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गीत चतुर्वेदी : "न्यूनतम मैं" से चुनी हुई कविताएँ

8:01 pm


दिल्ली पुस्तक मेले में गीत चतुर्वेदी का नया कविता-संग्रह "न्यूनतम मैं" आया है. इस संग्रह में गीत ने अपनी उन कविताओं को शामिल किया है, जो हिंदी में अब तक अप्रकाशित हैं (हालाँकि कुछ का प्रकाशन अनुवाद के ज़रिये दूसरी भाषाओं में हो चुका है). निविद का यह नया ड्राफ्ट किसी भी भाषा में पहली बार प्रकाशित हो रहा है., “निविद”, गीत की बहुचर्चित, बहुप्रशंसित कविता है, जिसका पहला प्रकाशन जनवरी 2012 में "सबद" पर ही हुआ था. उसी समय गीत ने उस कविता का एक दूसरा ड्राफ्ट भी बनाया था, "निविद, नया ड्राफ्ट" शीर्षक से, किन्तु उसे अप्रकाशित रखा था, ताकि जब संग्रह आये, तो सीधे उसी में शामिल कर दें. किताब से ऐसी कुछ कविताओं को चुन कर यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है :

© Anurag Vats, 2017


गीत चतुर्वेदी
निविद
(नया ड्राफ्ट)

मेरी कविताएं किसी राजनीतिक विवाद की पैदाइश नहीं
इनमें बस मनुष्य होने के संघर्ष का इतिहास
जो सिर्फ रणभूमि में नहीं होता
अकेले बैठे मन के भीतर भी चलता है
अचानक एक बुरा विचार हमला कर देता है
वह जीत गया तो तुम थोड़ा कम मनुष्य बच पाते

हमने साथ चलना शुरू किया था
हमने साथ रहना शुरू किया था
धीरे-धीरे मैं अलग होता चला गया
एक कमरा मैंने ऐसा बना लिया है
जहां अब किसी का भी प्रवेश निषिद्ध है
जो भी इसे पढ़े, कृपया इसे आरोप न माने
यह महज़ एक आत्म-स्वीकृति है

एक दिन हमारी आत्मा
विस्मृति की नदी में डुबकी लगाती है
उसे मौका मिलता है कि वह चुन सके
उसे क्या बनना है

प्लेटो की किताब में
अगामेमनॉन ने बाज़ बनना चुना
ऑर्फियस ने चुना हंस बनना
ओडिसस ने चुना ऐसा एक उदार मनुष्य बनना
जो ज़रा-सा भी मशहूर न हो
गुमनामी उसके उन गुणों को बचा लेगी
जिन्हें वह योद्धा के जन्म में कभी बचा न पाया

मैं ओडिसस जैसा विजेता नहीं
मैं ओडिसस जैसा पराजित भी नहीं
लेकिन उसकी इच्छा
बिल्कुल मेरी इच्छा है

एक जन्म में मैं चूहा था
मुझसे एक सांप ने अपना पेट भरा
मैं हाथी था
मेरे दांतों ने एक बहेलिये को धनवान बनाया
मैं एक पत्ती था
जो दो चिडिय़ों के लडऩे से टूट गई
एक पेड़ था
जिसकी छांह में प्रेमियों ने अभिसार किया
एक बार मैं एक रस्सी था
जिस पर अपनी बेटी के साथ एक नट कुशलता से चलता था
मैं एक बार एक स्वप्न बन गया
जिसे कई बीमार लोगों ने देखा और
पीड़ा के बीच भी मुस्कराए

उससे दूर रहो जिसमें हीनभावना होती है
तुम उसकी हीनता को दूर नहीं कर पाओगे
खुद को श्रेष्ठ बताने के चक्कर में
वह रोज़ तुम्हारी हत्या करेगा

एक जन्म में मैं कालिदास था
मैंने विद्योत्तमा और काव्य को एक जितना चाहा
मैं प्रेम में मूर्खता और छंदों में मंदाक्रांता था

जो कीलें जीसस को चुभी थीं
मैं उनमें से एक कील था
अगले कई जन्मों तक मेरी देह में लोहा कम रहा

सिलवटों से भरा है तुम्हारी आंख का पानी
फेंके गए सारे कंकड़ अब वापस लेता हूं

मुझमें इतना प्रायश्चित रहा कि
एक जन्म में मैं वह शब्द बन गया
जिसे सैकड़ों कवियों ने अपने पहले ड्राफ्ट में लिखा
दूसरे में काट दिया

