सबद
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हम उम्मीद करें ...

10:18 am
अभी थोड़ी देर पहले ही मुंबई में धमाके ख़त्म हुए हैं और उसकी पल-पल बदलने और दिल बैठा देने वाली सर्द ख़बरों की ज़द से निकल कर मैं अपने मोर्चे पर आया हूँ। इसे आंकड़ों में कहने की ज़रूरत नहीं कि देश पर हुए इस फ़िदायीन हमले में कितने निर्दोष लोगों का खून बहा। यह ज़रूर है कि इस नाजुक मौके पर सुरक्षा बलों और मीडिया ( एकाध टी आर पी पीड़ित चैनल्स को छोड़कर ) ने जितनी तत्परता और जिम्मेदारी का परिचय दिया वह काबिलेतारीफ है। यह भी गौरतलब है कि इस मौके को कुछ सियासी दलों ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए मुफीद समझा पर उनके मंसूबे किस कदर मखौल का विषय बन गए हैं यह किसी से छुपा नहीं है। यह एक लोकतंत्र के रूप में हमारे वयस्क होने का भी प्रमाण है। ऐसी घटनाओं के बाद जिस एक बात की ओर ध्यान जाना लाजिमी है, वह है हमारे नीति-निर्माताओं का बयान। चूँकि वह इतना घिसा-पिटा और दरहकीक़त इतना बेअसर है कि उसे लेकर हमारे मन में गुस्से और तकलीफ का भाव एक साथ जगता है। हम उम्मीद करें कि उनके ये बयान महज कोरी बातें न रहकर स्थिति में बदलाव लाने में भी सक्षम होंगे।

सबद मुंबई में जान गंवाने वाले तमाम निर्दोष लोगों और उन्हें बचाने की मुहिम में शहीद हुए सुरक्षा बलों के प्रति अपनी हार्दिक संवेदना प्रगट करता है।

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सबद विशेष : ६ : कुंवर नारायण : नई निगाह में

1:27 pm

( यह सबद की ओर से किए गए आग्रह से कहीं ज़्यादा अपनी भाषा के एक बड़े कवि-लेखक के सम्मान में लिखने की अन्तःप्रेरणा ही रही होगी जिसकी वजह से इन युवा कवि-लेखकों ने कुंवरजी के बहुविधात्मक कृतित्व पर इतना त्वरित लेखन किया। इनमें से पंकज चतुर्वेदी पहली बार ब्लॉग की दुनिया की ओर अपना रुख कर रहे हैं, उनका स्वागत ! गीत और गिरिराज ने कुंवरजी की कविता पर ख़ुद को एकाग्र किया है, जबकि प्रभात रंजन ने उनके एकलौते कहानी संग्रह के माध्यम से उनकी कहानियों के अनूठेपन की ओर इशारा किया है। हम इनके शुक्रगुजार हैं। )


आग का वादा
पंकज चतुर्वेदी

कुंवर नारायण पिछले लगभग छह दशकों से रचनारत हैं। आज जब त्रिलोचन और रघुवीर सहाय हमारे बीच नहीं हैं, तो बेशक वह हिन्दी के सबसे बडे़ कवि हैं। मुक्तिबोध ने 1964 में ही उनके महत्त्व को पहचानते हुए लिखा था कि वह 'अंतरात्मा की पीड़ित विवेक-चेतना और जीवन की आलोचना' के कवि हैं। मगर 1964 से 1994, यानी तीस वर्षों का लम्बा वक्फा ऐसा भी रहा है; जिसमें सतत रचनाशीलता के बावजूद कुंवर नारायण को हिन्दी आलोचना में वह सम्मान और शोहरत नहीं मिली, जिसके दरअसल वह हक़दार थे। उलटे, उनकी कविता की सायास उपेक्षा, अवमूल्यन और अन्यथाकरण का प्रकट न सही, पर गुपचुप एक प्रायोजित सिलसिला इस बीच ज़रूर चलता रहा। इसे अंजाम देनेवाले लोग हिन्दी की विश्वविद्यालयी दुनिया, प्रकाशन-तंत्र और पुरस्कार-तंत्र पर क़ाबिज़ थे। इन्हें कौन नहीं जानता? इन्होंने यह साबित करना और करवाना चाहा कि कुँवर नारायण तो एक ख़ास स्कूल के कवि हैं। मगर 1993 में 'कोई दूसरा नहीं' सरीखे एक सौ कविताओं के अनूठे संग्रह के प्रकाशन और 1995 में इसके लिए उन्हें 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार' सहित अनेक सम्मान मिल जाने पर ऐसी कोशिशें अंतिम तौर पर नाकाम हो गईं।

