Sunday, December 20, 2009

सबद विशेष : ९ : मिक्लोश रादनोती

( मिक्लोश रादनोती हंगरी के किसी कवि का नाम है और उनकी कवितायें हिंदी में उपलब्ध हैं और यह सिवाय उन कविताओं के अनुवादक के किसी को ध्यान तक नहीं कि कवि का यह जन्म शताब्दी वर्ष है! इन्हीं तथ्यों से प्रेरित है सबद की यह विशेष पोस्ट. विष्णु खरे कविता और आलोचना लिखने के बाद जिस काम को बहुत श्रम और सुरुचि से अनेक वर्षों से करते आ रहे हैं उनमें अनुवाद भी है. और हमें उनका ऋणी होना चाहिए कि उन्होंने हिंदी में विश्व की अनेक भाषाओं से इतने विपुल अनुवाद किये हैं. रादनोती के ये अनुवाद और उन पर लेख छब्बीस बरस पहले उन्होंने पुस्तकाकार किये/लिखे थे. बत्तीस पृष्ठों की वह पुस्तक एक लम्बे अरसे से अप्राप्य है. मुझे संयोग से उसकी एक प्रति विष्णुजी की स्टडी में मिल गई थी और कवितायें पढने के फ़ौरन बाद मैं उसे ले उड़ा. क्यों,यह आप आगे पढ़कर जानिए. विष्णुजी का सहयोग के लिए आभार. )

खंड : क : कवितायें

यहाँ इतनी कारें

बहन, तुम देखती हो कितने सारे भिखारी
और अभागे, और कितने सारे भलेमानस चीथड़े बीनने वाले
सिर्फ़ हम दो हैं : मुट्ठी बंधे भिखारी
और गूंगे अभागे

बहन, अपना हाथ मुझे पकडाओ, यहाँ इतनी कारें
और इतने सारे बड़े लोग चलते हैं कि हमें होशियार रहना होगा
अगर मैंने तुम्हें छोड़ दिया तो अंधे गलियारे तुम्हें ले जायेंगे

बहन, देखो, हम दो हैं : एक पिता के सपने
और दो मांओं की तकलीफें हम में चीखती हैं
दो सुन्दर आलिंगनों की निशानियों की तरह, देखो,
हम बचे हैं, दो महान स्वप्न-स्मृतियाँ, और हमारे ख्वाब
सुबहों में धीरे-धीरे सरकते हैं, दिन के डंठलों के खेतों पर
हम सपने देखते हैं
और जब घूमने जाते हैं तो एक-दूसरे का हाथ पकड़े रहते हैं.

(१२ अक्टूबर १९२८)
****
मद्धिम पंक्तियाँ, सिर झुकाए हुए
(अन्ताल फोर्गाच के लिए)

आधी रात के करीब मेरी मां ने मुझे जन्म दिया
सुबह तक वह मर चुकी थी ; बुखार उसे ले गया
और मैं खलिहानों में अलंकृत शब्दों में
प्रसव और ताकतवर माताओं के बारे में सोचता हूँ

एक बार, आधी रात को, फिकर मेरे पिता को
अस्पताल के बिस्तर से, मुंह बाए
डॉक्टरों के बीच में से ले गई; मैंने तब
उन लाल आँखों वाले लोगों को वहीं पीछे छोड़ दिया
और अकेला रहा हूँ, बहुत अरसे से
घरों के बाहर रह रहा हूँ.

अपने पूर्वजों को मैं भूल गया
मेरे कोई वारिस नहीं होंगे क्योंकि मैं कोई चाहता नहीं
मैं अपनी प्रियतमा की निष्फल गोद
पीले चांद के तले अपनी बाँहों में ले लेता हूँ
और यकीन नहीं कर सकता कि वह मुझे चाहती है,

कभी-कभी, चुम्बनों के बीच, मैं सोचता हूँ
कि वह ख़राब है, लेकिन वह सिर्फ़ बाँझ है और उदास
लेकिन मैं खुद भी उदास हूँ

और जब दिन उगने के वक़्त सितारे बुलाते हैं
तो सब कुछ के बावजूद
आलिंगन करते हुए हम साथ रवाना होते हैं, हम दोनों,
सूरज के उजाले की तरफ़

( २८ सितम्बर १९२९)

****
लोर्का

क्योंकि स्पेन को तुम से प्रेम था
और प्रेम करने वाले तुम्हारी कविताएं पढ़ते थे--
इसलिए जब वे आये तो सिवा इसके और क्या कर सकते थे--
तुम कवि थे इसलिए उन्होंने तुम्हें मार डाला
अब लोग लड़ रहे हैं तुम्हारे बगैर--
फेदरिको गार्सिया लोर्का

( १९३७)
****
सो जाओ

वे हमेशा कहीं न कहीं हत्या करते हैं
घाटी की गोद में, जिसकी पलकें मुंदी रहती हैं,
या खोजती हुई पर्वतों की चोटियों पर,
कहीं भी, और मुझे यह कह कर धधास बंधाने का
कोई मतलब नहीं है कि वह सब मुझसे बहुत दूर हो रहा है.
शंघाई या गुएर्निका
मेरे दिल के ठीक उतने ही पास हैं
जितना तुम्हारा थरथराता हाथ
या वहां ऊपर आकाश में कहीं बृहस्पति.
अभी आकाश की तरफ़ मत देखो.
और धरती की तरफ़ भी नहीं--सिर्फ़ सोओ.
मौत अभी चिंगारी फेंकती हुई आकाशगंगा
की धूल में दौड़ रही है और
गिरते हुए बदहवास सायों को
अपने रुपहली छिडकाव से भिगो रही है.

( २ नवम्बर १९३७ )
****
शांति, आतंक

जब मैं फाटक से बहार आया तो दस बजे थे
एक डबलरोटी वाला अपनी चमकती हुई साइकल पर गता चला गया
ऊपर एक हवाई जहाज घरघरा रहा था, सूरज चमक रहा था, दस बजे थे,
मेरी बहन जो मर चुकी थी याद आई और वे सारी आत्माएं
जिन्हें मैंने चाहा था, जो अब नहीं थीं, ऊपर मंडराने लगी
मरे हुए मौन लोगों का एक अँधियारा दल ऊपर से गुजर गया
और अचानक दिवार पर एक साया गिरा,
चुप्पी में सुबह सहम गई, दस बजे थे
सड़क पर शांति थी, आतंक की छुअन भी थी.

( १९३८)
****
एक बेचैन घडी में

मैं हवा में ऊँचाइयों पर रहताथा, हवा में, जहाँ सूरज था
हंगरी, अब तुम अपने टूटे हुए बेटे को वादियों में बंद करते हो!
तुम मुझे सायों में लपेटते हो और शाम के दृश्य में
सूर्यास्त की तपिश मुझे आराम नहीं देती

मेरे ऊपर चट्टानें हैं, दमकता आकाश दूर है
मैं गूंगे पत्थरों के बीच गड्ढों में रहता हूँ
शायद मुझे भी चुप हो जाना चाहिए. वह क्या चीज़ है
जो आज मुझसे कविताएं लिखवा रही है? क्या वह मौत है? कौन पूछता है?

ज़िन्दगी को कौन पूछता है,
और इस कविता को--इन चिंधियों को?
जान लो कि एक आवाज़ तक नहीं होगी
कि वे तुम्हें दफनायेंगे भी नहीं, कि घाटी तुम्हें रोक नहीं पायेगी

हवा तुम्हें बिखेर देगी, लेकिन कुछ अरसे के बाद
एक पत्थर से वह गूंजेगा
जो मैं आज कहता हूँ, और बेटे और बेटियां
जब बड़े होंगे तो उसे समझ लेंगे.

( १० जवारी १९३९)
****
अपने संकलन की एक प्रति पर

मैं एक कवि हूँ और किसी को मेरी ज़रूरत नहीं है
जब मैं बिना शब्दों के गुनगुनाता हूं हुं हूं हुं हूं
तब भी नहीं. मेरा गीत बदतमीज शैतानों ने
छीन लिया है.

भरोसा करो, यकीन करो मुझ पर कि मेरे पास इस बात की
अच्छी वजह है कि शक मुझे ज़िन्दा रखे हुए है.
मैं एक कवि हूं जो इसी लायक है कि जला दिया जाये
क्योंकि वह सच्चाई का गवाह है.

मैं वह हूं जो जानता है कि बर्फ सफ़ेद है
खून लाल है और पोस्त भी लाल है
और उसका रोएंदार डंठल खेत की तरह हरा है.
मैं वह हूं जिसे आख़िरकार वे मार देंगे
क्योंकि मैंने खुद को कभी नहीं मारा.

( १ जून १९३९)
****
गीत

दुःख के कोड़े खाता हुआ
मैं रोज चलता हूं
अपने ही देश में ज़लावतन

और इसका शायद ही कोई मतलब है कि कब तक और कहाँ
मैं आता हूं, जाता हूं, बैठता हूं
और आकाश का हर एक तारा
मेरे ख़िलाफ़ है

आकाश के तारे भी
बादलों के पीछे छिपते हैं
और अँधेरे में ठोकरें खाता हुआ
मैं नदी और उसमें झुकी हुई घास तक पहुँचता हूं

जहाँ सरकंडे उग रहे हैं
अब मेरे साथ कोई नहीं है
और लम्बे अरसे से
मैंने वाकई नाचना नहीं चाहा है

लम्बे अरसे से ठंडी नाक वाले हिरन ने
मेरा पीछा नहीं किया है
मैं दलदल में से हाथ पैर मारता निकलता हूं
और उसकी सतह से भाफ़ उठती है
उसकी सतह से भाफ़ उठती है
और मैं डूबता हूं, डूबता हूं
मेरे ऊपर गिले लत्तों की तरह
दो बाज़ मंडरा रहे हैं.

( ७ जून १९३९)
****
अपने सर के नीचे तुम्हारा दायां हाथ

अपने सर के नीचे तुम्हारा दायां हाथ रखकर रात मैं लेता रहा.
दिन का दुःख अभी बाकी था. मैंने तुम्हें उसे न हटाने को कहा
मैं तुम्हारी नब्ज़ में चलते हुए खून को सुनता रहा.

करीब बारह बजे होंगे जब नींद मुझपर बाढ़ जैसी आई
उसी तरह अचानक जैसे बहुत पहले पंख-भरे उनींदे बचपन में
आई थी और उसी तरह धीरे-धीरे मुझे झुलाने लगी.

तुम मुझे बता रही हो कि तीन भी नहीं बजे थे
कि मैं चौंककर उठ बैठा, डरा हुआ
बुदबुदाने लगा, कवितायें पढ़ने लगा, अनर्गल चिल्लाने लगा.

डरी हुई चिड़िया की तरह मैंने अपने हाथ फैला लिए
जो बगीचे में किसी परछाईं को देखकर अपने पंख फड़फड़ाने लगती है
मैं कहाँ जा रहा था? किस तरह की मौत मुझे डरा रही थी?

मेरी अपनी, तुमने मुझे चुप किया और बैठकर आँखें मूंदे मैं तुमसे चुप होता रहा
मैं चुपचाप लेट गया, आतंकों की राह इंतजार करती रही.
और मैं सपने देखता रहा. शायद किसी और तरह की मौत के.

( ८ अप्रैल १९४१)
****
तुम्हारी बांहों में

तुम्हारी बांहों में झूल रहा हूं मैं
चुपचाप
मेरी बांहों में झूल रही हो तुम
चुपचाप
तुम्हारी बांहों में मैं एक बच्चा हूं
जो चुप है
मेरी बांहों में तुम एक बच्चा हो.
मैं तुम्हें सुनता हूं
तुम मुझे अपनी बांहों में लेती हो
जब मैं डरता हूं
तो तुम्हें अपनी बांहों में लेता हूं
और मैं डरा हुआ नहीं हूं
मौत का गहरा सन्नाटा भी तुम्हारी बांहों में
मुझे डरा नहीं सकता
तुम्हारी बांहों में मैं
मौत से उबर आऊंगा.
एक सपने की तरह.

( २० अप्रैल १९४१)
****
अचानक

अचानक एक रात दीवार चलती है
सन्नाटा दिल में बिगुल की तरह गूंजता है और एक कराह फड़फड़ाकर उड़ती है
दर्द पसलियों में चाकू भोंकता है--उनके पीछे वह धड़कन भी चुप हो जाती है
जो तकलीफ देती थी
सिर्फ दिवार चीखती है, शरीर उठता है, गूंगा और बहरा.
और दिल, हाथ और मुंह जानते हैं--हाँ, यह मौत है, यह मौत है.

जैसे जब जेल में बिजली झपकती है
तो अदंर सारे कैदी और बाहर पहरा देते सारे संतरी
जानते हैं कि कैसे उस वक़्त एक ही आदमी के शरीर में सारी बिजली एक साथ दौड़ रही है
बल्ब को चुप ही रहना है, कोठरी से एक साया गुजरता है
और अब संतरी, कैदी और कीड़े जानते हैं कि जिसे वह सूंघ रहे हैं
वह जले हुए आदमी का मांस है.

( २० अप्रैल १९४२)
****
मैं जान नहीं सकता

मैं जान नहीं सकता कि किसी और को यह देश कैसा लगेगा, यह छोटा-सा मुल्क
आग से घिरा हुआ, मेरे लिए यह एक घर है जिसमें दूर मेरे बचपन की दुनिया
झूल रही है, जैसे तने से एक कोमल डाल फूटती है उसमें से मैं उगा
और उम्मीद करता हूं कि एक दिन मेरा शरीर इसी की ज़मीन में मिल जायेगा.
यहाँ कहीं भी रहूँ हमेशा अपने घर में हूं और जब कोई झाड़ी

मेरे पैरों पर झुकती है तो मैं उसका नाम जानता हूं और उसके फूल का नाम भी
बता सकता हूं. मैं लोगों को जानता हूं और जानता हूं इस वक़्त
वे कहाँ जा रहे हैं. और जानता हूं गर्मी के सूर्यास्त में
इसका क्या मतलब हो सकता है कि दीवारों से लाल-सा दर्द टपके.
जो हवाबाज़ ऊपर उड़ता है उसके लिए यह देश सिर्फ एक नक्शा है.
वह नहीं जानता कि कवि वोएरोशमार्ती कहाँ रहता था.
उसके लिए इस नक्शे में कारखाने और नाराज़ बैरकें छिपी हुई हैं
मेरे लिए टिड्डे, बैल, गिरजाघरों के कंगूरे, भले मुलायम खेत.
वह दूरबीन के जरिये कारखाने और जुते खेत देखता है

मैं कांपते हुए मजदूर देखता हूं जिसे अपने काम का डर है
मैं जंगल देखता हूं, गीतों से भरे बागान, अंगूर के खेत, कब्रस्तान
और एक छोटी बहुत बूढी औरत जो कब्रों के बीच रोती जा रही है.

और ऊपर से जो रेल की पटरियां दिखती हैं या मशीनघर जिन्हें मिटा देना है
वह नीचे एक लाइनमैन की झोपड़ी है जिसके सामने वह खड़ा हुआ है
लाल झंडी दिखता हुआ और बच्चे उसे घेरे हुए हैं
मशीनघर के बाड़े में एक कुत्ता लोटपोट होता हुआ खेल रहा है
और वहां पार्क में मेरी पुरानी प्रेमिकाओं के कदम अब भी बने हुए हैं
उनके मीठे चुम्बन अब भी मेरे होठों पर हैं, शहद की तरह साफ.
और एक बार स्कूल जाते वक़्त सड़क के किनारे मैं एक पत्थर पर
बैठ गया था कि उस दिन इम्तहान से बच जाऊँ--
यह रहा वह पत्थर --क्या उतनी ऊँचाई से उसे देख पाते हो?
कितनी भी कोशिश करो नहीं देख सकते उसे
उसकी सारी बारीकियों के साथ--ऐसा कोई यंत्र अभी नहीं बना है.

हम गुनाहगार हैं बेशक, जैसे दूसरे देश भी हैं
हम जानते हैं कि हमने कैसे हदें तोड़ी हैं, कब कहाँ और किस तरह
लेकीन यहाँ बेगुनाह कामगार भी रहते हैं और कवि भी
और दूध पीते बच्चे जिनमें चेतना अभी जाग रही है
और उनमें दमकती है; वे उसे बचा रहे हैं, अँधेरे तलघरों में छिपे हुए
जब तक कि शांति अपनी उंगुली से इस देश को फिर से उकेर न दे
और तब वे हमारे घुटे हुए शब्दों को साफ और ऊंचे शब्दों में कहेंगे.

रात के रखवाले बदल, हम पर अपना विराट पंख फैला ले.

