Friday, December 31, 2010

कोई खिड़की नहीं



(उर्फ़ कैब में प्‍यार)

उसके आने से वह जगह घर बन जाती

घर बनना शिकायत से शुरू होता और हंसी पर ख़त्म
शिकायत यह कि 'बाहर की तेज़ हवाओं से मेरे बाल बिखर जाते हैं'
और हंसी इस बात पर कि 'इतना भी नहीं समझते'

हंसी की ओट में लड़के को शिकायत समझ में आती
और यह भी कि लड़की की तरफ़ से यह दुनिया से की गई
सबसे जेनुइन शिकायत क्यों है

फिर शिकायत के दो तरफ़ शीशे की दीवार उठ जाती
और हालांकि दीवार में तो एक खिड़की का रहना बताया जाता है,
१२ किलोमीटर के असंभव फैलाव और अकल्पनीय विन्यास में
उसके आ जाने भर से रोज़- रोज़ आबाद
घर की दीवार में कोई खिड़की नहीं रहती

बाहर रात, सड़क, आसमाँ और चाँद-तारे रहे होंगे,
भीड़, जाम, लाल या हरी बत्तियां भी,
इस घर में तो लड़के का अजब ढंग होना और
लड़की की आंखों में शरीफ काजल ही रहा.

बाहर का होना
घर टूटने के बाद याद आया :
दोनों को
अलबत्ता बहुत अलग-अलग.
****
 
(इसके पहले की कविता देखें यहां  
तस्‍वीर : मधुमिता दास)

Monday, December 27, 2010

स्‍वगत : ६ : गीत चतुर्वेदी



[ यह, यानी आप जो आगे पढ़ने जा रहे हैं, कुंवर नारायण सरीखे कवि की उपस्थिति का महज खाका नहीं है, इसलिए यह सहज ही उस रीडिंग से भिन्न है जो कुंवर जी पर और उनसे परे आपके ज़ेहन में आलोचना के नाम पर पुख्ता है. यह आलोचना की 'हिंदी-हदबंदी' से बाहर शुरू हुआ है. इस तरह इसे पढ़ने का 'हिंदी-बाहर' ढंग करार दिया जाये तो अचरज नहीं. लेकिन अगर यह वह है भी तो आसानपसंद लोगों के उन अर्थों में नहीं, जो विदेशी साहित्य-सन्दर्भ या लेखक का नाम आदि देख कर ही  कुपित हो जाते हैं. यह अपनी भाषा के जेठे कवि की कविता को एक बड़े परिप्रेक्ष्य में रखकर देखने का जतन है : अतः  ध्यान और धीरज का गद्य है. इसमें अगर न के बराबर सुना-सुनायापन है तो इस वजह से क्योंकि इसके लेखक ने अपने काव्य-पुरुष की प्रदत्त समझ को नेपथ्‍य में छोड दिया है. आलोचना में सुमिरन को कितना महत्व दिया जाता रहा है, काश कि ऐसा दुर्लभ 'छोड़ना' भी उसमें कभी-कभार घटित होता ! ]     


एक कवि की जेनेसिस और रिवर्स जेनेसिस

रूसी भाषा के कवि जोसेफ ब्रॉडस्की ने थॉमस हार्डी पर एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया था कि इतने बरसों बाद भी हार्डी अपनी ही भाषा में उपेक्षित हैं और उन चीज़ों को नहीं पा सके हैं, जिसके वे हक़दार थे। उनका मानना था कि हार्डी को उनके आलोचक आधुनिक भावबोध से देखते हैं, जबकि उन्हें उससे एक सीढ़ी पहले यानी आधुनिकता से पूर्व-बोध को ध्यान में रखना चाहिए। कविता को पढऩे के तरीक़ों पर यह एक सुंदर लेख है। बाद के बरसों में ब्रॉडस्की के निबंधों पर लिखे एक लेख में जे. एम. कोएट्ज़ी ने उनकी इस प्रवृत्ति की ओर ध्यान दिलाया कि ब्रॉडस्की जब भी अपने प्रिय कवियों के बारे में लिखते हैं, उनमें वे सारी बातें खोज लेते हैं, जो दरअसल वह अपने भीतर पाना चाहते हैं।

समीक्षक या आलोचक को अपने विषय-लेखकों पर अपने आग्रहों को आरोपित नहीं करना चाहिए, ऐसा आमतौर पर माना जाता है। उससे उम्मीद की जाती है कि वह उन्हीं चीज़ों के इर्द-गिर्द घूमे, जिन्हें मूल लेखक ने अपने रचना के स्वभाव व रचनाकर्म से अर्जित किया है, पर लेखकों से नियमों का पालन नहीं हो पाता। साधारण तौर पर ऐसे नियमों को तोड़ जाना उनकी रचनात्मक विवशताओं का ही हिस्सा होते हैं। इसीलिए आम तौर पर दुर्गुण मानी जाने वाली चीज़ें बड़े कवियों का सिंगार बन जाती है। यह एक दुर्लालित्य है, जो अक्सर चीज़ों को नए तरीक़े से देखने या कुछ नई सुंदरताओं तक पहुंचने का माध्यम बन जाता है।

अपनी उल्लेखनीय या सूक्ष्म, विशेषताओं को अपने पहले के प्रिय कवियों में प्रत्यारोपित कर ब्रॉडस्की परंपरा के पहियों को थोड़ा-सा उल्टा घुमा देते हैं। जिन चीज़ों को वह अपने भीतर विकसित पाते हैं, उन चीज़ों के बीज उन्हें हार्डी से मिले थे, ऐसा बताकर वह अपनी जेनेसिस की मैपिंग का रास्ता ही दिखा रहे थे। उन्हें पढ़ते हुए मुझे हमेशा लगता है कि क्या एक रिवर्स-जेनेसिस भी हो सकती है, जिसमें ऐसा हो कि जिन चीज़ों के बीज हमें ब्रॉडस्की में मिलते हैं, पहले से ही हार्डी के भीतर उन सबकी एक भरे-पूरे विकसित वृक्ष के रूप में उपेक्षित अनुपस्थिति थी? यह संभव है।

कुंवर नारायण की कविताओं को पढ़ते हुए मुझे यह संभव दिखाई देता है। उनकी कविताओं की संरचना जिस तरह स्वीकृत-सरल-शास्त्रयीता की देह पहनती है और उनकी कविताओं का भावबोध जिस तरह लगभग अस्वीकृत, दुविधा में डाल देने वाला, जटिल भावबोध होता है-- ये दोनों चीज़ें यह सोचने पर विवश कर देती हैं कि क्या कुंवर नारायण मोनो-जेनेसिस के कवि हैं? यानी क्या उनके कवि, उनकी कविता और उनकी कविता के जीवन की उत्पत्ति सिर्फ़ एक कोशिका से होती है? कोई आदिम, प्राचीन, प्रारंभिक कोशिका?

या वह पॉली-जेनेसिस के कवि हैं? यानी उनके कवि, उनकी कविता और उनके कविता के जीवन की उत्पत्ति किसी एक कोशिका से होने के बजाय, फूलों की तरह उनके बीजारोपण में एक ख़ास कि़स्म का बंजारापन छिपा हुआ है? जैसे परागकणों को मधुमक्खियां, चिडिय़ां, हवाएं उड़ा ले जाती हैं और किन्हीं दूसरे पर्यावरणों में वह कण जब पैदा होता है, तो अपना स्वभाव थोड़ा-सा बदल लेता है, अपनी विशेष पारिस्थितिकी से समन्वय के क्रम में। इस तरह, हर बार उसमें कुछ न कुछ बदलाव आता है और एक दिन वह एक स्वतंत्र नस्ल बन जाता है।

ब्रॉडस्की की ही तरह कुंवर नारायण में जेनेसिस और रिवर्स-जेनेसिस की यह प्रक्रिया एक साथ दिखाई पड़ती है। ये दोनों चीज़ें एक ही सरल-रेखा या परस्पर समांतर सरल रेखाओं में नहीं होतीं, बल्कि रिवर्स-जेनेसिस बहुधा जि़ग-ज़ैग, आड़ी-तिरछी, रैंडम रेखाओं में होता है। वह अपनी कविताओं में समय के व्यक्तित्व को नष्ट होने से बचाने की कोशिश करते हैं; समय को अपने विचारों के वाहन के तौर पर इस्तेमाल करते हुए। वह अपने समय और उसके बीतेपन को, पुराने समय और उसके बीतेपन को, सतत जिज्ञासु और शंकालु, जवाबों के बीच से निकलने वाले सवालों के ज़रिए देखते हैं। वह वर्तमान को अतीत से देखते हैं और अतीत को वर्तमान से देखते हैं। वह जीवन की सुंदरताओं की खोज में एक बहुत लंबी यात्रा करते हैं और सुदूर मिथिहास में जाकर यह बताते हैं कि उनकी कविता का उत्स शायद यहीं-कहीं है। वह जीवन, प्रेम और मृत्यु के त्रिगुणसूत्री भारतीय चिंतनवृक्ष को अपने भीतर उगा हुआ महसूस करते हैं, तो समय की इसी सुदूर यात्रा के कारण। यह वृक्ष बीजरूप में मिथिहास में मौजूद है। यह जेनेसिस की प्रक्रिया के अंतर्गत है।

फिर वह मिथिहास और इतिहास की कंदराओं में भटकते हुए ठीक आज के समय के बारे में बताते हैं, पर वह सिर्फ प्रॉफेसी नहीं होती। वह मानवीय गुणों की विरासत को सहर्ष स्वीकार करते हैं। कवि के रूप में वह यथार्थ समय और काल्पनिक समय के बीच लगातार आवाजाही करते हैं, इस तरह से कि यथार्थ और कल्पना उनके लिए लगभग समार्थी शब्द बन जाते हैं- समार्थी जैसे कि अर्थ के सम तक पहुंचाने वाले शब्द। इन दोनों समयों की यात्रा के दौरान उन्हें कई अनुभव होते हैं, वह विभिन्न पर्यावरणों में रहते हैं, कई देशों और उपदेशों में अतिथि की तरह या नागरिक की तरह रहते हैं, उससे उनमें कई बदलाव आते हैं। वह इन सारी चीज़ों को विरासत में मिले अपने सांस्कृतिक अनुभव में मिश्रित कर देते हैं। लोहिया ने मिथकों को 'मनुष्य की कलात्मक कल्पनाएं’ कहा है। यह दृष्टि दरअसल आज दिन में बैठकर उस पूरे मिथिहास को देखने से बनती है। कुंवर नारायण अपनी रचनाओं में इस दृष्टि में भरोसा करते दिखते हैं, तो यह मनुष्य की तमाम वर्तमान व ऐतिहासिक कलात्मकताओं और कल्पनाओं के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है। व्यक्ति और समाज के अद्वैत और गुणों के परस्पर समावेश की जो प्रवृत्ति उनकी कविताओं में बीजरूप में मौजूद हैं, वे दरअसल वृक्ष के रूप में मिथिहास में मौजूद है। यह उनकी रिवर्स-जेनेसिस है।

ऐसा करते समय वह प्रस्तुत लीनिएज को नकार देते हैं। जो लीनिएज उन्हें जेनेसिस की प्रक्रिया में मिलती है, उसे वह थोड़ा-सा स्वीकार करते हैं और उल्टी प्रक्रिया में वह नए पड़ावों, नए मार्गदर्शकों को शामिल करके नितांत नई मिश्रित लीनिएज का प्रस्ताव करते हैं। बड़ा कवि अपना लीनिएज ख़ुद बनाता है। इसे अगर सरल शब्दों में कहने की ज़रूरत हो, तो बिल्कुल सड़क की भाषा में यह कहा जा सकता है कि बड़ा कवि यह ख़ुद तय करता है कि उसकी कविता का बाप कौन होगा। ऐसा करके वह परंपरा में अपनी तरह से उलटफेर करता है। ऐसा करके वह अपने समय की कविता के इतिहास को दुबारा लिखने के लिए विवश कर देता है। ऐसा कवि अमूमन पॉली-जेनेटिक कवि होता है। कुंवर नारायण ऐसे ही कवि हैं।

मोनो-जेनेटिक कवि अक्सर एक समय, एक विचारधारा, एक विशेष राजनीतिक-सामाजिक परिस्थिति, एक विशेष निष्ठा, एक विशेष आस्था यानी संक्षेप में, अपनी रचनाओं के व्यक्तित्व के लिए एकलताओं का चयन करता है। उसमें नज़रअंदाज़ न की जा सकने वाली 'एक्सक्लूसिवनेस’ होती है। उसकी निजी जि़ंदगी जोखिम से भरी होती है, लेकिन ज़्यादातर वह अपनी कला में बड़े जोखिम नहीं उठा पाता। मेरी नज़र में लोर्का और ब्रेख़्त, शिम्बोर्स्काह और सिल्विया प्लाथ इसी श्रेणी में आते हैं।

पॉली-जेनेटिक कवि, जैसा कि ऊपर के विलोम से इशारा मिल जाता है, अक्सर एक साथ बहुत सारे समयों, कई राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों के बीच, कई आध्यात्मिक यात्राओं को भी पूरा करते हुए, कई सांस्कृतिक रिसेप्शंस को समाहित करते हुए, यानी अपनी रचनाओं के व्यक्तित्व के लिए बहुलताओं का चयन करता है। वह सतत आर्गुमेंटेटिव, समाधानों से ज़्यादा नई समस्याओं का अनुसंधान करता, सहज ही ‘इन्लूक्त सिव’ और यूनिवर्सल अप्रोच व अपील का कवि होता है। उसकी निजी जिंदगी जोखिम से भरी हो सकती है या नहीं भी हो सकती, लेकिन अपनी कला में वह बड़े से बड़े जोखिम उठाता है। मेरी नज़र में बोर्हेस और मिवोश, नेरूदा और एलियट ऐसे ही कवि हैं।

