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गीत चतुर्वेदी : कॉलम 13 : चोरी की स्मृतियाँ

मैं एक चोर हुआ करता था। न मैंने सोना चुराया, न चाँदी। नक़दी और हीरे-जवाहरात भी नहीं। कपड़े-लत्ते, टीवी-रेडियो और बर्तन भी मैंने कभी नहीं चुराये। कुछ लड़कियाँ कहती थीं कि मैंने उनके दिल चुराये हैं, लेकिन मैं इसकी पुष्टि नहीं करूँगा, ये सब बातें वे ही जानें। लेकिन सच है कि मैं एक चोर हुआ करता था, भले अधिक समय के लिए नहीं। मैं किताबें चुराया करता था। किसी शातिर हुनरमंद की तरह। मुझे किताबें पढ़ने का शौक़ था, लेकिन आप जानते ही हैं, यह एक महँगा शौक़ है, क्योंकि किताबें किसी युग में सस्ती नहीं रहीं। मेरी जेब में पैसे हमेशा कम रहते। उस मजबूरी के कारण मैंने पहली बार किताबों की चोरी की। और उस पहली बार में मुझे इतना आनंद आया कि मैंने बार-बार चोरी की। चोरी और चुंबन एक जैसे होते हैं। एक बार चूमने के बाद, आपके भीतर, बार-बार चूमने की इच्छा जागती है। एक बार चोरी करने के बाद, इच्छाओं का भूत बोतल से बाहर निकल आता है। जब हवस आती है, सबसे पहले आप हवास खोते हैं। किताबें भी एक हवस होती हैं। दीग़र है कि एक अच्छी हवस।
जैसे लकड़ी का कीड़ा बिना कोई भेदभाव किए सबकुछ चट कर जाता है,  मैं पढ़ने की हर चीज़ चट कर जाता था। बिना …
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मरियम उस्मानी की डायरी

।। कितनी छोटी हैं मेरी बाहें, संसार का एक हिस्सा समेटती हूँ, तो दूसरा छूट जाता है ।।

(ज़िंदगी और अनुभव में धीरे-धीरे बड़ी हो रही मरियम का गद्य कविता जैसी सुंदरता से सम्पन्न है।उसमें एक सर्जनात्मक असावधानी है, जो दरअसल कवियों के लिए अनिवार्य है। यह देखना दिलचस्प होगा कि बमुश्किल बीस पार मरियम जब कभी कविता लिखेगी, तो उसका रूपाकार कैसा होगा। फ़िलहाल मरियम की डायरी के टुकड़े पढ़िए। यह कहीं भी प्रकाशित होने का मरियम के लिए पहला अवसर है।)  _________________________________________________


आवाज़
जब तक यह पता हो कि आवाज़ किस दिशा से आ रही है, उससे छूटा जा सकता है। लेकिन जब वह इस तरह आए कि उसकी दिशा बताना कठिन हो, तो सब दिशाएँ उससे लिपट कानों से टकराने लगती हैं...फिर वह आवाज़ घेर लेती है !
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नृत्य
नृत्य में मन की उमंग, उत्साह और उदासी को देह में उतर कर अभिव्यक्त होना था। लेकिन वे देह से ऐसे भाव उपजाना चाहते थे जिसके अंकुर भीतर की ओर फूटें।
यह अलग नृत्य था, अंगों की थिरकन से होता हुआ मन की सतह पर लहराने को अकुलाता !
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एक अबोध क्रूरता

किसी आँख से गिर कर बच जाने के बाद अपनी दृष्टि से उतरना होगा। …

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 12 : नेरूदा और स्त्रियाँ

पिछले सौ बरसों में जिस कवि पर सबसे ज़्यादा बात हुई है, वह हैं पाब्लो नेरूदा (1904-1973)। हो भी क्यों न, उन बरसों में प्रचलित काव्य-परंपराओं के साथ सबसे ज़्यादा छेड़छाड़ भी संभवत: उन्होंने ही की। उनकी सारी कविताओं को एक साथ रख दिया जाए, तो क़रीब चार हज़ार पन्नों की एक किताब बन जाएगी। अपने समय के कई आंदोलनों, विवादों, प्रेम-प्रसंगों व साहित्यिक विशेषाधिकारों से जुड़े रहने के कारण उन्होंने कविता से इतर एक ऐसा व्यक्तित्व भी पा लिया था, जो किसी कवि के प्रसार को व्यापक ही बनाता है। वह कम्युनिस्ट थे। देश और दुनिया की तत्कालीन परिस्थितियों से क्षुब्ध व विवश होकर, योजना बनाकर उन्होंने प्रतिरोध की महान कविताएँ लिखीं, लेकिन उन्हें आरंभिक प्रसिद्धि प्रेम कविताओं से ही मिली थी और आज भी उनकी प्रेम कविताओं को ही शिद्दत से याद किया जाता है।
नेरूदा एक रेल मज़दूर के बेटे थे। उनके पैदा होने के दो साल बाद ही उनकी माँ की मृत्यु हो गई। सौतेली माँ से भी नेरूदा को बहुत प्रेम मिला, लेकिन पिता से वह ख़ाइफ़ रहते थे। दस साल की उम्र से उन्होंने कविताएँ लिखना शुरू कर दिया था, लेकिन उनके पिता को उनका यह शौक़ पसंद न…