साहित्य-संसार में सक्रिय विभिन्न विचारधारात्मक शिविरों के आर-पार कुंवर नारायण को एक क़िस्म की सर्वानुमति या व्यापक प्रतिष्ठा हासिल हुई। ज़ाहिर है कि इस मक़ाम पर किसी 'साहित्यिक राजनीति' के ज़रिए नहीं पहुँचा जा सकता; बल्कि शब्द और कर्म, संवेदना और विचार तथा कविता और जीवन की वह दुर्लभ एकता ज़रूरी है, जो उनके यहाँ मिलती है। दूसरे शब्दों में, प्रगतिशील दिखना नहीं, होना अनिवार्य है। मसलन यह सभी जानते हैं कि कुंवर नारायण ने किसी ख़ास विचारधारा से ख़ुद को प्रतिबद्ध नहीं किया; पर यह ख़बर बहुत कम लोगों तक पहुँची कि उन्होंने कविता की एक फ़ेलोशिप के तहत आयोवा जाने से इनकार कर दिया, क्योंकि उन्हें यह लिखकर देने को कहा गया था कि ''मैं वामपंथी नहीं हूँ।'' इसी तरह उन्होंने पहली बार एक उद्योगपति के नाम पर रखे गए हिन्दी साहित्य के बदनाम पुरस्कार 'दयावती मोदी कविशेखर सम्मान' को भी नामंजू़र कर दिया, जिसे कथित प्रगतिशीलों और कलावादियों ने प्रसन्न और आत्ममुग्ध भाव से स्वीकार किया।

हिन्दी कवियों में कोई संघर्ष न करते हुए उसका दिखावा करने का चलन आम हो गया है; जबकि कुंवर नारायण जो कुछ करते हैं, उसका सार्वजनिक ज़िक्र करने में संकोच करते हैं। एक तरफ़ वे साहित्यकार हैं, जो नैतिक और अनैतिक का फ़र्क़ भूल चुके हैं; दूसरी तरफ़ कवि है, जिसे इस द्वन्द्व को मिटाने की सज़ा मालूम है--''नर और कुन्जर के फ़र्क़ को मिटाते ही/मिट गया जो/वह एक शोकातुर पिता था। ...सज़ा सिर्फ़ इतनी थी/कि इस अन्तर को समझती हुई दृष्टि से/नरक देखना पड़ा था धर्मराज को।'' कुंवर नारायण की कविता जिस बौद्धिक सान्द्रता और क्लासिकी संयम के लिए मशहूर है; उससे कम महत्त्वपूर्ण उनके स्वभाव की सादगी और विनयशीलता नहीं है, जिनके होने को हिन्दी के ज़्यादातर नामचीन साहित्यकार अपने बड़प्पन में बाधक समझते हैं। ऐसों को अशोक वाजपेयी की ये काव्य-पंक्तियाँ याद रखनी चाहिए कि ''जीवन में आभिजात्य तो आ जाता है/गरिमा आती है बड़ी मुश्किल से।''

कुंवर नारायण की कविता और व्यक्तित्व, दोनों में ही जिस उदात्तता, गरिमा और संवेदनशीलता का विरल संश्लेष है; उससे रश्क करने से ज़्यादा अहम यह जानना है कि इसकी क़ीमत चुकानी पड़ती है, सब-कुछ पा लेने की ग़रज़ या चालाकी से यह मुमकिन नहीं। इसके लिए सिर्फ़ 'दुनियादारी' से नहीं, 'साहित्य की राजनीति' से भी अलहदा और निर्लिप्त रहना ज़रूरी है। दूसरे, हमारी रौशनी और ऊर्जा के स्रोत महज़ बाहरी ज्ञान-विज्ञान में नहीं; बल्कि भारत की अपनी दार्शनिक, सांस्कृतिक, नैतिक और मिथकीय विरासत में भी हैं, जिसके आशयों को नये सन्दर्भों में अन्वेषित किये बिना हम अपनी समूची आत्मवत्ता को अर्जित नहीं कर सकते। बगै़र इस बुनियाद के मुक्ति की उम्मीद करना बेमानी है। कुंवर नारायण के शब्दों में 'पराक्रम की धुरी पर ही प्रगति-बिन्दु' का स्वप्न देखा जा सकता है। उनकी कविता में भारत की श्रेष्ठ सर्जनात्मक मनीषा का सारभूत रूप मिलता है।

