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सबद पुस्तिका : ७ : बेई दाओ की कविताएं

10:46 am


[चीनी भाषा में लिखने वाले बेई दाओ समकालीन विश्‍व कविता के अत्‍यंत चर्चित कवियों में से हैं. पिछले कई बरसों से नोबेल पुरस्‍कार के दावेदार बेई दाओ की कविताएं बिंबों और रूपकों के आंगन में ताज़ा-चमकीले पौधे की तरह हैं. 'सबद पुस्तिका' का यह सातवां अंक बेई दाओ की 36 चुनिंदा कविताओं का अनुवाद है. साथ ही, कवि-अनुवादक गीत चतुर्वेदी की एक लंबी प्रस्‍तावना है, जो बेई दाओ के जीवन और कविता से न केवल पर्याप्त परिचय कराती है, बल्कि कविता में प्रयोग होने वाले उपकरणों की बाक़ायदा व्‍याख्‍या भी करती है.
हर बार की तरह यह सबद पुस्तिका भी पीडीएफ़ फॉर्मेट में डाउनलोड करने के लिए उपलब्‍ध्‍ा है. नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके 48 पेज की इस पुस्तिका को पाठक डाउनलोड कर सकते हैं, प्रिंट निकालकर पढ़ सकते हैं, और फ़ाइल में सुरक्षित रख सकते हैं.]


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जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं, तो सच कहूं, मैं अपनी कविता के बारे में बहुत आश्वस्त-विश्वस्त होकर कुछ नहीं कह पाता। मुझे वे दिन याद आ जाते हैं, जब मैं लुहार का काम करता था। लोहे की जो कृतियां मैं बनाता था, उनसे लगभग निराश हो जाता था। अब मुझे लगता है कि कवि और लुहार दोनों लगभग एक जैसे ही होते हैं- दोनों ही उस सटीक स्वप्न के पीछे दौड़ रहे होते हैं जो कभी पूरा ही नहीं हो सकता। अपनी शुरुआती कविताओं में से एक में मैंने यह पंक्तियां लिखी थीं :

आज़ादी और कुछ नहीं सिवाय उस दूरी के
जो शिकारी और शिकार के बीच होती है





कविता लिखने की गत भी ऐसी ही है। जब आप कविता का शिकार करने की कोशिश करते हैं, कविता आपका शिकार कर लेती है। इस तरह देखा जाए, तो आप ख़ुद शिकार हैं, ख़ुद ही शिकारी भी, लेकिन कविता दोनों के बीच की दूरी है, जैसे आज़ादी।
- बेई दाओ

* * *

सच है कि बसंत चल रहा
धड़कते हुए दिल पानी के भीतर बादलों को सता रहे
बसंत की कोई राष्ट्रीयता नहीं होती
बादल पूरे विश्व के नागरिक हैं
ओ मेरे गीत
तुम फिर से मनुष्य के मित्र बन जाओ
- बेई दाओ


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अंतिम के बाद भी एक अंत होता है
(बेई दाओ की कविताओं पर कुछ नोट्स)
गीत चतुर्वेदी


1949 में जब चीनी क्रांति हुई और बीजिंग में माओ अपना ऐतिहासिक भाषण दे रहे थे, उनसे क़रीब हज़ार गज़ की दूरी पर दो माह का एक शिशु अपने पालने में झूल रहा था। उसके कोमल कानों में भी उस मातृभूमि की जयघोष गूंज रही थी। उस शिशु ने बड़े होकर जैसा जीवन जिया, उसमें इस संयोग के बिंबों को पढ़ा जा सकता है। उसे झाओ झेनकाई नाम दिया गया। अन्यमनस्क झाओ की पढ़ाई चीन की उस पीढ़ी की तरह बीच में ही रुक गई, जो 1966 की सांस्कृतिक क्रांति के दौरान स्कूलों के बंद हो जाने के कारण घरों में ही रहे। सिर्फ़ तीन साल बाद सरकार ने युवाओं को रोज़गार देने की अपनी योजनाओं के तहत झाओ को दक्षिणी इलाक़ों में भेज दिया। वह तब तक कम्युनिस्ट सरकार का रेड गार्ड बन चुका था। रेड गार्ड्स लोगों के घरों में दबिश देते थे। झाओ ने भी सरकार की ब्लैकलिस्ट में रहे बुद्धिजीवियों के घरों में दबिश दी और वहां से किताबें उठाईं। बंद पड़ी लाइब्रेरियों को लूटकर किताबें पढ़ीं। लेकिन मुख्यत: इस दौर में उसने सड़क पर गिट्टी बिछाने वाले मज़दूर का काम किया। उसके बाद वह लुहार बन गया।

बरसों बाद वह लोहे को पीट-पीटकर आकार देने का काम अपने सपनों में देखता। अगले आकार वह बिना किसी चीज़ को पीटे दे देना चाहता था।

रेड गार्ड के रूप में वह किसी भी चीनी युवा की तरह क्रांतिकारी बन जाना चाहता था, लेकिन दक्षिणी इलाक़ों में मज़दूरी करते समय उसने पाया कि सरकार का प्रचार बहुत लुभावना है, जबकि यथार्थ कहीं ज़्यादा कड़वा। जिन इलाक़ों को समृद्ध कहा जाता है, वहां भी भीषण ग़रीबी है। वह उन देहातों के भीतर तक घुसता है, लोगों के जीवन और कठिनाइयों को जानता है और उसका मोहभंग होना शुरू होता है। अब उसमें क्रांति की आकांक्षा नहीं है, बल्कि वह लोगों को सच बताना चाहता है।

बरसों बाद जब यह लड़का बीजिंग लौटता है, तो कविता करना शुरू कर चुका है। यहां कुछ हमख़्यालों से उसकी दोस्ती होती है और जैसा कि चीनी भाषा में आम है, सारे दोस्त एक-दूसरे को साहित्यिक नाम या तख़ल्लुस भेंट करते हैं। ऐसा इसलिए भी था कि उन्हें अपनी सरकार से छुपकर कविता करनी थी। झाओ का नाम रखा गया - बेई दाओ। चीनी भाषा में इसका अर्थ है उत्तरी द्वीप, जिसे अवसाद, अकेलेपन और निर्जनता के लिए भी जाना जाता है। बेई दाओ ख़ुद भी ऐसे थे और उनका काव्य भी ऐसा ही था।

मित्रों की इस मंडली ने एक कविता पत्रिका शुरू की। वे कविताएं इतनी ग़ुस्सैल, व्यवस्था को बदल देने की अकुलाहट से भरी थीं कि असंतुष्ट युवाओं ने इन्हें ख़ूब सराहा। 1978 में बीजिंग में हुए छात्र आंदोलन में एक कविता लाखों पोस्टरों पर छपी। उसकी एक पंक्ति 'मैं - विश्वास - नहीं - करता' हर नौजवान की ज़ुबान पर थी। यह थी बेई दाओ की कविता 'जवाब'।

उसके बाद बेई दाओ और उनकी पीढ़ी के कवि पूरे चीन में प्रतिरोध की नई कविता के प्रस्तावकों के तौर पर प्रसिद्ध हुए। निश्चित ही चीन की सरकार बेई दाओ और समानधर्मा कवियों के पीछे पड़ गई। उनकी निगरानी होने लगी। उनकी कविताओं की स्कैनिंग होने लगी। कुछ ही समय बाद उनकी पत्रिका को सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया, लेकिन श्रेष्ठ कविता ज़मीन के नीचे लिखी जाती है और उसकी प्रतिध्वनि धरती पर जंगल की तरह पनपती है। बेई दाओ की कविता भी इसी तरह लिखी जाती रही और पूरे चीन में पढ़ी जाती रही। उनकी कविता के असर के बारे में प्रसिद्ध संपादक और अनुवादक एलियट वाइनबर्गर ने एक निबंध में एक चीनी किसान नेता की स्मृतियों का हवाला दिया है। 1989 के थिएननमन नरसंहार के बाद उस नेता का एक इंटरव्यू छपा था, जिसमें उससे साफ़ पूछा गया था कि आपकी शिक्षा इतनी कम है, फिर आपकी राजनीतिक समझ इतनी तीक्ष्ण कैसे है? उसका जवाब था, 'मैंने बेई दाओ की कविताएं पढ़-पढ़कर राजनीति की समझ बढ़ाई है।'

बेई दाओ और उन जैसे कवियों को चीन, अस्सी के दशक में उभरे छात्र-असंतोष का उत्प्रेरक मानता है। 1989 में जब बीजिंग में रक्तपात हो रहा था, बेई दाओ बर्लिन में कविता सुना रहे थे। जब उनके पास समाचार पहुंचा, तभी उन्हें यह समझ में आ गया कि अब उन्हें चीन में प्रवेश नहीं दिया जाएगा। और वही हुआ। उसके बाद वह निर्वासन में चले गए। यूरोप के कई देशों में रहे। उनकी पत्नी और बच्चे पर चीन से बाहर निकलने पर पाबंदी लगा दी गई। सात साल तक उन्होंने अपने परिवार का चेहरा नहीं देखा। यही नहीं, यूरोप में वह चीनी बोलने के लिए तरस गए। उन्होंने एक कविता में लिखा भी है कि मैं आईने से चीनी भाषा में बात करता हूं।

विदेशों में उनके पास आमदनी का कोई ज़रिया नहीं था, तो वह कभी-कभार मिल जाने वाली लेखकीय शोधवृत्ति, राइटर्स इन रेज़ीडेंसी पर आश्रित रहे। साथ ही, दूर देशों में कविता पाठ से भी थोड़ी आमदनी होती रही। शुरुआती जीवन में लुहार का श्रमसाध्य काम और अब का अनिश्चित बौद्धिक काम विलोम की तरह उनकी कविता में जगह बनाता रहा। प्रतीक्षा उनकी कविता का मूल स्वर है। जब तक चीन में रहे, वह अपनी मातृभूमि के विशाल स्वप्नों के पूरा होने की प्रतीक्षा करते रहे। जब निर्वासन में गए, तो मातृभूमि उनके स्वप्नों में आती रही और वह घर लौटने की प्रतीक्षा करते रहे। हवा और सड़क ही दो रास्ते थे, जो उन्हें घर तक पहुंचा सकते थे। उन्होंने लिखा : हवा अगर घर की प्रतीक्षा है, तो सड़क यक़ीनन उस प्रतीक्षा की भाषा होगी।

