सबद
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तीन श्रद्धांजलियाँ

12:13 am



पहले कवि-नाटककार हैरॉल्ड पिंटर, फ़िर चिंतक सैमुएल हंटिंगटन और अब चित्रकार मंजीत बावा के निधन की ख़बर आई है। रचना, विचार और कला की दुनिया को इन तीनों ने अलग-अलग ढंग से आलोकित किया। पिंटर ने कवि-नाटककार से आगे जाकर एक सार्वजनिक बौद्धिक की भूमिका का भी निर्वाह किया। मौजूदा वक्त में पिंटर सरीखे लेखक और जन बौद्धिक की प्रजाति लुप्तप्राय है। पिंटर का हमारे बीच से जाना इस सन्दर्भ में और भी दुखद है।

हंटिंगटन
को विचार-विमर्श की दुनिया में उनकी पुस्तक , '' The clash of civilizations and the remaking of world order'' की अत्यन्त मौलिक और विचारोत्तेजक स्थापनाओं के लिए याद किया जाता है। हंटिंगटन ने यह पुस्तक उस दौर में लिखी जब यह प्रश्न जिज्ञासा और आशंका के मिले-जुले स्वर में पुछा जा रहा था कि क्या आने वाले समय में सभ्यताओं का संघर्ष वैश्विक राजनीति के केन्द्र में होगा ? अपनी पुस्तक के ज़रिये उन्होंने इस सवाल का जवाब देने के अलावा सभ्यताओं के संघर्ष के बीच वैश्विक शान्ति और सहअस्तित्व कायम रखने के रास्ते भी बताए। कहना न होगा कि हंटिंगटन द्वारा शुरू किए गए विमर्श का दायरा आज कितना बड़ा हो गया है और एक साथ हम सभ्यतागत संकट और उसके नजदीकी संघर्ष से आए दिन कितना अधिक दो-चार हो रहे हैं। हंटिंगटन की तरह हमें भी तेजी से बदल रही दुनिया में इन सवालों का जवाब ढूंढते रहना होगा।

मनजीत
बावा को उचित ही कई लोग भारतीय चित्रकला में हुसेन, रामकुमार और रजा की पीढ़ी के बाद के चंद विलक्षण चित्रकारों में से एक मानते हैं। रामचंद्रन की तरह उनके यहाँ भी मिथकों का एक गहन चित्रान्वेषण मिलता है। मनजीत ने अपने जीवन के आखिरी तीन वर्ष कोमा में गुजारे।
सबद की ओर से पिंटर, हंटिंगटन और बावा को श्रद्धांजलि।

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कुंवर नारायण पर असद ज़ैदी

1:11 pm
'ईमान का खाता' : कुंवर नारायण और उनकी कविता

असद ज़ैदी

धीरे धीरे टूटता जाता
मेरी ही हँसी से मेरा नाता

कुंवर
नारायण का लहजा ऐसे आदमी का लहजा है जिसने बहुत ज़माना देखा है। वह अपने तजरुबे की गहराई, सुलझेपन और अपनी आसानियों से चकित करते हैं और इस राह की दुश्वारियों को ओझल बनाते रहते हैं। काव्यशास्त्रीय नज़र से देखेंतो कह सकते हैं उनके लहजे ही में सब कुछ है। उनको पढ़ते हुए लगता है किउनका काफ़ी ज़ोर अपने इसी लहजे को साधे रखने और इसी ठाठ को बनाए रखने में सर्फ़ होता है--यही उनकी तर्ज़ है। बुफ़ों के शब्दों में : 'द स्टाइल इज़ द मैन'।

पर यह कहना असंगत न होगा कि स्टाइलिस्टों से कुलबुलाते काव्य-परिदृश्य में वह एक महत्वपूर्ण स्टाइलिस्ट-भर नहीं हैं। वह मूलतः नैतिक और सामजिकरूप से अत्यन्त सावधान और प्रतिबद्ध कवि हैं। हिन्दी के अव्वलीन नागरिक-कवि का कार्यभार और अधिकार अब उन्हीं के पास है। एक ज़माना पहले, 1960 के दशक के आरंभिक वर्षों में, मुक्तिबोध ने उन्हें अपने समीक्षात्माक लेख में 'अंतरात्मा की पीड़ित विवेक-चेतना और जीवन की आलोचना' का कवि कहा था। कुंवर नारायण ने हरदम मुक्तिबोध की इस निशानदेही का मान रखा और कभी भी पहचान के इस घेरे से बाहर नहीं गए।

उनकी शाइस्तगी, संतुलन, नर्म-मिज़ाजी और धैर्यशील तबियत की वजह से उन्हें मध्यममार्गी विचारधारा का प्रतिनिधि कवि माना जाता है। यह कोई ग़लत धारणा भी नहीं है पर यह उनके मूल स्वभाव का ठीक से अहाता नहीं करती। वह एक बेचैन, नाराज़ और मेहनती इंसान भी हैं। अपने समय के गंभीर मानवीय सवालोंपर--वे राजनीतिक हों या सांस्कृतिक--वह पोज़ीशन लेने से नहीं बचते। वह अपनी वज़ेदारी या मुरव्वत-पसंदी को बेशतर अपने ईमान के आड़े नहीं आने देते। उनकी तबियत ही को उनकी शख्सियत और काम का समानार्थक मान लेना उन्हें एक पहले से बने खांचे में ढालना है।

यूँ भी आम विमर्शों में 'मध्यम मार्ग' का बहुत भ्रामक अर्थों में इस्तेमाल होता रहता है। अव्वल तो एक ऐसे मुल्क और ज़बान में जहाँ मध्यममार्ग आम तौर पर लद्धड़पन और विकल्पहीनता का ही दूसरा नाम होता है, उसे एक उस्तादाना आत्मविश्वास के साथ आकर्षक, रचनात्मक और नैतिक रूप सेविश्वसनीय बनाना कोई आसान काम नहीं है। दूसरे, कुंवर नारायण का मध्यममार्ग कोई 'सेफ़' या आसान मार्ग भी नहीं है।

उनकी प्रगतिशीलता या गतिशीलता और रैडिकलिज़्म इस बात में है कि वह मध्यममार्ग की ओट में यथास्थितिवाद से समझौता नहीं करते, बल्कि बार बारयथास्थिति की विडंबनाओं और अतियों को ही निशाना बनाते हैं। वह विकल्प कोसम्भव और प्रतिरोध को ज़रूरी मानते हैं। वह उस सिनिसिज़्म को अपने पास नहीं फटकने देते जो सत्ता और प्रतिरोध के दरम्यान, यथास्थिति और विकल्प के दरम्यान, लगातार नैतिक बराबरी खोजता रहता है। नैतिक समतुल्यता की तलाश , बल्कि चाह, हमारे मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी जगत का प्रिय शग़ल है जो कि सामाजिक प्रतिक्रियावाद का ही एक रूप है। यह वह लिबास है जोमध्यवर्गीय बौद्धिकों की उरियानी को ढकता है। ऐसा नहीं है कि कुंवर नारायण की नज़र वैकल्पिक राहों के ख़तरों और गड्ढों पर नहीं रहती : वह उनको लेकर ख़ुद को और दूसरों को आगाह और तैयार भी करते हैं, पर किसी हाल में यथास्थिति में रिलैप्स नहीं करते।

कुंवर नारायण ने अपने कृतित्व में जितना ध्यान देखने, सुनने और बोलने में लगाया है उससे ज़्यादा जानने, जज़्ब करने और समझने में सर्फ़ किया है। उनके जैसी अध्ययनशील और मननशील कविता अपने लिए काफ़ी जगह और अवकाश मांगती है। फिर उसे एक दिलकश सादगी, विनम्रता, सम्प्रेषणीयता और लुत्फ़ के साथपेश होना होता है। यहाँ भी इसके पीछे की जो मशक़्क़त और उधेड़बुन है वह दिखाई नहीं देती, अपने कारख़ाने को वह ओझल ही रखते हैं। वहाँ निहित ऊर्जा भी अपनी ओर ध्यान नहीं खींचती।

ऐसा किफ़ायत-शुआर कवि जब कहता है 'अबकी बार लौटा तो / बृहत्तर लौटूंगा' तो यह एक बहुत बड़ा वक्तव्य बन जाता है, एक साथ विश्वसनीय और लगभग पौराणिक। कुंवर नारायण का हुनर यही है : उन्हें मालूम है कि उनकी सामर्थ्य का बिन्दु कब और कहाँ आ रहा है। उन्हें उसे पाने के लिए ज़ोरआज़माईश नहीं करनी पड़ती। जब वह कहते हैं कि 'इन गलियों से / बेदाग़ गुजर जाता तो अच्छा था' तो पिछले बीस तीस साल का भारतीय इतिहास ही नहीं, साराका सारा भारतीय दुखांत आंखों के सामने घूम जाता है। इन दो पंक्तियों में क्या नहीं है ? कुंवर जी के काव्य में दर्दमंदी तो है ही, 'अपने ही सिरहाने बैठकर' अपने को देखने की बेदर्द कोशिश भी है।

उनकी
कविता में कई ज़बानों, कई वक़्तों, और कई साहित्यिक संस्कृतियों का संगम है। उन्हें पढ़ते हुए अक्सर कवाफ़िस और लुई बोर्खेस की याद आती है जो उन्हीं जैसे गुणग्राहक और पारखी कवि थे। और उनकी दिलचस्पियों का घेरा भी काफ़ी बड़ा है : इतिहास, पुरातत्व, सिनेमा, संगीत, कला, क्लासिकल साहित्य, आधुनिक विचार, समकालीन विश्व साहित्य, संस्कृति विमर्श। उर्दू की क्लासिकी कविता तो उनकी प्रेरणा का स्रोत रही ही है।

इन
सब चीज़ों पर और बहुत सी बातों पर सोचते हुए जिस एकमात्र हिन्दी कवि की बार-बार याद आती है वह हैं उनके पुराने साथी रघुवीर सहाय, जिन्हें गए अब क़रीब बीस साल हो जाएँगे। दोनों एक ही परम्परा के जुड़वां वारिस हैं, दोनों की अपनी-अपनी ज़मीन है--कुंवर नारायण का इलाक़ा ज़्यादा बड़ा है, उनके यहाँ ज़्यादा चीज़ें, ज़्यादा आवाज़ें, ज़्यादा भाषाएँ और ज़्यादा स्वीकार है। वह कम मध्यवर्गीय और कम परेशान हैं। पर न सिर्फ़ उनके काम एक-दूसरे के पूरक हैं, बल्कि दोनों की खामोशियाँ और नाराज़ियाँ एक ही तरह की हैं। अपनी चुप्पी और फ़िक्रमन्दी में वे बिल्कुल एक हैं। दोनों के शाइर नासिख़ नहीं ग़ालिब ठहरते हैं, और दोनों अनीस से ज़्यादा मीर की महफ़िल में दिखाई देते हैं। उर्दू में जिसे 'देहलवियत' कहा जाता है, हिन्दी कविता में वह चीज़ और वह तर्ज़ लखनऊ के इन दो हिन्दी कवियों में पाई जाती है। वह शोखी से बचते हैं पर अपनी ज़राफ़त दिखाते हुए कहते हैं : 'लगता है कोई भीषण दुर्व्यवस्था / हमारी रक्षा कर रही।'

ज्ञानपीठ सम्मान हिन्दी कविता की इस महान, पर अपेक्षाकृत ख़ामोश, लखनवी परम्परा का सम्मान है।
ज्ञानपीठ पुरस्कार ने भी, जो बीच बीच में बुरी तरह लड़खड़ा जाता है, कुंवर नारायण के बहाने कुछ विश्वसनीयता और प्रासंगिकता वापस पाई है।

( कुंवरजी को हाल में वर्ष २००५ का ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई है। यह लेख उसके बाद ही दैनिक ''आज समाज'' के लिए लिखा गया था। हम असदजी के आभारी हैं जिन्होंने इसे सबद में पुनः प्रकाशित करने की अनुमति दी। इससे पहले सबद में ही कुंवरजी पर क्रमशः पंकज चतुर्वेदी, गीत चतुर्वेदी, गिरिराज किराडू और प्रभात रंजन लिख चुके हैं। )

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सिगरेट छोड़ने के बहाने : ओरहन पामुक

11:37 am
लिखना...अगर आपको इसमें सुख मिलता है तो...इससे सारे दुख मिट जाते हैं

ओरहन पामुक

मुझे सिगरेट छोड़े हुए २७२ दिन हो गए। अब आदत हो गई है। मेरा तनाव कम हो गया है और मुझे अब ऐसा नहीं लगता कि मेरे शरीर का कोई हिस्सा टूट रहा है। पर ऐसा असल में है नहीं । सचाई यह है कि एक अभाव की भावना से मैं अब तक नहीं छूटा हूँ। मैं इस सोच की ज़द में रहा कि मुझे मेरे स्व से अलग कर दिया गया है। और ज्यादा सही यह कहना होगा कि अब मुझे ऐसे जीने की आदत हो गई है। निष्ठुर सत्य को मैंने स्वीकार कर लिया है।

अब मैं फिर कभी सिगरेट पीऊंगा। कभी नहीं।

ऐसा कहते हुए भी मैं दिवास्वप्न देखता हूँ कि मैं सिगरेट पी रहा हूँ। अगर मैं कहूँ कि ये दिवास्वप्न इतने भयानक और गोपनीय हैं कि उन्हें हम अपने आपसे भी छिपाते हैं... समझते हैं ? वैसे भी, यह बात ऐसे ही एक दिवास्वप्न के दौरान होगी और उस क्षण जो भी खिचड़ी मैं पका रहा होऊँगा, जैसे-जैसे मैं इस फिल्म यानी कि अपने सपने को शिखर तक जाता देखता हूँ, मुझे उतनी ही खुशी मिलती है जितनी कि पीने के लिए एक सिगरेट जलाने से मिलती है।

तो सुख-दुख, आकांक्षा और हार, उदासी और उल्लास, वर्त्तमान-भविष्य के अनुभव को धीमा कर देना और हर दो तस्वीरों के बीच नई राहें और नए शार्टकट ढूँढना; मेरे जीवन में सिगरेटों का यही मुख्य उद्देश्य था। जब ये संभावनाएँ नहीं रहतीं, आदमी खुद को नंगा जैसा महसूस करने लगता है। कमज़ोर और असहाय।

एक बार मैं एक टैक्सी में बैठा, ड्राइवर एक के बाद एक सिगरेट पी रहा था। गाड़ी के अंदर गहरा धुआँ भरा हुआ था। मैं साँस के साथ धुआँ अंदर खींचने लगा।
'माफ कीजिएगा' उसने कहा। वह खिड़की खोलने लगा था।
'नहीं,नहीं, 'मैंने कहा, 'बंद रखो। मैंने सिगरेट छोड़ दिया है।'
मैं देर तक बिना सिगरेट की चाहत के जी सकता हूँ, पर जब पीने को जी चाहता है तो यह चाहत अंदर गहरे कहीं से आती है।

फिर
मुझे अपना भूला हुआ आपा याद आता है, जो दवाओं, जोड़तोड़ और स्वास्थ्य की चेतावनियों से बँधा हुआ स्व है। मैं वह वापस बनना चाहता हूँ, वह ओरहान जो मैं कभी था, सिगरेट पीने वाला, जो शैतान का सामना करने में कहीं ज्यादा काबिल था।

पुराने ओरहन के बारे में सोचते हुए सवाल यह नहीं उठता कि मैं तुरंत सिगरेट जलाऊँ। पुराने दिनों की वह रासायनिक जुगुप्सा अब नहीं होती, बस अपना पुराना आपा बहुत याद आता है, जैसे कि कोई खोया दोस्त या चेहरा याद आए। बस यही मन होता है कि मैं वापस वह बन सकूँ जो कि मैं कभी था। ऐसा महसूस होता है कि मुझे ऐसे कपड़े पहना दिए गए हैं, जिन्हें मैंने नहीं चुना। जैसे कि उन्हें पहनकर मैं ऐसा कुछ बन गया हूँ जो मैं कभी नहीं था। अगर मैं फिर सिगरेट पी सकूँ तो मुझे फिर पहले जैसे रातों के तीखे अहसास होंगे, उस व्यक्ति के आतंक वापस आ जाएँगे, जो कि मैं खुद को मानता था ।

जब मैं अपने पुराने ओरहन तक लौटना चाहता हूँ, मुझे याद आता है कि उन दिनों मुझे शाश्वत जीवन की बेतरतीब सूचनाएँ आती थीं। उन पुराने दिनों में, जब मैं सिगरेट पीता था, वक्त रुक जाता था। मुझे कभी ऐसा चरम सुख मिलता या कभी इतनी तीव्र पीड़ा होती कि मुझे लगता कहीं कुछ बदलेगा नहीं। मैं मजे से सिगरेट के कश लेता और दुनिया अपनी जगह खड़ी होती।

फिर मुझे मौत से डर होने लगा। कागज़ात में यह गहराई से समझाया हुआ था कि सिगरेट पीता वह आदमी कभी भी गिर कर मर सकता है। ज़िंदा रहने के लिए मुझे धुएँ के नशेड़ी को छोड़ना पड़ा और मैं कुछ और बन गया। ऐसा करने में मैं सफल हुआ। अब मेरा त्यागा हुआ स्व शैतान से जा मिला है और मुझे वापस उन दिनों में लौटने को कहता है जब वक्त हमेशा के लिए रुका हुआ था और कोई मरता नहीं था।

उसकी पुकार से मैं डरता नहीं हूँ।

क्योंकि जैसे कि आप देख सकते हैं, लिखना...अगर आपको इसमें सुख मिलता है तो...इससे सारे दुख मिट जाते हैं।

*****

( पामुक किसी परिचय के मुहताज नहीं। २००६ में नोबेल पुरस्कार से नवाजे गए तुर्की के इस पहले साहित्यकार की कथाकृतियों से आप अच्छी तरह परिचित होंगे। ऊपर पामुक की कथेतर गद्य के चयन ''अदर कलर्स'' से एक अंश दिया गया है। इसका अनुवाद हमारे आग्रह पर कवि-लेखक लाल्टू ने किया है। हम इसके लिए उनके अत्यंत आभारी हैं। हिन्दी के वाक्य-विन्यास आदि को ध्यान में रख कर गद्य के इस टुकड़े में अनुवाद से पुनरीक्षण तक आंशिक बदलाव किए गए हैं। हम आगे भी इस तरह के अनुवाद प्रकाशित करेंगे। )

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किस तरह से लिखूं मैं / निवेदिता / कि लगे/ तुम / हो ?