( १७ जनवरी १९४४)
****
न याद न जादू

अब तक मेरे दिल में सारा गुस्सा इस तरह छिपा रहता था
जैसे सेब के बीचोबीच गहरे भूरे रंग के बीज छिपे रहते हैं.
और मैं जानता था कि मेरे पीछे-पीछे हाथ में तलवार लिए एक फ़रिश्ता चलता है
जो मुसीबत के वक़्त मेरी हिफाज़त करता है, मुझे बचाता है.
लेकिन किसी बीहड़ दिन तुम सुबह उठो और पाओ
कि सब कुछ बर्बाद हो चूका है और तुम भूत की तरह निकल जाते हो
अपनी जो थोड़ी बहुत चीजें थीं उन्हें छोड़कर, करीब-करीब नंगे,
तो तुम्हारे खूबसूरत दिल में, जो अब हल्का हो चूका है,
एक वयस्क नम्रता जागने लगती है, संजीदा, संकोची
और अगर तब तुम कहोगे विद्रोह तो दूसरों के लिए कहोगे और वैसा निःस्वार्थ करोगे

और यह एक ऐसे मुक्त भविष्य की आशा में कहोगे जो दूर से ही दमक रहा है.
मेरे पास कभी कुछ नहीं था और न आगे कभी होगा
जाओ और जरा एक लम्हे के लिए मेरी ज़िन्दगी की इस दौलत पर विचार करो

मेरे दिल में कोई गुस्सा नहीं है, बदले की मुझे परवाह नहीं
यह दुनिया फिर से बनाई जाएगी--मेरी कविताओं पर रोक लगने दो
मेरी आवाज़ हर नई दीवार की नींव के पास सुनी जाएगी
अपने में मैं वह सब कुछ जी रहा हूँ जो बाकी दिनों में मुझ पर होगा
मैं पीछे मुड़कर नहीं देखूंगा क्योंकि मैं जानता हूँ कि मैं किसी भी तरह नहीं बचता
न मुझे कोई याद बचाएगी न कोई जादू--मेरे ऊपर का आसमान मनहूस है
अगर तुम मुझे कहीं देखो दोस्त तो कंधे झटक देना और मुद जाना
जहाँ पहले तलवार के लिए एक फ़रिश्ता था
वहां शायद अब कोई नहीं है.

( ३० अप्रैल १९४४)
****
अंश

मैं एक ऐसे ज़माने में इस धरती पर रहा
जब आदमी इतना गिर गया था
कि वह अपनी मर्ज़ी से दूसरों की जान लेता था, मज़े के लिए, किसी के हुक्म से नहीं
उसकी ज़िन्दगी पागल इरादों से बनी थी
वह झूठे खुदाओं में यकीन करता था, बदगुमान, उसके मुंह से फेन गिरता था.

मैं एक ऐसे ज़माने में इस धरती पर रहा
जब विश्वासघात और हत्या का आदर होता था
खूनी, गद्दार और चोर हीरो थे
और जो चुप रहता था और ताली नहीं बजाता था
उससे ऐसी नफ़रत की जाती थी जैसे उसे कोढ़ हो.

मैं एक ऐसे ज़माने में इस धरती पर रहा
जब अगर एक आदमी साफ़-साफ़ कह देता था तो उसे छिपाना पड़ता था
और शर्म से अपनी मुट्ठियाँ चबनी पड़ती थीं
मुल्क पागल हो गया था--खून और गलाज़त में धुत
अपने भयानक अंजाम पर खुश होता था

मैं एक ऐसे ज़माने में इस धरती पर रहा
जब मां अपने ही बच्चे पर एक लानत थी
औरतें अपने हमल गिराकर खुश होती थीं
टेबिल पर रखे गाढ़े ज़हर के प्याले से झाग उठता था
और जिंदा थे वे ताबूत में कैद सड़ते हुए मुर्दों से रश्क करते थे

मैं एक ऐसे ज़माने में इस धरती पर रहा
जब कवि भी चुप थे
और इसाइया की प्रतीक्षा कर रहे थे--
भयानक शब्दों के जानकार उस पैग़म्बर की--
क्योंकि सिर्फ़ वही एक सही शाप दे सकता था.

( १९ मई १९४४)
****
जड़

जड़ में ताक़त लहकती है
वह बारिश पीती है, तले की ज़मीन उसका खाना है
और उसके सपने बर्फ की तरह सफ़ेद हैं

धरती के नीचे से वह ऊपर फूटती है
ऊपर बढती है, चालाक है यह जड़
इसका हाथ ठीक रस्सी की तरह है,

जड़ के हाथ पर कीड़ा सोया हुआ है
जड़ के पैर पर कीड़ा चिपका हुआ है
सारी दुनिया कीड़ों से सड़ रही है

लेकिन अन्दर जड़ जिंदा है
उसे दुनिया की कोई चिंता नहीं है
सिर्फ़ उस डाल की है जिसे अब पत्तों ने ढक लिया है,

उस डाल से ही वह प्यार करती है और उसे ही पोसती है
उस तक बढ़िया स्वाद भेजती है
अच्छे, मीठे, आकाश-पके स्वाद

अब मैं खुद एक जड़ हूं
मेरा घर कीड़ों में है
वहीं मैं यह कविता बना रहा हूं
कभी एक फूल था अब मैं जड़ हो गया हूं
भारी और काली ज़मीन मेरे हाथ और पैर पर है
मेरी किस्मत ऐसी ही लिखी थी
और अब मेरे माथे पर आरे की आवाज़ है

( ८ अगस्त १९४४)
****
जबरन कूच

वह आदमी पागल है जो गिरने के बाद उठे और चलने लगे
घुटनों और टखनों को फिर जगाये, अकेला, भटकते हुए दर्द की तरह
फिर राह पकड़े जैसे उसे पंख उड़ाए लिए जा रहे हों
खंदक बेकार ही उसे आवाज़ देती है, उसमें रुकने की हिम्मत नहीं है
और अगर तुम पूछोगे कि क्यों नहीं है तो शायद वह मुड़कर कहेगा
उसकी पत्नी उसका इंतजार कर रही है और एक ज्यादा सांगत, सुन्दर मौत.
बेवक़ूफ़ अभागा! पिछले लम्बे अरसे से उन घरों पर
सिर्फ़ एक झुलसती हुई हवा बही है
उसके घर की दीवार ढह गई है, बेर का पेड़ टूट चुका है
और घर की साडी रातें दर से चीखती हैं
ओह, बस अगर मैं मान पाता कि जो कुछ भी सहेजने लायक है
वह सिर्फ़ मेरे दिल में ही नहीं है--कि धरती पर अब भी मेरा घर है
काश कि ऐसा है! पहले ही की तरह बेरों का ताज़ा मुरब्बा
पुराने बरामदे में ठंढा होता हुआ, चुप्पी में गुनगुनाती हुई मधुमक्खियां
गर्मियों के अंत की चुप्पी, उनींदी, धुप सेंकती,
वृक्षों पर पत्तियों के बीच झूलते हुए नंगे फल
और सुनहरे बालों वाली मेरी पत्नी मेरा इंतजार कर रही है कत्थई हाते की बाड़ी के पास
जहाँ सुबह धीरे-धीरे छाया पर छाया लिखती है
क्या यह सब हो सकता है ? देखो, आकाश में आज पूरा चंद है
मुझे छोड़कर न गुजर जाओ दोस्त, पुकारो, और मैं फिर उठ चलूंगा.

( १५ सितम्बर १९४४)
****
पिक्चर पोस्टकार्ड

बुल्गारिया से भारी, बेकाबू तोपों की धमक.
वह पहाड़ की रीढ़ से टकराती है, हिचकिचाती है और गिरती है.
आदमी, जानवर, गाडियां और ख़यालों का एक बढ़ता हुआ ढेर.
हिनहिनाकर सड़क अपने पिछले पैरों पर खड़ी होती है
आसमान अपनी अयाल लिए भाग रहा है. चलाचली के इस भूचाल में
तुम मुझमें हो, हमेशा के लिए
मेरे वजूद में तुम दमकती हो, चुप और अचल,
मौत के सामने गूंगे फ़रिश्ते की तरह या
एक सड़े हुए पेड़ के गढ़े में अपने को गड़ाते हुए कीड़े की तरह.

( ३० अगस्त १९४४)


ज्यादा नहीं यहाँ से नौ किलोमीटर दूर
खलिहान और घर जल रहे हैं
खेत की मेड़ पर बैठे हुए डेरे और गूंगे ग़रीब
तमाखू पी रहे हैं
भेड़ चराने वाली एक छोटी लड़की झील में उतारकर
पानी को थरथराती है
और थरथराती हुई भेड़ें पानी में इकठ्ठा होती हुईं
झुककर बादलों से पानी पीती हैं.

( ६ अक्टूबर १९४४)


बैलों के थूथन से खूनी फेचकुर लटक रहा है
हर आदमी खून की पेशाब कर रहा है
गारद जंगली गठानों जैसी खड़ी है गंधाती
और ऊपर घिनौनी मौत मंडराती.

(२४ अक्टूबर १९४४)


मैं उसके बाजू में गिर पड़ा, उसकी लाश उलट गई
जो अभी से ही उस रस्सी की तरह तन गई थी जो टूटने वाली हो.
उसकी गर्दन में पीछे से गोली मारी गई थी, 'तुम भी इसी तरह ख़त्म होगे'
मैंने फुसफुसाकर अपने से कहा : 'बस अब चुपचाप पड़े रहो'
धीरज अब मौत में फूलने वाला है
डेअर श्प्रिंगट नोख आउफ़ : ये सभी चल सकता है :
मेरे ऊपर एक आवाज़ ने कहा
मेरे कान पर कीचड-सना खून सूखने लगा.

( ३१ अक्टूबर १९४४)
****

खंड : ख : रदनोती पर विष्णु खरे

नवम्बर १९४४ को एक फ़ौजी दस्ते ने मिक्लोश रादनोती को गोली मार दी. रादनोती तब ३५ वर्ष के थे. नात्सी जर्मनी की फ़ौज की निगरानी में वे बेगार करने वाले कैदी मजदूरों की एक बटालियन में थे और उस समय सर्बिया में काम कर रहे थे, लेकिन जब पूर्वी मोर्चे से धुरी शक्तियों की सेनाओं ने पीछे हटना शुरू किया तो वे अपने साथ कम करने वाले इन बंदी मजदूरों को भी हंगरी से होते हुए पश्चिम में खदेड़ कर ले जाने लगीं. उत्तर पश्चिम में अब्दा नामक गाँव के पास जो मजदूर कैदी इतने कमज़ोर हो गए थे कि जर्मनी नहीं जा सकते थे, उनके पहरेदारों ने उनकी हत्या कर दी और एक सामूहिक कब्र में उन सबको दफना दिया. जब विश्व युद्ध समाप्त हो गया और अगले साल वे सारी लाशें खोदकर निकाली गईं तो रादनोती की बरसाती में एक नोटबुक मिली जिसमें कवितायें लिखी हुई थीं--कुछ तो उनकी मौत से कुछ ही दिनों पहले लिखी गई थीं. यह कवितायें मानो एक कठोर क्लासिकी नियंत्रण में लिखी गई कवितायें हैं, नपे-तुले शब्दों वाली, अपने शिल्प में लगभग सम्पूर्ण--ये कवितायें हैं जिन पर युद्ध की भयावह छाया है और जो कवि के इस अहसास से संपृक्त हैं कि उसकी मृत्यु समय से पहले होनी तय है. लेकिन फिर भी ये कवितायें उन मानवीय भावनाओं और मूल्यों के प्रति पूर्णतया प्रतिबद्ध हैं जिन्हें मानव सभ्यता ने पोसा है. दरअसल इन अन्तिम कविताओं की ''रूपवादिता'' और सूक्ष्मता ही उन भावनाओं और मूल्यों की अभ्व्यक्ति है और कवि की प्रतिबद्धता की घोषणा करती है. करीब दस वर्षों से मिक्लोश रादनोती स्वयं को ऐसी मृत्यु के लिए तैयार कर रहे थे. उनकी कविताओं को उनके कालक्रम में पढ़ना उस प्रक्रिया को थोड़ा-बहुत समझना है जिसमें एक व्यक्तिगत प्रतिभा ऐतिहासिक घटनाओं से विकसित होती है--साथ ही यह भी जानना है कि प्रतिभा अपने समय के इतिहास में किस तरह एक अर्थ देख लेती है. 

रादनोती का जन्म बुदापेश्त में १९०९ में हुआ था. वे यहूदी थे किंतु ऐसा लगता है कि उन्हें अपने धर्म या जाती से कोई विशेष लगाव नहीं था--यद्दपि ऐसा कहा जा सकता है कि शायद अनजाने ही उनकी कविता पर उनके धर्म ने प्रभाव डाला है. बचपन में उन्हें किसी तरह का स्नेह या सुरक्षा नहीं मिले. उनकी माँ तथा एक जुड़वां भाई की मृत्यु प्रसव के समय ही हो गई थी और पिता भी उसके बाद बहुत ज़्यादा समय तक जीवित नहीं रहे. जिन धनवान चाचा ने मिक्लोश को पाला उनके प्रति मिक्लोश की भावनाएं न बहुत अच्छी थीं और न बुरी, हालाँकि चाचा ने उनके साथ कोई दुर्वयवहार नहीं किया और उचित ढंग से पला-पोसा और पढ़ाया-लिखाया. 

इस शताब्दी के तीसरे दशक में मध्य यूरोप के प्रायः सरे देशों में राजनेतिक स्थिति बदतर हो काहली थी और मिक्लोश रादनोती को भी अपनी असुरक्षा का अहसास होने लगा. १९२० से १९२४ तक हंगरी पर एडमिरल होर्थी का छद्म-संसदीय शासन था. होर्थी एक अति -प्रतिक्रियावादी, सतर्क तानाशाहनुमा शासक था जिसने हर प्रकार के राजनीतिक विरोध या प्रतिवाद को कुचलने की कोशिश की. अपनी अवसरवादी महत्वाकांक्षा से प्रेरित होकर उसने हंगरी को हिटलर के सुपुर्द कर दिया. समाजवादी तथा बुद्धिजीवी रादनोती के लिए होर्थी सरकार घृणित थी.

१९३४ में जब रादनोती ने सेगेद विश्वविद्यालय से हंगारी और फ्रेंच भाषाओं में विशेष योग्यता के साथ स्नातक उपाधि प्राप्त की तब उनके तीन काव्य-संग्रह प्रकाशित हो चुके थे. उनकी प्रारंभिक कविताओं पर तीन प्रमुख प्रमुख प्रभाव थे--फ्रांसीसी अवां-गार्द, जर्मन अभिव्यक्तिवाद तथा रचनावाद का वह हंगारी संस्करण जिसे प्रसिद्द हंगारी समाजवादी कवि तथा सिद्धांतकार लायोश कस्साक के साथ जोड़ा जाता है. रादनोती की पहली किताब, ''एक मूर्तिपूजक का स्वागत'' ( पोगानी कोसोंतो) अधिकतर भावुकतापूर्ण, वाल्ट विटमैन जैसी जीवन, प्रकृति और शारीरिक प्रेम की कविताओं की है. लेकिन आगामी, वयस्क रादनोती की झलक भी कुछ पंक्तियों में मिल जाती है जिनमें एक अलग ही ऊष्मा, विषाद और इसाई प्रतीकवाद के स्पर्श मिलते हैं. १९३२ के आसपास मिक्लोश रादनोती अपने दिशाहीन, वायवीय विद्रोह से मुक्त हुए और एक ज्यादा ठोस अभिव्यक्ति की ओर मुड़े--राजनीतिक प्रतिवाद उनकी कविता का एक महत्वपूर्ण अंग बन गया. इस दौर में रादनोती पर मार्क्सवाद का प्रभाव पड़ा पर उनमें कठमुल्लापन नहीं था. इसी बीच उन पर कैथलिक कवि-धर्मगुरु शान्दोर शिक का प्रभाव भी पड़ा. धीरे-धीरे रादनोती केवल,''सर्वहारा कवि'' ही नहीं रहे, बल्कि देशी-विदेशी राजनितिक घटनाओं में उनकी दिलचस्पी और उन्हें लेकर उनकी चिंताएं और गहराने लगीं. वे मानो एक भूकंप सूचक यंत्र बन रहे थे--एक ऐसा संवेदनशील औजार जो विस्फोट को होने से बहत पहले महसूस कर लेता है.