बेई दाओ चीन की सरकार द्वारा समर्थित और स्वीकृत कविता की प्रणाली-परंपरा के विरुद्ध कविताएं लिख रहे थे। उन्होंने (और उनकी पीढ़ी ने) तथाकथित जनवादी-यथार्थवादी कविता, जो वर्ग-बोध के साथ-साथ राज्य-आराधना के अलंकारों का भी प्रयोग करती थी, का बहिष्कार किया, उसके खि़लाफ़ चीनी शास्त्रीयता और काव्य की लंबी चीनी परंपराओं को आत्मसात किया और उस भाषा की तरफ़ प्रस्थान किया, जो चीनी मास्टर्स सदियों पहले करते थे। साथ ही उन्होंने लोर्का, वैयेख़ो और चेलान जैसे कवियों का गंभीरता से अध्ययन कर उनके बिंब-विधान को अपने सांस्कृतिक धरातलों पर साधने का प्रयास किया। ऊपर से प्रकृति-प्रेम-कोमलता के दर्शन कराने वाली यह कविता अपने बिंबों और प्रतीकों में इतनी अमीर थी कि वह दुविधा में डाल देती थी। उनकी कविताएं शुद्ध राजनीतिक कविताएं हैं, लेकिन बेई दाओ के यहां राजनीति उनके निज से शुरू होती है। उन्होंने राजनीतिक चेतना को आत्मचेतना का गाढ़ा छलावरण दिया। यह एक ऐसा गुण था, जो उस समय की चीनी जनवादी कविता से सिरे से ग़ायब था। वहां आत्मचेतना का कोई अर्थ नहीं था। यह छलावरण ही बेई दाओ की कविता के विकास का पहला चरण है।

श्रेष्ठ कला, सपाट दृश्यों में नहीं रहती, वह हमेशा छल का कंबल ओढ़ती है। जो जैसा दिख रहा है, असल में वह वैसा है नहीं। महान सत्य और श्रेष्ठ कला अपने व्यवहार में एक जैसे होते हैं। सत्य भी अमूमन वह नहीं होता, जो धरातल पर दिख जाता है। सत्य भी छलावरण यानी कैमोफ्लेज में ही वास करता है। यह अनटेम्ड होने का सुख नहीं है, बल्कि यह संधान की चुनौती है।

चीनी भाषा अपनी धरती की तरह ही बेशुमार अक्षरों से आबाद है। ये अक्षर मिलकर ऐसे शब्द बनाते हैं, जो किसी चित्र की तरह दिखते हैं। बने हुए उन शब्दों के एक से ज़्यादा अर्थ होते हैं। कुछ अर्थ उनकी ध्वनि से बनते हैं और कुछ उनके चित्र से। कुछ अर्थ सबको पता होते हैं और कुछ अर्थ हमेशा लापता होते हैं। चीनी भाषा अपनी अक्षर-शब्द-बहुलता के बाद भी ऐसे कई शब्दों से भरी हुई है, जिनका सही अर्थ, वाक्य और संदर्भ को पूरा पढ़े बिना नहीं जाना जा सकता। बेई दाओ को जो भाषा अपने आसपास की हवा से मिली, उसका एक लाभ यह भी रहा कि उन्हें बहुअर्थी होने के लिए ज़्यादा दूर नहीं जाना पड़ा। उन्होंने एक शब्द उच्चारा और अलग-अलग लोगों ने उसका अलग-अलग अर्थ समझा। इससे संभवत: उनके कवि ने यह जाना कि कवि के पास सिर्फ़ शब्द होते हैं, अर्थ हमेशा दूसरों के पास होते हैं। कवि अपनी काया में एकल होता है, दूसरे अपनी उपस्थिति में हमेशा बहुल होते हैं। बेई दाओ की कविता बहुलता पर एकलता के आवरण की कविता है।

बेई दाओ की कविता छवियों से ज़्यादा उनके विलोम की कविता है। वह हर छवि को उसके विलोम में जाकर देखते हैं। जैसे देह देखने के लिए वह छाया देखेंगे। जल छूने के लिए वह हिम छुएंगे। जैसा पुराने चीनी मास्टर ली पाई और तू फू करते थे। जैसे पॉल चेलान, लोर्का और वैयेख़ो करते थे। ऐसा करने से कविता की ऊष्मा बेमायने ही बाहर नहीं निकल जाती, बल्कि उसे किसी इंसुलेटर-सा आवरण मिल जाता है। यह कविता के भीतर एक हॉटपॉट की संरचना जैसा है, जिसमें अंदर खाना गरम रहता है, लेकिन बाहर से तापमान का अंदाज़ा नहीं होता। उसकी गर्मास की अनुभूति के लिए आपको हॉटपॉट का ढक्कन खोलना ही होगा।

बेई दाओ पीड़ा के घनीभूत के कवि हैं। भाषा के भीतर एक भावनात्मक लेबर कैंप की पुनर्रचना उनके कवि का अभीष्ट है। वह पीड़ा के महाद्वीप के मानचित्र का अ-सीमांकन करते हैं। अनुभव और प्रयोग का एक ही पंक्ति में विरेचन करते हैं। पीड़ा के अंतर्लोक तक, उसके भूगर्भ तक पहुंचने का साहस निर्वासन से आता है और निर्वासन महज़ एक राजनीतिक कार्रवाई नहीं है। यह राज्य आप पर भौतिक तौर पर भी थोप सकता है और ऐसे हालात भी बन सकते हैं कि वह अधिभौतिक स्तर पर आपके भीतर बन जाए। निर्वासन का अर्थ है अपने सबसे क़रीबी 'परिवेश के आत्म' की तिलांजलि। उसके बाद भी अपनी भाषा में लिखना, लिखते रहना इस निर्वासन का निषेध है। भाषा ही कवि का महाद्वीप होती है। कवि के पास कोई गांव, क़स्बा, शहर, क्षेत्र, प्रांत, देश नहीं होता। वह कभी इन जगहों की कविता नहीं लिखता। इन सबकी स्मृति व अनुभव की कविता ज़रूर लिख सकता है। वह प्रथमत: और अंतत: भाषा के भीतर निवास करता है, क्योंकि भाषा ही उसके सांस्कृतिक कूट या कल्चरल कोड को उस तक पहुंचाती है। भूगोल कवि की स्मरा का आग्रह है। यहां स्मरा यानी स्मृति का स्मरण।

बेई दाओ की कविताओं में प्रतीकों का गहरा प्रयोग है। बिंब, दृश्य, स्टिल लाइफ़, कल्पनाशीलता, रुकी हुई उड़ानें, उड़ती हुई स्थिरताएं ये सब इनकी कविताओं में अनिवार्य रूप से आते हैं। उनकी कविताओं के असली अर्थ तक पहुंचना बहुत मुश्किल है, लेकिन वे अपने समग्र प्रभाव में इतनी चमकीली, द्रविल, गर्वीली, अबूझ किंतु मित्रवत् हैं कि वे इस मिथ को ही तोड़ देती हैं कि क्या किसी कविता को पूरा समझना ज़रूरी है?

क्या कविता को भाषा के परे जाकर नहीं पढऩा चाहिए?
क्या कविता को अर्थ की शय्या पर लेटना चाहिए?
क्या सृष्टि का हर रहस्य खुल जाना चाहिए?
त्वचा का क्या अर्थ है?

यह कि वह बाक़ी अवयवों को छिपाए-थामे रखती है? कंटेनर है? यदि त्वचा न हो, तो क्या शरीर का पूरा सामान बाहर बिखर जाएगा? भीतर एक निर्मिति है, संगति है, सारे अंग आपस में जुड़े हुए भी हैं। फिर भी त्वचा सबको कवर किए रखती है? तो त्वचा का अर्थ क्या है? क्या त्वचा का वही अर्थ है, जो जठर का अर्थ है? धमनियों के अर्थ से अलग है वह?

क्या त्वचा एक काव्य है?

अर्थ बुद्धि की अय्याशी है। बेई दाओ की कविता इस अय्याशी को उकसाती भी है और उसकी सीमा का बोध भी कराती है। यह शब्द और अर्थ की कविता है- शब्दार्थ की कविता। यहां शब्द हमेशा अल्पमत में हैं, कई बार निर्वासित भी हैं, लेकिन साम्राज्य अर्थ का है। दोनों में हमेशा द्वंद्व होता है। शब्द यहां अर्थ को लगातार ललकारते हैं। ऊपर जो बहुलता पर एकलता के आवरण की बात कही है, उसके मायने भी यही हैं कि उनकी कविता कम शब्दों के सहारे बड़े अर्थ खड़े करने का हुनर है। यह कम डग में ज़्यादा दूरी पार करने का हुनर है। जब आपके डग कम होंगे, और दूरी ज़्यादा पार करनी है, तो डग अवश्य ही लंबे होंगे। बेई दाओ के यहां एक पंक्ति और दूसरी पंक्ति के बीच जो लंबा अंतराल दिखता है, अर्थों और छवियों के मायने में, उससे कई लोगों को लग सकता है कि इन दोनों छवियों का आपस में कोई मेल ही नहीं है, कवि कैसे इसे इस्तेमाल कर रहा है और कैसे उसे वैध माना जा सकता है, तो इसका एक साधारण-सा कारण ही यही है कि उनके डग लंबे होते हैं। आम कवि जिस दूरी को दस डग में पार करेगा, बेई दाओ उसे एक डग में करेंगे। इस तरह बीच के नौ डग कविता से अनुपस्थित हो जाएंगे। तब वे दृश्य के बाहर होंगे, कविता के बाहर, और सुधी पाठक अपने विवेक से जान लेगा कि बीच के ये नौ डग तो कवि ने पार कर ही लिए हैं, तभी दसवें तक पहुंचा है। यह विवेक पाठक के पास होना चाहिए।

इसीलिए मेरी नज़र में बेई दाओ की कविता पाठकों पर अतिशय विश्वास की कविता है। इसीलिए वह पूरे यक़ीन के साथ लंबे डग भरते हैं। जिन कवियों में अपने पाठकों की क्षमता पर विश्वास नहीं होता, वे हर पंक्ति को कविता के भीतर ही औचित्य प्रदान करने की तार्किकता से मल्ल करते हैं और अंतत: हास्यास्पद अनावरण की आवृत्ति करते हैं।

