Tuesday, November 15, 2011

कला का आलोक : ३ : रवीन्द्रनाथ पर अखिलेश





तखन करि नि नाथ
कोनो
आयोजन

रवीन्द्रनाथ के अधिकांश चित्र उनके जीवन के उत्तरार्द्ध में बनते हैं। गुरुदेव की उम्र लगभग छियत्तर वर्ष की होगी। 1937 में वे गम्भीर रूप से बीमार होते हैं और इस बीमारी के दौरान वे काफी दिनों तक बेहोश रहे। इस बीमारी से लौटे रवीन्द्रनाथ के जीवन के उत्तरार्ध में सिर्फ़ चित्र ही नहीं बनते हैं, उनका ध्यान इस सांसारिक वैभव, प्रकृति प्रेम, अनन्त वैश्विक सम्भावना से हटकर मृत्यु पर भी केन्द्रित होता है। बाद की अधिकतर कविताओं के केन्द्र में मृत्यु ही है। रवीन्द्रनाथ का विवाह तय होते ही उनकी भाभी ‘कादम्बिरी’ ने चौबीस वर्ष की उम्र में आत्महत्या कर ली थी। रवीन्द्रनाथ का अपनी भाभी के प्रति आकर्षण सर्वविदित है। इस बेहोशी से लौटने के बाद की चित्र शृंखला का नाम रवीन्द्रनाथ ‘कादम्बिरी’ ही रखते हैं। इन्हीं चित्रों में वे उदात्त अवस्था से हटकर आत्मकेन्द्रित होते हैं।

रवीन्द्रनाथ इसके पहले भी चित्र बनाते रहे, अधिकांश चित्र कविताओं के लिखने के दौरान उनको सुधारते हुए बनते-बिगड़ते हुए रूपाकारों के हैं। जिन चित्रों के लिए रवीन्द्रनाथ प्रसिद्ध हैं, वे इन्हीं अन्तिम चार वर्षों के हैं, मानों इन वर्षों में रवीन्द्रनाथ का ध्यान रूपाकारों ने सोख लिया है।

रवीन्द्रनाथ पर पश्चिमी जीवनशैली का भरपूर प्रभाव था, जिससे वे मुक्त भी हुए। उन्होंने शान्तिनिकेतन की कल्पना की और अपनी जीवनशैली की तरफ लौटे। उनका यह लौटना इतना अधिक रहा कि वे सम्भवतः एकमात्र भारतीय कवि हैं, जिसने परम्परा को बहुत-कुछ दिया, सँवारा, पुनर्परिभाषित किया। रवीन्द्र संगीत के बिना बंगाल बूचा नज़र आयेगा। बंगाली संस्कृति की थाती बन चुके रवीन्द्र गान राजनैतिक सीमाओं के पार भी उतने ही स्वतंत्र हैं जितने जातिगत विभाजन के भीतर।

रवीन्द्रनाथ का लौटना, खासतौर पर बीमारी के बाद लौटना आसान न रहा होगा। सम्भवतः मृत्यु से साक्षात्कार भी हुआ होगा। इस बीमारी में काफी दिनों तक वे मरणासन्न रहे। इस दौरान एकान्त के अवसाद से भी गुज़रे होंगे। यहीं कहीं कुछ दरकता है, जीवन मोह छूटता है। इसी मनस्थिति में किसी एक क्षण, क्षणभंगुर संसार निरर्थक, अर्थहीन और उपेक्षा योग्य जान पड़ा होगा। सांसारिकता की संस्कृति को परिष्कृत करने वाले महाकवि को सम्भवतः मरणासन्न दिनों में अकेले मनुष्य होने की मजबूरी का अहसास हुआ। लौटने पर उन्होंने पाया कि एक और संसार है अकेले होने, रहने, करने और नाचने का। वे स्वस्थ जीवन में लौटते हैं, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की तरह नहीं, व्यथित मन लिये रवीन्द्र की तरह जिसको निस्सारता का अनुभव हुआ है, जो सांसारिक अर्थ के परे आध्यात्मिक अर्थ भरे संसार को भुगत कर लौटा है, जिसका अन्तर्मन आज़ादी की उन गहराइयों में साँस ले रहा है, जो राजनैतिक आज़ादी के ऊपर मनुष्य की आत्मा की आज़ादी का स्वप्न है।

रवीन्द्रनाथ के चित्र सीधे बनना शुरू नहीं होते, वे लौटते हैं कविताओं की तरफ, अपने लेखन की तरफ। लिखना अब आसान न था। भरे-पूरे वैश्विक रवीन्द्रनाथ टैगोर, जो भटका रहे थे इस अप्रतिम, अद्भुत, अचम्भित कर देने वाली दुनिया के आश्चर्यों में - अब कीलित भी है दुःख के अकेलेपन में। बिछोह की दुखदायी कादम्बिरी स्मृति में। लेखन में संशय की स्याही फैलना शुरू होती है। इस स्याही में अहंकार का फैलना नहीं है, जो कई कवियों की लेखनी से निकलता रंगों तक जा पहुँचता है, जिसके अत्यन्त कमजोर और अधकचरे उदाहरण शमशेर बहादुर सिंह, मलयज और श्रीपत राय के चित्र हैं।

रवीन्द्रनाथ की स्याही संकोच से सत्य की तरफ जाती दीखती है। इसमें आत्म सच का प्रकाश फैला है, इन रेखांकनों में दावा नहीं कवि का क़ातर भाव है। रवीन्द्र के चित्र रचनाकार की सहज विविधता से भरे दीखते हैं।

‘‘कवि के चित्र और रेखाचित्र विविध प्रभाव लिये हैं, उन्हें किसी वर्ग में नहीं रखा जा सकता। कुछ अभिव्यक्तिवाद, अभिव्यंजनावादी कुछ और कुछ आदिम अनगढ़ता लिये हैं।’’
- स्वामीनाथन, लिंक पत्रिका, 1961

रवीन्द्रनाथ अपने चित्रों के लिए विषय ढूँढ़ने नहीं जाते हैं। रवि वर्मा की तरह वे भारतीयता भुनाने की कोशिश नहीं करते। वे परम्परा को खँगालते, सम्भालते नज़र नहीं आते। रवीन्द्रनाथ के लिए लोक और आधुनिक, सभ्य या अपढ़, अभिव्यक्तिवाद या किसी अन्य वाद और चित्र परम्परा भी उतनी निस्सार थी जितनी कि पश्चिमी संस्कृति, जिसके वे ज्ञाता थे। वे जाते हैं अपने दिल की भीतरी कोनों में छिपी थरथराती उस आदिम आकांक्षा के पास, जो बाहर फैले मृत्यु ताण्डव में साँस ले सकेगी के डर से, काँप रही थी। यही कम्पन रवीन्द्र के शुरुआती रेखांकनों में दीखता है। वे जाते हैं विरह के पास, जिसके उदास वर्ष उन्हें बींधते रहे। यही उदासी चित्रों में फैलती है।
वे जाते हैं शब्दों के रूपाकार के पास।
वे अनायास बह जाने वाली कलम के साथ टहलते हैं।
वे ‘अचानक’ से मिलते हैं, जिसका रूप बदलता रहता है।
वे आकस्मिकता से जा टकराते हैं।
वे अपने को छोड़ देते हैं उस नर्तक की तरह जो लगातार चक्कर लगा रहा है - जिसका उद्देश्य नाचना नहीं है।

जो रचना नहीं चाहता, रचने के भीतर बसना चाहता है। वे बहते हैं, रचते हैं और अचम्भित हम देखते हैं कि रवीन्द्र के इन चित्रों को, रेखांकनों को, जो निरूद्देश्य रचे गये हैं। रचना सम्बन्ध रचना जगत् है। जागत का कुछ नहीं, जगताधीश सा है। वे अपने चित्रों को लिखी कविताओं की तरह ही देखते हैं। वे लिखते हैं:
‘‘मेरे चित्र लकीरों के बीच की पद्य रचना है। यदि उसमें कुछ जाना-पहचाना जा सका है तब पहले तो लयात्मक अभिप्राय ही होगा, जो अन्तिम सत्य है। वह किसी भी तरह के विचार का प्रस्तुतिकरण या यथार्थ की व्याख्या नहीं है।’’