इसका मिलना कुछ दूसरे कवियों में भी इन दिनों बताया जा रहा है, पर बतानेवाले भी जानते हैं कि दूसरों के बारे में यह बयान जितना झूठ है, कुंवर नारायण के सम्बन्ध में उतना ही सच। तीसरे, कुंवर नारायण की कविता हमें सिखाती है कि शाश्वत मूल्यों के इसरार का मतलब समकालीनता की अन्तर्वस्तु से इनकार हरगिज़ नहीं है, जिसकी कोशिश हिन्दी आलोचना के एक तबके़ द्वारा बराबर की जाती है। इसके विपरीत, कुंवर नारायण की कविता के सफ़र में आठवें दशक में इमर्जेन्सी, 1992 में अयोध्या-केन्द्रित उग्र हिन्दुत्ववादी साम्प्रदायिकता और 2002 में एकध्रुवीय हो चुकी दुनिया में अमेरिका के नव-उदार आर्थिक-सांस्कृतिक और सैनिक साम्राज्यवाद--यानी मौजूदा भारत और विश्व की कितनी ही विसंगतियों और विडम्बनाओं का गहरा और सशक्त प्रतिकार देखने को मिलता है।

कुंवर नारायण भारत के पहले और एकमात्र कवि हैं, जिन्हें रोम का अन्तरराष्ट्रीय 'प्रीमिओ फे़रोनिआ सम्मान' हाल में दिया गया है। ऐसे में 'भारतीय ज्ञानपीठ' के लिए यह आत्म-व्यंग्य ही होता, अगर वह अपना शीर्ष पुरस्कार उन्हें प्रदान न करती। मेरे जैसे उनके अनगिनत प्रशंसकों के लिए यह दोहरी खु़शी का मौक़ा है, जिसे मुहैया कराने के लिए वे इस संस्था के शुक्रगुज़ार हैं। दरअसल, सबसे बड़ी बात यह है कि कुंवर नारायण भारत के आम आदमी को, उसकी ज़िन्दगी के रोज़मर्रा के प्रसंगों में बार-बार याद आने और उसका साथ देनेवाले मूल्यवान् कवि हैं।

कैसा
सुखद इत्तिफ़ाक़ है कि इसी महीने की दस तारीख़ को बनारस के दशाश्वमेध घाट पर प्रतिदिन शाम को होनेवाली भव्य गंगा-आरती को देखने के लिए मैं एक नाव में मशहूर कवि असद जै़दी, उनकी जीवन-संगिनी नलिनी तनेजा और प्रसिद्ध कवि-मित्र व्योमेश शुक्ल के साथ था। मैंने कहा कि 'नाव से यह दृश्य देखना बहुत अच्छा लगता है।' असद जी ने पूछा-'अच्छा क्यों लगता है ?' मैं अपनी आत्मा की हक़ीक़त जानता था कि मुझे वह सब-कुछ किसी रूढ़ धार्मिक-पौराणिक मानी में अच्छा नहीं लग सकता। फिर क्या बात थी ? क्या सिर्फ़ उसका सौन्दर्य खींचता था ? नहीं। मैंने उनसे कहा, ''मुझे कुंवर नारायण की एक कविता याद आती है --''आग का वादा''--फिर मिलेंगे/...नदी के किनारे !''

( लेखक युवा कवि-आलोचक हैं। )
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तितलियों के देश में: जहाँ जिंदगी सबसे अधिक बेध्य हो कविता द्वारा
गिरिराज किराड़ू

या
कहीं ऐसा तो नहीं
कि आकाश और पाताल को मिलाती
एक काल्पनिक रेखा
जहाँ दायें बायें को काटती है
सचाई का सबसे नाज़ुक बिन्दु वही हो?
(अभिनवगुप्त)

कुंवर नारायण की कविता की ‘महत्वपूर्णता’ को ऐसे कहा जा सकता है, कहा जाता है कि उनकी कविता हिन्दी (कविता) में संस्कृति हो चुकी कमअक्ली और कमसुखनी की लद्धड, सांस्थानिक, किलेबंद अहमन्यता को भी हमदर्दी और परिष्कार बख्शता एक प्रतिकार, एक प्रत्याख्यान है; कि वह हिन्दी के दो संसारों के, उनके अतिचारों के आरपार एक प्रौढ़ मध्यमार्ग/तीसरा रास्ता है आदि आदि। लेकिन ये उनकी कविता के ‘एप्रोप्रिएशन’ की न सिर्फ़ आसान बल्कि खतरनाक तरकीबें हैं क्योंकि इस तरह वह (पॉलेमिकल) परिप्रेक्ष्य अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है जिसके समर्थन/ विरोध में ‘ही’ इस कविता की सार्थकता संभव होती/ सिद्ध की जाती है।