हिटलर सरीखी भयावह शक्तियों के उदय को रादनोती जैसे एकदम पहचान गए थे. सितम्बर १९३४ में लिखी एक कविता में वे कहते हैं :

उसे बचाने के लिए उसे तुम अपनी बाहों में लेते हो
जबकि तुम्हारे आसपास दुनिया तुम्हारी टाक में छिपी है
आखिरकार अपने लम्बे चाकुओं से तुम्हे ख़त्म कर देने के लिए

इसमें कोई शक नहीं कि संकेत नात्सी बर्बरता की और है. इसके बाद से रादनोती ने स्वयं को एक अभिशप्त आदमी समझा. उस समय जर्मनी जैसा नात्सीवाद हंगरी से दूर था लेकिन रादनोती एक भयावह भविष्य को देख प् रहे थे. सारे यूरोप में मानव-विरोधी नृशंस शक्तियां सिर उठा रही थीं और रादनोती के मस्तिष्क में अपनी स्वयं की नियति तथा पहले से ही पीड़ित लोगों के प्रति सहानुभूति मानो एकाकार हो गए. स्पेनी गृह युद्ध से पहले वर्ष में प्रकाशित उनके काव्य-संग्रह का शीर्षक इसका गवाह है : 'चलते रहो, तुम मृत्यु-अभिशप्त' ( १९३६). रादनोती ने समस्या का हल खोज निकला था. उनके लिए सवाल यह नहीं था कि 'क्या मैं मरूँगा?' या 'क्या मैं मर सकता हूँ', बल्कि सवाल था, 'मैं कैसे मरूँगा?' एक कविता में वे पूछते हैं, 'और जहाँ तक तुम्हारा सवाल है, नौजवान, किस तरह की मौत तुम्हारी राह देख रही है?' अपनी उम्र के बचे हुए आठ वर्षों में यह 'मृत्यु-शैली' ही उनकी केन्द्रीय चिंता थी.

रादनोती के वयस्क कृतित्व में अपनी क्रूर मृत्यु का यह निर्विकार चिंतन लगभग एक रुग्न ग्रंथि की तरह मौजूद है. इसका कारन क्या है? कुछ मनोविज्ञानंवादी आलोचकों ने इसकी जड़ें एक अपराध-भाव में खोजी हैं--रादनोती को जन्म देते समय ही उनकी मान तथा उनके साथ पैदा होने वाले जुड़वां भाई की मृत्यु हो गई थी. रादनोती इसे कभी भुला नहीं सके और स्वयं को दोषी समझते रहे. कुछ कविताओं में यह अपराध-भाव उपस्थित भी है किन्तु रादनोती की कविताओं में मृत्यु की रुग्न इच्छा अथवा उसका रुग्न वरण कहीं नहीं है. यदि कुछ है तो यह कि उनकी कविता मृत्यु के अहसास में डूबी हुई है. इस अहसास को जिन तत्वों ने गहराया वे हैं उनका यहूदी होना, बलिदान की ईसाई अधर्ना में उनकी दिलचस्पी ( युद्ध के दौरान वे रोमन कैथलिक हो गए थे) और यूरोप के तत्कालीन विनाशकारी संकट के बीच मानवतावादी परंपरा के भविष्य की चिंता.

इस बिंदु पर लोर्का का एक महान प्रतीकात्मक महत्व के व्यक्तित्व के रूप में प्रकट होते हैं. अन्य कई लोगों की तरह जिनकी सहानुभूति स्पेनी गणतंत्र से थी, रादनोती को भी विश्वास था कि लोर्का की हत्या राष्ट्रवादियों ने की थी. यदि ऐसा था तो यह भी स्पष्ट था कि लोर्का को उनकी जाती अथवा क्रन्तिकारी आस्था के कारन नहीं मारा गया था. रादनोती की व्याख्या यह थी कि लोर्का को मरना ही था, क्योंकि जनता उन्हें चाहती थी और साफ़ बात तो यह थी कि वे कवि थे--जीवन-शक्तियों के प्रवक्ता थे. उनकी मृत्यु के पीछे एक सदा-सा समीकरण था : फ़ासीवाद यानी युद्ध यानी मृत्यु. फ़ासीवाद कवियों को सिर्फ इसलिए मार डालता है कि वे कवि होते हैं.

जब रादनोती ने इसे समझ लिया और उसे अपनी नियति के रूप में स्वीकार कर लिया तो भौतिक विश्व के बारे में उनकी पूरी धरना बदल गई. 'एक मूर्तिपूजक स्वागत' के मनोहर प्रकृति-चित्र तिरोहित हो गए. वे बादलों में अपशकुन देखने लगे, शांत बगीचों में विचित्र चीत्कार और सिसकियाँ सुनने लगे और पतझड़ के सौन्दर्य को एक ऐसे व्यक्ति की आँखों से देखने लगे जिसके दिन गिने हुए हैं. ऐसा नहीं था कि उनकी कविताओं से उल्लास चला गया लेकिन वह उनमें एक चिंता के रूप में आया. रादनोती अपने भविष्य के प्रति कभी भी आश्वस्त नहीं हुए किन्तु उन्हें कुछ पारिवारिक सुख अवश्य मिला. १९३५ में उन्होंने अपनी प्रियतमा फान्नी दयारमाती से विवाह किया जिनके प्रेम ने उन्हें आगामी वर्षों की तकलीफों को बर्दाश्त करने की शक्ति दी. रादनोती की अंतिम कविताओं में भी उनमें फान्नी की अदम्य आस्था और अडिग प्रेम प्रतिबिंबित होते हैं.

जब दूसरा विश्व-युद्ध मंडराने लगा तब हंगरी धीरे-धीरे धुरी शक्तियों के शिविर में शामिल हो गया. जब सरकार ने १९३८ और १९३९ में यहूदी-विरोधी कानून लागू किये तो रादनोती की साडी आशंकाएं सच साबित हुईं. १९४१ में जर्मन फौजों को हंगरी से होकर युगोस्लाविया पर हमला करने की अनुमति दी गई और युगोस्लाविया का जीता हुआ एक हिस्सा हंगरी ने हथिया लिया. इसी वर्ष होर्थी सरकार ने सोवियत रूस से युद्ध की घोषणा कर दी और इस तरह वह खुल्लमखुल्ला धुरी शक्तियों में शामिल हो गई. मार्च १९४४ में जर्मन फौजों का आधिपत्य हो गया और होर्थी को गर्मन राजदूत द्वारा नामजद सरकार को स्वीकार करने पर मजबूर होना पड़ा.

इन घटनाओं के बीच रादनोती को जिस भयावह व्यक्तिगत नियति की प्रतीक्षा थी वह धीरे-धीरे पूरी हुई. १९४० के बाद उन्हें कई बलात बनाये गए मजदूरों की बटालियनों में भारती किया गया. बुदापेस्त पर नात्सी कब्जे के फ़ौरन बाद उन्हें युगोस्लाविया में बोर नमक स्थान कि जर्मन-संचालित तांम्बे की खान में भेजा गया. वहां उन्होंने बोर और बोग्रद के बीच रेल-पटरी बिछाने का काम किया. वहीँ उन्होंने अपनी कुछ सर्वश्रेष्ठ कवितायेँ भी लिखीं और जब १९४४ की पतझड़ में बोर का कैदी-शिविर खली किया गया तो रादनोती और उनके मजदूर-साथियों का वह जबरन कूच शुरू हुआ जिसकी परिणति उनकी हत्या में हुई.

अंतिम कविताओं में रादनोती को जीवित रहने की चिंता कम ही सता रही थी--वे इतिहास के महान मुक़दमे में एक गवाह बन गए थे. अपने जीवन के अंतिम दशक में वे वह उपलब्ध करने का यत्न कर रहे थे जिसे उनके समकालीन, एक और महान हंगारी कवि, अतिला योझेफ़ ने 'हीरक चेतना' कहा है --अपने सरे आध्यात्मिक तथा बौधिक साधनों को काव्यात्मक ऊर्जा की एक्सशाक्त किरण में परिणत कर देना. एक ओर उनकी कविता में यहूदी-ईसाई परम्परा दिखाई देती है तो दूसरी ओर इसे सम्पूर्ण बनती हुई समाजवादी जीवन-दृष्टि. चौथे दशक के अंतिम वर्षों के राद्नोती और १९४४ के राद्नोती में एक मौलिक अंतर है--पहले जहाँ ऐसा लगता था कि कवियों का (लोर्का की तरह) रहस्यमय ढंग से लापता हो जाना अपरिहार्य है, वहां बाद में अपनी मृत्यु के समीप आते-आते रादनोती ने समझ लिया था कि कविता में सत्य का पक्ष लेना चुनौती या आत्म-रक्षा नहीं है बल्कि खतरे में पड़े मूल्यों के साथ एकात्म होना और इस तरह उन्हें जीवित रखना है. कवि के रूप में रादनोती ज्यों-ज्यों वयस्क होते गए--लगता है कि उन पर विपत्ति जितनी बढती गई उनकी प्रतिभा उतनी ही निखरती चली गई--उनकी कविता छंद, मात्रा और लय की एक क्लासिकी शुद्धता की ओर पहुँचती चली गई. सत्य और रूपाकार के प्रति उनकी प्रतिबद्धता चरम सीमा की थी. उनके 'पिक्चर-पोस्टकार्ड', जो मृत्यु की कूच करते हुए लिखे गए हैं, मनो नरक से भेजे हुए छोटे-छोटे सन्देश हैं. युद्ध की विभीषिका के आकलन में वे निर्भीकता से वास्तविकतावादी हैं लेकिन एक बेहतर ज़िन्दगी की सम्भावना का स्वप्न देखना वे कभी नहीं भूलते. युद्ध की आग में गाँव जल रहे हैं लेकिन एक गडडडिया लड़की अभी भी अपनी मामूली ज़िन्दगी के रोजमर्रा काम में लगी हुई है और अपनी अंतिम कविता में, मृत्यु के कुछ दिन पहले, अपनी मौत को बगैर घबराये हुए ठीक-ठीक देख लेते हैं :

उसकी गर्दन में गोली मरी गई, 'तुम भी इसी तरह ख़त्म होगे'
मैंने खुद से फुसफुसाकर कहा : बस चुपचाप पड़े रहो.
धीरज अब मौत में फूलता है.

रादनोती को 'कैदी मजदूरों का' फ़ासीवाद विरोधी' कवि कहा गया है. लेकिन उन्हें सिर्फ इतना ही कहना उनके साथ अन्याय करना है. इसमें संदेह नहीं कि यह जानना अनिवार्य है कि रादनोती की कवितायेँ समसामयिक इतिहास के एक जघन्यतम दौर के निजी अनुभवों की कवितायेँ हैं. लेकिन अधिक महत्व इस बात का है कि रादनोती सरीखा महान कवि ही ऐसे अनुभवों से कवितायेँ बना सकता है और इसके लिए जिस साहस की आवश्यकता होती है वह रादनोती की सर्जनात्मक प्रतिभा का अविभाज्य हिस्सा था. रादनोती की महानतम उपलब्धि यह है कि वे अपने युग की विभीषिकाओं को लेकर मुखर रहे और उन्हें विलक्षण और शांत कविताओं में परिणत कर सके. रादनोती के मित्र तथा प्रसिद्द हंगारी कवि इश्त्वान वाश ने ठीक ही कहा है कि रादनोती के कृतित्व की नैतिक और कलात्मक पूर्णता को, उसके सत्य को, और सौन्दर्य को, अलग-अलग देखना असंभव है. इश्त्वान वाश कहते हैं, '' ( मिक्लोश रादनोती की कवितायें ) उन विरली उत्कृष्ट कृतियों में हैं जिनमें कलात्मक और नैतिक पूर्णता दोनों होती हैं...वे सिर्फ़ रोमांचक कृतियाँ नहीं हैं, सिर्फ़ वाकई महान कविताएं नहीं हैं, बल्कि मानवीय और कलात्मक निष्ठा का एक ऐसा उदाहरण हैं जो जितना विचित्र और संकोच में डालनेवाला है उतना अनिवार्य भी है.''
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Sunday, December 13, 2009

निधन : दिलीप चित्रे


ज़िन्दा रहने के साहस की एक अनिवार्य मुद्रा


दिलीप चित्रे कैंसर से पीड़ित थे. लेकिन इतने जिंदादिल कि आप उनसे मुखातिब होकर यह अंदाज़ तक नहीं लगा सकते थे. वो आपसे प्रसन्न गप्प लगाते थे. वो कविताओं के बारे में बात करते थे. राजनीति पर भी. जब राज ठाकरे ने अपनी बदमाशियां शुरू की थी, खासकर हिंदी पट्टी के लोगों को मुंबई में अपनी गुंडई से परेशान करना शुरू किया था, दिलीप ने मेरे आग्रह पर नवभारत टाइम्स में ''राज-नीति'' का प्रतिवाद करते हुए एक बड़ा लेख लिखा था. दिलीप छोटों को मान देना जानते थे. उससे पहले उन्होंने सबद के लिए अपनी कविताएं दी थी, जिसे युवा कवि तुषार धवल ने अनूदित किया था. हालाँकि दिलीप की कविताओं से मेरा परिचय उस दुबली-सी कविता-पुस्तक से हुआ था, जिसे चंद्रकांत देवताले ने मराठी से अनूदित किया था. कविताओं के अनुवाद में राजेंद्र धोड़पकर ने भी सहयोग किया था जिनसे बाद में उनकी कविता पर बात करने के अनेक अवसर आए. दिलीप अंग्रेजी और मराठी में लिखते हुए भी हिंदी के लिए अजाने नहीं थे. हिंदी में उन्हें पसंद करनेवाले, उनसे निकटता महसूस करनेवालों का एक बड़ा जागरूक समाज है, और इस समाज को अब उनका न होना बेतरह सालता है.

दिलीप की कविताओं के लाउड, लोडेड और एब्सर्ड टेम्परामेंट की ओर लोगों का ध्यान अक्सर गया है, पर इसके भीतर मराठी संत-कवियों ज्ञानदेव, नामदेव और तुकाराम के ज़ज्ब होने की बात लगभग अलक्षित गई है. उन्होंने अपनी कविताओं के बारे में कभी लिखा था : '' मेरी कविता-- चाहे वह मराठी में लिखी गई हो चाहे अंग्रेजी में, मराठी सांस्कृतिक परम्पराओं की गहराइयों से उपजी है...और इसीलिए वह मेरी भारतीयता का विश्वमुखी आविष्कार भी है.'' मेरे ख़याल में दिलीप को पढ़ते हुए दूसरी कई बातों के साथ इसका भी ध्यान रखना चाहिए. उन्होंने कविता को अपने लिए ''ज़िन्दा रहने के साहस की एक अनिवार्य मुद्रा तथा न्यास'' कहा था. उन्होंने अंत तक यह साहस बरकरार रखा. इस चंचल समय में दिलीप चित्रे की यह दृढ़ता याद आएगी, कइयों को यह निश्चय ही अनुकरणीय भी जान पड़ेगी.