मैं समंदर के भीतर से जन्मा हूं
लेकिन मुझे सी-फूड वाले शो-केस में मत रखना

एक जन्म में मैंने बिआट्रिस को देखा था
और अगले जन्म में दान्ते बनकर मैं उसके प्रेम में पड़ गया
एक साधारण किसान बनकर एक जन्म में मैंने
वासवदत्ता को चूमा था
अगले जन्म में मैं एक अल्पजीवी प्रेम कविता बन गया

द्रव में बदला हुआ प्रकाश हूं
तुम्हारी नाभि मेरे होने के द्रव से भरी है
मैं सूखकर कस्तूरी बन गया

एक बार मेरी आत्मा के दो टुकड़े हो गए
मैं बुद्ध बनकर जन्मा
मैं ही देवदत्त बनकर
एक बार एक ऐसा ग्रामदेवता
जो भक्तों से दुखी हो गांव के बाहर रहने लगा
एक बार एक ऐसा प्रेमी
जो पिया-मिलन की आस में
अपनी आंखें तो बचाए रहा
पर विरह के दुख में बाकी शरीर काट-काट कौओं को खिलाता रहा

तुम्हारे बालों की सबसे उलझी लट हूं
जितना खिंचूंगा उतना दुखूंगा

मैं ही विमलनेत्र था जिसने मृगरूपा की हत्या कर
एक बुद्ध के घर में छिपा दी थी लाश
मैं वह कर्मा हूं जो दो जन्मों के बीच ऐसे यात्रा करता
जैसे दो स्टेशनों के बीच कोई ट्रेन

मैं होमर, वर्जिल, वसुबंधु, अश्वघोष, कुमारजीव,
दारियो, ओविड, कुरुक्षेत्र का एक अनजान सिपाही,
बलुआ पत्थर, आम का पेड़, माधवी का फूल, नगरवधू, नैषध का श्रीहर्ष
सीप का मोती, मीठे पानी की मछली, इमारतों का ज़ीना, दिद्दा रानी का प्रेमी,
अकबर के हाथों मरा चीता और जहांगीर द्वारा लटकाया गया घंटा बना
मैंने खुसरो, मीर, गालिब, नेरूदा और बोर्हेस का जन्म लिया
सबसे उदास कविताएं और भूलभुलैया से भरे गद्य
उनके नाम से मैंने ही लिखे थे
बोर्हेस बनकर मैं खोया और तलाशना शुरू किया
काफ्का बनकर मैंने तलाश शुरू की और खो गया
कपिलवस्तु की पीड़ाओं को मैंने प्राग की सड़कों पर टहलता पाया
तहखानों के अंधेरों को बगीचों में बिखरता देखा

कई बार मृत्यु से पहले ही मेरा पुनर्भव हुआ
पुनर्भव के बाद भी पिछली देहें नहीं छोड़ीं कई बार

357 बार मैं मनुष्य बना
66 बार देवता
123 बार मैंने पशुओं के रूप में जन्म लिया
मैं सृष्टि की हर योनि में हो आया
सदियों तक फैला यह सारा प्रयास
मनुष्य के रूप में बचे रहने की तैयारी, अभ्यास

तुम जागती हो निविद जागता है
तुम दोनों के साथ सारे देव जागते हैं
एक निविद गाओ
युगों लंबी स्मृतियां जगा दो
मैं निविद करता अपनी जन्मों पुरानी आत्मा

इस जीवन में इस कविता में
उन सबकी स्मृति जारी है
मुझे किसी का आभार जताने की ज़रूरत नहीं
क्योंकि वह सब मैं खुद ही था
उनकी सब बातों पर मेरा उतना ही अधिकार

हर जन्म मेरा सामूहिक इतिहास है
जो कि सम्राटों की नहीं
मेरी कविताओं की वंशावली है

मैं एक जन्म की एकलता नहीं
इसी देह में बहुत सारे जन्मों की बहुल उपस्थिति हूं
स्मृति में स्मित हूं
विस्मृति में विस्मित हूं

* * *

ख़ालीपन का प्रतिबिंब

रास्ता हर क़दम पर रुका होता है
सांस भी मुई, कौन-सा हर पल चलती है

मेरी देह पर रोम ज़्यादा रहे
जेब में सिक्के कम
जन्म लेने के क्षण से ही
मैं एक सुंदर स्त्री और एक मेहनतकश पुरुष का
लगातार क़र्ज़दार रहा

बदलो, थोड़ा और बदलो
बदल-बदलकर एक रोज़
तुम ऐन अपने जैसे हो जाओगे

घोड़ा कभी ठीक घोड़े जैसा नहीं होता
मुर्गे में थोड़ी मछली हमेशा होती है
जैसे दीवार में थोड़ी-सी छत होती है
और रूप में थोड़ा-सा भ्रम

