Wednesday, July 30, 2008

बधाई : निशांत

( कविता के लिए वर्ष २००८ का प्रतिष्ठित भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार युवा कवि निशांत को दिया जाएगा। किसी एक कविता को आधार बना कर दिए जाने वाले इस पुरस्कार के लिए समकालीन भारतीय साहित्य के जुलाई-अगस्त २००७ के अंक में प्रकाशित उनकी कविता, ''अट्ठाइस साल की उम्र में '' को चुना गया है। इस वर्ष के निर्णायक नामवर सिंह थे। निशांत और उनकी कविता के बारे में उनका यह कथन उल्लेखनीय है कि बड़बोलेपन से बचते हुए यह कवि अपने आस-पास के जीवन से सीधे साक्षात्कार करता है। आगे यह कि काव्य-भाषा पर भी कवि का अच्छा अधिकार है। निशांत की कविताएं पत्र -पत्रिकाओं में एक लंबे अरसे से आ रही हैं। पहले वे अपने घरु नाम मिठाईलाल से कविताएं लिखते थे। बाद में इसे कवि-आलोचक अशोक वाजपेई के सुझाव पर बदल दिया और निशांत नाम से कविता करने लगे। वैसे उनका पढू नाम विजय कुमार साव है। उनकी कविताओं का पहला संग्रह, '' जवान होते हुए लड़के का कुबूलनामा '' भारतीय ज्ञानपीठ की युवा पुरस्कार योजना के तहत शीघ्र प्रकाश्य है। हमें खुशी है कि उन्होंने हमारे आग्रह पर पुरस्कृत कविता के साथ-साथ दो नई कविताएं भी सबद पर प्रकाशन के लिए भेजी। यह अवसर उनकी कविताओं की ओर ध्यानाकर्षण का है। पर फिलहाल तो हम यहाँ उसके मूल्यांकन का लोभ संवरण कर उन्हें बधाई और शुभकामनाएं देकर ही संतोष करते हैं। )

पुरस्कृत कविता

अट्ठाइस साल की उम्र में

सचमुच यही उसके प्रेम करने की सही उम्र है
जहाँ उसके सपनों में लहलहा रहा हो
एक पवित्र सुर्ख लाल गुलाब

इसी उम्र में दिल से निकलती है सच्ची प्रार्थना
जिसे कबूल करने से हिचकिचाता है समाज
इसी उम्र में खुलते हैं डैने जिससे तौलना पड़ता है सारा आकाश
इसी उम्र में पैर में लग जाते हैं चक्के
जिससे नापनी पड़ती है सारी पृथ्वी

यह बहुत ही महत्वपूर्ण उम्र होती है
जहाँ सबसे ज़रूरी होता है एक अनुभवी प्रेमी का अनुभव
पर अफ़सोस अपने अनुभव को सबसे श्रेष्ठ और सबसे पवित्र बताते हुए
हम ठगे जाते हैं
कभी-कभी हम जीत जाते हैं और जश्न मनाते हुए
रंगे हाथों पकड़ लिए जाते हैं अपने अन्दर ही

यहाँ तन हावी नहीं होता मन पर
मन बहुत ही हल्का पारदर्शी और पवित्र होता है इस उम्र में
तन की बात ही नहीं करता मन

ऐसी स्थितियों से गुजर चुका हूँ मैं
जहाँ सिर्फ़ दो आखें और दो बातें ही महत्वपूर्ण होती हैं
इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है
सपने में लहलहा रहे सुर्ख पवित्र गुलाब का लहलहाते रहना
पर क्या करूँ
जब सुबह उठता हूँ रात में भंभोड़ दिए गए
एक जंगली जानवर के पंजों तले अपने क्षत-विक्षत शव के लिए
तब लगता है बिना तुम्हें पाए तुम्हें प्रेम करना एक नाटक करना है

कई बार सोचा तुम्हें कहूँ
प्रेम की अन्तिम परिणति दो रानों के बीच होती है
हर बार बीच में आ गई
तुम्हारी दो आंखों में दिपदिपाती हुई पवित्रता
लहलहाता हुआ सुर्ख गुलाब
और ऐसा क्यूँ लगता कि गंगा से नहाकर माँ के साथ लौट रहा हूँ घर
शायद तुम्हारे अंदर मेरी माँ भी है