मेरे लिए यह सवाल मायने नहीं रखता कि इन दोनों श्रेणियों के बीच कवियों की बड़ी श्रेणी कौन-सी है? पर यह देखना फिर भी ज़रूरी है कि मोनो-जेनेटिक कवि संख्या में बहुत होते हैं, लेकिन उनमें से बहुत कम ही मेजर पोएट्स बन पाते हैं। जबकि पॉली-जेनेटिक कवि हमेशा संख्या में कम होते हैं और उनमें से बहुत ही कम माइनर पोएट्स कहलाते हैं।

पिछले कुछ समय से हम जैसा समाज देख रहे हैं, आक्रांताओं ने अपना रूप बदल लिया है, तलवारों की धार भले सान न चढ़ाई गई हो, रुपए के नोटों की धार इतनी तेज़ है कि गला रेत दे, एक निश्चित दिशा में एक अनियंत्रित दौड़ चल रही है, आदमी को आत्मा की तरह नहीं, एक वस्तु की तरह देखा जा रहा है, स्वीकार कर लेने की विवशताएं और लाभ बताकर अस्वीकार करने के सामूहिक बोध को समाप्त किया जा रहा है, मुझे ऐसा लगता है कि आज के सारे बड़े कवि पॉली-जेनेटिक कवि ही होंगे। वे ऐसा चयन करें न करें, पर ऐसा होना उनकी रचनात्मक और आत्मिक विवशता होगी।

आगे की पंक्तियों में संक्षेप में मैं उन विशेषताओं की चर्चा करूंगा, जो कुंवर नारायण की कविताओं में प्रधानता से हैं। प्रधान शब्द अपने भाव और व्यवहार में एकल होता है, लेकिन कुंवर जी की कविताओं के बारे में बात करते समय यह बहुलताबोधी हो जाता है। दरअसल, बहुलताबोध भी उनका एक गुण ही है। अकेले व्यक्ति पर बात करते हुए भी उनमें बहुलताबोध होता है-

फूलों को जब भी देखता हूं,
बहुवचन में देखता हूं

या

पूरे विश्वास के साथ बहुलता को दे जाना चाहता हूं

कुंवर नारायण मुझे गहरे अस्वीकार के कवि लगते हैं। उनकी कविता अपने समय के प्रचलित वादों, मुहावरों, दृश्य-विधानों, तेज़ी, भाषा के साथ चंचल व्यवहार, अत्यंत मुखर जोश-ख़रोश, वैचारिक ख़ूनख़राबा आदि को वृहत्तर अस्वीकार करती है। जिस समय कविता के भीतर कम्पोजीशन, फॉर्म और स्ट्रक्चर के स्तर पर क्लासिकीय होने से सतर्क तरीक़े से बचा जा रहा था, वह इस बचने को अस्वीकार करते हैं और उसी क्लासिकीय टोन की प्रतिष्ठा करते हैं। जब कविता वृहत्कथाओं की रचना नहीं कर रही थी, वह खंड-काव्य लिख रहे थे। जब भाषा के घोड़ों को ऊबडख़ाबड़ मैदानों पर दौड़ाया जा रहा था, वह उसके गोल या नुकीले किनारों को नफ़ासत से सहला रहे थे। जो चल रहा था, वह उससे अलग चल रहे थे। ख़ुद उन्हीं के शब्दों में कहा जाए, तो कवि वही है, जो अस्वीकार करना जानता हो। अस्वीकार कवि की बहुत बड़ी शक्ति होती है। वह उसे अपने लिए नए रास्ते तलाशने को प्रेरित करती है। आज़ादी के बाद एक देश के तौर पर इस भूगोल ने ख़ूब भौतिक तरक़्क़ी की है, लेकिन एक समाज के तौर पर इसका नैतिक बल लगातार कमज़ोर होता गया है। अपने अकेलेपन में भौतिकता समाजों के नैतिक बल व मनोबल पर आघात करती है। ऐसा अस्वीकार इसी बल को बढ़ाता है और उनकी कविता को फ़क़ीराना सादगी के वैभव से भर देता है। अस्वीकार प्रतिरोध की बुनियादी शर्त है और जिन लोगों को कुंवर जी की कविता में प्रतिरोध के स्वर नहीं मिलते, उन्हें इन कविताओं के नैतिक अस्वीकार का पुनर्पाठ अवश्य करना चाहिए।

जिस समय कुंवर नारायण ने कविता लिखना शुरू किया था, उस समय भारत पांच कि़स्म के परिवर्तनों से एक साथ गुज़र रहा था- शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, राष्ट्रीयतावाद, लोकतंत्र की समझ और सामाजिक बदलाव। इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने इन सबको अलग-अलग क्रांतियां कहा है और ज़ोर इस बात पर दिया है कि ये सब ‘एक साथ’ हो रहे थे। इतने स्तरों पर एक साथ होने वाला परिवर्तन व्यक्ति पर इनसे भी ज्य़ादा प्रभाव डालता है। इन सबने मिलकर एक व्यक्ति को नागरिक, उपभोक्ता, वस्तु, कलपुर्जा, संसाधन में तब्दील करने की प्रक्रिया में कोई क़सर नहीं छोड़ी। पांचों स्तरों पर चलने वाला यह परिवर्तन अभी भी पूरा नहीं हुआ है और उसमें बाज़ार, अर्थव्यवस्था आदि ने और नये आयाम जोड़ दिए हैं। व्यक्ति का समाज के साथ क्या संबंध होता है और ये सारी चीज़ें उसके मेटाकॉन्शस को किस तरह डिस्टर्ब करती हैं, इस पर बहुधा बातें होती हैं। कुंवर नारायण हिंदी के उन बहुत थोड़े कवियों में हैं, जिन्होंने व्यक्ति और समाज के मेटाकॉन्शस को अपनी कविताओं में केंद्रीयता दी है। उनकी कविताएं यथार्थ का सिर्फ़ सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक पहलू ही नहीं देखतीं, बल्कि इनके बीच एक आत्मिक-आध्यात्मिक यथार्थ की जगह को परिभाषित भी करती हैं। उनमें जीवन को जीने लायक़ बनाने की बुनियादी भौतिक शर्तों, उसके लिए संघर्ष करने, स्वप्न देखने का स्वाभाविक अनुमोदन करते हुए मनुष्य की आध्यात्मिक आवश्यकताओं को भी संबोधित करने का साहस है। आज और पिछले पचास बरसों की हिंदी कविता में मनुष्य की आत्मिक आवश्यकताओं का जि़क्र-भर कर देना बड़ी बौद्धिक आपदाओं, सुनियोजित उपेक्षाओं और पीठ पीछे उपहासों को आमंत्रित करने का बड़ा ख़तरा पैदा करना है। उनकी कविता, जीवन, जीवनमूल्यों और कविता की उपस्थिति-ताक़त में गहरा भरोसा करती है, इसीलिए वह इनटैक्ट रहते हैं।

अध्यात्म को हमारे यहां जितनी कैजुअल सरलता के साथ सीधे-सीधे धार्मिक अंधत्व से जोड़ कर देख लिया जाता है, उसे गली-मुहल्लों-टीवी चैनलों में दिखने वाले बाबाओं के उपदेशों-प्रवचनों मात्र से जोड़ दिया जाता है। एक फूहड़ जि़द के साथ यह मानने से इंकार कर दिया जाता है कि अपने व्यावहारिक-ऐतिहासिक अर्थों में हमारे अंतर्मन को भी एक अ-भौतिक भोजन की आवश्यकता होती है। एक चित्र को देखने से जो आनंद मिलता है, संगीत की कोई ध्वनि हमारे भीतर किसी लहर को पैदा कर देती है, एक अजनबी चेहरे को मुस्कराता हुआ देखना किस तरह का सुख और संतोष देता है? ये सब हमारे भीतर के कवि के अध्यात्म हैं। मनुष्य की आत्मा का भोजन। क्या ख़ुद कविता ही बहुधा इसी रूप में हमारे पास नहीं आती? अनुभूतियों के बीहड़ ज्वार के साथ? हमारे समय के महान पोलिश कवि एडम ज़गायेवस्की इसे 'मिस्टिसिज्म फॉर बिगिनर्स’ कहते हैं।

कुंवर नारायण पूरे समाज की आत्मिक-आध्यात्मिक चेतना को झिंझोड़ते हैं। उनकी कविताएं सिर्फ़ इंडीविज़ुअल नहीं, कलेक्टिव अनकॉन्शस को संबोधित हैं। यह सीधी नहीं, असेंब्ली लाइन प्रक्रिया है। प्रतिरोध की कविता भी अनिवार्य रूप से मिस्टीक होती है। तभी वह मनुष्य के अधि-जगत को सूक्ष्मता से टिटिलेट कर पाती है। इतिहास के सबसे प्रतिरोधी व्यक्तित्वों ने भी, प्रतिरोध की अपनी मुहिम के दौरान मनुष्य के मेटाकॉन्शसनेस को लगातार एड्रेस करते रहना कभी नहीं छोड़ा था। यलगार कहने से ठीक पहले तक इसी मेटाकॉन्शसनेस को सहलाते रहने की एक प्रक्रिया होती है- याद कीजिए, 'सेवन समुराई’ में काम्बेई आखि़री मुक़ाबले से पहले अपनी टोली का मनोबल इसी तरह ऊंचा करता है।

एक कमज़ोर नैतिक बल वाले इस समाज में, उपनिवेशों और आक्रांताओं से टूटे हुए मनोबल वाले इस इतिहास में, आत्मबल जुटाने की कोशिश में हांफ रहे इस भूगोल में, एक कवि जब अपनी कविताओं के ज़रिए यह भूमिका अदा करता है, तो दरअसल वह कितनी बड़ी भूमिका है। इसीलिए कुंवर नारायण की कविताएं कलेक्टिव मेटाकॉन्शस को संबोधित एक मानसिक-मनावैज्ञानिक मोर्चा हैं। वे हमारी कलात्मक, सांस्कृतिक और मानवीय अनुभूतियों की गहराई तक को छूने वाली आवाज़ हैं।

येट्स की एक पंक्ति याद आती है कि रेटरिक क्या है? दूसरों के साथ संघर्ष की हमारी भाषा है। कविता क्या है? ख़ुद के साथ संघर्ष की हमारी भाषा का नाम है।

इस समय लिख रहे कवियों में कुंवर सबसे ज़्यादा भारतीय हैं। यहां भारतीय का अर्थ वैसा ही डेफिनिट नहीं है, जैसा कहीं और का होना। जैसे अमेरिकी होना प्रतिस्पर्धी होना है। ब्रिटिश होना ऐसी कॉमेडी का होना है, जिसे सिर्फ़ वे ही लोग समझ पाते हैं। फ्रेंच होना ऐसे विट या प्रतीकों के बीच जाना है, जिनकी अब उम्र हो चली। कुंवर उन्हीं अर्थों में भारतीय हैं, जिन अर्थों में कुरोसावा और ओज़ू जापानी हैं। ये दोनों फिल्मकार जापानी दुनिया में पश्चिमी सिनेमा से सबसे ज़्यादा प्रभावित रहे, लेकिन अंतत: वे विशुद्ध जापानी फिल्मकार हैं, जो जापानियत के वैश्विक संदर्भों को पुनर्परिभाषित करते हैं। पश्चिमी संस्कृति और शैली ने उन्हें अपनी कला में प्राचीन जापानी शैली और मूल्यों की ओर लौटने को प्रेरित किया। कुंवर नारायण के साथ भी यही हुआ। वे जितना पाश्चात्य दर्शन से जुड़ते गए, उनके भीतर भारतीयता की पहचान पुख्ता होती गई। सिर्फ़ सामूहिक मिथकीय स्मृतियों की पुनर्यात्रा में ही ऐसा हुआ हो, ऐसा नहीं है। वह अपनी इच्छा से भारतीय हैं और अपनी 'कलात्मक कल्पनाओं’ से भी भारतीय हैं। उन्होंने समावेशीकरण के चिरंतन भारतीय मूल्य को अपनी कला में प्रतिष्ठित किया। इसीलिए शुरुआत से अब तक उनकी कविता का टोन लगभग एक-सा बना हुआ है। उनका टोन उनकी कविता का पक्ष स्पष्ट कर देता है। उनकी कविता की पंक्ति है-