( १० दिसम्बर, २००९ की सुबह दिलीप चित्रे का निधन हो गया. वे ७१ वर्ष के थे. )

Saturday, December 05, 2009

सबद विशेष : ८ : व्योमेश शुक्ल की लम्बी कविता


(अपने पहले संग्रह की सत्तावन कविताओं के बाद व्योमेश किस तरफ रुख करते हैं, इसका हम कविता-प्रेमी पाठकों को बेसब्री से इंतजार था. उनकी इस ५८ वीं कविता से, जो सबद के साथ-साथ रंग-प्रसंग के नवीनतम अंक की भी शोभा है, यह बात पुष्ट होती है कि वे अपनी कविता का एक सफल चक्र पूरा कर उसे दुहराने की बजाए अभी कुछ और पाने का दुर्लभ यत्न कर रहे हैं और उनकी अब तक की प्राप्ति को उनके रहबर चंद दूसरे कवियों की कविताओं के साथ मिलाकर देखें तो इधर की कविता पर इतरा लेने की पर्याप्त वजहें हमें आसानी से मिल जायेंगीं. व्योमेश के यहाँ शिल्प, भाषा और कथ्य के स्तर पर निरंतर सजगता बरती गई है और यह सजगता ही 'लीलामय' जैसी कविता संभव करती है. इसका विन्यास धोखेबाज़ है. विस्तार हैरत में डालनेवाला. आज और आज से पहले व्योमेश की अन्य कविताओं की तरह यहाँ भी अनिवार्य सन्दर्भ-बिंदु हैं और इनके '' बीच लीला लगातार होती रही - भले ही कुछ दूरी पर, याने जिन घटनाओं, लोगों, परिस्थितियों के ज़रिये इतिहास ख़ुद को घटित कर रहा था या कर रहा है, लीला उनके समानान्तर रहकर हो रही थी या हो रही है - शायद उनसे दूर रहकर ही या उनसे दूर रहकर भी''.कविता इन लीलाओं को दर्ज करती है और हम जो पढ़ते हुए कविता में ऐसी लीलाओं के अभ्यस्त नहीं हैं, उन्हें भी विचित्र ढंग से लीला में लपेटती है. सबद विशेष की इस आठवीं पेशकश में व्योमेश शुक्ल की यह पहली लम्बी कविता. दिया गया चित्र एक इंडोनेशियाई कलाकार का है. )


लीलामय
1
पानी में पांच बत्तख तैर रहे थे। तट पर खड़ा आदमी मछली को खाना खिला रहा था। निषादराज भगवान कीं आरती कर रहे थे। भगवानजी उस पार जाना चाह रहे थे। बच्चे मुहल्लेवाले प्रजा लग रहे थे। कविता गाई जा रही थी। एक आदमी गाय को सानी-पानी दे रहा था। मेला लगा हुआ था। बच्चे को पानी-भगवानजी-मेले-बत्तख-मछलियों-गायों में से हरेक बहुत अच्छा लग रहा था। उसे मालूम नहीं होगा या जो भी हो, वह उस पानी को नदी कहना चाहता था। मैं उससे कहना चाहता था कि ‘नहीं’ तो वह ‘नहीं’ सुनना नहीं चाहता था। वह पानी के बारे में कुछ पुराना सुनना चाहता था। मैं पानी के भविष्य को लेकर परेशान होना चाहता था। वह मुझी को लेकर परेशान होना चाहता था। यह कहने में कि ‘भविष्य में पानी ख़त्म हो जायेगा’, पानी की बड़ी बर्बादी थी। पानी के ख़त्म होने से पहले ही पानी के ख़त्म होने की उदासी में मैं एक अतीत था। पानी के पुराने को जानने में बच्चे की दिलचस्पी पानी का भविष्य थी। कभी-कभी चीज़ें उल्टी दिखाई देती हैं। मैंने पानी को उल्टा करके देखा तो पानी सीधा था । नदी को उल्टा बहा देने से प्रदूषण की समस्या का क्या होगा सोचता हुआ मैं उल्टी गंगा बहाने वाला मुहावरा हो गया था। शहर भर के सीवेज को उल्टा बहा देने से क्या होगा? निपटना दूभर हो जायेगा और क्या? जिन शहरों के किनारे नदियाँ नहीं होतीं, जैसे बंगलोर, वहाँ के लोग क्या टट्टी-पेशाब नहीं करते? आप मान लीजिए कि आपके शहर से होकर कोई नदी नहीं गुज़रती, बस, उसमें मत विसर्जित कीजिए अपनी अशुचि। यह मानते ही कि बनारस के किनारे से नहीं बहती गंगा, गंगा बनारस के किनारे बहने लगेगी। उसकी अनुपस्थिति का यक़ीन ही उसकी उपस्थिति की उम्मीद है। मैं स्मृति की गंगा में नहाकर मुमुक्षु हो जाता हूँ । तुम एक शब्द लिखो साफ़ काग़ज़ पर गंगा। सुबह पाओगे कि वह काग़ज़ फिर से पेड़ हुआ जाता है।

2
लीला शुरू हो गई है। राम, लक्ष्मण और सीता वनवास के लिए जा रहे हैं। राजस्व सूखा पत्ता है। अब गिरा कि तब गिरा। अब श्रृंगवेरपुर दूर नहीं और नन्दीग्रामों की ऋतु क़रीब है। निकलने से ठीक पहले भगवान व्यासजी की ओर देखकर मुस्कराते हैं। व्यासजी भी।

वाक़ई लीला शुरू हो गई है।

3
रामचन्द्र शुक्ल ने पता नहीं रामलीला का केवट प्रसंग देखा था कि नहीं। नहीं तो उनसे पूछा जाता कि भगवान को नाव पर बिठाने से पहले वह कबीर का भजन क्यों गाता था?

4
मैं पेड़ का अभिनय करना चाहता रहा हूँ। पेड़ की तरह दिखना चाहना भी है मुझमें। लेकिन इतने थोड़े से समय में मैं किस-किस का अभिनय करता फिरूँ? ख़ुद का, नागरिक या दो बच्चों के पिता का, बेटे या दोस्त का। मैं एक लड़की के फूटे हुए माथे का अभिनय करता हूँ जिसकी वजह से उसकी शादी में दिक्क़त आयेगी। एक टीबी-ग्रस्त फेफड़े का भी अभिनय किया है कुछ दिनों तक। उसमें साँस फूलने लगती है।

5
लीला में अभिनय नहीं है। अभिनय है टीवी सीरियलों में। यहाँ भगवान की, स्वरूपों की झाँकी है। रामलीला का तर्क यह है कि जो होते हैं वे अभिनय नहीं करते।

6
भरत बड़े भाई को मनाने आते हैं तो चौदह बरस के वियोग के बाद होने वाले भरतमिलाप के पहले एक बार और भरतमिलाप हो रहा है। अब दो भाई चौदह बरस बाद गले मिलेंगे याने वन जाते ही मिलने का मुहूर्त चौदह वर्षों के लिये स्थगित।

7
ये भविष्य में होना था कि नहीं होना था। अभी तो होना था। उनकी चोटों और अपने सीने के साथ। लगातार और बेसबब। आदमी होने की ऊब थी। यानी आदमी पुनः अपने होने से ऊब गया।

8
लेकिन तुम्हारे सवाल किसी को बेगाने बनाते हुए न हों, जैसे वे अक्सर होते हैं। और अभी कोई ऐसा सवाल मत पूछना जिससे पता लगे कि तुम शामिल नहीं थे या उपस्थित नहीं थे। शामिल न होने का पश्चाताप मौन में है और कहीं से भी, किसी भी छूटे हुए बिन्दु से शामिल हो जाओ, तुम्हारे जवाब अपने आप, कभी न कभी, तुम पर छा जायेंगे और बरस कर तुम्हें भिगो देंगे। तुम्हारे ऊपर ज़ाहिर हो जायेंगे।

सच कहने में इतनी बाधाएँ थी कि बाधाओं के बारे में बताना ही सच बताना हो गया था।

9
एक सज्जन हैं। अतिवृद्ध। रामलीला के दौरान उनके कंधे पर मृदंग टॅंगा रहता है जिसे वह ख़ुद नहीं बजाते। उन्हें मृदंग बजाना आता भी नहीं। मृदंग के लिये उनका कंधा ही प्रासंगिक है, हथेली और उंगलियाँ नहीं। जो लीलाएँ एक से अधिक जगहों पर या दो जगहों के दरम्यान चलते-चलते होती हैं वहाँ उनका कंधा काम आता है। तब मृदंग उनके कंधों पर टंगा रहता है और दूसरा आदमी उसे बजाता है। तब वह कंधा एक चरित्र बन जाता है - एक मूर्तिमान स्वरूप। उसकी वजह से ध्वनि होती है। उसकी मेहनत से संगत संभव होती है। मानस की पंक्तियों के गान में उस कंधे का आकार है। मैं उन सज्जन को करीब बीस साल से जानता हूँ, लेकिन उनके कंधे को कितना जानता हूँ ? कोई भी उस कंधे को कितना जानता है? रामलीला के सुदूर विराट अतीत में उस कंधे को हम कहाँ रखते हैं? और इन कंधों के बग़ैर रामलीला का गुणगान कितना वाजिब होगा?

परम्परा अक्सर ऐसी ही मुश्किल है।

10
लीला समय के ठीक बीच में घटती घटनाओं में नहीं, उनकी बग़ल में सम्पन्न होती रही है। इस तरह अनुमान लगाना आज कुछ विचित्र, कुछ काव्यात्मक लगता है कि कम से कम साढ़े चार सौ साल पुरानी यह लीला इतिहास के ज़रूरी मौक़ों पर, ख़ास जगहों पर क्या करती होगी? अंग्रेज़ों के बनारस समेत पूरे देश पर कब्ज़ा करते समय भी राम सूपर्णखा की नाक काट रहे होंगे, चन्द्रशेखर आज़ाद जब महात्मा गाँधी की जय-जयकार करते हुए अपनी पीठ पर कोड़े खा रहे थे, तब भी रावण सीता का अपहरण कर रहा होगा। 1942 के भारत छोड़ों के वक़्त भी राम अयोध्या छोड़कर जा रहे होंगे। इसी तरह आज़ाद भारत की प्रमुख घटनाओं के मद्देनज़र भी लीला को सोचा जा सकता है। इस बीच लीला लगातार होती रही - भले ही कुछ दूरी पर, याने जिन घटनाओं, लोगों, परिस्थितियों के ज़रिये इतिहास ख़ुद को घटित कर रहा था या कर रहा है, लीला उनके समानान्तर रहकर हो रही थी या हो रही है - शायद उनसे दूर रहकर ही या उनसे दूर रहकर भी। जैसे इतिहास के यन्त्र से अलग एक छोटा, फालतू-सा लेकिन लगातार चलता पुर्जा। एक कुटीर उद्योग। धाराप्रवाह के बरअक्स एक मौन तटस्थता।

11
रामलीला ने स्वयं को वस्तुओं पर कम से कम निर्भर किया है। जो वस्तुएँ वहाँ हैं, ठोस और पारंपरिक हैं। वे अनिवार्य भी हैं। उन्हें किसी दूसरी वस्तु या युक्ति से ‘रिप्लेस’ नहीं किया जा सकता। उन वस्तुओं की जड़ें लीला के समस्त सन्दर्भों, लीला से जुड़े लोगों, लीला से जुड़े मृतकों, लीला की स्मृति और समाज में लीला के व्यापक विस्मरण तक फैल गई हैं। उन ‘कम’ वस्तुओं का, लीला की ही तरह, व्यक्तित्व है। ये वही वस्तुएँ हैं जो थीं और हमेशा, लगभग हमेशा से हैं। ये वे वस्तुएँ नहीं हैं जो पहले नहीं थीं और अब हो गई हैं। मसलन, लीला में बैकड्राप नहीं है। एक बार किसी आधुनिक नाट्यविद ने इस लीला के संयोजकों से पूछा कि अगर आप लीला में पर्दों का इस्तेमाल नहीं करते तो एक दृश्य को दूसरे दृश्य से अलग कैसे करते हैं और रंगक्षेत्र (थियेट्रिकल स्पेस) को दूसरे आमफ़हम स्पेसेज़ से अलग कैसे करते हैं? जवाब में लीला संयोजकों ने अपने कामकाज जैसी सरल और बुनियादी बातें कहीं। उन्होंने कहा कि हमारी लीला में पर्दा तो है, बस थोड़ा बड़ा और थोड़ा दूर है। वह पर्दा दरअसल आकाश का पर्दा है और हमारा अलग से कोई स्पेस नहीं है जो ज़्यादा नैतिक या ज़्यादा पवित्र हो। समूची सृष्टि ही हमारे भगवान जी की लीला स्थली है- उनका अपना स्पेस। इसलिए हम स्पेस को स्याह-सफ़ेद में विभाजित करके देख नहीं पाते हैं। हम स्पेस को संक्षिप्त और विशिष्ट भी बना नहीं पाते।

12
यह आश्चर्य है कि आधुनिक रंगप्रयत्नों ने रामलीला की पारंपरीणता से कुछ ख़ास नहीं सीखा, बल्कि कुछ नहीं सीखा। यह दुर्भाग्य भारतेन्दु की उपस्थिति के बावजूद घटित हुआ और बनारस में घटित हुआ। अगर महाकाव्यात्मकता के मंचन की रामलीला जैसी उदार, भगीरथ कोशिश के साथ आधुनिकता की स्वस्थ अंतर्क्रिया सम्भव हुई होती तो जयशंकर ‘प्रसाद’ के नाटकों को अनभिनेय इत्यादि बताकर टालने का पलायन भी न हुआ होता। तब आधुनिक रंगमंच इतना ‘यथार्थवादी’, इतना अभिनय-निर्भर, इतना पूर्वनियोजित, इतना पूर्वानुमेय न हुआ होता। तब रंगमंच में जादू, रहस्य, कल्पना और अप्रत्याशित के लिए ज़्यादा जगह होती। तब ‘मानस’ की तरह दूसरी कविताओं को भी नाटक माना जा सकता। तब नाटक में ‘टेक्स्ट’ की ज़रूरत कुछ कम होती। अगर हिन्दी आधुनिकताएँ रामलीला से सीख पातीं तो आज की कविता कुछ ज़्यादा नाटक होती। और कुछ कम कविता।

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नयी जिज्ञासाएँ पूछती हैं कि आधुनिक थियेटर की तरह लीला एक ही जगह पर क्यों नहीं होती? वह इधर-उधर घूम-घूमकर, एक से दूसरी जगह जाकर, दो जगहों के बीच के सफ़र में भीड़, ट्रैफिक, शोर, साधारणता और अन्य दिक्कतों के धक्के खाकर क्यों होती है? इसका एक जवाब यह है कि मुगल काल और अंग्रेज़ों के ज़माने में औरतों पर जिस तरह की बन्दिशें थीं उनके भीतर रहकर वे किसी सार्वजनिक स्थल पर जाकर मेला-तमाशा नहीं देख सकती थीं। उनके लिए ही, उनके मनोरंजन की ख़ातिर ही ये लीलाएं अपने स्थायित्व, अपनी रिहाइश में से किसी जुलूस की तरह, किसी प्रभातफेरी की तरह या बंजारों के किसी समूह की तरह निकलकर भटकने लगी होंगी। इसके बाद औरतें घरों, छतों, मुंडेरों और बरामदों से लीला के कुछ हिस्से, लीला की झाँकी देख सकती थीं। अपने घर अर्थात् मंच से लीला के निर्वासन का तर्क स्त्री की कैद को कुछ कम करने की कोशिश में भी है।

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सूपर्णखा की नाक काटने का प्रसंग सभी लीलाओं में जोर-शोर से मनाया जाता है। सूपर्णखा की भूमिका हिजड़ा निभाता है। एक कटोरी में हिजड़ा औरतों के पाँव में लगने वाला महावर लिये खड़ा रहता है। जैसे ही लक्ष्मण अपने तीर का स्पर्श (स्पर्श भर) उसकी नाक से कराते हैं, नाक कट जाती है और कटोरी में रखा महावर खून हो जाता है और सूपर्णखा उसे चीख-पुकार, रोष और विलाप के साथ मिलाकर चारों ओर फेकनें लगती है। फिर बड़ा भारी जुलूस निकलता है - गाजेबाजे और तामझाम के साथ। यह जुलूस कई किलोमीटर लम्बा होता है। बहुत से हाथी, ऊँट, घोड़े, रथ और काली का मुखौटा पहने तलवारबाज़ आगे-आगे चलते हैं। इनके भी आगे खर और दूषण के दैत्याकार पुतले। पीछे बैलगाड़ियों, ट्रालियों, ट्रेक्टरों और ट्रकों पर मिथकों, किंवदंतियों, पुराकथाओं और समकालीन जीवन-समस्याओं पर आधारित झाँकियाँ। ये सैकड़ों होती हैं। अधिकतर झाँकियों में बच्चे ही भूमिकाओं में होते हैं। यह लीला आधी रात से शुरू होती है और सुबह तक चलती है। यह रतजगे की लीला है। लीला-क्षेत्र में पड़ने वाले घर इस रात मित्रों, रिश्तेदारों, ससुराल से पधारी बहनों, बेटियों और उनके बच्चों का उपनिवेश बन जाते हैं। कुछ लोग खिड़कियों और मुंडेरों की सोहबत में नक्कटैया देखना पसंद करते हैं और कुछ मेले में पैदल भटकते हुए। अरसे तक यह त्योहार प्रेमी-प्रेमिकाओं की आदर्श स्थली बना रहा। बाद में कुछ ज़्यादा ही उद्दाम और उत्तेजक अवसर प्रेम के पैदा हो गये तो इस मोर्चे पर भी नक्कटैया पीछे छूट गई। जुलूस में शामिल झाँकियों में हास्य और व्यंग्य की केन्द्रीयता होती है। कुछ जानकार लोगों का कहना है कि पराधीनता के दौर में ब्रिटिश राज के अन्यायों की हॅंसी उड़ाने के लिए इन झाँकियों को लीला में जोड़ा गया। लीला के विराट में ये आधुनिक और विद्रोही प्रयत्न बहुत सहजता से खप गये हैं। इनकी वजह से लीला का एक भिन्न पाठ भी तैयार होता है।