यहाँ ऐसा करने का पर्याप्त अवकाश नहीं है लेकिन एक प्रस्तावना की कोशिश है कि उनकी कविता को, एक स्वतंत्र काव्य-दृष्टि और सत्ता-दृष्टि की तरह पढ़ा जाये, उपलब्ध काव्य/सत्ता-दृष्टियों के पक्ष/प्रतिपक्ष की तरह नहीं, उनके ‘मध्यमार्ग’ की तरह नहीं क्योंकि ‘मध्यमार्ग’ इस कविता का मार्ग नहीं, उन उपलब्ध दृष्टियों की सुविधा है। कुंवर नारायण की कविता ही कहती हैः

हर एक के अपने-अपने ईमान धरम
इतने पारदर्शी
कि अपठनीय
(अपठनीय)

2
कुंवर नारायण की कविता/उनका लेखन मनुष्य होने की, कवि/कविता होने की संपूर्णतर विधियों को लगातार खोजने, पाने का एक आत्मविश्वस्त उद्यम है। उनमें सेल्फ-सेंसरशिप बिल्कुल नहीं है । वे मनुष्य की, ‘यथार्थ’ की, होने के उम्मीद और अज़ाब की अ-वश्य और सदैव हतप्रभ कर देने वाली, अक्सर विलोम छवियों/संस्करणों को विरल सहजता से और बहुत तरह के स्रोतों से मुमकिन करते हैं। उनकी ज्ञानमार्गी वस्तुनिष्ठता अपने नेपथ्य में, अपने डार्क-रुम में जितनी जटिल, विकट संघटना है, अपने प्रदर्शन के ‘धोखे’ में उतनी ही सहज (एफ़र्टलेस और सहजात दोनों अर्थों में, लेकिन ‘सरल’ के अर्थ में नहीं)। यूँ कहना चाहिये कि यह ऐसा पूरावक्ती ज्ञानमार्ग है जिसमें जटिल ही सहज हो गया है। हर कविता/रचना अपने में मनुष्य होने की वर्तमान, अतीत और भविष्य-संभव अवस्थितियों के संवाद से, इतिहास, पुराण और समकाल-संभव अन्योन्याश्रितता से, ‘कला’, ‘समाज’, ‘यथार्थ’, ‘राजनीति’, ‘व्यक्ति’, ‘अध्यात्म’ आदि ‘विरुद्धों’ के ‘सामंजस्य’ से नहीं उनके जैविक और डायलेक्टिकल एकत्व से, निर्मित होती हुई एक ‘सम्पूर्ण(तर) संघटना’ है। उनकी कविता/लेखन में समावेशिता और सम्पूर्णता के बीच एक अनोखा डायलेक्टिक्स है। बिना समग्रतामूलक सामान्यीकरणों/महाख्यानों के, बल्कि प्रायः उनके वि-सर्जन से सम्पूर्ण(तर)’ को मुमकिन करने की एक अजब कोशिश है यह जो ‘अनोखा’ और ‘अजब’ जैसे विशेषणों की अतिरिक्ति से फुसलाई नहीं जा सकती।

3
मैं जिंदगी से भागना नहीं
उससे जुड़ना चाहता हूँ। –
उसे झकझोरना चाहता हूँ
उसके काल्पनिक अक्ष पर
ठीक उस जगह जहाँ वह
सबसे अधिक बेध्य हो कविता द्वारा।
(उत्केंद्रित)

(आपसे गुज़ारिश है आप उद्धृत काव्यांशों के बोल्ड किये हर्फ़ों को गौर से पढ़ें, क्योंकि मुमकिन है आपको भी वही ‘धोखा’ हो रहा हो जिससे मेरी वाक़फ़ियत बिल्कुल न होती अगर कुँवर नारायण/बोरहेस जैसे लेखक न होते)

एक बार धोखा हुआ
कि तितलियों के देश में पहुँच गया हूँ
और एक तितली मेरा पीछा कर रही है
________
दरअसल वह भी
मेरी ही तरह धोखे में थी
कि वह तितलियों के देश में है
और कोई उसका पीछा कर रहा है।
(तितलियों के देश में)