एक बार इसी पवित्रता से डरकर
एक और पवित्रता की खाल ओढे तुम्हें निमंत्रित कर बैठा था
-- '' चलो शादी कर लें। ''
-- " नहीं, पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद ''
तुम्हारे सामने अंदर का जानवर न जाने क्यों शांत ही रहता है
उस दिन उस समय भी शांत रहा
जबकि रात में बिस्तर पर एक बार और वह हिंसक हो उठा था
मैं मजबूर- लाचार हो 'प्यार' 'पवित्रता' जैसे शब्दों से क्षमा-याचना मांगता रहा
अपने को भंभोड़वाते हुए

तुम क्या जानो
एक अट्ठाइस साल की उम्र के लड़के की ज़रूरत
जो अपनी उम्र चौबीस साल बतला रहा हो
आख़िर तुम्हारी उम्र कम है
और इस उम्र से मैं भी गुजर चुका हूँ

****
दो नई कविताएं

इकतीस की उम्र में

आकाश इतनी बड़ी शुभकामनाएं
और पृथ्वी इतना बड़ा प्यार

मुझे मालूम है दोस्त !
इकतीस की उम्र में
नौकरी पाने का
हताशा और ऊब से ऊपर उठने का आनंद

' इतना पढ़ के क्या किए ! '
जैसे जुमलों से आहात हुए शरीर का घाव
कितनी आसानी से भर जाता है
एक नौकरी के मलहम से

माँ खुश होती है
चौड़ा हो जाता है पिता का सीना
भाई की आखों में आ जाती है चमक
प्रेमिका की आखों में बैठी कोमलता
उद्दाम सांसों में तब्दील हो जाती है
बहन गर्व से बतलाती है सहेलियों के बीच
ये हैं मेरे बड़े भाई साहब
जो ' फलां ' जगह ' फलां ' होकर गए हैं...

एक नौकरी
और कितना-कितना आराम
घर तो घर
मोहल्ले से होकर भगवान तक की आंखों में
आ जाती है दीप्ति
आत्मा में शान्ति
और क्या ... क्या ...

पढ़ाई पर छिड़ी सारी बहस
चली जाती है चूल्हे-भांड में
और कोई कारोबार करने की
धीमी आंच में पकती हुई विचारधारा
तब्दील हो जाती है एक शानदार मुहावरे में
' भगवान के घर देर है अंधेर नहीं '

याद आती है तुम्हारी बहस
नौकरी बेरोजगारी प्रेम सिक्षा आरक्षण जनसंख्या
फ़िल्म पत्रिकाएं कविता कहानी उपन्यास पुरस्कार
और न जाने कितने मुद्दों पर
आंखें लाल किए और मुट्ठी ताने
दुनिया को बदल डालने के स्वप्न के साथ
' जला दोमिटा दो ' की भाव-भंगिमा के साथ
' एक धक्का और देते ' के नारों के साथ
शायद हम एम ए में थे उन दिनों
देश के सबसे उत्तर-आधुनिक विश्वविद्यालय में
' लाल सलाम-लाल सलाम ' और ' हल्ला बोल-हल्ला हल्ला बोल ' कहते हुए

उम्र कम थी
और नहीं जानते थे
इकतीस की उम्र में नौकरी पाने का सुख

आकाश इतनी बड़ी शुभकामनाएं
और पृथ्वी इतना बड़ा प्यार

आज पहली बार दोस्त !
आज पहली बार ...

****
पौने दो घंटे

आधा घंटा
चुरा लिया है मैंने सुबह के समय में
समाचार पात्र पढने के लिए

एक घंटा चुरा लिया है मैंने
दोपहर की कार्यावधि के बीच से
कहानियो को पढने के लिए

पन्द्रह मिनट और चुरा लिए हैं मैंने
अपनी नींद से
कविताओं के लिए

इस तरह
पंखे की तरह दौड़ती हुई ज़िन्दगी में से
प्रतिदिन चुरा लेता हूँ मैं
पौने दो घंटे किताबों के लिए

इन पौने दो घंटे ही
रहता हूँ मैं मनुष्य
बाकी समय पंखा, रेलगाड़ी, हवाई जहाज, कंप्यूटर
और ई-मेल में तब्दील रहता हूँ
एक गंतव्य से दूसरे
और दूसरे से फिर-फिर पहले की तरफ
दौड़ लगाते हुए

****

12 comments:

Udan Tashtari said...

निशांत जी को बधाई और शुभकामनाएं.

