Sunday, May 30, 2010

गोष्ठी : १ : स्मृति

( हम कविता क्या है या साहित्य क्या है सरीखे सवालों से तो दो-चार होते रहे हैं, पर कविता/साहित्य जिन अनिवार्य तत्वों की निर्मिति है, उसकी पहचान और परख करने में दिलचस्पी कम लेते हैं. स्मृति रचना का ऐसा ही एक अनिवार्य तत्व है. अपने तईं उसकी व्याप्ति और असर को कुछ रचनाकारों ने सबद के अनुरोध पर यहाँ कलमबद्ध किया है. उम्मीद है विचार-विनिमय की यह प्रक्रिया इसी तरह की कुछ और बुनियादी जिज्ञासाओं की ओर हमे ले जाएगी. सबद गई  १८ मई को दो साल पूरे कर गया. उसका काम और जिम्मेदारी इस दरम्यान बढे हैं, इसका उसे संतोष और अहसास बराबर रहा है. गोष्ठी नामक यह स्तंभ भी उसी अहसास की उपज है. )


किसी स्थगित अर्थ की तरह

गीत चतुर्वेदी

यह ऐसा बुनियादी विषय-संबंध है, जिस पर एक दौर में लगभग हर रचनाकार सोचता है, और आश्‍चर्यजनक तौर पर जो चीज़ें ऊपर-ऊपर अद्वितीय जान पड़ती हैं, वे दरअसल एक साझी क्रीड़ा ही होती हैं. इस पर सोचते हुए मुझे जॉयस, प्रूस्‍त और निर्मल वर्मा एक साथ याद आते हैं.

और महाभारत का वह दृश्‍य याद आता है, जब श्रीकृष्‍ण पराजित हो चुके हैं, उनकी सोलह हज़ार पत्नियां भीलों के साथ भाग चुकी हैं, उनकी मदद को आया अर्जुन परास्‍त-हताश है, उससे गांडीव तक न उठ सका और वह उनकी कोई मदद न कर पाया. इस अपमान-बोध के साथ वह त्रिगर्त में जाकर प्रायश्चित कर रहा है, अपनी असमर्थता के विलाप में प्राचीन सामर्थ्‍य का स्‍मरण कर रहा है, ख़ुद को कोस रहा है. इससे पहले गीता वाले हिस्‍से में वह श्रीकृष्‍ण के कहने पर विस्‍मृति का आवाह्न करता है; सारे नाते-रिश्‍तों के विस्‍मरण का आवाह्न, लेकिन इस बाद वाले प्रसंग में उल्‍टा है. यहां वह स्‍मृति का आवाह्न करता है और विस्‍मृति को कोस रहा है. उसे दुख है वह क्‍यों अपना हुनर भूल गया.

यह पहली बार है जब किसी व्‍यक्ति पर वह शाप फलीभूत होता हो, जो दरअसल उसे मिला ही नहीं था, उसके प्रतिद्वंद्वी को मिला था. एक समय कर्ण को मिला विस्‍मृति का शाप अर्जुन की विजय का कारक बनता है, और आज अर्जुन ख़ुद विस्‍मृति का शाप, जो मिला ही नहीं, झेल रहा है. यह उसे अ-जाने ही लग गया. इस प्रसंग में स्‍मृति और विस्‍मृति के बीच पराजित अर्जुन एक स्‍थगित अर्थ की तरह वास करता है. अर्जुन ने यह प्रसंग जिया, इसीलिए मेरी नज़र में वह एक रचनाकार व्‍यक्तित्‍व बनता है. स्‍मृति और विस्‍मृति के बीच किसी स्‍थगित अर्थ की तरह वास करना रचनाकार या कलाकार को मिला शाप होता है, अर्थ की आहुति या उसे आहूत करने में आकंठ प्रयासरत.

वह स्‍मृति की शरण में होता है. गौरवशाली नहीं, बल्कि पराजित. जो कुछ जिया, वह कोई विजय नहीं था. जो नहीं जिया, वह भी पराजय ही था. स्‍मृति इन सबको मिलाकर बनती है. यहां हां और ना की वर्तनी एक ही वर्ण से बनती है. हकार और नकार अपनी चित्रात्‍मक-ध्‍वन्‍यात्‍मक उपस्थिति में अलग-अलग होने के बाद भी एक ही होते हैं. इसीलिए स्‍मृति पराजय का परिष्‍कार है, हर कि़स्‍म की पराजय. विजय भी दरअसल पराजय का ही एक नाम है.

स्‍मृति से निजी कुछ नहीं, कुछ भी नहीं. उससे ज़्यादा मैनिपुलेटेड कुछ नहीं, कुछ भी नहीं. वह विस्‍मृति की बैसाखी पर चलती है, इसीलिए लगातार संघर्ष करती है. स्‍मृति का स्‍मृति से संघर्ष, स्‍मृति का विस्‍मृति से संघर्ष, स्‍मृति का कल्‍पना से संघर्ष, स्‍मृति का सच से संघर्ष और स्‍मृति का अवधारणाओं-परिकल्‍पनाओं से संघर्ष-- यह सब न जाने कितने स्‍तरों पर चलता है, एक साथ न जाने कितनी सृष्टियों में— तभी निर्मल वर्मा कहते हैं—आज का मनुष्‍य विस्‍मृत मनुष्‍य की अनेकानेक सृष्टियों का स्‍मारक है. घटना, स्‍वप्‍न, अनुभूति, कल्‍पना के स्‍मृति बनने के बीच जो अवकाश है, मात्र उसी में विस्‍मृति के महाखंड बन जाते हैं. इसी अवकाश के बीच विस्‍मृति की सृष्टियां रच जाती हैं. इन्‍हीं सारे संघर्षों के बीच सहकार भी जन्‍म ले लेता है- बिना किसी को अंदाज़ा हुए.

जिस
तरह स्‍मृति, विस्‍मृति का निर्माण करती है, उसी तरह विस्‍मृति भी स्‍मृति बनाती है. विस्‍मृति कल्‍पना को पोसती है, उसी तरह कल्‍पना एक ख़ास स्‍मृति बनाती चलती है. यहीं आकर स्‍मृति, काल्‍पनिक स्‍मृति में तब्‍दील हो जाती है और कल्‍पना के भीतर एक शरणार्थी अर्थ की उत्‍पत्ति करती है. तब ही स्‍मृति गल्‍प के स्‍वायत्‍त प्रदेश की मरुभूमि को सींचने लगती है. इसीलिए दुनिया का सारा महान गल्‍प स्‍मृति की काल्‍पनिकता का सृजन है.

लिखना एक तरफ़ जहां स्‍मृति है, वहीं वह विस्‍मृति भी है. एक तरफ़ अधिष्‍ठाता है, दूसरी तरफ़ शरणार्थी भी. विस्‍मृ‍त स्‍मृतियों की शृंखला. काल्‍पनिक स्‍मृतियों की मेखला. स्‍मृति की कल्‍पना की माला. घटनात्‍मक-अनुभूतिजन्‍य स्‍मृतियों का अल्‍प विराम. विस्‍मृति के क्षणों का प्रकाशन और स्‍मृति के क्षणों का आलोपन. लिखना दरअसल ऐसा क्षण है, जिसमें दोनों ही प्रसंग एक साथ वास करते हैं— गीता-प्रवचन से पहले वाला विस्‍मृति का आवाह्न भी और गांडीव तक न उठा सकने की लाचारगी में स्‍मृति का प्रायश्चितपूर्ण प्रक्षालन भी.

हिंदू मिथॉलजी में शिव को स्‍मृतियों का संहारक कहा जाता है. अमर देवताओं को भी हर बार जन्‍म लेना होता है, दरअसल हर जन्‍म में वह अपनी स्‍मृति पा लेते हैं. इसके लिए उन्‍हें शिव की स्‍तुति करनी होती है. यानी विस्‍मृति के विरुद्ध स्‍मृति की तपस्‍या करनी पड़ती है. मेरे लिए कथाकृति या रचना, स्‍मृत व विस्‍मृत क्षणों का आलोकन है, जो काल के अवकाश में अश्रव्‍य ध्‍वनि की मानिंद रहते हैं. तपस्‍या एक ललकार भी होती है, चुनौती भी. इसीलिए मेरे लिए लिखना दुनिया के समस्‍त शिव को चुनौती देने जैसा है. शिव जोकि स्‍मृतियों का अधिष्‍ठाता भी है और संहारक भी.

जेल से बाहर निकलने पर रस्‍कोलनिकोव ने सोन्‍या को किस निगाह से देखा होगा-- स्‍मृति की निगाह से या विस्‍मृति की निगाह से? और ख़ुद सोन्‍या ने उसे किस निगाह से देखा होगा— स्‍मृत निगाह या एक विस्‍मृत निगाह से? उस निगाह से, जो उसका सारा अतीत भूल चुकी हो या फिर उस निगाह से, जो उस सारे अतीत को एक बोतल में बंद कर समंदर में बहा चुकी हो या ख़ज़ाने की तरह गाड़ चुकी हो?

यही तो सवाल है; संघर्ष भी; संबंध भी.

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 जीवंत और प्रवहमान स्मृति संबल होती है
 (यह बयान दोस्त कवि गिरिराज किराडू के लिये)
व्योमेश शुक्ल

 एक दिमाग़ स्मृति को तथ्य की तरह इस्तेमाल करता है. एक अन्य दिमाग़ स्मृति के साथ भिन्न तरीक़े से पेश आता है. यहाँ स्याह-सफ़ेद का विभाजन नहीं किया जा रहा है, लेकिन इतना ज़रूर है कि ये इतने आत्मपरक मसले हैं कि मसलन मैं, दुनिया के किसी भी तथ्य को अपनी चेतना में तथ्येतर कर सकता हूँ, या, इसका उल्टा भी कर सकता हूँ. किसी के लिये गिनती और पहाड़े भी तथ्यों के पार की चीज़ें हो सकते हैं और कोई पूरी ज़िन्दगी स्मृतियों को ही गिनती और पहाड़े की तरह गिनता रह सकता है. किसी के लिये स्मृति आत्मपरकता की वस्तुपरकता है ( साही का प्रत्यय ), किसी के लिये वस्तुपरकता की आत्मपरकता ( पुनः साही ).

यह मुद्दा हमेशा असमाधेय है कि स्मृति का रचना के साथ क्या सम्बन्ध है, क्योंकि यह एक बड़ी उपलब्धि है कि हम इस सम्बन्ध को लेकर किसी उपलब्ध एकतरफ़ा निष्कर्ष तक नहीं पहुंचे हैं, स्वयं स्मृति और रचना की प्रकृति के बारे में हमें ज़्यादा मालूम नहीं है, जिन्हें ज़्यादा मालूम है, हम उन्हें संबोधित ही नहीं हैं. बस इतना तय है कि स्मृति रचना का एक बुनियादी पदार्थ है. स्मृति से रचना में कुछ जुड़ता है, बल्कि स्मृति रचना के साथ मिलकर कुछ ऐसा बनाती है जिसे संज्ञापित करना इतना आसान नहीं होता, जितना मान लिया गया है.

स्मृति के प्रकार बड़े धुंधले बेख़बर ढंग से रचना के रेशों में व्याप्त रहते हैं, मसलन विस्मरण के रूपों में. उन्हें नाम से पुकारना दरअसल उन्हें नया नाम देना है. स्मृति का कोई पुराना नाम नहीं होता. रघुवीर सहाय की एक महान कविता हमसे कहती आयी है कि '' देखो वृक्ष कुछ रच रहा है / किताबी होगा वह कवि जो कहेगा हाय पत्ता झर रहा है '' अगर हम किताबी होंगे तो स्मृति के निर्माणों को देखकर उन पर '' हाय पत्ता झर रहा है '' का आरोप लगाने लगेंगे. अगर हम निर्माणसंभावी होंगे तो स्मृति के निर्माणों पर ग़ौर करेंगे और स्मृति की ताक़त से ख़ुद भी कुछ अपने लिये, कुछ उनके लिये रचेंगे.

जीवंत और प्रवहमान स्मृति संबल होती है. वह वर्तमान में वर्तमान होकर दखलंदाज़ी करने लगती है. जो स्मृति वर्तमान में उपद्रव न कर दे वह क्या स्मृति. गुस्ताख़ी माफ़ हो, लेकिन कम जीवंत स्मृति ही '' वे दिन '' हो जाती होगी. स्मृति के संस्करण ही उसका मूल रूप होते हैं, जिस स्मृति ने अपने नये संस्करण तैयार करना बंद कर दिया है उसे शक की निगाह से देखा जाना चाहिए. स्मृति को जब भी किसी शाश्वत और आदिम अर्थ में स्थिर किया गया है, इतिहास गवाह है, वह प्रतिक्रियावादियों का हथियार बनती दिखाई दी है. जो क्रियाएँ स्मृति की शाश्वतता को चैलेन्ज कर रही हैं, स्मृति के निश्चित और आत्मविश्वस्त इस्तेमाल को उलझा दे रही हैं, निजी स्मृति और लोक स्मृति के द्वैत को धूमिल कर रही हैं, उन्हें एक दूसरे में घंघोल देने की चेष्टा कर रही हैं, रचनाकार का उपकरण वही हो सकती हैं. हमारा रास्ता उन्हीं में से होकर जाता है.