इन
चित्रों का रचयिता उस आदिम आत्म से संचारित है, जिसकी आँख की किरकिरी बीसवीं शताब्दी की आधुनिक होती जा रही विभीषिका भी है। विश्वयुद्ध की स्मृति, निरपराध, निर्दोष हत्याओं की सिहरन, मनुष्यता खोते जा रहे मनुष्य की विडम्बना। कमतर मनुष्य होते जाने की निरन्तरता, आदि झेलता, देखता, समझता इस रचनाकार की उन अन्जान छवियों के न पहचाने जा सकने वाले चेहरों में फैली उदासी और निराशा अन्जान मन के फीके उजास की तरह फैली है। रवीन्द्रनाथ के चित्र व्यक्तिगत विषाद का सार्वभौमिक प्रकटन है। शाश्वत और क्षणभंगुर के नाजुक सम्बन्धों के सक्षम चित्र हैं। संसार की निरन्तरता और उसकी टूटन के अहसास का प्रभाव है। ये आस्था के दरकने के आस्थावान चित्र हैं। रवीन्द्र सम्भवतः देख पा रहे थे आधुनिक होते जाते मनुष्य की मजबूरी और उससे अपने को न बचा पाने का दर्द। वे महसूस कर रहे थे साधारण मनुष्य की मुश्किलें बढ़ाता औद्योगिकी और उसके इर्द-गिर्द बुनी जा चुकी विचारधाराएँ।

लौटे हुए रवीन्द्रनाथ को अहसास हुआ होगा मनुष्य मन का साधारण से असाधारण हो जा सकने की क्षमता का जहाँ वे लिखना छोड़ चित्र बनाने लगते, चित्र बनाना छोड़ नाचने लगते। यह अहसास और चित्र बनाने, नाचने का आदिम बोध ही उन्हें ले चला होगा उस अन्जान, अव्यक्त, अपरिचित संसार की ओर जहाँ चिड़िया का चहकना सुनाई नहीं दे रहा, बल्कि दीखाई दे रहा है। जहाँ दुःख व्यक्त नहीं हो रहा - फैल रहा है।

रवीन्द्र काली स्याही के अंधकार से रचते हैं प्रकाश में डूबते-उतराते इन चित्रों को। उभरते इन रूपाकारों को, जो आत्मसात् कर लेने वाला है। उन आकारों को भी रचते हैं, जिनका सम्बन्ध सभ्यताओं, संस्कृतिओं और मनुष्यता की परम्पराओं से नहीं था, बल्कि स्वतंत्र होते जा रहे मनुष्य की अवस्था से था - जिसका भान उन्हें कुछ था, कुछ नीम-बेहोशी थी।
शब्दों की बनावट में छिपे रूपाकारों से सम्बन्ध बन रहा था।
वाक्यों में नये अर्थाकार प्रकट हो रहे थे।

ये चित्र भारतीय कला की स्वतंत्र अभिव्यक्ति के प्रमाण रूप थे, जो राजनैतिक स्वतंत्रता पाने के पूर्व धरा पर रूप धर चुके थे।

स्वामीनाथन के निधन के बाद के पहले जन्मदिवस पर उनकी स्मृति में बोलते हुए प्रख्यात चित्रकार रामकुमार ने कहा- ‘‘रवीन्द्रनाथ टैगोर, अमृता शेरगिल, मक़बूल फ़िदा हुसैन और स्वामीनाथन के बगैर आधुनिक भारतीय कला की शुरुआत नहीं मानी जा सकती।’’ रामकुमार इसे आज़ादी के पहले से शुरू कर आज के वर्तमान तक ले आ रहे हैं, जहाँ अभी भी कई जगहों पर इसके लक्षण दीख पड़ते हैं। भारत की गुलाम मानसिकता के प्रतिफलन को चित्रों में हम आज भी देखते हैं, जिन पर लिखना कागद कारे करना होगा। इनके लिए कई कला पत्रिकाएँ छप रही हैं, जिन्हें आज़ाद भारत का गुलाम प्रबुद्ध पाठक पढ़कर लगातार उपकृत हो रहा है। इस विषयान्तर में हम नहीं जा सकते, किन्तु इस सामूहिक चेतना की अभिव्यक्ति के ठेकेदार बनने की कोशिश में ‘ग्लोबलाइज़्ड' होने की महत्त्वाकांक्षा के बाहर हैं रवीन्द्रनाथ के अन्तर्मुखी चित्र।

इन चित्रों में संदेश देने की तड़पन नहीं है। वे मनुष्य की आत्माभिव्यक्ति का दावा भी नहीं करते हैं। वे आत्माभिमान लिये संकोच भरे चित्र हैं। वे संशय की उलझनों से गर्भित हैं। वे आज़ाद होने जा रहे देश की आज़ाद अभिव्यक्ति की चेतना के चित्र हैं, जो आज़ादी के आन्दोलन में शामिल होने का न आह्वान करते दीखते हैं, न शामिल होने की कोशिश करते हैं। वे तथाकथित सामाजिक-राजनैतिक चेतना के चित्र नहीं हैं जो आत्मग्लानि का रोना रोते नज़र आते हों।

‘‘रवीन्द्रनाथ अपने रेखांकन के लिए, जो निहायत सादगी से भरे हैं, मिथक और कथाओं की तरफ नहीं आकर्षित होते हैं। उनके कई अभ्यास चित्र चिन्तातुर विषयात्मकता, जो अर्धचेतन की गहराई से निकलने वाले अर्थों से भरे हैं - जिन्हें हम खुशी से आधुनिक भारतीय कला का ‘नायक’ कह सकते हैं।’’
- स्वामीनाथन, मार्च 1959

अर्धचेतन की गहराई से निकलने वाले जिन अर्थों की तरफ स्वामी का इशारा है, यह ‘अर्धचेतन', बेहोशी में उस शाश्वत मृत्यु से साक्षात्कार कर चुका होगा, जो रवीन्द्रनाथ की लम्बी बेहोशी में उनके साथ रही होगी। बीमारी के बाद इन्हीं चित्रों, मृत्यु सम्बन्धी कविताओं और आल्हादित नृत्य के बीच बीते इन चार सालों में बनाये रवीन्द्रनाथ के चित्र उन अर्थों से परे नज़र आते हैं, जो इस सांसारिकता में उन्हें वापस खींच लाने का प्रयत्न मात्र हैं। ये चित्र अन्तर्मन में बसे उस नाथ को सम्बोधित हैं, जो जाने कब चुपचाप हृदय में चला आया है। जिसका अनुभव उन्होंने कभी किया था और उसका वर्णन वे इस कविता में करते हैं:
तखन करि नि नाथ, कोनो आयोजन।
विश्वेर सवार साथे, हे विश्वराजन्,
अज्ञाते आसिते हासि आमार अन्तरे
कत शुभ दिने; कत मुहूर्तेर परे
असीमेर चिह्न लिखे गेछ। लड़ तुलि
तोमार-स्वाक्षर-आँका सेइ क्षण गुलि --
देखि तारा स्मृति-माझे आछिल जड़ाये
क्षणिकेर कत तुच्छ सुख-दुःख घिरे।
हे नाथ, अवज्ञा करि जाओ नाइ फिरे
आमार से धुलास्तूप खेला घर देखे।
खेला-माझे शुनिते पेयेछि थेके-थेके
जे चरणध्वनि, आज शुनि ताइ बाजे
जगत् सङ्गीत-साथे चन्द्रसूर्य-माझे
- रवीन्द्रनाथ, गीतांजलि
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( बहुचर्चित चित्रकार और लेखक अखिलेश का यह आलेख राजकमल प्रकाशन से उनकी सद्यः प्रकाशित गद्य-पुस्तक 'दरसपोथी' से लिया गया है। इस पुस्तक के अलावा यह निबंध कहीं भी पहली दफा छप रहा है। आलेख के साथ दिए गए चित्र रवीन्द्रनाथ टैगोर के हैं। अखिलेश का एक अन्य लेख यहां देखें। )


