Monday, August 31, 2009

अनकहा कुछ : ४ : गाब्रीएल गार्सीया मारकेज़

( प्रभात रंजन अपने स्तम्भ ''अनकहा कुछ'' में इस दफा मशहूर लैटिन अमेरिकी लेखक गाब्रीएल गार्सीया मारकेज़ के बारे में लिख रहे हैं। आधार मारकेज़ की उस हालिया लिखी जीवनी को बनाया है जिसकी बड़ी चर्चा हो रही है। )

मिथक मारकेज़ के चारों ओर

प्रभात रंजन

जीवन वह नहीं होता जो कोई जीता है, बल्कि वह होता है जिसे कोई याद रखता है और दोबारा याद करते हुए जिस क्रम से उसे वह याद करता है -ये पंक्तियां बेहद लोकप्रिय और चर्चित लेखक गाब्रीएल गार्सीया मारकेज़ ने अपनी आत्मकथा लिविंग टु टेल द टेल के आरंभ में लिखी हैं। शायद एक जीवनीकार यही काम करता है। जिसका जीवन उसके जिम्मे होता है, वह उसे शब्दों से इस तरह गढ़ता है कि वह यादगार बन जाए। गेराल्ड मार्टिन द्वारा लिखित मारकेज़ की आधिकारिक बताई जा रही जीवनी गाब्रीएल गार्सीया मारकेज़ : ए लाईफ को पढ़ते हुए भी यह बात कही जा सकती है। 642 पृष्ठों की इस किताब में मार्टिन ने लगभग मिथक में बदल चुके लेखक मारकेज़ की जीवन-कथा उन्हीं सूत्रों के सहारे गढ़ने की कोशिश की है जिसके संकेत मारकेज़ के साहित्य, भेंटवार्ताओं इत्यादि मिलते रहे हैं।

मारकेज़
न केवल ऊँचे दर्जे के लेखक हैं बल्कि उनकी शख्सियत भी बहुत बड़ी है। ऐसे व्यक्तित्व की जीवनी लिखना चुनौतीपूर्ण होता है। मारकेज़ ने स्वयं अपने बारे में लिखा है कि मेरा शुरुआती जीवन कठिन लेकिन जादुई था और बाद का जीवन सार्वजनिक और रहस्यमयी। वास्तव में, मारकेज़ का जीवन बहुआयामी रहा है - न केवल लेखक के रूप में बल्कि एक सार्वजनिक व्यक्तित्व और पत्रकार के रूप में भी। वे एक ऐसे लोकप्रिय लेखक हैं जिन्हें पाठकों का अपार प्यार मिला तो विवादों से भी नाता बना रहा। मारकेज़ को पहला ग्लोबल लेखक मानने वाले गेराल्ड मार्टिन ने न केवल इस लिविंग लीजेंड की जीवनी लिखने की चुनौती को स्वीकार की है, वरन् पर्याप्त मेहनत से, अनेक स्त्रोतों के आधार पर उसे पन्नों पर उतारा भी है।

जादुई
यथार्थवाद की शैली को लोकप्रिय बनाने वाले इस लेखक की जीवनी को लिखने के दौरान मार्टिन ने करीब सत्रह सालों तक मार्केस के जीवन और साहित्य को लेकर शोध किया। प्रश्न उठता है कि जब मारकेज़ ने कुछ ही समय पहले अपनी आत्मकथा लिखी है तो फिर आखिर उनकी यह जीवनी क्यों? वह भी उनके जीते जी? इसका एक संतोषजनक जवाब यह हो सकता है कि मारकेज़ ने अपनी आत्मकथा लिविंग टु टेल द टेल में अपने जीवन के आरंभिक वर्षों के बारे में लिखा है। उन के वर्षों बारे में जब उनके अनेक सपनों में एक सपना लेखक बनने का भी था। जब मारकेज़ लेखक बनने का निश्चय करते हैं तब आत्मकथा समाप्त हो जाती है। आत्मकथा में मारकेज़ ने लेखक बनने के सपने और अपने आरंभिक संघर्षों के बारे में विस्तार से लिखा है। जीवनी में गेराल्ड मार्टिन ने नोबेल पुरस्कार विजेता इस लेखक के लेखकीय जीवन को फोकस में रखा है। इसमें एक साधारण व्यक्ति के असाधारण लेखक बनने की कहानी है।

1927
में कोलंबिया के एक छोटे से कस्बे अराकाटक में जन्मे इस विश्वप्रसिद्ध लेखक का सबसे बड़ा लेखकीय ऑब्‍सेशन नाना के घर में बिताए गए बचपन के वर्ष रहे हैं जिनके बारे में पहले भी काफी कुछ लिखा जा चुका है और जिसे वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सॉलिट्यूड में मकोन्दो कस्बे के रूप में उन्होंने अमर बना दिया। नाना की विशाल हवेली से लेखक का ऐसा लगाव था कि अपनी आत्मकथा का आरंभ उन्होंने उस घटना से किया है जब उनकी माँ उन्हें बताती हैं कि नाना की उस हवेली को बेचना है और इसके लिए मारकेज़ बरसों बाद नाना के उस घर को दोबारा देखने जाते हैं जिससे उनके बचपन की यादें बावस्ता थीं। जीवनीकार के अनुसार वास्तव में उसी यात्रा के दौरान उस घर को देखते हुए उनके मन में कुछ बहुत बड़ा लिखने का विचार आया, जो बहुत बाद में वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सॉलिट्यूड नामक उपन्यास की शक्ल में ढला।

