकाग्र कर उन्हें दूर करने का पूरे मन से यत्न किया है। उन्होंने इस बात पर ध्यान दिया है कि आधुनिक भारत में शिक्षा व्यवस्था और विशेष ढंग की सांस्कृतिक संस्थाओं के कारण विभिन्न कलाओं के बीच का पारम्परिक संवाद टूट गया है।

इसे दूसरे शब्दों में इस तरह कह सकते हैं कि उन्होंने देखा कि उपनिवेशवाद के कारण जो आधुनिक संस्थाएं देश में स्थापित की गयी और जिनके कारण, कम से कम शहरी समाज को पुनर्विन्यस्त किया गया, उससे विभिन्न कलाओं का संयुक्त परिवार बिखर गया है। कलाओं के इस बिखरे हुए संयुक्त परिवार को नयी शर्तों के साथ (जिनमें आधुनिक विश्व की कुछ मान्यताओं का स्वीकार था और कुछ का तिरस्कार) दोबारा संयोजित करने में जिस स्तर का उपक्रम उन्होंने किया है, वह अपने में अनूठा है और इसीलिए उसके सामने उनपर उठने वाले तमाम वाममार्गी आरोप छिछले जान पड़ते हैं।

उन्होंने कोशिश की कि विविध कला विधाओं के व्यवहर्ता साथ आयें, विविध विचार परम्पराओं के लोग साथ आयें और उनके बीच गहन सम्वाद हो। यह करने में वे बहुत हद तक सफल भी हुए पर जैसा कि बिल्कुल ही स्वभाविक था कि उन पर एक विचारधारा को ही मानों मुक्ति की एकमात्र राह मानने वाले लेखकों आदि ने तरह-तरह के आरोप लगाये और फिर राजनीतिक रूप से सशक्त कुछ ऐसे लोगों के साथ मिलकर जो स्वयं भी एक ही विचारधारा को भारत मुक्ति की एकमात्र राह मानते थे, अशोक के कम से कम सांस्थानिक कार्य को जितनी हो सके, क्षति पहुंचायी। विचारों के संयुक्त परिवारों को सहने की इन दोनों ही तरह के लोगों में सामर्थ्य नहीं थी और इसीलिए ये दोनों ही तरह के लोग, मेरी दृष्टि में, भारतीय समाज के स्वभाव के विपरीत हैं। और उसके लिए बड़ा तो नहीं पर छोटा-मोटा ख़तरा ज़रूर हैं।

6
'मैं विलाप करता हूँ'
वे अपनी इस कविता में इसलिए विलाप करते हैं कि वे उत्तर औपनिवेशिक आधुनिक भारत में वह करने का प्रयत्न करते रहे जो उत्तर औपनिवेशिक आधुनिक भारत में उसकी अपनी राजनीति, सामाजिक प्रक्रियाओं और ज्ञान परियोजनाओं के कारण सम्भव ही नहीं है; वे विचारों का संयुक्त परिवार परिसर बनाने की कोशिश करते रहे, वे कलाओं का संयुक्त परिवार परिसर बनाने की कोशिश करते रहे और वे एक ऐसा संयुक्त घर बनाने की कोशिश करते रहे जिसमें रहते दिदिया-काका, अम्मा-दादा, बाबा/ऋभु के साथ...

यह सब बनाने के लिए एक नहीं कई अशोकों की आवश्यकता होगी जो कलाओं के क्षेत्र में ही नहीं, वैचारिकता के क्षेत्र में ही नहीं, राजनीति, समाज विज्ञान, आधुनिक विज्ञान, धर्म आदि अनेक क्षेत्रों में एक साथ काम कर सकें। लेकिन जो समाज अपनी राह पर चलने की जगह कभी सोवियत रूस की राह पर चलाया जाता रहा हो, कभी अमरीका की उसमें ऐसे लोग सक्रिय होंगे भी कैसे ? तो क्या अशोक के प्रयासों को पूरी तरह निष्फल मानना होगा ? क्या उनका यह विलाप उनकी विफलता की सम्पूर्णता को रेखांकित करता है ? क्या वे पूरी तरह विफल रहे हैं ?