अर्थबहुलता का एक अर्थ यह भी होता है कि आप अर्थों से परे जा रहे हैं, लेकिन इसका यह अर्थ क़तई नहीं होता कि इसमें अर्थहीनता या निरर्थकता की ओर कोई प्रस्थान है। यह कला की अभिव्यक्ति के सूत्र को अनायास ही न्यूनतम प्रयास की ओर ले जाने का उपक्रम है। हमारे यहां कविता को तीर की तरह इस्तेमाल करने की आदत है। कविता से एकदम स्पष्ट होने और एकदम स्पष्ट अर्थों की मांग की जाती है। दरअसल, यह मास कम्युनिकेशन के दुराग्रहों में से है। कविता संप्रेषणीयता के नियमों से संचालित नहीं होती।

बेई दाओ को राजनीतिक कवि माना जाता है, लेकिन वह ख़ुद अपने बारे में कहते हैं, 'जब मुझे लोग ख़ूब पढ़ते हैं, तो मुझे कई बार संदेह होता है कि ऐसा साधारणीकरण क्या आ गया है? मुझे पता है कि मेरी कविता को ग़लत समझे जाने की पूरी आशंका है, लेकिन तब मैं अपने शब्दों के इस्तेमाल के प्रति और सजग हो जाता हूं। मैं प्रतिरोध का कवि हूं, लेकिन मैं क्रांतिकारी नहीं हूं। मैं किसी भी कि़स्म की राजनीतिक विचारधारा का प्रवर्तक कवि नहीं बनना चाहता। मैं भाषा की एक नई शैली रच रहा हूं, अभिव्यक्ति का एक नया तरीक़ा। और कुछ नहीं।'

बेई दाओ की यह स्वीकारोक्ति उनकी काव्य-आकांक्षाओं को स्पष्ट कर देती है। सहज संप्रेषित होना उनकी कविता का अनिवार्य गुण नहीं है, अभीष्ट गुण भी नहीं। एक ऐसे समय में जहां सबकुछ आसान है, विश्लेषित है, मीडिया हर चीज़ का अर्थ बता देने को अकुला रहा है, घटनाएं होने के क्षण-भर बाद ही जिनका अर्थ बता देने की होड़ लगी हुई है, बेई दाओ की कविता अपने पाठक से कहती है कि मेरे साथ थोड़ी देर रुको। कुछ पल बिताओ और जल्दबाज़ होने की दुनियादारी से दूर हो जाओ।

ऐसे जल्दबाज़ समय में वह कविता क़तई नहीं लिखी जानी चाहिए, जिसमें प्रवेश के लिए पाठक को उसके द्वार पर दो पल ठिठकना भी न पड़े। बेई दाओ की ये गूढ़-गंभीर कविताएं हमारे हड़बड़ी से भरे समय की प्रतिस्पर्धा का निषेध है। यह हमारे समय की हड़बड़ी पर ली गई एक आपत्ति भी है।

सरलता का आग्रह तभी होता है, जब आप अर्थ के साथ विहार नहीं करना चाहते। जब आपमें समय नहीं होता, धैर्य नहीं होता, ठहरने का अवकाश नहीं होता, ऐसा समय सत्ता और बाज़ार के लिए बहुत लाभप्रद होता है। वे दोनों इस समय को चिरंतन रखना चाहते हैं। बेई दाओ की कविता सत्ता और बाज़ार की ऐसी गुप्त कुत्सा का प्रतिरोध करती हैं। इसीलिए वह अदृश्य की संरचना करते हैं। इसे अदेखे का सौंदर्यशास्त्र कहा जा सकता है। यह देखना भी दिलचस्प है कि प्रतिरोध का कवि प्रतिरोध के प्रोटोटाइप को ही ध्वस्त कर देता है। यह उनकी नव्यता है।

जिस कवि की कविताओं को राजनीतिक आंदोलनों में ईंधन की तरह इस्तेमाल किया गया हो, वह ख़ुद को राजनीतिक कवि नहीं कहना चाहता। यहां वीस्वावा शिम्बोर्स्‍का की याद आ जाती है। वह दैनंदिन राजनीति के हर पक्ष को अपनी कविता में छूती थीं, लेकिन ख़ुद को राजनीतिक कवि नहीं मानती थीं। कोई अनिवार्य नियम नहीं है, लेकिन बेई दाओ की कविता को अगर एक रेखा में देखा जाए, तो जो पड़ाव-बिंदु बनते हैं, वे क्रम से इस तरह हैं- प्रतिक्रिया, राजनीति, प्रेम, दर्शन। कविता के भीतर अनुभूति और दर्शन को गूंथना कवि की महत्तम परिपक्वता का परिचायक होता है। वही कविता इतिहास में सबसे लंबे समय तक सरवाइव करती है, जिसमें दोनों तत्वों का सही समावेश हो। दान्ते, कालिदास से लेकर बोर्हेस, नेरूदा तक इसके उदाहरण हैं।

कविता निजी आवरण में सार्वजनिक स्मृति है और कवि जनता की स्मृति का पहरुआ है। भौतिक व सामाजिक स्तर पर सत्ता, अनुभव और स्मृति दोनों का विलोपन कराती है। हर सत्ता चाहती है कि उसके नागरिक का अनुभव-संसार इतना विशद हो कि वह उस ज़ख़ीरे से ही दिग्भ्रमित हो जाए। चूंकि बिना स्मृति के व्यक्ति अपने अनुभव का विश्लेषण नहीं कर सकता, इसलिए उसकी स्मृति का ही हरण कर लिया जाए। यह अकारण नहीं है कि अब सभी जगहों पर यह कहा जाने लगा है कि जनता की स्मृति बहुत कमज़ोर होती है। यह अपने आप नहीं हुई है। इसमें सत्ताओं का योगदान है। चीन चाहता है कि उसके नागरिक थिएननमन को विस्मृत कर दें। भारत चाहता है कि उसके नागरिक 1975 और 1992 भूल जाएं। अमेरिका चाहता है कि वाटरगेट और इराक़ भुला दिया जाए। फिर यही सत्ताएं अपने लाभ के लिए सार्वजनिक स्मृतियों का आवाह्न भी करती हैं। जैसे इस समय अमेरिका चाहता है कि उसके लोग ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया 1939 की आर्थिक मंदी को याद करे।

कहने का अर्थ यह कि व्यक्ति के अनुभव और स्मृति को भी सत्ताएं संचालित करने का प्रयास करती हैं। उसी का प्रतिरोध करने के लिए कवि बार-बार कुछ छवियों को दोहराता है। वह अपने लिए अपनी ही भाषा के भीतर अपने लिए ऐसे शब्द चुनता है, जिससे एक नई दिखने वाली भाषा तैयार हो सके। भाषा एक राजनीतिक औज़ार है, जिसका कवियों से भी ज़्यादा मारक प्रयोग सत्ता-सरकारें करती हैं। विटगेंस्टीन ने कहा था, 'भाषा राजनीति है।' यानी हम भाषा के साथ जैसा प्रयोग करते हैं, अपने लिए जिन शब्दों को चुनते और उनके अर्थों में इज़ाफ़ा करते चलते हैं, वही हमारा राजनीतिक रुख़ होता है। सत्ता की भाषा और कवि की भाषा नाम से एक हो सकती है, लेकिन असल में कभी एक नहीं होती। इसलिए बेई दाओ कहते हैं, 'मैं भाषा की एक नई शैली रच रहा हूं, अभिव्यक्ति का एक नया तरीक़ा। और कुछ नहीं।'

यह भाषा के वाहन पर बैठ सक्रिय राजनीति में शिरकत करना है।

जैसा कि रोलां बार्थ फ़ोटोग्राफ़ी के बारे में कहते हैं- 'तस्वीर हमेशा अदृश्य होती है', कविता के बारे में भी कहा जा सकता है कि कविता हमेशा अशब्द होती है। यह शब्दों की चहारदीवारी के बीच बना हुआ एक शब्दहीन आवास है। जैसे ईंटों की एक चहारदीवारी है। वह ईंटविहीन जगह को घेरने के लिए बनती है। दीवारों के भीतर कुछ नहीं होता, स्पेस को घेरा जाता है। ईंटें उस वातावरण को पकड़ नहीं सकतीं, बस घेर सकती हैं। उसी तरह कविता भी शब्दों के बीच पकड़ी नहीं जा सकती, शब्द महज़ कविता के उस स्पेस को घेर सकते हैं। कोई मुट्ठी वातावरण को नहीं पकड़ सकती, लेकिन अंजुलियां अर्घ्‍य की मुद्रा में फैला दी जाएं, तो उन पर वातावरण को रखा ज़रूर जा सकता है।

उनकी कविता निर्वात को स्थान देने की कोशिश है। रिक्तता को माप लेने की आदिम कीमियागरी से भरी हुई।

बेई दाओ की कविता शब्द की सत्ता का शिरोधार्य है और सत्ता हमेशा अपनी सीमा की विवशता में होती है। सत्ता का निरंकुश व्यवहार यही दर्शाता है कि निरंकुशता भी एक सीमित विवशता है।

कवि भाषा का सारथि है। शब्द उसका रथ हैं। वह रहता भाषा के भीतर है, लेकिन महान कविताएं भाषा के भीतर नहीं लिखी जातीं। बस, वे भाषा के वाहन पर चलती हैं। भाषा के भीतर पढ़ी जाती हैं।

कविता एक विपश्यना है, जिसमें आप देह के भीतर रहते हुए विदेह होते हैं, अंतर्यात्रा की शुरुआत होती है और वह वस्तुजगत, भावजगत, मनोजगत और जगदातीत की यात्रा बन जाती है। शब्दों से बनी देह के भीतर की गई विपश्यना कविता की संज्ञा पाती है। यह संज्ञा के उच्चांक और संज्ञाहीनता के न्यूनांक के बीच की जाने वाली निरंतर आवाजाही है। ऐसी ही किसी स्थिति में शब्दों का मानचित्र ग़ायब हो जाता है, अर्थों की रेखाएं भी ग़ायब हो जाती हैं। अंत में एक अनुभूति बची रह जाती है, जो शब्दातीत है।

हर कविता अपने साथ ऐसी ही शब्दातीत अनुभूति लेकर चलती है। वही उस कविता का सर्वोच्च अंक होता है या भाषा के भीतर प्राप्त कविता का ऑर्गेइज़्म होता है। हर कविता का शीर्ष बिंदु चरम-कामसुख की तरह है। अच्छी कविताएं आपके साथ यात्रा करती हैं, तो सिर्फ़ ऑर्गेइज़्म की इसी अनुभूति के साथ या इसी के रूप में।

कुछ लोग कहते हैं कि अच्छी कविता वह है, जिसकी पंक्तियां आपको याद रह जाएं। यदि ऐसा है, तो वह कविता का नहीं, पाठक की स्मृति का गुण है। कुछ लोग कहते हैं कि अच्छी कविता वह है, जो पाठकों की ज़ुबान पर चढ़ जाए। यह भी कविता का नहीं, उसमें प्रयुक्त भाषा, लय और संगीत का गुण है। कुछ कहते हैं कि अच्छी कविता वह है, जिसके शब्द भले याद न रहें, लेकिन उसका अर्थ पाठक को याद रहे। अर्थ तो बुद्धि है। वह भी सापेक्ष है। जिसकी जितनी बुद्धि होगी, वह कविता का उतना अर्थ ग्रहण करेगा। पर यह भी ज़रूरी नहीं कि हर कविता अपना वही अर्थ उच्चारित करती हो, जो वह सच में हो और जिससे पाठक भी एकाकार हो सके। इसलिए अर्थ का साथ आना कविता का नहीं, व्यक्ति का गुण है।

(ग़ालिब इसी तरह के कवि थे। वह अर्थ की मरीचिका रचते थे। उनके एक ही शेर को आनंद में भी उद्धृत किया जा सकता है और शोक में भी। और दोनों ही जगहों पर उसका उद्धरण वैध होगा। यही अर्थबहुलता और भाषा के भीतर ऑर्गेइज़्म की प्राप्ति ग़ालिब की महान शक्ति है।)

फिर वह कौन-सी कौन-सी चीज़ है, जो अच्छी कविता के भीतर होती है और पढ़े जाने के बाद अपने पाठक के साथ यात्रा करती है?