जीवनी
में मार्टिन ने लेखन के आरंभिक वर्षों में मारकेज़ के पेरिस में बेरोजगारी और भयानक गरीबी में बिताए गए दिनों की कथा भी कही है। एक स्थान पर मार्टिन ने लिखा है कि एक बार पेरिस में कई दिनों की भूख से हारकर उन्होंने अपने एक दोस्त की कचरापेटी से कचरा निकाला और उसमें जो कुछ भी खाने लायक बचा था उसे उसी समय और वहीं खा लिया। उन दिनों का एक प्रसंग यह है कि गरीबी के कारण वे करीब एक साल तक एक वेश्यालय की बरसाती में कम किराए पर रहे। प्रसंगवश, वेश्याओं का जीवन भी मारकेज़ के लेखन का एक बहुत बड़ा ऑब्‍सेशन रहा है। अपनी आत्मकथा में भी उन्होंने वेश्याओं के बारे में लिखा है। बाद में उन्होंने उनके जीवन को आधार बनाकर संपूर्ण उपन्यास ही लिखा - मेमोरीज ऑफ़ माई मेलांकली होर्स। इसी तरह, पेरिस के दिनों की उनकी प्रेमिका के बारे में भी जीवनीकार ने लिखा है और आजीविका के लिए उनके द्वारा किए गए अनेक कामों के बारे में भी।

1958
में मारकेज़ की शादी मर्सिडीज नामक उसी युवती से हुई जिससे उनको जब प्यार हुआ तो उसकी उम्र महज 9 साल थी। प्रसंगवश, जीवनी लिखने के दौरान मार्टिन ने मारकेज़ की पत्नी से भी बातचीत की है और उनके दो बेटों से भी, जिनमें से एक रोड्रिगो गार्सिया भी हैं जो हॉलिवुड में फिल्मों का लेखन और निर्देशन करते हैं। कुल मिलाकर, पुस्तक में मारकेज़ के जीवन के निजी प्रसंग तो हैं लेकिन उनको लेखक ने उसी सीमा तक स्थान दिया है जहां तक उनके ऊपर निजता में हस्तक्षेप का आरोप नहीं लगे। मारकेज़ के रहस्यमयी जीवन के बारे में पुस्तक में संकेत भर है। वास्तव में, पुस्तक का उद्देश्य मेकिंग ऑफ़ मारकेज़ के रहस्यों का अनावरण अधिक है इसलिए निजी प्रसंगों का वर्णन करते हुए जीवनीकार की दृष्टि लेखक के प्रति अधिक सहानुभूतिपूर्ण है।

मार्टिन ने अपनी पुस्तक में यह दिखाया है कि असल में मारकेज़ ने अपने लंबे जीवनकाल में एक तरह से दो जीवन जिए हैं - एक जीवन वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ़ सॉलिट्यूड के प्रकाशन से पहले का है और दूसरा उस उपन्यास के प्रकाशन के बाद का।1967 में प्रकाशित इस उपन्यास ने उस को बनाया जिसे आज दुनिया भर के पाठक जादुई यथार्थवाद के जादुई चितेरे के रूप में जानते हैं। इस उपन्यास के प्रकाशन के समय उनकी उम्र 40 साल थी। जीवनीकार ने इसका दिलचस्प बयान अपनी पुस्तक में किया है कि किस तरह इस युगांतकारी समझे गए उपन्यास का आइडिया उनके दिमाग में कौंधा। 1965 में एक दिन वे गाड़ी से मेक्सिको सिटी से कहीं और जा रहे थे। अचानक उनके दिमाग में कुछ कौंधा, गाड़ी मोड़कर वे वापस घर आए और 18 महीने तक खुद को कमरे में बंद कर लिया। 18 महीने के बाद जब वे बाहर आए तो उनके हाथ में उस उपन्यास की पांडुलिपि थी जिसने उनको 1982 में नोबेल पुरस्कार दिलवाया और उनकी पत्नी के हाथों में 18 महीने के भुगतान न किए गए तरह-तरह के बिल।

जिस
तरह के अविश्वसनीय यथार्थ के किस्से मारकेज़ ने लिखे हैं उसी तरह के अनेक किस्से उनको लेकर भी प्रचलित हैं, जिनमें से कुछ का जीवनीकार ने विश्लेषण भी किया है। बहरहाल, अपनी प्रसिद्धि को लेकर मारकेज़ अक्सर मजाक करते रहते हैं। उन्होंने कई बार मजाक में कहा है कि वे इस बात से वाकिफ थे कि उनको प्रसिद्ध होना है। कहते हैं कि अपनी पत्नी को उन्होंने शादी के समय ही बता दिया था कि जब उनकी उम्र चालीस साल की होगी तब वे एक मास्टरपीस लिखेंगे। एक बार अपनी एक बातचीत में उन्होंने कहा था कि जब वे पैदा हुए उस समय भी प्रसिद्ध थे, यह अलग बात है कि उस समय इस बात को केवल वे ही जानते थे। हालांकि मारकेज़ ऐसे लेखक नहीं हैं जिनके लेखन का मात्र इस एक उपन्यास के आधार पर आकलन किया जाए। आलोचकों ने उनके अन्य उपन्यासों लव इन द टाईम ऑफ़ कॉलरा, ऑटम ऑफ़ द पैट्रिआर्क को भी विश्वस्तरीय माना है।
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यह जो हरा है