आजकल स्मृति और कल्पना में बहुत से फ़र्क़ देखने वाली निगाह भी रद्द लगने लगी है. यह यथार्थ से डरने या भागने की तरक़ीब हो सकती है या सरल बातचीत करने की सुविधा. उसे जायज़ विभाजन मानना मुश्किल है. क्योंकि किसी भी यथार्थ का अनुभव या तो स्मृति है या कल्पना. या दोनों एक ही बातें हैं. आख़िर स्मृति से कल्पना का काम क्यों नहीं लिया जा पा रहा है ? यह कोशिश या ऐसी कोशिश हमारे रचनात्मक अभियान का हिस्सा क्यों नहीं है ? अगर है तो इतनी कम और अपवाद-सी जगहों पर क्यों है ? और भविष्यों की स्मृतियाँ कहाँ हैं ? उनका इतना बुरा हाल क्यों है ? क्या कोई सर्वानुमति बन गई है कि आगामी की कोई स्मृति नहीं होती, और हर मौक़े पर स्मृति एक व्यतीत वस्तु, एक बीत गई चीज़ है ?

स्वप्न का मुद्दा भी यों ही छूटा हुआ सा है. उसे सचाई या जीवन-व्यवहारों से जुदा करके समझने का रूमान फिलहाल बहुत चुप्पे जोश में है और यह तेवर इतने मनचले ढंग से सक्रिय किया जा रहा है जैसे ये निरे व्यक्तिगत मामले हों, जैसे इंसानियत कोई सामूहिक ख़्वाब देखती ही न हो, जैसे स्वप्न की स्मृति होती ही न हो. बीसवीं सदी ने हमारी मनुष्यता में जो कुछ विशिष्ट और महान जोड़ा है - ज़ाहिर है कि सपने की शख्सियत का अभिज्ञान उसका अनिवार्य अंग है - उसे अवमूल्यित करके पेश करने के षड्यंत्र का हिस्सा हो सकता है यह रूमान. लेकिन रचनाकार को याद रहना चाहिए कि उसे किसी भी षड्यंत्र के ख़िलाफ़ रहना है. इसलिए इसके भी विरुद्ध.

मैं बनारस में रहता हूँ और बनारस में एक गाँव है लमही. हम जानते हैं कि इस गाँव के एक नागरिक को इस गाँव समेत पूरी दुनिया में भूला जा रहा है लेकिन इस गाँव या इस सभ्यता के लोगों की सबसे बड़ी पहचान है कि वे भूलने से डरते हैं. वे भूलते ज़रूर हैं लेकिन भूलने से डरते हैं. यही उनका व्यक्तित्व है. यही उनका बयान है. वे अपने नागरिक को भूलना नहीं चाहते लेकिन भूलते जाते हैं. ऐसे हालात में एक सभ्यता अपने विस्मरण के ख़िलाफ़ अनोखी कार्रवाइयां करने लगती है. लमही के लोगों ने गाँव में बाबा भोलेनाथ का एक दिव्य मंदिर बना डाला है. क्या आप उस मंदिर का नाम जानना चाहते हैं ? उस मंदिर का नाम है प्रेमचंदेश्वर महादेव. इस स्थापना पर हँसा जाये या रोया जाये ? मैं कहना चाहता हूँ कि स्मृति को विध्वंसक हो जाने से रोकने के लिये साहित्य ज़्यादा से ज़्यादा एक मोर्चा हो सकता है, उस पर निर्भर होना, जैसा मुक्तिबोध ने कहा था, ''मूर्खता'' है.

तो एक लेखक के रूप में मैं ख़ुद पर स्मृति की ज्ञानसम्मत, विवेकसम्मत और राजनीतिसम्मत निगरानी की ज़िम्मेदारी आयद करता हूँ. और यह भी कि यह कोई साहित्यिक मामला नहीं है.
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मुड़ कर किसी याद में सेंध मार लेना, आसान लिखाई है


प्रत्यक्षा


जंगल
में सूखे पत्तों पर पाँवों की चरमराहट स्मृति है, जो कहीं भी चलो साथ चलती है , पहाड़ पर, समतल पर, सूखे बंजर चट निचाट धरती पर. पत्तों की ध्वनि हर चाप पर भीतर बजती है. जैसे कोई बार बार देखा सपना दिन में भी साथ चलता है, उठते बैठते न होते न दिखते हुये भी भीतर कहीं, उन रास्तों पर जहाँ चले नहीं, उस दुनिया में जहाँ रहे नहीं का मीठा आस्वाद.

स्मृति सिर्फ बीता हुआ समय नहीं, वो आगत का भी स्मरण है, और लिखना किसी समूची तस्वीर में उनसब का समावेश है, अपने भीतर की उन सभी यर्निंग्स को खोजने की कोशिश है, समय जगह रस रंग की शिनाख्त है, जो हो चुका और जिसका होना हम चाहते हैं, वही कथा में आता है. लिखते हुये याददाश्त हमेशा साथ रहे, कि जो हमारी कल्पना है वो उन सब चीज़ों के मिश्रण से बनी जो हमने भोगी, जो भोगना चाहते हैं. स्मृति के छौंक के बिना कथन अधूरा है बशर्ते ये साफ समझ लिया जाये कि स्मृति का कनोटेशन कितना व्यापक है, जो हम नहीं जानते वो भी हमारी सामूहिक याददाश्त का हिस्सा है, या यों कहें कि हम उनका हिस्सा हैं.

कोई बुनावट होती है जिसके रेशे एक दूसरे में गुँथे होते हैं, परतें होती हैं कई उनमें से अदृश्य फिर भी अहम । स्मृति कई बार वही अदृश्य परत होती है जिसकी नींव पर लिखने की इमारत खड़ी की जाती है, वही कोरा सफेद कैनवस होता है जिसके सामने कूची लिये हम खड़े होते हैं रंगों के उन्मत्त हुल्लड़ की भव्य पच्चीकारी करने की सिहरती सँभावना से.

कुछ लिखना अपने भीतर के कूँये से ठंडा मीठा पानी निकालना होता है, शरीर तर करना होता है, आत्मा नम.

शब्द के चारों तरफ एक “औरा” होता है, एक महक होती है, कोई नंगा तार होता है, उसकी नोक को छूने भर की देर हो और स्मृति भक्क से फट जाती है, कोई जलती सुलगती लकड़ी की आँच होती है, कोई लपकती ज्वाला कभी.

लिखना बार बार उसी दुनिया में लौटना होता है, हर बार नये तरीके से और नये दरवाज़ों से. लौटना फिर अपने आप को, अपने परसेप्शन को और उस दुनिया को रीइंवेंट करना होता है. हर बार खुरचकर और भीतर जाना होता है, शायद एक आर्कियॉलॉजिकल एक्स्पेडिशन है जहाँ गहराई के हर स्तर पर किसी और दबी हुई स्मृति के अवशेष मिलें.

मेरे भीतर का लेखक स्मृतियों का पैरासाईट है, उस मायने में बेहद खुदगर्ज़ और स्वार्थी है, बहुत हद तक लुटेरा चोर है. कुछ मक्कारी की नीयत भी है, आलस भी. मुड़ कर किसी याद में सेंध मार लेना, आसान लिखाई है .

तथ्य और कल्पित, स्मृति और संज्ञा रचना की ज़मीन पर एक दूसरे में गुँथे हेलिक्स हैं, कुँडली. महीन बुनावट की कारीगरी है, कोई अल्केमी है जो एक रहस्यमय मिश्रण बनाती है जिसके पीछे कोई तर्क नहीं होता कोई फॉर्मुला नहीं. यह स्वत: स्फूर्त प्रक्रिया बहुत हद तक इंट्यूटिव है.

और अंत में स्मृति मेरी रचनाओं में हमेशा आईसबर्ग की तरह है जिसका कभी ऊपर निकला कम हिस्सा जो दिखता है, उस जैसा और ज़्यादा बार न दिखने वाले उस बड़े पानी में डूबे हिस्से की तरह, जो बहुधा मुझे भी नहीं दिखता या ''वो है ऐसे'' का इल्म मुझे भी नहीं रहता.
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रचना स्मृति के निषेध से भी जन्मती है


आशुतोष भारद्वाज

रचना समेत समस्त दर्ज अभिव्यक्तियॉं एक सतह पर अगर स्मृति का गल्प में कायांतरण है तो वहीं स्मृति के पाश से परे निकल जाने की आकांक्षा भी। स्मृति अगर रचना को उत्प्रेरित करती है तो सर्जन प्रक्रिया स्मृति को संस्कारित करती है। यह गल्प के साथ तथाकथित गैर-गल्पात्मक अभिव्यक्ति मसलन विज्ञान अथवा गणित के प्रमेय या दर्शन की प्रस्तावना, जिन्हें हम निगमनात्मक ज्ञान मान लेते हैं, के संदर्भ में भी उपयुक्त है। क्रौंच पक्षी के दृश्य ने अगर एक कवि को प्रेरित किया था तो किसी वैज्ञानिक को गिरते सेब के बिंब ने या नहाने के टब से फैलते पानी ने झनझना दिया था।

परंतु एक महान रचना स्मृति के सम्मोहक पाश में ही बंधकर नहीं रह जाती। वह अतीत के कतरों से आरंभ करती है लेकिन अपनी स्वायत्त सत्ता भी रचती जाती है। पक्षी की मौत हुई, सेब भी गिरा, नहाने के टब से पानी फैला जरूर, लेकिन उसके बाद जो हुआ वह विशुद्ध अननुमेय था। वाल्मीकि की सर्जना अथवा आर्किमिडीज की स्थापना अपनी स्मृति का बीज फोड़ कहीं बड़े फलक पर अपने को उद्घाटित करती है। सृजन प्रक्रिया में कुछ ऐसा मायावी रहस्य निहित रहा आता है जिसे बुद्धिजन्य समझ या स्मृतिजन्य अनुभव की कोटियों से नहीं चीन्हा जा सकता।

दूसरे, गल्पकार स्मृति के कच्चे माल को तराश अपना आख्यान रचता है तो इस प्रक्रिया में वह कच्ची स्मृति को भी तहजीब सिखाता है, अतीत के घुमड़ते आते बदहवास लम्हों को अनुशासित करता है, आगामी स्मृति किस प्रत्यंचा पर रची जायेगी यह भी उसे सिखलाता है।

यह दिलचस्प है। मनुष्य के बोध तंतु जो दृश्य को किसी विशिष्ट स्वरूप में ग्रहण कर, उसे स्मृति में ढालते हैं, एक रचना सबसे पहले इन्हीं तंतुओं को परिष्कृत-परिमार्जित करती है। रचना से गुजरते पाठक और खुद गल्पकार को भी पता नहीं चलने पाता, रचना का संविधान किस तरह उनकी ग्राहण प्रक्रिया को निर्णायक ढंग से परिवर्तित कर देता है। विनोद कुमार शुक्ल ने इस कदर हमारी चेतना को गढ़ा है कि इन्हें पढ़ने के कई बरसों बाद आज भी किसी छोटे सरकारी दफ्तर, डाकखाने टैलीफोन एक्सचैंज इत्यादि, जाना होता है तो वहॉं के किरदारों की देह पर संतू बाबू की कमीज ही हम ढूंढते हैं। इस स्तर पर शुक्लजी हमारी स्मृति का स्थायी निर्माण कर देते हैं। जीवन के न मालूम कितने पहलू हैं -- पहाड़, बरसात, धूप, प्रेम -- जिनकी स्मृति रचना से ही निर्धारित होती है, जिनके स्मरण में किसी बचपन में पढ़ी कविता, प्रेमिका के साथ भागकर डरते हुये देखी फिल्म के लम्हे बसे होते हैं। प्रेम सी स्वयंभू दीखती अनुभूति के रूपाकार भी कई बार हमें कहानी ही स्मरण कराती है।

जो चीज शुक्लजी के संदर्भ में अबोले तौर पर कार्यरत होती है कई रचनाकार इस संविधान का सृजन घोषित तौर पर कर देते हैं। मसलन दिमित्री मैंदलीव की आवर्त सारणी (periodic table) । महज अनुमान से, बिना यह अनुभूत किये कि आगामी तत्वों का स्वरूप कैसा होगा, इतना बारीक तंत्र रच देते हैं वे कि परवर्ती पीढ़ियॉं सदियों तलक अपनी तत्व-संबंधी स्मृति उनके ही विधान में तलाशती है। मैंदलीव की सृजनात्मक कल्पना किसी महान उपन्यासकार से कहीं कम थी? जिस लम्हे वे उन अदेखे तत्वों के जन्म से पहले ही उनका जन्माक्षर रच रहे थे, वही तत्व जिन्हें उनके विद्यार्थी बरसों बाद आविष्कृत करने वाले थे, नक्षत्रमंडल में उनका स्थान बड़ी सुघड़ता से निर्धारित कर रहे थे; उनका ही एक समवर्ती उनसे कुछ ही दूरी पर एक विवाहित स्त्री के बहाने उन सभी प्रेमिकाओं की नियति गढ़ रहा था जो किसी पगलायी हसरत की पुकार के पीछे बिंधी चली जाती हैं। इन दोनो फनकारों के प्रचलित-स्वीकृत अभिधान भले भिन्न हों, समाज इन्हें अलग, शायद विपरीत इकाइयों में भी रखे, खुद इनके औजार व आकाश बहुत अलग न थे। दोनो ही गल्पकार थे, अपने किरदारों की कथा आगामी पीढ़ियों को सुनाना चाहते थे।