वह शब्दातीत है। वह भाषा के भीतर वास करने वाली 'अनुभूतिजन्य (किंतु अनुभूत नहीं) निरपेक्षता' है। शब्दातीत यदि शब्द की पकड़ में आ जाए, तो उसका शब्दातीत होना बंद हो जाएगा। निरेपक्षता में यदि दूसरा कोण आ जाए, तो वह सापेक्ष हो जाएगी। निरपेक्षता जितनी क्षणभंगुर मरीचिका है, उतनी ही दीर्घजीवी भी है। जब तक आप उस तक नहीं पहुंचते, वह दीर्घजीवी होती है। जैसे ही आप उस तक पहुंच जाते हैं, उसका निरपेक्ष होना ख़त्म हो जाता है।

यह स्पर्श से मिली मृत्यु है। यह दृष्टिपात से मिला विलोप है। यह सुनते ही मिली अश्रव्यता है। यह इंद्रियों को चुनौती देता इंद्रियातीत है।

ओक्तावियो पास की पंक्ति का स्मरण हो आता है, 'कविता पढऩा आंखों से उसे सुनना होता है। कविता सुनना आंखों से उसे देखना होता है।' पास यहां कविता के संदर्भ में इंद्रियों को उनके मुख्य कार्य-व्यवहार से च्युत कर देते हैं। इंद्रियच्युत होना, इंद्रियातीत होने के मार्ग की शिला है।

सारी कलाएं इसी निरपेक्षता की ओर प्रस्थान की महत्वाकांक्षी होती हैं। कविता इस प्रस्थान की सबसे मुखर प्रस्तावक है। और यह बेई दाओ की कविता के प्रधान गुणों में से है।

क्या इस निरपेक्षता को कभी पकड़ा जा सकता है?

एक उदाहरण आता है।

जैसे मूर्च्‍छा होती है। व्यक्ति मूर्च्छित है, इसलिए गतिहीन है। स्थिर है। जड़ है। लेकिन उसके मूर्च्छित होने के बाद भी उसके भीतर सबकुछ चल रहा है। देह का अंदरूनी कारोबार अबाधित है। यानी मूर्च्‍छा कुछ विशेष इंद्रियों के निष्क्रिय हो जाने की दशा है। यानी मूर्च्‍छा का अनुभव एक इंद्रियातीत अनुभव है। मूर्च्‍छा की स्मृति नहीं होती। जहां इंद्रियां निष्क्रिय हो जाती हैं, वहां अनुभव का लोप होता है। अनुभव का लोप होते ही स्मृति का लोप होता है। कविता अनुभव और स्मृति दोनों के मिलने से बनती है।

फिर दो लुप्त तत्व किस जगह आपस में मिलते हैं? वही निरपेक्षता का बिंदु है। इसी जगह तक पहुंच पाना कला का सबसे बड़ा संघर्ष है।

चूंकि अनुभव और स्मृति की अनुपस्थिति और विलोप कविता का प्रधान गुण भी होता है, जैसा कि हम अनकहे के सौंदर्यशास्त्र के रूप में हमेशा चर्चा भी करते हैं, तो इन दोनों विलुप्त तत्वों का मेल भी कविता के भीतर ही होता है।

मूर्च्‍छा एक गतिहीनता है, जो अंदरूनी गतियों का कंटेनर है, तो भाषा भी एक गतिहीनता है, जो कविता के भीतर की गतियों को कंटेन करके रखती है।

स्थिरता गति का आवरण है।

यानी जो चीज़ बाहर से स्थिर दिख रही है, वह भीतर से अत्यंत गतिमान है। उसका बाहर से स्थिर दिखना ही उसके गतिमान्य का प्रमाण है। जैसे एक पत्थर बाहर से स्थिर दिख रहा है, लेकिन उसके अंदर ढेर सारी गतियां हैं, अनएक्स्प्लोर्ड गतियां।

बेई दाओ की कविता ऊपर से जितना स्थिर दिखती है, ठंडी और शांत दिखती है, अंदर से वह उतनी ही गतिमान है।

चेहरे की भावहीनता भावों की अभिव्यक्ति पर किया गया सबसे श्रेष्ठ नियंत्रण है। यह अभिव्यक्ति की साधना है। और बेई दाओ इसके अद्वितीय साधक हैं।

अनुपस्थिति का अर्थ ही यही है कि उस वस्तु का अभाव, जो पहले उस दृश्य में थी, जिसका होना सम्मत और दृश्यमान था। जैसे कोई बच्चा स्कूल में अनुपस्थित है। यानी कल वह उपस्थित था, आज नहीं है। यानी अनुपस्थिति, उपस्थिति की तार्किक परिचायक है। गारंटर है। यानी कल वह कक्षा में उपस्थित था, आज नहीं है, लेकिन आज वह अन्य की स्मृति में उपस्थित है। जो बच्चा कभी स्कूल गया ही नहीं, वह कभी स्कूल से अनुपस्थित नहीं हो सकता।

इसी तरह कविता के भीतर अनुपस्थिति के भाव का अर्थ ही यही है कि वह आस्वादक की स्मृति और कल्पना में उपस्थित है, उसे सम्मत तौर पर काव्य में प्रस्तुत दृश्य में होना चाहिए था, लेकिन वह नहीं है। यदि उस तत्व की उपस्थिति पाठक के ज्ञान, कल्पना व स्मृति में है ही नहीं, तो कविता के भीतर उसकी अनुपस्थिति को वह पाठक नहीं पकड़ पाएगा।

इसीलिए कविता द्विज है। उसका जन्म दो बार होता है। एक कवि के छूने से, दूसरा पाठक के छूने से। ऐसे में वाल्ट व्हिटमैन की वह प्रसिद्ध उक्ति याद आती है- 'मैं और मेरा पाठक दोनों मिलकर कविता लिखते हैं।'

इसे इस तरह भी देख सकते हैं- मैं मूर्त हूं, पाठक अमूर्त है। यानी कविता की रचना 'आत्म के मूर्त' और 'अनात्म के अमूर्त' के मेल से होती है।

जो हमारी बुद्धि, ज्ञान व कल्पना से बाहर का तत्व है, उसे रहस्य कहते हैं, लेकिन रहस्य कभी निरपेक्ष नहीं होता।

क्या कविता के भीतर घटने वाले इस ऑर्गेइज़्म को रहस्य कह सकते हैं?

स्वयंभू होना रहस्य से परे है। स्वयंभू होने की प्रक्रिया ज़रूर रहस्य कहला सकती है। ऐसा कह सकते हैं कि इस ऑर्गेइज़्म तक पहुंचने की प्रक्रिया रहस्य हो सकती है, लेकिन इस चरम-कामसुख को रहस्य भी नहीं कह सकते। यह उससे भी परे है।

यह अनुपस्थित तत्व आस्वादन के बाद ही अनुभूत हो सकता है और यह अनिवार्यत: अवर्णनीय अनुभूति है।

एक साधारण-सा उदाहरण लेते हैं-
चीनी का स्वाद क्या है?
मीठा।
मीठा क्या होता है?

मीठा अवर्णनीय है। कोई भी स्वाद अवर्णनीय होता है। वर्णन के लिए हम निजी प्रयोग और निजी अनुभव में जाते हैं। चीनी के दानों को जीभ पर रखकर घोलना और रस ग्रहण कर लेना प्रयोग है। उसकी मिठास के निष्कर्ष पर पहुंचना प्रयोग से प्राप्त अनुभूति है। स्वाद उस अनुभूति की स्मृति है। परंतु इस अनुभूति की कोई परिभाषा नहीं है। इसके पास कोई तर्क नहीं है। इस प्रयोग का 'अंतिम' मिठास की अनुभूति है। उसका मीठा होना एक स्वीकृत और अभ्यस्त अंतिम है, लेकिन वह वास्तविक अंत नहीं है। क्योंकि प्रयोग, तर्क व अनुभूति की शृंखला में तीसरा बिंदु सीमा के पार चला जाता है, जिसके लिए परिभाषा का संधान नहीं हुआ है। अंत वहां नहीं होता, जहां वस्तु ओझल हो जाती है। बल्कि ओझल हो जाना इस बात का प्रमाण है कि आगे और भी दूरी है, दृष्टि की सीमा से परे। इस अनिर्वचनीयता को देखते हुए कहा जा सकता है कि-

अंतिम के बाद भी, हमेशा, एक अंत होता है। उसकी उपस्थिति ऐसी अश्रुत, अदृष्ट उपस्थिति है, जो विलोमों के अपने साधारण समीकरणों से गुज़रकर अनुपस्थिति कहलाती है।

कविता के भीतर यह गुण 'अंतिम के बाद का अंत' है। यही अनुपस्थित अंत उस कविता का ऑर्गेइज़म होता है और वही पाठक के साथ यात्रा करता है। यह श्रेष्ठ कविताओं का अवश्यंभावी गुण है।