तुषार धवल की कविता कई मायनों में ''शद्ध कविता'' है। इन कविताओं में कवि की अन्तः प्रेरणा दूषित प्रभावों की तुलना में प्रबलतर हैं, जो इसे ''कनट्राइव्ड पोएट्री'' होने से बचाती हैं। इसका सामना जिन अधिकतर कविताओं से है उसमें कवि का श्रम और युक्ति दिखती है। इसलिए तुषार को पढ़ते हुए कई दफा यह भ्रम होता है कि उनके यहाँ चीजें कच्ची तो नहीं रह गईं। पर एकाधिक जगहों को छोड़ कर आपको उसका कच्चा या हरा होना ही मोहता है। एक नए कवि में अक्सर 'यह जो हरा है', उसका न होना सबसे ज़्यादा खटकता है। और अगर कवि-कर्म आपने महज सायानी जमात में हिस्सेदारी की गरज से इस हरे से शुरू न करके ठूंठ से शुरू की होती है तो वृक्ष की संभावनाएं भी आप ख़ुद ही निःशेष करते जाते हैं। अनेक नए कवि इसी तरह काल-कलवित हो गए और हो रहे हैं। तुषार के यहाँ यह हरा एक वृक्ष का आश्वाशन है। अस्तु। तुषार ने ( प्रभात रंजन ने ठीक मार्क किया है ) ऐसी कवितायें लिखी हैं जिनमें अवचेतन का अविरल प्रवाह आद्योपांत कायम रहता है। हालाँकि तुषार सिर्फ़ इसी से कविता नहीं संभव कर लेते। विमल मन जब वह कहते हैं कि ''जितना भी, जैसा भी पर शब्दों का एक संसार उग रहा है। अपने को उसी में धर रहा हूँ। शब्द आते हैं। मैं कहीं नहीं हूँ'' तो उसका यह आशय कतई नहीं है कि अवचेतन को वे अपने हिसाब से गढ़ते या पुनर्सृजित नहीं करते। दरअसल, इसी पुनर्सृजन में उनकी वैचारिकी और आध्यात्मिक प्रेक्षाएं भी जगह पाती हैं। तुषार की कविताओं के लिए इसीलिए 'प्रेक्षा' शब्द का इस्तेमाल करना मुझे उपयुक्त जान पड़ता है। प्रेक्षा का अर्थ है देखना। पर उनकी प्रेक्षाएं भी कुछ फर्क हैं। मसलन वे दृश्य-पाठ तक अपने को सीमित नहीं रखतीं। वे अपने लिए एक ज़्यादा बड़ा संदर्भ ढूँढने-पाने की चेष्टाएँ हैं। अनायास ही तुषार की कविता में नैतिक-आध्यात्मिक आयाम नहीं जुड़ जाते। ज़ाहिर है वे इन्हें प्रार्थना के शिल्प में स्वायत्त नहीं करते, बल्कि अपने तीखे यथार्थ-बोध से समंजस करते हैं।
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(''पहर यह बेपहर का'' नाम से प्रकाशित कवि के प्रथम संग्रह को पढने की एक कोशिश। ऊपर पुस्तक का आवरण चित्र , जो कवि की तुलिका से ही निकली है। नाम 'मिस्टिक क्वेस्ट'। )

Saturday, August 29, 2009

कवि कह गया है : ५ : तुषार धवल


( तुषार धवल हिन्दी के नए कवियों में अपने रचना-स्वभाव की वजह से अलग से पहचाने जाते हैं। उनकी कविता में समकालीन यथार्थ के साथ-साथ एक आध्यात्मिक प्रेक्षा भी जुड़ी है। बहुधा ऐसी प्रेक्षाओं को ग़लत पढ़ लिया जाता है। इसलिए ज़रूरी है कि हम उस कोहेतूर की भी सैर कर आयें जहाँ कविता में इन प्रेक्षाओं का नियोजन होता है। तुषार ने हमारे आग्रह पर यह तलघर खोला है। उनके शब्दों के आलोक में हम यहाँ विचर सकते हैं। 'कवि कह गया है' स्तम्भ में इस बार तुषार की अन्तः-क्रिया। हाल ही में कवि का पहला कविता-संग्रह, 'पहर यह बेपहर का'नाम से छपकर आया है। सबद कवि को उनके पहले संग्रह और भविष्य की शुभकामनायें देता है। तुषार कविता करने के साथ-साथ बहुत उम्दा चित्र भी बनाते हैं। ऊपर उन्हीं की चित्र-कृति ,''शेष '' दी गई है। )


एक तत्त्व है कविता

तुषार धवल

मन ... मन के पार एक कोमल अँधेरा पसरा रहता है। नहीं, अँधेरा भी नहीं, इसे एक कोमल उजास कहना चाहिए। या उजास भी नहीं, यह एक शून्य है। ....शून्य है ? नहीं वह भी नहीं। तो फिर क्या है ? पता नहीं, लेकिन कुछ तो है। कोई तो एक ज़मीन है। अवकाश या न जाने क्या है, जहाँ मन में उठती लहर मुझे धकेल रही है।