भूख में होती है तपस्या
पानी में बहुत सारी अतृप्ति
उपकार में कई आरोप
व्याख्या में थोड़ी-सी बदनीयती
करुणा में हमेशा एक निजी इतिहास होता है

इस चवन्नी का बोझ इतना है जितना सौरमंडल के सारे ग्रह
समय एक बोझ है : प्रयास, आधिपत्य, बीवी, बच्चे,
आंखें, दिमाग, यह गोश्त, यह रक्त,
पूरी यह देह

महासागरों में जितनी बूंदें उनसे ज़्यादा बहा है रक्त मेरा
आसमान में जितने सितारे उनसे कहीं ज़्यादा बार मैं आंखें गंवा चुका
मैं उस यूनानी दार्शनिक की तरह
जिसने अपनी आंखें नोंच के फेंक दी थीं
बस बाहर ही बाहर देखती हैं
आंख ही ख़ुद आंख को कहां देख पाती*

आमने-सामने रखे दो आईनों के बीच
ख़ालीपन का प्रतिबिंब डोलता है

मेरे पास तुम्हारी विस्मृति की नागरिकता है
और तुम्हारा ही दिया मंत्र कि
अजनबी और पराया होना सुखद होता है

* * *

मूली 

तमाम उम्र मैं एक मजलिस में रहा 
जहां लोग आपस में बात तो करते 

लेकिन सबके भीतर अकेलेपन का निजी अलाव जलता था 
जिसकी आंच से ताप लेती थी आत्‍मा

संतरे छीलने की सुगंध जाने कहां से आ जाती 
धरती कभी-कभी बेचैन दिलों की मानिंद धड़क उठती 

सारे विद्वान शंख बजा रहे थे
अपने-अपने वाद्ययंत्र बजा रहे थे 

मेरे पास कोई वाद्ययंत्र नहीं था 
सिर्फ़ एक मूली थी धवल, उज्‍ज्‍वल 

मैंने मुंह से लगाया मूली को 
और उसे बांसुरी की तरह बजाया 

जिन्‍हें सबने तज दिया था 
कला की संभावनाओं से विरत मान 

ठीक वहीं उपजाई मैंने कला 
अपना संगीत मैंने ऐसे बजाया. 

* * *

त्रान आन्ह हुंग की फिल्मों के लिए

घर से बाहर एक जगह ऐसी भी होती हैजहां आप उतनी ही बार जाते हैंजितनी बार घर जाते हैं.  

तुम्हें हरे से प्रेम है,
तुम हर दृश्य का अनुवाद हरे में करते हो
मुझे तुमसे प्रेम है
मैं हर दृश्य का अनुवाद तुममें करता हूँ
तुम्हारे अंधत्व का रंग हरा है, मेरे अंधत्व का रंग तुम

एक कवि है जो कि अपराधी है : एक अपराधी है जो कि कवि है : वह लगभग गूंगा है : गूंगापन एक लगभग है : पृष्ठभूमि में वह कविता पढता है : अग्रभूमि में वह अपराध करता है : कविता को अपराध की तरह पढता है : अपराध को कविता की तरह करता है : उसके होंठों पर सिगरेट चिपकी रहती है : वाक्यों का होंठों से कोई रिश्ता नहीं : जब कभी उसे रोना होता है उसकी आँख से आंसू नहीं गिरता : उसकी नाक से खून बहने लगता है :

दूर कहीं एक विएतनामी का दाओ लोकगीत बजता है :

बेवजह गलियों में भटकता है एक कवि
पाता है कि वह रास्‍ता भूल गया है.

मेरे बचपन की पतंग 
आसमान में लटकी भुरभुरी उम्‍मीद है 

कविअनमने के आंगन में रहता हैकविताएं उसके अनमने की हरियाली हैं. 

 * * *


वोंग कार-वाई की फिल्मों के लिए

एक दिन तुम एक अपरिचित पेड़ खोजना : थोड़ी देर उससे लिपट जाना : उसके किसी एक कोटर पर मुंह रखकर फुसफुसाना : इस तरह कि ख़ुद तुम्हें न सुनाई पड़े तुमने क्या कह दिया : तुम्हारा फुसफुसाता हुआ प्रेम : प्रायश्चित : अपराधबोध : पीड़ा : उद्विग्नता : यह सब : फिर उस छेद को गीली मिट्टी से ढंक देना : कोई तुम्हें समझ नहीं पाया यह तुम्हारे जीवन का सबसे बड़ा राज़ : यह राज़ तुम उसे भी नहीं बताते जो तुम्हें समझ नहीं पाया