एक रसायनशाला में उबलते टैस्ट-ट्यूब से अपनी बूढ़ी उंगलियॉं जला रहा था, दूसरा डैस्क पर झुका स्याही में अपनी रूह भस्म कर रहा था कि अपने चरित्रों को उनकी संपूर्णता में थाम सकें। ब्रौंस्की व अन्ना कैरेनिना अगर उस महान उपन्यासकार की निर्मित थे तो कांच के मर्तबान में चमकते रसायन मैंदलीव के किरदार ही थे जिनसे वे अपनी कथा गढ़ रहे थे, अपनी पीढ़ियों को संबोधित हो रहे थे।

उन दोनो की सृजन-कल्पना के मध्य की प्रचलित फांक कितनी नकली थी इसका हलफ खुद उनके देशवासी कुछ सालों बाद उठाने वाले थे जब टॉलस्टॉय की शवयात्रा में अगर हजारों किसान उमड़ आये थे तो हजारों विद्यार्थी सैंट पीटर्सबर्ग की सड़कों पर आवर्त सारणी के पोस्टर लिये मैंदलीव की देह के साथ चल रहे थे।

तीसरे, स्मृति अगर रचना को निर्मित करती है तो रचना भी स्मृति को रचती है। कहानी के शब्दों में अवतरित होने के बाद स्मृति की काया वही नहीं रहती जो उस शाम थी, जब वह गल्पकार के सम्मुख आ खड़ी हुई थी। स्मृति को खुद भी पता नहीं चलने पाता कितने बारीक स्तरों पर गल्पकार उसे रूपांतरित करता है, अपनी सृजन कल्पना से उसके डीएनए यानी जैविकीय मानचित्र में ऐसी कोशिकाओं को प्रविष्ट देता है कि स्मृति खुद एक गल्प, एक मायावी मिथक बन जाती है। महान रचना अपनी स्मृति को मिथक में परिवर्तित कर देती है।

एक रचना लेकिन स्मृति के निषेध से भी जन्मती है। काफ्का मसलन। अपना पहला उपन्यास, अमरीका, लिखने चले युवा काफ्का, लेखकीय कौमार्य को सहेजे संभाले, उस उपन्यास को ऐसी भूमि पर अवस्थित करते हैं जहॉं वे तब तक तो क्या अपने पूरे जीवन में कभी नहीं जाने वाले थे और जिसके प्रति उन्हें कोई विशेष लगाव या अलगाव रहा हो ऐसा भी नहीं दीखता। क्या कोई बतायेगा एक सत्रह वर्षीय नायक के भटकावों को चित्रित करने के लिये वे उसे यूरोप से भगा अमरीका क्यों ले आते हैं? कल्पना कीजिये कोई लेखक जो कभी रांची या आगरा या नागपुर से कभी बाहर नहीं गया लेकिन अपना उपन्यास इटली पर लिखता है।

जाहिरी तौर पर स्मृति महज अतीत की ही नहीं होती, रचनात्मक स्मृति तो कतई नहीं। महान लेखक अपने शब्दों में भविष्य का भी स्मरण करता है। उसमें अनुभव, अनुमान, कल्पना व स्वप्न का कुछ ऐसा अनिर्वचनीय घालमेल रचता है कि कथासागर के किस्से जन्म लेते हैं, अदेखे भविष्य का यूटोपियन आदर्श अपनी उपलब्धि पाता है तो अपनी रूह को तिनता तिनका कौंचते जाते चेतना के तहखाने में बैठे दॉस्तोयवस्की के दुःस्वप्न भी।
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Friday, May 28, 2010

ज़बां उर्दू : ७ : ग़ालिब : दिल की बात



आइन: देख अपना सा मुँह लेके रह गए
साहब को, दिल न देने प' कितना ग़ुरूर था

दिल उसको, पहले ही नाज़-ओ-अदा से दे बैठे
हमें दिमाग़ कहाँ, हुस्न के तक़ाज़ा का

मैं, और इक आफ़त का टुकड़ा, वो दिल-ए-वहशी कि है
आफ़ियत का दुश्मन और आइन: तेरा आशना

सौ बार बन्द-ए-इश्क़ से आज़ाद हम हुए
पर क्या कारें, कि दिल ही अदू है फ़राग का

सबके दिल में है जगह तेरी, जो तू राज़ी हुआ
मुझ प' गोया, इक ज़माना मेहरबाँ हो जाएगा

है एक तीर जिसमें दोनों छिदे पड़े हैं
वो दिन गए कि अपना दिल से जिगर जुदा था

लाज़िम था कि देखो मिरा रश्ता कोई दिन और
तन्हा गए क्यूँ ? अब रहो तन्हा कोई दिन और

मैं बुलाता तो हूँ उसको, मगर ऐ जज़्ब-ए-दिल !
उस प' बन जाए, कुछ ऐसी, कि बिन आए न बने

मेरी क़िस्मत में ग़म गर इतना था
दिल भी या रब ! कई दिए होते

पीनस में गुजरते हैं जो कुचे से वो मेरे
कन्धा भी कहारों को बदलने नहीं देते

रोने से और इश्क़ में बेबाक हो गए
धोए गए हम ऐसे, कि बस पाक हो गए

जिस ज़ख्म की हो सकती हो तदबीर, रफ़ू की
लिख दिजिए, यारब ! उसे क़िस्मत में अदू की

यार से छेड़, चली जाए, 'असद'
गर नहीं वस्ल तो हसरत ही सही
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( कुछ शब्दार्थ : पीनस = पालकी, फ़राग= मुक्ति, वस्ल = मिलन, अदू =शत्रु )
सबद पर ग़ालिब दूसरी दफा.

Wednesday, May 26, 2010

डायरी : आशुतोष भारद्वाज

बाइस दिसंबर दो हजार तीन। दिल्ली

कांच की बोतल में पानी सिहरा, दीवार पर टंगा बल्ब झिलमिला गया।
बोर्हेसः हम आधुनिक यूरोपीय साहित्य के धर्मभंजक हैं।

तेइस दिसंबर दो हजार तीन। सुबह साढ़े ग्यारह। दिल्ली।

लेखक पाठक को ही नहीं खुद अपने को भी छलता है। अपने जाने अनजाने ही। निर्मल की क्षमता इस छल व छलावे को छुपा ले जाने में निहित है। क्या मैं कभी उनसे पूछ पाउंगा कि जब वे मेरी कहानी पर कहते हैं:‘‘अंग्रेज पिता का अपनी संतान से वह संबंध थोड़े हो पाता है जो भारतीय पिता का होता है।‘‘ तो एक दिन का मेहमान, जिसे साहित्य में शायद उनके सबसे करीबी मित्रों ने आत्मकथात्मक कहा है और उन्होंने सहमति भी दी है, में इस वाक्य के क्या मायने हैं-- वे एक ऐसी बच्ची के हाथ थे जिसने सिर्फ मां के सीमित और सुरक्षित स्नेह को छूना सीखा था, मर्द के उत्सुक और पीड़ित उन्माद को नहीं जो पिता के सेक्स की काली कन्दरा से उमड़ता बाहर आता है।

कोई अनाम तारीख।

पिकासोः मैं चीजों के चित्र बनाता हूं जिस तरह मैं उन्हें सोचता हूं न कि जैसा वे मुझे दीखती हैं।

दो-तीन जुलाई दो हजार सात। दिल्ली-बैंगलोर राजधानी।

एक तीसेक की लड़की उपरी बर्थ पर है, मेरी निचली बर्थ बदलने का आग्रह करती है। बहुत संभल कर चलती, डुलती, हिलती है। पूरा स्पेस देता हूं उसे। खाना बड़े धीमे खाती है। देर तक बैठ भी नहीं पाती। पेट को सहेजे जल्दी ही पसर जाती है। मैं तुरंत उपर चला जाता हूं। वह थैंक्स बोलती है। छत्तीस घंटे की यात्रा है। दिन में हम अखबार की क्रॉसवर्ड पहेली सुलझाते हैं। मुझे कुछ शब्द ज्यादा पता हैं तो वह हंसती है। पता नहीं दिल्ली में कौन है इसका, या बैंगलोर में।

दिन भर सोती सी रहती है। शायद नींद ज्यादा आती होगी इन दिनो।

उपर की बर्थ पर लेटा मैं बार बार नीचे देखता रहता हूं लुढ़क न जाये वह। रास्ते का अंत नजदीक आता है तो रेल कर्मचारी फीडबैक फॉर्म दे जाते हैं। मैं चुपके से नीचे झांक लेता हूं -- सत्ताईस साल, विजय नगर। महज तीन किलोमीटर दूर मेरे घर से।

हैरी बैली ने अपनी गर्भावस्था के दौरान कहा थाः मेरे हॉरमोन मुझे पहले से कहीं अधिक दीप्त किये रहते हैं। इन दिनों मैं कहीं कम मेकअप इस्तेमाल करती हूं। मैं हमेशा गर्भ धारण किये रहना चाहती हूं।

नौ जनवरी दो हजार नौ। सुबह नौ। एम्सटर्डम हवाई अड्डा। रैंब्रा म्यूजियम की गैस्ट बुक में कुछ टीपें।

'हवाई अड्डे में म्यूजियम! अठ्ठाइसवां जन्मदिन रैंब्रा के चित्रों के साथ।'
रोस बोनिन, एडिनबरा। नौ जनवरी

'अंग्रेजी और डच दोनो भाषायें एक साथ। हमारी अटलांटिक भाषा कितनी विपन्न है। लेटिन में म्यूजियम का अर्थः विचार करने का स्थल।'
कैथरीन बारनेट, वॉशिंगटन डीसी। पॉंच जनवरी

एक अगस्त दो हजार दो। रात तीन पचास।

पढ़ते में दूध पीने का मन हुआ। गर्म किया, गिलास में डाला, फूंक  मारी --- भाप से चश्मे का शीशा लिहर गया। उंगली से साफ किया जा सकता था, चश्मा उतारना भी था संभव। दृश्य को लेकिन व्याधित नहीं किया। देर तक दुनिया भापमय रही।

अठारह फरवरी दो हजार छः। दिल्ली।

कहानी अजानी धड़कनों से ही बढ़ती होगी। मैं देखता रहूंगा, मसलन तुम्हें। झनझनाता बजता रहेगा तेज संगीत कहीं। परकोटे से गूंजती आयेगी चिचियाती बिल्लियों की लड़ाई, पढ़ोगे इन पंक्तियों को तुम पता भी नहीं चलेगा तुम्हें झांकता हूं मैं इनके मध्य रिसते आकाश से। न मालूम कौन सी कहानी का किरदार तुम्हारी ही तरह पैर समेट बैठा करेगा। तुम्हारे माथे की चोट के निशान पर कोई बचपन में गिरा होगा।

चार अप्रैल। दो हजार छः। दिल्ली।

कल निर्मल की पहली जयंती पर अशोक वाजपेयी बोलेः निर्मल स्वर्ग-नर्क के बीच कहीं विचरते होंगे। उनका लेखन मानवीय संबंधों में पवित्रता की स्थापना का संगीत है।‘

बारह दिसंबर दो हजार दो।

अतीत की धमक वर्तमान तक आती बासी पड़ने लगती है। वह ऑंच जिसके ताप में हम अर्सा पहले सुलगे थे अब महज सूखी राख हो चुका होता है। डायरी के पुराने पन्ने पलटो तो आश्चर्य होता है यही वह लम्हा था जिस पर हमने समूचे जीवन को टिका मान लिया था, जो अब महज एक घटना, पूरी डायरी में खोया एक पन्ना प्रतीत होता है--- पूरा पन्ना भी नहीं, कुछेक शब्द भर जीवन में जगह जिनकी उतनी ही थी जितनी पूरे कलैंडर में एक तारीख।

मैं चाहकर भी आज की लड़ाई कल की जमीन पर नहीं लड़ सकता।

चौदह मार्च दो हजार तीन। दिल्ली।

हरेक चेहरे के अपने होंठ होते हैं, किन्हीं होंठों के लेकिन अपने चेहरे भी होते हैं। उनकी नमी में आप उस चेहरे के होने को जान सकते हो जो अपने होंठों की तलाश में है।

बारह दिसंबर दो हजार तीन दिल्ली।

मास्क पार्टी में हम पूरी शाम एक ऐसे व्यक्ति के साथ बिता देते हैं जिसे हम जरा भी नहीं जानते, महज एक आस में.....। चेखव की भी शायद ऐसी ही कुछ कहानी है।

साइलेंट कंट्री में एक किरदार वेटिंग फॉर गोडो परः 'एबसर्डिटी ख्याल में घटित होता है या घटना में?'