यह रास का काल है। लय, गति और बारीक हरकतों का मिला जुला संयोजन! कविता वह नहीं जिसे हम जानते हैं। अनुभूति वह नहीं, जिसे हम व्यक्त करते हैं। यह कुछ शब्दातीत-सा होता है। सृष्टि ने अपनी रचना का सूत्र अपने भीतर छुपा रखा है। खजाने की कोई गुमशुदा चाबी गहरे अतल में किसी सूक्ष्म भाव में 'एनक्रिप्ट' करके रख दी है। उसे 'डी-कोड' करना मुझे नहीं आता। लेकिन एक संकेत कहीं भीतर से उठता है। कौन ? कहाँ ? लुका-छिपी का खेल चलता है ! मन को सतर्क करता हूँ। मुझे मालूम है, कहीं से कोई 'धप्पा' दे देगा और फिर से खेल अपनी शुरुआत पर लौट जायेगा।

एक 'सिम्फनी' है शब्दों की। 'रिद्मिक'। लय जो मुझे चारों तरफ से घेर रही है। कुनमुन कुनमुन कुछ कुनमुनाता है मेरे भीतर। टन्न से एक घंटी बजती है। स्वरों का जमघट एक 'रिदम' में फैलने लगता है। भाव उसी 'रिदम' पर चल रहे हैं। पड़ोस में कोई ड्रिल मशीन तीखी घिर्र-घिर्र करती दीवार में उतरती जा रही है। एक चील हवा में चकल्लस करती हुई गोता लगा रही है। फेरीवाला पुकार लगाता है। यहीं ट्रैफिक भी है। बीवी, ऑफिस, बॉस भी। ये सब हैं, लेकिन इन क्षणों में ठीक वैसे नहीं, जैसा हम उन्हें चीन्हते-जानते आए हैं। जानना भी कभी-कभी कितना अनजान होना है!

सृष्टि सेवित ( सृष्ट ) हर चीज़ की जो यह लय है, क्या हम इस लय को जान समझ पाते हैं ? इस नैसर्गिक लय का असर बहुत सीधा होता है। बहुत पक्का। भीतर जो उमड़ता-घुमड़ता है, वह इसी लय से तारतम्य बिठा कर इसमें विलय का आकांक्षी होता है। रचना वहीँ से उगती है। और यह लय सहजता की होती है।

इस 'सिम्फनी' में मैं भी डूब-उतरा रहा हूँ। आदिम संस्कार हैं, अहम् है, जो काठ के किवाड़-सा आड़े आ जाता है। जितना भी, जैसा भी पर शब्दों का एक संसार उग रहा है। अपने को उसी में धर रहा हूँ। शब्द आते हैं। मैं कहीं नहीं हूँ।

कभी कोई लय गीत के ताल पर उठती है तो कभी गद्य के ताल पर। उसका कोई फार्मूला नहीं है। कभी कभी तो बिलकुल निर्जन सपाट-सी भी लय होती है किसी भाव-चेतना की। बस उसके सहज में सहज हो जाने में सब कुछ बसा होता है। काठ के किवाड़ में दरार है जिसके पीछे से ढिबरी ढिमक ढिमक कुछ कह रही है। देखो उसकी लौ का 'रिदम'। यह संसार का 'रिदम' है। जो कुछ भी सहज-सृष्ट है उसमें 'रिदम' है।

कविता शब्दों में नहीं होती। शब्दों से बनती भी नहीं। एक तत्त्व है कविता।
कविता सिर्फ वहां संभव 'होती' है, जहाँ शब्दों के वाहन हमें ले जा कर छोड़ देते हैं !

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बही - खाता : ८ : पॉल ऑस्टर



किताब पाठक लिखता है


मेरी
यह कोशिश रहती है कि अपने गद्य में इतनी जगहें छोड़ता चलूँ जिसमें पाठक का वास हो। क्योंकि मेरी यह दृढ मान्यता है कि यह पाठक है जिसने किताब लिखी होती है, लेखक ने नहीं।

जब मैं लिखता हूँ, मेरे दिमाग में कहानी सर्वोपरि रहती है, और मुझे लगता है इस पर किसी और को वरीयता नहीं दी जानी चाहिए। इसके लिए सबकुछ तज देना चाहिए : अत्यन्त मनोरम और उत्सुकता से भर देनेवाले उन तमाम हिस्सों को भी, अगर वे, जो मैं कहना चाहता हूँ उसके साथ एक प्रासंगिक जुड़ाव नहीं रखते।

इतनी निर्ममता ज़रूरी है। तब जब आप एक कहानी कह रहे हों और उम्मीद करते हों कि लोग आपको सुनें। इसमें छटांक भर विचलन भी लोगों के मन में भारी बोरियत पैदा कर सकता है। अंततः आप वही किताब नहीं लिखते जिसे लिखने की ज़रूरत आपने महसूस की थी, आप वह किताब भी लिखना चाहेंगे जिसे आप ख़ुद पढ़ना पसंद करें।

मैं जब यह सोचता हूँ कि मैं क्यों लिखता हूँ, तो मुझे अचरज होता है। लिखते हुए न तो मैं कोई सुंदर वस्तु बना रहा होता हूँ और न मनोरंजक कहानियाँ गढ़ने की ही मेरी मंशा होती है। फिर ? मुझे दरअसल यह शिद्दत से महसूस होता है कि लेखन जीवित रहने के लिए किया जानेवाला एक ज़रूरी कर्म है। एक ऐसा काम जिसे न करूँ तो मुझे अपना अस्ति-बोध भयावह लगने लगता है।