बेई दाओ की कविताएं 'अंतिम के बाद के अंत' की प्रामाणिक कविताएं हैं। समकालीन विश्व कविता में ऐसे कवि अत्यंत विरल हैं, उनका सर्वस्वीकृत हो जाना तो और भी विरल है। इसी 'अंतिम के बाद के अंत' का गुण है, जिसका विकास उनकी कविता अत्यंत सहजता से करती हैं, क्योंकि उनकी कविता एकल अर्थ की चिंता में झुर्रियां नहीं पैदा कर लेती, और वह अर्थ की बहुलता से संकुचित या आक्रांत भी नहीं होती। इसीलिए वह शब्दों के अल्पमत से अर्थों के साम्राज्य को चुनौती देते हैं। यह गुण, संभव है कि, स्वयं कवि को भी न पता हो।

बेई दाओ जैसा ईमानदार कवि बाज़ दफ़ा इसे स्वीकार भी करता है, 'अपनी कविताओं के सारे अर्थ ख़ुद मुझे भी नहीं पता होते। कई बार मेरे गंभीर पाठक उनका अर्थ बताते हैं। और वही पाठक बाक़ी सबके लिए पुल बन जाते हैं।'

*

जैसे योगवाशिष्ठ कहता है- यह संसार कहानी सुनाने के बाद शेष बचा उसका प्रभाव है, वही शेष प्रभाव बेई दाओ की कविता की नाभि है।

_____________________________________________________________________________

प्रेम का पुनर्लेखन
(बेई दाओ की 36 कविताएं )

अनुवाद : गीत चतुर्वेदी


स्थानीय लहजा

मैं आईने से चीनी भाषा में बात करता हूं
पार्क के पास अपनी निजी सर्दियां हैं
मैं संगीत चला देता हूं
सर्दियां मक्खियों से मुक्त हैं
मैं बिना किसी हड़बड़ी के कॉफ़ी बनाता हूं
मक्खियों को समझ नहीं आता कि मातृभूमि का अर्थ क्या है
मैं थोड़ी शक्कर मिलाता हूं
मातृभूमि एक कि़स्म का स्थानीय लहजा होती है
मैं फोन पर दूसरी तरफ़
अपने भय को बोलता पाता हूं
*

धार चढ़ाना

मैं सूर्योदय की नीमहोश रोशनी पर जब चाक़ू को धार चढ़ाता हूं
पाता हूं कि रीढ़ की धार तेज़ हो गई है
चाक़ू वैसा ही भोथरा है
सूरज दहकने लगता है

मुख्य रास्तों पर दौड़ती हुई भीड़
दुकानों की विशाल खिड़कियों में खड़े पेड़ हैं
सन्नाटे का गर्जन है
मैं देखता हूं कि सुई उड़ रही है
ठूंठ के छल्लों के चारों ओर
धीरे-धीरे केंद्र की ओर बढ़ते हुए

*

पुरानी बर्फ़

जब क़द्दावर बर्फ़ एक पुरानी भाषा में जान फूंक देती है
इस महाद्वीप पर
राष्ट्रीय सीमाओं के नक़्शे अपना आकार बदल लेते हैं
बर्फ़ एक विदेशी के कमरे के लिए
तहेदिल से चिंता व्यक्त करती है

मेरे दरवाज़े के सामने
तीन मीटर लंबी इस्पात की एक पटरी बिछी हुई है

कारख़ाने दिवालिया हो जाते हैं, सरकारें गिर जाती हैं
बासी हो चुके अख़बार
सड़ गए समंदरों में तब्दील हो जाते हैं
पुरानी बर्फ़ बार-बार आती है, नई बर्फ़ एक बार भी नहीं आती
रचने की कला खो चुकी है
खिड़कियों ने अपने क़दम पीछे हटा लिए हैं
पांच टिटहरियों ने सलामी दी है

अप्रत्याशित प्रकाश भी एक घटना है

हरे मेढ़क अपनी शीत निष्क्रियता की शुरुआत करते हैं
डाकियों की हड़ताल चलती रहती है
कहीं से कोई ख़बर नहीं आती
*

प्रात:कथा

एक शब्द ने दूसरे शब्द का समूल नाश कर दिया है
एक किताब ने आदेश जारी किए हैं
दूसरी किताब को जला डालने के वास्ते
भाषा की हिंसा से बनाई गई एक सुबह ने
लोगों के खांसने की सुबह के मायने बदल दिए हैं

कीड़ों ने दानों पर हल्ला बोल दिया है
दाने आते हैं फीकी वादियों से
फीके लोगों के बीच से
सरकार खोज लेती है अपना प्रवक्ता
चूहे और बिल्ली
की अभिव्यक्तियां एक जैसी हो गई हैं

आसमान के बीच एक सड़क पर
हथियारशुदा एक वनवासी देखता है
डामर की झीलों पर गडग़ड़ाते हुए चलते सूरज को
वह सर्वनाश की आवाज़ सुनता है
एक विशाल अग्निकांड की एक अबाधित ध्वनि
*

शीर्षकहीन

वह अपनी तीसरी आंख खोलता है
सिर के ऊपर चमकते उस सितारे को
पूर्व और पश्चिम की उष्ण धाराओं ने
एक महराबदार रास्ता बना दिया है
महाराजमार्ग डूबते हुए सूरज के बीच से गुज़रता है
पहाड़ों की दो चोटियां ऊंट की सवारी करती हैं और वह भहरा जाता है
उसका कंकाल कोयले की गहरी परतों के नीचे
दबा दिया गया है

वह जलमग्न संकरे केबिन में बैठा है
शिलाओं जितना शांत
उसके चारों ओर मछलियों की पाठशाला है चहकती हुई चमकती हुई
स्वतंत्रता, जिसे उस सुनहरे ताबूत में छिपाया गया है
क़ैदख़ाने के बहुत ऊपर लटक रही है
विशाल चट्टान के पीछे क़तार में लगे लोग
प्रतीक्षा कर रहे हैं कि किसी तरह
सम्राट की स्मृति में वे घुस सकें

शब्दों का निर्वासन शुरू हो चुका है
*

बीच राह

जुलाई, एक परित्यक्त पत्थर खोदता है
तिरछी हवा को और काग़ज़ से बने पचास बाज़ उड़ते निकल जाते हैं
घुटनों के बल समंदर की ओर जाते हुए लोगों ने
अपना हज़ार साल पुराना युद्ध त्याग दिया है

मैं समय ठीक करता हूं
जैसे वह पूरा मेरे जीवन से गुज़र जाएगा

आज़ादी के जयकारे के साथ
पानी के भीतर से आती है सुनहरी रेत की आवाज़ें
गर्भ में भटकते शिशु के मुंह में तंबाकू का स्वाद है
उसकी मां का सिर गाढ़े कोहरे से लिपटा हुआ है

मैं समय ठीक करता हूं
जैसे वह पूरा मेरे जीवन से गुज़र जाएगा

शहर पलायन कर रहे हैं
होटल बड़े और छोटे पटरियों पर क़तार में हैं
पर्यटकों की तिनकों से बनी टोपियां घूम गई हैं
कोई उन पर निशानेबाज़ी का रियाज़ कर रहा है

मैं समय ठीक करता हूं
जैसे वह पूरा मेरे जीवन से गुज़र जाएगा

यायावरों के घुमक्कड़ बग़ीचों के पीछे
झुंड बना उड़ती हैं मधुमक्खियां
नेत्रहीन और गायक
अपनी दोहरी महिमा से आसमान में हलचल मचा देते हैं

मैं समय ठीक करता हूं
जैसे वह पूरा मेरे जीवन से गुज़र जाएगा

मृत्यु के ऊपर फैले नक़्शे पर
ख़ून की बूंद आखि़री निशान बनाती है
मेरे पैरों के नीचे पत्थर पूरे होश में हैं
जिन्हें भुला दिया है मैंने
*

शीर्षकहीन-2

दुर्घटनाओं से भी ज़्यादा अपरिचित
मलबों से भी ज़्यादा संपूर्ण

तुम्हारा नाम उच्चारना
तुम्हें हमेशा के लिए त्याग देना है

यौवन के कीचड़ पीछे छूट गए हैं
घड़ी के भीतर कहीं
*

पढऩा

अनावश्यक आंसुओं का स्वाद चखो
एक हसीन दिन के लिए
अब भी चमक रहा है तुम्हारा सितारा

जन्म लेने पर
हाथ सबसे ज़्यादा अभिव्यक्ति करते हैं
अपनी जड़ों की तलाश में
एक शब्द बदल देता है
नृत्य को

गर्मियों के अक्षरों को पढ़ो
चांदनी को पढ़ो
जिससे एक आदमी चाय पीता है
वही सच्चा सुनहरा युग है
मलबों पर बैठे कौओं के शागिर्दों के लिए

सारे गौण अर्थ
उंगलियों के नाख़ून तोड़ देते हैं
उगता हुआ धुआं
वायदों के भीतर से रिसता है

अनावश्यक समुद्र का स्वाद चखो
नमक ने जिससे छल किया है
*

ताला खोलना

मैं स्वप्न देखता हूं कि मैं शराब पी रहा हूं
गिलास ख़ाली है

पार्क में कोई अख़बार पढ़ रहा है
इतने बुढ़ापे में कौन है जो उसे
क्षितिज की रोशनी को लील लेने को उकसाता है?
मुर्दों के नाइट स्कूल में लगी बत्तियां
ठंडी चाय में बदल जाती हैं

स्मृति की ढलान लुढ़कते-लुढ़कते
रात के आसमान तक पहुंच जाती हैं, तो आंसू कीचड़ बन जाते हैं
लोग झूठ बोलने लगते हैं - जब अर्थ का सबसे कठिन बिंदु आता है
वे फिसलकर जल्लाद का पक्ष ले लेते हैं

फिसलकर मेरी ओर आ जाओ : ख़ाली मकान

एक खिड़की खुलती है
जैसे सरगम का द्रुत ग चीरता है सन्नाटे को
पृथ्वी और दिशासूचक कंपास घूमते हैं
अपने गुप्त संयोग से-
पौ फटती है
*

यात्रा की डायरी

जंगल में बारिश के प्रवेश से पहले
अग्निशामक यंत्र में बर्फ़ का एक तूफ़ान गहरी नींद में सो जाता है
तुम अतीत को सुनते हो-

एक निर्माणाधीन जगह रोशन हो उठती है:
शल्यक्रिया से उजागर हो जाती हैं अंतडिय़ां
कोई हथौड़ा बजा रहा है लगातार
कितनी कमज़ोर होती है दिल की धड़कन