4
उनसे सच्ची, जानलेवा, ज़िरही ईर्ष्या किये बिना उनसे प्रेरणा लेना तक मुश्किल है। यह उनके स्वावलंबी ज्ञानमार्ग की शर्त भी है, वसीयत भी।

( लेखक युवा कवि और प्रतिलिपि के संपादक हैं। )
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मिथिहास
से निकल कर आया ऋषि
गीत चतुर्वेदी

बीसवीं सदी दृश्य-माध्यमों के दबाव की सदी थी। कला की सारी विधाओं पर, अंदरूनी आवाजाही से इतर, यह दबाव देखा गया। इस दबाव के बावजूद, कुंवर नारायण के यहां तमाम रूढि़गत दृश्य-विधान टूटते हैं और धीरे-धीरे कविता एक स्वतंत्र कला के रूप में विकसित होती है। उनकी कविता महज़ दृश्य में बंध जाने की आकांक्षी नहीं है। वह दृश्य और बंधने की प्रक्रिया दोनों को ही सतत जटिल रूप देती है।

कुंवर नारायण की कविताओं में कहे और अनकहे के बीच लगातार द्वंद्व चलता रहता है, जो कविताओं के पाठ के स्तर को बढ़ा देता है। सहज न दिखने वाला यह द्वंद्व ही कविता को लंबे समय तक प्रभावी रखता है। उनकी कविताओं की यह ख़ासियत है कि बहुधा वे एक साथ दो मन:स्थितियों और भावों को अभिव्यक्त करती हैं। जैसे वही पंक्ति ठठाकर हंसते समय भी आपके ज़ेहन में आ सकती है और ऐन रुदन के क्षणों में भी। दोनों ही स्थितियों से बराबर जुड़ती हुई। जैसे नीम के पेड़ से आहिस्ता-आहिस्ता झरती निंबोली एक स्त्री के केश में अटक जाती है। रूमान और अवसाद एक साथ चलते हैं। ऊपर से पीला दिखता रंग भीतर से हरा होता है। जो ऊपर से मृत्यु दिखती है, वह जीवन भी है।

'आत्मजयी' हो या 'वाजश्रवा', इसी कारण इनमें जीने की अदम्य इच्छा दिखती है। नचिकेता का लौटना या घर तक पहुंचना, संभावनाओं के प्रति कवि की प्रतिबद्धता दिखाते हैं। एक कविता में घोड़े से बंधे घिसटते हुए आदमी के सिर्फ़ दो हाथ ही दिल्ली पहुंच पाते हैं, तो वह सारी राजनीतिक क़लाबाजि़यों को एक झटके में फ़ाश कर देते हैं। यह कविता दिल्ली या किसी भी शहर को, उन हाथों के जुड़े होने से, देखने की मांग करती है। यातनाओं और यांत्रिकता की अपेक्षा मनुष्यता की ओर ज़रा ज़्यादा सरक कर। उनकी कविताएं गहरे अर्थों में राजनीतिक कविताएं हैं, क्योंकि यहां राजनीति नारों की बजाय, सूक्ष्म चिंतन की तरह आती है। व्यक्ति, समाज, देश, मेटाफि़जि़क्स और `कथित मनुष्यता´ की राजनीति। उनकी एक छोटी-सी कविता है `पुराना कंबल´, इसे उनकी कविता का 'पदार्थ' माना जा सकता है, जिसमें भारतीय चिंतन परंपरा के `पद´ और `अर्थ´ दोनों ही आ जाते हैं। इस कविता की ही तरह कुंवर नारायण का पूरा कवि एक महाप्राचीन कंबल को कवच की तरह धारण करता है और वर्तमान को चुनौती देता है।

कलाकार का संघर्ष हमेशा वर्तमान से होता है। कुंवर नारायण इसीलिए मिथकों की तरफ़ जाते हैं और बेहतरी से जुड़े तमाम बुनियादी प्रश्नों का जीवद्रव्य वहां से पाते हैं। मिथिहास की कंदराओं से निकले एक आधुनिक विद्रोही ऋषि की तरह, जो अपनी हड्डियों को दूसरों का हथियार नहीं बनने देगा।और यह द्वंद्व भी उनकी कविता को अनुपम ऊंचाई देता है कि इतिहास, मिथकों, स्मृतियों, अद्वैत में जाने के बाद भी वह अपनी कविता में किसी भी कि़स्म के मोनोजेनेसिस को नकार देते हैं।

( लेखक युवा कवि-कहानीकार हैं। )
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इकहरे यथार्थ का अतिक्रमण करती कहानियाँ
प्रभात रंजन