अम्बर रंजना पांडेय की छह नई कविताएँ

( अम्बर रंजना पांडेय हिंदी की युवा पीढ़ी के विलक्षण कवि हैं. ऐसे कवियों के यहाँ परंपरा, उसका भाषिक वैभव और लोक-व्यवहार प्रसंगवश नहीं, गहरे निमज्जन से मुमकिन होते हैं. प्रेम, मृत्यु और शोक पर लिखी गई उनकी इन नई कविताओं में यह अनुभव करने के अलावा कवि का क्रमिक-विकास भी देखा जा सकता है.) 


शारीरिक पीड़ा

उसने हाथ ऐसे मस्तक पर रखे थे जैसे कोई पत्थर मार रहा हो या खम्भे से उसका मस्तक बार बार टकरा रहा हो। उसकी शारीरिक पीड़ा का अस्पताल जाने से पूर्व बस इतना ही पता चला। उसका दाँत मुँह भींचने से अंदर ही अंदर टूट गया है यह पता ही नहीं चला किसी को भी। शारीरिक पीड़ा हमेशा मृत्यु से छोटी पड़ जाती है। धुली हुई साफ़ और ठण्डी सफ़ेद चादर जैसे शव से अधिक समय तक प्रेम नहीं किया जा सकता हालाँकि जीवित मनुष्य शव में बदलते ही प्रेम करने के सर्वथा योग्य हो जाता है। जीवितों से प्रेम करने पर प्रेम घृण्य हो जाता हैै।
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ह्रदय प्रत्यारोपण

ह्रदय प्रत्यारोपण हो सकता है मस्तिष्क नहीं। उसका ह्रदय दे दिया। ह्रदय प्रत्यारोपण से शोक मृत्यु से महीने भर तक स्थगित रहता है। वह जीवित है। वह उससे मिली तब शोक हुआ। ह्रदय जो प्…

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 11 : कारवी के फूल

कवि कह गया है कि नरगिस के फूल इस बात पर दुखी होते हैं कि उनकी सुंदरता को देखनेवाला कोई नहीं। हज़ार साल में कोई एक ऐसा नज़रवान, दृष्टिसंपन्न रसिक आता है, जो उसके सौंदर्य को जी-भर निहारता है। ब्रह्मकमल साल में एक बार खिलता है। यह दुर्लभ फूल पहले हिमालय में रहता था, धीरे-धीरे मैदानों में भी आ गया है। आधी रात के बाद खिलता है। गाढ़ी नींद के मीठे सपने की तरह खिलता है। मान्यता है, इसको खिलता देख मन में की गई कामना पूरी हो जाती है। अशोक के पेड़ पर जब कोई सुंदरी पैरों से आघात करती है, तब उसमें फूल आते हैं। खिलने के लिए उसे निश्चित स्पर्श चाहिए।
मैं सोचता हूँ, कारवी कैसे खिलता है?
ये सभी फूल नामधनी हैं। बहुत भाग्यशाली हैं। इन्हें कवियों ने छू दिया। कवि जिसके प्रेम में पड़ जाते हैं, वह अमर हो जाता है। चाहे स्त्री हो, चाहे फूल। कवि सिर्फ़ एक-दूसरे के शब्दों का ही हरण नहीं करते, बल्कि उनकी नायिकाओं का भी कर लेते हैं। वासवदत्ता से पहला प्रेम किसने किया होगा? राजा उदयन या राजकुमार कन्दर्पकेतु ने? कवि भास या कवि सुबंधु ने? या इनसे भी पहले पैशाची भाषा के कवि गुणाढ्य ने? किसी को नहीं पता, लेकिन वासवदत्ता पर…