6:59 pm


( वक्त-वक्त पर सबद में नए कविओं को वरिष्ट कवि-लेखकों के समान ही महत्व देकर प्रकाशित किया जाता रहा है। उसी कड़ी में इस बार विपिन कुमार शर्मा की कविताएं दी जा रही हैं। विपिन की कविताएं यों पत्र-पत्रिकाओं में आती रही हैं और वे इतने भी अजाने और नए नहीं हैं कि उनकी कवि-पत्री बांची जाए। पर यह ज़रूर है कि जैसा उनकी कविताओं से किसी काव्य-मुद्रा के असर में न होकर लिखने का पता चलता है, उसी तरह व्यवहार में कवियशःप्रार्थी न होने की वजह से वे अलक्षित होते रहे हैं। ऐसे कई युवा और महत्वपूर्ण कवि हैं जिनकी किसी दरबार में हाजिरी नहीं है और वे अपनी कविताओं के बूते सुधि पाठकों की निगाह में बने हुए हैं। सबद इन कवि-लेखकों का सच्चा सखा बनने की आकांक्षा रखता है। विपिन ने अपनी जो कविताएं दी थीं उनमें से चार कहीं भी पहली बार प्रकाशित हो रही हैं, जबकि पांचवीं कविता पूर्व प्रकाशित है। )

नई कविताएं

सुकवि की मुश्किल

बहुत तड़पकर हाथ मलता है कवि
जब उसे पता चलता है
कल रात
साड़ी दुनिया का प्रेम ओढ़कर
जब वह लिख रहा था प्रेम कविता
ठीक उसी वक्त
पड़ोस की एक लड़की
उसको मदद के लिए पुकार रही थी
किया जा रहा था उसका बलात्कार
लगभग उसी समय
चंद रुपयों के लिए
दबाया जा रहा था गला
एक वृद्ध का
जो परदेस में पसीना बहा रहे
दो मजदूरों का पिता था

और भी जाने कितनी बुरी खबरें लेकर
आया था वह दिन

कवि सोचता है
अगर उस रात
उसने नहीं लिखी होती कविता
तो सुन सकता था वह इन सबकी गुहार
और कुछ न कुछ करता ज़रूर

शर्मसार हो जाता है वह
और चाहता है फाड़कर फ़ेंक दे उस कविता को
फिर कुछ सोचकर रह जाता है

कल रात
कुछ प्रेमी ज़रूर ही लिख रहे होंगे
प्रेम-पत्र
और कुछ प्रेमी रोते रहे होंगे
पूरी रात
इबादत की मुद्रा में
उन सब तक पहुंचानी होगी यह कविता
जीवन जहाँ से बच सके
बचाना होगा
इन दुखों से
पार तो पाना होगा
****
पाषाण युग

सुनते हैं
सभ्यता के विकास-क्रम में
जब आग की खोज अधूरी थी
तो मनुष्य
कच्चा ही चबा जाता था जानवरों को
( इंसानों को नहीं )

फिर जानवर कम होने लगे
इंसानों में बढोतरी होने लगी
फिर भी खाने की समस्या नहीं थी
खाने की चीजें इफरात में थीं
लेकिन
आग नहीं थी

फिर लोगों ने एक अद्भुत तरकीब निकाली
( यह चकमक पत्थर से पहले की बात है )
वे आपस में ही टक्कर मारने लगे
उनके टकराने से
कभी-कभी चिनगारी भी निकल आती
जिससे वे जला लेते आग
उसमें भून लेते खाने को कुछ
इससे खाने की समस्या भी कम हुई
और इंसान भी कम होने लगे

हालाँकि
यह चकमक पत्थर से पहले की बात है
तब मनुष्य
आज की तरह सभ्य नहीं था।
****
किताब के बहाने से : एक

तुमने पढ़कर लौटा दी किताब
आज मेरे पास काम ही काम है

पहले हरेक पृष्ठ
फिर परिच्छेद
और अब एक-एक शब्द को
टटोल रहा हूँ
कहाँ छुपी हुई हो तुम
कहीं से तो निकलो

हरेक शब्द को स्नेह से छूता हूँ, पर
कहीं नहीं मिलती तुम्हारी
कैसी भी पहचान
हारकर, बेसहारा-सा
किताब से आँखें ढँक कर
रो रहा हूँ...

आख़िर कहीं तो मिलोगी तुम !
****
किताब के बहाने से : दो

मैंने कहा ,
'' कितना कुछ है इस कहानी में
अजब-सा प्रेम और आवेग !''
तुमने कहा,
'' ऐसा तो कुछ भी नहीं
निरी भावुकता !''


मैं ऊपर-ऊपर हंस देता हूँ -
'' यों ही कहा था मैंने
तुमने सच कहा
ऐसा तो बिल्कुल नहीं है
इस कहानी में।''

तुम भी खुलकर मिला देती हो
मेरी हँसी में
अपनी हँसी
मगर इतनी-सी बात पर
छलक आए हैं मेरे आंसू

रोना
क्या अकेले ही होगा ?
****
पुराना चावल

किस तरह से

मूल्य बन चुका है
अविश्वास
इस युग का !
कुछ भी विश्वसनीय नहीं
न शब्द
न अर्थ
न भाषा
न लिपि

मैं कैसे लिखूं ''प्यार''
कि उसका अर्थ
घृणा न हो
द्वेष न हो
छल न हो
केवल प्यार हो ?

किस तरह से लिखूं मैं
निवेदिता
कि लगे
तुम
हो ?
****
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कवि कह गया है : १ : संजय कुंदन

12:28 pm



कविता के बारे में कुछ बेतरतीब बातें

हिंदी कविता के बारे में दो परस्पर विरोधी बातें कही जा रही हैं। एक तो यह कि अब काव्य परिदृश्य में ऐसा कुछ खास नजर नहीं आ रहा जो ध्यान खींचता हो, युवा कवियों ने ऐसा कुछ नया नहीं जोड़ा जिसे रेखांकित किया जा सके। लेकिन दूसरी तरफ कुछ लोग बेहद आश्वस्त होकर यहां तक कहते हैं कि यह कविता का स्वर्ण युग है। इतने सारे कवि लिख रहे हैं, यही क्या कम है। एक कवि इन दो तरह के वक्तव्यों को किस रूप में ले ? या उसे इन पर ध्यान देने की कोई जरूरत है भी कि नहीं ?

एक बार एक वरिष्ठ कवि ने मुझसे कहा था कि हमें इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिए कि हमारे पाठक हैं या नहीं। तब मुझे यह सवाल बहुत दिनों तक परेशान करता रहा था कि क्या कवि अपनी एक स्वायत्त दुनिया में बंद होकर चुपचाप कविता लिखता रहे, किसी गुह्य या रहस्यमय साधना की तरह ? क्या हमें उनकी अपेक्षाओं और शंकाओं से मुंह फेर कर बैठ जाना चाहिए, जिनके लिए हम लिखने का दावा करते हैं ? क्या हमें उनसे यह कहना चाहिए कि मैं जो लिख रहा हूं लिखता रहूंगा तुम्हें समझना है तो समझो वरना भाड़ में जाओ। हमें तुम्हारी परवाह नहीं।

क्या कवि इस बात की चिंता बिलकुल न करे कि वह जो लिख रहा है, उसका आखिरकार क्या होने वाला है ? या वह काव्य परिदृश्य में अपनी भूमिका और कविता की स्थिति या भविष्य पर भी गंभीरतापूर्वक विचार करे ? कविता की सार्थकता और कवि के सरोकार का मामला मुझे रह-रहकर परेशान करता है। यह सवाल हर बार नए रूप में सामने आ खड़ा होता है। मेरे कई साहित्यिक मित्र (जो नियमित-अनियमित रूप से कविता पढ़ते हैं ) यह शिकायत करते रहते हैं कि आज की कविता बिलकुल एक जैसी लगती है। सभी कवि एक तरह से लिख रहे हैं। मैं पहले इसे उनका साहित्यिक अज्ञान मान कर खारिज कर देता था लेकिन अब इसे गंभीरता से लेता हूं और खुद को कठघरे में खड़ा पाता हूं। मेरे उन मित्रों की आपत्ति पूरी तरह सही न भी हो, तो भी हिंदी कविता की वर्तमान भाषा या उसके ढांचे को लेकर गंभीर बहस की गुंजाइश जरूर है।

सच कहा जाए तो हिंदी कविता कहीं न कहीं ठहराव का शिकार होती जा रही है। पिछले दो दशकों में इसकी भाषा में, कहने के अंदाज में कोई अहम बदलाव नहीं आया है। इस अवधि में मोटे तौर पर दो तरह की भाषा प्रचलित रही है। एक तो केदारनाथ सिंह की भाषा, जो कुछ हद तक अपनी संरचना में प्रगीतात्मक लगती है और दूसरी रघुवीर सहाय की नाटकीय भाषा जो गद्य के बेहद करीब है। इन दोनों के बाद उभरे ज्यादातर कवियों ने इन्हीं दो भाषा रूपों को अपनाया। किसी के ऊपर एक का ज्यादा प्रभाव है तो किसी में इन दोनों का मिला-जुला रूप दिखता है। इन दोनों से हटकर एकदम अलग तरह से लिखने का कोई महत्वपूर्ण प्रयास अब तक सामने नहीं आया है। शायद इसीलिए आज की कविता के बारे में कहा जाने लगा है कि हरेक कविता एक ही कवि की लिखी हुई प्रतीत होती है।

गद्य में निहित काव्यात्मक संभावना को विष्णु खरे ने एक उत्कर्ष पर पहुंचाया है। आज कई कवि उसका अनुसरण कर रहे हैं। उसी तरह केदारनाथ सिंह ने अपने भाषा-शिल्प को क्लाइमेक्स पर पहुंचा दिया है। कई युवा कवियों में उसका दोहराव ऊब पैदा करता है। जब भाषा का कोई चौखटा बन जाए तो उनमें कई नए विषयों, संवेदनाओं और अनुभवों के प्रवेश की गुंजाइश कम हो जाती है। शायद इसलिए हिंदी कविता में विषयों-प्रसंगों का भी दोहराव हो रहा है। हालांकि इसकी एकमात्र वजह यही नहीं हो सकती। यह कवियों के अनुभव संसार की सीमा या उनकी वर्गगत सीमा हो सकती है, जिस पर अलग से बहस की जरूरत है।

क्या ऐसा नहीं लगता कि आज काव्यभाषा को एक बड़े झटके की जरूरत है ताकि कविता के लिए कुछ नए रास्ते खुलें, उसका एक नया तेवर, नया मिजाज सामने आए ? लेकिन यह बदलाव क्या होगा, कैसा होगा इस बारे में किसी तरह का अनुमान लगाना मुश्किल है। इसके बारे में कोई बना-बनाया सिद्धांत भी नहीं है।

कई बार नए रास्ते की तलाश के लिए पीछे मुड़कर देखना होता है। अक्सर भाषा-शिल्प का रिवाइवल भी होता है। मुमकिन है हर कवि अपने स्तर पर इस सवाल से जूझ रहा हो और अपने तरीके से हाथ-पैर भी मार रहा हो। लेकिन यह कुल मिलाकर एक जोखिम है जिसे स्वीकार करना आसान भी नहीं है। सच कहा जाए तो कवियों में इससे बचने की प्रवृत्ति ज्यादा रही है। कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो आम तौर पर भाषा संबंधी प्रयोग दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। इसकी एक वजह यह है कि हिंदी में एक खास तरह का सौंदर्यशास्त्र हावी है। उसी के तहत लिखने वालों को प्रोत्साहन-पुरस्कार आदि मिलता है। एक युवा कवि एकदम नए रास्ते अपनाकर गुमनाम होने की बजाय प्रचलित काव्यरूढि़ का दामन थामकर तुरंत-फुरंत कवि होने का तमगा हासिल कर लेना बेहतर समझता है।

असल दिक्कत यह है कि कविता के संसार में पाठकी दखल कम से कम है। कवि को पहचान वरिष्ठ कवियों या आलोचकों से मिलती है न कि पाठकों से। अब यहां यह सवाल सामने आता है कि क्या हिंदी कविता की नियति एक छोटे से क्लब में सीमित हो जाने में है या उसका हिंदीभाषी जनता से भी कुछ लेना-देना है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि यह समय ही कविता के ड्राइंग रूम में बंद हो जाने का है ? फिर हम उस काव्य परंपरा का क्या करें जो हमें नागार्जुन-त्रिलोचन जैसे कवियों से मिली है ?
****

( संजय कुंदन जाने-माने कवि-कथाकार हैं। उनके दो कविता संग्रह और एक कहानी संग्रह प्रकाशित हैं। कविता के लिए उन्हें वर्ष १९९८ का प्रतिष्ठित भारतभूषण अग्रवाल सम्मान मिल चुका है। सबद में संजय जी का लिखना लंबे अरसे से टल रहा था। पर जब उन्होंने अपना यह पर्चा लिख कर दिया तो लगा इस देरी की एक तरह से भरपाई हुई। उन्होंने अपने पर्चे में जोखिम लेकर कुछ बहुत ज़रूरी सवाल उठाये हैं। ऐसे सवालों का सामना न करने में ही कई बार हम अपनी सुरक्षा महसूसते हैं और गर सामना करना ही पड़े तो अक्सर किसी बौद्धिक तैयारी के बगैर पिष्टपेषण करते हैं। )

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हम उम्मीद करें ...

10:18 am
अभी थोड़ी देर पहले ही मुंबई में धमाके ख़त्म हुए हैं और उसकी पल-पल बदलने और दिल बैठा देने वाली सर्द ख़बरों की ज़द से निकल कर मैं अपने मोर्चे पर आया हूँ। इसे आंकड़ों में कहने की ज़रूरत नहीं कि देश पर हुए इस फ़िदायीन हमले में कितने निर्दोष लोगों का खून बहा। यह ज़रूर है कि इस नाजुक मौके पर सुरक्षा बलों और मीडिया ( एकाध टी आर पी पीड़ित चैनल्स को छोड़कर ) ने जितनी तत्परता और जिम्मेदारी का परिचय दिया वह काबिलेतारीफ है। यह भी गौरतलब है कि इस मौके को कुछ सियासी दलों ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए मुफीद समझा पर उनके मंसूबे किस कदर मखौल का विषय बन गए हैं यह किसी से छुपा नहीं है। यह एक लोकतंत्र के रूप में हमारे वयस्क होने का भी प्रमाण है। ऐसी घटनाओं के बाद जिस एक बात की ओर ध्यान जाना लाजिमी है, वह है हमारे नीति-निर्माताओं का बयान। चूँकि वह इतना घिसा-पिटा और दरहकीक़त इतना बेअसर है कि उसे लेकर हमारे मन में गुस्से और तकलीफ का भाव एक साथ जगता है। हम उम्मीद करें कि उनके ये बयान महज कोरी बातें न रहकर स्थिति में बदलाव लाने में भी सक्षम होंगे।

सबद मुंबई में जान गंवाने वाले तमाम निर्दोष लोगों और उन्हें बचाने की मुहिम में शहीद हुए सुरक्षा बलों के प्रति अपनी हार्दिक संवेदना प्रगट करता है।

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सबद विशेष : ६ : कुंवर नारायण : नई निगाह में

1:27 pm

( यह सबद की ओर से किए गए आग्रह से कहीं ज़्यादा अपनी भाषा के एक बड़े कवि-लेखक के सम्मान में लिखने की अन्तःप्रेरणा ही रही होगी जिसकी वजह से इन युवा कवि-लेखकों ने कुंवरजी के बहुविधात्मक कृतित्व पर इतना त्वरित लेखन किया। इनमें से पंकज चतुर्वेदी पहली बार ब्लॉग की दुनिया की ओर अपना रुख कर रहे हैं, उनका स्वागत ! गीत और गिरिराज ने कुंवरजी की कविता पर ख़ुद को एकाग्र किया है, जबकि प्रभात रंजन ने उनके एकलौते कहानी संग्रह के माध्यम से उनकी कहानियों के अनूठेपन की ओर इशारा किया है। हम इनके शुक्रगुजार हैं। )


आग का वादा
पंकज चतुर्वेदी

कुंवर नारायण पिछले लगभग छह दशकों से रचनारत हैं। आज जब त्रिलोचन और रघुवीर सहाय हमारे बीच नहीं हैं, तो बेशक वह हिन्दी के सबसे बडे़ कवि हैं। मुक्तिबोध ने 1964 में ही उनके महत्त्व को पहचानते हुए लिखा था कि वह 'अंतरात्मा की पीड़ित विवेक-चेतना और जीवन की आलोचना' के कवि हैं। मगर 1964 से 1994, यानी तीस वर्षों का लम्बा वक्फा ऐसा भी रहा है; जिसमें सतत रचनाशीलता के बावजूद कुंवर नारायण को हिन्दी आलोचना में वह सम्मान और शोहरत नहीं मिली, जिसके दरअसल वह हक़दार थे। उलटे, उनकी कविता की सायास उपेक्षा, अवमूल्यन और अन्यथाकरण का प्रकट न सही, पर गुपचुप एक प्रायोजित सिलसिला इस बीच ज़रूर चलता रहा। इसे अंजाम देनेवाले लोग हिन्दी की विश्वविद्यालयी दुनिया, प्रकाशन-तंत्र और पुरस्कार-तंत्र पर क़ाबिज़ थे। इन्हें कौन नहीं जानता? इन्होंने यह साबित करना और करवाना चाहा कि कुँवर नारायण तो एक ख़ास स्कूल के कवि हैं। मगर 1993 में 'कोई दूसरा नहीं' सरीखे एक सौ कविताओं के अनूठे संग्रह के प्रकाशन और 1995 में इसके लिए उन्हें 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार' सहित अनेक सम्मान मिल जाने पर ऐसी कोशिशें अंतिम तौर पर नाकाम हो गईं।

साहित्य-संसार में सक्रिय विभिन्न विचारधारात्मक शिविरों के आर-पार कुंवर नारायण को एक क़िस्म की सर्वानुमति या व्यापक प्रतिष्ठा हासिल हुई। ज़ाहिर है कि इस मक़ाम पर किसी 'साहित्यिक राजनीति' के ज़रिए नहीं पहुँचा जा सकता; बल्कि शब्द और कर्म, संवेदना और विचार तथा कविता और जीवन की वह दुर्लभ एकता ज़रूरी है, जो उनके यहाँ मिलती है। दूसरे शब्दों में, प्रगतिशील दिखना नहीं, होना अनिवार्य है। मसलन यह सभी जानते हैं कि कुंवर नारायण ने किसी ख़ास विचारधारा से ख़ुद को प्रतिबद्ध नहीं किया; पर यह ख़बर बहुत कम लोगों तक पहुँची कि उन्होंने कविता की एक फ़ेलोशिप के तहत आयोवा जाने से इनकार कर दिया, क्योंकि उन्हें यह लिखकर देने को कहा गया था कि ''मैं वामपंथी नहीं हूँ।'' इसी तरह उन्होंने पहली बार एक उद्योगपति के नाम पर रखे गए हिन्दी साहित्य के बदनाम पुरस्कार 'दयावती मोदी कविशेखर सम्मान' को भी नामंजू़र कर दिया, जिसे कथित प्रगतिशीलों और कलावादियों ने प्रसन्न और आत्ममुग्ध भाव से स्वीकार किया।