1973 में प्रकाशित अपने कथा-संग्रह, ''आकारों के आसपास'' की भूमिका में कुंवर नारायण ने लिखा है कि उनकी कहानियां वास्तव में यथार्थ से एक रोमांस हैं- यथार्थ के नाम पर कहानी नहीं, कहानी के नाम पर यथार्थ की बात करता हूं। संग्रह की सत्रह कहानियों को पढ़ते उनकी कथा-मुद्रा सहज ही ध्यान आकर्षित करती है। यह सवाल भी बार-बार मन में कौंधता है कि यथार्थ केवल बाहरी होता है या उसका कोई मानसिक स्तर भी होता है। ''आकारों के आसपास'' और ''आशंका'' शीर्षक कहानियों का इस संदर्भ में विषेश उल्लेख किया जा सकता है।

कुंवर
जी की कहानियों में यथार्थ के अनेक स्तर हैं। उनमें एक तरफ ऐतिहासिक संदर्भ हैं तो दूसरी ओर नितांत समसामयिकता। ''मुगल सल्तनत और भिश्ती'' कहानी में मुगल बादषाह हुमायूं के जीवन के उस संदर्भ को उठाया गया है जब जान बचाने के एवज में हुमायूं ने एक भिश्ती को आधे दिन की बादशाहत अता की थी। कहानी में उस भिश्ती के अंतर्द्वंदों का बड़ा बारीक विष्लेशण किया गया है। आजकल कहानी में लेखकीय हस्तक्षेप को उत्तर-आधुनिक कथात्मक युक्ति के रूप में देखा जाता है। कुंवर जी की कहानियों इस युक्ति का बहुत सुंदर उपयोग दिखाई देता है। ''मुगल सल्तनत और भिश्ती'' कहानी में कहानी सुनाने के बाद लेखक उपस्थित होकर इस कहानी की ऐतिहासिकता पर ही संदेह करता है। इसी तरह ''अचला और अचल'' कहानी में प्रेम कहानी सुनाने के बाद लेखक अंत में उपस्थित होकर कहता है कि वह नहीं जानता कि यह कहानी दुखांत हुई या सुखांत...

बीसवीं
षताब्दी के महान लेखक बोर्खेज के बारे में एक आलोचक ने लिखा है कि वे कहानियां नहीं लिखते, ऊहापोह और भूलभुलैया रचते हैं। वास्तव में कुंवर जी ने इस संग्रह में अनेक कथारूप आजमाए हैं और उनके माध्यम से यथार्थ की जटिलताओं की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया है। उनकी कहानियां मानो पाठकों को बार-बार इस बात की याद दिलाती हैं कि कुछ भी इकहरा नहीं होता- न जीवन में न यथार्थ में।

( लेखक युवा कहानीकार हैं। )
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कुंवर नारायण को ज्ञानपीठ

1:32 pm

ज्ञानपीठ

इस घोषणा के बाद कि वर्ष २००५ का ज्ञानपीठ पुरस्कार हिन्दी के शीर्षस्थ कवि कुंवर नारायण को दिया जाना है, यह उक्ति दुहराने का मन होता है कि इससे ज्ञानपीठ की ही प्रतिष्ठा बढ़ी है। ज्ञानपीठ पुरस्कार को समस्त भारतीय भाषाओँ के साहित्य में अत्यंत प्रतिष्ठित माना जाता है, पर इसके साथ भी विवाद और चयनित कवि-लेखक को लेकर बिल्कुल फर्क किस्म की बातें सामने आती रही है। इस परिप्रेक्ष्य में कुंवरजी का निर्विवाद चयन कुछ विलंबित ज़रूर है, पर इससे हिन्दी और विशेषकर कविता का सम्मान बढ़ा है। स्वयं कुंवरजी इसके लिए ख़ुद को एक निमित्त भर मानते हैं।

इन दिनों

कुंवर नारायण की कविता ने मुझ जैसे अनेक लोगों को न सिर्फ़ कवित-विवेक बल्कि जीवन विवेक भी दिया है। मैं खुशकिस्मत हूँ की पढ़ने-लिखने के शुरूआती दिनों से ही उनकी कविता और दिल्ली आने के बाद मुझे उनकी संगत भी मिली। अस्सी पार भी उनकी दिनचर्या किसी स्कूली छात्र जैसी है। आंखों की रोशनी कम पड़ने के बावजूद अपनी डेस्क से लगकर वे किताबें लेंस के सहारे देर तक पढ़ते हैं। हजारों पृष्ठों में फैली अपनी अनछपी रचनाओं का सख्ती से संपादन करते हैं। साहित्यिक गोष्ठियों से लेकर सिनेमा तक में उनकी दिलचस्पी और शिरकत अब तक बरकरार है। इन दिनों वे आलोचना की दूसरी पुस्तक पर काम कर रहे हैं। साथ ही एक नया कविता-संग्रह भी आकार ले रहा है।