न पकड़ से छूटता पुराना सामान
न पकड़ में आता छूटता वर्तमान

पुराने और नए दोनों के साथ सहज संबंध स्थापित कर लेने के कारण जब उनका कवि एक पुराने, सुदूर स्थित समय में जाता है, तब वह ख़ुद को किसी आश्चर्यबोध में फंस जाने से बचा लेता है। ऐसा करके उनका कवि अपनी औपनिवेशिक विरासत को कमोबेश झटक देता है। अपनी पहचान का आविष्कार, उनकी उपस्थिति के प्रति गहरा आश्चर्यबोध, उनकी स्वीकृति को लेकर मन में रहने वाली शंका और उससे उपजी आइडेंटिटी क्राइसिस पुराने उपनिवेशों की कलाओं में बहुधा एक ऐतिहासिक विकार, किंतु समकालीन दुर्लालित्य की तरह दिखती हैं। कुंवर नारायण अपनी गहरी वैचारिकता और बीहड़ संयम से इस आश्चर्यबोध को जांचकर रोकते हैं, भावनात्मकता का मुक़ाबला कर उसे बाहर का रास्ता नहीं दिखा देते, बल्कि ख़ुद भावनात्मकता को थोड़ा चकित कर देते हैं। वह अपनी दृष्टि को परिमित या रेस्ट्रिक्ट कर देते हैं, ताकि वह और दूर तक देख सकें। वह अपनी दुनिया को सीमाबद्ध कर देते हैं, ताकि वह दुनिया की सीमाओं का अतिक्रमण कर सकें। देखना उनकी कविताओं का महत्वपूर्ण अंतर्कर्म है। उन्हें अपने इस देखने पर यक़ीन है और उनमें अनदेखे से कन्फ्रंट करने का, उत्साह और आकांक्षा की भाषा का रोमांस है।

यही कारण है कि कुंवर की कविताएं कॉनफ्लिक्ट्स से भरी हुई हैं। उनकी कविताओं में वर्तमान और अतीत, नीति और राजनीति, सत्य और असत्य, अनुभूति व विचार, जीवन और मृत्यु, नया व पुराना, सही और ग़लत, क्लासिक और रोमांटिक, इन सबके भीतर एक कॉनफ्लिक्ट लगातार चलता रहता है। उनमें भारतीय और पश्चिमी सभ्यता, संस्कृति और विचार-दर्शन प्रणाली का कॉनफ्लिक्ट प्रमुखता से आता है। वह लखनऊ में हैं या क्राकोव में? शेक्सपीयर में हैं या अमीर ख़ुसरो में? काफ़्का के प्राहा में हैं या ग़ालिब की दिल्ली में? वेनिस की पानीदार गलियों में हैं या अयोध्या की उदास तंग गलियों में? बोर्हेस में हैं या निराला में? एकलता में हैं या बहुलता में? ख़ुद में हैं या बेख़ुद में? भौतिक दर्शन में हैं या आध्यात्मिक दर्शन में? जीवन में हैं या मृत्यु में? उनकी कविताएं इन सारी चीज़ों, मन:स्थितियों, विचार-प्रणालियों के कॉनफ्लिक्ट से बनती हैं।

यहां यह स्पष्ट कर दूं कि यह कॉनफ्लिक्ट उनकी कला का अंतर्कर्म है, देशों और समाजों में होने वाले कॉनफ्लिक्ट से इतर। भिडंत और युद्ध के अर्थों से भिन्न। यह सागर और तट की तरह है। कला में कॉनफ्लिक्ट सुमेल की संभावनाओं को बलवती करता है। इसीलिए कला में एक-दूसरे से लड़ती हुई दो तिरछी रेखाएं एक-दूसरे की सहयोगी रेखाएं बन जाती हैं। इसीलिए एक-दूसरे से बैर रखता दीखते दो शब्द एक-दूसरे को सहयोग देकर एक नया अर्थ स्थापित कर देते हैं। वह अलग-अलग दिखने वाली स्थितियों, विलोमों, विचारधाराओं के इसी कलात्मक कॉनफ्लिक्ट से अपने कविता का जीवन-सत्व हासिल करते हैं। कल्पना और यथार्थ का कॉनफ्लिक्ट एक संपूर्ण जीवन-यथार्थ की दृष्टि देता है, जो केवल देखी-पढ़ी व्यक्त दुनिया से ही नहीं, बल्कि अदेखी-अपढ़ी, अव्यक्त काल्पनिक दुनिया से भी बनता है। संपूर्ण काव्यदृष्टि के तौर पर वह इन सारी चीज़ों को अपने में शामिल कर लेते हैं, जैसे मानवकल्याण से जुड़ी सारी अनुभूतियों और विचारधाराओं को अंतत: मानवतावाद के विराट बिंदु में जाकर मिल जाना होता है। सांस्कृतिक और वैचारिक आवाजाही के नैरंतर्य से संभव हुआ यह कॉनफ्लिक्ट उनके यहां संयोजन के एक औज़ार के रूप में इस्तेमाल होता है। इसीलिए मैं उन्हें 'कलात्मक कॉनफ्लिक्ट्स का महाकवि’ कहना पसंद करता हूं।

यहीं वह विशुद्ध अर्थों में एक लेखक के रूप में दिखते हैं, जिसके सरोकार में (सबसे छोटी इकाई) व्यक्ति की बाहरी और भीतरी दोनों दुनियां होती हैं, लेकिन जिसकी प्रतिबद्धता अंतत: अपनी रचना के प्रति है, क्योंकि उन सरोकारों के प्रति उस लेखक का एकमात्र वही प्रस्ताव संभव और श्रेष्ठतम होता है।

जैसा कि पहले कहा मैंने, वह अपनी कविताओं के जीवन-सत्व की तलाश में बौद्ध दर्शन की तरफ़ भी जाते हैं, लेकिन सिर्फ़ इसी आधार पर उन्हें मध्यममार्गी कहना, किसी कवि को एक शब्द में रिड्यूस कर देने के जल्दबाज़ चिंतन से ज़्यादा कुछ नहीं। जो कवि यह लिखता हो कि तट पर हूं पर तटस्थ नहीं, वह मध्यममार्गी नहीं हो सकता। बुद्ध की तरह वह अपने लिए एक पक्ष चुन लेते हैं- जीवन और उसके सत्य का अन्वेषण। तभी तो नचिकेता एक पिता की क्रूरता के खि़लाफ़ एक पुत्र का विद्रोह है, जो आध्यात्मिक संघर्ष, ईश्वरीय सत्ता के ,खि़लाफ़ बग़ावत और अंतत: जीवन की जीत का पर्व-प्रतीक बन जाता है। एक नॉलेज फैनेटिक कवि का नॉलेज फैनेटिक चरित्र ख़ुद को जीत लेता है।

ऊपर जो विशेषताएं मैंने गिनाई हैं, और वे भी, जो समय के अभाव में इस बातचीत में नहीं आ पाई हैं, वह सिर्फ़ अकेले उन्हीं के कवि नहीं हैं। वह इन सारी विशेषताओं की सामूहिकता के कवि हैं। दरअसल, कुंवर नारायण में इतना वैविध्य है कि उन्हें किसी एक कल्ट में बांधा ही नहीं जा सकता। अच्छे कवियों का अकेला होना बहुत ज़रूरी है। जैसा कि बोर्हेस ने 'अ पोएट्स क्रीड’ में कहा है- बड़ा कवि अपना क्रीड या कल्ट ख़ुद ही होता है। कुंवर भी अपनी क्रीड के इकलौते कवि हैं। मेरी नज़र में वह दूसरी भाषाओं में इस समय लिख रहे इसी तरह के कवियों एडम ज़गायेवस्की, बेई दाओ, को उन आदि के समकक्ष हैं।

एक बार सत्यजित राय से एक इंटरव्यू में पूछा गया कि आपने, कुरोसावा, बर्गमैन और फेलिनी ने लगभग एक साथ काम शुरू किया था, फिर अब आप उनसे पीछे क्यों हैं? उनका जवाब था- क्योंकि मेरे पास उनके जैसे दर्शक नहीं।

कई बार मुझे लगता है कि यह सिर्फ़ राय की समस्या नहीं, हमारे पूरे कला-परिदृश्य, कलाकार और समाज की त्रासदी है।



{ गीत चतुर्वेदी हिंदी के लब्धप्रतिष्ठ कवि-कथाकार हैं. उन्होंने यह आलेख कुंवर नारायण को साहित्य अकादमी द्वारा २० दिसंबर को महत्तर- सदस्यता अर्पित किये जाने के मौके पर पढ़ा था. यह दूसरा अवसर है जब सबद पर उनका पठित आलेख इस स्तंभ के तहत छप रहा है. उनका अब तक का लेखन यों है : कविता संग्रह 'आलाप में गिरह' और दो कहानी संग्रह 'सावंत आंटी की लड़कियां' व 'पिंक स्लिप डैडी' प्रकाशित. वर्ष 2007 में 'मदर इंडिया' कविता के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार से सम्‍मानित. चार्ली चैपलिन की जीवनी और पाब्‍लो नेरूदा के दुर्लभ गद्य के अनुवाद की पुस्‍तक 'चिली के जंगलों से' के अलावा  अनुवाद के कई बहुप्रशंसित काम. यहां दी गई उनकी तस्वीरें प्रीति मान तथा शाहनवाज़ मलिक के कैमरे से. }

Friday, December 24, 2010

स्वगत : ५ : कुंवर नारायण




साहित्य एक समानांतर इच्छालोक रचता है


साहित्य अकादमी द्वारा दी जानेवाली ''महत्तर सदस्यता'' उत्कृष्ट साहित्य-लेखन को सम्मानित करती है. मेरे लिए इस मान्यता का सबसे मूल्यवान अंश ''उत्कृष्टता'' में विश्वास है, जिससे मुझे अपने लेखन और जीवन में भी, बराबर प्रेरणा मिलती रही है. अकादमी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए मैं इस सम्मान को सादर स्वीकार करता हूँ.

वह बीसवीं सदी का चौथा दशक था जब मैंने साहित्यिक होश संभाला. वही दूसरे महायुद्ध के शुरुआत और अंत का दशक था. ''भारत छोडो'' आन्दोलन और भारत की आज़ादी का दशक था. और आज़ादी के साथ ही भारत-विभाजन की भयानक सांप्रदायिक हिंसा और गाँधी की हत्या का दशक था...इन घटनाओं का मैं मूक साक्षी मात्र नहीं था : एक ऐसे संयुक्त परिवार का सदस्य था जो आज़ादी की लड़ाई से परोक्ष किंतु घनिष्ठ रूप से जुड़ा था. यही मेरे हिंदी साहित्य में प्रवेश का भी समय था -- लगभग १९५० के आसपास. उस समय को सोचते हुए कुछ शब्द स्मृति में तेज़ी से गूंजने लगते हैं --''आधुनिक'', ''प्रगतिशील'', ''प्रयोगवाद'', ''नया'', ''पुराना'', ''परंपरा'', ''युद्ध'', ''संघर्ष'', ''क्रांति'', ''आन्दोलन'' वगैरह जिनसे उस समय के मिजाज़ का अंदाज़ लगाया जा सकता है, और जिनसे तब का ''आधुनिकता-बोध'' अपने को परिभाषित कर रहा था. समाजवादी चेतना पर मार्क्स और गाँधी का मिलाजुला असर वातावरण में घुला था.

जिन पारिभाषिक शब्दों द्वारा हम अपने युग को दूसरे युगों से अलग करना चाहते हैं, अक्सर वे ही हमारी सोच की सीमा बन जाते हैं. उनसे बाहर निकलते ही विचारों का एक ज़्यादा बड़ा और खुला परिप्रेक्ष्य दिखाई देने लगता है. ''आधुनिक'' और ''नए'' जिन पर हमने इतना भरोसा किया, नाकाफ़ी लगने लगते हैं, और उनको लेकर हम अपने असंतोष को लगभग नकारात्मक ढंग से व्यक्त करते हैं, जैसे ''उत्तर-आधुनिकतावाद'', ''उत्तर-संरचनावाद'', ''उत्तर-मार्क्सवाद'' वगैरह...एक तरह से यह स्थापित परिभाषाओं के परिसीमन को आमूल रद्द करने की कोशिश है.

आज हम एक उतावले समय में जी रहे हैं. इस ज़ल्दबाज़ी में असंयम और बौखलाहट है. जो हम चाहते हैं, उसे तुरत झपट लेने की आपाधापी. यह हड़बड़ी भी एक तरह की हिंसा है -- लड़भिड़ कर किसी तरह से आगे निकल जाने की होड़. यह बेसब्री हमारे अन्दर कुंठा और अधीरज को भड़काती है -- उस अनुशासन को नहीं जिसका लक्ष्य महान-कुछ को प्राप्त करना होता है. मेरी एक कोशिश जहां अपने समय को ठीक-ठीक समझ सकने की रही है वहीं उसे स्वस्थ और स्थाई जीवनमूल्यों से जोड़ने की भी.

सदियों में जिस मानसिकता और जीवन-पद्धति का निर्माण हुआ है, उसमें काफी कुछ ऐसा भी है जिसमें हमारे सामाजिक दायित्व-बोध और नैतिक वृत्तियों की गहरी मनोवैज्ञानिक जड़ें हैं. उनमें सुधार और परिवर्तन धीरे-धीरे ही लाया जा सकता है, उतनी तेज़ी से नहीं जितनी तेज़ी से आज हमारा ''आधुनिकता-बोध'' बदल रहा है. पीढ़ी का मतलब किसी एक समय में कोई एक ही पीढ़ी नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों का अनिवार्य सह-अस्तित्व है.