बीस जुलाई दो हजार पॉंच। रात बारह।

वह रूसी पिता बंगाली मां की बेटी है। चौदह वर्ष का सुखद विवाह, उससे पहले बारह वर्ष का लंबा प्रेम। मुड़ती सड़क ने उसके जीवन को मोड़ा है। वह पिछले प्रेम में थी, बचपन के प्रेमी के साथ बड़ी हुई --- मामूली सा झगड़ा हुआ एक बार, जैसा अनेकों मरतबा हुआ था दोनो के बीच। इसी दरमियां किसी से मिली वह दिल्ली की एक सड़क पर --जिसकी बरसों की प्रेमिका परिवार के पास दूसरे शहर छुट्टियों में गयी थी। और महज तीन महीनों में शादी।

छः साल बाद वह फिर दिल्ली की किसी सड़क पर पूर्व प्रेमी से मिली --- देर तक उससे लिपटी रही। घर ले आयी, पति से मिलवाया, कहा: मैं कुछ समय इसके साथ बिताना चाहती हूं।'

मुझे उसके पिता का रूसी होना नहीं पता था लेकिन। मैं उसे सर्बियन समझा था देर तक। मैंने कहा तो उसने कहाः तुम निगाह बड़ी तेज है। है तो मेरा स्लाव ओरिजिन ही।

सत्रह-बीस अक्टूबर दो हजार पॉंच। नर्मदा घाटी के गॉंव।

ढेर मुर्गे इतने कभी नहीं देखे। दिन भर कुकड़ाते हैं। एक मुर्गा, पता चला है, सुबह तीन से शाम पॉंच तक कुकड़ाता है। कई मुर्गे गंजे भी हैं। फुलझड़ी सी कलंगी --- बाकी गरदन, सिर नंगा। गंजा मुर्गा चलता है गरदन उचकती आगे बढ़ती है, देह उसकी बाद में आगे आती है, पहले गंजी गरदन आगे बढ़ती है मानो किसी से गरदन लड़ाने बढ़ रहा हो। आगरा-मथुरा के लड़ाकू मुर्गे यहॉं ले आये जायें तो इन्हें चिढ़ा-चिढ़ा कर मार डालेंगे --- गंजे, ओए गंजे --- सारी मुर्गियों को भगा ले जायेंगे।

महुये की भट्टी के उपर उंबर का पेड़ तना है। उबलते महुये की भाप भट्टी से जुड़े तने से हो पतीले में इकठ्ठी होती है। दो युवक पतीले को लकड़ी से हिलाते हैं।

‘मैं इसका साड़ू हूं।'
‘नहीं, मैं इसका साड़ू हूं।'

अगर कहानी संस्मरण का, स्मृति को कथानक में ढालने गल्प है, तो संस्मरण बिखरी स्मृतियों को आख्यान न दे पाने का गल्प है।

छब्बीस अक्टूबर दो हजार पॉंच। रात नौ।

अभी लौटा हूं लोधी रोड शमशान घाट से। निर्मल को विदा कर। क्या मेरी लकीरों में उन्हें अंतिम बार देखना बदा था? कल देर रात लौटा था बंबई से। रेल से भी लौट सकता था। कल रात चल आज शाम पहुंचता, पता भी न चल पाता निर्मल के जाने का। कंपनी मेरी भले हवाई जहाज की टिकट दे रही थी मन जरा भी नहीं था उड़ कर जाने का। अगर जिद न की होती बॉस ने...।

आज बीस अप्रैल दो हजार दस, संयोग से निर्मल के जन्म का महीना, डायरी में लिखे को टाइप करते वक्त अचानक कौंधा--- मुझे निर्मल के जाने का पता कैसे चला? छब्बीस की सुबह दैनिक जागरण में। जिन अखबारों को मैं मंगाता हूं उनमें तो नहीं थी यह खबर। कभी अखबारवाला कोई दूसरा अखबार पटक भी जाता है लेकिन ऐसा हो ही नहीं सकता कि एक्सप्रैस या हिंदू के बदले जागरण हो।

मेरे घर सुबह सुबह जागरण आ कहां से गया?
कौन किसकी प्रतीक्षा में था?

उन्तीस दिसंबर दो हजार पॉंच रात दो। मथुरा।

निनुआ का डर। दस साल का बेटा अपनी मॉं का पेट सातवीं बार, उसके होश में तीसरी बार, फूलता देखता डरता है। फिर से सब पड़ौस में चिढ़ायेंगे उसे -- तेरा बाप हर साल डायरी छापता है।

अठारह जनवरी दो हजार छः। रात दस।

आज जनवरी की रात फरवरी की हवा थी। न तो इतनी कंपकंपी कि स्वेटर पहनना पड़े न ही इतनी मुक्त कि बांहें आपस में न भिंच जायें। बगैर गीले की बारिश। टेरिस पर एक कविता बहती थी... नहीं कविता नहीं, किसी प्राचीन काव्य की पंक्तियां शायद। बहुत महीन प्रेम राग। मुखर्जी नगर की सड़क हिलती थी। मन हुआ किसी को बताउं-- कोई फोन या एसएमएस ही सही। मोबाइल की कांटैक्ट लिस्ट पूरी देख डाली। लौट कर डायरी पर आया।

तेइस जनवरी दो हजार छः। मथुरा का कोई गांव।

मौहरू आगे बढ़ता जाता था। पीछे भाईसाब चलते थे। मौहरू के हाथ में छड़ी थी जिसे वह घुमाता चलता था। भाईसाब के हाथ लोटे के न होने से खाली थे।
‘मौहरू कहॉं जा रौ है?'
‘भाईसाबअन ने जंगल लेजाबे।'
‘इतकू कहां जारौ है? खेत तौ बा माऊं ।'
‘भाईसाब सहर ते आये हैं। खेत में ना उतरे उनकी। लल्लन के घर फलेस की लगी है। वहीं ले जा रौ हूं।'

परसों दिल्ली के डाकखाने में रजिस्ट्री करवाने की लाइन में गौंडा का एक मजदूर खड़ा था। छोटा, गठीला। मैल की भभक। सहसा लगा कितनी चीजें के बारे में तो मैं जानता ही नहीं --- मनीआर्डर के पैसे इकठ्ठे करना, लाइन में लग घर भेजना, फोन पर बताना कि पैसे चल दिये हैं फिर पहुंचने का इंतजार।

मनीआर्डर तो तीन दिन में ही पहुंच  जाता है, देहात तक ले जाने में डाकिया देर कर देता है। मनीआर्डर पर दस रुपया अलग से लेता है। कितनी राशि थी उसकी--- नौ सौ रुपये। उस पर पैंतालीस डाक खर्च। पॉच रुपया सैकड़े के हिसाब से।

सबसे करीबी जो मैं ऐसे अनुभव के पहुंचा हूंगा --- बंबई के दिनों में रेल टिकट आरक्षण को वीटी पर लाइन। कन्फर्म टिकट, साइड की बर्थ उन दिनों दुनिया की सबसे बड़ी इनायत हुआ करती थी।

तेइस फरवरी दो हजार छः दिल्ली।

फुटपाथ पर एक आदमी दो बच्चों से अपने काली पीठ खुजवा रहा था। पूरी बनियान उघाड़ दी थी उसने। कुबड़े की मुद्रा में पूरा झुक गया था। बच्चों ने आधी आधी पीठ बांट रखी थी। उपर से नीचे तलक खुजला रहे थे। पूरी तन्मयता से। छोटा वाले बच्चे के लिये पिता की पीठ पियानो का की बोर्ड हो गयी थी। बच्चे की उंगलियॉं पीठ के उपर तक नहीं पहुंच पाती थीं। पिता झुकता जाता था। पियानो पिता बजते राग में खो गया था।

छः अप्रैल। दो हजार छः। दिल्ली।

सर्वश्रेष्ठ ने बताया मेरा नाम उसके पिता का भी है। जब भी मुझे नाम से बुलाता है या मेरा नाम मोबाइल स्क्रीन पर चमकता है पिता का चेहरा चमकता है।

यूरी मार्कोविच नागीबिन की कहानी माई फर्स्ट एंड मोस्ट बिलव्ड फ्रैंड का समर्पण वाक्यः बेवजह प्यार करने लग जाना आसान है। दोस्ती कभी इतनी गैरजिम्मेदार नहीं होती।

अठारह मई दो हजार छः। दिल्ली।

पंद्रह मई आईटीओ पुल से गुजर रहा था। नीचे एकदम सपाट मैदान। महीना भर पहले अखबार में-- शायद द हिंदू में ही -- था यहॉं की

झुग्गियॉं हटा दी गयीं। तब से अब आ रहा हूं जहॉं साल पहले सबसे पहले रिपोर्ट की थी कि यहॉं की झुग्गियॉं कॉमनवैल्थ गेम्स के लिये हटायी जाने वाली हैं और इन दो-ढाई लाख लोगों के लिये कोई पुनर्वास योजना नहीं है।

नीचे उतरता जाता हूं। दीवार खिंच रही है। 'बड़ी रौनक थी यहॉं, लक्ष्मी नगर तक से लोग आते थे।' कुछ लड़के वहीं बैठे तंबाखू पीते बताते हैं।

दूर तक मलबा जो अभी नहीं हटा। दूर काली के टूटे मंदिर पर चार लोग गांजा पी रहे हैं। देवी का जूड़ा खुल गया है, मिट्टी की नंगी चांद चमक रही है। देवी का शेर लंगड़ा लेटा है। यहीं कहीं वो बंगाली परिवार रहता होगा जिसका बीमार आदमी अपनी औरत को बाहर जाता देखता रहता था, जिसकी कहानी मैं लिखना चाहता था।

मैं गांजा पीने में खांसता हूं, छोटू हालदार कहता हैः ‘अभी एलकेजी में हैं ये।‘ ‘नहीं, नर्सरी में।‘ मैं कहता हूं।
मिट्टी की चिलम में गांजा और तंबाखू का बुरादा। तंबाकू 502 पताका बीड़ी को खोल निकाला गया।
अभी भी याद है मुझे क्या हैडलाइन दी थी मैंने ----Games On Graves.

ग्यारह जून दो हजार छः। मथुरा रात साढ़े नौ।

बचपन की ये गलियॉं, दोस्त किसी दूसरे ग्रह के दीखते हैं। कुछ भी नहीं जो आज साझा कर सकूं इनसे। आश्चर्य होता है किसी उम्र में यहॉं रहा था, पागल हुआ था।

मच्छर पकड़ने का रैकिट पहली बार देखा। बैडमिंटन के रैकिट जैसा। मच्छर पकड़ते पकड़ते चिड़िया बल्ला खेलने लगो या फिर चिड़िया बल्ला खेलते में मच्छर मारने लग पड़ो। मथुरा आ हर बार कुछ ऐसा पता चलता है जो दिल्ली में नहीं ही होने पाता। ढेरों दिलचस्प गालियां  या सट्टेबाजी मसलन --- छंगू का छोरा नाले में गिर गया। यह कोड वर्ड है इंगित करने का कि बोली बढ़ने वाली है।

दो जुलाई दो हजार छः रात साढ़े चार। दिल्ली।

अभी अभी हमने पच्चीस साल बाद वैस्ट इंडीज में पहली टैस्ट सीरीज जीती। कमेंटेटर अंत तक आते भावुक हो गया। एकदम अंत में, विदा लेने से पहले बुलंदी से कहा--- जय हिंद।

अंधेरे में जाग कर कमेंट्री सुनना, और जय हिंद। और मेरा यह तीसरी मंजिल का हवा में डोलता कमरा। न जाने कितने समय बाद किसी को जय हिंद कहते सुना।

आठ जुलाई दो हजार छः रात पौने दो। दिल्ली।

एक बिंदु वह भी आता है जब हम किसी और को चाहने की आड़ में खुद अपने को ही चाहने लगते हैं। हम प्रेम करते हैं तो महज इसलिये हम अपने को चाहना चाहते हैं। यही बिंदु है जब हम भीतर से खाली होने लगते हैं।

सत्रह जुलाई दो हजार छः सुबह साढ़े पॉच। दिल्ली।

जुलाई की सुबह, उमस का आभास दिलाते लेकिन असलियत में रूखे बादलों की सुबह कितनी शुष्क होती है। उगते आकाश में रत्ती भर चमक नहीं होती। बादलों के पार्श्व में महीन सी नीली लकीरें दीखती हैं बस... बाकी पूरा आकाश उदास रहा आता है।

कल सुबह की याद है। सूरज बाबू सफेद गोला थे महज। कोई पहली मरतबा देखे तो जान ही न पाये यह कितनी रंगतों के साथ सुबह के आकाश में भासित होता है। वे अनेक सुबहें और शामें, जब सूरज को एकदम ठंडे फीकेपन में उमड़ते, उतरते देखा किया है। नितांत ठंडा गोला...चुपचाप। भूगोल या भौतिकी का न जाने कौन सिद्धांत होगा जो बतायेगा सूरज कैसे रंगतें बदलता है।

एक तरीका तो मेरे पास भी है वैसे। अपनी डायरी से हर मौसम के सूरज की कतरनें अलग करूं--- रेलगाड़ी में सुबह, हवाई जहाज में शाम, माउंट आबू का सहमा सा सूरज, औरंगाबाद का चिल्लाता। और बंबई का? मायावी। बंबई का आकाश भी कमबख्त तिलिस्मी है। बड़ा मुश्किल है उसे थामना।

नौ जनवरी दो हजार सात रात एक। दिल्ली।

ब्रेष्टः ‘‘वह इंसान वाकई दुर्भाग्यशाली है जिसके पास कुछ कहने को है लेकिन सुनने को कोई नहीं, लेकिन उससे भी अधिक भाग्यहीन वे हैं जो किसी को सुनना चाहते हैं लेकिन उनसे बात करने को कोई नहीं।‘‘