मेरे लिए लिखना हमेशा सुखकर नहीं रहा है। पर यह न लिख पाने की पीड़ा से हमेशा बेहतर रहा है।

जिन जीवनानुभवों से गुजरा हूँ उन्हें दर्ज कर मैं उनके प्रति एक नैतिक आभार प्रकट करता हूँ। मैं अपनी जी हुई दुनिया पर ज़्यादा यकीन करता हूँ, बनिस्बत मुझे बताई गई दुनिया के।...इस तरह हर लेखक अपने लेखन में अपने जीवनानुभवों को कमोबेश शामिल करता है और हर उपन्यास आत्मकथात्मक जान पड़ता है। पर इसमें लुत्फ़ कल्पना द्वारा यथार्थ में सुराख करने से पैदा होता है, यथार्थ को ज्यों का त्यों परस देने से नहीं।

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अनुवाद : अनुराग वत्स
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( अमेरिकी कथाकार और कवि पॉल ऑस्टर के ये विचार-बिन्दु उनके गद्य संकलन द रेड नोटबुक से लिए गए हैं। ऑस्टर की ख्याति क्राइम-फिक्शन के लिए है। साथ ही वे अपने अनुवाद और कथेतर गद्य के लिए भी जाने जाते हैं। बही-खाता में इस दफा ऑस्टर ही। )

Wednesday, August 26, 2009

पोथी पढ़ि पढ़ि : ३ : इतलो कल्विनो



क्लैसिक्स के बारे में


१. क्लैसिक किताबों के बारे में लोग अक्सर यह कहते पाए जाते हैं कि वे इन्हें 'फिर से पढ़ रहे हैं'। वे यह कभी नहीं कहते कि इन्हें ( दरअसल पहली दफा ही) 'पढ़ रहे हैं'! ऐसा उनके मुंह से तो और सुनने को मिलता है जो अपने-आप को खासा पढ़ाकू मानते-समझते हैं।

२. 'क्लैसिक्स' शब्द का इस्तेमाल हम उन किताबों के लिए करते हैं जिन्हें उनके पढ़ने और प्यार करनेवालों ने अमूल्य निधि की भांति सहेजा होता है। पर ये किताबें उन लोगों द्वारा भी कम सहेजी हुई नहीं मानी जाती, जिन्हें यह सौभाग्य मिला कि वे ऐसी किताबों को तब पढ़ सकें, जब स्थितियां पढ़े-गुनने के लिए सर्वाधिक अनुकूल रहीं।

३. क्लैसिक वे किताबें हैं, जो आपके मनोजगत पर गहरा असर छोड़ती हैं। खासकर तब, जब वे आपके दिलोदिमाग से जाने से मना करती हैं, और तब भी जब खुद को स्मृति में नियोजित करती हुई वे आपके सामूहिक या व्यक्तिगत अवचेतन में छुप बैठती हैं।

४. क्लैसिक का पुनर्पाठ भी उसके पहले पठन की तरह ही एक खोजी यात्रा सरीखा रोमांच से भर देता हैं।

५ + ६. क्लैसिक का हर पठन असल में पुनर्पाठ ही है। मायने ये कि एक क्लैसिक किताब कभी चुप नहीं बैठती। हर पाठ में वह आपको कुछ न कुछ अलग सौंपती जाती है।

७. क्लैसिक कृतियॉं हमारे पूर्व-पठन को अपने भीतर ज़ज्ब सांस्कृतिक अनुभवों से आलोकित करती हैं।

८. एक क्लैसिक किताब ज़रूरी नहीं कि हमें वह बताए, जो हम पहले नहीं जानते थे। बहुधा तो यह होता है कि ऐसी किताबों में हम उन्हीं चीजों को पाते हैं, जिनसे हमारा पूर्व परिचय रहता है। महत्वपूर्ण इस जाने हुए को एक खास ढंग से, अक्षरयोजित, जानना होता है।

९. क्लैसिक कृतियों के बारे में हमने जितना सुना होता है, पढ़ते हुए वे हमें उससे कहीं ज़्यादा ताज़ा, अनपेक्षित और अद्भुत जान पड़ती हैं।

१०. एक क्लैसिक किताब को उसकी संरचना में ब्रह्माण्ड के बराबर रख कर देखा जा सकता है।

११. आपके क्लैसिक लेखक वे हैं, जिनसे आप हमेशा अपने को नाभिनालबद्ध पाते हैं। इस अभिन्नता में न सिर्फ़ वह अपने सम्बन्ध में आपको अपनी परिभाषा गढ़ने में मदद करते हैं, बल्कि उनसे जिरह करते हुए भी आप ऐसा करने की सहूलियत पाते हैं।

१२. एक क्लैसिक किताब आपके हाथ दूसरी के पहले आती है। पर जिस किसी ने भी दूसरी पहले पढ़ी हुई होती है, वह अपने तईं पहली को पढ़ कर उसकी जगह आप ही तय कर देता है।
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अनुवाद : अनुराग वत्स

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( इतालवी भाषा के अनुपम कथाकार इतलो कल्विनो की ये पंक्तियाँ उनके कथेतर गद्य-संकलन 'लिटरेचर मशीन' से ली गई हैं। जिस लेख से इन्हें अलगाया गया है, उसका नाम है, व्हाई रीड क्लैसिक्स ? लेख में क्लैसिक की अवधारणा, निर्मिति और इस शब्द के मिथकीय होते जाने के बारे में विस्तार से लिखा गया है। यहाँ लेखक की स्थापनाओं के दर्जन भर सूत्र वाक्यों को ही अनूदित कर दिया गया है। इससे पहले आप इस स्तम्भ में मारीना त्स्वेतायेवा और फरनांदो पैसोआ का गद्य भी पढ़ चुके हैं। )

Tuesday, August 25, 2009

ज़बां उर्दू : ४ : मिर्ज़ा हादी 'रूस्वा'

आखिरी सफे...