एक पुल छलांग लगाता है
ख़बर के सबसे सियाह पहलू को
भविष्य के शहर के सामने लाता है

आगे बढ़ो! बच्चे के बेढंगे शब्दों के कल में
और तारों भरे आसमान की ब्रेल लिपि में
भीतर तक धंसो
वे तरुणाई का सफ़ेद परचम थामे हुए हैं
बरसों की ऊंचाई को तूफ़ानों से नापते हुए

अंत में तुम एक पिता बन जाते हो
खेतों के आरपार चलते हुए
रातोरात पहाड़ सफ़ेद हो जाते हैं

सड़कें मुड़ जाती हैं
*

रामल्लाह

रामल्लाह में
सितारों भरे आसमान तले पुरखे-पुरनिया शतरंज खेलते हैं
आखि़री सुलह टिमटिमाती है
घड़ी में क़ैद एक चिडिय़ा
समय बताने के लिए कूदकर बाहर निकलती है

रामल्लाह में
सूरज दीवार पर चढ़ता है किसी बूढ़े आदमी की तरह
और तांबे की पुरानी ज़ंग लगी तश्तरियों पर
आईनों की रोशनी फेंकते हुए
बाज़ार की तरफ़ निकल जाता है

रामल्लाह में
देवतागण मिट्टी के मर्तबानों से पानी पीते हैं
धनुष दिशाओं के बारे में पूछता है प्रत्यंचा से
आसमान के किनारे से एक लड़का निकलता है
और समंदर की विरासत अपने नाम करता है

रामल्लाह में
भरी दुपहरी में बोए जाते हैं बीज
मेरी खिड़की के नीचे मौत फूल उगाती है
एक पेड़ मुक़ाबला करता है बाक़ायदा
तूफ़ान के हिंसक असली स्वरूप से
*

घर छोडऩा

दिशासूचक कंपास जिस ओर इशारा करता है परिहास से
कुछ और नहीं वह, मन की अवस्था है
तुम सूप पीते हो और
जीवन के इस दृश्य से बाहर निकल जाते हो

आसमान और बिजली के तारों से बने आवेदन पत्र पर
एक पेड़ लडख़ड़ाता है
किस चीज़ के बारे में लिख सकता है वह?

कुछ भी हो जाए भले
तुम ख़तरे को पहचान लोगे
तुम्हारी यात्रा के अंत में
अजनबियों की एक भीड़ बैठी होगी

रात के समय हवा घंटियों को चुरा लेती है
लंबे बालों वाली दुल्हन
कांपती है प्रत्यंचा की तरह
दूल्हे की देह पर झुकी हुई
*

रियाज़

हवा जंगल की सबसे ग़रीब रिश्तेदार है
अपनी छुट्टियां बिताने के लिए क्षितिज की ओर जाती है
एक नदी में नींबू फेंकते हुए
जिसमें असंख्य घंटियां बह रही हैं

कैमरा प्रकाश का पीछा इस तरह करता है
जैसे पियानो को ट्यून किया जा रहा हो
रति-तृप्ति के बाद की वे संक्षिप्त मूर्च्‍छाएं
शुद्ध स्वर हैं रंग हैं

युद्ध और लेखन चलते ही रहते हैं
समय के घंटे इनके बीच ही बनाए जाते हैं
लोग अफ़वाहों की तरह इन पर बैठते हैं
शुरू हो जाने के इंतज़ार में

सिगरेट छोडऩा एक तरह से
हाथ से उसकी एक अभ्‍यस्‍त भंगिमा छीन लेना है
ऐसा क्यों न कहें
कि मैंने शब्दों को अभी सुलगाया नहीं है?
*

सुबह का गीत

शब्द किसी भी गीत का विष हैं

गीतों से बनी रात के रास्तों पर
पुलिस का सायरन
नींद में चलने वाले के अल्कोहल का उत्तर-स्वाद है

जागना ही एक सिरदर्द है
जैसे खिड़की के पारदर्शी स्पीकर
सन्नाटे से गर्जना की ओर

एक पूरा जीवन बर्बाद करने सबक़ सीखते
मैं चिडिय़ों की आवाज़ों पर मंडराता हूं
ठीक वैसा ही कभी नहीं बोलता

जब तूफ़ान गैसों से भर जाते हैं
प्रकाश की किरणें अक्षर को छीन लेती हैं
उसकी तहें खोलती हैं और फिर उसे फाड़ देती हैं
*

टी. ट्रांसट्रोमर के लिए

तुम कविता की आखि़री पंक्ति चुनते हो
और उसे बीचोबीच टांक देते हो- यह तुम्हारे गुरुत्वाकर्षण का केंद्र है
एक चर्च के भीतर गुरुत्वाकर्षण का केंद्र जो झूल रहा है बजती हुई घंटियों के बीच
बे-सिर फ़रिश्तों के साथ नाचते हुए
तुम अपना संतुलन ऐन साधे रखते हो

तुम्हारे विशाल पियानो के टीले पर
लोग लपक लेते हैं और मज़बूती से पकड़े रखते हैं
तूफ़ान की उस कड़कड़ाहट को, बटनों की बौछार को
तुम हैरत करते हो कैसे रात की रेलगाड़ी
शामिल हो जाती है आने वाले दिन के अंधकार में

अपने नीले रेल स्टेशन मकान से निकलकर
साहस के साथ तुम बरसते हो मशरूमों को देखने
सूरज, चांद और जंगल में लगे सिग्नलों की रोशनी देखने
सात साल पुराने एक इंद्रधनुष के पीछे
बेतहाशा भीड़ मोटरगाडिय़ों को मुखौटों की तरह पहने बैठी है
*

सेब और पत्थर

समुद्र की प्रार्थना सभा में
एक तूफ़ान घुटने टेकता है

पत्थर मई माह की निगहबानी करता है फि़ज़ूल ही
उसे हरे संक्रमण से बचा ले जाने के लिए

विशाल पेड़ों को आरे से चीरते हुए जैसे-जैसे गुज़रते हैं चारों मौसम
सितारे कोशिश करते हैं सड़क को पहचानने की

एक शराबी इस प्रतिभा का प्रयोग करता है संतुलन साधने में
और इसी बहाने समय की घेरेबंदी से बाहर निकल जाता है

एक गोली घुसती है सेब के भीतर
जि़ंदगी क़र्जे़ चढ़ गई है
*

विद्रोही

वह परछाईं जो प्रकाश को प्रसन्न करने का प्रयास करती है
मुझे ले जाती है
दूध पी चुके एक पेड़ और ख़ून पी चुकी एक लोमड़ी के बीच बने दर्रे से गुज़रने के लिए
शांति और षड्यंत्र के बीच से गुज़रने वाली किसी संधि की तरह

ओवरकोट से ढंकी हुई कुर्सी
पूरब की ओर बैठी है
उसका सिर सूरज है
वह एक बादल खोलती है और कहती है:
यह इतिहास का अंत है
देवताओं ने त्यागपत्र दे दिया है, मंदिरों में ताला जड़ गया है
तुम महज़ तस्वीरों से बना एक संकेत हो
जिसने अपनी आवाज़ खो दी है
*

धूमकेतु

लौट आओ या हमेशा के लिए चली जाओ
इस तरह दरवाज़े पर मत खड़ी रहो
पत्थर की किसी मूरत की तरह
जो हमारे बीच हर विषय पर बात करती है
और देखती इस तरह जैसे किसी जवाब की उम्मीद ही न हो

असलियत यह कि अंधेरा नहीं, बल्कि सूर्योदय है
जिसकी कल्पना करना ज़्यादा मुश्किल है
यह ढिबरी आखि़र कब तक जलती रहेगी
शायद उभरेगा अभी कोई धूमकेतु
खंडहरों के मलबों का निशान अपनी पूंछ से बनाता
और असफलताओं की एक सूची
जिन्हें वह चमकने देगा, जलने देगा और राख में बदलने देगा

लौट आओ, और हम अपना घर फिर बना लेंगे
या हमेशा के लिए चली जाओ, जैसे कि धूमकेतु
दहकता हुआ और उतना ही ठंडा जैसे धुंध
अंधेरे को निरस्त करता, और फिर अंधेरे में ही डूब जाता हुआ
दो शामों के बीच रहने वाले सफ़ेद गलियारे से गुज़रता हुआ
उस घाटी में जहां चारों ओर से गूंजती है प्रतिध्वनियां
तुम अकेली गाती हो
*

चित्र
(तिनतियान के लिए)

सुबह उतरती है बिना बांह वाली पोशाक पहने
सेब पूरी पृथ्वी पर ठोकर खाए लुढ़के हुए हैं
मेरी बेटी एक चित्र बना रही है
कितना विस्तृत होता है पांच साल की उम्र का आकाश
तुम्हारे नाम में दो खिड़कियां हैं
एक खुलती है सूरज की तरफ़ उसमें घड़ी जैसी कोई सुई नहीं
दूसरी खुलती है तुम्हारे पिता की ओर
जो निर्वासन के दिनों में कांटेदार साही जैसे हो गए हैं
अपने साथ कुछ नासमझ-से अक्षर और
एक चमकीला लाल सेब लेकर
वह तुम्हारे चित्र से बाहर निकल गए हैं
पांच साल की उम्र का आकाश कितना विस्तृत होता है

* तिनतियान : कवि ने अपनी बेटी का यह घरूनाम रखा था। चीनी भाषा में यह दो अक्षरों से लिखा जाता है और वे दोनों अक्षर अपनी आकृति में किसी खिड़की जैसे दिखते हैं। जब चीनी में चित्र शब्द लिखा जाता है, तो उसमें भी ये दोनों अक्षर आते हैं।
*

समय का गुलाब

जब पहरेदार सो जाता है
तुम तूफ़ान के साथ मुड़ जाते हो पीछे
गले लगते हुए बूढ़ा होते रहना
समय का गुलाब है

जब चिडिय़ों से बनी सड़क आसमान की परिभाषा गढ़ती है
तुम सूर्यास्त के पीछे झांककर देख लेना चाहते हो
गुमशुदगी के भीतर प्रकट हो जाना
समय का गुलाब है

जब चाक़ू पानी में घुसाकर मोड़ दिया गया हो
तुम बांसुरी से निकले गीतों पर चलते हुए पुल पार करते हो
षड्यंत्रों में रोना
समय का गुलाब है

जब एक क़लम क्षितिज का रेखाचित्र खींचता है
पूरब से बजने वाले घंटे की आवाज़ से तुम जाग जाते हो
प्रतिध्वनियों में फूल की तरह खिल उठना
समय का गुलाब है

आईने में हर वक़्त यह क्षण दिखता है
यह क्षण हमें पुनर्जन्म के द्वार तक ले जाता है
यह द्वार एक समंदर पर खुलता है जो
समय का गुलाब है
*

गुज़रती हुई सर्दियां

जागना : उत्तर की ओर के जंगल
पृथ्वी पर बेतहाशा जल्दबाज़ ढोलताल
सूरज की रोशनी की गाढ़ी शराब भरी है पेड़ों के तनों में
अंधेरे की बर्फ़ को हिला देती है
लोमडिय़ों के झुंड से भरा हृदय ज़ोरों से रोता है

हवा जो कुछ भी चुराती है वह हवा ही है
बर्फ़ की हानि झेलती हुई सर्दियां
अपने रूपक से कहीं बड़ी हैं
जो घर की याद से पीडि़त है उस राजा की तरह है
जो अपना राजपाट खो बैठा
उस चीज़ की तलाश में है जो हमेशा के लिए जा चुकी

समंदर हर जीवित वस्तु के मातम में है
सितारे प्रेम की चमक में हैं
पीतल की सींगों और बग़ीचे के दंगों के बीच से गुज़रती नदी की
इस चित्रावली का गवाह कौन है?