Monday, October 31, 2011

वृत्तांत : प्रत्यक्षा



[
आगे दिया गया वृत्तांत हिन्दी की चर्चित कहानीकार प्रत्यक्षा ने लिखा है। यह कुछ जगहों का हो सकने की रवायत से इसलिए मुक्त है क्योंकि इसके भीतर मापा गया भूगोल जितना बाहर है उतना ही भीतर भी। इस अदंर-बाहर की आवाजाही को जितना आकांक्षा ने पोसा है, स्मृति ने उतनी ही समृद्धि दी है। इन सबके बीच अनुभवों का हरा परिसर है। आइये इसमें शामिल हों। साथ में दी गई तस्वीर लेखिका के सौजन्य से। सबद पर इससे पूर्व उनका लेखन यहां ]

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दिन
पहला के पहले की रात


आज
मैं सफर में हूँ। रात के अँधेरे में सफर का शुरु होना, सोये मुसाफिरों के बीच किसी का सुगबुगा कर उठना फिर ढुलक जाना। सन्नाटे की यात्रा शरीरी से कहीं ऊपर अशरीरी हुई। मन जाने कहाँ भाग रहा था। चलती हुई गाड़ी से भी तेज़, उससे भी आगे आगे, पहाड़, बादल, नदी आसमान, भूगोल, इतिहास, समय, समाज के परे। हमेशा ऐसी स्थिति में अपना खुद के साथ होना सबसे अंतरंग होना होता है, बिना प्रिटेंस के, बिना कपड़ों के, बिना फरेब के, नये जन्मे बच्चे सा नंगापन, शरीर और आत्मा का और अथाह किस्म की संजीदगी। चलती गाड़ी के लय में शरीर का गिरना , थकान और अकड़न में जिस्म का टूटना, ये सोचना कि काश पैर फैला लेने की इतनी से जगह मयस्सर हो जाती और इन्हीं सब अगड़मबगड़म के बीच मन के उजाले उड़ान का बगूला कैसे अपने सफेद पँख फैला लेता है, इसकी मीठी नीम रौशनी में नहा लेना। रात का लम्बा सफर इतना होता है और इतने से बहुत बहुत ज़्यादा भी।

सुबह का झुटपुटा
(मनाली)


रात भर एक भय कँधे पर सवार था। पहाड़ी चक्कर खाती सड़कों पर मेरा जी खूब उबकाता डराता है। नींद के हिचकोलों के बीच जब जब आँख खुली, बस को चक्करदार सड़क पर झूलने का भास हुआ दोबारा आँखें भींच ली। सुबह के झुटपुटे पर जब नींद खुली, खिड़की के बाहर वेग से बहती पहाड़ी नदी साथ साथ दौड़ती चली। सफेद फेनिल झाग और देवदार के पेड़। लगा अब भी सपने में हैं, खूबसूरत वादी और झागदार पानी का पिक्चर पोस्टकार्ड जैसा देखा सपना। फिर बीच बीच में ठठ ठूँठ पेड़। पत्तियाँ काही सिकुड़ी हुई। जैसे आग लग गई हो। झुलसेपन में भी एक किस्म का आभास था। जैसे कुछ भी सच हो जैसे नींद से जाग के बीच का ट्वाईलाईट ज़ोन, जैसे सच और स्वप्न के बीच का माया जाल इन्द्रजाल। सब देखा हुआ समय था, ये सब भोगा हुआ भूगोल था। ये यात्रा की हुई यात्रा थी जिसे होना था भविष्य में सेंस ऑफ देजा वू।

नदी चलती रही साथ साथ

दो घँटे तक नदी चलती रही साथ साथ। मेरा मन बुखार के ताप में जल रहा था। शरीर अधलेटा अकड़ा चाह रहा था जगह जहाँ तन कर तान सके। साँस पहाड़ों की साफ हवा चाहती थी। सुबह की धूप खिल गई थी। बस अड्डे पर सवारियों की अधनींदी भीड़ थी, टैक्सी और औटो की धूल अटी जमघट में ज़रा सा शोर था। शहर अभी भी ठीक से जागा नहीं था। मैं भी। होटल के बाहर धूप में गमलों की कतार और दीवार पर लतड़ के हरियालेपन में ठहरी हुई खुशी थी। कमरा बिलकुल अंत में था, साठ सीढ़ियों के ऊपर अटाल में, बरामदे के सबसे अंतिम छोर पर। गोल खिड़की पर से पर्दा हटाते पहाड़ों के बीच की वादी, ठीक बीचोबीच बहती नदी और उसके पार क्षितिज पर पहाड़ की शृंखला, सबसे आखिर की चोटी पर सफेद बर्फ का आभास या शायद बादल का कोई बहका टुकड़ा।

कोई भूली सी गली

आत्मा के भीतर इतनी गहरी उदासी धँसी है , छाती से लेकर पैर तक उसका भार महसूस होता है । इतना भारी कि पैर मन-मन के हो जाते हैं, खड़ा रहना तक गले तक धँस जाना है। इस खूबसूरत सुरम्य सँसार में कहाँ से ऐसे अवसाद का यों चले आना। पामुक का हुज़ुन याद आता है। कुछ कुछ वैसा ही हवा में तिरता है, अमूर्त पर भारी, पोपटों पर ऐसा भार कि बरैनियाँ झुक जायें अवसाद के नशे से। सब तरफ धूल का आलम है और नदी के दोनों तरफ बड़े बड़े पत्थरों का जमाव। जैसे किसी ने सब सुंदरता भद्द कर देने के लिये उन्हें फैला दिया हो, टू स्पायल द गेम। नरेन हमारा ड्राईवर बताता है सन पँचानबे में आया बाढ़। उसी में चट्टान के ऐसे टुकड़े बहते आये। बड़ी तबाही हुई थी तब। मुझे कोई ध्यान नहीं ऐसे किसी बाढ़ के बारे में। तब मैं धरती के इस टुकड़े से दूर कहीं और रहती थी और हिमाँचल का कनेक्शन सिर्फ इतना था कि मेरे स्कूल की एक साथी वहाँ की थी।

मॉल रोड खुदा हुआ है। पहली नज़र में बंजर और उखड़ा हुआ। दुकानों की कतार। लकड़ी के सामान, ऊनी कपड़े, रेस्तरां, सूखे फल और मेवे, चाय की पत्तियों से भरे बोरे, पहली दफा चिलगोज़े देखे। सब्ज़ियों के टाल पर कुछ नई सब्ज़ियाँ और फल। नये किस्म के अचार, सूखे सेब की कतलियाँ, और चेहरे। मेरी नज़र का दोष रहा होगा कि सब बेजार चेहरे दिखे। ज़िंदगी के बोझ से दबे, जीने की मजबूरी से भरे। बिना प्रयोजन के मैं चलती गई, दुकानों में झाँकती, लोगों के चेहरे पढ़ती। सड़क आगे मुड़ कर किसी गली से ऊपर चढ़ गई।