अठ्ठाइस जनवरी दो हजार सात दिल्ली।

सत्यजित रे की शक्ति उनके क्लोज अप में है। इतना विश्वास है उन्हें अपने किरदारों पर, शायद खुद अपने पर उनसे मनचाहे अनुभाव हासिल कर लेने का कि वे कैमरा उनके चेहरे पर ठहरा सा देते हैं, कोई आप पर निगाह गड़ा बैठा हो।

टिन ड्रम का नायक ऑस्कर अपने जन्म के समय को याद करता हुआः मैंने इस सृष्टि की रोश्नाई पहली मरतबा साठ वॉट के बल्ब में देखी।

अठारह अगस्त दो हजार सात दिल्ली।

आज कहीं पढ़ा 1994 में पूना की पच्चीस मनोरोगी औरतों के गर्भाशय निकाल दिये गये। डॉक्टर ने कहा यह एकमात्र तरीका था उनका रोग दूर करने का।

कार्लोस सौरा की क्रिया क्युयरवॉस
एक चौदह साल की लड़की अपने टॉप के उपर ब्रा पहन, शीशे में अपने को देखती है। आठ साल की उसकी बहन कहती है:‘ये बहुत बड़ी है। तुम्हारे साइज की नहीं है। मैं कभी ऐसी चीजें नहीं पहनूंगी'।
बड़ी बहनः इसके बिना तुम कभी दौड़ नहीं पाओगी।

व्हाट इज डिजायर में सार्त्रः मनुष्य इसलिये एक यौनिक प्राणी नहीं है कि उसके पास यौनांग हैं। उसके यौनांग हैं क्योंकि वह मूलतः एक यौनिक प्राणी है।

बीस जनवरी दो हजार नौ। हेलेना।

धूप सन्नाटा भी होती है, हेलेना आकर ही पता चला है। भारत की धूप में अजीब सा शोर समाया रहता है...एक बवंडर सी धूप, गर्मियों में किसी बौराये कुत्ते की भौंक, सर्दियों में हलवाई की दुकान के नीचे ठिठुरते भूखे मरियल पिल्ले की कोंक। लेकिन हेलेना की धूप चुप चुप रहती है, अक्सर सहमी सी चुप्पी जो गॉथिक शैली की बर्फ से ढकी इमारतों से गुजरते हुये भयावह सी भी लगने लगती है। भारत के पहाड़ी इलाकों में बेढब, बेतरतीब घरों को देख करुणा उमड़ती है लेकिन यहॉं की चुप खड़ी सफेद इमारतें डराती है, मानो कितने राज अपने में डबोये बैठी हों। एडगर एलन पो असहनीय की हद तक अपनी क्रूर कहानियॉं इसी देश में लिख सकते थे।

कल पो का दो सौंवां जन्मदिन बीत गया। अर्से से उनकी कहानियॉं पढ़ते आये मुझे कल के दिन उनकी ही भूमि पर होना था। क्या दूसरा न कोई ऐसे ही किसी बर्फीले पहाड़ी शहर में लिखा गया था? वैद साहब अगर अमरीका न आये होते तो क्या इसे लिख पाते? बर्फ निर्मल के यहां भी है, ढेर बर्फ। लेकिन बड़ी कोमल है। बर्फ के गाले, निर्मल को बहुत प्रिय। वैद की बर्फ मायावी है। निर्मल की बर्फ छुओ तो पिघलने लगती है, वैद की बर्फ चट्टान सी ठोस। लेकिन यह भी लगता है यह है महज टिप ऑफ़ दि वैदबर्ग। कुछ ऐसा है उनमें जो पकड़ में आते आते कमबख्त छिटकने लगता है।

बाल्टीमोर में पो की कब्र है। उनकी हर जन्मतिथि पर कोई चुपके से एक गुलाब का फूल रख जाता है।

आठ फरवरी दो हजार नौ। दोपहर डेढ़। मिनियापोलिस हवाई अड्डा।

एक अमरीकी मां। प्रैम में बैठा एक बच्चा। मां हवाई अड्डे पर गणित के सवाल साथ ले आई है। छोटे छोटे बोर्ड बच्चे को दिखलाती है -- 7+4=? 4+0=? बच्चा कुनमुनाता है। प्रैम की रॉड मसलता है, नीचे उतर भागना चाहता है। मां नहीं मानती लेकिन। जब वह दूर चॉकलेट की दुकान के बाहर खड़े अपने बड़े भाई की ओर इशारा करता है तो उसे भी बुला लेती है, निकाल लेती है अंग्रेजी के बोर्ड और पूछती है उससे स्पैलिंग humongous की। कसम खाकर निकली है घर से खून पी जायेगी अपने बच्चों का आज ये।

पिता पूरे दौरान वॉशिंगटन पोस्ट पढ़ता रहा है।

बीस जुलाई दो हजार आठ रात बारह।

कई दिनों से हो रहा है यह। एक किताब उठाउं  , चार पांच पंक्तियां पढ़ पाता हूं दूसरी किताब बुलाने लगती है...फिर तीसरी... अंतहीन सिलसिला चलता रहता है, म्यूजिकल चेयर के बीच बदहवास सा किताबों के दरमियां भागता फिरता हूं कुछ हाथ नहीं आता। मेज पर ढेर जमाता जाता हूं, अलमारी से निकाल रखता जाऊंगा...अलमारी खोल देर तक खड़ा रहूंगा।

लैपटॉप ऑन कर बैठूंगा , दो पंक्ति एक कहानी की, दो तीसरी की, तीन किसी और की.....। न कहीं से आता, न कहीं को जाता।

बीस-पच्चीस मिनट हुये यह डायरी खोले भी, पूरी दुनिया घूम आया हूंगा लेकिन शब्द महज चार। कोई भी चीज नहीं खींचती, कोई धड़कन भीतर नहीं बजती। कोशिश भी करूं कुछ याद नहीं आता --- मेरा अतीत, स्मृति। अगर इसी समय मौत हो जाये तो भी यूं  ही ऑंखें फैलाये मर जाऊंगा और आखिरी इच्छा कोई पूछे भी तो सबसे पहले यह पूछूंगा  --- इच्छा? मतलब?

तेईस जनवरी दो हजार दस। रात एक। शनिवार।

मलयजः लिखो तभी जब संकट में हो
चीजें जब सब हिली हुई हों
जमीन सरकी हुई थिर कुछ भी नहीं
एक सांस भीतर एक बाहर बीच में
हलचल जिसमें कोई तरतीब नहीं
बक्से उलट दिए गए चीज-बस्ता बाहर
एक खुलापन जिसे सब घूर सकें
एक नंगापन जिसमें देख सकें सब
अपने दुखी कुछ विकृत चेहरे
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लिखो वह संबंध जो संकट से बचा हो

नौ जुलाई दो हजार सात। रात दस। उटी बस अड्डा।

काफी देर से सामने देख रहा हूं। पहाड़। बारिश में भीगता रेसकोर्स। जलती बत्तियां। सोचता रहा कभी इस दृश्य को कहानी में कायांतरित करना हुआ तो कैसे करूंगा , तभी एक परिवार छाते के नीचे चलता दृश्य को बींधता गुजर गया।

मेरे लेखन की सबसे बड़ी अक्षमता क्या यही है? दृश्य जैसा नजर आना चाहता है, मैं वैसा ही देख पाता हूं और परिणामस्वरूप वही दर्ज कर पाता हूं। इसके अलावा कुछ और होने ही नहीं पाता। जरा भी संदेह नहीं मुझे दृश्य पर कि प्रत्यक्ष के सिवाय और भी कुछ होगा कहीं। इसकी अन्य संभावनाओं को मैं टटोल ही नहीं पाता। निरा मूढ़ दर्शक। आंचल ही नहीं, सब कुछ ही पसारे बैठा। जब तक मेरी निगाह, नहीं महज निगाह भी नहीं, दृश्य से गुजरने व उसे ग्रहण करने की समूची प्रणाली नहीं बदलती मुझे खुद से कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिये।

मुझे आरंभ ही अपनी निगाह के दारिद्रय पर घनघोर विश्वास से करना चाहिये कि सामने है कुछ और जिसे मैं रत्ती भर भी नजर नहीं कर पा रहा हूं। ये पहाड़ शायद पहाड़ नहीं, रेसकोर्स का मैदान भी कुछ और है। बरसात दृष्टि-भ्रम है।
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( आशुतोष हिंदी के युवा कहानीकार हैं और आलोचनाएं भी लिखते रहे हैं. 'जो  फ्रेम में न थे ' शीर्षक एक कहानी संग्रह  अभी-अभी आया है और कथादेश का ''कल्प-कल्प का गल्प'' नाम से उनके संपादन में अभिनव रचनाओं का एक संकलन शीघ्र प्रकाश्य है. वे फ़िलहाल एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक में कार्यरत हैं. )

Monday, May 24, 2010

लिखने के बारे में डायरी से कुछ टीपें





'लिखना
असंभव' जैसी स्थितियों को अगर लिखा जाए तो एक संभव सच में ज़रूरी कलात्मक झूठ/ कल्पना को फेंट कर वह कहने का जोखिम उठाया जा सकेगा जो कहा नहीं गया और कथा ठीक उस बिंदु से शुरू की जा सकेगी जहां से स्मृति ने भी उन स्थितियों को पोसने से इनकार कर दिया है.

जो स्मृति में है वह अनिवार्यतः कथा में भी होगा, यह ज़रूरी नहीं. यानी अब लिखना महज याद करना ही नहीं है. और हालांकि लिखना पहले की तरह ही चयन है, लेकिन उन तमाम असुविधाजनक या असंभव से लगने वाले प्रसंगों के चयन के फर्क के साथ जो बयान में आने से बराबर छूटते रहे हैं.

लिखते हुए किसी स्थिति-विशेष को 'एप्रोप्रियेट' कर लेना स्मृति ही नहीं, कल्पना की भी बर्बादी है. कम से कम लिखते हुए यादाश्त गुमा देने में कोई हर्ज़ नहीं.

ऐसे लिखा जाए मानो जी रहे हों. ऐसे जिया जाए मानो लिखे हुए की देह से निकलना हो रहा हो.

प्रेम जैसी संलग्नता से लिखना चाहिए, लेकिन अपने लिखे हुए के प्रेम में पड़ने से भरसक बचना चाहिए. इस लिहाज से हिंदी के वे तमाम पाकेट-बुक्स पढ़ने से भी अपने को बचा लेना चाहिए जिसमें लेखक ने ''मेरी प्रिय कहानियां या कविताएं'' छपाई हुई हैं.

जहां-जहां प्यार लिखा है वहां-वहां सड़क लिख डालने वाले रुमान से तो खुद को बचाना ही होगा. लेकिन ''रहने के प्रसंग में एक घर था'' सरीखे विन्यास से बचने के लिए अभी और हुनर की दरकार होगी.

लिखते हुए देखने की आदत बराबर डालनी चाहिए. इससे भाषा को अपने पर मुग्ध होने या सपनों में खोने से फुर्सत मिलती रहती है.

हर लेखक लिख कर अपनी भाषा का दातुन करता है. दातुन बिला नागा करना चाहिए.

कुछ है जो लिखने के बाद दुरुस्त हो जाता है. उस कुछ को जानने के लिए ख़ुद लिखना पड़ता है. उस लिखे हुए का मोल जानने के लिए और बहुत सी लिखत को अपनी पढ़त में शामिल करना पड़ता है.
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( चित्र-कृति वांग कार वाई की फिल्म 2046 से )

Friday, May 21, 2010

महबूब की गली

अपनी मिट्टी को छिपायें आसमानों में कहाँ
उस गली में भी न जब अपना ठिकाना हो सका!
शमशेर

यह महबूब की गली से वापसी थी.

उसे अंदाज़ा न था कि उसके शहर में अब भी ऐसी गलियां मौजूद हैं जो पहले हिन्दू या मुसलमान गली हैं, इंसान गली बाद में. महबूब की गली यों कहीं थी भी नहीं. महबूब की गली तो दरअसल उसने बनाई थी. अपने दोस्तों से ही नहीं खुद लड़की से भी वह उसके वहां होने का जिक्र नगर निगम के नक्शे में इंगित जगह और नाम से कतई नहीं करता था. वह पहली दफा सुन कर हंसने लगी थी. लेकिन उसके इसरार और रियाज़ से हासिल सहजता ने लड़की को अपनी ही गली को नए नाम से पुकारना सिखा दिया था.

वह
कभी-कभी कहती,''तुम्हारे जैसे आदमी को लखनऊ के खयालीगंज में पैदा होना चाहिए था.'' लड़के ने न खयालीगंज देखा न लखनऊ. महबूब की गली देखी थी. उसके कूचे, नुक्कड़, लोग-बाग, यहाँ तक कि पहली दफा वहीं खाई गई 'बड़े' की बिरयानी भी उसकी दिनचर्या में इन वर्षों में इस कदर शामिल रहे कि वही उसका खयालीगंज और वही लखनऊ बन गए. उस गली से कभी वापसी भी हो सकती है, उसे ऐसी बदगुमानी तक न हुई थी.

...
और वापसी हो रही थी!