हिन्दी कवियों में कोई संघर्ष न करते हुए उसका दिखावा करने का चलन आम हो गया है; जबकि कुंवर नारायण जो कुछ करते हैं, उसका सार्वजनिक ज़िक्र करने में संकोच करते हैं। एक तरफ़ वे साहित्यकार हैं, जो नैतिक और अनैतिक का फ़र्क़ भूल चुके हैं; दूसरी तरफ़ कवि है, जिसे इस द्वन्द्व को मिटाने की सज़ा मालूम है--''नर और कुन्जर के फ़र्क़ को मिटाते ही/मिट गया जो/वह एक शोकातुर पिता था। ...सज़ा सिर्फ़ इतनी थी/कि इस अन्तर को समझती हुई दृष्टि से/नरक देखना पड़ा था धर्मराज को।'' कुंवर नारायण की कविता जिस बौद्धिक सान्द्रता और क्लासिकी संयम के लिए मशहूर है; उससे कम महत्त्वपूर्ण उनके स्वभाव की सादगी और विनयशीलता नहीं है, जिनके होने को हिन्दी के ज़्यादातर नामचीन साहित्यकार अपने बड़प्पन में बाधक समझते हैं। ऐसों को अशोक वाजपेयी की ये काव्य-पंक्तियाँ याद रखनी चाहिए कि ''जीवन में आभिजात्य तो आ जाता है/गरिमा आती है बड़ी मुश्किल से।''

कुंवर नारायण की कविता और व्यक्तित्व, दोनों में ही जिस उदात्तता, गरिमा और संवेदनशीलता का विरल संश्लेष है; उससे रश्क करने से ज़्यादा अहम यह जानना है कि इसकी क़ीमत चुकानी पड़ती है, सब-कुछ पा लेने की ग़रज़ या चालाकी से यह मुमकिन नहीं। इसके लिए सिर्फ़ 'दुनियादारी' से नहीं, 'साहित्य की राजनीति' से भी अलहदा और निर्लिप्त रहना ज़रूरी है। दूसरे, हमारी रौशनी और ऊर्जा के स्रोत महज़ बाहरी ज्ञान-विज्ञान में नहीं; बल्कि भारत की अपनी दार्शनिक, सांस्कृतिक, नैतिक और मिथकीय विरासत में भी हैं, जिसके आशयों को नये सन्दर्भों में अन्वेषित किये बिना हम अपनी समूची आत्मवत्ता को अर्जित नहीं कर सकते। बगै़र इस बुनियाद के मुक्ति की उम्मीद करना बेमानी है। कुंवर नारायण के शब्दों में 'पराक्रम की धुरी पर ही प्रगति-बिन्दु' का स्वप्न देखा जा सकता है। उनकी कविता में भारत की श्रेष्ठ सर्जनात्मक मनीषा का सारभूत रूप मिलता है।

इसका मिलना कुछ दूसरे कवियों में भी इन दिनों बताया जा रहा है, पर बतानेवाले भी जानते हैं कि दूसरों के बारे में यह बयान जितना झूठ है, कुंवर नारायण के सम्बन्ध में उतना ही सच। तीसरे, कुंवर नारायण की कविता हमें सिखाती है कि शाश्वत मूल्यों के इसरार का मतलब समकालीनता की अन्तर्वस्तु से इनकार हरगिज़ नहीं है, जिसकी कोशिश हिन्दी आलोचना के एक तबके़ द्वारा बराबर की जाती है। इसके विपरीत, कुंवर नारायण की कविता के सफ़र में आठवें दशक में इमर्जेन्सी, 1992 में अयोध्या-केन्द्रित उग्र हिन्दुत्ववादी साम्प्रदायिकता और 2002 में एकध्रुवीय हो चुकी दुनिया में अमेरिका के नव-उदार आर्थिक-सांस्कृतिक और सैनिक साम्राज्यवाद--यानी मौजूदा भारत और विश्व की कितनी ही विसंगतियों और विडम्बनाओं का गहरा और सशक्त प्रतिकार देखने को मिलता है।

कुंवर नारायण भारत के पहले और एकमात्र कवि हैं, जिन्हें रोम का अन्तरराष्ट्रीय 'प्रीमिओ फे़रोनिआ सम्मान' हाल में दिया गया है। ऐसे में 'भारतीय ज्ञानपीठ' के लिए यह आत्म-व्यंग्य ही होता, अगर वह अपना शीर्ष पुरस्कार उन्हें प्रदान न करती। मेरे जैसे उनके अनगिनत प्रशंसकों के लिए यह दोहरी खु़शी का मौक़ा है, जिसे मुहैया कराने के लिए वे इस संस्था के शुक्रगुज़ार हैं। दरअसल, सबसे बड़ी बात यह है कि कुंवर नारायण भारत के आम आदमी को, उसकी ज़िन्दगी के रोज़मर्रा के प्रसंगों में बार-बार याद आने और उसका साथ देनेवाले मूल्यवान् कवि हैं।

कैसा
सुखद इत्तिफ़ाक़ है कि इसी महीने की दस तारीख़ को बनारस के दशाश्वमेध घाट पर प्रतिदिन शाम को होनेवाली भव्य गंगा-आरती को देखने के लिए मैं एक नाव में मशहूर कवि असद जै़दी, उनकी जीवन-संगिनी नलिनी तनेजा और प्रसिद्ध कवि-मित्र व्योमेश शुक्ल के साथ था। मैंने कहा कि 'नाव से यह दृश्य देखना बहुत अच्छा लगता है।' असद जी ने पूछा-'अच्छा क्यों लगता है ?' मैं अपनी आत्मा की हक़ीक़त जानता था कि मुझे वह सब-कुछ किसी रूढ़ धार्मिक-पौराणिक मानी में अच्छा नहीं लग सकता। फिर क्या बात थी ? क्या सिर्फ़ उसका सौन्दर्य खींचता था ? नहीं। मैंने उनसे कहा, ''मुझे कुंवर नारायण की एक कविता याद आती है --''आग का वादा''--फिर मिलेंगे/...नदी के किनारे !''

( लेखक युवा कवि-आलोचक हैं। )
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तितलियों के देश में: जहाँ जिंदगी सबसे अधिक बेध्य हो कविता द्वारा
गिरिराज किराड़ू

या
कहीं ऐसा तो नहीं
कि आकाश और पाताल को मिलाती
एक काल्पनिक रेखा
जहाँ दायें बायें को काटती है
सचाई का सबसे नाज़ुक बिन्दु वही हो?
(अभिनवगुप्त)

कुंवर नारायण की कविता की ‘महत्वपूर्णता’ को ऐसे कहा जा सकता है, कहा जाता है कि उनकी कविता हिन्दी (कविता) में संस्कृति हो चुकी कमअक्ली और कमसुखनी की लद्धड, सांस्थानिक, किलेबंद अहमन्यता को भी हमदर्दी और परिष्कार बख्शता एक प्रतिकार, एक प्रत्याख्यान है; कि वह हिन्दी के दो संसारों के, उनके अतिचारों के आरपार एक प्रौढ़ मध्यमार्ग/तीसरा रास्ता है आदि आदि। लेकिन ये उनकी कविता के ‘एप्रोप्रिएशन’ की न सिर्फ़ आसान बल्कि खतरनाक तरकीबें हैं क्योंकि इस तरह वह (पॉलेमिकल) परिप्रेक्ष्य अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है जिसके समर्थन/ विरोध में ‘ही’ इस कविता की सार्थकता संभव होती/ सिद्ध की जाती है।

यहाँ ऐसा करने का पर्याप्त अवकाश नहीं है लेकिन एक प्रस्तावना की कोशिश है कि उनकी कविता को, एक स्वतंत्र काव्य-दृष्टि और सत्ता-दृष्टि की तरह पढ़ा जाये, उपलब्ध काव्य/सत्ता-दृष्टियों के पक्ष/प्रतिपक्ष की तरह नहीं, उनके ‘मध्यमार्ग’ की तरह नहीं क्योंकि ‘मध्यमार्ग’ इस कविता का मार्ग नहीं, उन उपलब्ध दृष्टियों की सुविधा है। कुंवर नारायण की कविता ही कहती हैः

हर एक के अपने-अपने ईमान धरम
इतने पारदर्शी
कि अपठनीय
(अपठनीय)

2
कुंवर नारायण की कविता/उनका लेखन मनुष्य होने की, कवि/कविता होने की संपूर्णतर विधियों को लगातार खोजने, पाने का एक आत्मविश्वस्त उद्यम है। उनमें सेल्फ-सेंसरशिप बिल्कुल नहीं है । वे मनुष्य की, ‘यथार्थ’ की, होने के उम्मीद और अज़ाब की अ-वश्य और सदैव हतप्रभ कर देने वाली, अक्सर विलोम छवियों/संस्करणों को विरल सहजता से और बहुत तरह के स्रोतों से मुमकिन करते हैं। उनकी ज्ञानमार्गी वस्तुनिष्ठता अपने नेपथ्य में, अपने डार्क-रुम में जितनी जटिल, विकट संघटना है, अपने प्रदर्शन के ‘धोखे’ में उतनी ही सहज (एफ़र्टलेस और सहजात दोनों अर्थों में, लेकिन ‘सरल’ के अर्थ में नहीं)। यूँ कहना चाहिये कि यह ऐसा पूरावक्ती ज्ञानमार्ग है जिसमें जटिल ही सहज हो गया है। हर कविता/रचना अपने में मनुष्य होने की वर्तमान, अतीत और भविष्य-संभव अवस्थितियों के संवाद से, इतिहास, पुराण और समकाल-संभव अन्योन्याश्रितता से, ‘कला’, ‘समाज’, ‘यथार्थ’, ‘राजनीति’, ‘व्यक्ति’, ‘अध्यात्म’ आदि ‘विरुद्धों’ के ‘सामंजस्य’ से नहीं उनके जैविक और डायलेक्टिकल एकत्व से, निर्मित होती हुई एक ‘सम्पूर्ण(तर) संघटना’ है। उनकी कविता/लेखन में समावेशिता और सम्पूर्णता के बीच एक अनोखा डायलेक्टिक्स है। बिना समग्रतामूलक सामान्यीकरणों/महाख्यानों के, बल्कि प्रायः उनके वि-सर्जन से सम्पूर्ण(तर)’ को मुमकिन करने की एक अजब कोशिश है यह जो ‘अनोखा’ और ‘अजब’ जैसे विशेषणों की अतिरिक्ति से फुसलाई नहीं जा सकती।

3
मैं जिंदगी से भागना नहीं
उससे जुड़ना चाहता हूँ। –
उसे झकझोरना चाहता हूँ
उसके काल्पनिक अक्ष पर
ठीक उस जगह जहाँ वह
सबसे अधिक बेध्य हो कविता द्वारा।
(उत्केंद्रित)

(आपसे गुज़ारिश है आप उद्धृत काव्यांशों के बोल्ड किये हर्फ़ों को गौर से पढ़ें, क्योंकि मुमकिन है आपको भी वही ‘धोखा’ हो रहा हो जिससे मेरी वाक़फ़ियत बिल्कुल न होती अगर कुँवर नारायण/बोरहेस जैसे लेखक न होते)

एक बार धोखा हुआ
कि तितलियों के देश में पहुँच गया हूँ
और एक तितली मेरा पीछा कर रही है
________
दरअसल वह भी
मेरी ही तरह धोखे में थी
कि वह तितलियों के देश में है
और कोई उसका पीछा कर रहा है।
(तितलियों के देश में)

4
उनसे सच्ची, जानलेवा, ज़िरही ईर्ष्या किये बिना उनसे प्रेरणा लेना तक मुश्किल है। यह उनके स्वावलंबी ज्ञानमार्ग की शर्त भी है, वसीयत भी।

( लेखक युवा कवि और प्रतिलिपि के संपादक हैं। )
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मिथिहास
से निकल कर आया ऋषि
गीत चतुर्वेदी

बीसवीं सदी दृश्य-माध्यमों के दबाव की सदी थी। कला की सारी विधाओं पर, अंदरूनी आवाजाही से इतर, यह दबाव देखा गया। इस दबाव के बावजूद, कुंवर नारायण के यहां तमाम रूढि़गत दृश्य-विधान टूटते हैं और धीरे-धीरे कविता एक स्वतंत्र कला के रूप में विकसित होती है। उनकी कविता महज़ दृश्य में बंध जाने की आकांक्षी नहीं है। वह दृश्य और बंधने की प्रक्रिया दोनों को ही सतत जटिल रूप देती है।

कुंवर नारायण की कविताओं में कहे और अनकहे के बीच लगातार द्वंद्व चलता रहता है, जो कविताओं के पाठ के स्तर को बढ़ा देता है। सहज न दिखने वाला यह द्वंद्व ही कविता को लंबे समय तक प्रभावी रखता है। उनकी कविताओं की यह ख़ासियत है कि बहुधा वे एक साथ दो मन:स्थितियों और भावों को अभिव्यक्त करती हैं। जैसे वही पंक्ति ठठाकर हंसते समय भी आपके ज़ेहन में आ सकती है और ऐन रुदन के क्षणों में भी। दोनों ही स्थितियों से बराबर जुड़ती हुई। जैसे नीम के पेड़ से आहिस्ता-आहिस्ता झरती निंबोली एक स्त्री के केश में अटक जाती है। रूमान और अवसाद एक साथ चलते हैं। ऊपर से पीला दिखता रंग भीतर से हरा होता है। जो ऊपर से मृत्यु दिखती है, वह जीवन भी है।

'आत्मजयी' हो या 'वाजश्रवा', इसी कारण इनमें जीने की अदम्य इच्छा दिखती है। नचिकेता का लौटना या घर तक पहुंचना, संभावनाओं के प्रति कवि की प्रतिबद्धता दिखाते हैं। एक कविता में घोड़े से बंधे घिसटते हुए आदमी के सिर्फ़ दो हाथ ही दिल्ली पहुंच पाते हैं, तो वह सारी राजनीतिक क़लाबाजि़यों को एक झटके में फ़ाश कर देते हैं। यह कविता दिल्ली या किसी भी शहर को, उन हाथों के जुड़े होने से, देखने की मांग करती है। यातनाओं और यांत्रिकता की अपेक्षा मनुष्यता की ओर ज़रा ज़्यादा सरक कर। उनकी कविताएं गहरे अर्थों में राजनीतिक कविताएं हैं, क्योंकि यहां राजनीति नारों की बजाय, सूक्ष्म चिंतन की तरह आती है। व्यक्ति, समाज, देश, मेटाफि़जि़क्स और `कथित मनुष्यता´ की राजनीति। उनकी एक छोटी-सी कविता है `पुराना कंबल´, इसे उनकी कविता का 'पदार्थ' माना जा सकता है, जिसमें भारतीय चिंतन परंपरा के `पद´ और `अर्थ´ दोनों ही आ जाते हैं। इस कविता की ही तरह कुंवर नारायण का पूरा कवि एक महाप्राचीन कंबल को कवच की तरह धारण करता है और वर्तमान को चुनौती देता है।

कलाकार का संघर्ष हमेशा वर्तमान से होता है। कुंवर नारायण इसीलिए मिथकों की तरफ़ जाते हैं और बेहतरी से जुड़े तमाम बुनियादी प्रश्नों का जीवद्रव्य वहां से पाते हैं। मिथिहास की कंदराओं से निकले एक आधुनिक विद्रोही ऋषि की तरह, जो अपनी हड्डियों को दूसरों का हथियार नहीं बनने देगा।और यह द्वंद्व भी उनकी कविता को अनुपम ऊंचाई देता है कि इतिहास, मिथकों, स्मृतियों, अद्वैत में जाने के बाद भी वह अपनी कविता में किसी भी कि़स्म के मोनोजेनेसिस को नकार देते हैं।

( लेखक युवा कवि-कहानीकार हैं। )
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इकहरे यथार्थ का अतिक्रमण करती कहानियाँ
प्रभात रंजन

1973 में प्रकाशित अपने कथा-संग्रह, ''आकारों के आसपास'' की भूमिका में कुंवर नारायण ने लिखा है कि उनकी कहानियां वास्तव में यथार्थ से एक रोमांस हैं- यथार्थ के नाम पर कहानी नहीं, कहानी के नाम पर यथार्थ की बात करता हूं। संग्रह की सत्रह कहानियों को पढ़ते उनकी कथा-मुद्रा सहज ही ध्यान आकर्षित करती है। यह सवाल भी बार-बार मन में कौंधता है कि यथार्थ केवल बाहरी होता है या उसका कोई मानसिक स्तर भी होता है। ''आकारों के आसपास'' और ''आशंका'' शीर्षक कहानियों का इस संदर्भ में विषेश उल्लेख किया जा सकता है।

कुंवर
जी की कहानियों में यथार्थ के अनेक स्तर हैं। उनमें एक तरफ ऐतिहासिक संदर्भ हैं तो दूसरी ओर नितांत समसामयिकता। ''मुगल सल्तनत और भिश्ती'' कहानी में मुगल बादषाह हुमायूं के जीवन के उस संदर्भ को उठाया गया है जब जान बचाने के एवज में हुमायूं ने एक भिश्ती को आधे दिन की बादशाहत अता की थी। कहानी में उस भिश्ती के अंतर्द्वंदों का बड़ा बारीक विष्लेशण किया गया है। आजकल कहानी में लेखकीय हस्तक्षेप को उत्तर-आधुनिक कथात्मक युक्ति के रूप में देखा जाता है। कुंवर जी की कहानियों इस युक्ति का बहुत सुंदर उपयोग दिखाई देता है। ''मुगल सल्तनत और भिश्ती'' कहानी में कहानी सुनाने के बाद लेखक उपस्थित होकर इस कहानी की ऐतिहासिकता पर ही संदेह करता है। इसी तरह ''अचला और अचल'' कहानी में प्रेम कहानी सुनाने के बाद लेखक अंत में उपस्थित होकर कहता है कि वह नहीं जानता कि यह कहानी दुखांत हुई या सुखांत...

बीसवीं
षताब्दी के महान लेखक बोर्खेज के बारे में एक आलोचक ने लिखा है कि वे कहानियां नहीं लिखते, ऊहापोह और भूलभुलैया रचते हैं। वास्तव में कुंवर जी ने इस संग्रह में अनेक कथारूप आजमाए हैं और उनके माध्यम से यथार्थ की जटिलताओं की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया है। उनकी कहानियां मानो पाठकों को बार-बार इस बात की याद दिलाती हैं कि कुछ भी इकहरा नहीं होता- न जीवन में न यथार्थ में।

( लेखक युवा कहानीकार हैं। )
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कुंवर नारायण को ज्ञानपीठ

1:32 pm

ज्ञानपीठ

इस घोषणा के बाद कि वर्ष २००५ का ज्ञानपीठ पुरस्कार हिन्दी के शीर्षस्थ कवि कुंवर नारायण को दिया जाना है, यह उक्ति दुहराने का मन होता है कि इससे ज्ञानपीठ की ही प्रतिष्ठा बढ़ी है। ज्ञानपीठ पुरस्कार को समस्त भारतीय भाषाओँ के साहित्य में अत्यंत प्रतिष्ठित माना जाता है, पर इसके साथ भी विवाद और चयनित कवि-लेखक को लेकर बिल्कुल फर्क किस्म की बातें सामने आती रही है। इस परिप्रेक्ष्य में कुंवरजी का निर्विवाद चयन कुछ विलंबित ज़रूर है, पर इससे हिन्दी और विशेषकर कविता का सम्मान बढ़ा है। स्वयं कुंवरजी इसके लिए ख़ुद को एक निमित्त भर मानते हैं।

इन दिनों

कुंवर नारायण की कविता ने मुझ जैसे अनेक लोगों को न सिर्फ़ कवित-विवेक बल्कि जीवन विवेक भी दिया है। मैं खुशकिस्मत हूँ की पढ़ने-लिखने के शुरूआती दिनों से ही उनकी कविता और दिल्ली आने के बाद मुझे उनकी संगत भी मिली। अस्सी पार भी उनकी दिनचर्या किसी स्कूली छात्र जैसी है। आंखों की रोशनी कम पड़ने के बावजूद अपनी डेस्क से लगकर वे किताबें लेंस के सहारे देर तक पढ़ते हैं। हजारों पृष्ठों में फैली अपनी अनछपी रचनाओं का सख्ती से संपादन करते हैं। साहित्यिक गोष्ठियों से लेकर सिनेमा तक में उनकी दिलचस्पी और शिरकत अब तक बरकरार है। इन दिनों वे आलोचना की दूसरी पुस्तक पर काम कर रहे हैं। साथ ही एक नया कविता-संग्रह भी आकार ले रहा है।

दो नई कविताएं

( उन्होंने अपनी नोटबुक से दो कविताएं सबद लिए दी हैं। सबद इन्हीं दो कविताओं के साथ उनकी यह उपलब्धि सेलिब्रेट करता है। )

प्यार के बदले

कई दर्द थे जीवन में :
एक दर्द और सही, मैंने सोचा --
इतना भी बे-दर्द होकर क्या जीना !