बिल्कुल नहीं। वे जो कुछ जमीन पर बनाने में पूरी तरह सफल न हो सके (हालाँकि यह कहना होगा कि यहाँ भी वह अंशतः सफल रहे हैं), उसे उन्होंने शब्दों में, अपनी कविताओं में पूरी तन्मयता से, पूरे सौन्दर्य के साथ निर्मित किया है। उन्होंने अपनी कविताओं में कलाओं के, विचारों के, विभिन्न नाते-रिश्तेदारों और मित्रों, विभिन्न उपस्थितियों और अनुपस्थितियों के संयुक्त परिवारों को पूरी बारीकी के साथ, पूरी संगीतमयता के साथ बनाया है और अपने बनाये इस भव्य और बहुस्तरीय संयुक्त परिवार परिसर में वे स्वयं और उनके सम्वेदनशील पाठक पूरे ठाठ से विचरते हैं।

7
यह शुभकामना निबन्ध है, अशोक के सत्तरवें जन्मदिन के लिए लिखा गया। मुझे अपने भाईयों के पाँव छूने की आदत नहीं है (पता नहीं क्यों मैं सिर्फ़ बहनों और भाभियों के पांव छूता हूँ) पर मैं इस निबन्ध के अन्त में अशोक के पांव छूते हुए उनके दीर्घजीवी होने की शुभकामना करता हूँ।
****
14 comments:

संयुक्त परिवार और सृजनात्मकता के स्तम्भ। घर में आनन्द बसता होगा निशदिन।


उदयन बाजपेयी की कलम से अशोक जी पर पढ़ना एक अलग ही अनुभूति दे गया।
*
बात महत्‍वपूर्ण नहीं है,पर तथ्‍य है कि भीमबैठिका होशंगाबाद जिले में नहीं बल्कि रायसेन जिले में हुआ करता था। और अब शायद भोपाल या सीहोर जिले का हिस्‍सा है। होशंगाबाद जिले की सीमा पर नर्मदा बहती है।


आपके इस विलाप ने सारे सुर समेट लिए . . किस कोने नहीं लेके गए आप, सब घूम लिया सुन लिया पहचान लिया ..आपके विलाप की आड़ में :)


अशोक जी ने इस विलाप को सुर में बदला है अपने कामों से.


पारिवारिकता का बहुत ही आत्मीय राग... अशोक को याद किया गया सुन्दर ढंग से... इस के लिए आप को बधाई


ashok vajpayee ke jeevan ka bharapura pan unki kavitao me bhi nazar ata hai, aur unke chehre par bhi ...hamesha muskurate jo rehte hai....lekh ke saath lagaya gayi unki photo bahut achi hai.


... bhaavpoorn abhivyakti ... prasanshaneey post !!


hum samajhte the ki 'didiya'didi ko likhte hain.abhi malum hua ki maa ke liye likhe hain.bahut achchi tarah yaaden sanjoyee hai aapne.


बतोर कवि अशोक जी के विचारों की उड़ान मुझे बेहद पसंद है ....स्वीकारोक्ति वाली उनकी कई कविताएं विशेष तौर से.......हिंदी भाषा पर उनका अधिकार काबिले तारीफ है ....

उनके व्यक्तित्व के इस पहलु से भी रूबरू होना अच्छा लगा


अशोक जी पर इतनी वस्तुनिष्ठ आत्मीयता से उदयन जी ही लिख सकते थे उन्हें हार्दिक बधाई.
संयुक्त परिवार हमेशा सृजनात्मकता का उपहार ही नहीं देते.अशोक जी की सकारात्मकता है कि वो ऐसी सृजनशीलता ले सके.
उन्हें बहुत-बहुत बधाई


This comment has been removed by the author.

Udayan ji ka NIBANDH atyant aatmiya aur marmik laga. Ajneya ke baad wah sambhavatah akele kavi haiN jinhoNne bhasha ko usi tarah sanskaarit karne ka kaam kiya hai...unki kavyanubhooti me bhi ek bahurangi vitaan waala aakaash hai...jahaN hameN wah aksar le jaate haiN..Unke parivaarik sandarbhoN se unhe is tarah khojne ka kaam sirf Udayan hi kar sakte the..is tarah aur itni gaharaai se....balki kahiN usase bhi baDe dard se..Sattar ke hone ja rahe Ashok ji ko shubhkaamnayeN..
Aanandkumar Singh, Bhopal


UDAYAYAN....NE.....VILAP....KO....YAHAN....AALAP......ME...BADAL...DIYA...


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