मैं घर देखना चाहती थी। बाज़ार के परे का संसार। दरवाज़ा खटखटा कर रुकना चाहती थी, कोई औरत आये और ज़रा सा किवाड़ खोल कर पूछे कि क्या चाहिये। पीछे से कोई बच्चा झाँकता, माँ की ओट से मुस्कुराये। आँगन में सूखते कपड़े, फूल वाले छापे का सोफे का कवर, बाहर बाल्टी में उगाया कोई पीले गुलदाउदी जैसा फूल, रसोई में पकता लाल चावल और राजमें की खुश्बू, कँबल और रजाई की गर्म पुरानी महक, टीन के संदूक पर क्रोशिया का कवर। मैं ऐसे किसी घर का हिस्सा होना चाहती थी। ऐसे जैसे बरसों वहाँ रहती आई रहूँ, ऐसे नहीं जैसे कोई घँटे भर का मेहमान हो और जिसकी पहुँच बाहर वाले कमरे तक सीमित हो। मैं उस घर के रेशे रेशे में समाई देखना चाहती थी, गरम मसाले और हल्दी की महक जैसे, अलगनी पर चपोती साड़ी के कलफ जैसे, अदरक वाली चाय के पुराने ज़रा दरके कप के उड़ते भाप जैसे, दीवार पर तेल लगे सर के छापे निशान जैसे, बाथरूम के बरसों टपकते और बार बार बनाये जाने के बावज़ूद टपकते रहने वाले नल के गिरते पानी की आवाज़ जैसे। मैं होना चाहती थी, अपने पूरे होने की चाहत में, ऐसे उस पल और जाने ऐसे कितने पल, कितनी यात्राओं में गुज़रते बसों से ज़रा सा देखी गई ज़िंदगी का टुकड़ा, किसी भागते छूटते घर से खुली खिड़की के ओट से लहराता कोई कैलेंडर का ज़रा-सा कोना, किसी ट्रेन से दूर अँधेरे में अकेले किसी मकान की टिमटिमाती रौशनी, पैदल किसी अनजान शहर की किसी चोटखाई भूली सी गली के मुहाने किसी घर की अटारी पर से झाँकता काजल लगे आँखों वाला नंगधड़ंग कोई डेढ़ साल का बच्चा जिसके कमर से बँधी काले धागे में लड़ी घँटी अचानक बज उठे ।

किसी नई जगह पहुँचने के ये फायदे हैं कि भूली हुई सब चाहतें तीखेपन में घिर आती हैं, जैसे अब फुरसत हुई है तो हम आते हैं। शहर के दूसरे छोर कोई पाँच सौ साल पुराना मंदिर है। पत्थर और लकड़ियों से बना। इतने वर्षों में लकड़ी और पत्थर का स्वरूप एक हो गया है। छूओ तो बिलकुल एक से स्पर्श का अहसास। उँगलियाँ फिराओं तो नक्काशी पर पोर फिसल जाये। मंदिर का गर्भगृह दो भाग में है, नीचे ताख सी छोटी जगह में देवी की मूर्ति, ऊपर चट्टान की छत आधे भाग में और ऊपर वाले हिस्से में पुजारी जी का आसन। लाल टीका लगाते हैं और हथेली पर नारियल के कतलियों का प्रसाद।

धर्म के बारे में मेरे ख्याल बहुत अम्बीगुअस हैं। मैं नहीं जानती कि कितना विश्वास करना है और क्यों। मैं किसी सुप्रीम बीईंग के अस्तित्व में विश्वास करना चाहती हूँ, चाहती हूँ कि ऐसा कोई आधार हो जिसपर मैं अपने सब संशय, सब दुविधा, सारी दुश्चिंता का भार सौंप कर निश्चिंत हो जाऊँ। लेकिन ऐसी किसी जगह आ कर मेरे भीतर धार्मिक ख्याल नहीं उपजते। मेरे लिये ऐसे स्थान का ऐतिहासिक और पुरातत्विक महत्व अधिक हो जाता है, पुरानी कहानियों का विश्वास और मिथक में बदल जाने की प्रक्रिया का जादू ज़्यादा रोचक हो जाता है। जैसे आगे के किसी दिन किसी गाँव से गुज़रते बताया गया कि पाँडव यहाँ कुछ महीने रुके थे और ये जो तीखी खाईयों से घिरी जगह आप देख रहे हैं, ये प्राकृतिक खाई नहीं बल्कि पाँडवों द्वारा बनाई गई थी अपने सुरक्षा के लिये। तीखे चट्टानों की ऊँची दीवार पर लोक कथा का ऐसा बिम्ब मेरे भीतर रोमाँच भर देता है। ऐसी परिस्थितियों में मैं विलक्षण तरीके से अव्यवहारिक और हद दर्ज़े की रूमानी हूँ। उस जगह को मैंने मार्क कर लिया था कि लौटते वक्त उसका आस्वाद फिर ले सकूँ। कुछ उस तरह जैसे मैं जगहों के नाम का स्वाद लेती हूँ, मन ही मन बोल कर, अलेऊ, पलचान, शनास, कोठी, गज़ाँ।

अंगोरा खरगोश और दो याक

मंदिर के बाहर औरतें अंगोरा खरगोश ले कर खड़ी हैं, उन्हें गोद में ले कर फोटो खिंचवाने के बीस रुपये। आपकी ले लूँ, खरगोश के साथ? मैं पूछती हूँ, कैमरा लिये, लेकिन वो नाराज़ हो जाती हैं, झट से मुँह फेर लेती हैं। मैं उन्हें पैसे पकड़ाती हूँ, खरगोश अपनी लाल आँखों से चुप देखता है। उसके फ़र बेहद मुलायम हैं। मैं गोद में लेकर उसे प्यार करती हूँ। वो निर्विकार मुझे देखता है। ऐसे प्यार की उसे बहुत आदत होगी। एक तरफ ऐसे ही दो याक खड़े हैं। उनके बाल ऐसे गिरते हैं जैसे पार्लर में जाकर घुँघराले बालों को सीधा कराया हो। पीछे से कथकली डांसर जैसे उनका बालों का घेर बनता है। याक वाला कहता है रोज़ इनके बाल शैम्पू करता हूँ, तब तो टूरिस्ट बैठ कर फोटो खिंचवायेंगे। मैं उसके बाल छूती हूँ। अब तक याक मैंने सिर्फ तस्वीरों में देखी थी। जैसे ब्यास नदी सिर्फ नक्शों पर। इम्तहान के वक्त भूगोल की किताबों पर हिमालय के पास से पाँचों नदी की रेखा पर उँगली फिराते रटना, इंदस, झेलम, सतलज, रावी, ब्यास। जैसे पीर पंजाल और धौलागिरी। जैसे ग्रेट आर्क पढ़ते हिमालय की ऊँचाई नापते एवरेस्ट और विलियम लैम्बटन की टीम के रोमाँचक कारनामें। अब सब देखना अपनी आँखों से। पीर पंजाल की चोटी धूप में चमकती हैं। ज़मीन पर कितने पुराने पेड़ हैं देवदार के। नीचे चट्टान किसी प्रागैतिहासिक पशु की तरह समय में जकड़ा पसरा अलसाया पड़ा है। शाम ढलने को है।

वशिष्ठ गाँव में फिर मंदिर है वशिष्ठ ऋषि का मंदिर। ऊपर गर्म पानी का कुंड है। कुछ फिरंगी नंगधड़ंग बैठे गप्प कर रहे हैं। उनके बगल से गर्म पानी भाप उड़ाता बह रहा है। नीचे मंदिर के प्रांगण में फिर कुंड है। औरतों के लिये अलग और पुरुषों के लिये अलग। मैं भीतर घुसती हूँ। कुछ औरतें पानी में पैर डुबाये बैठी हैं। फिसलन भरे किनारे पर पैर जमाती मैं भी बैठ जाती हूँ। पानी बहुत गर्म है। ज़रा ज़रा डुबा कर फिर पैर निकालना होता है। धीरे-धीरे पैर को गर्म सहने की आदत होगी। चारों ओर पुराने पत्थर की दीवार है। ऊपर आसमान और बादल। मेरे बगल में दो बैंगलोरियन औरत हैं। वे जे कृष्णमूर्ति के किसी स्कूल से आई हैं। बच्चों को लेह में ट्रेकिंग कराने। बताती हैं कि तम्बुओं में सोने और कठोर क्लाईमैटिक परिस्थितियों की वजह से कुछ बच्चे बीमार पड़ गये। एक टोली आगे ट्रेकिंग पर निकल पड़ी। ये अस्वस्थ बच्चों के साथ वापसी के रास्ते पर हैं। उनमें से एक का पैर गर्म पानी में डूब कर गुलाबी हो गया है। मुझे अनजाने में ब्रॉयल्ड प्रॉंन्स की याद आ जाती है। तीसरी औरत मणिकरण की कहानी सुना रही है। वो यहीं की है और पिछले महीने मुँबई घूम आने की कहानी उत्साहित हो कर बता रही है। मैं उन्हें राजगीर के गर्म पानी के कुँड की कहानी बताती हूँ कि ऊपर खूब ऊँचा एक गुँबद है और नीचे सीढ़ियों से ऊतर कर पानी का कुँड। बचपन में वहाँ जाकर नहाना याद है। पिता तब टूरिस्म देखते थे। हम घूमने गये तब फायदा अपने का काम का सिर्फ यही लिया था उन्होंने कि पर्य़टकों के आने के पहले, लगभग अँधेरे में हम वहाँ जाकर नहा आये थे। जाड़े की सपसप बहती हवा में लगभग दिन के शुरु होने के पहले के झुटपुटे अँधेरे में यों इस तरह धीरे धीरे गर्म पानी को क्रमश: और सहने की ताकत लेते हम सीढ़ियों से नीचे उतरते गये थे, जब तक कि कँधे तक हम डूब नहीं गये। फिर निकलना मुश्किल था। गर्म पानी का नशा बड़ा ऐडिक्टिव होता है।