अपना लिया उसे भी
अपना ही समझ कर

जो दर्द अपनों ने दिया
प्यार के बदले...

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रोते हँसते

जैसे बेबात हँसी आ जाती है
हँसते चेहरों को देख कर


जैसे अनायास आंसू आ जाते हैं
रोते चेहरों को देख कर


हँसी और रोने के बीच
काश, कुछ ऐसा होता रिश्ता
कि रोते-रोते हँसी आ जाती
जैसे हँसते-हँसते आंसू !


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ज़बां उर्दू : २ : सफ़िया अख्तर

12:09 pm
जाने अज़ीज़,

कैसे
हो ? मेरे कूच के वक्त मेरी तबियत पर जो बार था उसकी फ़िक्र है। खुदा करे अच्छी तरह सो गए हो और सुब्ह बश्शाश (खुश) उठे हो।
इस मर्तबा ग्वालियर के स्टेशन पर हर लहज़ा (क्षण) दिल चाहता था कि काश कोई खारजी कुव्वत (बाह्य शक्ति) जाने से रोक लेती और अपने पर से जिम्मेदारी का बोझ हट जाता, मगर संग-दिल ट्रेन आकर रही और बेरहम लोगों ने टिकट भी हासिल कर लिया और सफ़िया को दूर फेंक दिया, गो कि वो इसके बावजूद तुमसे ज़रा भी दूर नहीं।
जब सोचती हूं तो समझ में नहीं आता कि मेरी गैरमौजूदगी में ज़िन्दगी को किन मशागिल (कामों) से पुर करते होगे ? फातिमा बहन बेचारी मजदूर आदमी, वक्त पर चल देती होगी, फिर घर पर अकेले क्या करते होगे, वक्त कैसे कटता होगा ? घबराओ नहीं, मैं भी तुम्हारे पास हूं, अलबत्ता ये और बात है कि ऐसे में मीना (शराब ) भी आ जाती हो और मुझे उस बज़्म से निकाला मिल जाता हो।
तुम कब आओगे ? मुझे बुलाना या ख़ुद आना। मार्च के पहले हफ्ते में जयपुर जाना तय करो और मुनासिब समझो तो मुझे भी ले चलो। औन के यहां ठहरेंगे और उनकी शाने-मेज़बानी भी देखेंगे। वैसे तुम अपनी मर्ज़ी पर रखो। ये शौक तो महज़ तुम्हारी हमसफरी की ख्वाहिश में उछला बकिया कुछ नहीं। खैर।
हां, और सुनो। आज यूनिवर्सिटी बंद रही। कोई तालिबेइल्म इत्तेफाकिया रेल से कुचलकर मर गया था रात को। तबियत पर तकद्दुर (उदासी) सा रहा गो कि मौसम बहुत ही रंगीन रहा।
आज दोपहर कोई तीन घंटे सोई। ये नींद गोया वो क़र्ज़ मयसूद ( ब्याज सहित ऋण) है जो तुम्हारे पहलू और बाजुओं पर वाजिब था।
आज एक बहुत ही 'देर हज्म' किस्म की किताब पढ़ने के लिए उठाई है। अपने को तुमसे बहस करने के लिए मुसल्लह (तैयार) करना चाहती हूं। लड़ने के लिए तो मेरी फितरत ने मुझे मुसल्लह करके भेजा था पर बहस की ज़रूरत यूं आन पड़ी तुमसे लड़े बगैर बहस छिड़े, मुमकिन ही नहीं है।
तुम्हारी सलाहकार नहीं बनना चाहती। बनूं भी क्योंकर और दावा भी करूं तो किस बिरते (आधार) पर जबकि अपने को बेशतर चीज़ों में तुमसे कमतर पाती हूं। हां, छेड़ की खातिर फिर लिख रही हूं कि मेरे पीछे मुझ से 'तर्के वफ़ा' न बरतना कि अपने को मुझसे अलेहदा करके ख़ुद परेशानियों के दौरे डालो और कहो कि मैं सफिया के साथ ये न कर सका और ये न कर सका।
यकीन करो अख्तर कि ये एहसास ही मेरी ज़िन्दगी के अक्सर लम्हों को कतई सुकून बख्श देता है कि मैं तुम्हारी हूं। अब तक मैं किसी कि भी न थी और न समझ सकती थी कि अपने को क्योंकर संभालकर रखूं और किसके लिए ? मेरी वफाओं का, मेरी उबलती हुई आरजुओं और तमन्नाओं का मर्कज़ कोई नहीं था। मेरे ख्वाबों का पसमंज़र (परिदृश्य) बिल्कुल सियाह था और मेरे अरमानों की दुनिया यकसर ( बिलकुल) सूनी।
ऐसी उजड़ी हुई दुनिया को एकाऐकी जगमगा देने का सेहरा तुम्हारे सर होगा, इसका यकीन भी न था। पिछली बातें ऐसी पिछली बातें बन चुकी हैं कि उनके हकीकी ( सच) होने में भी शुब्ह (शक) है। फिर ऐसे में भी तुम ये करते हो कि मेरे पीछे मेरी इसे दुनिया को ठुकराकर उस दुनिया में जा बसते हो जो तुम्हारे लिए गुजरी बात बन चुकी है और फिर अक्सर ऐसी बातों पर मग्मूम ( दुखी) होते हो जिन पर ग़म करने का अब तुम्हें कोई हक नहीं रहा मेरे दोस्त !
आओ, प्यार कर लूं तुम्हें। न मालूम किन नज़रों से इन सतरों को पढ़ रहे हो। इस तसव्वुर को ज्यादा मज़बूत नहीं करना चाहती वरना मेरे हाथ थरथराने शुरू होंगे शिद्दते-ज़ज्बात से और फिर मुझसे कुछ भी तो न लिखा जाएगा।
तुमसे मिलने को हर मिनट जी चाहता है। इस ज़ब्ते-नफ़्स (भावना पर नियंत्रण) का कुछ सवाब भी है या नहीं, ये तुम बताना। हां सुनो ! इस जुमे को सलमा देहली जा रही हैं, सईदा भी। सलमा को कपड़े खरीदने हैं, दुल्हन बनने के लिए। मेरी राय और मेरा इंतेखाब ( चुनाव) बहुत अहम् है इस मुआमले में, चुनांचे मुझे साथ ले जा रही हैं, चली जाऊं ? तुम्हारी आप शाहिदा से भी मुलाकात होगी, तुम्हारे मजाज़ से भी।
मुझे मुफस्सिल सा ख़त लिखना। महज़ प्यार की बातें लिखकर ताल देते हो मुझे। ये भी लिखना कि कैसे रहते हो और क्या करते हो ?
देहली से क्या मंगाते हो अपने लिए ? न बताओ मैं ख़ुद ही अपनी मर्ज़ी से ले आउंगी उलटी-सीधी चीज़ें, फिर उन्हें बरतना ही पड़ेगा तुम्हें।
आओ मेरे करीब , प्यार कर लूं तुम्हें। शब बखैर...

तुम्हारी सफ्फो


( सफ़िया अख्तर मशहूर शायर जांनिसार अख्तर की पत्नी थीं। जांनिसार के नाम लिखे उनके पत्रों का हिन्दी में पुस्तकाकार अनुवाद कथाकार-नाटककार असगर वजाहत ने कुछ अरसा पहले 'तुम्हारे नाम' शीर्षक से किया था। यह अनुवाद उसी पुस्तक से साभार लिया गया है। कहना न होगा कि अदब और अदीबों की दुनिया में ना-कुछ की हैसियत रखनेवाली सफ़िया का ख़त उर्दू नस्र का बेजोड़ नमूना है। इस स्तंभ के अंतर्गत इससे पहले आप फ़िराक़ गोरखपुरी को पढ़ चुके हैं।)

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सबद विशेष : ५ : के. सच्चिदानंदन की कविताएं

11:23 am

एक ही भाषा नहीं


व्योमेश शुक्ल

मलयाली कवि के. सच्चिदानंदन समसामयिक हिंदी कविता के अनूठे दोस्त हैं। उनकी कविता की अंतर्वस्तु, प्रतिक्रिया करने की पद्धतियाँ, मुख्यधारा की राजनीति के पतन का हिस्सा बन जाने को लालायित वामपंथी भटकन के प्रति उनकी चिढ़, और फिर भी मार्क्सवाद को एकमात्र विकल्प मानने की अक्सर अदृश्य और कभी-कभी ज़ाहिर ज़िम्मेदारी उनके साथ आज की हिंदी कविता के रिश्ते को एक आदर्श तनाव में स्थापित कर देती है। हालाँकि, इसके अलावा आप मलयाली जीवन-संस्कृति की अनेक खुश और उदास, बेबस और प्रचंड , अतिसाधारण और असामान्य फिल्में भी उनके यहाँ देख सकते हैं। इस कविता में स्मृतियों, जगहों , लोगों प्रकृति और लगावों का ऐसा वैभव मुमकिन हुआ है जिसमें डूबकर मुग्ध, विस्मृत या आत्महीन नहीं हुआ जा सकता। सच्चिदानंदन की कविता कभी भी ऐसी सहूलियत ख़ुद को या अपने पाठकों को नहीं देती।

उनकी कविताएं सरलता लगभग हथियार की तरह इस्तेमाल करती हैं और एक आश्चर्यजनक उमंग के साथ मिथकों, पुराकथाओं, मनुष्येतर प्रकृति के उपेक्षित नायकों के शरीर और आत्मा में दाख़िल होकर वहीं से कुछ उनकी, कुछ अपनी बातें कहने लगती हैं। उनके उदबोधनों का यह स्थाई नैसर्गिक मंच है। यहीं से वह सभ्यता और जिंदगी को सेलिब्रेट करते हैं, पतनशील राज्य की भर्त्सना करते हैं और ज़रूरत होने पर नंदीग्राम के हत्यारों तक को बेनकाब कर डालते हैं।

साहित्य
संसार के कुछेक मूर्धन्यों के मन में जब इसी बात पर भ्रम और संशय है कि सिंगूर और नंदीग्राम के असल खलनायक कौन हैं; और वे वंचित मनुष्यता के हक़ के लिए किसी भी हद तक जाकर प्रतिकार करने वाली महाश्वेता देवी और मेधा पाटकर जैसी शख्सियत पर शक करने के प्रस्ताव कर रहे हैं, सच्चिदानंदन की खुली, साफ, निर्भ्रान्त और उत्तेजित पक्षधरता हमें बहुत दूर तक राहत पहुँचाती है। ऐसी कविताएं पाठक को अपने गांव-कस्बे, अपने जनपद अपनी दुनिया का नागरिक बना लेती हैं और भूमंडल को जगह आईने में देखने की पेशकश करती हैं। सच्चिदानंदन की कविताएं पढ़ते हुए यह तथ्य भी एक विलक्षण बोध से आपको संपन्न करता हुआ सामने आता है कि लौकिक रूप से इतर भाषा में लिखी जाकर भी यह हमारी समस्याओं, हमारे समाधानों की कविता है और किसी भी तकलीफ की एक ही भाषा नहीं होती।

कविताएं

शाकुंतलम

हर प्रेमी अभिषप्त है
भूल जाने को, कम से कम कुछ देर के लिए
अपनी स्त्री को : जैसे विस्मरण की नदी
अपने ही प्यार पर बाढ़ ला दे

हर प्रेमिका अभिशप्त है
तब तक भुला दिए जाने को जब तक उसका रहस्य
स्मृति के जाल में फँस नहीं जाता

प्रत्येक शिशु अभिशप्त है
पितृहीन बड़ा होने को
शेर के मुँह में अपना हाथ डालकर
****
हिन्दू

मैं एक श्रेष्ट हिन्दू हूँ
मैं कुछ नहीं जानता
कोणार्क या खजुराहो के बारे में
मैंने कामसूत्र को छुआ तक नहीं है
मैं उल्टी करने लगूंगा अगर दुर्गा या सरस्वती को
नग्न देख लूँ हमारे देवी देवता कामहीन हैं
जो कुछ भी उनका था
हमने चढ़ा दिया काशी और कामाख्या पर
कबीर के राम को हमने कैद कर लिया
अयोध्या में, और गाँधी के राम को,
उनके अपने जन्मस्थल पर ज़िंदा जला दिया
भगवा ध्वज से अपनी आत्मा को बदल डालने के बाद
हरेक भिन्न रंग मुझे पागल कर देता है
निकर के नीचे मेरे पास....एक चाकू है
औरतों के सिर चूमने के लिए नहीं
काट डालने के लिए होते हैं
****
राष्ट्र

राष्ट्र
ने मुझसे कहा
तुम मेरे ऋणी हो
हवा के लिए जिसमें तुम साँस लेते हो
पानी के लिए जो तुम पीते हो
खाने की रोटी के लिए
चलने-फिरने की सड़क के लिए
बैठने की ज़मीन के लिए

मैंने
राष्ट्र पूछा
तब जवाब कौन देगा ?
मेरी माँ को जिनका गला घोंट दिया गया
मेरी बहन को जिसने ज़हर पी लिया
दादी को जो भीख माँगती भटकती रही
मेरे पिता को जो भूख से मर गए
मेरे भाई को जो तुम्हें आज़ाद कराता हुआ जेल चला गया

मैं
किसी खेमे की नहीं हूँ, हवा ने कहा
कोई मेरा मालिक नहीं, पानी ने कहा
मैं ज़मीन से पैदा हुई, रोटी बोली
मैं सीमाओं की परवाह नहीं करती, सड़क ने कहा
घास का कोई दोष नहीं होता, ज़मीन ने कहा

तब
प्यार के साथ
राष्ट्र ने मुझे ऊपर उठा लिया
गोद में और कहा
अब क्या तुम मानते हो कि राष्ट्र सचाई है ?
लहुलुहान गर्दन से गिरता ख़ून ज़मीन पर फैल गया
' राष्ट्र की जय हो '
****
नन्दी

वे आए
सुनिश्चित चाल और लाल झंडों के साथ
हमारे अपने अपने कॉमरेड
उन्होंने हमें दी ज़मीन, पानी, बादल, आत्मवत्ता

वे फिर आए
काली बंदूकों और डगमगाते क़दमों के साथ
हमारे अपने शत्रु
उन्होंने छीन ली हमसे हमारी
ज़मीन, पानी, बादल, आत्मवत्ता

झंडे यों भी लाल कर दिए जाते हैं
हँसिया स्वस्तिक में बदल जाती है
हथौड़ा भी वहां करने लग सकता है खूनी पंजों को
सितारा दूसरे झंडों पर भी सवार हो सकता है

लेनिन-लेनिन का उद्घोष
सलीम-सलीम के जयकारे में परिणत हो सकता है
उक्रेन, प्राग, ब्रातिसलेवियारूमानिया
रूमानिया, कम्पूचिया, अल्बानिया
उन बड़ी मूंछों की बाढ़
अभी तक थमी नहीं है
****
पेड़

कोई कभी कह नहीं सकता
कि कब पेड़ चलना शुरू कर देंगे
और कहाँ के लिए
उनके पैर खास तत्पर हैं और
उनके हाथ झूम ही रहे हैं
उन्हें याद हैं
वे जगहें जो उन्होंने छोड़ीं
और मालूम है पता वहां का
जहाँ पहुँचाना है

चिडियाएँ चढ़ती-उतरती भर
नहीं हैं पेड़ों पर
पेड़ उन्हें अपनी शाखों
के इशारे से बुलाते हैं
और उन्हें उनके नामों से पुकारते हैं
पेड़ों के ऊपर लगा फलों का मेला
उन्हें निमंत्रित करना बंद कर देता है
तब भी कुछ कृतज्ञ पक्षी
ढांपे रहते हैं उन्हें
सर्दियों में गर्म रखने के लिए
पेड़ न अस्तित्ववादी हैं
न आधुनिकतावादी
फिर भी उनके पास विचार तो हैं
ये वो बात है जिसे हम कलियों के तौर पर देखते हैं
उन्क्की कामनाएं फूल हो जाती हैं
जितनी दूर तक उनके पास वसंत कि याद है
वे बुढ़ापे कि शिकायत नहीं करते
जब स्मृति का अवसान होने लगता है
वे छोड़ देते हैं दुनिया
अपनी पत्तियां गिराते हुए

जब मृत्यु आती है
वे चुपके-चुपके झुक जाते हैं आगे की ओर
जैसे वे गिलहरियों के लिए झुकते हैं
जैसे ही वे गिरते हैं वे भेजते हैं
एक अवशेष धरती के जरिये
अपनी अनावृत जड़ों से
एक नवांकुर
अपने बालसुलभ आश्चर्य में धरती को टकटकी लगाकर देखता है
सूर्य उसे आशीष देता है
पक्षी उसकी मंगलकामना में गीत गाते हैं

जन्म की खुशी मनाने के लिए
बिस्मिल्ला खां अपनी शहनाई बजाते हैं
सातवें आसमान से
****
नागफनी

कांटे मेरी भाषा हैं
मैं अपने होने का उद्घोष करता हूँ
एक रक्तिम स्पर्श के साथ

कभी ये कांटे फूल थे
मैं दगाबाज प्रेमियों से नफरत करता हूँ
कविओं ने मरुस्थल से कन्नी काट ली है
बगीचों की ओर लौटने में
सिर्फ यहाँ ऊँट बचे, और व्यापारी
जो रौंद डालते हैं मेरी लाली को धूल में
पानी की हर दुष्प्राप्य बूँद के लिए एक काँटा
मैं तितलियों को नहीं ललचाता
कोई चिड़िया मेरी प्रशंषा में गीत नहीं गाती
मैं अकाल नहीं उपजाता

मैं एक भिन्न सौन्दर्य रच लेता हूँ
चंद्रमा की रोशनी के पार
सपनों की ओर
एक तीखी, भेदक
प्रतिभाषा
****
घोंघा

तुम कहाँ घिरे हुए हो
तुम्हारा घर तुम्हारी पीठ पर
और तुम्हारे नन्हें सींग सतर्क
किस यात्रा के लिए

गीली लकड़ी पर फूल
काई के सफ़ेद आशिक
शिथिल दार्शनिक
मनुष्यों के उन्मत्त संसार की जो खिल्ली उड़ाता है
क्या ये तुम्हारा बाहर है जिसे हम देखते हैं
या तुम्हारा भीतर ?