यह समय मुझे मुख्यतः सही समझौतों का वक़्त लगता है, टकरावों का नहीं. समझौता लड़ाई की भाषा का शब्द नहीं है, विचार और विकास की भाषा का शब्द है. चाहे अनचाहे विकास का औद्योगिक मॉडल राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तरों पर स्वीकृत हो चुका है. अब उन फैसलों के नतीजों पर गंभीरता से सोचने-विचारने का वक़्त है. असली विकास वही है जो हमारी आज़ादी के प्रत्येक हिस्से तक पूरी तरह पंहुचे, न कि कुछ ही लोगों और जगहों तक सिमट कर रह जाए. ''संकटकालीन'' या ''संक्रमणकालीन'' जैसे मुहावरे -- जिनसे हम विभिन्न युगों को सोचने के आदी हैं -- शायद इस समय पर बहुत दूर तक लागू नहीं होते. हमें उनकी हदबंदी से बाहर निकाल कर सोचना होगा. हमारे सामने अब तमाम विकल्प हैं. ''बाजारवाद'' और ''उपभोक्तावाद'' आज का कटु यथार्थ है जो हमारे रहन-सहन, रीति-रिवाजों, आपसी संबंधों और सांस्कृतिक चेतना को कई स्तरों पर तेज़ी से बदल रहा है. हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती इस समय तमाम विकल्पों में से सही रास्ते चुन सकने की है. शायद इसीलिए इस समय को ''द्विविधाओं'' और ''संदेहों'' का समय कहना ज़्यादा ठीक लगता है.

जर्मन समीक्षा से निकले दो 'पद' मुझे अक्सर याद आते हैं --''जीवनदृष्टि '' और ''विश्वदृष्टि''. आज ऐसा नहीं लगता कि उच्च-कोटि की जीवनदृष्टि से हमारी विश्वदृष्टि बन रही है : उलटे संदेह होता है कि एक बिलकुल स्थूल और व्यावसायिक विश्वदृष्टि हमारी जीवनदृष्टि को बना रही है. हमारे लिए जो सही है उसे चुनना है. क्या सच है, क्या महज विज्ञापन यह दुविधा केवल चीज़ों तक सीमित नहीं, साहित्य, कलाओं और विचारों को लेकर भी है. बाज़ार-संस्कृति की जिस अंतरराष्ट्रीय चकाचौंध में हम खड़े हैं क्या उसके पार भी हम कुछ देख पा रहे हैं ? ऐसा लगता है कि ज़्यादा दवाब ''बेस्ट-सेलर'' ( सर्वाधिक बिकाऊ माल ) के उत्पादन पर है, न कि ''बेस्ट'' ( सर्वश्रेष्ठ ) की खोज पर. मीडिया में भी लाखों में बिकनेवाली किताबों का जिस जोरशोर से प्रचार और प्रसार होता है वैसा गंभीर और विचारशील साहित्य का नहीं. ऐसा नहीं कि इस समय बड़ा साहित्य भी नहीं लिखा जा रहा है, पर यह सवाल फिर भी अपनी जगह बना रहता है कि आज के जीवन में उत्‍कृष्‍ट की खोज इतनी उपेक्षित और निर्वासित-सी क्यों है?

कविता का जीवन जीते हुए मैंने इस तथ्य को बार-बार जाना है कि वह एक एकांत साधना और समर्पित किस्म की चेष्टा है -- आर्थिक लाभ के खातों से अलग. परन्तु हमारे निजी और सामजिक जीवनबोध का वह सबसे संवेदनशील हिस्सा है जिसके ''लाभ'' को बौद्धिक और भावनात्मक स्तरों पर ही ग्रहण किया जा सकता है.

जीवन में साहित्य की जगह को मैंने अपने लिए कुछ इस तरह भी समझा है. वह एक बहुत बड़ी भाषाई ताक़त का स्रोत है. जिस तरह हर शब्द की एक स्वतंत्र सत्ता होती है उसी तरह भाषा में गठित उसकी एक समवेत शक्ति भी. रचना-कर्म का एक खास मतलब इस निहित शक्ति-स्रोत का निरंतर उत्खनन और अविष्कार है. रचनात्मकता इस ऊर्जा को दहका कर एक रचना में अर्जित करती है. जीवनेच्छा और साहित्य-रचना के बीच निकट सादृश्यता है. साहित्य शब्दों के बहुआयामी प्रयोगों द्वारा ज़िन्दगी के दवाबों से मुक्त करके एक समानांतर इच्छालोक रचता है. 'मुक्ति' और 'रचना' का यह दुहरा एहसास यथार्थ से पलायन नहीं है, उसी अदम्य जीवनशक्ति का परिचायक है जो साहित्य और कलाओं की रचनाशीलता में प्रकट होती है.
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[ साहित्य अकादमी द्वारा महत्तर-सदस्यता प्रदान किये जाने के अवसर पर २० दिसंबर को दिया गया स्वीकृति वकतव्य. इस स्तंभ में इससे पूर्व आप कुमार अंबुज, गीत चतुर्वेदी तथा व्योमेश शुक्ल को भी पढ़ चुके हैं. कुंवर जी की तस्वीरें प्रीति मान के कैमरे से. ]

Saturday, December 18, 2010

सबद विशेष : ११ : कुंवर नारायण की नोटबुक



[ हिंदी के बारे में चित्र-विचित्र बातें करते हुए आपके सामने जब कुंवर नारायण सरीखे कवि-लेखक का कुछ ( फिर वह उनकी कविता हो, आलोचना हो, कहानी हो ) पड़ जाता है तो आप अपनी धारणाएं बदलने को बाध्य होते हैं. यह एक ऐसा लेखन है जो सोच, विचार और कल्पना के उत्कृष्ट से आपका साक्षात कराते हुए आपको अपनी भाषा में ऐसा संभव होते /देखने /पढ़ने के सौभाग्य, गर्व और संतोष से भर देता है.

सबद विशेष की ११वीं कड़ी में कुंवर जी का अब तक अजाना लेखन : उनकी नोटबुक. सच तो यह है कि पचासेक वर्षों के साहित्य सृजन के सामानांतर लिखे जाने वाले इन नोट्स / जाटिंग्स को कई दफ़ा बज़िद मैंने उनसे लेकर पढ़ा है और एक अपूर्व अनुभव और विचारोत्तेजना से समृद्ध होता रहा हूँ. बहुत आग्रह करने पर उन्होंने कुछ हिस्सों पर काम करने की अनुमति दी. अब इसकी पहली कड़ी यहां है. यह चयन थीमैटिक है, इसलिए वर्ष आदि का उल्लेख नहीं है. इसकी दूसरी कड़ी भी जल्द सामने होगी.

सबद जब शुरू हुआ था तो पहले लेखक कुंवर जी थे, आज जब इसकी २०० वीं पोस्ट लग रही है तो भी कुंवर जी. कहना कम है कि इस बीच वे कितने बड़े संबल रहे. मैं उनके सहित उन तमाम लेखकों और पाठकों के आगे नतशिर हूँ जिन्होंने इसे ज़रूरी प्रकाशन बनाये रखने का हौसला दिया.


प्रसंगवश यह सूचना आपसे बांटी जा रही कि कुंवर जी को साहित्य अकादमी ने अपनी महत्तर सदस्यता से नवाजने का निर्णय लिया है. ]




आधा भी कम नहीं

आधा भी कम नहीं होता, बशर्ते हमें उसे भी पूरी तरह जीने की कला आती हो.

अधूरे तर्क भी बड़े काम के होते हैं, क्योंकि कोई भी तर्क कभी पूरा नहीं होता. अधूरे किस्से, अधूरी खोजें, अधूरी आकांक्षाएं, अधूरे समझौते, अधूरे युद्ध, अधूरे सपने, अधूरे प्रेम, अधूरी ज़िन्दगी...एक पूरा संसार है इनका --उस संसार से कहीं बड़ा और रोचक जिसे हम पूर्णताओं का संसार कहते हैं.

संदेह करना चाहिए कि पूर्णता जैसा कुछ है भी या वह भी एक भ्रम है ? या हम कहीं भी 'समाप्त' लिख कर अपने को समझा लेते हैं कि एक किताब पूरी हुई. मैंने ऐसी कोई भी किताब नहीं पढ़ी है जिसके 'अंत' से एक नई किताब की शुरुआत ना हो सके.
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मुझे शुरुआतें पसंद हैं : उनमें एक उत्साह, उम्मीद और ताज़गी होती है. सब कुछ अंत तक जी डाला जाए यह ज़रूरी तो नहीं. काफी कुछ को अधूरा ही छोड़ कर नई-नई शुरुआतों की ओर लौटना अधिक रोमांचक और आशाप्रद लगता है.
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'उपदेश' जैसे शब्दों से भागने की ज़रूरत नहीं. ये भी 'विचार' करने, देने और पाने के जायज़ तरीके रहे हैं - संवादी तरीके.
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कविता की ताज़गी जब ख़त्म होने लगती है, तब वह सब से पहले भाषा की ओर से सड़ना शुरू करती है.
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कविता, अनुभव और भाषा के साथ एक खास तरह का सलूक करती है. कविता अनुभव की भाषा पर एक दूसरी तरह का चिंतन है.
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कविता 'यथार्थ' के बारे में 'कल्पना' की भाषा में बोलती है. इस तरह यथार्थ और कल्पना के बीच वह एक निकटता बनाती है- दूरी नहीं. हम कल्पना की भाषा में भी यथार्थ के बारे में सोच और बातें कर सकते हैं. इस विरोधाभास को दूर करने में ही कविता ना केवल दर्शन को संभव बनाती है, बल्कि इस आम धारणा को भी खंडित करती है कि कल्पनाशीलता और यथार्थ में कोई बुनियादी विरोध है ही जिसे दूर नहीं किया जा सकता.
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भाषा की बारीकियों को मोटा और भोंडा करके नहीं बल्कि उसकी धार और नोक को एक लगभग पारदर्शी शिल्प द्वारा और भी पैना करके यदि सोचा जाए तो अनुभव और विचारों की ज़मीन को एक पक्का मानवीय आधार दिया जा सकता है.
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शब्द सांकेतिक होते हैं -अमूर्त संकेत- जिनके द्वारा हम वस्तुजगत या उसके बारे में जानकारियों को अपनी कल्पना में ग्रहण करते हैं. संकेतों का तभी कोई अर्थ है जब हम उन्हें किसी सन्दर्भ में व्याख्यायित करते हैं.
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एक माने में शब्द के साथ अब हमारे संबंध बदल गए हैं : अत्यंत परोक्ष जटिल अर्थों में. हम शब्दों से भी उसी तरह के सीधे प्रभावों की उम्मीद करते हैं जैसी बिम्बों से. किसी भी प्रकार के अमूर्त / प्रतीकात्मक / पराभौतिक / चिंतन को लेकर हम धीरज खो देते हैं. तुरंत ठोस, और साकार सम्प्रेषण हम चाहते हैं. वैज्ञानिक तथ्यों के अनुरूप. वह शब्दों की बुनियादी प्रकृति के ही प्रतिकूल है. शब्द चिन्ह मात्र ही नहीं, ऐतिहासिक भी होते हैं जिनके अभिप्रायों को नियम विशेष के अनुसार 'पढ़ना' और 'रचना' होता है. उनके associations और inovations बिम्बों की अपेक्षा अधिक तरल और विस्तृत होते हैं.
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औद्योगिक, व्यावसायिक और तकनीकी दुनिया में जैसे भाषा का मतलब स्थूल हितों से जुड़ता जाता है, भाषा के अत्यंत नाज़ुक संवेदन-तंतुओं का क्षरण होना लाजिम है. कलाओं की भाषा 'व्यावहारिक' नहीं लगती- यह आक्षेप अपने आप में भाषा के अत्यंत सुसंस्कृत पक्ष के प्रति बदसलूकी है.
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पोलिश नाट्य-निर्देशक ग्रोताव्सकी ने एक बातचीत के दौरान कहा था कि कुछ शब्द मुर्दा हो गए हैं, फिर भी हम उन्हें ढो रहे हैं. उनकी जगह दूसरे शब्द रखने भर से काम नहीं चलेगा, क्योंकि उन शब्दों के अर्थ मर चुके हैं. यह बात मानीखेज है. नए शब्दों से अधिक नए अर्थों की खोज ज़रूरी है. इस खोज के लिए साहसिकता और जोखिम उठाते हुए हम अपने लिए ऐसा कुछ पा सकते हैं जिसे दूसरों तक पहुँचाना मूल्यवान हो.

'संस्कृति' शब्द मुझे एक बुरी तरह लुटा हुआ शब्द लगता है : इसे किसी भी अर्थ की दासता स्वीकार है. इसका अपना व्यक्तित्व पूर्णतः विघटित हो गया है. यह अब किसी ऐसी ऐतिहासिकता या जोखिम का परिणाम नहीं मालूम होता जिससे कभी प्राचीन भारतीय, यूनानी, मिस्री या रोमन सभ्यताओं ने गुजरते हुए इस शब्द के रोमांचकारी गौरव मूल्यों को पाया था. आज हम ''मास कल्चर'' या ''जन-संस्कृति'' शब्द को उसके उन ऐतिहासिक अर्थों से छीनते भी हैं. किसी नए अर्थ में उसे समृद्ध नहीं करते.
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Thursday, December 09, 2010

रघुवीर सहाय पर व्योमेश शुक्ल



[ यह
आलेख रघुवीर सहाय के हिंदी में होने को सिर्फ़ दर्ज भर नहीं करता. उन्हें याद कर लेना भी इसका अभीष्ट नहीं. यह याद करने की राजनीति और उसके अभिप्राय पर कुछ सवाल ज़रूर खड़े करता है और ऐसा करते हुए पुनः हमारा ध्यान उन समस्याओं की ओर भी ले आता है जो सहाय जैसे कवियों की मूल चिंता में शामिल थे और जिसका बहुत सतही, रवायती और जगहघेरू पाठ हमारे पास उतना ही मौजूद है जितना सहाय जी का नाम-जाप. व्योमेश शुक्ल ने सबद पर इससे पहले मंगलेश डबराल और बिस्मिल्लाह खान पर अपने लेख लिखे थे. इस दफा परिप्रेक्ष्य को सही करते हुए रघुवीर सहाय पर उनका लेख.