मिर्ज़ा रुस्वा साहब, जब आपने मेरी ज़िन्दगी के हालात लिखके मसविदा मुझे पढ़ने के लिए दिया, तो मुझे ऐसा गुस्सा आया कि जी चाहता था टुकड़े-टुकड़े करके फेंक दूँ। बार-बार ख़याल आया कि ज़िन्दगी में क्या कम काला मुंह हुआ था, जो उसकी कहानी मरने के बाद भी बाकी रहे और लोग पढ़ें और मेरी लानत-मलामत करें ? मगर कुछ आपका लिहाज़ करके हाथ रुक गया।
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मुझे नेक औरतों का खयाल आता है। उन्हें अपने ऊपर जितना घमंड न हो, थोड़ा है। हम-जैसी बज़ारियों का उनसे क्या मुकाबला! मगर मैंने सोचा कि इसमें वक्त ही का हाथ है, जो मैं बाज़ार में आई और अपनी किस्मत का लिखा पूरा किया। वक्त न होता, तो क्या दिलावर खां मुझे उठाके लाता और लाके खानम के हाथ बेचता और मैं वह बुरे काम करती, जिनको अब मैं बुरा समझती हूँ ? उस ज़माने में मैं उन चीज़ों को नहीं समझती थी और न मुझे बताया गया था कि मैं उन कामों से बचूं।
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जवान होने के बाद ऐशो-आराम में पड़ गई। उस ज़माने में गा-बजाके मर्दों को रिझाना मेरा पेशा था। इसमें औरों के मुकाबले मुझे जितनी कामयाबी मिलती थी, उतनी ही मैं खुश होती थी। जहाँ कामयाबी नहीं होती थी, रंज होता था। मेरी सूरत दूसरों की बनिस्बत कुछ अच्छी न थी, मगर गाने और शेरो-शायरी के शौक की वजह से मैं सबसे बढ़ी-चढ़ी रही। अपनी उम्रवालों में मुझे ज़्यादा बड़ा दर्जा मिला हुआ था। इसका नतीजा यह हुआ कि जितनी मेरी इज्ज़त बढ़ती, मैं अपनी निगाहों में ख़ुद को इज्ज़तदार समझने लगी। इससे नुकसान यह हुआ कि मैं तो अपने काम में मुंह देखती रह जाती और दूसरी रंडियां अपना मतलब निकाल लेतीं।

फ़िर वह ज़माना आया कि मैं रंडी के ज़लील पेशे को ऐब समझने लगी और उससे हाथ खींच लिया। हर ऐरे-गैरे से मिलना छोड़ दिया और सिर्फ़ नाच-मुजरे पर गुज़र करने लगी।

जब
मैंने उन कामों को छोड़ा, जिन्हें मैं बुरा समझती थी, तो कई बार मेरे जी में आया कि किसी के घर बैठ जाऊँ। फिर सोचा लोग कहेंगे कि आख़िर रंडी थी न, कफ़न का चोगा किया। जब कोई रंडी उम्र से उतर जाने के बाद किसी के घर बैठती है तो तजुर्बेकार तमाशबीन कहते हैं कि मरते-मरते कफ़न ले मरी...बात सच है, हमलोग ऐसी ही होती हैं, खुदगर्ज़, लालची, फरेबी।
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एक बड़ी बी कभी-कभी मेरे मकान पर आया करती हैं। किसी ज़माने में बड़ी मशहूर रंडियों में थीं। जवानी में हजारों रुपये कमाए। जब सिन से उतरी, तो वही कमाई यारों को खिलाना शुरू कर दी। बुढ़ापे में एक नौजवान के घर जा बैठी। वह खूबसूरत था, कमसिन था, इन पर क्यों रीझता ? मगर यह न समझीं। पहले तो साहबजादे की बीवी इनको देखकर ज़रा बिगड़ीं, मगर जब मियां ने असल मतलब समझा दिया, तो खामोश हो रहीं और उनकी खूब खातिर-मदारत करने लगीं। जब तक माल रहा, मियां-बीवी ने खूब फुसलाकर खाया और जब खुख हो गईं, तो घर से निकाल दिया। अब गलियों की ठोकरें खाती फिरती हैं।