तुम हमारे लड़ाई-झगड़ों को चुनौती देते हो
और त्वचा के नीचे तक उतर गए हमारे भेदभाव को
तुम जामे रहते हो हमारे दिनों और यादों पर
शुरू से आखिर तक
लेकिन हम
हम प्यार तक हड़बड़ी में करते हैं
हम दुनिया बदलने के लिए भी भागमभाग करते रहते हैं

तुम कहते हो हमसे : समय अंतहीन है
धीमे-धीमे तुम फुसफुसाते हो
तुम्हारी चिपचिपी चेतावनी
चुपचाप आह्वान करती है
उस संसार का जिसे हमने गंवा दिया है
एक पृथ्वी जो धीरे-धीरे चक्कर लगाती है
एक सूर्य जो धीरे-धीरे उगता है
एक चंद्रमा जो धीरे-धीरे पृथ्वी की परिक्रमा करता है
धीरे बारिश
धीरे संगीत
धीरे जीवन
धीरे मृत्यु
****
जब हाथी नहाता है

जब हाथी नहाता है
हम देखते हैं सिर्फ
एक घना अँधेरा पर्दा छाते की तरह और
एक उतुंग सूंड पाइप की तरह

अब मछलियाँ नाचने लगती हैं चारों ओर
उसके पैरों के, घासें
उसकी नाम देह को गुदगुदाती हैं
जंगल अपने शेरों, भेड़ियों
और पक्षियों के साथ अपनी तंग आँखों को तृप्त कर लेता है
उसके पृष्ट पर लगी हुई धूल
तांबें में सने सोने की तरह चमकती है
कीचड़प्लावित तालाब लहराने लगता है
एक जंगली सोते की तरह

जब हाथी नहाता है
हमारे त्योहार
व्याकुल कर देने की हद तक
तुच्छ दिखाई देते हैं...साजोसामान
से प्रसन्न नहीं होता हाथी
आप उसे रोते देख सकते हैं
पर्वों की शोभायात्राओं में
हाथियों और मनुष्यों की नियति पर विलाप करते हुए

जब हाथी नहाता है
गर्मी उस सूँड में से होती हुई गम हो जाती है
और मानसून आ जाता है
वन्य चांदनी उन आखों में
समा जाती है
पानी गाता है हिंडोल
तालाब में उसके एक डबाक पर
समग्र जंगल की खुशबू
एक फूल में
लोगों को दीवाना कर देती है
प्यार बंदिशें तोड़ देता है खुद की
आज़ादी बिगुल बजाती है
और अक्षर उसकी सूंडों को उठा देते हैं ऊपर
वसंत के स्वागत में।
****

( प्रख्यात मलयाली कवि सच्चिदानंदन ने हमारे विशेष आग्रह पर अपनी मलयाली कविताओं का स्वयम अंग्रेजी में अनुवाद करके भेजा था। इसके आधार पर ही युवा कवि व्योमेश शुक्ल ने इन्हें अनूदित किया है। व्योमेश के हेराल्ड पिंटर के अनुवाद को लोगों ने पहले भी पसंद किया है। हम इन दोनों कविओं के सहयोग के लिए आभारी हैं। )

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डायरी : २ : कृष्ण बलदेव वैद

7:05 pm

( कृष्ण बलदेव वैद हिन्दी के कथा परिदृश्य में अपनी विरल उपस्थिति के कारण जाने जाते हैं। उनके उपन्यास और कहानियाँ उन्हीं अर्थों में कथा कृतियाँ नहीं हैं जिनकी चिर-परिचित छवि हमारे मन में परम्परित कथाकृतियों को पढ़ कर बनी है। वैद ने अपने फॉर्म और कंटेंट को लेकर लगातार प्रयोग किया है और अब भी उनमें प्रयोगशीलता और जोखिम उठाने का माद्दा कम नहीं पड़ा है। कहना न होगा कि हिन्दी में अपनी इस प्रयोगवृत्ति के कारण उन्हें लेकर एक नासमझी का भी माहौल बना है जो प्रकारांतर से उसकी क्षीण पड़ती आलोचनात्मक मेधा का ही परिचायक है। हालाँकि वैद और उनके जैसे लेखकों की अब तो एक बड़ी जमात ही है, पर वैचारिक असहमतियों आदि का बहाना बना लोग अब भी ऐसे लेखकों की कृतियों पर विचारने-बतियाने से कतराते हैं। होना यह चाहिए कि इस ओर एक सच्चा और निर्भीक आलोचनात्मक उद्यम के लिए हम एक माहौल बनाएं। इसके लिए यह आवश्यक है कि अवसर और औचित्य की चिंता किए बगैर इस करुण तथ्य की ओर इशारा किया जाए। यहाँ भी यही करने की मंशा है।
आगे आप वैद साहब की तीसरी डायरी, '' डुबोया मुझको होने ने '' के अंश पढ़ेंगे जिसे ज्ञानपीठ ने हाल ही में प्रकाशित किया है। इससे पहले सबद पर उनकी पिछली डायारियों के बारे में आप पढ़ चुके हैं। इस बार उनसे और प्रकाशक की इजाज़त से हमने उसके एक महत्वपूर्ण अंश को छापने का निर्णय लिया है। यह अंश जितना वैद के अंदाजे-बयां से तार्रुफ कराता है उतनी ही शिद्दत से मूर्धन्य भारतीय चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन से अपने लगावों और उनके बहुरंगी व्यक्तित्व के बारे में भी बताता है। दी गई चित्र कृति स्वामी की ही है। सबद पर इससे पूर्व आप कवि मंगलेश डबराल की डायरी भी पढ़ चुके हैं।



आज सुबह (२५.४.९४ ) स्वामीनाथन चल बसा। अचानक।

हम पाली और आशा के साथ नाश्ता कर रहे थे और उसके समधियों के घर जाने को तैयार बैठे थे कि अशोक का फ़ोन आया कि कुछ ही देर पहले उन्हें खबर मिली कि स्वामी बेहोश हो गया है। मैंने स्वामी के घर फोन किया तो कालीदास ने बताया कि स्वामी बचेगा नहीं। हम उसी वक्त स्वामी के घर को चल दिए। पता नहीं मैंने गाड़ी कैसे चलाई। हमारे वहां पहुँचने से पहले ही स्वामी जा चुका था। जब हम ऊपर पहुंचे तो स्वामी की लाश उस बड़े कमरे में पड़ी हुई थी जिसमें वह काम किया करता था। धोती, दाढ़ी, मुंह खुला, बाल दीवान के सिरे से नीचे लटक रहे थे। मनजीत बावा उसके हाथ पकड़े उसके पास यूँ बैठा था जैसे उसके जाग उठने का इंतज़ार कर रहा हो। मैंने स्वामी को छुआ और छूते ही मैं फूट पड़ा, मनजीत मेरे साथ।

रिश्तेदार और चित्रकार दोस्त आ रहे थे। भिवानी की हालत ख़राब थी। स्वामी की बहनें चुपचाप रो रही थीं। कालिदास और हर्षा इधर-उधर डोल रहे थे। स्वामी सबसे बेखबर और दूर था।

शाम। कुछ ही देर पहले श्मशान घाट से लौटे। जब स्वामी की लाश पर लकडियां रखी जा रही थीं तो रामू मेरे साथ खड़ा था। उसका ग़म बातों में बह रहा था, मेरा खामोशी में। अशोक भी ऐसे अवसरों पर खामोश नहीं रह पाते।

कल रात नींद कई बार टूटी।

स्वामी के चाहने वालों को उसके दोष भी उसके गुण नज़र आते थे -- मसलन उसका न नहाना, उसकी बदपर्हेजियाँ, उसके आत्मालाप, उसका अंहकार। वह बिलाशक एक असाधारण बल्कि विलक्षण शख्स था। डॉक्टरों से वह डरता था। वह अपना डॉक्टर आप था। अपनी नब्ज़ टटोलता रहता था, अपने लिए दवाइयाँ भी खुद ही तजवीज़ करता रहता था। दांत का दर्द हो या दिल का, अपना इलाज वह खुद ही कर लिया करता था। धार्मिक नहीं था, आध्यात्मिक था। उसकी आवाज़ में हरारत और मुस्कराहट में शरारत थी।
एक बचकाना-सी सादगी।

स्वामी एक बहुत बड़ा अभिनेता या नेता भी हो सकता था। लेकिन वह अदंर से एक मस्तमौला, फक्कड़ और एक निहायत मौलिक कलाकार ही था।

उसे अपने परिवार से अथाह प्यार था। बातें करते-करते वह खो जाता था और खोया-खोया सजग हो उठता था।

स्वामी की आँखों की गहराइयों में लोग अक्सर खो जाया करते थे।

पी कर वह पीरोमुरशिद भी हो सकता था और गुस्सैल भेड़िया भी।

उसके घर की बेसरोसामानी में भी एक विलक्षण सलीका था।

गुस्सा और गमगुसारी। अतिभावुकता और अतिसंयत समझ-बूझ। बज़्मआराई और एकान्तप्रियता। लगन और अलगाव। खुदी और बेखुदगी। जलवत और खिलवत।

शामों का शहंशाह। पीरेमुगां। रिन्दाना बांकपन।
अपना मज़ाक उड़ाने की क्षमता। अपनी गलतियों को कबूल कर लेने की क्षमता। बेगर्जी की क्षमता।

शाम। अभी-अभी स्वामी के घर से लौटे हैं। मनजीत वहीं था। कुछ देर बाद अशोक भी आ गए। कालिदास अजीजाना अंदाज़ में मेरे पास बैठा रहा। कल शोक सभा है।

कल शाम त्रिवेणी में स्वामी की याद में हम सब इकट्ठे हुए। हाल भर गया। बोलने वालों में मैं भी था। बाद में हर्षा ने धीमे से मेरे कान में कहा -- आप जो बोले वह सबसे अच्छा था। हॉल से बहार निकलते ही मैं ठोकर खाकर बुरी तरह गिरा। बच गया लेकिन दोनों टांगें छिल गईं। रास्ते में आईआईसी में रुके। जब बाकी लोग चले गए तो रामू बहुत उदास नज़र आया, इसलिए हम कुछ देर उसके साथ बैठे रहे। जब हम चलने लगे तो रामू बोला कि अगर वह हमारे साथ हमारे घर चले तो हमें कोई एतराज़ तो नहीं होगा। हमने पुरतापाक तरीके से उसे साथ ले लिया। वह बंगाली मार्किट वाले अपने कमरे में उस रात अकेला नहीं सोना चाहता था। हम आधी रात घर पहुंचे। स्वामी कि याद में एक-एक जाम और लिया, खाना खाया, स्वामी को याद किया, और दो बजे सोए।
जब मैं बोल रहा था तो मेरी नज़र कृष्णा और अमजद अली खाँ पर बार-बार जा टिकती रही। जब-जब मेरी आवाज़ में उर्दू का रंग आया तब-तब अमजद का सर सराहना में हिला।

अभी-अभी कालिदास से बात हुई। भिवानी के बारे में बात हुई। डॉक्टर उसे वेलियम देना चाह रहा है। कालिदास ने बताया कि स्वामी कोई वसीयत नहीं छोड़ गया है, इसलिए कई कानूनी झमेले उठेंगे। गेलरी वाले भी बेईमानियाँ कर रहे हैं। बैंक में जो पैसा है उसे हाथ नहीं लगाया जा सकता।

स्वामी का मातम कर रहा हूँ इसलिए काम नहीं हो रहा। बार-बार मृत स्वामी कि बंधी हुई दाढ़ी सामने आ जाती है। उसके जबड़ों को बंद करने के लिए उन्हें बांधना पड़ा था। उसके माथे का ठंडा स्पर्श मुझे याद है, और उसके सरहाने बैठी उसकी बहन का झुका हुआ चेहरा। उसके जाने के बाद अब कृष्णा के सिवा मेरा कोई समकालीन दोस्त बाकी नहीं रहा।
****
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सृजन : तुषार धवल की लंबी कविता

1:32 pm
( हिंदी में लंबी कविताओं के लेखन की अत्यंत समृद्ध परंपरा है। उन कविओं की एक लंबी फेहरिस्त है जिन्होंने कविता के इस विधान को साध कर सार्थक रचनाएं दीं। युवा कवि तुषार धवल की यह सद्यः लिखित कविता उसी सार्थक सृजन की एक कड़ी है जिसमें हम अपने समय की तमाम विसंगतियों और विद्रूपताओं से साक्षात होते हैं। अच्छी बात यह है कि इस विद्रूप अंकन के बाद भी कवि के पास मनुष्यों के लिए जीवनदायनी आस्था बच रहती है और कविता में उसकी पुनर्प्रतिष्ठा इन लंबी कविताओं के ज्ञात इतिहास में भी प्रीतिकर विलोम है। प्रसंगवस जोड़ दूँ की सबद पर यह तुषार की दूसरी लंबी कविता पहलेपहल प्रकाशित हो रही है। )


काला राक्षस

तुषार धवल

समुद्र एक
शून्य अंधकार सा पसरा है।
काले राक्षस के खुले जबड़ों से
झाग उगल-उचक आती है
दबे पाँव घेरता है काल
इस रात में काली पॉलीथिन में बंद आकाश

संशय की स्थितियों में सब हैं
वह चाँद भी
जो जा घुसा है काले राक्षस के मुंह में

काले राक्षस का
काला सम्मोहन
नीम बेहोशी में चल रहे हैं करोड़ों लोग
सम्मोहित मूर्छा में
एक जुलूस चला जा रहा है
किसी शून्य में

कहाँ है आदमी ?

असमय ही जिन्हें मार दिया गया
सड़कों पर
खेतों में
जगमगाती रोशनी के अंधेरों में
हवा में गोलबंद हो
हमारी ओर देखते हैं गर्दन घुमा कर
चिताओं ने समवेत स्वर में क्या कहा था ?

पीडाएं
अपना लोक खुद रचती हैं
आस्थाएँ अपने हन्ता खुद चुनती हैं
अँधेरा अँधेरे को आकार देता है

घर्र घर्र घूमता है पहिया

(२)

काला
राक्षस

वह
खड़ा है जमीन से आकाश के उस पार तक
उसकी देह हवा में घुलती हुई
फेफड़ों में धंसती धूसर उसकी जीभ
नचाता है अंगुलियाँ आकाश की सुराख़ में

वह
संसद में है मल्टीप्लेक्स मॉल में है
बोकारो मुंगेर में है
मेरे टीवी अखबार वोटिंग मशीन में है
वह मेरी भाषा
तुम्हारी आंखों में है
हमारे सहवास में घुलता काला सम्मोहन

काला सम्मोहन काला जादू
केमिकल धुआं उगलता नदी पीता जंगल उजाड़ता
वह खड़ा है जमीन से आकाश उस पार तक अंगुलियाँ नचाता
उसकी काली अंगुली से सबकी डोर बंधी है
देश सरकार विश्व संगठन
सत्ताओं को नचाता
उसका अट्टहास।

काली
पालीथिन में बंद आकाश।

(३)

अट्टहास

फ़िर सन्नाटा।

सम्मोहित मूर्छा में
एक जुलूस चला जा रहा है
किसी शून्य में --
काल में
वह
हमारे मन की खोह में छुप कर बैठा है
जाने कब से

हमारे तलों से रोम छिद्रों से
हमरे डीएनए से उगता है
काला राक्षस
हुंकारता हुआ
नाजी सोवियत व्हाइट हाउस माइक्रोसॉफ्ट पेप्सी दलाल स्ट्रीट
सियाचीन जनपथ आईएसआई ओजोन एसपीएम एसिड रेन
स्किटज़ोफ्रेनिया सुइसाइड रेप क्राइम सनसनी न्यूज़ चैनल

बम विस्फोट !!!

तमाशा
तमाशबीन ध्वंस
मानव मानव मानव
गोश्त गोश्त गोश्त

घर्र घर्र घूमता है पहिया

(४)

घर्र घर्र घूमता है पहिया

गुबार

उठ रही है अंधकार में
पीली-आसमानी
उठ रही है पीड़ा-आस्था भी
गड्डमड्ड आवाजों के बुलबुलों में
फटता फूटता फोड़ा
काल की देह पर
अँधेरा है
और काले सम्मोहन में मूर्छित विश्व

फिर
एक फूँक में
सब व्यापार ...
देह जीवन प्यार
आक्रामक हिंसक
जंगलों में चौपालों में
शहर में बाज़ारों में
मेरी सांसों में
लिप्सित भोग का
काला राक्षस

(५)

एक छाया सा चलता है मेरे साथ
धीरे धीरे और सघन फिर वाचाल
बुदबुदाता है कान में
हड़प कर मेरी देह
जीवित सच सा
प्रति सृष्टि कर मुझे
निकल जाता है
अब मैं अपनी छाया हूँ। वह नहीं जो था।
पुकारता भटकता हूँ
मुझे कोई नहीं पहचानता
मैं किसी को नज़र नहीं आता

उसके हाथों में जादू है
जिसे भी छूता है बदल देता है
बना रहा है प्रति मानव
सबके साथ छाया सा चला है वह

अब कोई किसी को नहीं पहचानता
अब कोई किसी को नज़र नहीं आता

प्रति मानव !
कोई किसी को नज़र नहीं आता

(६)

तुमने काली अँगुलियों से गिरह खोल दी
काली रातों में
इच्छाएं अनंत असंतोष हिंसक

कहाँ है आदमी ?

उत्तेजित
शोर यह
छूट छिटक कर उड़ी इच्छाओं का
गाता है
हारी हुई नस्लों के पराभूत विजय गीत
खारिज है कवि की आवाज़
यातना की आदमखोर रातों में
एक गीत की उम्मीद लिए फिर भी खड़ा हूँ
ढेव गिनता
पूरब को ताकता

तुमने काली अँगुलियों से गिरह खोल दी
काली रातों में
खोल दिया सदियों से जकड़े
मेरे पशु को उन्मुक्त भोग की लम्बी रातों की हिंसा में

(७)

बिकता है बिकता है बिकता है
ले लो ले लो ले लो
सस्ता सुंदर और टिकाऊ ईश्वर
जीन डीएनए डिज़ाइनर कलेक्शन से पीढियां ले लो
ले लो ले लो ले लो
बीपीओ में भुस्स रातें
स्कर्ट्स पैंटीज़ कॉन्डोम सब नया है
नशे पर नशा फ्री
सोचना मना है क्योंकि
हमने सब सोच डाला है
ले लो ले लो ले लो
स्मृतियाँ लोक कथाएँ पुराना माल
बदलो नए हैपनिंग इवेंट्स से
तुम्हारी कथाओं को री-सायकल करके लाएंगे
नए हीरो आल्हा-ऊदल नए माइक्रोचिप से भरेंगे
मेड टू आर्डर नया इंसान
ले लो ले लो ले लो
मेरे अदंर बाहर बेचता खरीदता उजाड़ता है
काला राक्षस
प्यास
और प्यास

(८)

इस धमन भट्ठी में
एक सन्नाटे से दूसरे में दाखिल होता हुआ
बुझाता हूँ
देह
अजनबी रातों में परदे का चलन
नोंचता हूँ
गंध के बदन को

यातना की आदमखोर रातों में
लिपटता हूँ तुम्हारी देह से
नाखून से गडा कर तुम्हारे
मांस पर
लिखता हूँ
प्यास
और प्यास...