दो निजी तथ्यों का उल्लेख गैरज़रूरी न होगा. एक तो यह कि आज सहाय जी का जन्मदिन है और दूसरा, सिर्फ़ ४८ घंटे की शॉर्ट नोटिस पर
'रघुवीर सहाय' पर इतना निरंध्र और निर्भीक गद्य उनको जीनेवाले व्योमेश ही लिख सकते थे. यह सार्वजानिक स्वीकार ही शुक्रिया है. निजी तौर पर इसे जताना मेरे लिए असंभव है. ]


लोग भूल नहीं गए हैं, लेकिन...

इस बात पर यक़ीन करना लगातार मुश्किल होता जा रहा है कि हमलोग रघुवीर सहाय को नहीं भूले हैं या नहीं भूल जायेंगे; मसलन हम उन्हें बग़ैर यक़ीन के याद करते हैं। यह एक निजी दिक़्क़त है कि तमाम 'साहित्यिक' लोगों से मिलकर, उन्हें देखकर या उनकी बातें सुनकर लगता है कि उन्होंने सहाय जी को पढ़ा नहीं है; मसलन कविता से लगभग आक्रांत एक सभागार में बैठे हुए ऐसा ख़याल विपत्ति की तरह अचानक किसी के ऊपर बरस जाता है कि यहाँ ज़्यादातर लोग रघुवीर सहाय के बग़ैर मनुष्य, समाज या कविता की रचना करने की कोशिश कर रहे हैं. यों, रघुवीर सहाय की अनुपस्थिति के बादल घिरे ही रहते हैं.

ऐसी ही निरी 'साहित्येतर' वजहों से मुझको समाज में और साहित्य की छोटी सी दुनिया में कवि की व्याप्ति या दख़ल की जांच करते रहने का रोज़गार मिल जाता है. ज़ाहिर है कि इन टोटकों से रघुवीर सहाय या किसी की भी कविता के औचित्य या उत्कर्ष का सीधा संबंध बनाना दुश्वार है और समीक्षा की भाषा के स्तर पर उसे सिद्ध कर पाना तो प्रायः नामुमकिन, लेकिन अगर भूलने की राजनीति को मुद्दा बनाया जाये तो वह मुद्दा अपने आप सहाय जी की कविता की राजनीति को रेफ्लेक्ट करने लगेगा. रघुवीर सहाय नाम के नागरिक, संपादक, कवि और दार्शनिक के मुद्दे ऐसे ही जनता में झिलमिलाते हैं.

ऐसे मूल्यों की एक वृहत्तर सूची तैयार की जा सकती है जिनकी जगह भारतीय नागरिक के विवेक में कम होती गई है, लोग जिन्हें भूलते गये हैं. फ़िलहाल वे मूल्य अक्सर मुहावरे की शक्लों में पेश किये जाते हैं. धर्मनिरपेक्षता, सहिष्णुता, शोक या करुणा जैसे किसी भी मूल्य को उदाहरण बनाया जा सकता है. वे चमकीले और चंचल बना दिए गये हैं, उनके अनिवार्य सन्दर्भ ओझल हैं और उनके मुहावरेबाज़ प्रयोक्ता ज़्यादा से ज़्यादा जगह घेरने के आकांक्षी. यह साहित्यिक सचाई है और राजनीतिक सचाई है.

मूल्य को मुहावरे में अपदस्थ किये जाने के इस ख़तरे से सहाय जी वाकिफ़ थे. इस विडम्बना का रचनात्मक प्रतिकार क्या हो सकता था ? रघुवीर सहाय कविता की भाषा को अनेकार्थी, तात्कालिक, अवसरानुरूप और यथास्थितिवादी होने से रोकने का संघर्ष करते हैं. वह अनेकार्थता और इस प्रकार आलंकारिकता को कविता का गुण मानने वाले कॉमन सेन्स के सामने खड़े हो जाते हैं. यों वह हिंदी साहित्य संसार के पारंपरिक कॉमन सेन्स में एक रैडिकल रप्चर घटित कर देते हैं. रास्ता कहीं और ही मुड़ और किसी दूसरी ही दिशा में खुल जाता है. वह पुरानी जनता को एक नये कलात्मक व्यवहार के ज़रिये नये समाज, नये मनुष्य और नये विचार के लिये नया कर लेते हैं.

डायलेक्टिक्स का कोलाहल और रचनात्मक व्यवहार में उसका सर्वथा अभाव हिंदी में लगभग एक ही बात है. शोषण की कविता चूँकि घोषित तौर पर लिखी नहीं जाती इसलिए हम शोषण के ख़िलाफ़ लिखी जा रही कविता में ही डायलेक्टिक्स की कमी की शिकायत करने को विवश हैं. दरअसल शोषण के अधिकतम संभव वर्तमान और आगामी रूपों की शिनाख्त के बग़ैर प्रतिकार की नई शक्लें ढूँढना संभव नहीं और शोषण के प्रकारों की खोज - ज़ोर देकर कहा जाना चाहिए - कि हमेशा एक सामाजिक काम है, एक राजनीतिक गतिविधि है. शोषण और शक्ति की अधुनातन सरंचनाओं में घुसे बग़ैर उन्हें ढहाने की आकांक्षा भी कैसे की जा सकती है?

आज की अधिकांश कविता में इन नव्यतम सरंचनाओं में जाने की नीयत, कौशल, सूझ और इच्छाशक्ति का अभाव तो है ही, उसमें इन्हीं वजहों से नारा लगाने और पत्थर चलाने तक के जुनून का अभाव भी है. यानी होश और जोश दोनों की कमी. कला का रहस्य कुछ इस व्यवहार में भी निहित है कि उसमें किसी एक बिंदु पर जोश और होश, कलात्मकता और सामाजिकता जैसे प्रत्यय एक ही हो जाते हैं, इसी बिंदु पर कविता में विचार या कला की कमी का अलग-अलग रुदन करने वाले भी एक-से मसखरे हो जाते हैं.

ख़ैर, शोषण के उपलब्ध रूपों के ख़िलाफ़ उपलब्ध में ही चीख़-पुकार मचाना, अनुभव से साबित है, यथास्थिति की निर्लज्ज अभ्यर्थना के सिवाय कुछ नहीं है. मिसाल के लिये युवा कवि राकेश रंजन की एक कविता हिंदी के आलोचकों की कथित तौर पर भर्त्सना करती है. कविता का आख्याता कहता है कि महानगर चलो, आलोचक वहीँ रहते हैं, हे कवि, उनसे दोस्ती कर लो, तुम्हारा बहुत भला होगा, आदि-आदि. कविता तुकांत है और हिंदी आलोचना के सामान्य कामकाज के बारे में जो असंतोष और निराशा-मिश्रित आम राय है, उसी को वाणी देती है. पूरी कविता समकालीन आलोचना की किसी भी बौद्धिक प्रवृत्ति, अन्याय या अत्याचार के उसके औज़ारों, उसमे शामिल व्यक्तियों या समूहों के ख़िलाफ़ विशेष रूप से कोई टिप्पणी नहीं करती, जबकि शाब्दिक रूप से वह आलोचना का निंदन ही अथ से इति तक कर रही है.

अब यह निंदन - जो उपलब्ध के पिष्टपेषण के सफलतावादी नुक्ते से निकला है, अपने लक्ष्य में इस हद तक सफल है कि ज़माने भर के नामवर सिंह और नन्दकिशोर नवल और परमानंद श्रीवास्तव मज़े से बैठे -बैठे उसे सुनते हैं और काव्यपाठ पूरा हो जाने पर कवि की पीठ ठोंकते हैं. यह कविता अपने विरोध की उपलब्धवादिता और एकांगिता में आलोचना नाम की अन्यायरत ताक़त को लेजीटिमाइज़ करती है. ऐसी कविता का शोषण के प्रकारों की खोज और मीमांसा से दूर का ही रिश्ता है. यह विशुद्ध साहित्यिक कर्म है.

इसके विपरीत रघुवीर सहाय के यहाँ डायलेक्टिक्स रचना के सभी स्तरों पर एक साथ सक्रिय और अंतर्भूत है. समाज और भाषा की डायलेक्टिक्स. रूप और अंतर्वस्तु की डायलेक्टिक्स... मानवीय संबंधों के निर्माण और परिष्कार की डायलेक्टिक्स. नीम के पेड़ के इर्दगिर्द बनी उनकी एक कविता में अंततः पेड़ के पास उसकी महिमा का गुणगान करने कुछ संस्कृतज्ञ जुटते हैं. पूरी कविता दृश्य में अभिव्यक्त होती है लेकिन अन्यायमूलक यथास्थिति के नये प्रकार तक अपने पाठक को पहुँचाती है.

आज रघुवीर सहाय की दुविधाएँ भी रचनात्मक तौर पर बड़ी लगती हैं. उनकी उपलब्धियों के बग़ैर तो हिंदी कविता अपने भविष्य में दाखिल ही नहीं हो सकती. अपने समय अर्थात नेहरु युग और उसके ठीक बाद के दौर की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति को सहाय जी कितने विशाल फलक पर प्रोब्लेमेटाइज़ करते हैं और भाषा और शिल्प की पिछली समस्त चुनौतियों को एकबारगी पार करते हुए नये लक्ष्य सामने रखते हैं. आज जिन बातों बिलावजह मुद्दा बनाने की कोशिश हो रही है, उनके कितने सशक्त समाधान सहाय जी की कविताओं में निहित हैं ,'' अरे अब ऐसी कविता लिखो कि जिसमे छन्द घूमकर आए '' में छन्द और अछन्द, प्रगति और प्रयोग, लघु और गुरु जैसे विभाजन किस तरह ओछे और निरर्थ हो जाते हैं.

रघुवीर सहाय ने हिंदी कविता को धर्मनिरपेक्षता, नागरिक अधिकार, लोकतंत्र, बराबरी और अंततः सारे संघर्ष एक साथ करते हुए भाषा के मोर्चे पर ही खपने जैसी प्रतिश्रुतियाँ दी हैं. जब तक इन संकल्पों के सामने आने खतरों की पहचान का विवेक ओर उनके विश्लेषण का माद्दा हममें हैं तब तक कवि जीवित है और उसे भूला भी नहीं गया है.

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Sunday, December 05, 2010

आज पहली और आखिरी बार 2010 की 6 दिसंबर है !



अयोध्या, 1992
कुंवर नारायण

हे राम,
जीवन एक कटु यथार्थ है
और तुम एक महाकाव्य !

तुम्हारे बस की नहीं
उस अविवेक पर विजय
जिसके दस बीस नहीं
अब लाखों सर - लाखों हाथ हैं,
और विभीषण भी अब
न जाने किसके साथ है.

इससे बड़ा क्या हो सकता है
हमारा दुर्भाग्य
एक विवादित स्थल में सिमट कर
रह गया तुम्हारा साम्राज्य

अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं
योद्धाओं की लंका है,
'मानस' तुम्हारा 'चरित' नहीं
चुनाव का डंका है !

हे राम, कहां यह समय
कहां तुम्हारा त्रेता युग,
कहां तुम मर्यादा पुरुषोत्तम
कहां यह नेता-युग !

सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ
किसी पुरान - किसी धर्मग्रन्थ में
सकुशल सपत्नीक ....
अबके जंगल वो जंगल नहीं
जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक !
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{ कविता प्रकाशित करने की अनुमति देने के लिए हम कुंवरजी के अत्यंत आभारी हैं. साथ में दी गई चित्र-कृति सिंडी वॉकर की है.}

Friday, December 03, 2010

पुस्तकों से बनता जीवन


{ वे दिल्ली के आरंभिक दिन थे .सीखने, पढ़ने, प्रेम और काम करने के भी. फिर पता नहीं कब ये सब एक हो गए. जैसे कई लड़कियों के लिए उमड़नेवाला कैशोर्य प्रेम किसी एक पर टिक जाता है, कुछ उसी तरह. ऐसे यहां जीना शुरू हुआ और इसे बेहतर संभव करने में पीसीओ में खड़े होकर कई हफ़्तों तक की गई लेखकों/ कलाकारों/ विचारकों से बातचीत भी शामिल थी. आगे पसंदीदा किताबों पर एकाग्र उनकी बहुवर्णी टिप्पणियां दी जा रही हैं. फिल्मों, जगहों आदि के बारे में फिर कभी. इन्हें पुराने कागजों से छांटते वक़्त जिनके हाथ का मैं बना हुआ हूँ, उन्हीं राजेंद्र धोड़पकर की याद आती रही और इसीलिए यह पोस्ट उनको समर्पित है. इसके अलावा मसीहगढ़ और जामिया कॉलेज के उन टेलीफ़ोन बूथ वाले सदय भाइयों को भी जिनके सामने न जाने कितनी दफ़ा ऐसी बातचीत के दरम्यान जेब के पैसों से ज़्यादा वक़्त निकल जाता था और वे उधार भले बढ़ाते रहे थे, पर न तो कभी टोका न ही याद दिलाई.

