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गीत चतुर्वेदी : कॉलम 9 : पढ़ना भी एक कला है

अपने जीवन में पहला उपन्यास जो मैंने पूरा पढ़ा था, वह था- शिवप्रसाद सिंह का ‘गली आगे मुड़ती है।’ तब मैं सत्रह साल का था। पढ़ते ही मुझे शिवप्रसाद सिंह, रामानंद तिवारी (उपन्यास का नायक) और बनारस से प्यार हो गया। तब तक मुझे शिवप्रसाद सिंह की कीर्ति व अन्य बातों का कोई अंदाज़ा नहीं था, न ही कोई चिंता थी। मैंने तो बस एक किताब पढ़ी थी और उसके प्रेम में पड़ गया था। उस साधारण पाठक की तरह, जिसे किताब के शब्दों के अलावा लेखक के बारे में कोई जानकारी नहीं होती। मुझे लगता था, रामानंद तिवारी ही शिवप्रसाद सिंह है। किताब में वह संघर्ष करता है, ट्यूशन पढ़ाता है, धर्मभीरु रिश्तेदारों से बहस करता है, बनारस के भूगोल में भटकता है, मणिकर्णिका व दशाश्वमेध पर चिरायंध गंध को महसूस करता है, गंगा को नए-नए रंगों में देखता है, एक लड़की से प्रेम करता है, उसके विरह में दूसरी को दिल दे बैठता है, फिर उलझ जाता है कि किसको छोड़े, किसको पाये। उलझन की गली कभी सीधी नहीं चलती, आगे जाकर मुड़ जाती है।
मैं शिवप्रसाद सिंह की किताबें खोजने लगा। तग़ादे कर-करके मुंबई के एक पुस्तक-विक्रेता की जान खा ली। उनकी संपूर्ण कहानियों के दोनो…
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देवताओं के क़िस्से ख़त्म हो चुके

मनोज कुमार झा की पाँच नई कविताएँ

टूटे पत्थरों से पहाड़ बनाने हैं

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देवताओं के क़िस्से ख़त्म हो चुके हैं
अब वहां हांफता पूर्णविराम है
और थकाने वाली उदासी

मनुष्यों के किस्सों का तो आरम्भ है
आओ सँपेरों, चरवाहों, मछुआरों
पहाड़ तोड़ने वालों
अब तुम्हें टूटे पत्थरों से पहाड़ बनाने हैं।
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दुःख
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मैं दुःख कहता था
तो मां जली हुई रोटी समझती थी
मैं बार बार दुःख कहता था
दुःख का अनुवाद बार बार अधूरा रह जाता था

एक बार एक चुप्पा चरवाहे ने कहा
जिसे कुछ लोग पागल भी कहते हैं
कि चिड़ियों का दुःख पंख है
जिसके कारण पृथ्वी उन्हें आसमान में धकेल देती है
मुझे आश्चर्य हुआ
कि क्या मेरा दुःख मन है
जिस कारण राजा का चेहरा गिद्ध के चेहरे की तरह दिखता है।
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सारा जीवन
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बारिश होती थी तो कागज की नाव बनाता था
नाव थोड़ी दूर चलती और गल जाती थी
गलना तब सहज क्रिया थी
दूसरी नाव बनाने की पूर्व-कथा।

तब पता नहीं था कि बाद में
नदियों को पार करने का समय आएगा तो भी
कागज की नाव ही मिलेगी
एक नष्ट हो रहे जीवन की उत्तर-कथा।
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ट्रोलिंग
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गालियां यहां सही होने का फल है
उन गालियों को भूल जाओ
जो स…