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मित्र साथ था और भरतमिलाप की लीला हो रही थी। बनारस की सभ्यता की लोकप्रियता का स्मारक लक्खी मेला। जिन मेलों में अनिवार्यतः लाखों लोग आते हैं, स्थानीय परम्परा में उन्हें लक्खी मेला कहा जाता है। पन्द्रह मिनट की लीला स्थानीय पुलिस और प्रशासन की तैयारियों की परीक्षा लेती हुई सम्भव होती है। चौदह वर्ष के वियोग को पार कर भाई गले मिले। लोगों ने ‘बोल दे राजा रामचन्द्र की जय’ और ‘हर हर महादेव’ का उद्घोष किया। लोगों ने ‘जय श्री राम’ का उद्घोष नहीं किया। हज़ारों यादवों के कंधे पर आरूढ़ होकर पुष्पक विमान नन्दीग्राम से अयोध्या की ओर उड़ता हुआ-सा चला। मित्र ने गर्वोक्ति के से लहज़े में कहा : ''ओसामा बिन लादेन ने 2015 तक पूरी दुनिया को मुसलमान बनाने की चुनौती दी है। क्या यह मुमकिन है?'' सवाल वाहियात था और मज़ाक या डांट में ही उत्तर दिया जा सकता था। मैंने मज़ाक किया - '‘हम सब लोग तो पहले से ही मुसलमान हैं। हमें कोई क्या बनायेगा?'' बहरहाल, हम विमान के पीछे की विराट भीड़ का हिस्सा होकर आगे चले और मित्र के सवाल का उत्तर सामने आ गया। मुसलमानों की विपुल संख्या मेला देखकर निकल रही थी। चारों ओर टोपियाँ और लुंगियां। मित्र झेंपते हुए मुस्करा रहे थे। उनकी चिढ़ इस हिस्सेदारी के आगे झूठ हो रही थी।

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लीला और प्रकारान्तर से मानस के क़रीब होने में अद्वैत का आकर्षण है। अगुण और सगुण के बीच, ज्ञान और भक्ति के बीच, शंकर और राम के बीच, होने और होने के अभिनय के बीच।

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जानकारों को मानस-गान बेसुरा लग सकता है। वहाँ पर्याप्त रफनेस और पराक्रम है भी। कुछ चीखना, कुछ बहरों को सुना डालने की कशिश। तर्क के धरातल पर एक बेसुरापन कभी-भी उसमें साबित किया जा सकता है। लेकिन अगर कानों में थोड़ी बहक हो और कुछ तर्कातीत सुनने का हुनर हो तो वहाँ खजाना है। वहाँ निरे-वर्तमानकालिक सुरीलेपन के फासिल्स हैं। एक आदिम आर्केस्ट्रा के जीवाश्म। और इस प्रकार बेसुरे होते जाने की प्रक्रियाएँ। बीच की धूल। रास्ते का शोर। दुर्घटनाएँ। इस संगीत से इश्क करना आसान नहीं है। यह किसी शुद्ध संगीत का अपभ्रंश है। उसे सुनना और सराहना मूल को खोजने की मेहनत है।

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लीला के संचालन में आने वाली दिक्कतें विचित्र हैं। पैसे और संसाधन इकट्ठा करना एक चैलेंज है। हिन्दू उच्च वर्गों में रामलीला के प्रति उपेक्षाभाव है। इसी समय होने वाली दुर्गापूजाएँ ज़्यादा चमकीली और उत्तेजक हैं। वे परम फैशनेबल हैं और वक्त के साथ चलने में माहिर। सत्ता-राजनीति और कारपोरेट सेक्टर ने उनके भीतर अपने अभेद्य लालची ठिकाने बना लिये हैं। उनके संगठन में माफिया का बोलबाला है। लोग उनसे डरते हैं और यह वक़्त ऐसा है जिसमें लोग जिस चीज़ से डरते हैं उसी को पसंद करते घूमते हैं। दुर्गापूजाएँ, अजीब ट्रेजिडी है, कि बदनाम होकर प्रतिष्ठित हैं। रामलीला से उनका कोई प्रत्यक्ष टकराव नहीं है, लेकिन टकराव प्रत्यक्ष कहाँ होते हैं? लीलासमितियाँ प्राचीन हैं। उन्हें राजाओं, रईसों और महाजनों से लीला करने के लिए भूखण्ड मिले हैं। उन्हें छीन लेने और उन पर कब्जा कर लेने के षडयंत्र लगातार होते रहे हैं। लेकिन लीलाएँ खुद को बचाना और बढ़ाना जानती हैं। सबसे प्राचीन और समृद्ध रामलीला समिति ने नगर के सर्वाधिक प्रतिष्ठित वकील को अपना सचिव बना लिया है।

यह भी एक लीला है।

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रामकथा में एक बद्तमीज पक्षी है, जयन्त। राम उसकी आँखें फोड़ देते हैं। तुलसी के ‘मर्यादित’ टेक्स्ट में यह प्रसंग कुछ ऐसे घटित होता है कि वह पक्षी सीताजी के चरणों को अपनी चोंच के प्रहार से घायल कर देता है। वाल्मिकी के यहाँ पक्षी ज़्यादा उद्धत है। वह सीता के स्तनों को छलनी करता है। बहरहाल, यह लीला उस पक्षी की चंचलता की तरह घटित होती है। ढलती दोपहर में एक बड़े मैदान में लोग ख़ासकर नौजवान और किशोर - हाथों में पत्थर लेकर नेत्र-भंग की लीला होने का इंतज़ार करते हैं। राम जयन्त के मुखौटे की आँखों में जैसे ही तीर का स्पर्श (स्पर्श-मात्र) कराते हैं, जनसमूह उस बदमाश पक्षी पर पत्थरों की बारिश करने लगता है। जयन्त का मुखौटा पहना आदमी अक्सर लहूलुहान हो जाता है। कई बार वह जान बचाने के लिए भागता हुआ पुलिस थाने में छिप जाता है।

इसी बीच वह पक्षी हेल्मेट पहनकर लीला में आने लगा है।

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प्रयोग ‘एब्सोल्यूट’ नहीं है। वह हमेशा परम्परा की सापेक्षिकता में घटित होता है। प्रयोग से जिस चीज़ पर सबसे ज़्यादा असर पड़ता है उसका भी नाम परंपरा है। रामलीला के भीतर न जाने कितने प्रयोग उपस्थित हैं और उतने ही ज़्यादा प्रयोगों की संभावनाएँ। हरेक आगामी स्पंदन की जगह वहाँ है और उसके परिसर में पर्याप्त बड़प्पन है। वहाँ भीड़-भड़क्के और शोरगुल का आलम है और नए का स्वागत करने की वत्सल ललक। वह छोटे से छोटे नवाचार से आपादमस्तक थरथरा जाती है और झूमते हुए उसे ख़ुद में शामिल कर लेती है। उसके प्रकांड अतीत के तथ्य देखकर लग सकता है कि वह कोई स्थिर और बंद चीज़ है। लेकिन रामलीला के साक्ष्य से साबित होता है कि ऐसा है नहीं। ‘इम्प्रोवाइजेशन’ के लिए लीला के भीतर मनमानी जगहें हैं।

मसलन्, एक शाम एक पिता अपनी दो साल की बच्ची के साथ लीला में पहुँचे। रावण का दरबार लगा हुआ था और कुछ ही देर में अंगद अपने पाँव जमाकर उसे हिला-भर देने की चुनौती वहाँ उपस्थित राक्षसों को देने वाला था। यह लीला उसी मैदान में होती है जहाँ राम-रावण युद्ध होता है। बगल में युद्धस्थल निर्माण चल रहा था। मूँगफली, गुब्बारों और गरीब खिलौनों की दुकानें लगी हुईं थी। थोड़े सयाने बच्चों का मन इस ठहरी हुई दरबारी लीला में नहीं लग रहा होगा इसलिए वे दौड़धूप के खेल खेल रहे थे। रामायणियों का दल मानस की प्रसंगानुकूल पंक्तियाँ गा रहा था। पिता गोद की बच्ची के साथ रावण-दरबार के करीब पहुँचते गये। एक ही आसन पर तीन राक्षस विराजमान थे। बीच वाला भव्य है इसलिए वही रावण है।

तो सिर से कमर तक कपड़े का शानदार चेहरा पहने रावण की निगाहें बच्ची से मिलीं। छोटी बच्ची रावण की आँखों की चंचल बदमाशी को समझ नहीं सकी होगी। इसलिए उस पर कोई असर नहीं दिखा। वह डिजिटल ज़माने की बच्ची - तमाम कार्टून चैनल्स पर इस गरीबतर रावण से न जाने कितने गुना वीभत्स डरावने आकार देखने की अभ्यस्त। लीला के रावण का किंचित अपमान हुआ। वह धीरे से उठा। यह बड़ा एकान्त उठाना था। जैसे सृष्टि में कहीं भी इसे नोटिस न किया गया हो। एक सर्वथा अलक्षित मानवीय क्रिया। सिर्फ़ एक पिता और एक बच्ची सरीखे दो ग़ैर ज़रूरी दर्शकों के सामने घटित होता रंगकर्म। मूल कथा से दूर, मूल कथा से भिन्न, कहानी की वयस्क केन्द्रीयता के विरूद्ध ‘अनाख्यान’ के पक्ष में एक किशोर उत्पात। बहरहाल, तलवारधारी रावण ने गोद की बच्ची को दौड़ा लिया। और इस बार बच्ची डर गई। यह संवेदना का ‘वर्चुअल टूर’ नहीं था, जीवन-वास्तव था। यह कला-वास्तव थी।

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धर्म के विभिन्न मतांतर, परस्पर विरोधी जीवनदृष्टियाँ और भाँति-भाँति के पक्ष-प्रतिपक्ष रामलीला नामक सांस्कृतिक अभियान में साथ-साथ सक्रिय हैं। यह महान तथ्य सुस्थापित है लेकिन इसे अभिनव उदाहरणों के साथ बार-बार दुहराने की ज़रूरत है। मौनीबाबा की रामलीला में मेघनाथ की भूमिका पाँचों वक़्त का नमाज़ी एक मुसलमान अदा करता है। साल भर ‘राधे-राधे’ जपने वाले बल्लभाचार्य संप्रदाय के अनुयायी, गोपाल जी के भक्त, नित्यप्रति गोपाल मंदिर की परिक्रमा करने वाले और सम्भवतः वर्ष में एक बार भी विश्वनाथ जी की ओर रुख़ न करने वाले कट्टर पुष्टिमार्गी बाईस दिनों के लिये राम के हो जाते हैं। यों, ऐसे सारे परस्पर उलझे हुए संदर्भ रामलीला के साथ रहकर, लेकिन उसके समानान्तर, एक और लीलामय जीवनलीला सम्भव करते हैं।
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Thursday, December 03, 2009

बही- खाता : ९ : जयशंकर


(हिंदी के जाने-माने कथाकार जयशंकर के अब तक चार कहानी-संग्रह छप चुके हैं. मरुस्थल नामक उनका संग्रह अत्यंत चर्चित रहा था और बारिश, इश्वर तथा मृत्यु शीर्षक उनका नवीनतम संग्रह बिना किसी हो-हल्ले के हिंदी का बेस्ट-सेलर है, मेरे जाने पिछले पांच वर्ष में आया सबसे अच्छा कहानी-संग्रह भी. जयशंकर आमला जैसी छोटी जगह में रहकर लिखते हैं, यह लेखक-परिचय पढने में दिलचस्पी रखने के अलावा शायद ही कोई जानता हो. स्वयं जयशंकर के संज्ञान में लेखक संगठन या गुट वगैरह नहीं, उनसे सम्बन्ध तो दूर की बात है. ऐसे लेखकों के प्रति मन में एक सम्मान का भाव जगता है. जयशंकर ने कहानियों के अलावा समय-समय पर पत्रिकाओं में अपने जर्नल्स भी प्रकाशित कराये हैं. यह बही-खाता उनमें से ही कुछ वाक्यों का थीमैटिक चयन है. यों बही-खाता स्तंभ की यह नौवीं प्रस्तुति है. बाद में जयशंकर के जर्नल्स की दूसरी झलकियाँ भी पेश की जाएंगी. )

लिखने के बारे में

लिख नहीं पाने की अपनी हार और हताशा, शर्म और पीड़ा से मुंह चुराने के लिए आप अपने रैक से कोई पुस्तक निकालकर पढ़ना शुरू करते हैं। अगर आपके दुर्भाग्य से वह किताब सचमुच की किताब रही तब पढ़ते हुए भी आपकी अपनी व्यथा का विस्तार होता रहता है, आपका अवसाद आकार लेता रहता है।

जीवन में जो अनुभव दुःख देते हैं, जिनके साथ रह पाना असहनीय हो जाता है, उन्हीं अनुभवों को किसी परिपक्व , प्रौढ़ कलाकृति में पढ़ते या देखते हुए गहरी तसल्ली मिलती है।

किसी भी लेखक के भीतर अधूरी आकांक्षाओं के कितने ही प्रेत बसते होंगे। शायद हर लेखक जिस चीज़ के अभाव को अपनी ज़िन्दगी में पाता होगा, उस चीज़ को अपनी कृति में पाना चाहता होगा।...हर सच्चा लेखक और कलाकार अपनी तरह से अपनी परिस्थिति, मनःस्थिति और अपनी कृति के बीच संतुलन पैदा करने में सफल होता है।

वैसे तो लिखने का कोई निश्चित नियम कैसे निर्धारित किया जा सकता है ? पर मन में यह संशय उठता रहता है कि लिखने के कर्म की मर्यादाएं न रहें तो यह कर्म एक अराजक कर्म भी हो सकता है।...हजारों बर्षों की सृजनात्मक चेष्टाओं के आलोक में अपनी रचनात्मक असफलताओं, कल्पना की कमजोरियों और अभिव्यक्ति की गरीबी को देखा जा सकता है।

हम अपने जीवन के किसी आत्मीय हिस्से में बस जाना चाहते हैं, छिप जाना चाहते हैं, रुक जाना चाहते हैं, लेकिन समय की सनक के सामने हम विवश हो जाते हैं। अपने जीवन के उस मार्मिक प्रसंग को भुलाने की तमन्ना के साथ हम उस प्रसंग को अपनी कहानियों-कविताओं में जगह देने की सफल-असफल कोशिश करते हैं। जीने के वक्त की उत्तेजना, अपने लिखे हुए में बहुत कम नज़र आती है। कल्पना, अभिव्यक्ति और रचना की असफलताओं से निरंतर संघर्ष और संवाद में ही किसी लेखक को तसल्ली का, निष्ठां का, उम्मीद का कोई अज्ञात ज़ोन नज़र आता होगा। शायद हर लेखक तारकोवस्की की फ़िल्म 'stalker' के नायक की तरह एक अज्ञात ज़ोन में जाने का खतरा उठता होगा।

मैं पिछले तीन बरसों से धीरे-धीरे, डरते-डरते, रोते-थकते हुए उपन्यास लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। अभी तक तो कुछ भी हाथ नहीं आया है। न भाषा, न पात्र, न परिवेश और न ही कोई नई बात या संवेदना। मैं सिर्फ़ लिखता चला जाता हूँ और थकता चला जाता हूँ। कभी-कभी घनी निराशा और हताशा के क्षण आते हैं जब मैं महसूस करता हूँ कि लिखते-लिखते नौ-दस बरस होने को आए हैं और मैं एक अच्छा, जीवंत और सच्चा वाक्य लिख पाने के भी काबिल नहीं बन पाया हूँ। तब यह भी महसूस होता है कि मुझे अपनी लिखने की लालसा और आकांक्षा के बारे में, कभी अपने लेखक हो जाने के स्वप्न के विषय में एक और बार सोचना चाहिए।

जब कोई लिखना चाह रहा हो तो उसके लिए मरे हुए वाक्य से ज्यादा मृत क्या चीज़ हो सकती है?

अपने लिखे हुए में कुछ महत्वपूर्ण होना चाहिए, अपनी कृतियों की निजी, विशिष्ट और जीवंत दुनिया होनी चाहिए।...ऐसा कुछ भी लिख सकूँ इसके लिए मुझे साधना करनी चाहिए, प्रतीक्षा करनीचाहिए और मैं अभी तक इन दोनों ही चीज़ों से अपना सहज रिश्ता नहीं बना पाया हूँ. ये दोनों ही चीजें मेरे लिए सिर्फ शब्द हैं।
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Monday, November 30, 2009

विचारार्थ : २ : इस पुरस्कार के प्रायोजक हैं...