स्पष्ट करना ज़रूरी है कि राजेन्द्र जी के यहां लिखे जाने वाले कॉलम का तक़ाज़ा था कि किसी एक किताब/फिल्म/जगह आदि पर ही बातचीत हो. लेकिन इसमें न तो मैं सफल होना चाहता था न जिनसे बातें होती थी वे एक पर टिकते थे. चंद्रकांत देवताले ने इसे यों कहा था : 'किसी एक का नाम लेने से अपने पूरेपन में पसंद ज़ाहिर नहीं हो पायेगी. ऐसा करना उड़ते परिंदे को एक दरख़्त के नीचे खड़ा करने जैसा होगा.' फिर भी यहां प्रायः सभी एक पर ही एकाग्र हैं, क्योंकि इसे छपना ऐसे ही था. साथ में दी गई पेंटिंग्स माइक स्टिलकी की है.}

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रामकुमार
[ पेंटर]
मुझे एपिक नॉवेल पढ़ने में विशेष रुचि रही है. 'वार एंड पीस' इसीलिए मेरी सबसे प्रिय पुस्तक है. इसे तीन दफ़ा पढ़ जाने के बावजूद दो-एक बार और पढ़ने की ख्वाहिश मेरे मन में अब भी है. इस क्रम में मैं टॉमस मान की औपन्यासिक कृति 'मैजिक माउंटेन' का भी ज़िक्र करना चाहूँगा. बहुत अरसा पहले पढ़ा था इसे और इसके प्रभाव में वर्षों तक रहा. मुझे एपिक नॉवेलों में भरे-पूरे जीवन का अद्भुत विस्तार भाता है. तथाकथित छोटे नॉवेलों में मैंने अक्सर जीवन कम, दर्शन ज़्यादा पाया है, जो मेरे मुताबिक फिक्शन का एक कमज़ोर पहलू है.

कुंवर नारायण

[कवि]
कुछ किताबों के साथ हम बड़े होते हैं और कुछ किताबें हमारी उम्र के साथ बड़ी होती हैं. 'महाभारत' दूसरी तरह की किताबों में से है और इसीलिए मुझे अत्यंत प्रिय है. उम्र के इस मोड़ पर भी मेरा-उसका साथ छूटा नहीं है. आज भी उसके प्रसंगों से मुझे नए अर्थ और अभिप्राय मिलते हैं. उसके चरित्र, घटनाएँ और उसमें गीता जैसी अनेकानेक पुस्तकों का समायोजन बड़े महत्व के हैं. लोग इस प्रक्षेप को दोष मानते हैं लेकिन मुझे यह महाभारत का सबसे बड़ा गुण मालूम पड़ता है. समूची भारतीय मानसिकता की झलक हमें महाभारत में ही मिलती है.

. रामचंद्रन

[पेंटर]
बहुत सारा रूसी साहित्य और उसमें भी विशेष रूप से दोस्तोवस्की, क्योंकि उनसे मुझे पेंटिंग के लिए ढेरों प्रेरणाएं मिलती रहीं, लेकिन सबसे ज़्यादा पसंद मुझे अपनी ही भाषा मलयालम के वैकम मोहम्मद बशीर प्रिय हैं. बशीर का लगभग सम्पूर्ण लेखन आत्मकथात्मक है. लेकिन उनकी आपबीती में जगबीती गुंथी हुई है. इतना सादा और आमफहम शब्दों में रचा-बसा यह जटिल जीवन मुझे दूसरों में नहीं मिलता.

चंद्रकांत देवताले
[कवि ]
मुक्तिबोध की कविता पुस्तक 'चाँद का मुह टेढ़ा है' और डायरी ( एक साहित्यिक की). कवि मुक्तिबोध से मैंने बहुत-कुछ सीखा है, इस नाते स्वाभाविक ही उनकी कविताओं से मेरा मर लम्बा और सघन जुड़ाव है. पर गद्य में भी जिस जीवन-विवेक को उन्होंने काव्य-विवेक में बदलने की बात की और साहित्य से अधिक उम्मीद बाँधने को मूर्खतापूर्ण कहा --यह सब मुझे बहुत प्रेरक और लिखे जाने के इतने बरस बाद भी प्रासंगिक लगता है.

एम. के. रैना
[रंगकर्मी ]
किसी एक किताब की सिफारिश मुझसे न की जाएगी. अपने शुरू के पढ़ाकू दिनों में कल्चरल कोलोनियलिज्म के बारे में पढ़ने का बड़ा चाव रहा. असल में मैं उस मानस को खारोलना-परोलना चाहता था जो दुनिया भर में अपना सांस्कृतिक उपनिवेश स्थापित करना चाहता था और ऐसा बहुत हद तक कर पाने में सफल भी रहा. मुझे यह दूसरे देश और उनके निवासियों के मानस पर गहरा आघात करने जैसा प्रतीत हुआ, जिसका पता ऊपरी तौर कई दशकों तक नहीं लगता. बाद में थियेटर करने के दरम्यान जिन लेखकों को मन से पढ़ा उनमें प्रेमचंद, मुक्तिबोध और रेणु का नाम लेना चाहूँगा.

उदय प्रकाश
[कवि-कथाकार]
मुझे ज़्यादातर आत्मकथाएं और जीवनियाँ पसंद हैं. मुझे फिल्मकार लुई बुनुएल की आत्मकथा 'मई लास्ट ब्रेथ' सबसे ज़्यादा पसंद है. बुनुएल अपने काम में बहुत प्रोफेशनल नहीं थे. बहुत ठहरकर और इत्मिनान से काम किया करते थे. 'आराम हराम है' की बड़ी खिल्ली उड़ाया करते थे और 'कर्मठता' को अमानवीयता के नजदीक लाकर सोचते थे. उनकी दृढ मान्यता थी कि मनुष्य स्वप्न देखने के लिए पैदा हुआ है, काम करते हुए मर-खप जाने के लिए नहीं. अपनी आत्मकथा में उन्होंने ऐसी अनेक रोचक और बहसतलब बातों का ज़िक्र किया है.

रघु राय

[फोटोग्राफर ]
इमानदारी से कहूँ तो मैं ज़्यादा पढ़ता नहीं हूँ. इतने बरस कैमरे की आंख से ज़िन्दगी की किताब के अलावा कुछ और दिलचस्पी से पढ़ नहीं पाया. लेकिन दलाईलामा पर पुस्तक तैयार करते हुए जब मैं उनकी किताब 'माई लैंड माई पीपल' पढ़ी तो गहरे उद्वेलित हुआ. इसमें उन्होंने बहुत सादगी और लगाव से तिब्बती लोगों का दुःख-दर्द बयाँ किया है. इसके ज़रिये मैं उनके संघर्ष को समग्रता में समझ सका.

राजी सेठ
[कथाकार ]
यूँ तो अपने पसंदीदा रिल्के को मैं बहुत अर्से से पढ़ रही थी, लेकिन जब मुझे उलरिच बेयर द्वारा रिल्के के साहित्य से विषयवार चुने हुए अंशों की सुसंपादित पुस्तक ' ए पोएट'स गाइड टू लाइफ : विजडम ऑफ़ रिल्के' पढ़ने का मौका मिला तो मुझे लगा मैं उस जैसे महान कवि-लेखक की दुनिया को नए सिरे से जान रही हूँ. यह किताब रिल्के को लेकर मेरी समझ बढ़ाने में बहुत मददगार रही. रिल्के जैसी प्रज्ञा का समय-समय पर साथ आपकी रचनात्मकता को स्फूर्ति प्रदान करता है.

मुशीरुल हसन
[ इतिहासकार]
निश्चय ही जवाहरलाल नेहरू की 'ऑटोबायोग्रफी' मुझे सबसे ज़्यादा पसंद है. कई वजह है इसकी. पहली तो यही कि मेरी एक इतिहासपुरुष के रूप में नेहरू में गहरी दिलचस्पी है. दूसरी यह कि नेहरू ने इसे जिस दौर में लिखा था वह हिंदुस्तान की आज़ादी की लड़ाई के बेहद अहम् साल थे. इस कारण इस किताब में दर्ज घटनाओं और ब्योरों का भी बहुत महत्व है. फिर नेहरू के नेहरू बनने की कथा तो यह है ही. उनके जितने जटिल 'इंटर पर्सनल रिलेशंस' रहे, वे चाहे गाँधी के साथ हों या पिता मोतीलाल और पत्नी कमला नेहरू के साथ, सबके सब इस ऑटोबायोग्रफी में बहुत संवेदनशीलता के साथ दर्ज किए गए हैं. मेरे ख़याल से इस पुस्तक महत्व इसीलिए साहित्य, इतिहास और राजनीति के लोगों के लिए एक सामान है.

अर्पिता सिंह
[ पेंटर ]
ओरहन पमुक का उपन्यास 'माई नेम इज रेड'. एक रोचक और अत्यंत पठनीय उपन्यास होने के अलावा यह मुझे चित्र-कला के नज़रिए से भी बहुत पसंद आया. जैसा नाम से पता चलता है, इसमें रंगों की भी एक सामानांतर कथा है. पमुक स्वयं एक विफल पेंटर रहे हैं. पर रंगों के साथ अपने अपनापे, उसके व्यवहार और भिन्न-भिन्न सन्दर्भों में उसके मायनों को उन्होंने कथा में इस खूबी के साथ गूंथ दिया है कि यह पठन अपूर्व बन जाता है.

विश्वनाथ त्रिपाठी
[ आलोचक ]
तुलसीदास की रामचरितमानस. कवि तो बहुत हुए पर गोस्वामी जी जैसा जीवन और उसके सौंदर्य का नानाविध चितेरा कोई और नहीं हुआ. यही वजह है कि वर्णाश्रम आदि विचारों से असहमति के बावजूद उनका काव्य मुझे खींचता है. तुलसी को लोक की बहुत गहरी समझ थी. अपनी कविता में उन्होंने इसे प्रतिष्ठित भी बहुत लगाव से किया है. उनकी तारीफ में चंद शब्द कम पड़ेंगे. फिराक के हवाले से कहूँ तो कविता का उत्तमांश तुलसी के पास है.

के. बिक्रम सिंह

[ फिल्म मेकर + लेखक ]
करीब सत्तर के दशक में पढ़ी हुई अरुण जोशी की किताब 'द स्ट्रेंज कॉल ऑफ़ विली विश्वास' मुझे नहीं भूलती. इसे दसियों दफ़ा पढ़ चुका हूँ और आज भी जब इच्छा होती है, शेल्फ से निकालकर इसके कुछ हिस्से पढ़ता हूँ. जिन कारणों से मुझे यह किताब अत्यंत प्रिय है उसमें एक तो यही है कि इसके माध्यम से मैं एक भिन्न अनुभव-क्षेत्र से, जिसे मैं मनुष्यों का आदि-अनुभव कहना चाहूँगा, अपना तादात्म्य स्थापित कर सका. संक्षेप में इस उपन्यास की कथा तो मुझसे कही नहीं जाएगी, क्योंकि ऐसा करना उसके जादू को, उसकी कलात्मकता को, नष्ट करना होगा. इसने मुझे अद्वितीय अनुभव, असीम कल्पना और कला के एक अत्यंत उर्वर प्रदेश की सैर कराई.
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Monday, November 29, 2010