एक बेहद बूढ़ी औरत अंदर आती है। उसकी बेटी या बहू साथ है। बूढ़ी का लबादा खोलती है। सिर का स्कार्फ हटाती है। उसके बाल कतरे हुये हैं और चेहरे पर अथाह झुर्रियाँ हैं। वो झुक कर चल रही है। मैं डरती हूँ, कहीं गिर न जायें। मेरे बगल की बैंगलोरियन अपना ज़ूम लेंस वाला कैमरा निकालती है। बूढ़ी के साथ की औरत बेहद नाराज़गी में मना करती है। बैग़लोरियन झेंपती कहती है, कोई बात नहीं, इन्हें देख कर मुझे अपने माँ की याद आई इसलिये फोटो खींचना चाह रही थी। मैं गर्म पानी का मोह छोड़ कर बाहर निकल आती हूँ। मेरी थकान मिट गई है और मेरे पाँव साफ गुलाबी हो गये हैं, किसी बच्चे के से पाँव नरम मुलायम साफ।

सिड्डु, करी पत्ता और ट्राउट मछलियाँ

मुझे उन दोनों औरतों की याद आती है उनका चेहरा, उनके चेहरे के भाव। ऐसे कितने लोग मिलते हैं जीवन में, कोई बात का एक टुकड़ा, चेहरे की कोई भंगिमा, बोलने का लहज़ा, गुज़रते ट्रेन से किसी का दिख पड़ना और फिर याद में अटक जाना जाने कितने बरस और फिर अचानक ऐसे ही किसी दिन फटते बादल के बीच रौशनी की कौंध जैसे याद पड़ना और ऐसे याद पड़ना जैसे कभी भूले ही न हों। होसुर के सबस्टेशन में, शहर से दूर, सब कितना सुंदर सुरम्य शांत, बारिश के झपाटे और ताज़ी हवा के सुरूर में ढेर सारा करी पत्ता डला हुआ पकौड़ी खिलाता वो लड़का जैसे याद में अटका है, जैसे कॉरबेट में ट्रेकिंग कराता लड़का दानियेल, जहाँ करी पत्ता के असंख्य झाड़ देख कर मैंने आश्चर्य किया था कि इतनी मात्रा में यहाँ उगते हैं फिर इनका खाने में प्रयोग क्यों प्रचलित नहीं हुआ। पुराने वक्त में लोग वही तो खाते थे जो ज़्यादा अबंडेंस में आसपास उगता होगा। कितना एक्स्पेरीमेंटल रहा होगा खाने योग्य वनस्पति की खोज करना, कितना आहलाद भरा और ये कि किस चीज़ को कैसे खाया जाय। उसे उबाला जाय, आग में पकाया जाय या फिर कूट पीस कर खाया जाय। किसने ये सोचा होगा कि चावल तो उबाला जायेगा पर गेंहूँ पीस कर रोटी बनाई जायेगी। या फिर किस सब्ज़ी को किस छौंक के मिश्रण से सुस्वादु बनाया जायेगा। वयंजनों और भाँति भाँति के क्यूज़ींस का इज़ाद कितना खुशी भरा अनुभव रहा होगा। ये भी कि मज़ेदार तरीके से दुनिया में फैले लोग खाने के वही वही तरीके के वैरियेशंज़ इज़ाद कर रहे थे। गेंहूँ की रोटी और ब्रेड और पीटा और नान या चावल के पुलाव, बिरयानी और पायेला और रिसोत्तो। समोसा और पैटी, मोमो, सिड्डु और दलपीठी, आलू भुजिया और फ्रेंच फ्राई, आलू का चोखा और स्विस रोश्टी का वैरियेशन मुझे हमेशा खुश करता है।

ब्रॉदेल की द स्ट्रकचर्स ऑफ एवरीडे लाईफ में कई चैप्टर्स खाने पर हैं और चीनी, नमक स्पाईसेज़ के प्रथम उपयोग के बारे में रोचक जानकारी देते हुये, लोगों के खाने के तरीकों के बारे में, उनके रहन सहन और समाजिक संदर्भों के बारे में। कुछ साल पहले पढ़ी इस किताब पर फिर लौटने की इच्छा हो रही है। कोई ऐसे ही लिख दे हमारे भारतीय खाने की उतपत्ति पर जैसे अब्दुल हलीम 'शरर' की "पुराना लखनऊ" में पुलाव के भिन्न किस्मों की कहानी है... पुलाव, मुज़ाफर, मुतंजन, शीरमाल, सफेदा, बुरानी के प्याले, शीरविरंज के ख्वांचे, क़ोरमा, तली हुई अरबियां गोश्त में, शामी कबाब, मुरब्बा, अचार या चटनी...

रज़ाई की गर्माहट में लेटे खिड़की के बाहर टिमटिमाती रौशनियों के देखते लगता है तारे नीचे उतर आये हैं। मुझे बचपन की बेहद प्रिय किताब हाईडी की याद आती है, बस ऐसे ही। स्टोव के ऊपर की अटारी पर उसका सोना याद आता है। जाने कब अपने विचारों को बेलगाम उड़ते-पकड़ते मैं थकान की नींद में उतरती हूँ।

हरिपुर में ट्राउट मछलियों का फार्म है। पत्थरों के बीच उफनती नदी और मचान पर बैठने का सुख। चारों तरफ बहुत से फूल हैं, फल भी। साईनपोस्ट ताकीद करता है कि फल और फूल तोड़ने वाले को जुर्माना भरना पड़ेगा। जाने कितनी सीढ़ियाँ उतर कर यहाँ तक आई हूँ। अब फिर से उन्हें चढ़ना डरा रहा है। पर ऐसे लकड़ी और अनगढ़ पत्थर के इस ढाँचे वाले रेस्तरां में बैठना अच्छा लगता है। अपने शहरी जीवन के भागदौड़ को जाने किस जनम छोड़ आई हूँ। ऑर्डर देने के बहुत-बहुत बाद मेरा खाना आता है। चावल के परत के ऊपर समूची ट्राउट मछली, उसपर टार्टर सॉस, कुछ गाजर और मूली और बेबी कॉर्न के टुकड़े और ब्लैक ऑलिव्स। इतने इंतज़ार का समुचित रिवार्ड। मछली इतनी ताज़ी और क्रीमी है। मुँह में स्वाद घुलता है। पूरा खत्म करती हूँ फिर एक और ऑर्डर करती हूँ। इस बार मस्टर्ड सॉस। जब तक खाना आता है, मैं प्रकृति के साथ हूँ, अपने सेंसेज़ के साथ। मन खाली है जैसे इस खालीपन का भी एक भरापन हो। ठहरा हुआ भरापन। सब चीज़ें तब तक रुकी हैं जबतक मेरा खाना नहीं आता।