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 8 : बिल्लियाँ

मेरा बचपन बिल्लियों के बीच बीता। सत्रह साल तक उनकी कई पीढ़ियाँ हमारे घर में रहीं। हमने उन्हें नहीं चुना, उन्होंने हमें चुना था। वे अपनी मर्ज़ी से हमारे यहाँ आईं, हमारे सुख-दुख की उदासीन साक्षी रहीं, हमें बहुत सारी मुस्कानें दीं, कई बार हमें रुलाया, और एक दिन चली गईं।
तब मैं सात साल का था। एक रोज़ हमारे पड़ोस से बिल्ली की आवाज़ें आने लगीं। साधारण-सी म्याऊँ-म्याऊँ थोड़ी देर बाद बेचैन, मोटी म्याऊँ में बदलने लगी। हमारे आँगनों के बीच पाँच फीट ऊँची दीवार थी। बड़े लोग थोड़ा-सा उचककर एक-दूसरे के आँगनों में पूरी तरह झाँक लिया करते थे। हम बच्चों को आँगन के पार झाँकने के लिए स्टूल लगाना पड़ता था। बिल्ली की भाँति-भाँति की आवाज़ों से आकर्षित होकर हमने दीवार के पास स्टूल लगाया और झाँककर उस पार देखने लगे। पड़ोस के आँगन में, किनारे एक सुंदर-सी, बड़े मटमैले बालों वाली बिल्ली बैठी थी। उसके गले में कॉलर था, वह लोहे की पतली ज़ंजीर से बँधी हुई थी। पास ही एक कटोरी में पानी, दूसरी में दूध रखा हुआ था। दीवार के पार से झाँकते हमारे चेहरों को देख बिल्ली की बेचैन आवाज़ें बढ़ गईं। वह बिना रुके चिल्ला रही थी। हम द…

मनोज कुमार झा की नई कविताएं

मासूमियत में पराजित
वो निहायत मासूम था
इतना मासूम कि उसे इस कठिन जाड़े में भी गर्म कपड़े नही थे
चप्पल किसी के थे जिसे अब उसके पैरों ने कबूल लिया था
रात के तीन थे और मैं स्टेशन पर चाय पी रहा था
वो अंगीठी में हाथ सेंक रहा था जो चायवाले को बुरा लग रहा था
हम दोनों ठंड में थे ,मेरे पास मफलर था और उसके पास खुले कान
वो इस शहर में नया था,शहर उसके लिए नया नहीं था
वो कई शहर देख चुका था और जान चुका था कि हर शहर के दस्ताने एक से होते हैं
हर शहर उसकी

गीत चतुर्वेदी : कॉलम 7 : आप किसके लिए लिखते हैं?

1996-97 का समय। 19-20 साल का एक युवक (यानी मैं), मुंबई में नरीमन पॉइंट पर बैठ, दूसरे युवक (यानी एक प्यारा कवि-मित्र) से पूछता है, “तू किसके लिए लिखता है?”

वह जवाब देता है, “मैं समाज के शोषित-पीड़ित-दमित वर्ग के लिए लिखता हूँ। मैं राशन की दुकान व रोज़गार कार्यालय की क़तार में खड़े तमाम व्यक्तियों के लिए लिखता हूँ, और ख़ासकर उस आख़िरी व्यक्ति के लिए, जिसका नंबर कभी नहीं आएगा। मैं हारे हुए आदमी के लिए कविता लिखता हूँ।”
मैंने कहा, “बड़ा प्रभावित करने वाला जवाब है, रे! लेकिन इनमें से कोई भी तेरी कविताएँ नहीं पढ़ता।”
वह: “भले न पढ़ें, लेकिन मैं उन्हीं को ध्यान में रखकर लिखता हूँ।”
मैं: “यानी ऐसा कह सकते हैं कि तू जिन लोगों को ध्यान में रखकर लिखता है, वे तुझे नहीं पढ़ते। और जो लोग तुझे पढ़ते हैं, तूने उनके लिए लिखा ही नहीं, नाहक़ वे तुझे पढ़ते हैं।”
फँसा हुआ महसूस कर, उसने अपना गोल चश्मा ठीक करते हुए मेरी ओर देखा और मेरी बात में छिपी शरारत को ताड़कर हँस पड़ा, बोला, “बहुत मारूँगा।”
हम दोनों हँसने लगे और सवाल आया-गया हो गया। लेकिन उसके जवाब से यह ज़ाहिर हो गया था कि मुंबई की गोष्ठियों में वह, उन व…