दो नई कविताएं

( उन्होंने अपनी नोटबुक से दो कविताएं सबद लिए दी हैं। सबद इन्हीं दो कविताओं के साथ उनकी यह उपलब्धि सेलिब्रेट करता है। )

प्यार के बदले

कई दर्द थे जीवन में :
एक दर्द और सही, मैंने सोचा --
इतना भी बे-दर्द होकर क्या जीना !

अपना लिया उसे भी
अपना ही समझ कर

जो दर्द अपनों ने दिया
प्यार के बदले...

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रोते हँसते

जैसे बेबात हँसी आ जाती है
हँसते चेहरों को देख कर


जैसे अनायास आंसू आ जाते हैं
रोते चेहरों को देख कर


हँसी और रोने के बीच
काश, कुछ ऐसा होता रिश्ता
कि रोते-रोते हँसी आ जाती
जैसे हँसते-हँसते आंसू !


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ज़बां उर्दू : २ : सफ़िया अख्तर

12:09 pm
जाने अज़ीज़,

कैसे
हो ? मेरे कूच के वक्त मेरी तबियत पर जो बार था उसकी फ़िक्र है। खुदा करे अच्छी तरह सो गए हो और सुब्ह बश्शाश (खुश) उठे हो।
इस मर्तबा ग्वालियर के स्टेशन पर हर लहज़ा (क्षण) दिल चाहता था कि काश कोई खारजी कुव्वत (बाह्य शक्ति) जाने से रोक लेती और अपने पर से जिम्मेदारी का बोझ हट जाता, मगर संग-दिल ट्रेन आकर रही और बेरहम लोगों ने टिकट भी हासिल कर लिया और सफ़िया को दूर फेंक दिया, गो कि वो इसके बावजूद तुमसे ज़रा भी दूर नहीं।
जब सोचती हूं तो समझ में नहीं आता कि मेरी गैरमौजूदगी में ज़िन्दगी को किन मशागिल (कामों) से पुर करते होगे ? फातिमा बहन बेचारी मजदूर आदमी, वक्त पर चल देती होगी, फिर घर पर अकेले क्या करते होगे, वक्त कैसे कटता होगा ? घबराओ नहीं, मैं भी तुम्हारे पास हूं, अलबत्ता ये और बात है कि ऐसे में मीना (शराब ) भी आ जाती हो और मुझे उस बज़्म से निकाला मिल जाता हो।
तुम कब आओगे ? मुझे बुलाना या ख़ुद आना। मार्च के पहले हफ्ते में जयपुर जाना तय करो और मुनासिब समझो तो मुझे भी ले चलो। औन के यहां ठहरेंगे और उनकी शाने-मेज़बानी भी देखेंगे। वैसे तुम अपनी मर्ज़ी पर रखो। ये शौक तो महज़ तुम्हारी हमसफरी की ख्वाहिश में उछला बकिया कुछ नहीं। खैर।
हां, और सुनो। आज यूनिवर्सिटी बंद रही। कोई तालिबेइल्म इत्तेफाकिया रेल से कुचलकर मर गया था रात को। तबियत पर तकद्दुर (उदासी) सा रहा गो कि मौसम बहुत ही रंगीन रहा।
आज दोपहर कोई तीन घंटे सोई। ये नींद गोया वो क़र्ज़ मयसूद ( ब्याज सहित ऋण) है जो तुम्हारे पहलू और बाजुओं पर वाजिब था।
आज एक बहुत ही 'देर हज्म' किस्म की किताब पढ़ने के लिए उठाई है। अपने को तुमसे बहस करने के लिए मुसल्लह (तैयार) करना चाहती हूं। लड़ने के लिए तो मेरी फितरत ने मुझे मुसल्लह करके भेजा था पर बहस की ज़रूरत यूं आन पड़ी तुमसे लड़े बगैर बहस छिड़े, मुमकिन ही नहीं है।
तुम्हारी सलाहकार नहीं बनना चाहती। बनूं भी क्योंकर और दावा भी करूं तो किस बिरते (आधार) पर जबकि अपने को बेशतर चीज़ों में तुमसे कमतर पाती हूं। हां, छेड़ की खातिर फिर लिख रही हूं कि मेरे पीछे मुझ से 'तर्के वफ़ा' न बरतना कि अपने को मुझसे अलेहदा करके ख़ुद परेशानियों के दौरे डालो और कहो कि मैं सफिया के साथ ये न कर सका और ये न कर सका।