एड़ियों के बोझ सर पर
और मन दस फाड़
खून पसीना मॉल वीर्य सन रहे हैं
मिट्टी से उग रहे ताबूत


ठौर नहीं छांह नहीं
बस मांगता हूँ
प्यास
और प्यास...


(९)

प्यास
यह अंतहीन सड़कों का अंतर्जाल
खुले पशु के नथुने फड़कते हैं
यह वो जंगल नहीं जिसे हमारे पूर्वज जानते थे
अराजक भोग का दर्शनशास्त्र
और जनश्रुतियों में सब कुछ
एक पर एक फ्री


हँसता है प्यारा गड़रिया
नए पशुओं को हांकता हुआ


(१०)

तुमने काली अँगुलियों से गिरह खोल दी
काली रातों में
निर्बंध पशु मैं भोग का
नाखून से गडा कर तुम्हारी देह पर
लिखता हूँ
प्यास
और प्यास...

भोग
का अतृप्त पशु
हिंसक ही होगा
बुद्धि के छल से ओढ़ लेगा विचार
बकेगा आस्था
और अपने तेज पंजे धंसा इस
दिमाग की गुद्दियों में --
रक्त पीता नई आज़ादी का दर्शन !


लूट का षड़यंत्र
महीन हिंसा का
दुकानों की पर्चियों में, शिशुओं के खिलौनों में
धर्म और युद्ध की परिभाषा में भात-दाल प्रेम में
हवा में हर तरफ
तेल के कुएं से निकल कर नदी की तरफ बढ़ता हुआ
हवस का अश्वमेध
नर बलि से सिद्ध होता हुआ।


बम विस्फोट !!!

(११)

सबके बिस्तर बंधे हुए
सभी पेड़ जड़ से उखडे हुए
सड़क किनारे कहीं जाने को खड़े हैं
यह इंतज़ार ख़त्म नहीं होता
भीड़ यह इतनी बिखरी हुई कभी नहीं थी


काला सम्मोहन काला जादू
सत्ताओं को नचाता
उसका अट्टहास।
काली पॉलीथिन में बंद आकाश।


(१२)

वो जो नया ईश्वर है वह इतना निर्मम क्यों है ?
उसकी गीतों में हवास क्यों है ?
किस तेजाब से बना है उसका सिक्का ?

उसके हैं बम के कारखाने ढेर सारे
जिसे वह बच्चों की देह में लगाता है
वह जिन्नातों का मालिक है
वह हँसते चेहरों का नाश्ता करता है

हँसता है काला राक्षस मेरे ईश्वर पर
कल जिसे बनाया था
आज फिर बदल गया
उसकी शव यात्रा में लोग नहीं
सिर्फ़ झंडे निकलते हैं

(1३)

सत्ताएं रंगरेज़
वाद सिद्धांत पूँजी आतंक
सारे सियार नीले


उस किनारे अब उपेक्षित देखता है मोहनदास
और लौटने को है
उसके लौटते निशानों पर कुछ दूब सी उग आती है।


(१४)

पीड़ाओं का भूगोल अलग है
लोक अलग
जहाँ पिघल कर फिर मानव ही उगता है
लिए अपनी आस्था।


काला सम्मोहन --

चेर्नोबिल। भोपाल।
कालाहांडी। सोमालिया। विधर्व।
इराक। हिरोशिमा। गुजरात।
नर्मदा। टिहरी।
कितने खेत-किसान
अब पीड़ाओं के मानचित्र पर ये ग़लत पते हैं

पीड़ाओं का रंग भगवा
पीड़ाओं का रंग हरा
अपने अपने झंडे अपनी अपनी पीड़ा।


(१५)

कहाँ है आदमी ?

यह नरमुंडों का देश है
डार्विन की अगली सीढ़ी --
प्रति मानव
सबके चेहरे सपाट
चिंतन की क्षमताएं क्षीण
आखें सम्मोहित मूर्छा में तनी हुई
दौड़ते दौड़ते पैरों में खुर निकल आया है
कहाँ है आदमी ?
प्रति मानव !

(१६)

मैं स्तंभ स्तंभ गिरता हूँ
मैं खंड खंड उठता हूँ


ये दीवारें अदृश्य कारावासों की
आज़ादी ! आज़ादी !! आज़ादी !!!


बम विस्फोट !!!

कहाँ है आदमी ?
प्रति मानव सब चले जा रहे किसी इशारे पर
सम्मोहित मूर्छा में


मैं पहचानता हूँ इन चेहरों को
मुझे याद है इनकी भाषा
मुझे याद है इनकी हँसी इनके माटी सने सपने


कहाँ है आदमी ?

सुनहरे बाइस्कोप में
सेंसेक्स की आत्मरति
सम्भोग के आंकड़े
आंकड़ों का सम्भोग
आंकडों की पीढ़ियों में
कहाँ है आदमी ?

सन्नाटे ध्वनियों के
ध्वनियाँ सन्नाटों की
गूंजती है खुले जबड़ों में

यह सन्नाटा हमारी अपनी ध्वनियों के नहीं होने का
बहरे इस समय में

बहरे इस समय में
मैं ध्वनियों के बीज रोप आया हूँ।


(१७)

तुमने काली अँगुलियों से गिरह खोल दी
काली रातों में
उगती है पीड़ा
उगती है आस्था भी
जुड़वां बहनों सी
तुम्हारे चाहे बगैर भी


घर्र घर्र घूमता है पहिया

कितना भी कुछ कर लो
आकांक्षाओं में बचा हुआ रह ही जाता है
आदमी।
उसी की आँखों में मैंने देखा है सपना।
तुम्हारी प्रति सृष्टि को रोक रही आस्था
साँसों की
हमने भी जीवन के बेताल पाल रखे हैं

काले राक्षस

सब बदला ज़रूर है
तुम्हारे नक्शे से लेकिन हम फितरतन भटक ही जाते हैं
तुम्हारी सोच में हमने मिला दिया
अपना अपना डार्विन
हमने थोड़ा सुकरात थोड़ा बुद्ध थोड़ा मार्क्स फ्रायड न्यूटन आइन्स्टीन
और ढेर सारा मोहनदास बचा रखा था
तुम्हारी आँखों से चूक गया सब
जीवन का नया दर्शनशास्त्र
तुम नहीं
मेरी पीढियां तय करेंगी
अपनी नज़र से

यह द्वंद्व ध्वंस और सृजन का।

(१८)

काले राक्षस

देखो तुम्हारे मुंह पर जो मक्खियों से भिनभिनाते हैं
हमारे सपने हैं
वो जो पिटा हुआ आदमी अभी गिरा पड़ा है
वही खडा होकर पुकारेगा बिखरी हुई भीड़ को
आस्था के जंगल उजड़ते नहीं हैं

काले राक्षस

देखो तुमने बम फोड़ा और
लाश तौलने बैठ गए तुम
कबाड़ी !
जहाँ जहाँ तुम मारते हो हमें
हम वहीं वहीं फिर उग आते हैं

देखो
मौत का तांडव कैसे थम जाता है
जब छटपटाए हाथों को

हाथ पुकार लेते हैं

तुम्हारे बावजूद
कहीं न कहीं है एक आदमी
जो ढूंढ ही लेता है आदमी !

काले राक्षस !
घर्र घर्र घूमता है पहिया

****


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कोठार से बीज : ४ : रघुवीर सहाय

7:08 pm


( हिन्दी के जिन कविओं का अपने समय और बाद की कविता पर बहुत सीधा, निर्णायक और सार्थक असर रहा, रघुवीर सहाय उनमें से एक थे। उन्होंने कविता को इस योग्य बनाया कि उसकी तरफ उम्मीद से देखा जा सके : उसकी ज़रूरत महसूस हो। उनकी ऐसी अनेक स्मरणीय कविताएं हैं जिनसे इस अंधेर समय में रोशनी के कल्ले फूटते हैं।
मसलन यही : कुछ तो होगा / कुछ तो होगा / अगर मैं बोलूँगा / न टूटे / तिलस्म सत्ता का / मेरे अदंर / एक कायर टूटेगा / टूट मेरे मन / अब अच्छी तरह से टूट / झूठ मूट मत अब रूठइसीलिए रघुवीर सहाय को याद करना कभी-कभी निराशा का कर्तव्य भी लगता है। कोठार से बीज में इस दफा गद्यकार रघुवीर सहाय। आगे दिए गए गद्य के टुकड़े सुरेश शर्मा द्वारा संपादित रघुवीरजी के गद्य चयन, '' यथार्थ यथास्थिति नहीं '' से हैं जिसे चयन में से एक और चयन भी कहा जा सकता है। )

जो कविता बचा लेती है

कविता क्या चीज़ें बचा सकती है ? बहुत सोच करके देखूं तो भी मैं उसको कुछ पहचानी जाने वाली शक्लों में नहीं देख पाता -- सिवा इसके कि कुछ चीज़ें हैं जो कि रोज हम अपनी जिंदगी में करते हैं या पाते हैं और हर वक्त एक तरह की भावना से आक्रांत रहते हैं कि ये हमें रिआयतों के रूप में मिली हैं, जबकि वे हमारे अधिकार हैं। उन चीज़ों को अगर बचा रखा जा सके तो हम सोच सकते हैं कि कभी-न-कभी हम इनको अपने अधिकार की तरह से बरतेंगे। आप कह सकते हैं कि मैं चाहता हूँ कि इस बात को बचा रखा जाए कि बच्चा अपनी माँ और अपने बाप के साथ एक रिश्ता रखता है। आप कह सकते हैं कि इस बात को बचा रखा जाए कि मैं जब कोई बहुत जायकेदार चीज़ खाता हूँ तो मेरे शरीर में एक संवेदन होता है। वह बचा रखनेवाली चीज़ है।

कविता क्या करती है ?

कविता, उस आदमी को जिसने उसे लिखा है, एक बेहतर इंसान बनाती है। और नहीं बनाती है तो वह कविता नहीं है। कविता क्या, कोई भी रचना नहीं है। हर रचना उसे हमेशा एक बेहतर व्यक्ति बनाती है जिसने उसको किया है। रचना कम-से-कम उस व्यक्ति को जो उसे कर रहा है, एक बेहतर इंसान ज़रूर बनाती है, क्योंकि पहले तो वह इन शर्तों का अनजाने पालन करता है कि उसके मन में द्वेष नहीं है। क्रोध हो सकता है, एक तरह की छटपटाहट हो सकती है, मजबूरी हो सकती है, लेकिन हताशा नहीं है और अन्याय भी नहीं है। दूसरे कदम पर वह एक बेहतर इंसान इसीलिए बनता है कि हर रचना अपने व्यक्तित्व को बिखरने से बचाने का प्रयत्न है।

इस तरह वह रचना योग्य बना रहता है

यह मैं मान सकता हूँ कि अगर इंसान और इंसान के बीच एक गैरबराबरी का रिश्ता है और उस रिश्ते को कोई आदमी मानता है कि ऐसे ही रहना चाहिए, तो वह कोई रचना नहीं कर सकता। वह एक भी कविता नहीं लिख सकता -- ऐसी जिसको पढ़ कर मैं खुश होऊं कि यह कविता है। इसके उलट अगर आप यह मानें कि जो आदमी इस गैरबराबरी को हटाना चाहता है -- अब वह कैसे भी हटाना चाहता हो, वह अवधारनाओं के द्वारा हटाना चाहता हो, किसी संगठित कार्रवाई के द्वारा हटाना चाहता हो या केवल इसी के द्वारा हटाना चाहता हो कि मैं कम-से-कम नहीं करूंगा और इसकी निस्सारता को भी पहचानता हो कि मेरे अकेले यह न कर देने से होगा नहीं, लेकिन मैं करूंगा नहीं -- तो मैं समझता हूँ कि तीनों-चारों प्रकारों में वह रचना करने में समर्थ और योग्य बना रहता है।

कविता की मृत्यु और अमरत्व

कविता हुई नहीं कि मरी का मतलब सिर्फ़ यह है कि जिस क्षण आप एक कविता को पूरा लिख लेते हैं अर्थात् आप किसी एक जगह से शुरू करके यह जान लेते हैं कि आपने क्या लिखा, उसके बाद कवि के लिए उसका वह महत्व नहीं रह जाता जो कि दूसरों के लिए होता है। इसके साथ यह भी होता है कि जिस सामग्री में आपने रचना कि थी, वह ख़त्म हो जाती है। साथ ही और भी एक बात होती है कि जिस कलात्मक अनुभव को आपने दुबारा से अनुभव और अभिव्यक्त किया वह अनुभव ख़त्म हो जाता है। कभी-कभी यह भी संभव है कि वह पूरी तरह से ख़त्म न हो। तब यह भी मानना पड़ेगा कि वह कविता जो आपने उस समय लिखी है वह भी पूरी तरह से पूरी नहीं हुई।

कविता की ज़रूरत

बार-बार ऐसा वक्त आता है कि कवि को जीने का उद्देश्य समझ में नहीं आ रहा होता है। उसी वक्त कविता की ज़रूरत कवि को होती है। कविता उसे जीने का उद्देश्य बता नहीं देती। वह स्वयं उद्देश्य बन जाती है। कह सकते हैं कि वह जीवन का उद्देश्य नहीं बनती : ख़ुद एक जीवन बन जाती है जिसका उदेश्य वह स्वयं होती है। '' कविता ख़ुद एक जीवन बन जाती है '' के क्या माने ? इस जीवन में जो भी है -- रहस्य, बोध, जिज्ञासा, राग, विरक्ति, भय और साहस वह सब कविता में एक दर्जा फर्क हो जाता है -- उसमें से ममत्व छूट जाता है। कविता नामक जीवन में मृत्यु नहीं होती : मृत्यु तो ममत्व का ही दूसरा नाम है। तब क्या उसमें अमरत्व होता है ? अवश्य होता है, परन्तु समझने की बात यह है कि ख़ुद कविता अमर नहीं होती : कविता तो इस जीवन में शायद सबसे अधिक मर्त्य है। वह हुई नहीं कि मरी... वह न जाने कैसा कवि होगा जो अपनी कविता को लेकर लगातार जी सकता होगा।
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रंगायन : ३ : हबीब तनवीर

2:18 pm
( हबीब तनवीर उन जीवित मूर्धन्यों में से एक हैं जिनका होना उस कला-माध्यम को न सिर्फ़ एक अमाप ऊँचाई देता है, बल्कि जिन मूल्यों और प्रतिबद्धताओं से वह विकस रही होती है, उसमें हमारी आस्था भी दृढ़ करता है। रंगायन में इस दफा हबीब तनवीर। )

'' आओ, देखो सत्य क्या है ''

हृषीकेश सुलभ

अब छियासी के हो चुके हबीब तनवीर को याद करना सिर्फ रंगकर्म से जुड़े एक व्यक्ति को याद करने की तरह नहीं है। दसों दिशाओं से टकराते उस व्यक्ति की कल्पना कीजिए, जिसके सिर पर टूटने को आसमान आमादा हो, धरती पाँव खींचने को तैयार बैठी हो और कुहनियाँ अन्य दिशाओं से टकराकर छिल रही हों; और वह व्यक्ति सहज भाव से सजगता तथा बेफ़िक्री दोनों को एक साथ साधकर चला जा रहा हो। अब तक कुछ ऐसा ही जीवन रहा है हबीब तनवीर का। भारतेन्दु के बाद भारतीय समाज के सांस्कृतिक संघर्ष को नेतृत्व देनेवाले कुछ गिने-चुने व्यक्तित्वों में हबीब तनवीर भी शामिल हैं। भारतेन्दु का एक भी नाटक अब तक मंचित न करने के बावजूद वे भारतेन्दु के सर्वाधिक निकट हैं। उन्होंने लोक की व्यापक अवधारणा को अपने रंगकर्म का आधार बनाते हुए अभिव्यक्ति के नये कौशल से दर्शकों को विस्मित किया है।

विस्मय अक्सर हमारी चेतना को जड़ बनाता है, पर हबीब तनवीर के रंग कौशल का जादू हमें इसलिए विस्मित करता है कि उनकी प्रस्तुतियों में सहजता के साथ वे सारे प्रपंच हमारे सामने खुलने लगते हैं, जो सदियों से मनुष्य को गुलाम बनाए रखने के लिए मनुष्य द्वारा ही रचे जा रहे हैं। इन प्रपंचों के तहख़ानों में निर्भय होकर उतरना और सारे गवाक्षों को खोलकर आवाज़ लगाना कि आओ, देखो सत्य क्या है; आज सरल काम नहीं है। रचनाकर्म में इसके दोहरे ख़तरे होते हैं। एक तो कलात्मकता के ह्रास का ख़तरा हमेशा बना रहता है और दूसरी ओर प्रपंच रचनेवालों की हिंसा का सामना भी करना पड़ता है। हबीब तनवीर इन दोनों ख़तरों से जूझते हैं। कलात्मकता के स्तर पर वह निरंतर उन रूढ़ियों को तोड़ते हैं, जिन्होंने आज़ादी के बाद के हिन्दी रंगमंच का नैसर्गिक विकास नहीं होने दिया। तथाकथित बौद्धिकता और आभिजात्यपन की लालसा में इन रूढ़ियों के आधार पर हिन्दी रंगमंच का ऐसा स्वरूप उभरा, जो आज सामान्य जनता की सांस्कृतिक भूख मिटाने में सक्षम नहीं है।

हबीब तनवीर ने इन रूढ़ियों को तोड़ते हुए नये प्रयोग किए और प्रयोगों की सफलताओं- असफलताओं के बीच से अपनी प्रस्तुतियों के लिए नयी रंगभाषा और नयी रंगयुक्तियों की खोज की। उन्होंने अपने नाटकों की केन्द्रीय चेतना से कभी कोई समझौता नहीं किया। अपने हर नाटक को अपने समय और समाज के प्रति उत्तरदायी बनाए रखा। समाज के सारे प्रपंचों और अंतर्द्वंद्वों को उजागर करते हुए वे उस शक्ति से न कभी भयभीत हुए न ही समझौता किया, जो मनुष्यता के विरोध में संगठित होकर हिंसा करती है।

हबीब साझा संस्कृति की वकालत करते रहे हैं। धार्मिक आडम्बरों-बाह्याचारों-कट्टरताओं के ध्वजवाहकों की क्रूरताएँ हों या पूँजी के मद में बौरायी शक्तियों की हिंसा - सबका उन्होंने सामना किया। पुनरुत्थानवाद और शुचितावाद को उन्होंने एक सिरे से नकारा। अपने रंगकर्म के आरम्भिक काल से ही हबीब तनवीर इस बात बल देते रहे हैं कि रंगमंच को आलोचनात्मक होना चाहिए। रजनीतिक दलों की नकेल पहने बिना राजनीतिक विचारों से लैस रंगमंच की उनकी कल्पना को आरम्भिक दौर में संदेह की नज़र से देखा गया। पर जैसे-जैसे उन्होंने अपने नाटकों के लिए नयी युक्तियों की खोज की और नाटकों में विचार के स्तर पर मनुष्य की पक्षधरता का संघर्ष तेज़ किया, फलस्वरूप रंगकर्मियों-दर्शकों का एक बड़ा तबका उनकी तरफ आकर्षित हुआ।