शैलेश भारतवासी said...

नामवर जी ने बिलकुल सच कहा है। कवि ने अपनी कविता में खुद को नहीं आने दिया है। सच लिखा है। और कविता वही होती है जो सच हो। मैं २६ का ही हूँ लेकिन २८ और ३१ दोनों का सच समझता हूँ। यह सच मेरा भी है-

जब सुबह उठता हूँ रात में भंभोड़ दिए गए
एक जंगली जानवर के पंजों टेल अपने क्षत-विक्षत शव के लिए
तब लगता है बिना तुम्हें पाये तुम्हें प्रेम करना एक नाटक करना है

और ३१ के सच से तो मेरे सारे दोस्त २४ और २५ में ही गुजर चुके हैं-

एक नौकरी
और कितना-कितना आराम
घर तो घर
मोहल्ले से होकर भगवान् तक की आंखों में
आ जाती है दीप्ति
आत्मा में शान्ति
और क्या ... क्या ...


और इस सच को पढ़कर तो किसे अपना सच नहीं लगेगा, कम से कम उसे जो पौने दो घंटे के लिए इंसान बन जाता हो, उसे तो ज़रूर-

इन पौने दो घंटे ही
रहता हूँ मैं मनुष्य
बाकी समय पंखा, रेलगाड़ी, हवाई जहाज, कंप्यूटर
और ई-मेल में तब्दील रहता हूँ
एक गंतव्य से दूसरे
और दूसरे से फिर-फिर पहले की तरफ
दौड़ लगाते हुए

निशांत जी आपको बहुत-बहुत बधाई और भविष्य के लिए शुभकामनाएँ। आपका नं॰ होता तो सीधे आपको फोन करता।

खैर अनुराग वत्स ने आपकी बात हम तक पहुँचाकर हमपर कृपा की है। इन्हें भी साधुवाद

Geet Chaturvedi said...

निशांत को बधाइयां. और शुभकामनाएं.

बाल किशन said...

निशांत जी को बधाई और शुभकामनाएं.
बहुत ही अच्छी और सच्ची कवितायें लिखते है वो.
आपका आभार.

ravindra vyas said...

यह सचमुच अपार खुशी का वक्त है कि हिंदी में इस पुरस्कार के बहाने कुछ अच्छे कवियों को पहचाना जाकर रेखांकित किया जा रहा है। निशांत को बधाई भी और शुभकामनाएं कि उनकी रचनात्मकता नए आयाम छूती हुई, ऊचाइयां भी छुएगी।
रवींद्र व्यास, इंदौर

aalekh said...

namvarji ka kavit-vivek kya is darje tk gir chuka hai ki we jis-tis ko bharat bhushan dete chalen!

vidya said...

hamare yuwa muflis dino ki sachhi dastan.nishantji ko badhai.

ajay said...

bahut achhi kavitayen hain nishant ki.khaskar paune do ghante to hmari apni kavita lagti hai.puraskrit hone pr badhai.

vivek said...

yah kavita nahin kisi ki bakwas hai.kuchh likh dene se koi kavi nahin ho jata,kavi kavita likhne se hota hai.behtar hota ki nishant kavita likhne ka nahin puraskar lene ka riyaz karte.

सागर said...

आज तो बस आपने दिन बना दिया सर, आबेहयात पढवाया है... देर से ही सही निशांत को बधाई.

दीनदयाल शर्मा said...

प्रिय भाई, निशांत जी. कविता कोश में आपका नाम निशांत देख कर अचम्भा हुआ, चूँकि ये नाम तो हमारे क्षेत्र के जाने माने कवि और कथाकार निशांत जी का है.वैसे नाम एक सा होना सामान्य बात है..लेकिन आपके नाम के साथ हमारे चिर परिचित निशांत जी की कवितायेँ देख कर अचम्भा होना स्वाभाविक है..पते की जगह हमारे परिचित निशांत जी का पता है.. और फोटो आपकी है..ये दोनों घालमेल ..आप दोनों के लिए नुक्सान दायक है....कृपया आप इसमें सुधार करें..दीनदयाल शर्मा , बाल साहित्यकार , हनुमानगढ़ जं.
09414514666 , 09509542303
deendayalsharma.blogspot.com

vibha rani Shrivastava said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 18 मार्च 2017 को लिंक की जाएगी ....
http://halchalwith5links.blogspot.in
पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!