यकीन करो अख्तर कि ये एहसास ही मेरी ज़िन्दगी के अक्सर लम्हों को कतई सुकून बख्श देता है कि मैं तुम्हारी हूं। अब तक मैं किसी कि भी न थी और न समझ सकती थी कि अपने को क्योंकर संभालकर रखूं और किसके लिए ? मेरी वफाओं का, मेरी उबलती हुई आरजुओं और तमन्नाओं का मर्कज़ कोई नहीं था। मेरे ख्वाबों का पसमंज़र (परिदृश्य) बिल्कुल सियाह था और मेरे अरमानों की दुनिया यकसर ( बिलकुल) सूनी।
ऐसी उजड़ी हुई दुनिया को एकाऐकी जगमगा देने का सेहरा तुम्हारे सर होगा, इसका यकीन भी न था। पिछली बातें ऐसी पिछली बातें बन चुकी हैं कि उनके हकीकी ( सच) होने में भी शुब्ह (शक) है। फिर ऐसे में भी तुम ये करते हो कि मेरे पीछे मेरी इसे दुनिया को ठुकराकर उस दुनिया में जा बसते हो जो तुम्हारे लिए गुजरी बात बन चुकी है और फिर अक्सर ऐसी बातों पर मग्मूम ( दुखी) होते हो जिन पर ग़म करने का अब तुम्हें कोई हक नहीं रहा मेरे दोस्त !
आओ, प्यार कर लूं तुम्हें। न मालूम किन नज़रों से इन सतरों को पढ़ रहे हो। इस तसव्वुर को ज्यादा मज़बूत नहीं करना चाहती वरना मेरे हाथ थरथराने शुरू होंगे शिद्दते-ज़ज्बात से और फिर मुझसे कुछ भी तो न लिखा जाएगा।
तुमसे मिलने को हर मिनट जी चाहता है। इस ज़ब्ते-नफ़्स (भावना पर नियंत्रण) का कुछ सवाब भी है या नहीं, ये तुम बताना। हां सुनो ! इस जुमे को सलमा देहली जा रही हैं, सईदा भी। सलमा को कपड़े खरीदने हैं, दुल्हन बनने के लिए। मेरी राय और मेरा इंतेखाब ( चुनाव) बहुत अहम् है इस मुआमले में, चुनांचे मुझे साथ ले जा रही हैं, चली जाऊं ? तुम्हारी आप शाहिदा से भी मुलाकात होगी, तुम्हारे मजाज़ से भी।
मुझे मुफस्सिल सा ख़त लिखना। महज़ प्यार की बातें लिखकर ताल देते हो मुझे। ये भी लिखना कि कैसे रहते हो और क्या करते हो ?
देहली से क्या मंगाते हो अपने लिए ? न बताओ मैं ख़ुद ही अपनी मर्ज़ी से ले आउंगी उलटी-सीधी चीज़ें, फिर उन्हें बरतना ही पड़ेगा तुम्हें।
आओ मेरे करीब , प्यार कर लूं तुम्हें। शब बखैर...

तुम्हारी सफ्फो


( सफ़िया अख्तर मशहूर शायर जांनिसार अख्तर की पत्नी थीं। जांनिसार के नाम लिखे उनके पत्रों का हिन्दी में पुस्तकाकार अनुवाद कथाकार-नाटककार असगर वजाहत ने कुछ अरसा पहले 'तुम्हारे नाम' शीर्षक से किया था। यह अनुवाद उसी पुस्तक से साभार लिया गया है। कहना न होगा कि अदब और अदीबों की दुनिया में ना-कुछ की हैसियत रखनेवाली सफ़िया का ख़त उर्दू नस्र का बेजोड़ नमूना है। इस स्तंभ के अंतर्गत इससे पहले आप फ़िराक़ गोरखपुरी को पढ़ चुके हैं।)

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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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सबद पुस्तिका : 2

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सबद पुस्तिका : 3

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सम्‍मुख - 1

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मुक्तिबोध के बहाने हिंदी कविता के बारे में - गीत चतुर्वेदी