जिस इप्टा आन्दोलन ने अपनी सक्रियता से देखते-देखते समग्र भारत को एक सूत्र में बाँध दिया था, राजनीतिक बँटवारे के बाद उसका बिखरना एक सदमे की तरह था। इस सांस्कृतिक सदमे से उबरने के लिए अधिकांश कलाकारों ने सृजन का ही रास्ता अपनाया। इप्टा के साथ जुड़े रहने का रंगमंचीय अनुभव हबीब तनवीर के काम आया और साथ ही राजनीतिक अंतर्द्वंद्वों से उपजे संकटों और निराशा ने नये रास्तों की खोज के लिए विवश किया। मानवतावादी विचारों तथा जीवन की संवेदना की अभिव्यक्ति के लिए स्वतंत्र राहों की निर्मिति के संघर्ष ने हबीब तनवीर को इस सदमे से मुक्ति दी। रॉयल एकेडमी ऑफ़ ड्रामेटिक आट्र्स (राडा) में प्रशिक्षण के दौरान अपनी भाषा में रंगकर्म करने की उनकी आस्था ने प्रशिक्षण के उत्तरार्द्ध के प्रति उनके मन में अनास्था जगा दी। उन्होंने राडा छोड़ने का निर्णय लिया, जो असामान्य और जोखिम भरा था। यह जोखिम सब नहीं उठा सकते। अपनी रंग परम्परा और भाषा के भीतर बहुत गहरे उतरकर उसकी शक्ति की पहचान किए बगैर यह जोखिम नहीं उठाया जा सकता।

हबीब तनवीर को अपनी रंग परम्पराओं तथा अपनी भाषा की पहचान थी और इनकी शक्ति पर विश्वास था। उन्होंने यह जोखिम उठाया और राडा छोड़कर ब्रिस्टल ओल्ड विक थियेटर में प्रशिक्षण लेने लगे। यहाँ उन्हें डंकन रास मिले, जिन्हें वह आज भी अपना गुरु मानते हैं। डंकन रास ने उन्हें नाटक के पहले पाठ के दरम्यान प्राप्त नाटक की चेतना और मूल प्रयोजन से जुड़े रहने का हुनर सिखाया। हबीब तनवीर ने ब्रिस्टल ओल्ड विक के बाद ब्रिटिश ड्रामा लीग में प्रशिक्षण प्राप्त किया। फिर यूरोप की यात्रा पर निकले। एक ऐसी यात्रा, जिसे संचालित कर रही थी दुनिया की विविध रंग छवियों को देखने-समझने की बेचैनी।

इस यात्रा ने उनकी इस धारणा को ताक़तवर बनाया कि शब्द और संस्कृति की रचनात्मक दुनिया में उस स्थान और पर्यावरण का बहुत महत्त्व होता है, जहाँ आप जनमते और पालित-पोषित होते हैं। सृजनात्मकता के लिए तमाम उर्वरा शक्तियाँ आपकी अपनी ज़मीन में ही छिपी होती हैं। आज़ादी के बाद रंगमंच के संदर्भ में परम्परा के उपयोग को लेकर चलनेवाली बहस को हबीब तनवीर ने अपने रंगकर्म से तीव्र किया और धुँधलके को छाँटने के लिए सूत्र दिए। परम्परा के बीच से जीवन को गतिशील बनानेवाली आधुनिकता के तत्त्वों को चुनकर हबीब तनवीर ने एक नये रंग परिदृश्य की रचना की।

हबीब तनवीर कला को जीवन का अंग मानते हैं। एक ओर शैली, तकनीक और प्रस्तुतिकरण के सम्पूर्णता में देशज बने रहने पर बल देते हैं, तो साथ-साथ इस बात पर भी बल देते हैं कि इसे कथ्यात्मक रूप से विश्वजनीन, आधुनिक तथा समसामयिक होना चाहिए। वह महानगरों में मंचित होनेवाले आँचलिक मुहावरों वाले अपने नाटकों के पक्ष में आक्रामकता के साथ यह तर्क रखते हैं कि, '' मैं इस तथाकथित सभ्य समाज के बनावटी और ओढ़े हुए आवरण को उतार देना चाहता हूँ। '' हबीब तनवीर को न तो परम्परा का दास बनना स्वीकार्य है और न ही परम्परा से मनमानी करना। वह सृजनशीलता और मानवीय मूल्यों के मूल सरोकारों से जुड़ी परम्परा के उन जीवित अंशों के उपयोग की वकालत करते हैं, जो कलात्मकता को भ्रष्ट न करें।

मृच्छकटिक पहला नाटक था, जिसे प्रस्तुत करते हुए हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ के पारम्परिक रंगकर्म की युक्तियों, बोली, शैली और कलाकारों का प्रयोगधर्मी उपयोग किया। हबीब तनवीर ने आगा हश्र कश्मीरी, विशाखदत्त के अलावा मौलियर, ब्रेख्त , लोर्का, ऑस्कर वाइल्ड, शेक्सपीयर, गोल्डनी आदि के नाटकों को मंचित किया। उन्होंने ग़ालिब के जीवन पर भी नाटक किया। इस कालावधि में उन्हें वैसी सफलता नहीं मिली, जैसी आगरा बाज़ार के मंचन से मिली थी। पर उनकी प्रयोगधर्मिता बहस के केन्द्र में रही।

गाँव का नाम ससुराल, मोर नाम दामाद ने उन्हें एक बार फिर सफल निर्देशक के रूप में स्थापित किया। यहीं से उन्होंने अपने रंगकर्म के लिए एक ऐसे रास्ते को पकड़ा या ऐसी दिशा की खोज की, जिसके कारण उन्हें बाद के दिनों में अपार सफलता और महत्त्व प्राप्त हुआ। चरनदास चोर ने उनको विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित किया। अपने नाटकों की प्रस्तुतियों से हबीब तनवीर बार-बार अपनी सृजनात्मकता का अतिक्रमण करते हैं। यह एक दुस्साहस भरा काम है। अक्सर बड़े नाम इससे बचना चाहते हैं क्योंकि अपने ही रचे को फिर से रचकर आगे निकल जाना बहुत कठिन होता है। असफलता का भय ऐसा करने से रोकता है। पर हबीब तनवीर की प्रयोगधर्मिता असफलताओं से जूझती रही है।
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अनकहा कुछ : ३ : फ्रान्ज़ काफ़्का : जीवनी : अंतिम किस्त

2:00 pm
( काफ़्का की पिएत्रो सिताती द्वारा लिखित और अशोक पांडे द्वारा अनूदित जीवनी के तीसरे अध्याय की यह आखिरी पेशकश है। इस अपेक्षाकृत लंबी पोस्ट को भी रूचि और लगाव से पढ़ा गया है। इसके पीछे जितना काफ़्का और सिताती हैं उससे कतई कम अशोक का उद्यम नहीं है। हम इस पेशकश की समाप्ति पर पुनः उनके सहयोग के लिए अपना आभार प्रकट करते हैं। )

यह रूपान्तरण हमारी आंखों के सामने होता है। शुरू में सास्सा को लगता है कि वह एक ऐसी देह में कैद है जिसे वह उस नैसर्गिकता के साथ काबू या निर्देशित नहीं कर पाता जैसा पहले अपने प्राकृतिक हाथ पैरों के साथ कर पाता था। जब वह बोलने के लिए अपना मुंह खोलता है उसे नीचे कहीं से चिड़िया की सी दर्दनाक आवाज अपने शब्दों के साथ घुलती महसूस होती है और उस प्रतिध्वनि में उसे संदेह होता है कि उसने अपनी आवाज सुनी भी या नहीं। उसे भान होता है कि उसकी देह अकल्पनीय रूप से चौड़ी है। जब वह बिस्तर से उतरना चाहता है उसके पास हाथ पैर नहीं बल्कि कई सारे छोटे छोटे पैर हैं ; अगर वह उन में से एक को मोड़ना चाहता है तो उसे अपने को खींचना होता था और जब वह उसे मोड़ पाता है वह देखता है कि बिना उसके प्रयास किए बाकी सारे पैर भी भीषण दर्दभरी उत्तेजना में हिलने लगते हैं।

उसकी पाशविक प्रवृत्ति जल्द ही और विकसित होती हैः उसकी आवाज जो अब तक आधी मानवीय आधी पशुओं जैसी थी अब पूरी तरह पशुओं जैसी हो जाती है और अब वह उन शब्दों को समझने लगता है जो पहले उसे अजनबी लगे थे। वह अपने नए शरीर को अपनाना शुरू करने का प्रयास करता है। अब उसे अपने असंख्य हिलते डुलते पैरों से भय नहीं लगता ; जब वह फर्श को छूता है वह पाता है कि वे उसकी आज्ञा का पालन कर रहे हैं और उसे जहां वह चाहे ले जा सकते हैं जैसा वह पहले के पैरों से कर सकता था। और उसे एक शारीरिक बेहतरी का अनुभव होता है और एक तरह की प्रसन्नता का भी मानो वह अभी अभी अपने नए हाथ पैरों में प्रविष्ट हुआ हो। वह अपने एन्टीना का इस्तेमाल करना शुरू करता है। जब वह दूध जो उसे कभी अतिप्रिय था के प्याले में अपना सिर डुबाता है उसे उबकाई आ जाती है : अब एक कीड़े की तरह उसे सड़ी सब्जियां बदबूदार पनीर और फफूंदभरा दूध पसंद है। ऊंची छत वाले कमरे से उसे डर लगता है और उसकी पशुप्रवृत्ति उसे पलंग के नीचे छिपने और कूड़े में टहलने को प्रेरित करती है।

काफ़्का की पैनी निगाहों के सामने ग्रगोर साम्सा धीरे धीरे अपनी सारे मानवीय इन्द्रियों को खोता जाता है जिन्होंने उसके लिए संसार की तमाम चीजों को परिभाषित किया था। शुरू में वह देख और सुन सकता है। कई दयनीय प्राणियों की तरह दृष्टि उसके लिए एक तरह की मुक्ति थी। उसने कई घंटे खिड़की से बाहर देखते हुए बिताए थे और उन दृश्यों से उसे खुद को कहीं खो पाने की उम्मीद बनी रहती थी। अब जब वह एक कुर्सी को खिड़की तक खिसकाता है और उस पर रेंग कर ऊपर चढ़ कर बाहर देखता है चीजों को अलग कर पाने की उसकी क्षमता कम होती जा रही है। अब वह बाहर अस्पताल को साफ नहीं देख पाता था और अगर उसे यह पता न होता कि वह चालोर्टनस्ट्रासे में रहता है तो बाहर देख कर उसे लगता कि वह किसी रेगिस्तान को देख रहा है जहां सलेटी आसमान और धरती एक अस्पष्टता में एक दूसरे से मिलते हैं। वह बस सुन सकता है और अपने कमरे में बन्द सारे अपार्टमेन्ट की आवाजों को सुनना उसके लिए दर्दनाक होता है - कोई नहीं सोचता कि वह उन आवाजों को समझ पाता है। लेकिन अभी उसकी मानवीय संवेदनाएं खत्म नहीं हुई हैं : सपने, कुछ बेढब उम्मीदें, स्मृतियां, उसकी नौकरी, ट्रैवलिंग सेल्समैन के तौर पर की गई उसकी यात्राएं, एक क्षणिक प्रेमसंबंध, उसकी संकरी बन्द जिन्दगी।

उस लिहाज से साम्सा का रूपान्तरण ओविड जितना संपूर्ण नहीं है। ग्रगोर साम्सा कोई तिलचट्टा या कीड़ा नहीं बना है : वह एक बंटा हुआ जीव है आधा पशु आधा आदमी जो पूरी तरह जानवर बन सकता है या वापस आदमी पर पूरे रूपान्तरण के लिए उसके पास पर्याप्त शक्ति नहीं है। बाहरी संसार कोहरे ने मिटा दिया है। सारा विराट बाहरी संसार खिड़की के शीशों पर पड़ रही बारिश की बूंदों में सिमट जाता है जो शरद के कदमों को एक लय प्रदान करती हैं और सड़क की रोशनियों में जो कमरे के फर्श और फनीर्चर पर प्रतिविम्बित होती हैं। कमरे में कोई और रोशनी नहीं है : उसकी अल्मारी मेज और पलंग जिन पर कभी चमकदार रोशनी होती थी फिलहाल गोधूलि जैसे मद्धिम प्रकाश से ढंके हैं और नीचे जहां ग्रेगोर साम्सा है वहां सिर्फ अंधेरा है। चाभी से बंद दरवाजा बमुश्किल कभी खुलता है। वह कमरा एक तरह की कैद है जहां कीड़े में बदल चुका ग्रेगोर साम्सा एकाकी जीवन काट रहा है। यह ठीक वैसा ही जीवन है जिसके बारे में काफ़्का अपने क्लास्ट्रोफोबिया के बीच सोचा करता था।

स्थान सघन हो गया था। समय पूरी तरह खत्म हो गया था। वह अलार्म घड़ी जिसकी गति से वह शुरू में रेलगाड़ी की समयसारिणी और संसार की विशालता से जोड़ कर देखता था भी गायब हो गई थी। उसे कोई वहां से उठा ले गया था। उस अंधेरे कमरे में समय का कोई हिस्सा नहीं थाः घन्टों का मतलब एक स्थाई गोधूलि हो गया था। ग्रेगोर को समय के बीतने की भी स्मृति नहीं रह गई है और कहानी के बीच में आते आते उसे यह भी पता नहीं रहता कि क्रिसमस बीत चुका या अभी आने को है। कुछ हफ्तों के बाद अपने नए शरीर से परिचित हो चुकने के बाद ग्रेगोर दीवारों पर रेंगना और चढ़ना सीख लेता है। छत पर चढ़ कर धरती से ऊपर वह अधिक स्वतंत्रता से सांस ले सकता है ; शारीरिक तन्दुरुस्ती की एक अजीब सनसनी उसके भीतर भर जाती है और प्रसन्न विस्मृति के साथ वह खेलना शुरू करता है और अपने शरीर को फर्श पर गिर जाने देता है। हालांकि वह देखने की शक्ति खो चुका है जो मानवेन्द्रिओं में श्रेष्ठतम होती है ; उसने ऊपर चढ़ पाने की एक मानवेतर स्थिति को भी पा लिया है जो एक तरह का शारीरिक और अध्यात्मिक आनन्द है। ट्रैवलिंग सेल्समैन के तौर पर उसने इतनी प्रसन्नता नहीं जानी थी। अगर पशुओं वाले खेल जारी रहते तो संभवतः ग्रेगोर पूरी तरह रूपान्तरित हो जाता। सारी मानवीय स्मृति से मुक्त अपने कमरे में पूरी तरह एक कीड़ा बनकर वह अकेलेपन शान्ति और हल्केपन का आनन्द महसूस कर सकता था। उसकी बहन रोज उसका खाना लेकर आती और अपनी मूक उपस्थिति से उसे सहलाती। अगर ऐसा होता तो उसकी भयानक त्रासदी एक अतुलनीय आनन्द में बदल जाती और उसे उसकी ईडिपल नियति से बचा लेती। ऐसे में इस कहानी ने विशुद्ध रूप से पशुजीवन के महिमागान के साथ खत्म हो जाना था।

काफ़्का ने खुद के लिए किसी और भाग्य की कल्पना नहीं की थी। किसी अंधेरी कोठरी में सारी चीजों से दूर रहना जहां सिवा एक मेज दिए और कागजों के कुछ नहीं होना था - बिना किसी से बात करे बिना किसी की बात सुने बस जहां एक बहन - मिस्ट्रेस की अस्पष्ट सुदूर सांस उसे बस छुआ करे। वहां वह भी मनुष्यों की बातों को भूल सकता था। वह बिना बाहरी संसार से संपर्क रखे अपनी देह के अंधेरे से सामग्री जुटाता हुआ महीनों तक लिखता रह सकता था और उसी परामानवीय हल्केपन को महसूस कर सकता था जिसे कमरे की दीवारों पर रेंगता चढ़ता कीड़ा महसूस करता है। ग्रेगोर साम्सा की एक छोटी बहन भी है जिसके लिए उसकी भावनाएं एक ही समय पिता जैसी भी हैं और प्रेमी जैसी भी। ग्रेटे वायलिन बजाती है ; अपने रूपान्तरण से पहले ग्रेगोर ने उसे किसी संगीत विद्यालय भेजने की योजना बनाई थी ताकि वह अपने हुनर को संवार सके। भाई का रूपान्तरण ग्रेटे को तबाह कर देता है ; वह उसकी भीषण पशु गंध और आकृति को सहन नहीं कर पाती और न ही वह उसके खाने के कटोरे को छूने की हिम्मत कर पाती है। इस घृणा के बावजूद भाई बहन अब भी उस पुराने प्रेम संबंध से जुड़े हुए हैं। उनके बीच एक शब्दहीन समझौता स्थापित हो जाता है। जैसे ही वह दरवाजे के ताले में चाभी लगाए जाने की आवाज सुनता है वह अपने को पलंग के नीचे छिपाकर चादर ओढ़ लेता है और उसकी बहन उसे कृतज्ञ निगाहों से धन्यवाद देती है।

ग्रेटे उससे ईष्र्या करती है ; वह चाहती है कि भाई की देखभाल सिर्फ वही करे और जब कभी मां उसका कमरा साफ करती है ग्रेटे को बुरा लगता है और वह रोने लगती है। जहां ग्रेगोर अपने पशुओं वाले खेल खेलता रहता है ग्रेटे उसकी इच्छाओं को समझने लगती है। वह कमरे से अल्मारी और डेस्क को हटाने की सोचती है जो पिछले समय की स्मृतियों से अटे हुए हैं ताकि ग्रेगोर दीवारों पर आजादी से रेंग सके और नीचे गिर सके। उसका सपना यह था कि ग्रेगोर पूरी तरह पशु बन जाए ताकि वह उस खाली खोह में खेलता रहे और उन दोनों के बीच वैसा है मजबूत चुम्बकीय प्रेम हो जैसा कि काफ़्का फेलीसे के साथ चाहता था। इस पर मां राजी नहीं होतीः वह कमरे को एक खोह में तब्दील नहीं करना चाहती ; वह समझती है कि फनीर्चर के वहां रहने से ग्रेगोर मानवीय अस्तित्व कभी नहीं छोड़ेगा।