प्राथमिक
विद्यालय में रोज की तरह ६ दिसंबर, १९९२ को बस्ता बांध कर घर लौटते हुए सिर्फ एक घर मुसलमान वाले अपने ननिहाल गाँव में शुरू हुए जश्ननुमा कीर्तन और १० साल बाद के गुजरात को भी लड़के ने कहां देखा था! जश्न की बात उसने सुनी थी और और गुजरात के बारे में अख़बारों या टीवी में बेध्यानी से पढ़ा/देखा था.

महबूब की गली से वापसी के दौरान उसने इन हादसों के अपने ही 'महबूब वतन' में होने को अपने खिलाफ सबसे ज्यादा पाया. अदालत किसी साक्ष्य के अभाव में इसके गुनाहगारों को अगर बरी भी कर दे तो वे उस जैसे असंख्य 'महज हिन्दू' ठहरा कर उस गली से वापिस भेज दिए गए लोगों की निगाह में बरी कैसे हो जायेंगे?
****

Sunday, May 16, 2010

मंगलेश डबराल

गुंजायमान

यह कोई विधा नहीं है. स्मृति या राय की बर्बादी से बच निकलने की कोशिश है. ज़्यादातर ये अनुभव हैं जो अक्सर अपने मूल रूप में हैं और किसी संहिता की तरह जीवन-धड़कनों के साथ गूँजते रहते हैं. इसे आलोचना, संस्मरण, डायरी या नोट्स वगैरह समझना भूल है और सच्चाई से खिलवाड़ है. ये बातें निर्माता के प्रति मानसिक तथ्य हैं. यहाँ कुछ शुरू नहीं हो रहा है, कुछ ख़त्म नहीं हो रहा है, कोई दावा नहीं किया जा रहा है. इसलिए क्रमानुक्रम का ख़याल नहीं रखा गया है.
-व्योमेश शुक्ल

2003

' बाहर निकलने पर वे देखते हैं
फूल तोड़ लिये गए हैं
घास कुचली जा चुकी है.......'' ( पैदल बच्चे स्कूल )

वक़्त हमारे लिए ऐसा ही था. हम विपर्ययों को झेल रहे थे लेकिन उन्हें कहते नहीं थे. दरअसल हमसे कोई नहीं कहता था कि लिखो. अगर हमें लिखना आता भी होता तो भी हम उसे ज़रूरी न मान पाते. हमारे अनुभवों को कोई अनिवार्य नहीं मानता था इसलिए हम भी नहीं मानते थे.

011 - 22711805

तभी
एक दिन एक टेलीफ़ोन नम्बर चेतना में दाख़िल होता है. आप फ़ोन करते हैं और एक आवाज़ आपसे कहती है कि 'तुम्हें लिखना चाहिए', 'तुम्हें गंगा प्रदूषण के सवाल पर नए तरीक़े से लिखना चाहिए', तुमने इसे न्यूज़ की तरह लिख दिया है, फ़ीचर की तरह लिखते', 'तुम्हें गंगा घाटों पर लिखना चाहिए', तुम्हें हाशिये पर चली गयी चीज़ों के बारे में लिखना चाहिए'.

ये वाक्य कितने साधारण शब्दों से बने हैं लेकिन इनकी ध्वनियाँ अपूर्व हैं और हमारी नैतिकता की लगातार निगरानी करती हैं. ये हमें गिरने से बचाने की सफल-असफल कोशिशें करती रहती हैं. ये एक असिद्ध और अदृश्य शिल्प है जो जीवन की वास्तु तय कर देता है.

यों जीवन का पहला लेख लिखा गया और दूसरा और तीसरा. हिंदी में फ़िलहाल - जब पत्रिकाओं और उनके संपादकों की आबादी की तुलना सिर्फ़ उन्हीं की गिरावट से की जा सकती है - संपादक के संस्था होने की धारणा के मंगलेश जी आख़िरी और असंभव उदाहरण हैं. अंतिम निर्माता संपादक. उनके आह्वान में कितनी प्रेरणा और शक्ति रहती आयी है. वह जब भी कुछ लिखने को कहते हैं तो उसमे कितनी 'अर्जेंसी' होती है. उन्होंने हिंदी की नयी पीढ़ियों पर कितना यक़ीन किया है. अपनी 'विज़नरी' और मूल्यनिष्ठ पत्रकारिता के ज़रिये उन्होंने, इस प्रकार, कवियों और पत्रकारों के एक पूरे समूह का निर्माण किया है.

मुझे बार-बार लगता है कि मंगलेश डबराल उस दौर के लोगों के रघुवीर सहाय हैं जिन्होंने रघुवीर सहाय को देखा नहीं है.

होने के प्रमाण

मंगलेश
जी के बग़ैर दृश्य की कल्पना नहीं की जा सकती और यह सिर्फ़ साहित्यिक दृश्य नहीं है. यह जीवन, संघर्ष और सौन्दर्य का दृश्य है. यह मेरी ज़िन्दगी का दृश्य है. यह बात कितनी भी भावुक या अजीब लग सकती है लेकिन मंगलेश जी को समझने के बाद कोई दिन ऐसा नहीं गुज़रा जिसमें उनकी याद या उनका ख़याल या उनके होने के दूसरे एहसास न हों. लेखक और मनुष्य के तौर पर मैं और मुझ जैसे कई लोग उनके बग़ैर संभव ही नहीं थे. मेरा और हमारा लेखक होना उनके होने का प्रमाण है या उनके होने की व्युत्पत्तियाँ.

शमशेर का मतलब

उनकी किताबें - लेखक की रोटी और कवि का अकेलापन हिंदी आलोचना की हैण्ड बुक हैं. अगर कुछ सुझाव देने का हक़ हो तो मैं नौजवान आलोचकों से कहूंगा कि ये दोनों किताबें उनकी टेबुल या उनके झोले में हमेशा होनी चाहिए. याद रखने या उद्धृत करने के लिए नहीं - लेखक की रोटी के अधिकांश निबंध मुझ समेत बहुत से लोगों को याद हैं; ये उसके पार की ज़रुरत हैं. हमारी आत्मिक ख़ुराक. मंगलेश डबराल नामक व्यक्ति या लेखक की चिंतन और जीवन-प्रक्रिया को समझने के सबसे विश्वसनीय और उज्जवल स्त्रोत यहाँ हैं. शमशेर की कविता और रघुवीर सहाय के कवि-व्यक्तित्व की ख़ासियतों के ज़िक्र यहाँ इतने मौलिक और सम्मोहक हैं के पाठक को वे स्वयं मंगलेश डबराल की अच्छाइयों के रूपक की तरह नज़र आते हैं, जो वे हैं भी. उनकी सराहनाओं के नावीन्य और बड़प्पन से अच्छा होना, अच्छा बनना सीखा जा सकता है.

उनकी कविता

और
उनकी कविता, जिसने चुपचाप हिंदी कविता को बनाया, बढ़ाया और बदला है, उसका संकोच अब हमारे लिए एक राजनीतिक मूल्य है. इस संकोच को हिंदी के मौजूदा पर्यावरण में अंततः जिस हद तक माना और समझा गया है, वह समवेत उपलब्धि है और तमाम शोर और वाचालताओं का प्रतिकार.

उनकी कविता एक ऐसी चीज़ है जिस पर अकेले बात नहीं की जा सकती. उस कविता का दौर, उस कविता के दौर की राजनीति, संघर्षों, मुख्याधाराओं, हाशियों, प्रकृति, बचपन, स्त्री और मनुष्यता के संगीत के बग़ैर वह ज़ाहिर नहीं होती. वह ज़ाहिर होना भी नहीं चाहती. आज अगर सेकुलरिज्म समकालीन कविता का सबसे बड़ा मुद्दा है तो इतने डायरेक्ट और तल्ख़ बिंदु तक कविता को ले आने में " गुजरात के मृतक का बयान '' की केन्द्रीय भूमिका है. वह सन १९९२ या २००० के बाद के भारत में कविकर्म का घोषणा पत्र है.

आज मंगलेश जी का जन्मदिन है. वह ६२ साल के हो रहे हैं, यानी रघुवीर सहाय से दो साल ज़्यादा. हिंदी के लिए ये २ और आगामी कई वर्ष, जो जीने के लिए मंगलेश जी को रघुवीर सहाय से ज़्यादा मिले हैं, सम्पदा हैं. इसलिए हम उनके होने को, होने की राजनीति और होने के सौन्दर्य को सेलिब्रेट कर रहे हैं.
****

( यह लेख युवा कवि-लेखक व्योमेश शुक्ल ने अनेक आग्रहों पर सबद के लिए लिखा है. तस्वीरों में मंगलेश जी के अलावा उनकी पत्नी संयुक्ता, पुत्र मोहित और पुत्री अल्मा हैं. )

Wednesday, May 12, 2010

शिरीष कुमार मौर्य की नई कविता


{ कविता में कहानी सुनाना शिरीष की इस बीच की पहचान है लेकिन कहानी में कविता कहना उनकी सबसे बड़ी शक्ति, यानी जिस चीज़ को हम किसी किस्से की तरह सुनना चाहते हैं कवि उसे कविता की शर्तों पर हासिल करता है और हमसे, पाठकों से, भी ऐसी उम्मीद करता है; यों वह हमारे साहित्य-मिजाज़ को कुछ बदल देता है या कम से कम बदल देना चाहता है. यह कहानी की आवाज़ में कविता की ख़ामोशी की पेशकश है. ज़ाहिर है, ऐसा करने वाले शिरीष पहले कवि नहीं हैं, कवि पहला होना भी नहीं चाहता, लेकिन कविता निर्मित करने के अत्यन्त निजी साधनों के साथ यह कोशिश करते हुए वह हमेशा अनूठे और अनिवार्य लगा किये हैं.
शिरीष की कविता में क्रीड़ा-भाव पर्याप्त है किन्तु उन्होंने ज़िन्दगी को ही कला के बुनियादी पदार्थ के रूप में स्वीकार किया है, उनकी कविता में जीवन के बढे-चढ़े अनुपात को उनके कर्त्तव्य की तरह पढ़कर उससे और प्यार किया जा सकता है. यह देखना कितना दिलचस्प है कि कवि अपनी लगातार कविताओं में इसी पदार्थ के मनमाने प्रयोग करता चला जा रहा है, अपनी पहाड़ी, पठारी और मैदानी नागरिकताओं के प्रयोग, स्मृतियों के प्रयोग, स्त्री के साथ विविधतर मानवीय संबंधों में जाने के जोखिम के प्रयोग - शिरीष की कविता का विषय-वैविध्य जीवन के साथ कवि के अकुंठ रिश्ते की व्युत्पत्ति है.
सेल्फ-सेंसरशिप के ख़िलाफ़ प्रमाण या उदाहरण की तरह जो कविता आज हमारा सर्वाधिक साथ देती है, शिरीष की कविता को उसमें रखा जा सकता है. वह कोई राजनीति न करने के बहाने से राजनीति कर रही कविता को शर्मिन्दा करते हुए संभव होती है.} --व्योमेश शुक्ल.

प्रकाश केश कर्तनालय

उच्चतरमाध्यमिक कन्याशाला से छुट्टी होने पर
साइकिल से घर लौटती
लड़कियों के झुंड चिड़ियों के झुंड हैं

पुलिया पर बैठ उन्हे छेड़ते किशोर
कभी घबराई बकरियों को खदेड़ते कुत्ते हैं
और कभी शायद कुछ दिल हैं हसरत भरे
जिन्हें व्याकरण में अभी कुछ कहना नहीं आता

बाल काटते हुए अपनी पटायी हुई एक ग़रीब औरत का क़िस्सा तोता-मैना सुनाता
मुझे पता है प्रकाश केश कर्तनालय मध्य प्रदेश का बल्लू नाऊ
उत्तराखंड का चाँद नाई नहीं है
हालाँकि उसका पेशा बिल्कुल वही है

फ़ोश क़िस्सा सुनाना
कुर्सी पर बैठे दालमिल वाले सेठ के नौउम्र इकलौते लड़के के लिए
हज़ामत के साथ
हर दिन निभाया जाने वाला उसका फ़र्ज़ है
और उससे उसकी यही उम्मीद है

उस्तरे के नीचे जो रोमांच नहीं है वह दरअसल ऐसे ही कुछ क़िस्सों के पीछे है
दोनों यह जानते हैं

नाऊ की भाषा शुरू से ही कुछ उलझने लगी है
थोड़ी पेंचदार
जिसे सुधारने के लिए उसे कंघी की ज़रूरत किसी भी वक़्त पड़ सकती है

मैं पान चबाता बैठा हूँ जिसमें चौरसिया पान भंडार ने हाथ की घिसी तम्बाकू डाली है
यहीं कहीं आसपास के किसी खेत की उगी
उसमें शुरूआती तेज़ी के बाद एक हल्का अद्भुत मीठापन है गले से नीचे उतरकर
हिचकियों में बदलता हुआ

नाऊ भी अब उस औरत के साथ खेतों में है
वहाँ उन रसीली फलियों के बीच उसे लिटा रहा है जिन्हें वह अपने देस में बटरा कहता है
और मैं अपने देस में मटर समझता हूँ
भाषा का ब्लाउज़ भदेस में पोलका है जिसके भीतर नाऊ का उस्तरे जैसा हाथ है
औरत को उससे साठ रुपयों की दरकार है
नाऊ की ज़ुबान उसके कान के बिलकुल पास है
दुकान में ग्राहक बहुत हैं और नाऊ का घटनाक्रम अभी बाक़ी है
मुझे इंतज़ार करना पड़ रहा है