सुना तुमने? मेरी प्यारी
एक-दूसरे का हाथ थामे हम बूढ़े हो जाएं
शब्दों के नीचे अपनी निष्क्रियता को जीते हुए
समय को दुबारा बुनते हुए छूट जाएं हमसे कुछ गांठें
या छूट जाए एक कविता ही अधूरी
*

सड़क का गीत

विस्मृति के क्षणों में पेड़ों के बीच
गीतों पर कुत्ते हमला करते हैं
एक अनंत यात्रा के अंतिम छोर पर
रात सारी चाभियों को सोने की चाभी बना देती है
फिर भी तुम्हारे लिए कोई दरवाज़ा नहीं खुलता

एक लालटेन पीछा करती है
सर्दियों का प्राचीन सिद्धांत है यह
मैं सीधे तुम्हारी तरफ़ चलकर आता हूं
तुम इतिहास का पंखा खोलती हो
जिसे तुमने तह कर रखा था एक परित्यक्त गीत में

शाम की घंटियां धीरे-धीरे तुमसे सवाल करती हैं
तुम्हारे लिए प्रतिध्वनियां दो बार जवाब देती हैं
गाढ़ी रात धारा के खि़लाफ़ तैरती है
पेड़ों की जड़े गोपनीय ढंग से विद्युत पैदा करती हैं
तुम्हारा पूरा बग़ीचा जगमगा रहा है

मैं सीधा तुम्हारी तरफ़ चलकर आता हूं
सारी विदेशी सड़कों के मुहाने पर
जब आग भारी बर्फ़ पर ज़ोर-आज़माइश करती है
सारे साम्राज्य को सूर्यास्त अपनी मुहर से बंद कर देता है
पृथ्वी की किताब इस क्षण का पृष्ठ पलटती है
*

परंपरा के बारे में

ढलान पर खड़ी है पहाड़ी बकरी
कमान जैसा झुका हुआ पुल उसी दिन से जर्जर है
जिस दिन वह बना
क्षितिज को कौन समझ सकता है
साही के कांटों की तरह घने बरसों से गुज़रते हुए
दिन और रातों से, हवा में लटकते ध्वनि करते घुंघरू
उतने ही नैराश्य से भरे हैं
जितना गोदना गुदाए पुरुष, पुरखों की आवाज़ें मत सुनो
लंबी रात चुपचाप एक पत्थर के भीतर प्रवेश करती है
पत्थर को हिला देने की इच्छा
दरअसल एक पर्वत शृंखला है जो इतिहास की किताबों में उठती और गिरती है
*

अपराध में साझीदार

कई बरस गुज़र गए
अभ्रक अभी भी कीचड़ में जगमगाता है
चमकदार और दुष्ट रोशनी से
जैसे हाथों के जंगल में किसी करैत की आंखों में चमकता है सूरज
सड़क शाखाओं में बदलती है और खो जाती है
जहां एक तरुण हिरण है
शायद सिर्फ़ एक क़ब्रिस्तान ही इस अरण्य को बदल सकता है
और इसमें से एक क़स्बा संजो सकता है
आज़ादी और कुछ नहीं सिवाय उस दूरी के
जो शिकारी और शिकार के बीच होती है
जब मुड़कर हम पीछे देखते हैं
हमारे पुरखों के चित्रों की विशाल पृष्ठभूमि पर
चमगादड़ों की उड़ान से बना हुआ आर्क
गोधूलिवेला के साथ धीरे-धीरे धुंधला होता जाता है

हम दोषहीन नहीं हैं
बहुत पहले आईने के भीतर हम
इतिहास के अपराध में साझीदार हुए थे, उस दिन की प्रतीक्षा करते हुए
जिसे लावा में जमा कर देना था
और एक ठंडे बसंत में तब्दील हो जाना था
ताकि अंधकार से पुनर्मिलन हो सके
*

रेज़्यूमे

एक बार बतख़ की तरह चलता हुआ मैं चौराहे से गुज़रा
सिर मुंड़ाने से वह अनावृत्त था
बेहतर हो इसे मैं सूरज की इच्छा करना कहूं
लेकिन पागलपन के उस मौसम में
परली तरफ़ ठंडे चेहरे वाली बकरियों को देखकर मैंने
अपना रास्ता बदल लिया
जब मैंने अपने आदर्शों को देखा
ख़ाली काग़ज़ पर नमक से भरी हुई ऊबड़-खाबड़ भूमि की तरह
मैंने अपनी रीढ़ झुका दी
यह मानते हुए कि मैंने सत्य की अभिव्यक्ति का
एकमात्र रास्ता खोज लिया है
जैसे भुनी हुई एक मछली समुद्र का स्वप्न देखती है
जि़न्‍दाबाद...! मैं सिर्फ़ एक बार चीख़ा था, लानत है
उसके बाद मैंने दाढ़ी उगा ली
जो अनगिनत शताब्दियों की लटों में उलझी हुई थी
मैं इतिहास के साथ युद्ध करने को विवश हुआ
और चाक़ू की नोंक पर मैंने
अपनी आदर्श प्रतिमाओं के साथ एक पारिवारिक गठजोड़ स्थापित किया
बेशक ऐसा मैंने मक्खी की आंख में खंड-खंड बसी दुनिया से
तालमेल बिठाने के लिए नहीं किया था
आपस में एक अनंत कहा-सुनी में मुब्तिला किताबों के ढेर के बीच
हमने बहुत शांति से अपना-अपना हिस्सा बांट लिया
एक-एक सितारे को बेचकर जो कुछ सिक्के हमने कमाए थे
उन्हें एक ही रात में मैंने जुए में गंवा दिया
बिना बेल्ट के नग्न लौटा मैं इस दुनिया में
एक ख़ामोश सिगरेट सुलगाते हुए
जो कि एक बंदूक़ थी जो आधी रात को मृत्यु दे रही थी
जब स्वर्ग और धरती ने अपनी जगहें बदल लीं
मैं एक बूढ़े पेड़ पर उल्टा लटक गया
जो एक झाड़ू जैसा लग रहा था
बहुत दूर घूर रहा था
*

काला नक़्शा

अंत में ठंडे कौए सारे टुकड़े जोड़कर
रात बनाते हैं : एक काला नक़्शा
मैं घर पहुंच गया हूं - पीछे रास्ता
ग़लत रास्ते से भी ज़्यादा लंबा निकला
उतना ही लंबा जितना जीवन

जाड़ों का हृदय लाओ
जब चश्मे का पानी और बेतहाशा विशाल दवा-गोलियां
रात के शब्द बन जाती हैं
जब स्मृति भौंकती है
इंद्रधनुष काले बाज़ार पर प्रेतबाधा की तरह उगता है

मेरे पिता के जीवन की कौंध उतनी ही छोटी थी जितनी मटर का दाना
मैं उनकी प्रतिध्वनि हूं
मुलाक़ातों के कोनों को पलटता हुआ
एक पूर्व-प्रेमी चिट्ठियों से चकराती हवा के पीछे
छिप जाता है

बीजिंग, शराब का यह जाम
तुम्हारी राहबत्तियों के लिए
मेरे सफ़ेद बालों को इस अंधेरे नक़्शे से
रास्ता खोज निकालने दो
जैसे कि कोई तूफ़ान तुम्हें उड़ाए ले जा रहा हो

मैं क़तार में खड़ा इंतज़ार करता हूं
जब कि तक वह छोटी खिड़की बंद नहीं हो जाती :
ओ मेरे चमकीले चांद
मैं घर जा रहा हूं
जीवन में कुल जितनी अलविदा होती हैं
उनसे एक कम पुनर्मिलन होता है
*

नमक
(चिन सान लान्ग के साल्टवर्क नामक फोटोग्राफ़ को देखने के बाद)

निगेटिव पर काली रात का कोयला
लोगों के रोज़मर्रा के नमक में तब्दील हो जाता है
एक चिडिय़ा नई ऊंचाइयों को छूती है
छत पर लगे पैबंद
पृथ्वी को ज़्यादा दुरुस्त बनाते हैं

धुआं पेड़ों से भी ज़्यादा ऊंचाई पर पहुंचता है
यह जड़ों की स्मृति से निकलता है
भारी बर्फ़बारी की नक़ल करता हुआ
समय अपनी अमीरी का प्रदर्शन करता है
रोज़गार के अंधे कुएं
सुबह के दुख पर छलक-छलक जाते हैं


कांपती हुई चहारदीवारी पर चलती हुई शराबी हवा
सड़क पर गिर जाती है
कोहरे के भीतर कोई घंटी गूंजती है -
ऐसे कि बस धड़कता रह जाता है काग़ज़ का हृदय
*

पिता के लिए

फरवरी की एक सर्द सुबह
अंत में लगे सिंदूर के सारे वृक्ष उदासी का आकार हैं
पिता, तुम्हारी तस्वीर के सामने
आठ तहों में लिपटी हवा गोल मेज़ को शांत रखती है

बचपन की दिशा से
मैंने हमेशा तुम्हारी पीठ देखी
काले बादलों और भेड़ों के झुंड को तुम हांक कर ले जाते थे
सम्राटों की तरफ़ जाने वाली सड़कों पर चलते हुए