गुरुदेव की आड़ में अकादेमी का 'सामसुंग' साहित्य प्रायोजन

विष्णु खरे
संसार भर के लेखक और बुद्धिजीवी, वे वामपंथी हों या न हों, कथित 'खुलापन', 'उदारवाद', 'बाजारवाद', 'उपभोक्तावाद', 'विज्ञापनवाद', 'प्रयोजन्वाद' तथा बहुराष्ट्रीय व्यापार निगमों के विरुद्ध हैं। सामान्यतः राष्ट्रवाद और विशेषतः वामपंथ के कारण, भारतीय साहित्यकार, और उसमें भी हिन्दी के कवि-कथाकार-आलोचक, जो अधिकांशतः 'प्रतिबद्ध' विचारधारा में यकीन करते हैं, वर्तमान नव-पूंजीवाद के ख़िलाफ़ हैं। यहाँ तक कि वे कथित 'नक्सलवाद' की दिग्भ्रमित हिंसा का विरोध तो करते हैं लेकिन उसकी आधारभूत भावना के नैतिक-सैद्धांतिक समर्थक हैं। आज हिन्दी का शायद ही कोई आत्मसम्मानी लेखक हो जो आर्थिक और राजनीतिक नव-साम्राज्यवाद का विरोध अपनी विधा में न कर रहा हो- वह ईमानदारी और कला की शर्तों पर कितना खरा उतर रहा है, उसके पाठक उसे समझदारी और गंभीरता से ले रहे हैं या नहीं, यह अलग बहसों के विषय हैं। लेकिन ऐसी आशंका है कि भारत सरकार और उसके साहित्यिक प्रतिष्ठान या तो भारतीय लेखकों के इन रुझानों को जानते-समझते नहीं, या हैं भी तो उनकी परवाह नहीं करते, या यह जानने के लिए कि अपनी प्रतिबद्धता में साहित्यकार कहाँ तक जा सकते हैं, वे उन्हें उकसाने के लिए कोई अतिवादी हरकत कर बैठते हैं।

पिछले लगभग २५ वर्षों से साहित्य अकादेमी अपने उत्तरोत्तर पतन के कारण पर्याप्त कुख्याति अर्जित करती आ रही है और इस प्रक्रिया में उसने हिन्दी तथा शेष भारतीय साहित्यों और लेखकों को भी भ्रष्ट किया ही है, किंतु यदि उसने अपना ताज़ातरीन कारनामा अंजाम न दिया होता तो वह कल्पनातीत ही समझा जाता। साहित्य अकादेमी ने पिछले दिनों दक्षिण कोरिया के सबसे बड़े बहुराष्ट्रीय व्यापार निगम 'सामसुंग' के साथ एक समझौते पर दस्तखत किए हैं जिसके तहत वह चौबीस नए साहित्यिक पुरस्कार स्थापित करेगी जो यद्यपि 'रवींद्रनाथ ठाकुर पुरस्कार' के नाम से जाने जायेंगे, किंतु उनकी रकम और पुरस्कार-निर्णय-प्रक्रिया का खर्च 'सामसुंग' देगी।

हालाँकि अपने मोबाइल फ़ोनों, प्लाज्मा टेलीविज़नों, फ्रिजों और अन्य उपभोक्ता उत्पादों के कारण और उनकी बिक्री के लिए करोड़ों रुपयों के अपने विज्ञापनों के ज़रिये 'सामसुंग' अब 'शाइनिंग' और 'इन्क्रेडिबल इंडिया' के लिए कोई अपरिचित छाप-नाम (ब्रांड नेम) नहीं रहा, फिर भी उसके संबंध में कुछ तथ्य शायद उपयोगी हों। कोरियाई भाषा में उसके नाम का हिन्दी अर्थ 'त्रिनक्षत्र ' ( अंग्रेज़ी में 'थ्री-स्टार्स' ) होगा और ये तीन सितारे हैं, 'सामसुंग इलेक्ट्रानिक्स', 'सामसुंग हैवी इंडस्ट्रीज' तथा निर्माण कंपनी 'सैमसंग सी एंड टी'। पिछले वर्ष तक 'सामसुंग' की सकल संपत्ति २५ खरब, 2५ अरब अमेरिकी डॉलर थी, उसका मुनाफा एक खरब सात अरब डॉलर था। आज डॉलर का भाव करीब ४७ रुपये है। 'सामसुंग' दक्षिण कोरिया की सबसे बड़ी कंपनी है, अपने देश का २० प्रतिशत निर्यात करती है, संसार की सबसे बड़ी इलेक्ट्रॉनिक है, 'सोनी' से भी बड़ी, और विश्व की सभी किस्म की कंपनियों में उसका स्थान १९ वां है। दक्षिण कोरिया को परिहास में 'सामसुंग गणराज्य' कहा जाता है और और स्वयं 'सामसुंग' को 'औपनिवेशिक साम्राज्य' और 'भूखा डायनासोर' कहकर पुकारा जाता है। जब वह ईमानदार राष्ट्रों में ही सरकारों को प्रभावित कर सकता है तो संसार के भ्रष्टतम देशों में वह किन व्यक्तियों और संस्थानों को नहीं खरीद सकता।

'सामसुंग' का दुस्साहस इतना बढ़ा हुआ है कि उसने चार वर्ष पहले अमेरिका में इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद ' डायनैमिक रैंडम एक्सैस मेमोरी' की कीमतों में हेराफेरी के ज़रिये कई बड़ी अमरीकी कंपनियों को नुक्सान पहुँचाने की कोशिश की लेकिन कानून के शिकंजे में आ गई। अमेरिका के न्याय मंत्रालय ने उस पर ३० करोड़ डॉलर का फौजदारी जुर्माना किया जो अमेरिका में इस तरह के अपराधों के लिए दूसरा सबसे बड़ा दंड है। 'सामसुंग' के तीन अधिकारीयों को, भले ही कुछ महीनों के लिए, लेकिन जेल जाना पड़ा।

दक्षिण कोरिया में तो 'सामसुंग' के स्वामी और प्रमुख ली कुन-ही स्वयं को देश का मालिक ही समझते थे लेकिन पिछले वर्ष उन्हें अप्रत्याशित सदमा तब पहुँचा जब टैक्स-चोरी और अन्य अपराधों के लिए सरकार ने उन पर ११ करोड़ ३० लाख डॉलर का जुर्माना किया। वे हवालात भी जा सकते थे लेकिन उससे कोरिआई अर्थव्यवस्था और स्वयं 'सामसुंग' कंपनी डांवाडोल हो जाती, इसलिए उनसे अपने पद से इस्तीफा देने को कहा गया। उनके उपाध्यक्ष ली हाक-सू और ख़ुद उनके बेटे ली जाए-योंग को भी त्यागपत्र देने पड़े। 'सामसुंग' के साथ एक ही हादसा हुआ है, जब पिछले दिनों दिल्ली के समीप नॉएडा में स्थित उसकी वाशिंग मशीन उत्पादन इकाई में जहरीली गैस रिसने से ५० से अधिक कर्मचारी भोपाल के यूनियन कार्बाइड कांड जैसी बीमारी के शिकार हो गए थे, उन्हें अस्पताल ले जन पड़ा था, लेकिन जिन छः लोगों की हालत गंभीर बताई जा रही थी उनका क्या हुआ यह अब तक साफ़ नहीं हुआ है।

संभव है भारत सरकार और साहित्य अकादेमी को 'सामसुंग' के इस हाल के इतिहास और रिकॉर्ड का कुछ पता न हो, हालाँकि आश्चर्य यह है कि किसी अज्ञात करणवश स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आजकल संस्कृति मंत्रालय का प्रभार भी संभाले हुए हैं और उनके पास उनका एक जागरूक मीडिया विभाग भी होगा ही। इतना तो मानकर ही चलना चाहिए कि साहित्य अकादेमी ने 'सामसुंग' के साथ यह करार यदि प्रधानमंत्री कि सहमति से नहीं तो उनके संज्ञान में तो किया ही होगा। वैसे हम जानते ही हैं कि भारत को नई विश्व अर्थव्यवस्था से जोड़ने का सेहरा हमारे प्रधानमंत्री के सर पर ही जाता है जब वे नरसिंह राव सरकार में वित्त मंत्री थे और इस तरह यदि साहित्य अकादेमी ने संसार की एक सर्वाधिक ताक़तवर कंपनी से जुड़ने का फ़ैसला किया है तो संस्कृति मंत्रालय ने उसका सहर्ष अनुमोदन किया होगा।

लेकिन साहित्य अकादेमी के कुछ सूत्रों के से विचित्र बातें सुनाई दे रही हैं। कहते हैं कि अकादेमी की सर्वशक्तिमान कार्यकारिणी पर पिछले कुछ वर्षों से दबाव था कि वह अपने पुरस्कारों को बड़ी निजी कंपनियों से प्रायोजित करवाए लेकिन उसने ऐसे प्रयासों को ठुकरा दिया। यह मालूम नहीं पड़ रहा है कि यह दबाव संस्कृति मंत्रालय से आया और क्या यह सामान्य सैद्धांतिक दबाव था या एकमात्र 'सामसुंग' के लिए था? अब यह बताया जा रहा है कि दबाव असह्य और अपरिहार्य हो गया और अकादेमी को, जो ख़ुद को लगातार स्वायत्त कहते रही है, अपने पुरस्कारों को 'सैमसंग' को सौंपना पड़ा।

अकादेमी ने अपने संविधान और पुरस्कार-नियमों की हत्या करके ही यह निर्णय लिया है। उसका एक-एक रूपया केन्द्र सरकार से आता है और अब तक उसके नियमों में बाहरी पैसा लेने का कोई प्रावधान नहीं है। फिर उसके जो नियमित २४ पुरस्कार हैं वे ही 'अकादेमी पुरस्कार' के नाम से जाने जाते हैं और उनके दिए जाने की एक लिखित प्रक्रिया और नियमावली है। अनुवाद के लिए दिए जानेवाले पुरस्कारों का स्थान और प्रक्रिया अलग हैं। लेकिन अकादेमी साहित्य के लिए ही दूसरे पुरस्कार दे और उन्हें 'रवीन्द्र पुरस्कार' या 'टैगोर प्राइज़' कहे, यह न संविधानसम्मत है और न तर्कसम्मत।

अकादेमी अपनी मतिमंद्ता के जाल में फंसती जा रही है। वह कह रही है कि अपने द्वारा मान्य २४ भाषाओँ के नियमित, वार्षिक पुरस्कार तो वह देगी ही, उनमें से ८ भाषाओँ को प्रतिवर्ष वह 'सामसुंग रवीन्द्रनाथ पुरस्कार' भी देगी। पहले खेप की आठ भाषाएँ होंगी : बांग्ला, हिन्दी, गुजरती, कन्नड़, कश्मीरी, पंजाबी, तेलगु और बोडो। इनके बाद अगले वर्ष आठ और तीसरे वर्ष फिर आठ। चौथा वर्ष फिर भाषाओँ की पहली किश्त से शुरू होगा। 'सामसुंग' का नाम नहीं जाएगा, रवीन्द्रनाथ का जाएगा। गुरुदेव को जोतकर अकादेमी ने बांग्ला साहित्यकारों का तो मुंह शायद बंद कर दिया, ज़ाहिर है कि इसमें अकादेमी के उपाध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय ने भी अपना कहावती 'पाउंड -भर मांस' वसूला होगा, लेकिन सवाल यह है कि क्या अन्य भारतीय भाषाओँ में महान साहित्यकार हैं ही नहीं कि सिर्फ़ नोबेल पुरस्कार के कारण भारतीय साहित्यों को चिरकाल तक मात्र रवीन्द्र-संगीत गाना पड़े? अकादेमी यह भी कह रही है कि इन 'सामसुंग पुरस्कारों' की रकम उसके नियमित पुरस्कारों से कम होगी। क्यों? क्या इसलिए कि वह इन पुरस्कारों को अभी से दोयम दर्जे का समझती है? या इसलिए कि उसे निर्धन 'सामसुंग' कंपनी को ज़्यादा आर्थिक संघात नहीं पहुँचाना है?

'सामसुंग' की तो यह घोषित नीति है कि वह अपने छाप-नाम के प्रचार और प्रतिष्ठा के लिए प्रायोजन करेगी। वह कई फुटबाल क्लबों, कर-रेसिंग प्रतियोगिताओं, शीत-ओलंपिकों और नियमित ओलंपिकों की प्रायोजक है। वह भारत की क्रिकेट प्रतियोगिता में भी प्रवेश करनेवाली है। शिक्षा, मीडिया आदि क्षेत्रों में भी उसकी गहरी घुसपैठ है। इसके लिए अरबों डॉलर नियोजित कर देना उसके लिए सुबह के नाश्ते के बराबर है। भारत सर्कार, संस्कृति मंत्रालय और साहित्य अकादेमी ने तो अपनी बौद्धिक का परिचय दिया है कि उसे इतने सस्ते में भारतीय साहित्य और रवीन्द्रनाथ ठाकुर को बेच दिया।

शायद 'सामसुंग', उसके लिए साहित्य अकादेमी पर कथित दबाव डालने वाले अधिकारी और मंत्रालय, तथा स्वयं साहित्य अकादेमी का वर्तमान तंत्र यह जानते हों कि विश्वव्यापी नई अर्थव्यवस्था तथा बहुराष्ट्रीय व्यापारिक निगमों का जैसा-जितना भी प्रतिरोध कर रहे हैं वे प्रबुद्ध भारतीय लेखक ही हैं। साहित्य अकादेमी की साधारण सभा में विभिन्न साहित्यों के सौ के करीब प्रतिनिधि होते हैं जिनमें वरिष्ट सरकारी अधिकारी भी पड़ें नामित किये जाते हैं। उनमें से कार्यकारणी चुनी जाती है। अब ये सब 'सामसुंग' के समर्थक हो ही चुके और उनके माध्यम से सैंकड़ों अन्य लेखक, जिसमें भावी 'सामसुंग' विजेता भी होंगे, खुलेपन, उदारता, उपभोक्तावाद, बहुराष्ट्रीय निगमों के लाभ भी देख पाएंगे। ज़ाहिर है कि उनका वामपंथ और नाक्सालवाद आदि से मोहभंग हो सकगा। बहुत सस्ते में बहुत बड़ा काम हो जायेगा।

'सामसुंग' प्रयोजन के दूरगामी प्रभाव होंगे। ललित कला अकादेमी और संगीत नाटक अकादेमी, जिनका बाज़ार से सामीप्य साहित्य से कई गुना ज्यादा है, अब अपने पुरस्कार, आयोजन, प्रदर्शनियां आदि देशी-विदेशी महकम्पनियों से प्रायोजित करवाने को स्वतंत्र हैं। चित्रकारों, नर्तकों और गायकों-वादकों की अब और बन आएगी। उनकी इन संस्थाओं को सदेबी, कृष्टि, निजी गैलरियां, विदेशी कम्पनियाँ खुलकर प्रायोजित कर सकेंगी। राज्यों की बीसियों ऐसी अकदेमियां और उनके पुरस्कार, स्वयं सरोकारों द्वारा सीधे दिए जानेवालों पुरस्कार, कंपनियों द्वारा 'फंड' किये जायेंगे। जितनी ज्यादा विदेशी कम्पनियाँ दाखिल होंगी उतने ही अधिक विदेशी लाभ होंगे। अन्याय, अत्याचार, गैर-बराबरी, शोषण, अपराध, भ्रष्टाचार आदि के खिलाफ बोलना उतना ही कम होता जायेगा। जनवादी संघर्षों के लिए समर्थन लुप्त होने लगेगा. एक राष्ट्रव्यापी सांस्कृतिक सलवा जुडूम तैयार होगा।

एक ज़माना था जब वामपंथी, जनवादी, प्रगतिवादी ही नहीं, सामान्य प्रबुद्ध लेखक भी 'कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम' के खिलाफ सच्चे-झूठे खड़े होते थे। फिर एक दौर 'सी.आई.ए.' के छिपे हाथ का आया। अब कभी-कभार इस बात का विरोध होता है कि कोई लेखक किसी फासिस्ट महंत के मंच पर कैसे पहुँच गया, किसी ने भाजपा सरकारों के विज्ञापन क्यों ले लिए या कोई युवा कवि क्योंकर ताक़तवर पत्रिकाओं को अपनी किसी जेबी संस्था के माध्यम से फोर्ड फाउंडेशन की रिश्वतें देता पकड़ा गया। 'सोवियत लैंड नेहरु साहित्य पुरस्कारों' के ज़रिये शायद सोवियत संघ की 'केजीबी' ने भी कुछ किया होगा। उनमें तो मुफ्त रूस-यात्रा भी होती थी। लेकिन इस क्षेत्र में 'सामसुंग' की आमद, वह भी सरकारी रूप से, खुल्लमखुल्ला, एक बिलकुल अनूठे युग की शुरुआत है। यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रगतिशील, जनवादी तथा जन संस्कृति मोर्चा लेखक संगठनों के हमारे मित्र जिनमें सर्वश्री ज्ञानेंद्रपति, लीलाधर जगूड़ी, राजेश जोशी, अरुण कमल, विरेन डंगवाल तथा मंगलेश डबराल जैसे मनसा-वाचा-कर्मणा नई आर्थिक व्यवस्था और नव-साम्राज्यवाद के सक्रिय विरोधी हैं, जो उनके काव्य और गद्य तथा सक्रियता में स्पष्ट दीखता है, उस साहित्य अकादेमी के इस प्रायोज्य 'सामसुंग रवीन्द्रनाथ साहित्य पुरस्कार' के बारे में क्या सोचेंगे जिसने उन्हें अपने नियमित पुरस्कार से कभी सम्मानित किया था।
****
( विचारार्थ स्तंभ की यह दूसरी कड़ी है. यह महत्वपूर्ण लेख जनसत्ता में छपने के साथ-साथ सबद के लिए विष्णुजी के मार्फ़त मिला था. उनका अत्यंत आभार! )

Saturday, November 28, 2009

विचारार्थ : १ : इयुजेनियो मोन्ताले


वैचारिक प्रतिबद्धता आवश्यक और पर्याप्त शर्त नहीं है

नया मनुष्य बहुत बूढा पैदा हुआ है. वह नई दुनिया को झेल नहीं सकता.जीवन की मौजूदा स्थितियों ने अब तक अतीत के चिह्नों को मिटाया नहीं है. हम बहुत तेजी से दौड़ते हैं, पर फिर भी कहीं पहुँचते नहीं. दुसरे शब्दों में, नया मनुष्य एक प्रयोगात्मक अवस्था में है. वह देखता है पर विचार करने में असमर्थ है.
*
सड़क पर चलते आदमी को भी विशिष्ट होने का अधिकार है. वह भी अपने बारे में यह भ्रम रख सकता है कि सच्चाई को जिस तरह वह जानता है, वह तमाम बुद्धिजीवियों की उपलब्धियों से ज्यादा मौलिक है. पर भीड़ का मनुष्य भीड़ की तमाम बुराइयों का शिकार है. हममें से कोई इससे बचा नहीं है.
*
कलाकार का अलग-थलग पड़ जाना ( अक्सर यह स्थिति प्रचार पाने की एक बेहया प्रदर्शनप्रियता में भी बदल जाती है ) एक ऐसे समय में लाजमी है जब कर्म और ज्ञान दो विपरीत दिशाओं के यात्री हैं और कभी-कभार केवल संयोग से ही मिलते हैं.