लखनऊ
के गली-कूचों में जो बूढी-फ़कीरनियाँ पड़ी रहती हैं, उनमें ज्यादातर रंडियां हैं और वे रंडियां, जो कभी ज़मीन पर पैर न रखती थीं, जिन्होंने क़यामत बरपाकर रखी थी...जहाँ जाती थीं, लोग आँखें बिछाते थे, जहाँ बैठ जाती थीं, लोग बाग़-बाग़ हो जाते थे; आज उनकी तरफ कोई आँख उठाके नहीं देखता...
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मैं बहुत दिन तकदीर और तदबीर के मसले में फंसी रही। मगर अपने हालत को क्योंकर भूल सकती हूँ! मेरी ज़िन्दगी में काम वही दो हरूफ आए, जो मौलवी साहब ने पढ़ा दिए थे...उस ज़माने में जब मैं नाच-मुजरा करती थी, तो मौलवी साहब से हासिल किये हुए इल्म की वजह से मेरी शोहरत हुई। उस वक्त तो मैं बराबर तारीफ करनेवालों से घिरी रहती थी। पढ़ने-लिखने के लिए ज्यादा फुरसत नहीं मिलती थी। लेकिन अब मैं अकेली हूँ, तो मौलवी साहब की दी हुई किताबें पढ़ने के शौक की वजह से ही ज़िन्दा हूँ। अगर यह शौक न होता तो जवानी के मातम, पुरानी दिनों के ग़म और मर्दों की बेवफाई का रोना रोते हुए ज़िन्दगी खत्म हो जाती।

रहती रंडी की तरह हूँ, ख़ुदा चाहे मारे, चाहे जिलाए, मुझसे पर्दे में घुटकर तो न बैठा जायेगा। मगर मैं पर्देवालियों के लिए दिल से दुआ मांगती हूँ, ख़ुदा उनका राज-सुहाग कायम रखे और रहती दुनिया तक उनका पर्दा रहे। जहाँ तक मेरी बात है, अपने हाल तो यह हैं कि :

मरने के दिन करीब हैं शायद कि ऐ हयात
तुझसे तबीयत अपनी बहुत सीर हो गई
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( यह गद्य मिर्ज़ा हादी 'रुस्वा' का है। रुस्वा उर्दू के आरंभिक गद्यकारों में अग्रगण्य हैं। यहाँ दिए गए अंश उनके अत्यंत प्रसिद्द उपन्यास उमराव जान 'अदा' से चयनित हैं। रुस्वा का यह उपन्यास उन्नीसवीं सदी के अवध ( लखनऊ) का आईना है। हालाँकि इसमें एक वेश्या अपने जीवन का अक्स देखती है, लेकिन बजरिये उसके पूरे युग का चरित और त्रासद विडम्बनाएं उजागर होती जाती हैं। इन मायनों में इसकी अमरता इतिहास पुस्तकों से कुछ ज्यादा है। साथ-साथ यह उपन्यास तत्कालीन गद्य मात्र में हिंदी के बरक्स उर्दू की बढ़त का सूचक भी है। ज़बां उर्दू में इस दफा यही। जोड़ना ज़रूरी है कि प्रस्तुत अंश गिरीश माथुर द्वारा उपन्यास के पुस्तकाकार अनुवाद से हैं। )
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Saturday, August 22, 2009

लव इन द टाइम ऑफ़ स्‍वाइन फ्लू...





क्या यह ज़रूरी है ?
... नहीं।
...फिर ? तुमने बात क्यों बंद की ?
...सोच रहा था, देखें, बगैर बात किए लोग कैसे रहते हैं।
...अच्छा !, बकवास। तुमने खामख्वाह परेशान किया मुझे। ऐसा क्यों करते हो ?
XXX
खैर, अभी कहाँ हो, ऑनलाइन नही दिखते।
...बस में हूँ।
...जगह मिली ?
...हाँ, निजामुद्दीन आते-आते।...तुम ?
...मैं घर पर हूँ। बात बंद कर दी थी तुमने इसलिए बिना मिले चली आई।
...ओह!
XXX
बाहर बारिश गिर रही है। जाम लगा है और अदंर लोग नकाबपोश हैं ?
...क्यों ?
...तुम अख़बार नहीं पढ़ती क्या ? स्वाइन फ्लू।
...तुम मेरे मन का अख़बार ही नहीं बनाते, क्या पढूं!
...तुम भी!
...अच्छा तुमने मास्क पहन रखी है ?
...नहीं।
...क्यों तुम्हारे लिए फ्लू नहीं है?
...है, पर मैं उससे बड़ी फ्लू की चपेट में हूँ।
...बनो मत। कम से कम रुमाल ही बाँध लेते।
...तुम जानती हो न...
...हाँ-हाँ कि आप रुमाल भूल जाते हैं। पर ऐन नाक पर बंधी रहेगी तब भी भूलोगे ?
...नहीं। ...ऐसा करो रुमाल बांधनेवाली बीवी घर ले आओ।
...वह गले में पट्टा बाँध देगी!
...हाहाहा
...हमं, सच कह रहा हूँ।
XXX
...क्या करते रहे इन चार गुमसुम दिनों में। अभी जैसे ऊँगली पटपट चल रही है, चार दिन में तुमसे चार अक्षर नहीं लिखे गए!
... सॉरी...
...शट अप! मेरा मतलब है क्यों ? क्यों करते हो ऐसा ? बताओ अपने लिए तकलीफ सिरजते हो, जबकि जितना साथ लिखा है, उतनी दूर तक तो मैं हूँ न।
...
...मेरा स्टाप आ गया।
...कमीने!
...किसके, विशाल के ?
...नहीं, मेरे। मेरे अपने।....
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Friday, August 21, 2009