अलक्षित : 1


मदन की उत्‍प्रेक्षा

आलोचना में ऐसा उद्यम विरल होता जा रहा है जब वह अपनी अंतरंगता में प्रखर और प्रखरता में ललित (निबंध नहीं !) हो जाए. जब वह कृति और कृतिवाह्य अर्थ सन्दर्भों में प्रवेश कर उसकी व्याख्या और पुनर्रचना का प्रयत्न साथ-साथ करे. जिसमें पारंपरिक प्रत्यय पुनराविष्कृत होकर नई अर्थाभा से चमक उठें और नए प्रत्ययों की प्रतिध्वनि सुनाई पड़े. जो अपने सामने महज ''एक कृति का आकलन करने से बढ़कर'' चुनौतियाँ स्वीकार करे और साहस किसी फैशन में नहीं जोखिम उठाने की गरज से करे. आलोचना का ऐसा विरल, गंभीर और दायित्वपूर्ण उद्यम मदन सोनी एक लम्बे अरसे से कर रहे हैं और इसका साक्ष्य उनकी चौथी आलोचना पुस्तक 'उत्प्रेक्षा' भी है. हालांकि इस पुस्तक की ओर भी हिंदी साहित्य के पुराने रस्मोरिवाज़ के तहत न बहुत ध्यान है न ध्यान दिलाने की चेष्टा. उसकी एक वजह संभवतः उसमें हिंदी के अन्यथा आदरणीय प्रेमचंद, अज्ञेय, विनोद कुमार शुक्ल के अलावा फ़क़त 'भोपाल स्कूल' के अशोक वाजपेयी, कृष्ण बलदेव वैद, रमेशचंद्र शाह, वागीश शुक्ल, गगन गिल की कृतियों के पाठ का शामिल होना भी हो. प्रेम कविता, स्त्री, कबीर वगैरह तो हैं ही, हिंदी बाहर रविन्द्रनाथ और हिंदी साहित्यिक हलकों के लिए अस्पृश्य 'एड्स' पर भी एक निबंध है. कहना कठिन नहीं कि मदन ने पुस्तक का नाम उत्प्रेक्षा क्यों रखा है. 'उत्प्रेक्षा' एक अलंकारिक पदावली है, जिसका अर्थ है किन्हीं दो भिन्न वस्तुओं में एकत्व की सम्भावना का निदर्शन. मदन इस परम्परित अर्थ को कुछ वसी करते हैं. वे इसमें ''उस समस्त कृतित्व को शामिल मानकर इस शब्द का उपयोग कर रहे हैं जिसे भाषा में रचा गया है और जहां से आत्यंतिक रूप से भिन्न वस्तुओं को उनकी भिन्नता के प्रति बेखबर न रहकर इस तरह बरता जाता है मानो वे एक हों''. मेरे ख़याल से यह बर्ताव अनूठा है. यह दरअसल हिंदी में मौजूद सोच की उस फांक पर एक करारी चोट भी है जिसके तहत प्रेमचंद के बारे में ही क्यों अज्ञेय/ मुक्तिबोध / शमशेर / नागार्जुन के बारे में एक खास काट (डिजाइन) में या तबका ही बात कर सकता है. मदन अपनी पहली पुस्तक 'कविता का व्योम और व्योम की कविता' में आलोचना के इस जागरूक विवेक से हमें परिचित करा चुके हैं. बाद की पुस्तकों में उसमें और प्रौढ़ता आई है. इस अवधि में उनसे असहमति भी बढ़ी है. किंतु उनकी आलोच-क्रिया में रचना (कार से भी ) एकत्व स्थापित करने का सयाना विवेक हमेशा असहमति को साथ रखकर उन्हें पढ़ने के लिए न्योतता रहा है. इसी एक बिंदु पर मुझे लगता है कि गुंजाइश, लोच, सहिष्णुता की दरकार अब दुतरफा है.जैसे यहां तक आते आते मुझे अपनी यह असहमति ज़ाहिर करनी चाहिए कि मदन के विवेचन में 'स्फीति' बहुत है. जिसे कुंवर नारायण बेहतर शब्दों में 'कवि-दृष्टि का अभाव' कहते हैं, वह है और उनको नजदीक से फ़ॉलो करने वाले शायद इस बात की भी ताईद करें कि यह अब उनका लाइलाज आलोचकीय आचरण बन चुका है.दूसरी बात यह कि बाहर के जिन विद्वानों के सन्दर्भ अब दिए जाते हैं, आलोचना में रूचि रखनेवाले विज्ञ पाठक को उनके बारे में अब इंटरनेट या पुस्तकों की आसन पावती की वजह से कुछ पहले से भी पता रहता है. इसलिए वे सन्दर्भ क्षिप्रतर हों तो क्या ही अच्छा.

(यह टिप्पणी कॉलेज के दिनों में अशोक वाजपेयी से संयोगवश हुई मुलाकात के बाद 'उत्प्रेक्षा 'की उनकी प्रति मांग लेने के अपने युवकोचित उत्साह और अशोक जी द्वारा बिना किसी संकोच के इसे मेरे हाथ में रख देने की अच्छी याद के नाम।)

चित्राक्रिती : सल्‍वादोर दाली

Friday, November 19, 2010

कथा : २ : हिमांशु पंड्या की कहानी



Image : Rajesh R. Nair
पञ्च परमेश्वर : भाग दो

एक समय की बात है .एक गाँव था ,गाँव का नाम था खारिया खंगार .गाँव में एक मनुष्य रहता था जिसका नाम था हू. हू के पास एक बकरी थी .बकरी क्या थी ,पूरे गाँव की शान थी .सालाना बकरी मेले में उसे पुरस्कार भी मिला था .हू को वह बकरी बहुत अजीज़ थी .सुनहरा पीला रंग,पुष्ट शरीर,उसके कान के रोयें सुनहरी आभा बिखेरते थे और जब वह इठलाकर बोलती ,"म्है है है... "तो लगता मानो किसी प्रेमिका ने आवाज़ लगाई हो .

....पर एक बात थी .उस बकरी के खुर टेढ़े थे .सामान्य बकरियों से थोड़े अलग (गो कि इससे उसकी चाल बाधित नहीं हुई थी बल्कि उसमें चार चाँद लग गए थे). गाँव के कुछ लोगों को वह बकरी अपशकुन लगती थी .उन्हें लगता था कि इसका मूल कारण यह था कि उस बकरी की नस्ल में कुछ संकरता थी.वे उसे गाँव के लिए श्राप मानते थे और गाँव पर यदा कदा आयी आपदाओं के लिए उसे जिम्मेदार मानते थे .

धीरे धीरे इन लोगों का विरोध बढ़ता गया और यहाँ तक पहुचा कि उस बकरी की मौत ही गाँव की भलाई का एकमात्र हल थी .इन्हीं लोगों द्वारा दावा किया गया कि दरअसल उस बकरी पर असली हक क्वै का था क्योंकि बकरी के परदादा दरअसल क्वै के परदादा के बकरे थे .इसे जांचने का कोई ठोस आधार नहीं था क्योंकि हू की बकरी की परदादी के जमाने में गाँव में कई बकरे थे और अब पितृत्व की पहचान करना असंभव था .

क्वै और उसके साथियों ने आसपास के चालीस गावों में मुनादी करवाई कि यदि हू अपनी बकरी उसे नहीं सौपंता तो वे इकठ्ठे होकर उसकी बलि का अनुष्ठान करेंगे .गाँव नए सिरे से बसा ,उसके बाद से बलि प्रथा गैरकानूनी थी और वैसे भी बकरी हू की थी सो वो निश्चिन्त था कि गाँव मिलकर इस बलि को नहीं होने देगा .

...बलि हुई .खूब तंत्र मंत्र अनुष्ठान हुए .बड़े बड़े तांत्रिक ओझा आये जिन्होंने बकरी के वध के ऐतिहासिक महत्त्व को बताया और बताया कि आज एक ऐतिहासिक गलती सुधार ली गयी है .खुद बकरी को भी पता नहीं था कि वह पूरे गाँव की शान्ति और सद्भाव के लिए इतना बड़ा खतरा थी .जब उसे वधस्थल पर खडा कर उसके साथ जुड़े श्राप की महागाथा सुनाई गयी तो जवाब में बकरी ने एक ही बात कही -"म्है है है... "

असली लड़ाई बकरी की मौत के बाद शुरू हुई .अनुष्ठान समिति अपने यज्ञस्थल पर इस यज्ञ और पौरोहित्य की गाथा वाला एक स्मारक चाहती थी जबकि हू की चाह थी कि यहाँ उसकी प्यारी बकरी की याद में एक स्मारक बने .
इसके बाद की कहानी दंतकथाओं के इतिहास में बदल जाने की कहानी है .पंचायत ने फैसला दिया कि यह बकरी क्वै की ही थी क्योंकि गाँव के सब लोग मानते थे कि हू की बकरी के परदादा क्वै के बकरे थे .पंचायत के फैसले में बलि का कोई ज़िक्र नहीं था और पंचायत का यह दावा कि -सारा गाँव यह मानता है -भी खासा संदेहास्पद था .एक और समय पर, एक और मसले में जब यह कहा गया था कि पूरा गाँव ऐसा मानता है तो उस गाँव के एक पुराने शायर पाश ने कहा था कि मेरा नाम उसमें से अभी खारिज कर दो .

हू का बेटा ध्री इससे खासा बेचैन था .उसे बिलकुल भी समझ नहीं आ रहा था कि सारे गाँव के कहने से उसकी बकरी की बलि जायज़ कैसे हो गयी जबकि गाँव में बलि गैरकानूनी थी ! गाँव खामोश था .एक आम राय थी कि जो हुआ सो हुआ ,कम से कम अब तो शान्ति है ,आखिर वधस्थल के कोने में हू को भी छोटी सी जगह दे ही दी गयी थी .सबसे बड़ी बात जो हर हलके से कही जा रही थी -आखिर वो एक बकरी ही तो थी !

ध्री के लिए वह सिर्फ बकरी नहीं थी .उस बकरी की उम्र ध्री के बराबर ही थी , वह उस बकरी के साथ खेलकर ही बड़ा हुआ था .उसे बकरी के साथ की सारी किलकारियां ,अठखेलियाँ याद थीं और उससे भी ज्यादा उसे उसका क़त्ल याद था .वह पंचायत से चीखचीख कर कहना चाहता था कि अब जब जब उसे अपनी बकरी याद आयेगी उसका क़त्ल भी याद आयेगा और आज शायद पंचायत उसके हत्यारों को सजा देकर उस क़त्ल की कड़वी यादों से उबरने का उसे मौका दे सकती थी लेकिन उसके क़त्ल पर चुप्पी साध लेने से अब वह क़त्ल उसके जेहन में अमिट रूप से अंकित हो गया था . ध्री चीख चीख कर कहना चाहता था कि बकरी का क़त्ल तब नहीं हुआ था बल्कि अब पंचायत ने उसका क़त्ल कर दिया था पर उसकी बात समझने वाला कोई नहीं था .आखिर वह एक बकरी ही तो थी ,पूरे गाँव की शान्ति और सद्भाव से बढ़कर तो न थी .

ध्री लगातार इधर उधर भटकता रहता .उसे लगता कि आज तक जिन बातों पर उसका ध्यान नहीं गया था वहां भी बहुमत सच और झूठ का फैसला कर रहा था .गाँव के बाहर ३७० गज दूर लो के ऊपर पूरे गाँव के कपडे धोने की जिम्मेदारी डाल दी गयी थी क्योंकि नदी का वो कोना सबसे साफ़ था .कुछ ताकतवर लोग नदी को रोक कर गाँव के गरीबों को पानी से महरूम कर रहे थे और गाँव की पंचायत ने उनकी गुहार अनसुनी कर दी थी . गाँव के बाएं कोने में सात बहनें जमींदार और उसके गुंडों के बलात्कार का शिकार हो रही थीं .गाँव कुछ तो जानकारी के अभाव में और कुछ सहमकर चुप था पर अब तो गाँव की पंचायत ने भी मुहर लगा दी थी कि कि लोगों के मानने से ही तय होगा कि क्या सही है और क्या गलत .कौन थे ये लोग और किसकी थी ये पंचायत ? ध्री को लगता कि गाँव की खाप पंचायत की यह बात भी अब मान लेनी होगी कि कोई अपनी मर्जी से न प्रेम कर सकता है न शादी . तांत्रिक और ओझा गाँव के भाग्य निर्धारक हो गए थे .

एक अंधेरी शाम ध्री ने गाँव को छोड़ देने का फैसला किया .हू के रोकने का उसपर कोई असर नहीं पडा .असल में हू के अलावा उसे रोकने वाला कोई था भी नहीं .जो कुछ लोग उसे रोकना चाहते थे उनके पास उसे रोकने की कोई ठोस वजह नहीं बची थी .उनके पास ध्री के सवालों के जवाब नहीं थे .

दरअसल खारिया खंगार अब वह खारिया खंगार बचा भी नहीं था .जब पञ्च अलगू चौधरी और जुम्मन शेख होते थे तब उस गाँव की फिजा और ही थी , आज की पंचायत में वैसे पञ्च नहीं थे .वे लोग जो ध्री के सवालों के जवाब नहीं दे पाए उन्होंने जवाब अब कहीं और तलाशने शुरू कर दिए थे .गाँव में इसके निशाँ दिखने लगे थे .गाँव के बाहरी कोने पर लगा एक पोस्टर इसकी गवाही देता था .पोस्टर पर लिखा था ," pity the nation that needs to jail those who ask for justice ,while communal killers, mass murderers, corporate scamsters, looters,rapists, and those who prey on the poorest of the poor , roam free ."

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(१२-१३ नवम्बर,२०१० को उदयपुर में मीरा कन्या महाविद्यालय और सुखाडिया विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग के संयुक्त तत्वावधान में एक सेमीनार हुआ था -'विज्ञान,समाज और स्वतंत्रता '। इसमें पर्चे के रूप में यह कहानी पढी गई थी । पर्चा प्रज्ञा जोशी और हिमांशु द्वारा संयुक्त रूप से पढ़ा गया था । अलबत्ता , इसे हिमांशु की पहली प्रकाशित कहानी मानने में कोई हर्ज़ नहीं। इस स्तंभ में पहले आप उदयन वाजपेयी की कथा-कृति पढ़ चुके हैं। ऊपर का चित्र यहां से। )

Monday, November 01, 2010

निगाह से जन्म लेते हैं दृश्य



{ आगे व्योमेश शुक्ल की नई कविताएं दी जा रही हैं. इनमें से अंतिम चार को कवि के शब्दों में उनकी असमाप्य कविता 'मैं रहा तो था' के हिस्से की तरह पढ़ा जाना चाहिए. सूचनार्थ यह भी निवेदित है कि इस कविता का प्रथम प्रकाशन सबद पर हुआ था और दूसरी बार जब यह आशुतोष भारद्वाज द्वारा संपादित 'कथादेश' के 'कल्प कल्प का गल्प' शीर्षक विशेषांक में छपी तो उसमें तीन नए हिस्से जोड़े गए. आखिरी तीन हिस्से वही हैं. 'अलावा' शीर्षक से छपा हिस्सा पहली दफ़ा छप रहा है.