{ एक उदाहरण : Just 24 hrs. left to return to my beloved country...but I'm sad inside...scared of those power-centers who might have planned something again to put my life in a state of unwelcome nomad.... Can't there be an end to such 'games' by just a few ? Can I only see a bird singing a welcome song for an author who simply needed a sleep, peace and love....in my land..?
यह उक्ति उदय प्रकाश जी की है जो उन्होंने २४ नवम्बर को अपने
फेसबुक वाल पर लिख छोड़ा है. प्रदर्शनप्रियता के किसी और बेहतर उदाहरण के अभाव में ही उदय जी की उक्ति वहां से साभार ली गई है. बहरहाल!}
*
एक जीवंत काव्य-रचना के लिए वैचारिक प्रतिबद्धता आवश्यक और पर्याप्त शर्त नहीं है, और न ही वह स्वयं में कोई नकारात्मक स्थिति है. हर सच्चे कवि की अपने तरीके से एक प्रतिबद्धता होती है...हाँ, यह स्वाभाविक है कि पेशेवर कवियों ने अक्सर अपने संरक्षकों, युवराजों और अभयदाताओं के प्रति अपने उदगार व्यक्त किये हैं, पर फिर भी कविता का इतिहास ऐसी महान रचनाओं का इतिहास भी है जिन्होंने किसी भी किस्म की निरंकुशता को स्वीकार नहीं किया है. कोई भी कविता अपने समय में प्रचलित प्रतिबद्धता के अर्थ को पूरा करे या न करे पर वह अपने समय का प्रत्युत्तर ज़रूर होती है.
*
कविता आज की कला में बखूबी अंट सकती है पर आज के समाज में कवियों की स्थिति? सामान्यतया वह बहुत अच्छी नहीं है. कुछ कवि भूखे मर जाते हैं, कुछ जो दूसरा कुछ काम करते रहते हैं, वे बेहतर जीवन यापन कर लेते हैं. कुछ कवि निर्वासन में चले जाते हैं, कुछ अपने पीछे बिना कोई निशानी छोड़े अदृश्य हो जाते हैं. बाबेल और मान्देल्स्ताम कहाँ चले गए? ब्लाक और मायकोवस्की यदि खुद को ख़त्म न कर लेते तो क्या करते ? ( यह सूची और भी लम्बी हो सकती है.)...और दूसरे अनेक कवियों की वजह से हमें वह अपकीर्ति भी समझ में आती है --वह खंदक जिसमें आकर आधुनिक कविता का पशु गिर पड़ा है. यह केवल समाज की गलती नहीं है, एक बड़ी हद तक इसमें कवियों का भी दोष है!
****
( उपरोक्त विचार इतालवी कवि इयुजेनियो मोन्ताले के हैं. कविता और विचार पर केन्द्रित कवि-आलोचक विजय कुमार के संपादन में निकले उद्भावना के कवितांक में मोन्ताले का निबंध पढ़ा था. ये विचार-बिंदु वहीं से साभार लिए गए हैं. सबद पर मोन्ताले के साथ ही विचारार्थ नामक स्तंभ शुरू किया जा रहा है. इसके दायरे में ज़ाहिर है, सिर्फ साहित्य नहीं होगा, हालाँकि उसका होना अनिवार्य होगा. )

Sunday, November 15, 2009

सबद पुस्तिका : २ : कुंवर नारायण




( कुंवरजी का यह ताज़ा लेख पहलेपहल सबद पुस्तिका के रूप में यहाँ छप रहा है। ८२ की उम्र में भी उनकी मेधा, चिंतन-प्रक्रिया और कवि-कर्म में कोई शैथिल्य नहीं आया है। इस बात की पुष्टि जितना आगे दिया जा रहा यह लेख करता है, उतना ही उनका नवीनतम काव्य-संग्रह 'हाशिए का गवाह' भी। कविता-संग्रह से कुछ कविताएं भी इस पुस्तिका की संगिनी हैं। साथ में दी गई तस्वीर हेनरी मतीस की। )

खंड
: क


साहित्य और आज का समाज

इक्कीसवीं सदी का पहला दशक अब लगभग समाप्ति पर है। पिछले दस वर्षों में हुए परिवर्तनों पर एक उड़ती नज़र डालें तो कुछ ख़ास बातें सामने आती हैं जिनका समाज और साहित्य दोनों के लिए परिवर्तनकारी महत्वा रहा है। जैसे, आर्थिक, राजनीतिक और भाषाई दृष्टियों से एशियाई देशों - ख़ासकर भारत और चीन - का विश्व-शक्तियों के रूप में उभारना। हिन्दी साहित्य और समाज से सम्बंधित ऐसे कुछ सवालों की ओर ध्यान जाता है जो उपरोक्त तीनों विषयों से अलग रख कर नहीं सोचे जा सकते।

यह तथ्य कि हिन्दी इस समय संसार की प्रमुख भाषाओँ में से है, देश की आर्थिक और राजनीतिक स्थितियों से अनिवार्यतः जुड़ा है। हिन्दी भाषा के विस्तार के पीछे मुख्यतः व्यावसायिक और राजनीतिक कारण हैं, तथा मीडिया और प्रचार-प्रसार की टेक्नोलॉजी में विकास ने हिन्दी भाषा को नई तरह की ज़रूरतों से जोड़ा है। भाषा की क्षमता बढ़ी है। वह एक ज़्यादा बड़े हिन्दी-भाषी समुदाय तक पंहुच रही है। उसके द्वारा जनमानस तक क्या संदेसा पंहुच रहा है- इसके गहरे अध्ययन से समाज के लिए आज साहित्य की उपयोगिता का प्रश्न जुड़ा है। इस संदेशे के पीछे किस तरह के अंदेशे और उद्देश्य काम कर रहे हैं इस पर ही, बहुत कुछ, समाज में साहित्य जैसी चेष्टाओं का महत्व निर्भर है।

शुरू में ही 'सामजिक यथार्थ' और सामजिक चेतना' के बीच एक बारीक, किंतु आवश्यक, फ़र्क करते हुए अपनी बात कहना चाहता हूँ।

भारत का सामाजिक यथार्थ अत्यन्त जटिल, बहुस्तरीय और रूढिबद्ध है। वह बदल रहा है, लेकिन इतनी तेज़ी से नहीं कि वह 'सामाजिक चेतना' को बदल दे। इससे पहले, और इससे कहीं ज़्यादा तेज़ी से, वे शक्तियां सामाजिक चेतना को बदल रही हैं जिन्हें आज साफ़-साफ़ बाजारवाद और उपभोक्ता संस्कृति के रूप में पहचाना जा सकता है। उनका अपना तिजारती तंत्र है जो अच्छी तरह जानता है कि नई-नई चीजों के लिए आदमी की भूख को कैसे बढ़ाया जाए। वह तंत्र अत्यन्त विक्सित मनोवैज्ञानिक और तकनीकी तरीकों से भौतिक सुख सुविधाओं के प्रति हमारी स्वाभाविक आसक्ति को पुष्ट करता रहता है।

मेरी बात से यह नकारात्मक निष्कर्ष निकलने की जल्दी न की जाए कि मैं औधोगिक प्रगति को एक सिरे से खारिज कर रहा हूँ। उसके लाभ भी सब तक पंहुच रहे हैं जिन्हें नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता- लाभ जो हमें एक बेहतर ज़िन्दगी दे रहे हैं। मेरी कोशिश सिर्फ़ उस असंतुलन की ओर ध्यान खींचना है जो आज के समाज में, सारी प्रगति के बावजूद, एक गहरा असंतोष, विसंगति और विषमता भी पैदा कर रहा है।

साहित्य एक शाब्दिक-कला है, भाषा से अनिवार्यतः जुड़ी हुई। वह सामजिक-चेतना को सीधे संबोधित करती है, किसी अन्य विषय की भाषा और व्याख्या के मार्फ़तनहीं। वह जीवन की भाषा है- सच्ची और बेबाक़। अपनी तरह विभिन्न विषयों से संपर्क रखते हुए भी वह अपनी बात कहती है। उसका यह अधिकार आज भी सुरक्षित है, लेकिन उसकी आवाज़ जिन कानों तक पहुंचनी चाहिए उन्हें एक ऐसे शोरगुल ने घेर रखा है कि साहित्य, ख़ासकर कविता, जैसी कोशिशों की उपस्थिति ही महसूस नहीं होती। संक्षेप में, सामजिक-चेतना से साहित्यिक-चेतना का सीधा संवाद सम्भव नहीं हो पता रहा। क्या यह सिर्फ़ साहित्य के लिए एक चुनौती है ? या एक शिक्षित समाज के लिए भी कि वह, जाने-अनजाने, मानव-समाज की एक अत्यन्त समृद्ध सांस्कृतिक चेष्टा से वंचित होता न चला जाए ?

थोड़ा आत्मचिंतन साहित्य, विशेषतः कविता, की ओर से भी ज़रूरी है। बीसवीं सदी की काव्यचेतना ने जिन कुछ बीज-शब्दों और सन्दर्भ-पदों के आधार पर अपनी एक अलग 'पहचान' बनाई उन पर भी थोड़ा गौर अब ज़्यादा प्रासंगिक जान पड़ता है। या शायद, अब अधिक प्रासंगिक हो गया है। ध्यान देन कि अधिकांश शब्द उन विषयों से लिए हुए शब्द थे जो साहित्य से बहार के विषय थे। 'आधुनिकता' शब्द इतना आधुनिक भी नहीं था जितना हम समझ रहे थे- लगभग ५०० वर्ष पुराना इतिहास है उसका। बोद्लेअर जैसे फ्रेंच कवि ने बहुत पहले ही उसके छिछले आशयों से सावधान रहने की चेतावनी दी थी। 'क्रांति' राजनीति का शब्द था : फ्रेंच और रूसी क्रांतियों से निकला शब्द, जिसके बरक्स 'औद्योगिक क्रांतियों' और गाँधी की 'नैतिक क्रांति' के भी उदाहरण थे। हम सब चाहते थे कि दुनिया बदले : वह बदलती रही, और अब भी बदल रही है- लेकिन उस तरह नहीं जैसे हम चाहते थे : वह कुछ इस तरह बदली कि उसने हमें बदल दिया।

'परिवर्तन' का जूनून चढ़ता उतरता रहा। 'प्रगति' शब्द, ख़ासतौर पर उद्योग-धंधों की दुनिया का शब्द, मानव-समाज में मानो एक नई मशीन की तरह आया, कुछ दिन तेज़ी से चला, फ़िर बराबर मरम्मत मांगता रहा। 'प्रयोग', सीधे किसी वैज्ञानिक प्रयोगशाला से उठाया हुआ शब्द। आकर्षक, लेकिन ज़ल्दी ही किसी 'नए' प्रयोग की ज़रूरत के सामने खारिज हो गया ! इस भीड़ में 'नया' शब्द सबसे निरीह लगता है जिसे देखते-देखते बाज़ारवाद ने और उपभोक्तावाद ने समूचा हड़प लिया ! मानो अब उसका कोई मतलब साहित्य के काम का न हो, सिर्फ़ बाज़ार के मतलब का हो।

कविता में 'तकनीक' और 'शिल्प' वगैरह की पदावली आज की हर क्षेत्र में विकसित टेक्नोलॉजी के सामने फ़ुटनोट की तरह लगती है। नए का मतलब नई-नई चीजें ! 'नई' का 'कविता' के साथ कोई योग नहीं बैठता ! नया कुछ चाहिए तो हम बाज़ार की तरफ़ देखते हैं, नई कविता की तरफ़ नहीं।

तो फिर ऐसी कविता, जिसके सारे संदर्भ-साधन छिन चुके, क्या दे सकती है समाज को ? या अभी ऐसा कुछ बचा है, कविता और समाज के बीच, जो दोनों के लिए बेहद ज़रूरी है ? हम नई कोई चीज़ चाहते हैं तो बाज़ार की ओर दौड़ते हैं, लेकिन आत्मिक कुछ चाहते हैं तो कविता की ओर देखते हैं। प्रेम में, दुःख में, उदासी में, अकेलेपन में, मुश्किलों में, बेबसी में, भावुक क्षणों में क्यों हमें अनायास याद आती हैं कविताएं ? वह अजीब-सा, रहस्यमय 'कुछ' जो हमें मिलता है सिर्फ़ कविता से, क्या वह हमें मिल सकता है बाज़ार से ?