कोठार से बीज : ८ : कारेल चापेक

नींद की दया असीम है

रात होते ही दूसरी ज़िन्दगी शुरू हो जाती है, पीड़ा और दुविधा से भरी हुई।

जो आदमी सो नहीं पाता, वह किसी भी चीज़ से छुटकारा नहीं पा सकता।

जब आदमी सो नहीं पाता, तो शुरू-शुरू में वह किसी के बारे में कुछ नहीं सोचना चाहता। वह या तो गिनती गिनने लगता है, या प्रार्थना करने लगता है। फिर अचानक उसे बीच में ही खयाल आता है- हे ईश्वर, कल मैं अमुक काम करना भूल गया। और बाद में एक नया खयाल तंग करने लगता है कि कल सौदा खरीदते समय दुकानदार ने उसे ठग लिया था। फिर उसे सहसा याद आता है कि उस दिन उसकी पत्नी या मित्र ने कितने अजीब ढंग से उससे बातचीत की थी।

नींद सिर्फ एक शारीरिक विश्राम नहीं है, नींद एक तरह से बीते हुए दिन का प्रायश्चित और शुद्धिकरण है। वह क्षमादान है। अच्छी नींद के पहले कुछ मिनटों में हर व्यक्ति की आत्मा बच्चे की तरह निर्मल और पवित्र हो जाती है।

नींद एक गहरे, अंधेरे पानी की तरह है। उसमें वह सबकुछ बह जाता है, जिसके बारे में हम कुछ नहीं जानते और जिसके बारे में हमें कुछ नहीं जानना चाहिए। हमारे भीतर जो अजीब-सी कीचड़ जमा हो जाती है, नींद उसे बहाकर उस अचेतन में डुबो देती है, जो अपने में असीम है। हमारी नीचता और कायरता...रोज़मर्रा के हमारे कुलबुलाते पाप, हमारी लज्जास्पद मूर्खताएं और असफलताएं, अपने प्रिय लोगों की आंखों में झूठ और घृणा देखने की पीड़ा, वे लोग जिन पर हम लांछना लगाते हैं, और वे लोग जो हम पर लांछन लगाते हैं...ये सब चीजें रात की सुप्त घड़ियों में चुपचाप चेतना के नीचे बह जाती है। नींद की दया असीम है...वह न केवल हमें क्षमा कर देती है बल्कि उन सबको भी, जो हमारे प्रति गुनाहगार हैं।
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( ऊपर दिए गए अंश किसी निबंध से नहीं, प्रख्यात चेक लेखक कारेल चापेक की कहानी नीं से लिए गए हैं। कई दशक पहले हिन्दी को चापेक के दुर्लभ गद्य-गुण से निर्मल वर्मा ने परिचित कराया था। टिकट-संग्रह नाम से उन्होंने चापेक की कहानियों का पुस्तकाकार अनुवाद किया था। नींद उसी संग्रह की आखिरी कहानी है। इस कहानी के उपरोक्त अंशों को यहाँ भले कुछ मनमाने ढंग से संयोजित किया गया है, उसका औचित्य महज एक पाठ-निर्मिति का ही रहा है। जिसे हम साहित्य का आत्म-सत्य कहते हैं, वह कहानी या कविताओं में इसी तरह बिखरा पड़ा है। उन्हें उनकी अस्थि-मज्जा ( कथा या काव्य तत्व ) से अलगाना लगभग असम्भव है। फिर भी ऐसी चमकदार पंक्तियाँ आपका ध्यान खींचती हैं और एक अलग पढ़त बनती है। कोठार से बीज में इस दफा यही। )
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Tuesday, August 18, 2009

फिर भी कुछ लोग


चालीस पार को युवा कहने की लापरवाह आदत डाले हम हिन्दी वालों के लिए करीब तीस के व्योमेश शुक्ल का जमा सत्तावन कविताओं का पहला कविता-संग्रह, 'फिर भी कुछ लोग' दिक्कत पैदा करनेवाला है। हम किन नामों से अभिहित करेंगे इस कवि को जिसकी संवेदना का धरातल इतना ठोस और मर्मग्राही है, जिसकी वैचारिक प्रौढ़ता के सामने उनके समवयस कवि किशोर और चालीस पार युवा युवतर सखा नज़र आते हैं ( अगर यह बड़बोलापन लगे तो संग्रह की तीसरी ही कविता पढ़ ली जानी चाहिए : अस्तु ), जो आरंभिक शिल्प-सजगता की बात तो जाने दीजिए, बेसंभाल शिल्प में लिखने का जोखिम अभी से उठा रहा है और जिसे मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, विनोद कुमार शुक्ल या विष्णु खरे जैसे कवियों की लिखी गई कविताओं के लील जाने वाले प्रभाव से बचने, सीखने और रचने का हुनर मालूम है। ऐसे कवि का पहला कविता-संग्रह उसे तुंरत किसी नामावली में खातियाने की हमारी आदत में खलल तो है ही। इससे इतर यह बहुत प्रमाणिक ढंग से इस बात को पुष्ट करने का भी दस्तावेज़ है कि कविता की अभी बिल्कुल अभी वाली पुरानी अवधारणा को कितनी कुशलता से व्योमेश सरीखे कुछ कवि चुपचाप बदल रहे हैं। विष्णु खरे का संग्रह के अंतिम हिस्से में व्योमेश की कविताओं पर एकाग्र लंबा लेख इस उक्ति के आलोक में द्रष्टव्य है। व्योमेश यहाँ से किस ओर रुख करते हैं यह देखना दिलचस्प होगा, क्योंकि कविता के स्वनिर्मित और प्रशंसित प्रासाद में टिक रहने की हिंदी कवियों की नियति से वे परिचित नहीं हैं, ऐसा फ़िलहाल नहीं लग रहा।
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