लौटते नरेन से बात करती हूँ। बताता है उसका गाँव गज़ाँ पास में है। कि घर में माँ हैं पिता हैं, एक बड़ा भाई है, भाभी हैं। दो बहनें थीं जिनकी शादी हो गई। भाई के बच्चा नहीं है। भाई भी टैक्सी चलाता है। शहर में दो हज़ार टैक्सियाँ होंगी। सीज़न में खूब कमाई हो जाती है। घर में मवेशी ? मैं पूछती हूँ। हँस कर कहता है, हैं न, एक गाय और दो बकरियाँ। मैं पूछती हूँ क्या नाम है गाय का। हँसता है कहता है उसका नाम नहीं रखा लेकिन बकरियों का नाम है। क्या ? लवली। मैं हँसती हूँ, दोनों का ? वो जवाब में हँसता है, हाँ दोनों के। एक कुत्ता भी था, मर गया अब और कुत्ते नहीं पालने, बड़ा दुख होता है।

आओ हुज़ुर तुमको सितारों में ले चलूँ

बगल से बारात जा रही है। कुछ लोग पैदल और आगे गाड़ी में दूल्हा। दूल्हा सुंदर खिच्चा है। नरेन कहता है यहाँ शादियाँ दिन में होती हैं। शायद रात को ठंड ने ये रिवाज़ शुरु कराया होगा। मैं मुड़ कर देर तक देखती हूँ। नरेन रियर व्यू मिरर में मुस्कुराता दिखता है। यहाँ ज़्यादा शादियाँ भगा कर होती हैं। मैं हैरानी से पूछती हूँ, फिर माँ-बाप? मान जाते हैं बाद में और क्या? मैं पूछती हूँ और तुम? कैसे करोगे विवाह? भगा कर? उसके चेहरे को लाल पड़ते देखती हूँ। कल अल्ल सुबह रोहतांग को निकलेंगे। तुम आओगे? वो सर डुलाता है। रात बॉन फायर के गिर्द प्रवीन जो ऐक्टिविटी मैनेजर है, कराओके माईक पर गा रहा है, मोहम्मद रफी के पुराने नशीले गाने। ठंड और थकान से निजात पाने के लिये मैंने एक पेग जिन लिया है। लपकते शोलों और जलते लकड़ी के कुंदे को सम्मोहित ताकते मैं सुनती हूँ, कोई लड़की माईक ले कर गाती है बेसुरे पर उतफुल्ल तरीके से, आओ हुज़ुर तुमको सितारों में ले चलूँ

और ऊपर सबसे ऊपर

हाँ-ना के दस दुविधा के बीच तय करती हूँ कि रोहतांग चले ही जाना चाहिये। कहते हैं इस मौसम में बर्फ नहीं मिलेगा। बर्फ का मोह बहुत बड़ा है इसलिये डिसाप्प्वायंट होती हूँ। फिर सोचती हूँ यंगफ्राउय़ॉक में देख तो लिया था अथाह बर्फ। और ये कि फिर आऊँगी अगस्त के महीने में लदे सेब के बगान देखने और दिसंबर में बर्फ देखने। फिलहाल रोहतांग देख ही लेती हूँ। सुबह निकलते हैं। रास्ते में एक के बाद एक दुकानों की कतार है। शॉप नम्बर 077, 310 । 90 , 456, 777, ऐसे ही बिना क्रम के। बूट्स और ठंड के कपड़े, जम्प सूट्स और कोट्स भाड़े पर। रास्ता ऊपर और ऊपर चढ़ता जाता है। किनारे से नीचे की चक्करदार सड़क सफेद रेखा सी दिखती है। नीचे देखते भय होता है। गिरे तो हड्डियाँ तक नहीं मिलेंगी। दूर दूर तक पहाड़ों की चोटियाँ, पत्थरों का अनगढ़ फैलाव। किस विशाल प्रक्रिया से धरती इतनी ऊपर चोटियों तक उठी होगी ऐसे। पहाड़ पर सफेद बर्फ की एक परत है।

हम बार बार घूम कर उसी पहाड़ी पर ऊपर जाते चलते हैं। रास्ते में कोई हैबिटेशन नहीं हैं। पर भेड़ों का झुंड ढलान पर कभी कभार दिखता है। ठंड बढ रही है। पानी का एक टुक़ड़ा दिखता है। कुछ ढाबे नुमा दुनिया, प्लास्टिक के कुछ चेयर्स। यही जगह है जहाँ हम दूसरे पहाड़ पर क्रॉस कर जाते हैं। अब चढ़ाई और तीखी है। पानी और ढाबे की दुनिया खिड़की से दिखती क्रमश: छोटी होती जाती है। आगे अचानक चहल पहल की दुनिया। कुछ आर्मी के जवान या बॉर्डर रोड ऑरगनईज़ेशन के कर्मचारी। साईनपोस्ट प्रॉमिनेनटली डिसप्लेड है। रोहतांग पास बंद है। कल शायद बर्फ गिरी थी। किसी ने कहा था कि पहली सही बर्फबारी पर रोहतांग बन्द हो जाता है। पिछले साल लगभग तीन हज़ार पर्यटक दो दिन तक यहाँ अटक गये थे। पता चलता है पास बन्द नहीं है। ये मढ़ी है। भुट्टे बिक रहे हैं, ऊनी दास्ताने और टोपियाँ, रेस्तराँ में गर्म चाय और मैगी। नरेन कहता है बाथरूम होना हो तो हो लीजिये, इसके बाद कोई जगह नहीं, खुले में जाना होगा। जम्पसूट में किस तरह निपटान हो ये सवाल मुझे जिज्ञासु करता है। मैं फारिग होती हूँ, मेरे जैसे और बहुत लोग हैं। खुले में जाना मुझे बहुत डराता नहीं। लेकिन ज़रा सी प्राईवेसी तो चाहिये। मैं अभी भी मेरी रॉय नहीं हुई हूँ। पुरुलिया में याद है किसी घर के पिछवाड़े खुले में, पौधों और लतरों के बीच फारिग होना। और कोई उपाय नहीं था। बचपन में ऐसे जबकि कई वाकये याद हैं। किसी खेत में या पेड़ों की झुरमुट देख कर हम चिल्लाते थे, बस यहीं गाड़ी रोको। फिर हँसते चिल्लाते उतर पड़ते थे अपने अपने पेड़ ओट के लिये चुनकर। ये ज़रा झेंप भरा पर बहुत नैचुरल क्रिया होती थी।

मढ़ी के बाद का रास्ता कच्चा है और चढ़ाई बेहद तीखी। पेड़ खत्म हैं अब। पहाड़ों पर मॉस और लिचेंस जैसे वनस्पति हैं। एक तरफ महीन कत्थई भूरे रंग की परत। पहाड़ों पर से पानी की धार बह रही है। एक किलोमीटर के फासले पर तीन चार झरने। सफेद झागदार। सड़क का काम हो रहा है। रास्ता चौड़ा किया जा रहा है। ज़रूरी है। फिलहाल तो अगर सामने से गाड़ी आ जाये तो बैक करने का हृदय विदारक भयावह क्रम शुरु होता है। इंच-इंच करते हुये उस जगह तक पहुँचना जहाँ इतनी चौड़ाई हो कि दो गाड़ियाँ निकल सकें। हगिंग द क्लिफ वाली पंक्ति अब समझ में आती है। पहिये से इंच भर की दूरी पर खाई है। मजदूर बहुत से आदिवासी दिखते हैं। ठंड में सिकुड़े हुये बूट्स और हेलमेट में। अपनी जगह से कहाँ दूर चले आये रोज़ी की तलाश में। कैसे रहते होंगे ? क्या सोचते होंगे ? माईग्रेशन हमेशा से मनुष्य की फितरत में रहा है। अपनी बेहतरी के लिये निकल पड़ना।