मैं उस कविता-बराबर ज़रा-से 'कुछ' को परिभाषित नहीं करना चाहता- चाहूँ भी तो नहीं कर सकूँगा। पर इतना जानता हूँ कि वह हमारी प्राणवायु की तरह सूक्ष्म है। उसके बिना हम जी नहीं सकते। वह एक सीमारहित, अपरिभाषित दुनिया है। उसकी अपनी शर्तें हैं। हम उसमें जाते हैं हमेशा ही कुछ पाने के लिए नहीं ; कभी-कभी अनायास उसमें खो जाने के लिए - कहीं भी, किसी भी समय में। भाषा में संभव इस अद्भुत कला को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहूँगा। जिगर साहब के इस शेर को अक्सर याद करता हूँ :

ज़रा-सा दिल है लेकिन कम नहीं है
इसी में कौन-सा आलम नहीं है

आज के समाज में मैं कविता की ज़रूरत और उसकी उपस्थिति को कुछ इस तरह सोचता हूँ कि वह मुख्यतः एक 'सूचनापरक' विधा नहीं है। इस माने में वह साहित्य की अन्य विधाओं से बहुत भिन्न है। वह मूलतः अत्यन्त उदार और उदात्त अर्थों में, 'आत्मचिंतन' की भाषा है। आत्मचिंतन को संकुचित करके 'आत्म-केंद्रित' के अर्थों में न लें : निहायत वस्तुनिष्ठ और व्यावहारिक भाषा भी बिल्कुल स्वार्थी अर्थों में आत्म-केंद्रित हो सकती है। कविता जितना कुछ जीवन के बारे में कहती है, उससे कहीं अधिक उस भाषा को ही एक सार्थक रचनात्मक अनुभव बना कर कहती है जिस भाषा में वह काव्य-रचना करती है। इसीलिए कविता हमेशा ही अपने को परिसीमित करनेवाले सन्दर्भ-पदों और शब्दावली का उल्लंघन और अतिक्रमण करने के लिए बाध्य है।

रचनात्मक ऊर्जा विस्फोटक होती है। अस्तित्व में आने के बाद ही उसकी 'पहचान' और 'नियम' बन पाते हैं। इसीलिए उसकी पारिभाषिक शब्दावली कभी भी उसके स्वरुप-निर्धारण में पर्याप्त नहीं ठहरती। जिस तरह भाषा, व्याकरण के नियमों को तोड़ते हुए, जीवन के साथ-साथ चलते हुए बदलती और विकसित होती है, उसी तरह भाषा में बसी कविता भी, जीवन के 'साथ' चलती है। इस 'साथ-चलने' के अर्थ को विस्तृत करके इस तरह समझें कि वह अपने समय के जीवन के साथ लगातार एक अत्यन्त संवेदनशील संवाद है जिसमें केवल सहमतियाँ ही नहीं प्रतिरोधों की भी पूरी गुंजाइश है।

इस अंतरंग संवाद से छन कर जो काव्यविवेक निकलता है उसके पीछे केवल 'तात्कालिक' और 'स्थानिक' सन्दर्भ नहीं होते, एक व्यापक और सर्वकालिक जीवनानुभव से निकली हुई वे ध्वनियाँ और अंतर्ध्वनियां भी होती हैं जिनसे एक सुसभ्य और न्यायप्रिय मानव-समाज की चेतना बनती है। इसे जीवित रखना ज़रूरी है। कविता इसे जीवित रखने की एक विनम्र कोशिश है।

( रचना तिथि : ५ नवम्बर, २००९ )
****

खंड : ख

प्यार की भाषाएँ

मैंने कई भाषाओँ में प्यार किया है
पहला प्यार
ममत्व की तुतलाती मातृभाषा में...
कुछ ही वर्ष रही वह जीवन में :

दूसरा प्यार
बहन की कोमल छाया में
एक सेनेटोरियम की उदासी तक :

फिर नासमझी की भाषा में
एक लौ को पकड़ने की कोशिश में
जला बैठा था अपनी उंगुलियां :

एक परदे के दूसरी तरफ़
खिली धुप में खिलता गुलाब
बेचैन शब्द
जिन्हें होठों पर लाना भी गुनाह था

धीरे धीरे जाना
प्यार की और भी भाषाएँ हैं दुनिया में
देशी-विदेशी

और विश्वास किया कि प्यार की भाषा
सब जगह एक ही है
लेकिन जल्दी ही जाना
कि वर्जनाओं की भाषा भी एक ही है :

एक-से घरों में रहते हैं
तरह-तरह के लोग
जिनसे बनते हैं
दूरियों के भूगोल...

अगला प्यार
भूली बिसरी यादों की
ऐसी भाषा में जिसमें शब्द नहीं होते
केवल कुछ अधमिटे अक्षर
कुछ अस्फुट ध्वनियाँ भर बचती हैं
जिन्हें किसी तरह जोड़कर
हम बनाते हैं
प्यार की भाषा
****

उजास


तब तक इजिप्ट के पिरामिड नहीं बने थे
जब दुनिया में
पहले प्यार का जन्म हुआ

तब तक आत्मा की खोज भी नहीं हुई थी,
शरीर ही सब कुछ था

काफ़ी बाद विचारों का जन्म हुआ
मनुष्य के मष्तिष्क से

अनुभवों से उत्पन्न हुई स्मृतियाँ
और जन्म-जन्मांतर तक
खिंचती चली गईं

माना गया कि आत्मा का बैभव
वह जीवन है जो कभी नहीं मरता

प्यार ने
शरीर में छिपी इसी आत्मा के
उजास को जीना चाहा.

एक आदिम देह में
लौटती रहती है वह अमर इच्छा
रोज़ अँधेरा होते ही
डूब जाती है वह
अँधेरे के प्रलय में

और हर सुबह निकलती है
एक ताजी वैदिक भोर की तरह
पार करती है
सदियों के अन्तराल और आपात दूरियां
अपने उस अर्धांग तक पहुँचने क लिए
जिसके बार बार लौटने की कथाएँ
एक देह से लिपटी हैं
****

मामूली ज़िन्दगी जीते हुए

जानता हूँ कि मैं
दुनिया को बदल नहीं सकता,
न लड़ कर
उससे जीत ही सकता हूँ

हाँ लड़ते-लड़ते शहीद हो सकता हूँ
और उससे आगे
एक शहीद का मकबरा
या एक अदाकार की तरह मशहूर...

लेकिन शहीद होना
एक बिलकुल फ़र्क तरह का मामला है

बिलकुल मामूली ज़िन्दगी जीते हुए भी
लोग चुपचाप शहीद होते देखे गए हैं
****

मैं कहीं और भी होता हूँ

मैं कहीं और भी होता हूँ
जब कविता लिखता

कुछ भी करते हुए
कहीं और भी होना
धीरे-धीरे मेरी आदत-सी बन चुकी है

हर वक़्त बस वहीं होना
जहाँ कुछ कर रहा हूँ
एक तरह की कम-समझी है
जो मुझे सीमित करती है

ज़िन्दगी बेहद जगह मांगती है
फैलने के लिए

इसे फैसले को ज़रूरी समझता हूँ
और अपनी मजबूरी भी
पहुंचना चाहता हूँ अन्तरिक्ष तक
फिर लौटना चाहता हूँ सब तक
जैसे लौटती हैं
किसी उपग्रह को छूकर
जीवन की असंख्य तरंगें...
****

उदासी के रंग

उदासी भी
एक पक्का रंग है जीवन का

उदासी के भी तमाम रंग होते हैं
जैसे
फक्कड़ जोगिया
पतझड़ी भूरा
फीका मटमैला
आसमानी नीला
वीरान हरा
बर्फीला सफ़ेद
बुझता लाल
बीमार पीला

कभी-कभी धोखा होता
उल्लास के इन्द्रधनुषी रंगों से खेलते वक़्त
कि कहीं वे
किन्हीं उदासियों से ही
छीने हुए रंग तो नहीं ?
****

नई किताबें

नई
नई किताबें पहले तो

दूर
से देखती हैं
मुझे
शरमाती हुईं

फिर संकोच छोड़ कर
बैठ
जाती हैं फैल कर

मेरे
सामने मेरी पढ़ने की मेज़ पर

उनसे पहला परिचय...स्पर्श
हाथ
मिलाने जैसी रोमांचक

एक
शुरुआत...


धीरे
धीरे खुलती हैं वे

पृष्ठ
दर पृष्ठ

घनिष्ठतर
निकटता

कुछ
से मित्रता

कुछ
से गहरी मित्रता

कुछ
अनायास ही छू लेतीं मेरे मन को

कुछ
मेरे चिंतन की अंग बन जातीं

कुछ
पूरे परिवार की पसंद

ज़्यादातर
ऐसी जिनसे कुछ न कुछ मिल जाता


फिर
भी

अपने
लिए हमेशा खोजता रहता हूँ

किताबों
की इतनी बड़ी दुनिया में
एक जीवन-संगिनी
थोडी
अल्हड़-चुलबुली-सुंदर

आत्मीय
किताब

जिसके
सामने मैं भी खुल सकूँ

एक
किताब की तरह पन्ना पन्ना

और
वह मुझे भी

प्यार
से मन लगा कर पढ़े..

****

Monday, November 02, 2009

स्वगत : २ : गीत चतुर्वेदी

( हिंदी के युवा कवि-कथाकार गीत चतुर्वेदी ने  कहानी पर अपनी बातें यहाँ एक अलग लहजे में कही हैं. बिना लाग-लपेट के. एक विरल साफगोई और पैनेपन के साथ. परम्परित जार्गन से मुक्त और विमर्श के बेमतलबी होने के खतरे से पूरी तरह बाखबर. आज की हिंदी कहानी के लिए यह शुभ है. लेखक के बही-खाते से एक बार फिर से चीजें निकल रही हैं और उनमें कहानी की तरह ही एक टटकापन है. आश्वस्ति से ज़्यादा विनम्र संदेह. खुद पर और उस पर भी जो कथा के नाम पर पेश्तर दे दिया गया है. अस्तु. स्वगत शीर्षक से यह सबद की दूसरी प्रस्तुति है.  )


संदेह - दृष्टि

बोर्हेस ने ‘द रिडल ऑफ पोएट्री’ में कहा है- ‘सत्तर साल साहित्य में गुज़ारने के बाद मेरे पास आपको देने के लिए सिवाय संदेहों के और कुछ नहीं।‘ मैं बोर्हेस की इस बात को इस तरह लेता हूं कि संदेह करना कलाकार के बुनियादी गुणों में होना चाहिए। संदेह और उससे उपजे हुए सवालों से ही कथा की कलाकृतियों की रचना होती है। इक्कीसवीं सदी के इन बरसों में जब विश्वास मनुष्य के बजाय बाज़ार के एक मूल्य के रूप में स्थापित है, संदेह की महत्ता कहीं अधिक बढ़ जाती है। एक कलाकार को, निश्चित ही एक कथाकार को भी, अपनी पूरी परंपरा, इतिहास, मिथिहास, वर्तमान, कला के रूपों, औज़ारों और अपनी क्षमताओं को भी संदेह की दृष्टि से देखना चाहिए।

अपनी बात को स्पष्ट करते हुए एक सूत्र तक पहुंचाने के लिए मैं फिर एक बार बोर्हेस को ही कोट करूंगा। उनकी एक कहानी है- ‘द रोज़ ऑफ़ पैरासेल्‍सस’, जिसमें एक किरदार राख से गुलाब बनाता है। जब एक व्यक्ति उससे यह हुनर सीखने आता है, तो वह मना कर देता है कि उसके पास ऐसी कोई चमत्कारी शक्ति नहीं है। उस व्यक्ति के जाते ही पैरासेल्‍सस नाम का वह किरदार फिर चमत्कार करते हुए राख से गुलाब बना देता है। बोर्हेस की यह कहानी अपने मेटाफि़जि़कल और मेटाहिस्टॉरिक अर्थों में बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन इंटर-टेक्स्चुअल रीडिंग से ज़रा खेलते हुए मैं बोर्हेस की इस कहानी को हिंदी फि़क्शन के संदर्भ में मेटाकॉमिक तरीक़े से देखता हूं।

कुछ लोग हिंदी कहानी से इसी कि़स्म के राख से गुलाब बना देने वाले चमत्कार का दावा करते हैं, लेकिन अपने किस अकेलेपन में वह यह चमत्कार कर रही है? जैसे ही वह पाठक के सामने जाती है, पैरासेल्‍सस की तरह चमत्कार से इंकार कर देती है, अपना वांछित या प्रोजेक्टेड असर तक नहीं छोड़ती, जबकि बार-बार कहा जा रहा है कि वह चमत्कारी है, तो फिर यह चमत्कार किस निर्जनता या नीरवता में है?

इस समय हिंदी कहानी में जिस तथाकथित रचनात्मक विस्फोट की बात की जाती है, उसे देखकर बरबस मुझे ‘पोएटिक्स ऑफ़ डीफैमिलियराइज़ेशन’ की याद आ जाती है। यह कला का एक सिद्धांत या प्रविधि है, जिसे पुराने ज़माने के रूसी लेखकों ने और बीसवीं सदी की शुरुआत के अमेरिकी लेखकों ने ख़ासा इस्तेमाल किया था। इसमें नैरेटर किसी जानी-पहचानी साधारण-सी चीज़ को इस क़दर नाटकीय और हल्लेदार बनाकर प्रस्तुत करता था कि देखने वाले को यह अहसास हो जाए कि दरअसल वह पहली बार ही उस चीज़ को देख रहा है। इस चौंक के कलात्मक लाभ और छौंकदार हासिल को वह फिक्शन मान लेता था। हिंदी कहानी से ज़्यादा उसका परिदृश्य इस समय उसी पोएटिक्स को एन्ज्वॉय करता जान पड़ता है।

इसके पीछे बहुधा मुझे हिंदी कहानी के विकास की सरणियों के पेचो-ख़म दिखाई देते हैं। हिंदी कथा साहित्य का विकास और हिंदी सिनेमा का विकास कुछ बरसों के आगे-पीछे में ही होता है। दोनों स्टोरी-टेलिंग की दो विधाएं हैं, लेकिन इस विकास में मुझे हिंदी सिनेमा की लोकप्रिय कथ्य-धारा अत्यधिक हावी होती दिखाई देती है। सिनेमा ने साहित्य को समृद्धि ही दी है, ऐसा हम दुनिया के कई बड़े लेखकों का आत्मकथ्य पढ़कर जान पाते हैं, लेकिन हिंदी में सिनेमा के लोकप्रिय कथानक-कथात्मक दबाव ने, कुछ ख़ास अर्थों में भारतीय-हिंदी समाज की संरचना ने भी, हिंदी कथा-साहित्य को चीज़ों को ब्लैक एंड व्हाइट में देखने का जो अत्यंत सरल, सुपाच्य कि़स्म का फॉर्मूला दिया है कि वह आज भी हमारे कथाकारों, किंचित पाठकों और अधिकतर आलोचकों से छुड़ाए नहीं छूट रहा। हमने नैरेशन की चेखोवियन शैली को तो अपना लिया, लेकिन अंतर्वस्तु की चेखोवियन जटिलताओं को ख़ुद से दूर ही रखा। आज भी हम तथाकथित पोस्ट-मॉडर्न नैरेटिव से उसी कि़स्म के सरलीकृत, लेकिन हाहाकारजनित नतीजे ही निकाल रहे हैं।

क्या इसके पीछे कहीं ये कारण तो नहीं कि हम शुरू से ही, हिंदी कथा के परिक्षेत्र में, डेमी-गॉड्स और लेसर-गॉड्स को पूजते आ रहे हैं? क्या हिंदी कहानी लगातार रॉन्ग्ड पैट्रन्स के हाथों में रही है? क्यों ऐसा होता है कि मुझे हिंदी कहानी के शिखर पुरुष हिंदी से बाहर कहीं दिखाई ही नहीं देते? और दुनिया के आला दरजे के फिक्शन का एक हिस्सा पढ़ लेने के बाद अपने इन लेसर-गॉड्स की कहानियों में मेरी कोई दिलचस्पी रह ही नहीं पाती? हां, उनकी कथेतर साहित्यिक-सामाजिक तिकड़में, शरारतें, बदमाशियां मुझे उनकी कहानी से ज़्यादा आकर्षित करती हैं। फिक्शन का अगर कोई मानचित्र हो, तो उसमें हमारी पोजीशनिंग कहां है? यक़ीनन, कहीं नहीं। हम साहित्य में रणजी ट्रॉफ़ी मुक़ाबलों से ही अंतरराष्ट्रीय विजय-प्राप्ति का आनंद भोग ले रहे हैं।

नहीं, यह न सोचा जाए कि इसके पीछे कोई पश्चिमपरस्त मानसिकता है, अपने जातीय-भाषाई स्‍वभावगत विशेष सरलीकृत तुरत-फुरत आरोप-निष्पादन की फेहरिस्त में इज़ाफ़ा करते हुए यह न कह दिया जाए कि कुछ लोगों को विदेशी चीज़ों में ही आनंद आता है, बल्कि यह एक कड़वी सचाई है, जिसे कम से कम ब्लैक एंड व्हाइट में न देखा जाए। तो वह चमत्कार जो उस कहानी में पैरासेल्‍सस कर रहा है और हमारे परिदृश्य में हिंदी कहानी कर रही है, उसे जांच लिया जाए। स्ट्रैटजिक टाइमिंग्स के सहारे नहीं, बल्कि साहित्य की गुणवत्ता को मानदंड बनाकर। हम डीफैमिलियराइज्ड की आत्मरति से बाज़ आएं, लेसर-गॉड्स के होलसेल प्रोडक्‍शन से भी.

मैं यहां किसी कि़स्म के सामाजिक यथार्थ, वर्तमान की चुनौतियां, समकालीन हिंदी कहानी का संकट, यथार्थ और विभ्रम, 90 के पहले और बाद का यथार्थ, दशा और दिशा जैसे सेमिनारी क्लीशे में नहीं जाना चाहता, क्योंकि एक ख़ास, सीमित दबाव डालने के अलावा इन सारी बातों का आर्ट ऑफ द फि़क्शन से कोई लेना-देना भी नहीं होता, लेकिन फिर भी मैं यहां पहले पैराग्राफ़ की बात को दोहराते हुए महज़ इतना कहना चाहूंगा कि हम इतिहास के साथ-साथ अपनी पूरी कथा-परंपरा को भी संशयग्रस्त होकर देखें।

(30 अक्‍टूबर 2009 को रामगढ़, नैनीताल में हिंदी कहानी पर आयोजित सेमिनार में कुछ ज़बानी जोड़ के साथ पढ़ा गया आलेख.)
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