बड़बोली हवा अपने साथ बाढ़ ले आती है
गलियारों का तर्क लोगों के दिलों में बहुत गहरे गड़ा हुआ है
मुझे आज्ञा देते-देते तुम बेटे बन गए
तुम्हारा अनुसरण करता-करता मैं पिता बन गया

हथेली पर बहती है भाग्य की धारा
सूरज चांद सितारों को घुमाती रहती है
इकलौते एक पुरुष लैम्प के नीचे
हर चीज़ की दो-दो परछाईं बनती है

घड़ी की सुइयां दो भाई हैं जिनमें होड़ लगी हुई है
कि वे एक न्यूनकोण बना लें, फिर एक हो जाएं
बीमार तूफ़ान रात के अस्पताल में ढुलक रहा है
तुम्हारा दरवाज़ा खटखटाता हुआ

विदूषक की तरह आता है सूर्योदय
लपटें तुम्हारी बिस्तर की चादर बदलती हैं
घड़ी जहां रुकती है
समय का ढक्कन सीटी बजाता निकल जाता है

मृत्यु की उस गाड़ी को पकड़ें, चलिए,
बसंत के रास्ते पर
कोई चोर पहाड़ों के बीच ख़ज़ाना खोज निकालता है
कोई नदी चक्कर काटती है किसी गीत की उदासियों के
नारे दीवारों के भीतर छुप जाते हैं
यह दुनिया कोई ख़ास नहीं बदलती :
एक औरत मुड़ती है रात में घुल जाती है
सुबह होने पर एक आदमी बाहर निकलता है
*

इस दिन

हवा जानती है कि प्रेम क्या है
गर्मियों का यह दिन कौंधा रहा है शाही रंग
एक अकेला मछुआरा तमाम दुनिया के घावों का
जायज़ा लेता है
बजी हुई एक घंटी अपनी तरंगों से फूलती है
लोग दुपहरी में तफ़रीह कर रहे हैं
आइए, इस वर्ष के निहितार्थों में शामिल हो जाएं

कोई झुकता है एक पियानो की ओर
कोई एक सीढ़ी ढोता चला जाता है
कुछ मिनटों के लिए उनींदरे को स्थगित कर दिया गया है
कुछ मिनटों के लिए ही महज़
सूर्य शोध करता है परछाइयों का
और चमकदार शीशे से पानी पीते हुए
मैं भीतर के दुश्मन को देखता हूं

तेल का एक टैंकर
ऊंचे स्वर के एक गीत से खीझ उठता है समुद्र
भोर के तीन बजे मैं टिन का डिब्बा खोलता हूं
कुछ मछलियों को आग पर रखता हूं
*

हम

खोई हुई आत्माएं और बिखरी हुई रूहें
हाथ में लालटेन थाम
पीछा करती हैं बसंत का

घावों के निशान झिलमिलाते हैं, कटोरियां प्रदक्षिणा करती हैं
प्रकाश की उत्पत्ति हो रही है
उस जादुई क्षण को देखो
डाकख़ाने में सेंध लगाता है एक चोर
चिट्ठियां चीख़-पुकार मचाती हैं

नाख़ूनो ओ नाख़ूनो
गीत के बोल कभी बदलते नहीं
जलाऊ लकडिय़ां सिमटकर झुंड बना रहीं
श्रोताओं की तलाश में हैं जो उन्हें सुन सकें

जाड़ों के हृदय की तलाश करता
नदी का छोर
एक नाविक प्रतीक्षा करता है असीम गोधूलिवेला की

कोई न कोई तो होगा जो यक़ीनन प्रेम का पुनर्लेखन करेगा
*

फरवरी

अपने दोषों से मुक्त रात अब हर ओर से सटीक हो रही
मैं भाषा के भीतर तिर रहा हूं
मृत्यु के संगीत में निर्लज्जता
बर्फ़ से भरी हुई है

दिन में कौन अपने घावों से उबर पाता है
गाता हुआ जल, कसैला होने लगता है
ख़ून बहाती ज्वाला दुर्बल होती है
तेंदुओं की तरह सितारों की तरफ़ झपटती है
स्वप्न देखने के लिए
आपको शिल्प की ज़रूरत होगी

एक सर्द सुबह
जागता हुआ एक पक्षी
सत्य के और क़रीब पहुंचता है
मैं और मेरी कविता
डूब रहे होते हैं उस समय

किताब में फरवरी :
कुछ हलचलें और परछाइयां
*

चमकदार आईना

शराब में जब आधी रात बजती है
सत्य की ज्वालाएं बौरा जाती हैं
पीछे मुड़कर देखने को एक जगह चाहिए
जिसके पास कोई घर नहीं
इतनी ऊंचाई पर क्यों लटकती हैं खिड़कियां

तुम मृत्यु से थक चुके हो
सड़क जीवन से थक चुकी है
लपटों-से लाल उन समयों में
कोई दिन-भर आराम करता है और रात में सफ़र
एक देश के साथ शतरंज खेलता हुआ

लेकिन इतना ही नहीं है
लोग तुम्हारी नींद की खुदाई करते हैं
नीले पड़ जाते हैं
सुबह तुमसे थक चुकी है
चमकीला आईना भी अब शब्दों से थक चुका

प्रेम के बारे में सोचो
तुम ख़ुद को किसी नायक में बदला हुआ पाओगे
जहां स्वर्ग कांप उठता है धरती थर्रा जाती है
तुम ख़ुद से ही कहते हो
बहुत ठंड है
*

रात का पहरेदार

चांदनी नींद से छोटी है
हमारे कमरे से बहती गुज़रती है नदी
फ़र्नीचर इस तरह हैं जैसे बंदरगाह में खड़े हों

न केवल इतिहास की कथाएं
बल्कि नाजायज़ मौसम के
स्वीकृत चेहरे भी
हमें वर्षा वनों की तरफ़ ले जाते हैं
ओ! आंसुओं में एक सुरक्षा-रेखा बनी है

कांच के पेपरवेट अर्थ निकालते हैं
लेखन के आख्यान की चोटों का
कितने सारे काले पहाड़ों ने मिलकर रोका था
1949 का रास्ता

जहां एक बेनाम धुन ख़त्म होती है
फूल मुट्ठी तान चीख़ उठते हैं
*

पुरानी जगहें

मृत्यु हमेशा दूसरी तरफ़ बैठती है
पेंटिंग देखती हुई

अभी-अभी खिड़की पर
मैंने अपने बचपन का एक सूर्यास्त देखा
पुरानी जगहों की यात्रा फिर से करते हुए
मैं बेचैन हूं सच बता देने के लिए
लेकिन आसमान के सियाह हो जाने से पहले
कुछ और कहा जा सकता है क्या

एक प्याले में शब्द पीना
तुम्हें और ज़्यादा प्यासा बना देता है
मैं पृथ्वी को उद्धृत करने के लिए बारिश के पानियों में शामिल हो जाता हूं
और ख़ाली पहाड़ों में सुनता हूं
एक बांसुरीवादक के सुबकते हुए हृदय को

फ़रिश्ते चुंगी वसूल रहे हैं
पेंटिंग की दूसरी तरफ़ से लौटते हुए
उड़ते हुए उन कपालों से
सूर्यास्त के भीतर अपनी फ़ेहरिस्त से
*

दूर से दृश्य

समुद्री चिडिय़ा स्वप्न कूकती है
आस्था के आसमान का प्रतिरोध करते हुए
जब चारा दूध बन जाता है
हवा अपनी बारीकियों को खो देती है

अगर हवा घर की प्रतीक्षा है
तो सड़कें यक़ीनन उस प्रतीक्षा की भाषा हैं

सड़क के दूरस्थ छोर पर
इतिहास का मसख़रा
रात का भेस बनाकर टहलता है
और मेरे क़रीब आने लगता है

रात की पीठ से बाहर
एक असीमित कण है
प्रेमी जिसका दिल टूट गया
*

जवाब

नींव की कुंजी होती है नीचे गिरते जाना
कुलीनता समाधि-लेख होती है कुलीनों की
देखो यह उड़ता हुआ आसमान किस तरह ढंका हुआ है
मुर्दों की तिरती-लिपटती परछाइयों से

हिमयुग अब ख़त्म हो चुका है
फिर क्यों चारों तरफ़ यह हिम ही हिम है?
अच्छी आशाओं का लबादा यानी केप ऑफ गुड होप की खोज हो चुकी
फिर भी मृत सागर को जीतने को हज़ार नौकाएं क्यों तैयार हैं?

जब इस दुनिया में आया मैं
तो मेरे पास थे महज़ काग़ज़, रस्सी, परछाईं
निर्णय से पहले ही जिस आवाज़ पर निर्णय सुना दिया गया
उस आवाज़ के प्रमाण में मैं कहता हूं :

तुम्हें बता दं मैं, ऐ दुनिया
मैं - विश्वास - नहीं - करता
अगर हज़ार चुनौतीबाज़ तुम्हारे पैरों के नीचे रुंदे पड़े हैं
मुझे एक हज़ार एक वां गिन लेना

मैं विश्वास नहीं करता कि आसमान का रंग नीला है
मैं विश्वास नहीं करता कि तूफ़ानों की भी प्रतिध्वनि होती है
मैं विश्वास नहीं करता कि सपने झूठे होते हैं
मैं विश्वास नहीं करता कि मृत्यु का कोई बदला नहीं होता

अगर समंदर की नियति में यही है कि वह नहरों से छल करे
तो लाओ, सारा खारा पानी मेरे हृदय में उंड़ेल दो
अगर धरती की नियति में यही है कि वह बह जाए
तो मनुष्यता को फिर एक पर्वतचोटी चुनने दो अपने वजूद के लिए

झिलमिलाते सितारों का एक नया गुच्छा
अबाधित आसमान की शोभा बढ़ा रहा है :
यह पांच हज़ार साल पुराना रेखाचित्र है
ये आने वाली नस्लों की पहरेदार आंखें हैं
*

_______________________________________________________________________________


गीत चतुर्वेदी द्वारा किए गए बेई दाओ की इन कविताओं के अनुवाद

यानबिंग चेन, डेविड हिंटन, चेन माइपिंग, इयोना मान-चियोंग, बोनी एस. मैकडॉगल और एलियट वाइनबर्गर द्वारा चीनी से अंग्रेज़ी में किए गए अनुवादों पर आधारित हैं.


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सबद का प्रकाशन 18 मई 2008 को शुरू हुआ.

संपादन : अनुराग वत्स.

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