कभी-कभी ऐसा पलायन मुझे तकलीफ से भरता है। पहले गट रियेक्शन में लगता है जैसे अपनी ज़मीन से विश्वासघात हो रहा हो। फिर सोचने पर लगता है कि मनुष्य ने ये कीड़ा नहीं पाया होता तो इवाल्यूशन की इतनी कहानी कैसे होती। एक कॉंटिनेंट से दूसरे, अफ्रीका से होमोसेपियेंस फिर योरप और ऐशिया में फैले। समुद्र पार किया, नई दुनिया की खोज की। कोई कोलम्बस नहीं होता, कोई मेगेलन नहीं होता, कोई मार्को पोलो और अल बरुनी नहीं होता, फाहियेन और हुयेन सांग नहीं होता। राउंडिंग द केप ऑफ गुड होप पढ़ते मुझे हमेशा बेईंतहा रोमाँच होता रहा है। थॉर हाईडरडाल की कॉन टिकी एक्स्पेडिशन ने हमेशा डूबने और सोचने पर विवश किया है। फिर ये भी याद आता है कि भारत से ऐसे कोई यात्री क्यों नहीं हुआ, मार्को पोलो जैसा या अल बरूनी जैसा ? हमारे भीतर कौन से गुण सूत्र हैं जो हमें जोखिम उठाने से रोकते हैं। उस प्राचीन मध्ययुगीन समय में क्या हम इतना अघाये-खाये-पीये थे कि हमें ज़रूरत नहीं हुई खोज यात्रा पर निकल पड़ने की ? या फिर हममें ऐसा कोई एलीमेंट गायब था जो हमें उकसाता ? या हो सकता है मेरी कोई जानकारी नहीं।

उस जगह को ले लिया है हमेशा के लिये

आगे अचानक कोलतार की चौड़ी सड़क है और पहाड़ी संकरी सड़क कुछ फैले हुये चौड़े पठार पर खुलती है। एक कतार से दुकानें हैं और टट्टुओं की भीड़। चट्टान पर एक गुंबदनुमा मोनैस्टरी जैसी शकल का मंदिर है। यही रोहतांग है। अभी ज़मीन काली और ज़रा कीचड़ भरी है। पत्थर चट बिखरे हैं और पीछे बैकग्राउंड में बर्फीली चोटी है, एकदम पास। मैं कल्पना करती हूँ सर्दियों में जब ये ईलाका बर्फ से ढँका होता होगा। योरप के बर्फीली पहाड़ियों से कहीं ज़्यादा ऊँचाई पर और कहीं ज़्यादा रिमोट और खतरनाक और सुनसान। इन दस दुकानों की कतार के बावज़ूद प्रकृति अपने समूचे अनगढ़ता में भव्य है। तेज़ हवा है और जम्पसूट के बावज़ूद ठंड अपने तीखेपन में छील रहा है। मेरे हाथ सुन्न हो गये हैं। अचानक हल्की बर्फ गिरने लगी है। होम्योपैथी के दाने की तरह छोटी गोलियों जैसी। माउंटेन बाईक से हम और ऊपर जाते हैं। कोई तालाब है, बाईक वाला कहता है बड़ा नहीं है। पर मुझे ठीक ठाक विशाल दिखता है। चट्टानों पर बाईक उछलते कूदते बढती है। बहते पानी की धार को पार करते लगभग समतल चट्टानी इलाके में हमें छोड़ देता है। पिछले खेप के यात्रियों को वापस ले जाना है। दस पंद्रह मिनट में आता हूँ, कहता इंजिन के शोर में डूबता चला जाता है। लगभग आठ दस लोग हैं वहाँ। जहाँ नज़र जाती है चोटियाँ बर्फ ढँकी और कोई कोई परिन्दा चरिन्दा नहीं। बर्फ अब तेज़ी से गिर रही है। हमारे चेहरे लाल हो गये हैं। भौंह और सर की टोपी सफेद। अगर बाईक वाला वापस न आया तो। अजीब से रोमाँच और भय का सँसार है। लगता है इस भव्यता के सामने हम बौने हैं। आसमान गहरा हो चला है। नरेन ने कहा था कि जैसे ही बर्फबारी हो हम तुरत गाड़ी तक लौट आयें। इतनी बर्फबारी कितनी खतरनाक है मुझे नहीं मालूम। एक कॉफी वाला घूम रहा है। दस रुपये की कॉफी मीठी और गर्म है। उसके पास एक बड़ा सा कैनिस्टर है। बिना जम्पसूट जैसे तामे झामे के वो मज़े से है। हम लोगों को देख उसे हँसी आ रही है। कहता है मेरा हाथ पकड़ो, देखो कितना गर्म है, मेरी छाती गला छूओ देखो। तुमलोगों को किस बात की ठंड लग रही है। थोड़ा दौड़ लो गरमी आ जायेगी। अपने सुपीरियॉरिटी में वो बच्चे-सा भोला है। मैं पूछती हो कहाँ रहते हैं आप, यहाँ कहाँ ? सब नीचे से आते हैं हर रोज़, जब तक पर्यटक आते हैं।

नीचे की चट्टानी मॉस ढकी ज़मीन दस मिनट में सफेद हो चली है। हू हू करती हवा और झरते बर्फ में हम अदना से प्राणी अपने पूरे वल्नेरेबिलिटी में है। हमारा सारा दंभ निकल गया है। आर्कटिक अंटार्टिक की पढ़ी कहानियाँ याद आ रही हैं, अलिस्टेयर मैकलीन की नाईट विदाउट एंड और आईस स्टेशन ज़ीब्रा याद आ रही है, अमन्दसेन का अंतार्क्टिक का दक्षिणी ध्रुव एक्स्पेडिशन याद आ रहा है, जैक लन्दन की एस्कीमों हस्की कुत्तों की कहानी कॉल ऑफ द वाईल्ड और व्हाईट फैंग याद आ रही है। बर्फानी प्रदेशों की कैनेडियन और रूसी फिल्में याद आ रही हैं, मैप ऑफ ह्यूमन हार्ट और नेसेसिटीज़ ऑफ लाईफ । बाईक वाला लौट आया है। कुछ देर में हम गाड़ी के पास हैं। भुट्टे वाले की आग पर हाथ सेंकते।

लौटने का रास्ता खामोशी और इंट्रोस्पेक्शन भरा है। उतरना तेज़ी से होता है। किसी एक जगह पर अचानक एक पहाड़ी हल्की ढलान, मुलायम घास से भरी और उसके ऊपर देवदार के पेड़ों का झुँड। मेरी दिल मुँह को आता है। ये मेरी देखी हुई जगह है। ढलान का पेड़ों के बीच रहस्यमय अँधेरे में विलीन हो जाना जैसे यही अपनी बहुत-बहुत पहचानी जगह हो जहाँ कुछ देर लेट कर आँख बन्द की जा सके, एक नींद खुद के साथ। गाड़ी तेज़ी से पार हो जाती है। मैं रुकना चाहती हूँ एक बार वहाँ जाकर लेटना चाहती हूँ, बोलना चाहती हूँ नरेन बैक करो। मेरी आवाज़ नहीं निकलती। गाड़ी आगे बढ़ जाती है। मैं मुड़ कर नहीं देखती। मेरी आत्मा मेरे शरीर से निकल कर उन पेड़ों के बीच चली जाती है। मैंने उस जगह को ले लिया है हमेशा के लिये...