मैं पान चबाने के साथ साथ आईने में झाँकता हुआ अपने बाल भी सहलाने लगा हूँ सामने एक कैंची भी है
वह चमकदार है पर उसकी ध्वनि फ़िलहाल तो धातु की ध्वनि नहीं है
वह अभी नाऊ के कौशल की ध्वनि भी नहीं है
जबकि वह कुछ कर नहीं रही है उसमें एक इच्छा की ध्वनि है
जैसी नाऊ की ज़ुबान में है बहुत तीखी

कैंची को लगातार देखते हुए
मुझे पता चलने लगा है कि वह मेरी उँगलियों के लिए नहीं बनी है और नाऊ अभी खेत में ही है
वहाँ लेटी हुई औरत तब तक कुछ फलियाँ तोड़ रही है और ऊपर उठी हुई साड़ी का सिरा खोज रही है
जिनमें वह उन्हें बाद में बाँधेगी
फलतः नाऊ अब थोड़ा नाराज़ है और भाषा में वैसा व्यवहार करना चाहता है
जैसा शरीर में संभव नहीं

उधर कुर्सी पर सेठ का लड़का अब कसमसाने लगा है
वह शरीर में वैसा व्यवहार करना चाहता है जैसा भाषा में संभव नहीं
उसके गालों को चिकना बनाती ब्लेड के नीचे फ़िलहाल उसके पास शरीर तो है
पर भाषा नहीं है

मैं प्रतीक्षा का व्यवहार करते करते अब आराम का व्यवहार करने लगा हूँ
मैं बेंच पर बैठा शरीर से भी कुछ व्यवहार कर सकता हूँ और भाषा से भी लेकिन दोनों से ही मुझे कुछ भी व्यवहार
करना
अब जम नहीं रहा है

नाऊ बता रहा है कि वह वहाँ खेत में बहुत खीझा हुआ है
साड़ी के छोर में बटरा बाँधनेवाली औरत दरअसल इस काम के लिए पलटना चाह रही है
उसकी इन इच्छाओं का नाऊ के कार्यव्यहार पर फ़र्क पड़ रहा है और वह भी अब जितना जल्दी हो
सुलटना चाहता है
एक बार दाढ़ी बनाकर उसे बेहतर घोंटने को वह दुबारा साबुन लगा रहा है
औरत को बटरा बाँधने का मौका मिल गया है
साठ रूपए वह पहले ही रखवा चुकी थी पर पोलके में नाऊ का हाथ माँसपिंड के अलावा भी कुछ खोज रहा है

‘इते हमने आँखिरी दान दओ एक घुसा के और उते पइसे भी हमाए हाथ में आ गए’ -कहता हुआ नाऊ अब
फिटकरी रगड़ रहा है मुझे ख़ाली होती जगह पर बैठने का इशारा करता हुआ

मैं उससे ख़ुश नहीं हूँ और पान थूकने के बहाने खिसक जाना चाहता हूँ वहाँ से
पर वह मेरी खिन्नता भाँप गया है और लड़के के जाते ही बड़ी मासूमियत से बोल रहा है
- अरे ऐंसो कछु नई करो बड़े भइया हमने !
जे तो सेठ जी को मोड़ा इ मग्घा है, बाहे बातन में तर करनो पड़त है !
तनक हमाइ भी समझो आप !

पान थूकने के बाद मैं कहीं न जाकर वापस दुकान में आ गया हूँ
बाल बिखर रहे हैं इधर-उधर
सेठ जी के मग्घा मोड़े की कहानी के बीच कभी-कभी बोतल से निकली पानी की फुहार है
मेरे बालों को मुलायम बनाती हुई
नाऊ दुकान से कुछ ही देर पहले बाइज़्ज़त विदा हुए पूंजीवाद का प्रतीकात्मक विरोध करता
उसे अब आढ़त के कलूटे मजूर की औलाद बता रहा है
जो सेठ जी के नाम पर फल रही है

कन्याशाला से निकली लड़कियाँ कब की घर पहुँच गई हैं
बटरा छील रहीं दाल पका रही हैं
किशोर भी अब हाथ जोड़कर माता मंदिर की आरती में खड़े कुछ असम्भव सम्भ्रांत औरतों में सम्भावनाएँ खोज रहे हैं

साइनबोर्ड के अक्षर ट्यूबलाइट की रोशनी से खिसककर गली के अँधेरे में जा रहे हैं
उधर ही मेरे घर का छोटा रास्ता है
हालाँकि ज़िन्दग़ी में कोई रास्ता छोटा नहीं होता यह प्रकाश केश कर्तनालय का बल्लू नाऊ मुफ़त में मुझे बता रहा है
उसके बताने में अनुभव है
एक आँचलिक दार्शनिकता है
मैं देख रहा हूँ उसके बाल गरदन के पीछे बेतरतीब बढ़े हैं
समूचे सिर में ख़िजाब के नीचे सफ़ेदी की एक दयनीय परत है उसमें गरिमा नहीं है
अधपकी दाढ़ी भी किंचित बढ़ आयी है
चेहरा हड़ीला
जाहिर मुस्कान के पीछे एक रूदन है और बिलखने की कोई सूरत नहीं

वह मेरे बाल काट रहा है
मैं बहुत संजीदा बैठा हूँ आईने के सामने
कैंची में अब किसी इच्छा की ध्वनि नहीं है
धातु की ध्वनि है
और कटते हुए बालों की ध्वनि है जो फैलती जाती है

बरसों पहले गुज़र चुके
अतिभव्य उदात्त दादाजी के अतिशय दबदबे वाले इस क़स्बे में
मैं अब बस दाल के बारे में सोच पा रहा हूँ
और बटरा के बारे में
जिसे मैं मटर कहकर अपनी ज़िम्मेदारी से कभी बच नहीं पाऊँगा।
****
( शिरीष कुमार मौर्य की इस अप्रकाशित कविता की ओर ध्यानाकर्षण भी व्योमेश की ही तरफ से. इसे छापने की स्वीकृति देने के लिए कवि का आभार.)  

Wednesday, May 05, 2010

कवि की संगत कविता के साथ : ७ : नीलेश रघुवंशी

{जब मैं नीलेश रघुवंशी की कविताएं पढ़ता हूं, तो मुझे ब्‍लैक एंड व्‍हाइट फिल्‍मों की याद आ जाती है, जहां कई सारे रंगों से नहीं, बल्कि किसी अपरिमेय छांव को साधने की कोशिश की जाती है. रंगों की महत्‍वाकांक्षा चौंध में तब्‍दील होना नहीं होता होगा, वे सब एक अपूर्व छांव बन जाना चाहते हैं. जैसा कि यहां है. सॉफ़्ट लेंस के प्रयोग से कुछ पैंसिव छवियों का निर्माण होता है, पानी उस जगह फूटकर निकलता है, जहां का पता ख़ुद नमी के पास नहीं होता. आसपास, घर-परिवार, जीवन-समाज के बारीक अनुभव और सादगी का आभास कराता एक बेहद सजग शिल्‍प-शब्‍द-विधान तो हैं ही, विलक्षण यह भी है कि यहां स्‍मृति बिना किसी सिंगार के आती है. यह कभी नहीं कहा जा सकता कि कविता अबूझ स्‍मृतियों के आगे प्रार्थना होती है या उन्‍हीं का एक अनुषंग, पर यहां स्‍मृति अपने खंडों-टुकड़ों में भी नैसर्गिक है. स्‍मृति का सहज नैसर्गिक होना-दिखना साधना की अनिवार्य मांग करता है, क्‍योंकि दोनों अमूमन अलग ध्रुवों पर रहते हैं. नीलेश की कविताएं इस साधना से निकलती हैं, किसी योगी-सी मुद्रा में नहीं, बल्कि इस समूचे प्रदेश की अपनी नागरिकता को याद रखते हुए. और यहीं उनकी अद्वितीयता के सूत्र हैं.}-- गीत चतुर्वेदी
वक्तव्य
कविता जनरल बोगी में यात्रा कर रहे यात्री की तरह है
नीलेश रघुवंशी
1.
मुझे इस पार या उस पार का जीवन अच्छा लगता है !

अपनी पूरी की पूरी दिनचर्या से कोफ्त होती है- कोफ्त होती है उस रास्ते से जिस पर मैं चल पड़ी हूँ ! एक मशीन में तब्दील हो गई हूँ और जाने कहाँ किसके पास मेरा रिमोट है ! क्या करूँ मैं और कैसे करूं ? ऐसी कैसी बैचेनी मेरे भीतर तक पैठ गई है जो मुझे निष्क्रिय किए दे रही है ! थक गई हूँ एक से ढर्रे का जीवन जीते जीते ! इसे तोड़ देना चाहती हूँ- पूरा का पूरा तहस-नहस कर देना चाहती हूँ और एक नया दिन, नया जीवन प्राप्त करना चाहती हूँ !

कभी एकदम पास और कभी एकदम दूर आकाश में उड़ती, आधी रात में जब टिटहरी बोलती है, तो लगता है वह मेरे मन की आवाजें निकाल रही हैं !

जी भर के आवारगी करना चाहती हूँ ! लेकिन कर नहीं पा रही हूँ ! जब आवारगी मेरे भीतर कुलाँचें भरने लगती है, जब प्यास से उसका कंठ सूखने लगता है ! तब मैं पेड़ों के पास चली जाती हूँ... उन्हें सहेजने लगती हूँ ! गड़ाई-खुदाई करने लगती हूँ ! बगीचे में पानी देने लगती हूँ ! खरपतवार को सहेजती हूँ ! फिर उसे धीरे-से पेड़ों से अलग करती हूँ ! बिल्कुल आवारगी की इच्छा की तरह ! आवारगी को खुद से दूर झटकती हूँ और दुनियादारी को गले लगाती हूँ ! इस तरह अपने अन्त की शुरूआत करती हूँ !

2.
जब भी कभी ट्रेन में जगह न मिल पाने के कारण लटक कर सफर करने वाले मजबूर यात्रियों को देखती हूँ तो बरबस ही अपने समय की कविता को उनमें देखने लगती हूँ ! समाज में जगह तलाशती कविता... जगह न मिल पाने के कारण कभी लटक कर, कभी छत पर चढ़कर, बिजली के तारों से जीवन बचाती, सफ़र तय करती हमारे समय की कविता---- तीसरे दरजे की यात्रा करती !

हमारे समय में कविता जनरल बोगी में यात्रा कर रहे यात्री की तरह है !

जिस समाज में कहने को उसे पाँव धरने की जगह नहीं, उसी समाज में वह जगह बनाती बड़ी ठसक से अपनी यात्रा में है ! इस यात्रा में जोखि़म है और पहले-दूसरे दरजे की यात्रा-सा सुख-आराम नहीं, लेकिन उसके एकदम पास है जीवन !

कुछ कविताएँ बिना टिकिट हैं वो भी डंके की चोट पर..! कुछ दुनिया भर का बोझा उठाए चल रही हैं तो कुछ जमाने को ठोकर मारतीं अपनी ही चाल में !
ऐसा नहीं है कि बिना टिकिट यात्रा करती कविताएँ सिर्फ जनरल बोगी में हैं ! बल्कि वे सैकण्ड एसी, थर्ड एसी में भी हैं ! यह और बात है कि उन्हें टीसी एलीट की आड़ में पकड़ नहीं पाता ! वे वैभव का, श्रेष्ठि वर्ग का, आभिजात्य का ऐसा ताना-बाना रचती हैं कि खुद चोरी करते हुए चोर किसी और को ठहरा देती हैं !

3.
इस समय हमें चिड़िया की आँख नहीं देखना है बल्कि इस दुनिया को, इस समय को चिड़िया की आँख से देखना है ! एक कवि होने के नाते बहुत गहराई से यह महसूस करती हूँ कि इस दुनिया को देखने का नज़रिया हमें बदलना ही होगा ! हमें आँख चाहिए वो भी चिड़िया की..! इस दुनिया की, समय की भीतरी अन्दरूनी परतें हमें दिखाई नहीं दे रहीं या ओझल हैं हमसे ! आखिर क्यों? चीज़ों/जीवन को समझने में हमसे चूक होती गई और होती जा रही है !

ऐसा नहीं कि सिर्फ दुनिया और समय को देखने के लिए ही चिड़िया की आँख चाहिए बल्कि खुद को देखने परखने के लिए भी चिड़िया की आँख चाहिए ! आज के समय में कविता कवि से आत्मालोचना की माँग कर रही है! घनीभूत पीड़ा के संग कवि से कह रही है...
आत्मालोचना-- आत्मालोचना-- आत्मालोचना !
आत्मसंघर्ष-- आत्मसंघर्ष-- आत्मसंघर्ष !
___________

कविताएं


चोरी

जब भी बहनें आतीं ससुराल से
वे दो-चार दिनों तक सोती रहतीं
उलाँकते हुए उनके कान में जोर की कूँक मारते
एक बार तो लँगड़ी भी खेली हमने उन पर
वे हमें मारने दौड़ीं
हम भागकर पिता से चिपक गए
नींद से भरी वे फिर सो गईं वहीं पिता के पास...!