पेड़ों में कोटरें क्यों होती हैंताकि हमारे राज़ वहां छिप सकें और आवारा बच्चों की तरह मटरगश्ती न करें :
खंडहरों की दीवारों में कोटर : पहाड़ों के किनारों पर कोटर : कोटर, सब तुम्हारे राज़ की पनाहगाह :
तुम अब तक एक स्त्री की देह में बने कोटर में अपने रहस्यों को स्खलित करते आए

पेड़ चाहे तो अपनी पत्तियों के रूप में उगा सकता है तुम्हारे रहस्य
सबसे घना पेड़ छिपाए रखता है सबसे ज़्यादा लोगों की बातें

मनदेह की भाषा बोलता है
जितना देह नहीं डोलतीउससे कहीं अधिक डोलता है मन
मैं इसलिए दौड़ता हूं इतना कि शरीर का सारा नमक पसीने के रास्ते निकल जाए
तब आंख पर नमक का अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ता
मन : टूटे हुए तारों का सितार
प्रेम के जलाशय में आधा पैर डुबोए बैठा जोगी

हृदय हमारी देह का सबसे भारी अंग है

वह कोशिकाओं से नहींअनुभूतियों से बनता है

पहाड़ भी अनुभूतियों से बनते हैंइसलिए अपनी जगह से खिसकते नहीं : तोते दूसरों के शब्द दोहराते हैंअपनी मृत्यु में वे चुप्पी की उंगली पकड़ प्रवेश करते हैं : एक टेपरिकॉर्डर में कैसेट बज रहा होता है : उसमें कोई सुबक रहा है : उसे कोई नहीं सुनता : सिवाय समंदर के : समंदर का सारा शोर ऐसी ही लावारिस सुबकियों का गुच्छा है : मैं समंदर के सामने खड़ा हूं : उसके विशाल शोर के बीच अपनी महीन-सी एक प्राचीन सुबक को रेशा-रेशा पहचानता हुआ
मेरी पीड़ा, मेरा अवसाद, मेरा अकेलापन, मेरा सन्‍नाटा

एक दिन हवा सबकुछ बहा ले जाती है
एक दिन समंदर सबकुछ लील लेता है
एक दिन मिट्टी सबकुछ ढंक लेती है

वह अनिवार्यत: हृदय से भी भारी गीली मिट्टी होती है

* * * 


© Anurag Vats, 2017
27 नवंबर 1977 को मुंबई में जन्मे गीत चतुर्वेदी की ताज़ा किताब उनका कविता संग्रह "न्यूनतम मैं" है, जो कि राजकमल प्रकाशन से आया है. इससे पहले 2010 में "आलाप में गिरह" प्रकाशित. उसी वर्ष लम्बी कहानियों की दो किताबें "सावंत आंटी की लड़कियां" और "पिंक स्लिप डैडी" आईं. उन्हें कविता के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, गल्प के लिए कृष्ण प्रताप कथा सम्मान मिल चुके हैं. "इंडियन एक्सप्रेस" सहित कई प्रकाशन संस्थानों ने उन्हें भारत के सर्वश्रेष्ठ लेखकों में शुमार किया है. उनकी रचनाएँ देश-दुनिया की सत्रह भाषाओँ में अनूदित हो चुकी हैं. उनके नॉवेला "सिमसिम" के अंग्रेजी अनुवाद (अनुवादक: अनिता गोपालन) को "पेन अमेरिका" ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित "पेन-हैम ट्रांसलेशन ग्रांट 2016 अवार्ड किया है. गीत भोपाल में रहते हैं. उनका ईमेल पता है : geetchaturvedi@gmail.com





"न्यूनतम मैं" का लोकार्पण पिछले दिनों दिल्ली और भोपाल में हुआ. उसकी तस्वीरें और विवरण नीचे हैं :


दिल्ली पुस्तक मेले में "न्यूनतम मैं का लोकार्पण करते नामवर सिंह. साथ हैं समर्थ वाशिष्ठ, अशोक महेश्वरी, मैत्रेयी पुष्पा, शिवमूर्ति, वीरेंद्र यादव व अन्य. 13 जनवरी 2017


भोपाल में लोकार्पण, गीत चतुर्वेदी, उदयन वाजपेयी व संगीता गुंदेचा.  14 जनवरी 2017   छायाचित्र: अनुराग वत्स

भारत भवन में लोकार्पण, रमेश चन्द्र शाह द्वारा. साथ हैं, विपिन चौधरी, उपासना, लवली गोस्वामी और मनोज श्रीवास्तव. 14 जनवरी 2017


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