इस तरह ग्रेगोर चौराहे पर खड़ा होता है। लेकिन तुरन्त ही अपनी खुद की इच्छाओं को नकारते हुए वह अपनी मां के विचारों से सहमत हो जाता है ; उन चीजों और बीते समय की गरमी को वह कभी अस्वीकार नहीं करेगा ( उसका पुरान कमरा 19वीं सदी के किसी उपन्यास के कमरे की तरह पुराने पारिवारिक फनीर्चर से सजा हुआ था। ) उसके भीतर सब कुछ नकार कर पूरी तरह पशु संसार में चले जाने की ताकत नहीं है। क्या हम यह कहें कि वह कमजोर है ? क्या हम एक ट्रैवलिंग सेल्समैन से वह कर पाने की उम्मीद करें जैसा अब तक कोई मनुष्य नहीं कर सका ? पशु संसार में उतर पाने का काम बस काफ़्का कर सकता था जब अपनी अंधेरी कोठरी में बैठा वह एक पशु की तरह नहीं बल्कि एक मृत व्यक्ति की तरह लिखता रहता था। स्त्रियों ने कपड़े की अल्मारी को पहले ही हटा दिया था। डेस्क अभी कमरे में ही थी और दीवार पर एक स्त्री की तस्वीर थी जिसे ग्रेगोर ने चित्रों वाली एक पत्रिका से काटा था। ट्रैवलिंग सेल्समैन के समय के उदास घण्टों में ग्रेगोर ने उस तस्वीर को लकड़ी के एक सुनहरे कामदार फ्रेम से सजाया था। एक मूक फ्लाबेरियन संकेत की तरह यह चित्र उसकी दमित वासना और असफल प्रेम का सतत बिम्ब है।

ग्रेगोर गुस्से के साथ अपना विरोध जाहिर करता है "वे उसका कमरा खाली कर रहे थे। वे उस हर चीज को बाहर ले जा रहे थे जे उसे प्रिय थीः उसके उपकरणों वाली दराज पहले ही बाहर ले जाई जा चुकी थी ; अब उन्होंने उसकी भारी डेस्क को तोड़ना शुरू किया जिस पर बैठकर उसने अपने विद्यार्थी जीवन का सारा होमवर्क किया था …" एक क्षण के अनिश्चय के बाद वह जल्दी जल्दी उस स्त्री के चित्र के ऊपर चढ़ जाता है। उसका शरीर चित्र को पूरी तरह ढंक लेता है जिससे उस के पेट को आनन्द मिलता है। "कम से कम इस तस्वीर को कोई नहीं ले जाएगा।" ग्रेगोर ने चुनाव कर लिया है। वह उस स्त्री की छवि में अपनी कलात्मक सनकों और भावनात्मक फन्तासियों को देखता है और उस खामोश और अंधेरे जीवन को अस्वीकार कर देता है जो उसकी बहन ने उस के सामने प्रस्तुत किया होता है। पशु के तौर पर रूपान्तरित होने की प्रक्रिया थम जाती है।

पुत्र के रूपान्तरण के पहले ही पिता को थक चुका दिखाया गया है। शाम को जब ग्रेगोर काम से लौटता था वे उसका स्वागत अपनी आरामकुर्सी में बैठे करते हैं ; उन्होंने अपना लबादा पहना होता है और वे उठ नहीं पाते ; साल के दो इतवारों को जब वे साथ टहलने जाया करते थे वे बेहद धीमे धीमे घिसटा करते थे। अब जब उनका पुत्र खामोश अपनी कोठरी में है उन्हें लगता है कि उनकी जीवन्तता को मिलने वाली चुनौती खत्म हो गई है और वे एक तरो ताजा व्यक्ति में बदल जाते हैं : उन्हें जैसे वह रक्त वापस मिल जाता है जो कभी उनके पुत्र ने उनसे लिया था। कुछ ही समय पहले उन्होंने एक बैंक में दुबारा काम करना शुरू किया था। अब वे बढ़िया कपड़े पहने अपना काम फुर्ती के साथ करते हैं। उन दोनों के बीच का संघर्ष जीवित रहने का संघर्ष है। अगर बेटे ने जानबूझ कर पिता को मारना चाहा था तो अब यह काम पिता करना चाहते हैं।

ग्रेगोर का रूपान्तरण एक गलत काम है एक पाप है जिसे कड़ा दण्ड मिलना चाहिए। एक शाम जब पिता घर आते हैं मां बेसुध पड़ी होती है और निराश ग्रेगोर लिविंग रूम में पसरा हुआ होता है। उसे देखते ही पिता अपना बूट उठाकर उस पर चोट करते हैं मानो वह किसी परीकथा का दैत्य हो। पिता अपना जूता लेकर उसे कमरे के बाहर खदेड़ देते हैं जबकि भयभीत साम्सा की आंखें तक बंद हो जाती हैं। यदि वह इस पितृसत्तात्मक हिंसा से बचना चाहता तो वह अपने पशु संसार में पनाह लेता हुआ दीवार पर ऊपर चढ़ सकता था और हमेशा के लिए पुरुषों के उस ईडिपल संसार को छोड़ सकता था जहां पिता अपने बेटों की हत्या करते हैं और बेटों ने अपने पिताओं को मारने पर विवश होना पड़ता है। लेकिन वह एक कीड़ा बनने से मना कर देता है। वह एक मुक्त कीड़े की बजाय बलि दिया हुआ एक पुत्र बनना चाहेगा। सो लिविंगरूम में बचाव के लिए उसकी दर्दभरी दौड़ जारी रहती है। पिता अल्मारी में रखे एक कटोरे से कुछ छोटे लाल सेब निकालकर उस पर उनकी बमबारी शुरू कर देते हैं : पहले सेब फर्श पर लुढ़कते हैं मानो उनमें बिजली बह रही हो ; फिर एक सेब ग्रेगोर हे शरीर को छू कर जाता है फिर एक और जोर से उसकी पीठ पर पड़ता है। उसकी मां के गाउन के बटन खुले हुए हैं और वह पिता से उसे छोड़ देने की याचना कर रही है। ग्रेगोर की इन्द्रियां बुरी तरह थकी हुई हैं और वह फर्श पर पसर जाता है।

क्या ही विचित्र और हैबतनाक यह दृश्य है जिसमें अब्राहम द्वारा आइजैक की बलि का अनुष्ठान पूरा होता है और जिसमें हम पवित्रता की सिहरन और नियम का एक ही साथ पालन और उल्लंघन देखते हैं। ग्रेगोर का घाव करीब महीने भर तकलीफ देता है। वह अपने कमरे में रहता है - वह मनुष्य नहीं रह गया है न ही जानवर बना है ; वह एक घायल पशु और अपमानित पुरुष है। उसकी देह में धंसा सेब एक लाइलाज घाव है जिसे किसी भी स्त्री का हाथ ठीक नहीं कर सकता : उसके पिता की घृणा की चाक्षुष स्मृति¸ उसके बलिदान का विम्ब। अब वह आजादी से दीवारों पर नहीं चढ़ पाता था ; वह मानवीय संसार में कैद हो गया था ; अब वह बच कर भाग भी नहीं सकता था और करीब करीब पश्चाताप और समझौते के तौर पर उसे वापस परिवार में शामिल कर लिया जाता है। हर शाम लिविंग रूम का दरवाजा खुल जाता था "ताकि औरों की सहमति के साथ वह सारे परिवार को रोशन मेज के गिर्द देख सके और उनकी बातें सुन सके। " हालांकि वह बेआवाज है उसे परिवार की ध्वनियों में शामिल कर लिया जाता है। लेकिन इस संपर्क के कारण परिवार के जीवन का ह्रास होने लगता है और वह अपने पुराने जीवन का क्षुद्रतर रूप बन जाता है। प्रसन्नताभरे समय के बारे में उत्तेजित वार्तालाप अब नहीं होते ; हर रात गंदी दागदार पोशाक पहने उसके पिता मेज पर ही सो जाते हैं अपनी आंखों को तबाह करती उसकी मां सिलाई में लगी रहती है और उसकी बहन स्टेनोग्राफी और फ्रेंच का अध्ययन करती रहती है ; नौकरानी की छुट्टी कर दी जाती है और परिवार के गहने बिकने लगते हैं।

अंधेरे कमरे से देखे गए इस दृश्य से अधिक नैराश्यपूर्ण कुछ नहीं हो सकता था कि स्त्रियां काम करती थीं और पिता सोए रहते थे। फिर एक और पतन होता हैः तीन किराएदार रख लिए जाते हैं ; सारा परिवार अपना भोजन रसोई में करता है। अपनी खोह में से काफ़्का इन किराएदारों की चपचप सुनता था और अपने परिवार के अपमान को महसूस करता था - उसके पिता बैठने की हिम्मत नहीं कर पाते थे और मेज के बगल में अपनी टोपी हाथ में लिए भिखारी की तरह खड़े रहते थे। ग्रेगोर के जीवन में भी पतन आता है। मां और बहन उसके प्रति वही असहिष्णुता महसूस करते हैं जो किसी ऐसे संबंधी के लिए होती है जिस के साथ कुछ दुर्घटना घट गई हो¸ ठीक जैसा बर्ताव इवान इल्यीच के साथ उसकी पत्नी और बच्चे करते हैं। प्रेम पूरी तरह बुझ जाता है। सिर्फ एक महामानवीय दुभार्ग्य को सह पाने की अक्षमता बच जाती है। वही बहन जो कभी प्यार से उसका खाना बनाती थी अब कैसा भी खाना अपने पैरों से उसके कमरे में खिसका देती है बिना इस बात की परवाह किए कि ग्रेगोर उसे छुएगा भी या नहीं। वह सफाई भी नहीं करती और न किसी को करने देती है। कमरे की दीवारों और फर्श पर कूड़े और गंदगी के निशान होते हैं। अवांछित चीजें और तमाम कूड़ा करकट कमरे में धकेल दिए जाते हैं। ग्रेगोर ने उस खाली खोह को नकार दिया था जहां वह अपने खेल खेल सकता था लेकिन अब उसका कमरा मानवता द्वारा अस्वीकृत की गई चीजों की शरणस्थली बन गया था। एक तिलचट्टे की तरह वह घर भर की धूलसनी चीजों से अपने को गंदा करता घिसटा करता था।

कुछ समय और बीतता है। एक शाम किराएदारों से घिरी ग्रेटे वायलिन बजा रही है। किराएदारों की समझ में वह संगीत नहीं आता क्योंकि उन्होंने किसी मनोरंजक संगीत की उम्मीद की थी और वे परेशान से होकर अपने सिगार पीने लगते हैं। ग्रगोर संगीत के कोमल स्वरों को सुनता है ; कूड़े गन्दगी और बालों से सना वह रेंगता हुआ अपने कमरे से निकलता है और लिविंग रूम की चौखट पर अपना सिर ढुलका कर उस क्षण की प्रतीक्षा करता है जब उसकी बहन उसकी तरफ देखती ; चूंकि वह बोल नहीं सकता था संवाद अब उस के लिए केवल दृष्टि के माध्यम से संभव रह गया था। पहले समय में जब वह एक आदमी था उसे संगीत अच्छा नहीं लगता था। अब जब कि वह एक पशु में पतित हो चुका था संगीत उसे भावुक बना देता था और उसे लगता था कि संगीत उसके लिए "वांछित और अनजाने पोषण" की तरह था। हम काफ़्का के लेखन की आत्मा में पहुंच गए हैं - "वांछित और अनजाने पोषण" की धारणा एक महान प्लेटोनिक थीम है ; एक अनजानी पुरातन छवि की तरफ आत्मा की गति ; फ्लाबेरियन पात्रों का असफल और अप्राप्य उम्मीदों की तरफ उत्तेजित सफर।

जब तक वह एक मनुष्य था एक सेल्समैन था एक आज्ञाकारी बेटा था गहरी उम्मीदें उसके भीतर नहीं जागती थीं। पशु बनने के बाद कम से कम उसके कान महामानवीय संगीत के लिए खुल गए हैं। अब जबकि वह गंदगी में लिथड़ा एक घायल पशु है वह जान गया है कि उसकी आत्मा की मंद्र आवाज एक अपरिभाषेय इच्छा है जिसे प्रकट नहीं किया जा सकता और जो उसे उस लक्ष्य की तरफ ले जाती है जहां मनुष्य और पशु के बीच की विभाजनरेखा बेमतलब हो जाती है। बिना इस बात को जाने कि वह क्या कर रहा है ग्रेगोर एक साथ प्राचीन कथाओं की दो मूल चीजों को पुनर्जीवित करता हैः खजाने की पहरेदारी करता ईर्ष्यालू ड्रैगन ; और पशु में बदल गया राजकुमार जो राजकुमारी के बगल में रहता हुआ उम्मीद करता है कि वह उस से शादी कर पाएगा और दुबारा से आदमी बन जाएगा।

लेकिन कथा के इस पशु के बरखिलाफ ग्रेगोर दुबारा आदमी नहीं बनना चाहता ; वह समझता है और जैसा उसकी बहन ने उस से कहा भी था पशु बने रहना ही उस पर पूरी तरह जंचता था। वह सिर्फ इतना चाहता था कि वायलिन बजाती अपनी बहन के उतना पास जा सके जितना वह अनुमति देगी क्योंकि वही उसके संगीत को सबसे अच्छा समझता है। वह उसे अपने कमरे में तालाबन्द कर देगा ठीक जिस तरह ड्रैगन राजकुमारी को कैद रखता है या काफ़्का की तरह जो अपने को कोठरी में बन्द रखता है ताकि वह लिख सकेः क्योंकि खुशी केवल वहीं पाई जा सकती है जहां दीवारें हमें बन्द कर देती हैं : जेल में। अब आखिरकार काफ़्का अपनी बहन के उस प्रेम प्रस्ताव को समझता है जिसे उसने अस्वीकृत कर दिया होता है। पलंग पर बैठी उसकी बहन फर्श पर उसकी तरफ झुकती ताकि वह उसके कान में अपनी योजना बताता कि अगर यह दुर्घटना न घटती तो वह उसे संगीत सिखाने भेजना चाहता था और इस बात को वह पिछले क्रिसमस को सब को बताने वाला था। "इस स्पष्टीकरण के बाद उसकी बहन की रुलाई फूट जाती और ग्रेगोर उसके कन्धे तक अपने को उठाकर उसकी गरदन को चूमता रहता जो अब बिना कालर या स्कार्फ के अनावृत्त होती क्योंकि अब वह काम पर जाती थी।"

लेकिन ठीक इसी क्षण ग्रेगोर समझता है कि वह उस "वांछित और अनजाने पोषण" के नजदीक है जो ग्रेटे अपने भाई को देने से मना करती रही है। वह उस खोह में अपने पशु भाई के साथ रहना चाहती थी और अस्वीकृत कर दी गई थी और अब वह उस स्वप्न को अस्वीकृत कर रही थी जो उसका भाई उसके सामने प्रस्तुत कर रहा था। वह अपना बदला लेती हैः वह जब भी उसे देखती है वह इस बात को मानने से इन्कार कर देती है कि वह दैत्य अब भी उसका भाई है और अपने यौवन की क्रूरता में वह मां बाप के सामने उसे मृत्युदण्ड की घोषणा करती है। "आप लोग शायद उसे नहीं जानतेः मैं जानती हूं। मैं इस दैत्य के सामने अपने भाई का नाम नहीं लेना चाहती। और मैं इतना ही कहती हूं कि हमें इससे छुटकारा पा लेना चाहिए।" सुन्दरी पशु की हत्या कर देती है। ग्रेगोर अपने कमरे में जाने के लिए मुड़ता है। इस से अधिक श्रमसाध्य कुछ नहीं हो सकताः उसकी देह लगातार भूखा रहने से कमजोर पड़ चुकी है और उसका दिमाग जम गया है; उसे नहीं पता वह उतना बड़ा फासला कैसे तय कर सका। जैसे ही वह अपने कमरे में दाखिल होता है ग्रटे दरवाजे को जोर से भेड़ती है ताला बन्द करती है और चीखकर कहती हैः "आखिरकार।"

उस क्षण अंधेरे कमरे में ग्रगोर के लिए मर जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। वह भूख से मर जाता हैः वह बहुत दिनों का भूखा था। लेकिन यह मृत्यु भी एक बलिदान हैः वह अपना सिर झुका कर मौत के फरमान को स्वीकार करता है और बेहद प्यार और संवेदना के साथ अपने परिवार के बारे में सोचता है। जैसा कि वल्टर सोकेल ने लिखा है वह अपने प्रियजनों के पापों की सजा पाने वाली बलि की बकरी है। वह ईसामसीह है जो समूची मानवता को बचाने के लिए मर जाता है। सबसे बड़ा गुण अन्ततः न तो शान्त पशुवत हल्कापन है न "वांछित और अनजाने पोषण" की खोज न अपनी बहन के साथ वह प्रमसंबंध न ही अपनी कोठरी में बिना हाथ उठाए लिखते जाना; सबसे बड़ा गुण बलिदान में है।

मरने से पहले ग्रेगोर को वह उपहार मिलता है जो शायद मृत्यु से पहले ही मिल सकता है - एक खाली और विचारशील मस्तिष्क। वह आखिरी बात घन्टाघर की घड़ी को तीन बजाते सुनता है। वह खिड़की के बाहर आसमान को चमकदार होता देखता है। फिर उसका सिर ढुलक जाता है और उसके नथुनों से आखिरी कमजोर सांस बाहर आती है।ग्रेगोर के बलिदान की प्रतिध्वनि सारी प्रकृति में गूंजती हैः वह जाड़ों के बीतने और वसन्त के आगमन की घोषणा करती है। अगर ग्रेगोर अपनी जान नहीं देता तो शायद प्रकृति सदा के लिए अपनी मृत ठण्डी आकृतियों में थम जाती - किसी मृत कीड़े की देह की तरह सूखी हुई। नया रक्त अब प्रकृति की नसों में बह सकता था और ब्रह्माण्ड के रूपान्तरण का चक्र फिर से शुरू हो सकता था।

परिवार अपना शीतकालीन पतन फेंक देता हैः उसके पिता अपना खोया स्वाभिमान वापस पाते हैं और किराएदारों को बाहर का रास्ता दिखाते हैं; उसकी बहन का चेहरा खुशी से लाल हो जाता है और मां उसे गले से लगा लेती है। सारे के सारे मृत व्यक्ति के लिए आंसू बहाते हैं। लेकिन हमने प्रकृति के भलेपन पर विश्वास नहीं करना चाहिए। ग्रेगोर के शरीर को कोई नहीं दफनाताः उसके अंतिम संस्कार का जिम्मा उस रूखी नौकरानी को जैसे तैसे निभाने को सौंप दिया जाता है जिसका "उस बूढ़े तिलचट्टे" के साथ एक वास्तविक सम्बन्ध था। ग्रेगोर का रूपाान्तरण हमें पिछले जाड़ों में घटा दुस्वप्न लगने लगता है। मां बाप और बेटी ट्राम में बैठकर गांवों की तरफ जाते हैं और उत्तेजना के साथ भविष्य की बातें करते हैं। संभावनाएं काफी आकार्षक हैं : तीन नए रोजगार के मौके बढ़िया हैं¸ उन्होंने रहने के लिए नई जगह देखनी चाहिए और ग्रेटे की शादी के बारे में सोचना शुरू करना चाहिए। ग्रेटे उठती है और सारे दुखों और सारी मौतों की तरफ जीवन की क्रूरता के साथ अपना युवा शरीर तानती है। ग्रेगोर ने अस्तित्व की सदाबहार प्रकृति को बचा लिया है। लेकिन वह ईसामसीह की तरह उसे परिष्कृत नहीं कर पाता। जीवन का कारोबार वैसा ही चलता रहता है उसके सारे खौफनाक चेहरों और अभिमानों के साथ और कोई भी अपनी आत्मा के लिए उस "अजाने पोषण" की लालसा नहीं करता।

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संपादन : अनुराग वत्स.

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