हवाओं पे लिख दो हवाओं के नाम

सोलांग में पैराग्लाईडिंग होती है, स्कीईंग भी। पर अभी बर्फ नहीं है। पर्वतों से घिरी वादी और उनके बीच नदी का चाँदी की तरह बहना। बर्फ के बिना धरती पथरीली और उजाड़ है। हवा में ग्लाईडर्स के सेल पंछियों की तरह उड़ रहे हैं। केबल कार ऊपर ले जाती है तीन हज़ार फीट। ऊपर जाते पहाड़ के ढलान पर पौधे, घास, पेड़ सब का स्वरूप बदलता जाता है। कुछ ऊपर चले जाने के बाद पीले हरे पत्तियों से ढलान ढक जाता है। लगता है धूप की चादर ओढ़े है पहाड़। पेड़ लम्बे सतर खड़े हैं। मैं जानना चाहती हूँ सबके नाम। नरेन ने कहा था, पूछने पर कि देवदार हैं, जामुन हैं। मुझे ज़रा आश्चर्य हुआ था, जामुन ? शायद किसी और पेड़ को यहाँ जामुन कहते होंगे। जैसे होसुर में फल के इतने पेड़ दिखे, कुछ पहचाने जैसे अमरूद और अनार पर कुछ और जिन्हें जनते नहीं थे, पूछने पर बताया सपोटा। कितने फूल, कितनी जड़ी बूटियाँ, हमारे टैसिट नॉलेज के भंडार से सब गायब हो रहे हैं। अपने आस-पास के बायोस्फीयर से हमारा कितना डिसकनेक्ट हो चला है ये हमें मालूम तक नहीं। अनकाशंस इंकाम्पीटेंस, आई आई टी के प्रोफेसर गणेश का पढ़ाया ये मैट्रिक्स याद आता है।

सेब किधर हैं

कुछ दिन पहले एक फिल्म देखी थी बॉटनी ऑफ डिज़ायर। ये माईकल पॉलॉन की एक किताब पर आधारित है जिसमें उन्होंने एक मज़ेदार प्रिमाईज़ रखा है कि हमें लगता है पौधे हमारे नियत्रंण में हैं पर वाट इफ ? द प्लांट्स हव कंट्रोल्ड अस। उन्होंने हमारा इस्तेमाल किया अपने को दुनिया भर में प्रोपोगेट करने के लिये। पॉलॉन अपने अनुभव ट्यूलिप्स, आलू, मारियुआना और सेब के साथ बताते उनको उनके सामाजिक इतिहास के साथ गूँथते चलते हैं। सेब के ठठ बगान देखते मुझे बॉटनी ऑफ डिज़ायर याद आता है। सेब जो हमारे डिज़ायर ऑफ स्वीटनेस को बिम्बित करता है और जो मध्य कज़ाकिस्तान से शुरुआत करते अब यूनिवर्सल फ्रूट बन गया है। सोचती हूँ लौटूँ तो गूगल करूँ कि उनको कैसा मौसम, कैसी ज़मीन मुआफिक होती होगी बढ़ने फलने फूलने के लिये। कितनी ठंड, कितनी बारिश, कितना ढलान।

पहला सेब का पेड़ अँग्रेज़ कप्तान ली ने लगाया। जो पेड़ लगाया वो न्यूटन पिप्पिन था, ज़रा खट्टा कस्सा। आम खाने वाले बाशिन्दों के रास नहीं आया। बताते हैं कि यहाँ मीठे सेब लाने वाला अमरीकी सैमुयेल इवान स्टोक्स था। हिन्दू धर्म से प्रभावित होकर बाईस साल की उम्र में उसने हिन्दू धर्म अपनाया। फिर अपने बाईस सौ एकड़ ज़मीन पर उसने सेब के पेड़ लगाये। स्टोक्स साहब की बेहद रोचक कहानी है। लेपरसी के मरीज़ों की देखभाल, काँगड़ा में भूकम्प के दौरान लोगों की अथक सहायता करना, बीमार पड़ने के बाद कोटगढ़ में जाकर संगन्यासियों की तरह कुछ समय गुफाओं में रहना, बेगार के खिलाफ सी एफ अंड्रूज़ के साथ लड़ना, और स्वाधीनता की लड़ाई में भाग लेना और सेब की खेती को कमर्शियालाईज़ करना। उनको श्रेय जाता है इन पहाड़ी इलाकों को आर्थिक स्वालम्ब देने का। कहते हैं कि मौसम में इतने फल लगते हैं इन पेड़ों में कि उनकी डालियाँ फलों के भार से टूट जातीं हैं ।

फिलहाल मुझे पेड़ उदास दिखे। फल टूट चुके थे। पत्तियाँ राख हो चली थीं। खुद से वादा किया कि अगस्त में सिर्फ सेब लदे पेड़ देखने आऊँगी। तब तक ब्यास के साथ साथ चलते पेड़ों में कल्पना के फल देखती रही। सोचती रही कि यही वो जगह है जहाँ से प्राचीन व्यापार मार्ग की शुरुआत होती थी, यहाँ से काराकोम पास, फिर यार्कन्द, और तारिम घाटी में खोतान तक। नीचे उतरते कुछ पेड़ पीले नारंगी फल से लदे दिखे। जैसे बड़ा पीला सा टमाटर। जापानी सेब। एक किलो खरीदा और हफ्ते भर खाया। हल्का मीठा स्वाद, अच्छा अलग।

रुला के गया सपना मेरा


रेल में बैठी औरत अधलेटी अपने में मगन बेसुरा गाती है, रुला के गया सपना मेरा। उसके गाने में रोने जैसा कुछ नहीं, न सपना जैसा कुछ है। औरत प्रगमैटिक दिखती है। उसका गाना भी वैसा ही कुछ। जरा फटे पैरों को एक के ऊपर एक चढ़ाती करवट बदलती है। उसके चेहरे में यकबयक मुझे वही बच्ची दिखती है मुँहजोर और बेहया और ज़िद्दी । दुनिया से लड़ती। मैं धीरे से आँख बन्द कर लेती हूँ। कनिंघम रोड और कैंटोन्मेंट ऐरिया से गुज़रते पाम के वृक्ष के पँखे से फैलाव के बीच किसी तेरहवीं सदी में कृष्णदेव राय के परपिता द्वारा बनाया चंद्रचूड़ेश्वर मंदिर, पहाड़ी टीले पर स्थित, पत्थर काट कर गुफा नुमा पर विस्तार से बनाया मंदिर याद आता है। सभी मूर्तियों के नीचे नामपट्ट हैं, तमिल में और अंग्रेज़ी में। हम सब किसी भी भगवान को प्लेस नहीं कर पाते सिवाय नवग्रह के ।

भगवान भी गज़ब हैं। जाने किस किस छलिया नाम के पीछे छुपे हैं, किस सरल भक्त को दर्शन देंगे ? मुझे तो नहीं। होसुर का पुजारी जो गणेश पूजा करते अपनी अँगूठियाँ और हार भगवान को पहनाता उनका शृंगार करता है और पूजा सम्पन्न होने पर उतार कर फिर पहन लेता है, शायद उसको देंगे दर्शन, उसके भोले भक्ति को। हथेली में दबा फूल और भभूत दाबे मैं निकल आती हूँ, आरती में पैसे न चढ़ाने के ज़िद पकड़े। उत्तर से दक्षिण का सफर, सब भीतर ही भीतर होता, अनएक्स्प्लोर्ड दुनिया को नापना। मल्टीपल एक्सिसटेंस।


दिमाग में यही सब चलाती मैं ढलान पर बैठी हूँ। केबल कार से ऊपर पहुँच कर फिर ज़रा तीखे ढलान से नीचे उतरना। कहीं कहीं ढलान इतना तीखा है कि बैठ कर उतरना पड़ रहा है। भय है कि अगर खड़े उतरूँ तो मेरी रफ्तार इतनी तेज़ हो जायेगी कि रुकना मुश्किल होगा। सामने ज़रा हल्के ढलान के बाद गहरी खाई है। ज़रा देर बाद ज्ञान होता है कि अगर टेढ़े उतरें अपने शरीर को पीछे ठेले तो सेंटर ऑफ ग्रविटी रीलोकेट हो जाये, गिरने का अंदेशा कम। खुदा-खुदा करके समतल ढलान पर पहुँचती हूँ। पाईलट्स पैरा ग्लाईडिंग के सेल फैलाये एक के बाद एक अपने साथी के साथ दौड़ते एज़ से अचानक ऊपर उठते उड़ते हैं। अ ग्लोरियस फ्लाईट। मैं अपनी बारी का इंतज़ार करती हूँ। आज मैं इकारस हूँ अपने मोम और परों के पँख के साथ। ऊपर देखती हूँ, अथाह अंतहीन विस्तार। सब मेरे पीछे छूट गया है। संसार और मेरा स्व:। सिर्फ इतना सच है। और वो भी सच है किसी और समधरातल में। मेरे अस्तित्व के परे। इस उड़ान के बाद, इस हवा की तेज़ी और हल्केपन के बाद उतरना खुद में लौटना है। बरसों बाद आज मैं खुद में हूँ, सफर में हूँ।
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