निजी बनाम पोलिटिकल / कला बनाम कमिटमेंट / क्राफ्ट बनाम कंटेंट का आनुपातिक अनुमान लगा कर कविता लिखने और जांचने वाली बुद्धि के लिए हिंदी के नए कवि ऐसी ही कविताओं से दिक्कत पेश कर सकते थे. व्योमेश उस बहुत छोटी सी जमात से हैं, जिन्होंने ऐसा सफलतापूर्वक किया है. व्योमेश के यहां यह करना कुछ अधिक दीप्त इसलिए है, क्योंकि उन्होंने लगभग असंभव, बेसंभाल और किसी सुविधा / शब्दाभाव / जल्दबाजी में जिसे हम 'आवां-गर्द' कहते हैं, उसे अप
नी कविता में एक सतत, सजग और संयंत जैविक और बौद्धिक अन्तर्क्रिया से पाया है. उनकी कविता इसलिए प्रथम दृष्टया अभिव्यक्ति के खतरे उठाने से ज़्यादा बड़ी आकांक्षा से लिखी हुई कविता जान पड़ती है.


चित्र-कृति मधुमिता दास के कैमरे से.}



कुछ का कुछ

ग्लेशियर बाद में गलते हैं
और हिमालय प्रेस नाम का हिंदी छापाख़ाना पहले बंद हो जाता है
पंचम राम समेत बारह कम्पोज़ीटर और प्रूफ रीडर अकालनिवृत्त हो जाते हैं
यों, बग़ैर कलफ़ के साफ़ धोती-कुरता पहनने वाली एक दर्जन साइकिल नागारिकताएं किसान बना दी जाती हैं मज़दूर बना दी जाती हैं और कुछ के बारे में पता नहीं है कि वे क्या बना दी जाती हैं

नागरिकता जैसियों को ज़रूर कुछ का कुछ बना दिया जाता है

आइन्दा वे कुछ और बना दी जायेंगी
सत्तर के शहर को तेल लेने भेज दिया जाएगा

मेले में मूँगफली बेचने लगता है लेटरप्रेस में सही वाक्य संभव करने वाला आविष्कारक वैज्ञानिक कम्प्यूटर नहीं सीख पाता
अश्लील भोजपुरी में गर्क़ होने को है भाषा की शख्सियत
यहीं टूटने थे खड़ी बोली के गुम्बद
यहीं बक सकता था गाली दारोग़ा - माँ की, बहन की, दुनिया के सभी भाइयों और बेटों और प्रेमियों को
यहीं बनना था आस्था को सबसे बड़ा तर्क
यहीं तय होने थे हिन्दू-मुसलमान, आदमी-औरत, ज़्यादा आदमी और कम औरत, काव्यात्मक-अकाव्यात्मक के फ़र्क़

और जब सब तय हो ही गया है तो दारोग़ा का नाम भी बता दिया जाना चाहिए क्योंकि इतने नुक़सान के बाद एक नाम आख़िर किसी चीज़ का और कितना नुक़सान कर सकता है

तो दोस्तो,
दारोग़ा का नाम है
विभूति नारायण राय

****
कार्य-कारण


शायद किसू के दिल को लगी उस गली में चोट
मेरी बग़ल में शीशा ए दिल चूर हो गया

पन्त जी की कविता चींटी पढ़ाने के कुछ मिनट बाद

दिखती है चीटियों की कतार एक लड़की की आँख में - पहली चमक-सी चमक पैदा करती हुई
यह कविता का समझा जाना हो सकता है
या एक अन्य कविता की शुरूआत
यह ख़ात्मा हो सकता है कविता का
या ख़ात्मे का ख़ात्मा

लोग कहते कुछ

और करते कुछ हैं
और जब यह बात कार्य-कारण-संबंध की तरह नियम बन गई है,
कुछ लोग जो कहते हैं
वही कर देते हैं

मैं उसकी ओर देखता हूँ तो वह भी देखती है मेरी ओर

मैं इस संसार की सर्वाधिक निर्जीव और जड़ चीज़ों की ओर देखता हूँ - लोहे की पाइप, कटे हुए बाल, गाड़ी की स्टीयरिंग, धम्मेख स्तूप और आनंद के तलवे की तरफ़, तो न सिर्फ़ ये चीज़ें भी मुझे देखती हैं,
वह भी घूरने लगती है मुझे

लिखता है कवि अपने छन्द में

और मुझ तक पहुँचता है वह गद्य के सबसे रुक्ष उदाहरण की तरह

जो बातचीत बहुत बहक कर की जानी थी

वह कमबख्त वस्तुनिष्ठ हो जाती है फ़ोन पर
और यह नीच ट्रैजिडी भी जुड जाती है दोस्ती के गड़बड़-सड़बड़ हिसाब-किताब में

बिल्ली रास्ता काट जाया करती है
प्यारी-प्यारी औरतें हरदम बकबक करती रहती हैं
चांदनी रात को मैदान में खुले मवेशी
आकर चरते रहते हैं

और प्रभु यह तुम्हारी दया नहीं तो और क्या है
कि इनमें आपस में कोई संबंध नहीं


( अंतिम 6 वाक्य रघुवीर सहाय की एक मशहूर कविता से ले लिये गये हैं. कवि हमेशा की तरह उनका कृतज्ञ )
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जैसे वैसे

जैसे फ़ोन पर किसी को पता नोट करा रहे हों और अंग्रेज़ी के 'V' से कोई शब्द शुरू करना हो
जैसे 'Varanasi' से शुरू करना हो
जैसे बहुत बोल-बोल कर नोट कराना हो अपना पक्ष, कि घटना ऐसे नहीं वैसे हुई थी
और जो नहीं हुआ वह होकर रहेगा

वैसा

धूल से साँवला घुटना
हवा के निर्भार में एक अप्रतिम 'V' बनाता हुआ
किसी बेहद क़िस्म के मूल की परछाई
और मूल भी इसी परछाई से पैदा हुए होंगे

मूल परछाइयों से ही जन्म लेते हैं
निगाह से जन्म लेते हैं दृश्य
सपने में पानी बरसता है तो लगता है नींद में बरस रहा है
और सुबह कोई किसी से पूछता है...

'कल पानी बरसा था ?'
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दृष्टान्त

1. मरने से काफ़ी पहले किसी ने देख लिया होगा वह पेड़ जिसकी लकड़ियों से बनेगी उसकी चिता 2. आगे की सड़कों पर लगने वाले ट्रैफ़िक जाम कुछ लोगों को पहले ही मालूम हो जाते हैं 3. नितांत चालू हिंदी फ़िल्मों में आए दुख में कई बार बिल्कुल अपने-अपने आँसू देखे हैं ज़िन्दगी की हेरोइनों ने.

इन लचर दृष्टान्तों के आधार पर कम से कम कविता में कहा जा सकता है कि उसने तुम्हें देख लिया होगा तुम्हें देखने से पहले,
जैसे एक बार तुम्हें देख लिया था तुम्हें देखने के बाद

दरअसल इस सारे फ़साने में पहले और बाद का कोई चक्कर ही नहीं है, कहाँ से पहले और कहाँ के बाद ?
कभी लगता है कि सारी गाड़ियां पहले ही छूट चुकी हैं
और कभी यह कि अपना वक़्त अभी आया ही नहीं

इसलिए अगर कोई ऐसी किसी भाषा में कुछ सोचने या लिखने लगे जिसमें 'अतीत' और 'आगामी' जैसे शब्द एक ही अर्थ देते हों तो ज़्यादा दिक़्क़त में पड़ने की ज़रूरत नहीं है, ज़्यादा से ज़्यादा यही न होगा कि 'आगामी' का झंझट करते हुए वह 'व्यतीत' को भी साँसत में डाल देगा, तो डाल दे, हमें इससे क्या लेना-लादना? वह अपने रास्ते हम अपने रास्ते. उसके वाक्यों में तो क़दम-क़दम पर इतने संशय कि वह अगर लिख रहा हो तो उसके ही मुहावरे में 'वह कुछ और कर रहा है.'
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अलावा

उसमें देखने के अलावा भी था. उसमें मुस्कराहट के अलावा भी था. उसमें न देखने और न मुस्कराने के अलावा भी था. उसमें उसके अलावा भी था. उसमें है के अलावा भी था.
उसमें एक घड़ा था, साफ़ पानी से नहीं पेयजल से भरा हुआ.
तत्सम की बाधाएं थी और बाधाओं के अलावा भी था. हम तद्भव की तरह छलक जाते थे.
उसमें मरण था और मरण के अलावा. अथ और इति के अलावा. उसमें मेरी बेटी रहती थी. मैं रहता था उसमें, एक बेटी का बाप. एक बेटी का बाप होने अलावा भी मैं उसमें था. मेरा बाप था उसमें सनातन सेकुलर कांग्रेसी. उसमें एक खूंटा था नरेंद्र मोदी की गांड में डालने के लिये.


खूंटे पर, घड़े पर, किताब पर, आँखों पर मेरी, मेरे काले हाथों पर, लकड़ी पर, नींद पर, रुमाल पर, गणेश जी की तोंद पर तुम्हारा स्पर्श.

उस स्पर्श में स्पर्श के अलावा भी था.
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कि पानी से आग ?

भींगती हुई बरसात
भींगता हुआ शिशिर
इसके पहले ग्रीष्म भी भींगा था

भींगती हुई सड़क - जो उसकी भी मातृभूमि है

रात भींगी सुबह भींगी
पप्पा की गोदी में
बच्ची कुछ कम भींगी
भींगता हुआ शव चिता भींगती हुई
इस ख़याल का भींगना कि पानी से आग बुझ जाती है
भींगने का इंतज़ार करते हुए गुप्ता जी

चराचर

ये सब तुम्हें भींगता न देख पाने के दृश्य हो सकते थे
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होना था

गर्मी में पिता होना था कि तुम्हें लू न लग जाये. ( उफ़.... तुम्हारे बाप का पीसीओ....)
बहुत ज़्यादा गर्मी में पानी के बरसने का पर्व होना था कि तुम भींग सको देवी-देवता के विग्रहों की तरह और जब भींगते-भींगते बुखार हो जाये या नाक बहने लगे तो एक धवल रुमाल या एक झोलाछाप डॉक्टर होना था.
रक्षाबंधन के दिन भाई होना था तुम्हारा, लाख भाइयों के बराबर.
भले ही माफिया डान को देना पड़े, अट्ठारह की उम्र में बीजेपी के ख़िलाफ़ तुम्हारा पहला वोट होना था.
अपना वोट बीजेपी को नहीं देंगे की वरीयता होना था. कुछ-कुछ विनोद कुमार शुक्ल होना था. कुछ तुम्हारा कुछ अपना कुछ विनोद जी का आदिवास होना था.

जो होना था वह होना था.
जो नहीं होना था वह होना था.
था होना था, है होना था.

'सब कुछ' होना था.
'होना' होना था.
'बचा रहेगा' होना था.

तुम्हारी और अपनी, यानी विनोद जी की कविता किताब होना था.
उनकी आगामी कविताओं में निहित दंडकारण्य का कोलाहल होना था. उस कोलाहल का मौन होना था. उस मौन को तुम्हारी आवाज़ होना था.
कभी-कभी मुझे बोलना था तुम्हारे मुँह से. तुम्हारा वाक्यविन्यास होना था. ऐन इसी सोहराबुद्दीनी मुहूर्त में गुजरात का कांग्रेसी राज्यपाल होना था. रोज़-रोज़ मोदी के ख़िलाफ़ कानूनी तरीक़े से लिखा गया बहुत सुंदर राजकीय निबंध होना था. एक अभिनव केंद्र-राज्य संबंध होना था.

तुम्हें नीरू होना था मुझे नीमा होना था.
एक कबीर होना था एक मीर होना था.
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मौसम के ख़िलाफ़ अच्छी सेहत भी चाहिए

जब बिजली का खंबा या गिर रहे पेड़ों में से कोई एक गिरेगा सर पर और बेहोश होने से कुछ पहले मैं साँसों में कहूँगा की विवेकानंद या दयानंद मेडिकल स्टोर ले चलो तो वह ऐसा पहला अंतिम आदमी होगा जो यक़ीन करेगा कि ये मुहावरे नहीं दवा की दुकानों के नाम हैं.

मरने से बचने के लिये अस्पताल की बजाय दवा की दुकान जाने का क्या मतलब हो सकता है तो इसका मतलब हो सकता है की दुकान अस्पताल की बग़ल में भी तो हो सकती है. मैं दवा का दुकानदार हो सकता हूँ मेरा बेटा नाजायज़ कंपाउंडर हो सकता है.

और एक बच्ची दिखी थी मोटरसाइकिल पर बैठी माँ की गोद में. देर तक देखती थी मुड़ने के बाद भी देखती थी.

जूते की दुकान पर एक जोड़ी जूता दिखा था, अपने होने में मेरी प्रेमिका के मामा के जूते जैसा, देर तक देखता था मुड़ने के बाद भी देखता था.

और वह दिखी थी. बिल्कुल उस जैसी दिखती थी. बस थोड़ा ज़्यादा हँसती थी. वह हँसी बहुत कुछ कहती थी. देर तक देखती थी मुड़ने के बाद भी.

और देवेन्द्र द्विवेदी दिखे थे अपनी अकाल मौत के बाद. और यह ख़याल कि गुजरात का राज्यपाल बनने के बाद शपथग्रहण से पहले ही उन्हें नहीं रहना था.

और यह ख़याल कि उन्हें मरना था तो गुजरात का राज्यपाल बनते ही क्यों मरना था. और यह ख़याल कि गुजरात का राज्यपाल बनाने के लिए सबकुछ के साथ अच्छी सेहत भी चाहिए. यह ख़याल देर तक देखता था मुड़ने के बाद भी देखता था.
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