पिता के न होने पर
नहीं सोईं एक भी भरी दोपहरी में
क्या उनकी नींद जाग गई पिता के सोते ही.... ?
सब घेरकर बैठी रहीं उसी जगह को
जहाँ अक्सर बैठते थे पिता और लेटे थे अपने अंतिम दिनों में....!
पिता का तकिया जिस पर सर रखने को लेकर
पूरे तेरह दिन रूआँसे हुए हम सब कई बार
बाँटते भी कैसे
एक दो तीन नहीं हम तो पूरे नौ हैं........!

इसी बीच सबकी आँख बचाकर
मैंने पिता की छड़ी पार कर दी
उन्होंने देख लिया शायद मुझे
मारे डर के वैसे ही लिपटी छड़ी से
लिपटी थी जैसे पहली बार
पिता की सुपारी चुराने पर पिता से..!
****
पेड़ों का शहर

कल रात स्वप्न में
एक पेड़ से लिपटकर बहुत रोई
हिचकियाँ लेते रुंधे गले से बोली
मैं जीना चाहती हूँ और जीवन बहुत दूर है मुझसे
पेड़ ने कहा
मेरे साथ चलो तुम मेरे शहर
रोते हुए आँखें चमक गईं मेरी
पेड़ों का शहर..?
चमकती हुई रात में
अचानक हम ट्रैफिक में घिर गए
बीच चौराहे पर एक हरा-भरा पेड़
सब ओर खुशी की बूँदें छा गयीं
पेड़ के होने से
चौराहे की खूबसूरती में चार चाँद लग गए....!
स्वप्न ने करवट बदली
भयानक शोर भारी-भरकम क्रेन
पेड़ शिफ्टिंग करने वालों का काफिला
सबसे ऊँची टहनी पर बैठी मैं
पेड़ के संग हवा में लहराने लगी
क्रेन हमारे पास बहुत पास आ रही थी
चौराहे पर लोगों का जबरदस्त हुजूम
भय और आश्‍चर्य से भरी आवाजें
इसी अफरा-तफरी और हो हल्ले में
पेड़ अपने शहर का रास्ता भूल गया
पेड़ों का शहर......
एक लम्बी सिसकारी भरी मैंने नींद में!
****
उलटबाँसी

तुम मेरा प्रथम प्रेम तो नहीं
लेकिन तुम्हारे प्रेम की व्याकुलता
प्रथम प्रेम की व्याकुलता-सी है !
हर शाम तुम्हारी याद आती है
तुम्हारी याद को शाम
करेला और नीम चढ़ा बना देती है !
अगर पेड़ न होते तो जाने क्या होता
दगा तो सूर्य और चन्द्रमा करते हैं
सूर्य अपनी लालिमा बिखेरकर
तुम्हारी याद में तपा देता है !
चाँद बजाए शीतलता देने के
ऐसे छिपता है जैसे छोटे शहरों के
प्रेमी युगल अपने प्रेम को छिपाते फिरते
मारे डर के एक-दूसरे को राखी बाँध देते हैं !
यही उलटबाँसी चाँद की हर दिन चलती है
सबसे ज्यादा तब-
जब मुझे तम्हारी घनघोर याद आती है !
****
एफ. आई. आर.

खुद को चोर होने से रोक सकती हूँ
मेरे घर में चोरी न हो
यह भला कैसे रोक सकती हूँ !
खुद को चोर होने से रोका
कोई बड़ी बात नहीं
चोर को चोर होने से रोक सकती
तो कुछ बात बनती
घर में ताला लगाकर चाभी चोर के यहाँ रखती
इस तरह
किसी और युग में न जाकर
किसी और ग्रह को न ताककर
चोर के संग
एफ. आई. आर के रजिस्टर के पुरजे पुरजे कर
यहीं धरती पर पानी की नाव बनाती...!
****
पच्चीस दिन
तुम्हें गए आज पूरे पच्चीस दिन हो गए
पच्चीस जनम की तरह गुजरे
ये पच्चीस दिन
कैसे गुजरेगी अब ये बची-खुची जिंदगी !
यह भी तो नहीं कह सकती
तुम्हारी जगह मैं चली जाती
फिर तुम कैसे गुजारते अपने बचे-खुचे बरस !
पच्चीस दिन बाद आज लौटी काम पर
धूल की मोटी परत टेबिल पर
कुर्सी पर कबूतरों की भरपूर बीट
बिखरे पड़े हैं पच्चीस दिन के अखबार
कितने चाव से पढ़ते थे तुम इन्हें
ओ मेरे पिता
क्यों चले गए तुम....
इन अखबारों के बीच मुझे छोड़कर !
****
आत्मकथ्य

मेरे प्राण मेरी कमीज़ के बाहर
आधी उधड़ चुकी जेब में लटके हैं
मेरी जेब में उसका फोटो है
रोपा जा रहा है जिसके दिल में
फूल विस्मरण का....!
झूठ फरेबी चार सौ बीसी
जाने कितने मामले दर्ज़ हैं मेरे ऊपर
इस भ्रष्ट और अंधे तंत्र से
लड़ने का कारगर हथियार नहीं मेरे पास
घृणा आततायी को जन्म देती है
आततायी निरंकुषता को
प्रेम किसको जन्म देता है....?
अपना सूखा कंठ लिए रोता हूँ फूट फूटकर
मेरी जेब में तुम्हारा फोटो है
कर गए चस्पा उसी पर
नोटिस गुमशुदा की तलाश का......!

एक बूढ़ी औरत का बयान

मथुरा की परकम्मा करने गए थे हम
वहीं रेलवे स्टेशन पे भैया.......
(रोओ मत ! पहले बात पूरी करो फिर रोना जी भर के)
साब भीड़ में हाथ छूट गए हमारे
पूरे दो दिन स्टेशन पर बैठी रही मानो वे नहीं मिले
ढूँढत ढूँढत आँखें पथरा गई भैया मेरी
अब आप ही कुछ दया करम करो बाबूजी
(दो चार दिन और इंतज़ार करो बाई आ जाएँगे खुद ब खुद !)
नहीं आ पाएँगे बेटा वे पूरो एक महीना और पन्द्रह दिन हो गए
वे सुन नहीं पाते और दिखता भी नहीं उन्हें अच्छे से !
(बुढ़ापे में चैन से बैठते नहीं बनता घर में ! जाओ और करो परकम्मा..
कहाँ की रहने वाली हो ?)
अशोक नगर के !
(घर में और कोई नहीं है क्या ?)
हैं ! नाती पोता सब हैं भैया !
(फिर तुम अकेली क्यों आती हो ?
लड़कों को भेजना चाहिए था न रिपोर्ट लिखाने....)
वे नहीं आ रहे न वे ढूँढ रहे
कहते हैं....
तुम्हीं गुमा के आई हो सो तुम्हीं ढूँढो !
लाल सुर्ख साड़ी में एकदम जवान
दद्दा के साथ कितनी खूबसूरत बूढ़ी औरत
इसी फोटो पर चस्पा
नोटिस गुमशुदा की तलाश का..
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आम आदमी

इन दिनों मुश्किल में है आम आदमी
हर कोई उसी की बात करता है
सबसे ज्यादा वो
जो जानता भी नहीं आम आदमी को
हर अच्छा बुरा काम हो रहा है उसी के नाम पर
हद हो गई अब तो
चप्पल घसीटते कंधे उचकाते
साधारण का स्वाँग भरते
पहन रहे हैं चोला साधारणता का विशिष्ट जन
जानते नहीं ये लोग
घिसटने से जल्दी टूट जाती है चप्पल
और-- कंधे
बोझ ढोने के लिए हैं उचकाने के लिए नहीं
साँस फँस रही है गले में आम आदमी की
विशिष्ट जन आ रहे हैं उसकी गली में
माँग रहे हैं
मोटी रोटी और कुटी लाल मिर्च की चटनी
कैसे बचेगा अब आम आदमी
कैसे बचेगी अब साधारणता.......!
साधारणता को बचाना है तंगहाली को दूर करना है
हवा में उड़ती लाल मिर्च
जाने किसकी आँख को बताने उड़ती जाती दूर तक
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एक बार फिर अकाल

दौड़ो दौड़ो दौड़ो
तुम्हारा जन्म ही दौड़ने के लिए हुआ
मत देखना कभी पीछे मुड़कर
कहीं तुम्हारे अपने तुम्हें आवाज न दे दें
अकाल अकाल अकाल प्रेम का अकाल !
महानगर बनने की कगार पर इसी शहर की
एक पॉश कॉलोनी में
संभव को असंभव और असंभव को संभव बनाती
ये बात कि
एक भले मानुष के विदेश में बसे
बड़े बेटे ने सारी सम्पत्ति
छोटे भाई को देने की गुहार की पिता से
सम्पत्ति के संग पिता को भी किया भाई के हिस्से !
जीवन अपनी गति से चल रहा था कि
कुएँ बावड़ी नदी पोखर सब सूखने लगे
पशुओं ने चरना और पक्षियों ने उड़ना किया बंद
बहुत बुरा हाल लोगों का
वे न जी पा रहे न मर पा रहे !
बुजुर्ग अपने ही घर में पराए हो गए
हुआ ये कि एक दिन
शाम की सैर से लौटे तो देखा
उनका कमरा अब उनका नहीं रहा
गेस्ट हाऊस के छोटे-से कमरे में
शिफ्ट कर दिया गया तिस पर
बढ़ती मँहगाई के नाम पर सारी कटौती उनके हिस्से !
होनी को अनहोनी और अनहोनी को होनी बनाते
बुजुर्ग सज्जन ने अपना सब कुछ बेच दिया
दिन तो क्या कई महीने गुजर गए
विश्‍व भ्रमण से
सुखी परिवार जब वापस आया तो
अपने ही घर में किसी अजनबी को देख हकबका गया
प्रेम के अकाल को बगल में दबाए बुजुर्ग
कुछ भी कह सुन लिखकर नहीं गए
प्रेम के अकाल को
सम्पत्ति और बैंक-बैलेंस के अकाल में बदलते
वे चले गए..!
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एक घूँट पानी

हम पहले कभी नहीं मिले फिर कभी मिलेंगे
इसका अंदेशा दूर-दूर तक न था !
वो बात कम करती हँसती ज्यादा
उसकी हँसी मूँगफली बनकर
सब दूर अपने छिलके बिखेर रही थी कि
इसी बीच मुझे प्यास लगी
थोड़ा सा पानी पिया मैंने और थोड़ा सा बचा लिया
मारे गरमी के गला सूख रहा है.....
उसने बॉटल की ओर हाथ बढ़ाया
नहीं नहीं जूठा है.....
एक घूँट पानी के लिए भी मना कर देते हैं मुझ जैसे लोग !
हमारे बीच अब
बोतल के पानी का सूखा लहराने लगा
जिसने उसकी बातों की फसल को अपनी चपेट में ले लिया
धड़धड़ाती ट्रेन पुल से गुजरी
वो झाँककर नदी को देखने लगी
मिनरल वाटर की बॉटल को सबसे बचाते
हँसी और बातों से कन्नी काट
सोने का स्वाँग करते हुए आँखें मूँद ली मैंने अपनी !
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रंज

अगर मैं
किसी दुख से दुखी न होऊँ
किसी सुख की चाह न करूँ
रोग भय और क्रोध से पा जाऊँ छुटकारा
तो क्या और कैसा होगा ?
जीवन कितना उबाऊ और नीरस होगा !

जिया नहीं जिसने जीवन को
पिया नहीं उसने मृत्यु को.....!

मृत्यु से छुटकारा और जीवन से राग
सुख को देहरी का जलता दिया बनाया
दुख को जलाया खेत में कूड़े के संग
सुख को पकड़ा दुख को छोड़ा
ईमान छोड़ा अपनों को छोड़ा खुद को न छोड़ा
बीत गया आधा जीवन कोई न पहचाना
ये रंज मेरे भीतर तक पैठ गया है !
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घनघोर आत्मीय क्षण

जब जब हारी खुद से आई तुम्हारे पास
मेरे जीवन का चौराहा तुम
रास्ते निकले जिससे कई कई !
वो कौन सी फाँस है चुभती है जो जब तब
डरती हूँ अब तुमसे मिलने और बतियाने से
मिलेंगे जब हम करेंगे बहुत सारी बातें
धीरे धीरे जब हम
घनघोर आत्मीय क्षणों में प्रवेश कर जाएँगे
तब सकुचाते हुए पश्‍चाताप करते हुए
तुम सच बोलोगे
छल हँसेगा तब कितना
कपट नाचेगा ईर्ष्या करेगी सोलह शृंगार
मैं तुम्हें प्यार करती हूँ तुम मुझे छलते हो
भोले प्यारे कपटी इंसान
प्यार और छल रह नहीं सकते एक साथ
क्यों छला तुमने मुझे इतना
कि
तुम्हारा ही कलेजा छलनी हो गया !
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('घर-निकासी', 'पानी का स्‍वाद', 'अंतिम पंक्ति में', तीन कविता-संग्रहों की कवि नीलेश रघुवंशी की ये ताज़ा कविताएं हैं, जो उन्‍होंने सबद के आग्रह पर ख़ासतौर पर भेजी हैं. आपको बता दें कि यह हिंदी की ब्‍लॉग-दुनिया में नीलेश की पहली उपस्थिति है.)